अंग 1427

अंग
1427
राग Salok Mehl 9
राग: Salok Mehl 9 · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोक महला 9 का हिस्सा। पूरे 57 सलोक की commentary /salok-mahalla-9/ पर है।
ਜਿਹ ਸਿਮਰਤ ਗਤਿ ਪਾਈਐ ਤਿਹ ਭਜੁ ਰੇ ਤੈ ਮੀਤ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨੁ ਰੇ ਮਨਾ ਅਉਧ ਘਟਤ ਹੈ ਨੀਤ ॥੧੦॥
जिह सिमरत गति पाईऐ तिह भजु रे तै मीत ॥
कहु नानक सुनु रे मना अउध घटत है नीत ॥१०॥

हिन्दी अर्थ: हे मित्र ! तू उस परमात्मा का भजन किया कर। जिसका नाम सिमरने से ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त होती है। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। उम्र घटती जा रही है (परमात्मा का सिमरन ना बिसार)। 10।
ਪਾਂਚ ਤਤ ਕੋ ਤਨੁ ਰਚਿਓ ਜਾਨਹੁ ਚਤੁਰ ਸੁਜਾਨ ॥
ਜਿਹ ਤੇ ਉਪਜਿਓ ਨਾਨਕਾ ਲੀਨ ਤਾਹਿ ਮੈ ਮਾਨੁ ॥੧੧॥
पांच तत को तनु रचिओ जानहु चतुर सुजान ॥
जिह ते उपजिओ नानका लीन ताहि मै मानु ॥११॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे चतुर मनुष्य ! हे समझदार मनुष्य ! तू जानता है कि (तेरा ये) शरीर (परमात्मा ने) पाँच तत्वों से बनाया है। (ये भी) यकीन जान कि जिन तत्वों से (ये शरीर) बना है (दोबारा) उनमें ही लीन हो जाएगा (फिर इस शरीर के झूठे मोह में फस के परमात्मा का सिमरन क्यों भुला रहा है। 11।
ਘਟ ਘਟ ਮੈ ਹਰਿ ਜੂ ਬਸੈ ਸੰਤਨ ਕਹਿਓ ਪੁਕਾਰਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਭਜੁ ਮਨਾ ਭਉ ਨਿਧਿ ਉਤਰਹਿ ਪਾਰਿ ॥੧੨॥
घट घट मै हरि जू बसै संतन कहिओ पुकारि ॥
कहु नानक तिह भजु मना भउ निधि उतरहि पारि ॥१२॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे मन ! संत जनों ने ऊँचा-ऊँचा पुकार के बता दिया है कि परमात्मा हरेक शरीर में बस रहा है। तू उस (परमात्मा) का भजन किया कर। (भजन की बरकति से) संसार-समुंद्र से तू पार लांघ जाएगा। 12।
ਸੁਖੁ ਦੁਖੁ ਜਿਹ ਪਰਸੈ ਨਹੀ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨੁ ਰੇ ਮਨਾ ਸੋ ਮੂਰਤਿ ਭਗਵਾਨ ॥੧੩॥
सुखु दुखु जिह परसै नही लोभु मोहु अभिमानु ॥
कहु नानक सुनु रे मना सो मूरति भगवान ॥१३॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य (के हृदय) को सुख-दुख नहीं छू सकता। लोभ मोह अहंकार नहीं पोह सकता (भाव। जो मनुष्य सुख-दुख के समय आत्मिक जीवन से नहीं डोलता। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। जिस पर लोभ-मोह-अहंकार अपना जोर नहीं डाल सकता) वह मनुष्य (साक्षात) परमात्मा का रूप है। 13।
ਉਸਤਤਿ ਨਿੰਦਿਆ ਨਾਹਿ ਜਿਹਿ ਕੰਚਨ ਲੋਹ ਸਮਾਨਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਮੁਕਤਿ ਤਾਹਿ ਤੈ ਜਾਨਿ ॥੧੪॥
उसतति निंदिआ नाहि जिहि कंचन लोह समानि ॥
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥१४॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य (के मन) को उस्तति नहीं (डाँवा-डोल कर सकती)। जिसको सोना और लोहा एक समान (दिखते हैं। भाव। जो लालच में नहीं फसता)। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। यह बात (पक्की) समझो कि उसको मोह से छुटकारा मिल चुका है। 14।
ਹਰਖੁ ਸੋਗੁ ਜਾ ਕੈ ਨਹੀ ਬੈਰੀ ਮੀਤ ਸਮਾਨਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਮੁਕਤਿ ਤਾਹਿ ਤੈ ਜਾਨਿ ॥੧੫॥
हरखु सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥१५॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के हृदय में खुशी-ग़मी अपना जोर नहीं डाल सकती। जिसको वैरी और मित्र एक जैसे (मित्र ही) प्रतीत होते हैं। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। तू ये बात पक्की समझ कि उसको माया के मोह से निजात मिल चुकी है। 15।
ਭੈ ਕਾਹੂ ਕਉ ਦੇਤ ਨਹਿ ਨਹਿ ਭੈ ਮਾਨਤ ਆਨ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਗਿਆਨੀ ਤਾਹਿ ਬਖਾਨਿ ॥੧੬॥
भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन ॥
कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि ॥१६॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य किसी को (कोई) डरावे नहीं देता। और किसी से भयभीत (भी) नहीं होता (धमकियों डरावों से घबराता नहीं ) हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। उसको आत्मिक जीवन की सूझ वाला समझ। 16।
ਜਿਹਿ ਬਿਖਿਆ ਸਗਲੀ ਤਜੀ ਲੀਓ ਭੇਖ ਬੈਰਾਗ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨੁ ਰੇ ਮਨਾ ਤਿਹ ਨਰ ਮਾਥੈ ਭਾਗੁ ॥੧੭॥
जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह नर माथै भागु ॥१७॥

हिन्दी अर्थ: जिस (मनुष्य) ने (काम क्रोध लोभ मोह अहंकार निंदा ईष्या आदि) सारी की सारी माया त्याग दी। (उसने ही सही) वैराग का (सही) भेष धारण किया (समझो)। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। उस मनुष्य के माथे पर (अच्छे) भाग्य (जागे समझ)। 17।
ਜਿਹਿ ਮਾਇਆ ਮਮਤਾ ਤਜੀ ਸਭ ਤੇ ਭਇਓ ਉਦਾਸੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨੁ ਰੇ ਮਨਾ ਤਿਹ ਘਟਿ ਬ੍ਰਹਮ ਨਿਵਾਸੁ ॥੧੮॥
जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह घटि ब्रहम निवासु ॥१८॥

हिन्दी अर्थ: जिस (मनुष्य) ने माया का मोह छोड़ दिया। (जो मनुष्य माया के कामादिक) सारे विकारों से उपराम हो गया। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। उसके दिल में (प्रत्यक्ष तौर पर) परमात्मा का निवास हो जाता है।
ਜਿਹਿ ਪ੍ਰਾਨੀ ਹਉਮੈ ਤਜੀ ਕਰਤਾ ਰਾਮੁ ਪਛਾਨਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਵਹੁ ਮੁਕਤਿ ਨਰੁ ਇਹ ਮਨ ਸਾਚੀ ਮਾਨੁ ॥੧੯॥
जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥
कहु नानक वहु मुकति नरु इह मन साची मानु ॥१९॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने करतार सृजनहार के साथ गहरी सांझ डाल के (अपने अंदर से) अहंकार त्याग दिया। हे नानक ! कह- हे मन ! ये बात सच्ची समझ कि वह मनुष्य (ही) मुक्त है। 19।
ਭੈ ਨਾਸਨ ਦੁਰਮਤਿ ਹਰਨ ਕਲਿ ਮੈ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮੁ ॥
ਨਿਸਿ ਦਿਨੁ ਜੋ ਨਾਨਕ ਭਜੈ ਸਫਲ ਹੋਹਿ ਤਿਹ ਕਾਮ ॥੨੦॥
भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥
निसि दिनु जो नानक भजै सफल होहि तिह काम ॥२०॥

हिन्दी अर्थ: इस कलेशों भरे संसार में परमात्मा का नाम (ही) सारे डर नाश करने वाला है। खोटी मति दूर करने वाला है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जो मनुष्य प्रभू का नाम रात दिन जपता रहता है उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। 20।
ਜਿਹਬਾ ਗੁਨ ਗੋਬਿੰਦ ਭਜਹੁ ਕਰਨ ਸੁਨਹੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਪਰਹਿ ਨ ਜਮ ਕੈ ਧਾਮ ॥੨੧॥
जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥
कहु नानक सुनि रे मना परहि न जम कै धाम ॥२१॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (अपनी) जीभ से परमात्मा के गुणों का जाप किया करो। (अपने) कानों से परमात्मा का नाम सुना करो। हे नानक ! कह- हे मन ! (जो मनुष्य नाम जपते हैं। वे) जमों के वश नहीं पड़ते। 21।
ਜੋ ਪ੍ਰਾਨੀ ਮਮਤਾ ਤਜੈ ਲੋਭ ਮੋਹ ਅਹੰਕਾਰ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਆਪਨ ਤਰੈ ਅਉਰਨ ਲੇਤ ਉਧਾਰ ॥੨੨॥
जो प्रानी ममता तजै लोभ मोह अहंकार ॥
कहु नानक आपन तरै अउरन लेत उधार ॥२२॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई !) जो मनुष्य (अपने अंदर से माया की) ममता त्यागता है। लोभ मोह और अहंकार को दूर करता है। वह स्वयं (भी इस संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है और औरों को भी (विकारों से) बचा लेता है। 22।
ਜਿਉ ਸੁਪਨਾ ਅਰੁ ਪੇਖਨਾ ਐਸੇ ਜਗ ਕਉ ਜਾਨਿ ॥
ਇਨ ਮੈ ਕਛੁ ਸਾਚੋ ਨਹੀ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਭਗਵਾਨ ॥੨੩॥
जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥
इन मै कछु साचो नही नानक बिनु भगवान ॥२३॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) जैसे (सोए हुए) सपना (आता है) और (और उस सपने में कई पदार्थ हम) देखते हैं। वैसे ही इस जगत को समझ ले। परमात्मा के नाम के बिना (जगत में दिखाई दे रहे) इन (पदार्थों) में कोई भी पदार्थ सदा साथ निभाने वाला नहीं। 23।
ਨਿਸਿ ਦਿਨੁ ਮਾਇਆ ਕਾਰਨੇ ਪ੍ਰਾਨੀ ਡੋਲਤ ਨੀਤ ॥
ਕੋਟਨ ਮੈ ਨਾਨਕ ਕੋਊ ਨਾਰਾਇਨੁ ਜਿਹ ਚੀਤਿ ॥੨੪॥
निसि दिनु माइआ कारने प्रानी डोलत नीत ॥
कोटन मै नानक कोऊ नाराइनु जिह चीति ॥२४॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) माया (इकट्ठी करने) की खातिर मनुष्य सदा रात-दिन भटकता फिरता है। करोड़ों (लोगों) में कोई विरला (ऐसा होता) है। जिसके मन में परमात्मा की याद टिकी होती है। 24।
ਜੈਸੇ ਜਲ ਤੇ ਬੁਦਬੁਦਾ ਉਪਜੈ ਬਿਨਸੈ ਨੀਤ ॥
ਜਗ ਰਚਨਾ ਤੈਸੇ ਰਚੀ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨਿ ਮੀਤ ॥੨੫॥
जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥
जग रचना तैसे रची कहु नानक सुनि मीत ॥२५॥

हिन्दी अर्थ: जैसे पानी से सदा बुलबुला पैदा होता है और नाश होता रहता है। हे नानक ! कह- हे मित्र ! सुन। वैसे ही (परमात्मा ने) जगत की (यह) खेल बनाई हुई है। 25। पर।
ਪ੍ਰਾਨੀ ਕਛੂ ਨ ਚੇਤਈ ਮਦਿ ਮਾਇਆ ਕੈ ਅੰਧੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਪਰਤ ਤਾਹਿ ਜਮ ਫੰਧ ॥੨੬॥
प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन परत ताहि जम फंध ॥२६॥

हिन्दी अर्थ: माया के नशे में (आत्मिक जीवन से) अंधा हुआ मनुष्य (आत्मिक जीवन के बारे में) कुछ भी नहीं सोचता। हे नानक ! कह- परमात्मा के भजन के बिना (ऐसे मनुष्य को) जमों के फंदे पड़े रहते हैं। 26।
ਜਉ ਸੁਖ ਕਉ ਚਾਹੈ ਸਦਾ ਸਰਨਿ ਰਾਮ ਕੀ ਲੇਹ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਨਿ ਰੇ ਮਨਾ ਦੁਰਲਭ ਮਾਨੁਖ ਦੇਹ ॥੨੭॥
जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ॥
कहु नानक सुनि रे मना दुरलभ मानुख देह ॥२७॥

हिन्दी अर्थ: जो (मनुष्य) आत्मिक आनंद (हासिल करना) चाहता है। तो (उसको चाहिए कि) परमात्मा की शरण पड़ा रहे। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। ये मनुष्य-शरीर बड़ी मुश्किल से मिलता है (इसको माया की खातिर भटकने में ही नहीं व्यर्थ गवा देना चाहिए)। 27।
ਮਾਇਆ ਕਾਰਨਿ ਧਾਵਹੀ ਮੂਰਖ ਲੋਗ ਅਜਾਨ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਜਨ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਸਿਰਾਨ ॥੨੮॥
माइआ कारनि धावही मूरख लोग अजान ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन बिरथा जनमु सिरान ॥२८॥

हिन्दी अर्थ: मूर्ख बेसमझ बंदे (निरी) माया (इकट्ठी करने) के लिए भटकते रहते हैं। हे नानक ! कह- (हे भाई !) परमात्मा के भजन के बिना (उनका ये मनुष्य-) जनम व्यर्थ बीत जाता है। 28।
ਜੋ ਪ੍ਰਾਨੀ ਨਿਸਿ ਦਿਨੁ ਭਜੈ ਰੂਪ ਰਾਮ ਤਿਹ ਜਾਨੁ ॥
जो प्रानी निसि दिनु भजै रूप राम तिह जानु ॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य रात-दिन (हर वक्त परमात्मा का नाम) जपता रहता है। उसको परमात्मा का रूप समझो।

संदर्भ: यह अंग 1427 है, राग Salok Mehl 9 का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji।

Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 20 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1427” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Salok Mehl 9 राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1428 →, पीछे का: ← अंग 1426

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।