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1426
वारों से अतिरिक्त सलोक · सलोक महला 9
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- जिसहि उधारे नानका सो सिमरे सिरजणहारु ॥15॥
- गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥
- बिखिअन सिउ काहे रचिओ निमख न होहि उदासु ॥
- तरनापो इउ ही गइओ लीओ जरा तनु जीति ॥
- बिरधि भइओ सूझै नही कालु पहूचिओ आनि ॥
- धनु दारा संपति सगल जिनि अपुनी करि मानि ॥
- पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ ॥
- तनु धनु जिह तो कउ दीओ तां सिउ नेहु न कीन ॥
- तनु धनु संपै सुख दीओ अरु जिह नीके धाम ॥
- सभ सुख दाता रामु है दूसर नाहिन कोइ ॥
· सलोक
जिसहि उधारे नानका सो सिमरे सिरजणहारु ॥15॥
जिसहि उधारे नानका सो सिमरे सिरजणहारु ॥15॥
दूजी छोडि कुवाटड़ी इकस सउ चितु लाइ ॥
दूजै भावंी नानका वहणि लुड़॑ंदड़ी जाइ ॥16॥
तिहटड़े बाजार सउदा करनि वणजारिआ ॥
सचु वखरु जिनी लदिआ से सचड़े पासार ॥17॥
पंथा प्रेम न जाणई भूली फिरै गवारि ॥
नानक हरि बिसराइ कै पउदे नरकि अंध्यार ॥18॥
माइआ मनहु न वीसरै मांगै दंमां दंम ॥
सो प्रभु चिति न आवई नानक नही करंमि ॥19॥
तिचरु मूलि न थुड़ंीदो जिचरु आपि क्रिपालु ॥
सबदु अखुटु बाबा नानका खाहि खरचि धनु मालु ॥20॥
खंभ विकांदड़े जे लहां घिंना सावी तोलि ॥
तंनि जड़ांई आपणै लहां सु सजणु टोलि ॥21॥
सजणु सचा पातिसाहु सिरि साहां दै साहु ॥
जिसु पासि बहिठिआ सोहीऐ सभनां दा वेसाहु ॥22॥
दूजी छोडि कुवाटड़ी इकस सउ चितु लाइ ॥
दूजै भावंी नानका वहणि लुड़॑ंदड़ी जाइ ॥16॥
तिहटड़े बाजार सउदा करनि वणजारिआ ॥
सचु वखरु जिनी लदिआ से सचड़े पासार ॥17॥
पंथा प्रेम न जाणई भूली फिरै गवारि ॥
नानक हरि बिसराइ कै पउदे नरकि अंध्यार ॥18॥
माइआ मनहु न वीसरै मांगै दंमां दंम ॥
सो प्रभु चिति न आवई नानक नही करंमि ॥19॥
तिचरु मूलि न थुड़ंीदो जिचरु आपि क्रिपालु ॥
सबदु अखुटु बाबा नानका खाहि खरचि धनु मालु ॥20॥
खंभ विकांदड़े जे लहां घिंना सावी तोलि ॥
तंनि जड़ांई आपणै लहां सु सजणु टोलि ॥21॥
सजणु सचा पातिसाहु सिरि साहां दै साहु ॥
जिसु पासि बहिठिआ सोहीऐ सभनां दा वेसाहु ॥22॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! जिस (जीव) को वह विकारों से निकालता है, वह उस सृजनहार करतार को सिमरने लग जाता है। 15। हे भाई! सिर्फ एक परमात्मा के साथ (अपना) चित्त जोड़े रखें। (प्रभू की याद के बिना) माया के मोह वाला कोझा रास्ता छोड़ दें। हे नानक! औरों के प्यार में (फसने से)। जीव-स्त्री (विकारों के) बहाव में बहती चली जाती है। 16। हे भाई! (जगत में हरी-नाम का) वणज करने आए हुए जीव (आम तौर पर) माया के तीन गुणों के प्रभाव तले ही दुनिया के कार्य-व्यवहार करते रहते हैं। असल व्यापारी वे हैं जिन्होंने (यहाँ से) सदा-स्थिर हरी-नाम (का) सौदा लादा है। 17। हे भाई! जो जीव-स्त्री (परमात्मा के) प्रेम का रास्ता नहीं जानती। वह मूर्ख स्त्री जीवन के सही राह सें टूट के भटकती फिरती है। हे नानक! परमात्मा (की याद) भुला के जीव घोर नरक में पड़े रहते हैं। 18। हे भाई! (माया-ग्रसित मनुष्य के) मन से माया कभी नहीं भूलती। (वह हर वक्त) धन ही धन तलाशता रहता है। वह परमात्मा (जो सब कुछ देने वाला है। उसके) चित्त में नहीं आता। पर, हे नानक! (वह माया-ग्रसित मनुष्य भी क्या करे। नाम-धन उसकी) किस्मत में है ही नहीं। 19। हे नानक (कहें:) हे भाई! परमात्मा की सिफतसालाह ऐसा धन है ऐसा माल है जो कभी खत्म नहीं होता। (इस धन को स्वयं) इस्तेमाल किया करें। (औरों को भी) बाँटा करें। जब तक परमात्मा स्वयं दयावान रहता है, तब तक यह धन कभी समाप्त नहीं होता। 20। हे भाई! अगर मैं कहीं पंख ढूँढ लूँ, तो मैं अपना-आप दे के उसके बराबर तोल के वह पंख ले लूँ। मैं वह पंख अपने शरीर पर जड़ लूँ और (उड़ान भर के) तलाश के उस सज्जन-प्रभू का मिलाप हासिल कर लूँ (भाव, स्वै-भाव सदके करने से ही वह आत्मिक उड़ान भरी जा सकती है जिसकी बरकति से परमात्मा मिल जाता है)। 21। हे भाई! (असल) मित्र सदा कायम रहने वाला प्रभू-पातशाह है जो (दुनिया के सारे) पातशाहों के सिर पर पातशाह है (सब दुनिया के बादशाहों से बड़ा है)। वह प्रभू-पातशाह सब जीवों का आसरा है। (वह ऐसा है कि) उसके पास बैठने से (लोक-परलोक की) शोभा कमा ली जाती है। 22।
· सलोक
गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक महला 9 ॥
गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥
कहु नानक हरि भजु मना जिह बिधि जल कउ मीनु ॥1॥
सलोक महला 9 ॥
गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥
कहु नानक हरि भजु मना जिह बिधि जल कउ मीनु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला 9 ॥ हे भाई! अगर आपने परमात्मा के गुण कभी नहीं गाए, तो आपने अपना मानस जन्म निकम्मा कर लिया। हे नानक! कहें-हे मन! परमात्मा का भजन किया करें (और, उसको इस तरह जिंदगी का आसरा बनाएँ) जैसे पानी को मछली (अपनी जिंद का आसरा बनाए रखती है)। 1।
· सलोक
बिखिअन सिउ काहे रचिओ निमख न होहि उदासु ॥
बिखिअन सिउ काहे रचिओ निमख न होहि उदासु ॥
कहु नानक भजु हरि मना परै न जम की फास ॥2॥
कहु नानक भजु हरि मना परै न जम की फास ॥2॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई! आप विषयों के साथ (इतना) मस्त क्यों रहते हैं। आप आँख झपकने जितने समय के लिए भी विषयों से चित्त नहीं हटाते। हे नानक! कहें: हे मन! परमात्मा का भजन किया करें। (भजन की बरकति से) जमों का फंदा (गले में) नहीं पड़ता। 2।
· सलोक
तरनापो इउ ही गइओ लीओ जरा तनु जीति ॥
तरनापो इउ ही गइओ लीओ जरा तनु जीति ॥
कहु नानक भजु हरि मना अउध जातु है बीति ॥3॥
कहु नानक भजु हरि मना अउध जातु है बीति ॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई! (आपकी) जवानी बेपरवाही में ही गुजर गई। (अब) बुढ़ापे ने आपके शरीर को जीत लिया है। हे नानक! कहें: हे मन! परमात्मा का भजन किया करें। उम्र गुजरती जा रही है। 3।
· सलोक
बिरधि भइओ सूझै नही कालु पहूचिओ आनि ॥
बिरधि भइओ सूझै नही कालु पहूचिओ आनि ॥
कहु नानक नर बावरे किउ न भजै भगवानु ॥4॥
कहु नानक नर बावरे किउ न भजै भगवानु ॥4॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: हे झल्ले मनुष्य! आप क्यों परमात्मा का भजन नहीं करते। (देखिए। अब आप) बूढ़े हो गए हैं (पर, आपको अभी भी यह) समझ नहीं आ रही कि मौत (सिर पर) आ पहुँची है। 4।
· सलोक
धनु दारा संपति सगल जिनि अपुनी करि मानि ॥
धनु दारा संपति सगल जिनि अपुनी करि मानि ॥
इन मै कछु संगी नही नानक साची जानि ॥5॥
इन मै कछु संगी नही नानक साची जानि ॥5॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें: हे भाई!) धन, स्त्री, सारी जायदाद, (इसको) अपनी कर के ना मानें। ये बात सच्ची समझें कि इन सभी में से कोई एक भी आपका साथी नहीं बन सकता। 5।
· सलोक
पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ ॥
पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ ॥
कहु नानक तिह जानीऐ सदा बसतु तुम साथि ॥6॥
कहु नानक तिह जानीऐ सदा बसतु तुम साथि ॥6॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: (हे भाई!) प्रभू जी विकारियों को विकारों से बचाने वाले हैं। सारे डर दूर करने वाले हैं। और अनाथों के नाथ हैं। हे भाई! उस (प्रभू) को (इस प्रकार) समझना चाहिए कि वह सदा आपके साथ बसता है। 6।
· सलोक
तनु धनु जिह तो कउ दीओ तां सिउ नेहु न कीन ॥
तनु धनु जिह तो कउ दीओ तां सिउ नेहु न कीन ॥
कहु नानक नर बावरे अब किउ डोलत दीन ॥7॥
कहु नानक नर बावरे अब किउ डोलत दीन ॥7॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: हे झल्ले मनुष्य! जिस (परमात्मा) ने आपको शरीर दिया। धन दिया। आपने उसके साथ प्यार नहीं डाला। फिर अब दीन-हीन बन के (आतुर हो के) घबराए क्यों फिरते हैं (भाव, उस हरी को ना याद करने के कारण घबराना तो हुआ ही)। 7।
· सलोक
तनु धनु संपै सुख दीओ अरु जिह नीके धाम ॥
तनु धनु संपै सुख दीओ अरु जिह नीके धाम ॥
कहु नानक सुनु रे मना सिमरत काहि न रामु ॥8॥
कहु नानक सुनु रे मना सिमरत काहि न रामु ॥8॥
हिन्दी अर्थ: जिस (परमात्मा) ने शरीर दिया। धन दिया। जायदाद दी। सुख दिए और सुंदर घर दिए। हे नानक! कहें: हे मन! सुनें। उस परमात्मा का आप सिमरन क्यों नहीं करते? 8।
· सलोक
सभ सुख दाता रामु है दूसर नाहिन कोइ ॥
सभ सुख दाता रामु है दूसर नाहिन कोइ ॥
कहु नानक सुनि रे मना तिह सिमरत गति होइ ॥9॥
कहु नानक सुनि रे मना तिह सिमरत गति होइ ॥9॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा (ही) सारे सुख देने वाला है। (उसके बराबर का और) कोई दूसरा नहीं। हे नानक! कहें: हे मन! उस (का नाम) सिमरते हुए ऊँची आत्मिक अवस्था (भी) प्राप्त हो जाती है। 9।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; महला 9: गुरु तेग बहादुर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1426 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।