अंग 1426

अंग
1426
राग Salok Mehl 9
राग: Salok Mehl 9 · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोक महला 9 का हिस्सा। पूरे 57 सलोक की commentary /salok-mahalla-9/ पर है।
जिसहि उधारे नानका सो सिमरे सिरजणहारु ॥१५॥
दूजी छोडि कुवाटड़ी इकस सउ चितु लाइ ॥
दूजै भावंी नानका वहणि लुड़॑ंदड़ी जाइ ॥१६॥
तिहटड़े बाजार सउदा करनि वणजारिआ ॥
सचु वखरु जिनी लदिआ से सचड़े पासार ॥१७॥
पंथा प्रेम न जाणई भूली फिरै गवारि ॥
नानक हरि बिसराइ कै पउदे नरकि अंध्यार ॥१८॥
माइआ मनहु न वीसरै मांगै दंमां दंम ॥
सो प्रभु चिति न आवई नानक नही करंमि ॥१९॥
तिचरु मूलि न थुड़ंीदो जिचरु आपि क्रिपालु ॥
सबदु अखुटु बाबा नानका खाहि खरचि धनु मालु ॥२०॥
खंभ विकांदड़े जे लहां घिंना सावी तोलि ॥
तंनि जड़ांई आपणै लहां सु सजणु टोलि ॥२१॥
सजणु सचा पातिसाहु सिरि साहां दै साहु ॥
जिसु पासि बहिठिआ सोहीऐ सभनां दा वेसाहु ॥२२॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जिस (जीव) को वह विकारों में निकालता है। वह उस सृजनहार करतार को सिमरने लग जाता है। 15। हे भाई ! सिर्फ एक परमात्मा के साथ (अपना) चिक्त जोड़े रख। (प्रभू की याद के बिना) माया के मोह वाला कोझा रास्ता छोड़ दे। हे नानक ! औरों के प्यार में (फसने से)। जीव-स्त्री (विकारों के) बहाव में बहती चली जाती है। 16। हे भाई ! (जगत में हरी-नाम का) वणज करने आए हुए जीव (आम तौर पर) माया के तीन गुणों के प्रभाव तले ही दुनिया की कार्य-व्यवहार करते रहते हैं। असल व्यापारी वे हैं जिन्होंने (यहाँ से) सदा-स्थिर हरी-नाम (का) सौदा लादा है। 17। हे भाई ! जो जीव-स्त्री (परमात्मा के) प्रेम का रास्ता नहीं जानती। वह मूर्ख स्त्री जीवन के सही राह सें टूट के भटकती फिरती है। हे नानक ! परमात्मा (की याद) भुला के जीव घोर नरक में पड़े रहते हैं। 18। हे भाई ! (माया-ग्रसित मनुष्य के) मन से माया कभी नहीं भूलती। (वह हर वक्त) धन ही धन तलाशता रहता है। वह परमात्मा (जो सब कुछ देने वाला है। उसके) चिक्त में नहीं आता। पर। हे नानक ! (वह माया-ग्रसित मनुष्य भी क्या करे। नाम-धन उसकी) किस्मत में है ही नहीं। 19। हे नानक (कह-) हे भाई ! परमात्मा की सिफतसालाह ऐसा धन है ऐसा माल है जो कभी खत्म नहीं होता। (इस धन को स्वयं) इस्तेमाल किया कर। (औरों को भी) बाँटा कर। जब तक परमात्मा स्वयं दयावान रहता है। तब तक यह धन कभी समाप्त नहीं होता। 20। हे भाई ! अगर मैं कहीं पंख ढूँढ लूँ। तो मैं अपना-आप दे के उसके बराबर तोल के वह पंख ले लूँ। मैं वह पंख अपने शरीर पर जड़ लूँ और (उड़ान भर के) तलाश के उस सज्जन-प्रभू का मिलाप हासिल कर लूँ (भाव। स्वै-भाव सदके करने से ही वह आत्मिक उड़ान भरी जा सकती है जिसकी बरकति से परमात्मा मिल जाता है)। 21। हे भाई ! (असल) मित्र सदा कायम रहने वाला प्रभू-पातशाह है जो (दुनिया के सारे) पातशाहों के सिर पर पातशाह है (सब दुनिया के बादशाहों से बड़ा है)। वह प्रभू-पातशाह सब जीवों का आसरा है। (वह ऐसा है कि) उसके पास बैठने से (लोक-परलोक की) शोभा कमा ली जाती है। 22।
सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक महला ९ ॥
गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥
कहु नानक हरि भजु मना जिह बिधि जल कउ मीनु ॥१॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: वह अद्वितीय परब्रह्म जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार स्वरूप) है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। श्लोक महला ६ ॥ हे भाई ! अगर तूने परमात्मा के गुण कभी नहीं गाए। तो तूने अपना मानस जन्म निकम्मा कर लिया। हे नानक ! कह-हे मन ! परमात्मा का भजन किया कर (और। उसको इस तरह जिंदगी का आसरा बना) जैसे पानी को मछली (अपनी जिंद का आसरा बनाए रखती है)। 1।
बिखिअन सिउ काहे रचिओ निमख न होहि उदासु ॥
कहु नानक भजु हरि मना परै न जम की फास ॥२॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! आप विषियों के साथ (इतना) मस्त क्यों रहता है। आप आँख झपकने जितने समय के लिए भी विषियों से चिक्त नहीं हटाता। हे नानक ! कह- हे मन ! परमात्मा का भजन किया कर। (भजन की बरकति से) जमों का फंदा (गले में) नहीं पड़ता। 2।
तरनापो इउ ही गइओ लीओ जरा तनु जीति ॥
कहु नानक भजु हरि मना अउध जातु है बीति ॥३॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (आपकी) जवानी बेपरवाही में ही गुजर गई। (अब) बुढ़ापे ने आपके शरीर को जीत लिया है। हे नानक ! कह- हे मन ! परमात्मा का भजन किया कर। उम्र गुजरती जा रही है। 3।
बिरधि भइओ सूझै नही कालु पहूचिओ आनि ॥
कहु नानक नर बावरे किउ न भजै भगवानु ॥४॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे झल्ले मनुष्य ! आप क्यों परमात्मा का भजन नहीं करता। (देख। अब आप) बॅुढा हैं गया है (पर। आपको अभी भी यह) समझ नहीं आ रही कि मौत (सिर पर) आ पहुँची है। 4।
धनु दारा संपति सगल जिनि अपुनी करि मानि ॥
इन मै कछु संगी नही नानक साची जानि ॥५॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) धन। स्त्री। सारी जायदाद- (इसको) अपनी कर के ना मान। ये बात सच्ची समझ कि इन सभी में से कोई एक भी आपका साथी नहीं बन सकता। 5।
पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ ॥
कहु नानक तिह जानीऐ सदा बसतु तुम साथि ॥६॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई !) प्रभू जी विकारियों को विकारों से बचाने वाले हैं। सारे डर दूर करने वाले हैं। और अनाथों के नाथ हैं। हे भाई ! उस (प्रभू) को (इस प्रकार) समझना चाहिए कि वह सदा आपके साथ बसता है। 6।
तनु धनु जिह तो कउ दीओ तां सिउ नेहु न कीन ॥
कहु नानक नर बावरे अब किउ डोलत दीन ॥७॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे झल्ले मनुष्य ! जिस (परमात्मा) ने आपको शरीर दिया। धन दिया। तूने उसके साथ प्यार नहीं डाला। फिर अब दीन-हीन बन के (आतुर हैं के) घबराया क्यों फिरता है (भाव। उस हरी को ना याद करने के कारण घबराना तो हुआ ही)। 7।
तनु धनु संपै सुख दीओ अरु जिह नीके धाम ॥
कहु नानक सुनु रे मना सिमरत काहि न रामु ॥८॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: जिस (परमात्मा) ने शरीर दिया। धन दिया। जायदाद दी। सुख दिए और सुंदर घर दिए। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। उस परमात्मा का आप सिमरन क्यों नहीं करता। 8।
सभ सुख दाता रामु है दूसर नाहिन कोइ ॥
कहु नानक सुनि रे मना तिह सिमरत गति होइ ॥९॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा (ही) सारे सुख देने वाला है। (उसके बराबर का और) कोई दूसरा नहीं। हे नानक ! कह- हे मन ! उस (का नाम) सिमरते हुए ऊँची आत्मिक अवस्था (भी) प्राप्त हो जाती है। 9।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जिस (जीव) को वह विकारों में निकालता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।