अंग 1425

अंग
1425
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਲੋਕ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਤੇ ਸੇਈ ਜਿ ਮੁਖੁ ਨ ਮੋੜੰਨਿੑ ਜਿਨੑੀ ਸਿਞਾਤਾ ਸਾਈ ॥
ਝੜਿ ਝੜਿ ਪਵਦੇ ਕਚੇ ਬਿਰਹੀ ਜਿਨੑਾ ਕਾਰਿ ਨ ਆਈ ॥੧॥
ਧਣੀ ਵਿਹੂਣਾ ਪਾਟ ਪਟੰਬਰ ਭਾਹੀ ਸੇਤੀ ਜਾਲੇ ॥
ਧੂੜੀ ਵਿਚਿ ਲੁਡੰਦੜੀ ਸੋਹਾਂ ਨਾਨਕ ਤੈ ਸਹ ਨਾਲੇ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਅਰਾਧੀਐ ਨਾਮਿ ਰੰਗਿ ਬੈਰਾਗੁ ॥
ਜੀਤੇ ਪੰਚ ਬੈਰਾਈਆ ਨਾਨਕ ਸਫਲ ਮਾਰੂ ਇਹੁ ਰਾਗੁ ॥੩॥
ਜਾਂ ਮੂੰ ਇਕੁ ਤ ਲਖ ਤਉ ਜਿਤੀ ਪਿਨਣੇ ਦਰਿ ਕਿਤੜੇ ॥
ਬਾਮਣੁ ਬਿਰਥਾ ਗਇਓ ਜਨੰਮੁ ਜਿਨਿ ਕੀਤੋ ਸੋ ਵਿਸਰੇ ॥੪॥
ਸੋਰਠਿ ਸੋ ਰਸੁ ਪੀਜੀਐ ਕਬਹੂ ਨ ਫੀਕਾ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਨ ਗਾਈਅਹਿ ਦਰਗਹ ਨਿਰਮਲ ਸੋਇ ॥੫॥
ਜੋ ਪ੍ਰਭਿ ਰਖੇ ਆਪਿ ਤਿਨ ਕੋਇ ਨ ਮਾਰਈ ॥
ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸਦਾ ਗੁਣ ਸਾਰਈ ॥
ਏਕਾ ਟੇਕ ਅਗੰਮ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰਭੁ ਧਾਰਈ ॥
ਲਗਾ ਰੰਗੁ ਅਪਾਰੁ ਕੋ ਨ ਉਤਾਰਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ਸਹਜਿ ਸੁਖੁ ਸਾਰਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਰਿਦੈ ਉਰਿ ਹਾਰਈ ॥੬॥
ਕਰੇ ਸੁ ਚੰਗਾ ਮਾਨਿ ਦੁਯੀ ਗਣਤ ਲਾਹਿ ॥
ਅਪਣੀ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲਿ ਆਪੇ ਲੈਹੁ ਲਾਇ ॥
ਜਨ ਦੇਹੁ ਮਤੀ ਉਪਦੇਸੁ ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਜਾਇ ॥
ਜੋ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਲੇਖੁ ਸੋਈ ਸਭ ਕਮਾਇ ॥
ਸਭੁ ਕਛੁ ਤਿਸ ਦੈ ਵਸਿ ਦੂਜੀ ਨਾਹਿ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੁਖ ਅਨਦ ਭਏ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਮੰਨਿ ਰਜਾਇ ॥੭॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਜਿਨ ਸਿਮਰਿਆ ਸੇਈ ਭਏ ਨਿਹਾਲ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਅਰਾਧਣਾ ਕਾਰਜੁ ਆਵੈ ਰਾਸਿ ॥੮॥
ਪਾਪੀ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਕਰਦੇ ਹਾਏ ਹਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਉ ਮਥਨਿ ਮਾਧਾਣੀਆ ਤਿਉ ਮਥੇ ਧ੍ਰਮ ਰਾਇ ॥੯॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਨਿ ਸਾਜਨਾ ਜਨਮ ਪਦਾਰਥੁ ਜੀਤਿ ॥
ਨਾਨਕ ਧਰਮ ਐਸੇ ਚਵਹਿ ਕੀਤੋ ਭਵਨੁ ਪੁਨੀਤ ॥੧੦॥
ਖੁਭੜੀ ਕੁਥਾਇ ਮਿਠੀ ਗਲਣਿ ਕੁਮੰਤ੍ਰੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇਈ ਉਬਰੇ ਜਿਨਾ ਭਾਗੁ ਮਥਾਹਿ ॥੧੧॥
ਸੁਤੜੇ ਸੁਖੀ ਸਵੰਨਿੑ ਜੋ ਰਤੇ ਸਹ ਆਪਣੈ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਵਿਛੋਹਾ ਧਣੀ ਸਉ ਅਠੇ ਪਹਰ ਲਵੰਨਿੑ ॥੧੨॥
ਸੁਤੜੇ ਅਸੰਖ ਮਾਇਆ ਝੂਠੀ ਕਾਰਣੇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇ ਜਾਗੰਨਿੑ ਜਿ ਰਸਨਾ ਨਾਮੁ ਉਚਾਰਣੇ ॥੧੩॥
ਮ੍ਰਿਗ ਤਿਸਨਾ ਪੇਖਿ ਭੁਲਣੇ ਵੁਠੇ ਨਗਰ ਗੰਧ੍ਰਬ ॥
ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਅਰਾਧਿਆ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਤਨਿ ਫਬ ॥੧੪॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਣ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਸੰਮ੍ਰਥ ਪੁਰਖੁ ਅਪਾਰੁ ॥
सलोक महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रते सेई जि मुखु न मोड़ंनि॑ जिन॑ी सिञाता साई ॥
झड़ि झड़ि पवदे कचे बिरही जिन॑ा कारि न आई ॥१॥
धणी विहूणा पाट पटंबर भाही सेती जाले ॥
धूड़ी विचि लुडंदड़ी सोहां नानक तै सह नाले ॥२॥
गुर कै सबदि अराधीऐ नामि रंगि बैरागु ॥
जीते पंच बैराईआ नानक सफल मारू इहु रागु ॥३॥
जां मूं इकु त लख तउ जिती पिनणे दरि कितड़े ॥
बामणु बिरथा गइओ जनंमु जिनि कीतो सो विसरे ॥४॥
सोरठि सो रसु पीजीऐ कबहू न फीका होइ ॥
नानक राम नाम गुन गाईअहि दरगह निरमल सोइ ॥५॥
जो प्रभि रखे आपि तिन कोइ न मारई ॥
अंदरि नामु निधानु सदा गुण सारई ॥
एका टेक अगंम मनि तनि प्रभु धारई ॥
लगा रंगु अपारु को न उतारई ॥
गुरमुखि हरि गुण गाइ सहजि सुखु सारई ॥
नानक नामु निधानु रिदै उरि हारई ॥६॥
करे सु चंगा मानि दुयी गणत लाहि ॥
अपणी नदरि निहालि आपे लैहु लाइ ॥
जन देहु मती उपदेसु विचहु भरमु जाइ ॥
जो धुरि लिखिआ लेखु सोई सभ कमाइ ॥
सभु कछु तिस दै वसि दूजी नाहि जाइ ॥
नानक सुख अनद भए प्रभ की मंनि रजाइ ॥७॥
गुरु पूरा जिन सिमरिआ सेई भए निहाल ॥
नानक नामु अराधणा कारजु आवै रासि ॥८॥
पापी करम कमावदे करदे हाए हाइ ॥
नानक जिउ मथनि माधाणीआ तिउ मथे ध्रम राइ ॥९॥
नामु धिआइनि साजना जनम पदारथु जीति ॥
नानक धरम ऐसे चवहि कीतो भवनु पुनीत ॥१०॥
खुभड़ी कुथाइ मिठी गलणि कुमंत्रीआ ॥
नानक सेई उबरे जिना भागु मथाहि ॥११॥
सुतड़े सुखी सवंनि॑ जो रते सह आपणै ॥
प्रेम विछोहा धणी सउ अठे पहर लवंनि॑ ॥१२॥
सुतड़े असंख माइआ झूठी कारणे ॥
नानक से जागंनि॑ जि रसना नामु उचारणे ॥१३॥
म्रिग तिसना पेखि भुलणे वुठे नगर गंध्रब ॥
जिनी सचु अराधिआ नानक मनि तनि फब ॥१४॥
पतित उधारण पारब्रहमु संम्रथ पुरखु अपारु ॥

हिन्दी अर्थ: सलोक महला ५ वह परब्रह्म केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। हे भाई ! वे मनुष्य ही (प्रेम-रंग में) रंगे हुए हैं। जो (पति-प्रभू की याद से कभी भी) मुँह नहीं मोड़ते (कभी भी प्रभू की याद नहीं भुलाते)। जिन्होंने पति-प्रभू के साथ गहरी सांझ डाली हुई है। पर जिनको (प्रेम की दवाई) मुआफिक नहीं बैठती (ठीक असर नहीं करती। ) वह कमजोर प्रेम वाले मनुष्य (प्रभू चरणों से इस तरह) बार-बार टूटते हैं (जैसे कमजोर कच्चे फल टाहनी से)। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) (मैंने तो वह) रेशमी कपड़े (भी) आग के साथ जला दिए हैं (जिनके कारण जीवन) पति-प्रभू (की याद) से वंचित ही रहे। हे पति-प्रभू ! तेरे साथ (तेरे चरणों में रह के) मैं धूल-मिट्टी में लिबड़ी हुई भी (अपने आप को) सुंदर लगती हूँ। 2। हे भाई ! गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। (प्रभू के) नाम की बरकति से। (प्रभू के प्रेम-) रंग की बरकति से (मन में विकारों की ओर से) उपरामता (पैदा हो जाती है)। (कामादिक) पाँचों वैरी बस में आ जाते हैं। हे नानक ! ये प्रेम-हिलौरे (विकार-रोगों को) खत्म कर देने वाली कारगर दवा हैं। 3। हे प्रभू ! जब तू एक मेरी ओर है। तब (तेरे) पैदा किए हुए लाखों ही (जीव मेरी ओर हो जाते हैं)। (ये) तेरी जितनी भी (पैदा की हुई सृष्टि है। तेरे) दर पर (यह सारे) अनेकों ही मंगते हैं। हे भाई ! जिस परमात्मा ने पैदा किया है। अगर वह भूला रहे (मनुष्य को पैदा करने वाला वह भूल जाए)। तो (सबसे ऊँचा समझे जाना वाला) ब्राहमण (के घर का) जनम (भी) व्यर्थ चला गया। 4। हे भाई ! वह (हरी-नाम-) रस पीते रहना चाहिए। जो कभी भी बेस्वादा नहीं होता। हे नानक ! परमात्मा के नाम के गुण (सदा) गाए जाने चाहिए (इस तरह परमात्मा की) हजूरी में बेदाग़ शोभा मिलती है। 5। हे भाई ! जिन (मनुष्यों) की प्रभू ने खुद रक्षा की। उनको कोई मार नहीं सकता। हे भाई ! (जिस मनुष्य के) हृदय में परमात्मा का नाम खजाना बस रहा है। वह सदा परमात्मा के गुण याद करता रहता है। जिसको एक अपहुँच प्रभू का (सदा) आसरा है। वह अपने मन में तन में प्रभू को बसाए रखता है। (जिसके हृदय में) कभी ना खत्म होने वाला प्रभू-प्रेम बन जाता है। उस प्रेम-रंग को कोई उतार नहीं सकता। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। और आत्मिक अडोलता में (टिक के आत्मिक) आनंद माणता रहता है। हे नानक ! (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य) परमात्मा के नाम का खजाना अपने हृदय में (इस तरह) टिकाए रखता है (जैसे हार गले में डाल के रखा जाता है)। 6। हे भाई ! (जो काम परमात्मा) करता है। उस (काम) को अच्छा समझ। (और अपने अंदर से) और तरह की चिंता-फिकरें दूर कर। वह अपनी कृपा-दृष्टि करके आप ही मिला लेता है। हे परमपिता ! अपने भक्तों को उपदेश प्रदान करो, ताकि मन में से भ्रम दूर हो जाए। हे प्रभू ! (जीवों के किए कर्मों के अनुसार) धुर दरगाह से जो लेख (इनके माथे पर) लिखा जाता है। सारी दुनिया (उस लेख के अनुसार ही हरेक) कार करती है (क्योंकि) हरेक कार उस (परमात्मा) के वश में है; (उसके बिना जीवों के लिए) और कोई जगह (आसरा) नहीं। हे नानक ! परमात्मा की रजा को मान के (जीव के अंदर आत्मिक) सुख-आनंद बने रहते हैं। 7। हे भाई ! जिस जिस मनुष्य ने पूरे गुरू को (गुरू के उपदेश को) याद रखा। वह सारे प्रसन्न-चिक्त हो गए। हे नानक ! (गुरू का उपदेश यह है कि परमात्मा का) नाम सिमरना चाहिए (सिमरन की बरकति से) जीवन-मनोरथ सफल हो जाता है। 8। हे भाई ! विकारी मनुष्य (विकारों के) काम करते रहते हैं। हे नानक ! (विकारियों को) धरमराज (हर वक्त) इस तरह दुखी करता रहता है जैसे मथानियां (दूध) मथती हैं। 9। हे भाई ! जो भले मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं। वे इस कीमती मनुष्य जीवन की बाज़ी जीत के (जाते हैं)। हे नानक ! जो मनुष्य (मनुष्य के जीवन का) मनोरथ (हरी-नाम) उचारते रहते हैं। वे जगत को भी पवित्र कर देते हैं। 10। हे भाई ! बुरी मति लेने वाली (जीव-स्त्री माया के मोह की जिल्लत में) गलत जगह पर बुरे हाल चुभी (धँसी) रहती है। (पर यह) जिल्लत (उसको) मीठी (भी लगती है)। हे नानक ! वह मनुष्य ही (माया के मोह की इस जिल्लत में से) बच निकलते हैं। जिनके माथे पर भाग्य (जाग उठते हैं)। 11। हे भाई ! जो मनुष्य अपने पति-प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। प्रेम-लगन में मस्त रहने वाले वे मनुष्य आनंद से जीवन व्यतीत करते हैं। पर। जिन मनुष्यों को पति से प्रेम का विछोड़ा रहता है। वह (माया की खातिर) आठों पहर (कौऐ की तरह) काँव-काँव करते रहते हैं। 12। हे भाई ! नाशवंत माया की खातिर अनगिनत जीव (मोह की नींद में) सोए रहते हैं। हे नानक ! (मोह की इस नींद में से सिर्फ) वही लोग जागते रहते हैं। जो (अपनी) जीभ से परमात्मा का नाम जपते रहते हैं। 13। हे भाई ! (जैसे) ठॅग-नीरे को देख के (हिरण भूल जाते हैं कि और जान गवा लेते हैं। वैसे ही माया की) बनी गंधर्व-नगरी को देख के (जीव) गलत राह पर पड़े रहते हैं। हे नानक ! जिन मनुष्यों ने सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरा। उनके मन में उनके तन में (आत्मिक जीवन की) सुंदरता पैदा हो गई। 14। हे भाई ! अकाल पुरख परमात्मा बेअंत है। सब ताकतों का मालिक है। विकारियों को विकारों से बचाने वाला है।

संदर्भ: यह अंग 1425 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Greater Kailash के बाज़ार में सर्दियों की धूप, और कोई पुराना दोस्त मिल जाए।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1425” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1426 →, पीछे का: ← अंग 1424

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।