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  • Chapter 18: मोक्ष संन्यास योग

    अध्याय 18

    मोक्ष संन्यास योग

    अंतिम शरणागति
    18वाँ अध्याय पूरी गीता का सार है। और अंत में एक ही पंक्ति: ”सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आएँ।” अर्जुन का संदेह मिटा, धनुष उठा।
    78 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 14 मिनट

    अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

    सब धर्मों को त्याग कर एकमात्र मेरी शरण में आ। मैं आपको सब पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत कर।

    गीता 18.66

    Chapter 18 panel 1

    पाठ-संदर्भ

    अठारहवाँ अध्याय भगवद् गीता का सबसे लम्बा है, अठहत्तर श्लोक। यह एक तरह का सार-संग्रह है, पूरी गीता का। हर पुराने विषय की पुनः-स्मृति, हर अवधारणा की पुनः-व्याख्या। आखिरी श्लोक, छियासठवाँ, “सर्व-धर्मान् परित्यज्य माम् एकं शरणं व्रज” (सब धर्मों को छोड़ कर मेरी अकेले की शरण में आओ), को कई परम्पराओं में “चरम-श्लोक” कहा जाता है। रामानुजाचार्य की ग्यारहवीं-सदी की श्रीवैष्णव-परम्परा ने इसी श्लोक को अपनी मूल-शरणागति-वाणी बनाया, और बाद के दक्षिण-भारतीय आचार्यों ने इसी पर सबसे विस्तृत भाष्य लिखे।

    अध्याय का सार

    गीता का सबसे लंबा अध्याय, और सब का सार। कृष्ण यहाँ पिछले 17 अध्यायों की सारी बातें फिर से इकट्ठा करते हैं, मगर एक नई दिशा से।

    Chapter 18 panel 2

    पहले ‘त्याग’ और ‘संन्यास’ के बीच का फ़र्क़ साफ़ करते हैं। फिर पाँच कारण बताते हैं किसी भी कर्म के, अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, इन्द्रियाँ, चेष्टा, और दैव। अकेला अहंकार कर्ता नहीं।

    फिर तीन गुणों के हिसाब से सब का विभाजन: ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति, सुख। हर के तीन रंग।

    Chapter 18 panel 3

    और तब वर्ण-धर्म: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के कर्म।स्वभाव-व्यवस्था है। हर एक का धर्म उसके अपने स्वभाव से जुड़ा है।

    Chapter 18 panel 4

    अंत में सबसे शक्तिशाली श्लोक, 18.66, ‘सब धर्मों को छोड़, मेरी शरण में आ। मैं आपको सब पापों से मुक्त करूँगा। शोक मत कर।’ अर्जुन का संदेह मिटता है। वो धनुष उठाते हैं, युद्ध शुरू होता है।

    Chapter 18 panel 5

    मुख्य श्लोक

    श्लोक 18.47

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
    स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
    साधारण अनुवाद‘अपना धर्म अधूरा भी हो, तो भी दूसरे का अच्छा धर्म निभाने से बेहतर है। स्वभाव-नियत कर्म करते हुए मनुष्य पाप नहीं पाता।’

    3.35 की पुनरावृत्ति, मगर ज़्यादा मज़बूती से। यह दोहराव कुछ बता रहा है, यह बात बार-बार सुनने लायक है।

    Chapter 18 panel 6

    श्लोक 18.61

    ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
    भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
    साधारण अनुवाद‘हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है। माया के द्वारा सब प्राणियों को यंत्र पर चढ़ाकर घुमाता है।’

    ईश्वर हृदय में है, और सब को घुमा रहा है। हम ख़ुद नहीं चलते, हम यंत्र पर चढ़े हैं।

    श्लोक 18.65

    मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
    मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
    साधारण अनुवाद‘मन मुझ में रख, भक्त बन, यज्ञ मेरे लिए कर, मुझे ही नमस्कार कर। आप मुझे ही पाएगा, सच्चे वचन में कहता हूँ, क्योंकि आप मुझे प्रिय है।’

    पाँच कार्य, एक वचन। मन-भक्ति-यज्ञ-नमन-कृष्ण। और बीच में एक भावुक पंक्ति: ‘क्योंकि आप मुझे प्रिय है।’

    Chapter 18 panel 7

    श्लोक 18.66

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
    साधारण अनुवाद‘सब धर्मों को छोड़कर एक मेरी शरण में आ। मैं आपको सब पापों से मुक्त करूँगा, शोक मत कर।’

    गीता का अंतिम सूत्र। ‘चरम-श्लोक’ कहलाता है। पूरी 700 श्लोकों की किताब इस एक पंक्ति में सिमट जाती है।

    Chapter 18 panel 8

    श्लोक 18.78

    यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
    तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
    साधारण अनुवाद(संजय का अंतिम कथन:) ‘जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं, और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, ऐश्वर्य, और नीति, सब निश्चित। यह मेरा मत है।’

    पूरी गीता की अंतिम मुहर। संजय ने सारा वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाया है। और एक वाक्य में निचोड़: कृष्ण + अर्जुन = विजय। ज्ञान + कर्म = सफलता।

    सारएक वाक्य में: सब रास्तों का अंत एक ही जगह जाता है, सब छोड़कर शरणागत होना। और जहाँ कृष्ण-अर्जुन साथ हैं, वहाँ जीत निश्चित है।