छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 6

छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय छह

उद्दालक, श्वेतकेतु, और “तत् त्वम् असि”

सोलह खण्ड। एक पिता, एक पुत्र, और वो एक वाक्य जिस पर पूरा वेदान्त टिका है।

श्वेतकेतु बारह बरस का होकर गुरुकुल भेजा गया था, और तेईस का होकर लौटा। सब वेद कंठस्थ, सिर ज़रा ऊँचा, चाल में थोड़ा घमंड। पिता उद्दालक आरुणि ने पुत्र को देखा, और एक ही प्रश्न रख दिया, जिसने सारी विद्या को एक क्षण में हल्का कर दिया, क्या आपने वो जान लिया जिसको जान लेने पर बाक़ी सब अपने-आप जान लिया जाता है? श्वेतकेतु चुप रह गया। उत्तर उसके पास नहीं था।

उसके बाद के पन्द्रह खण्ड उसी प्रश्न का उत्तर हैं। पिता मिट्टी, सोना और लोहे के तीन सीधे-सादे दृष्टान्तों से शुरू करते हैं, फिर मधुमक्खी का शहद, समुद्र में मिलती नदियाँ, वृक्ष का जीव, बीज के भीतर छिपा अनदेखा कारण, पानी में घुला नमक, गन्धार-देश का आँख-बँधा पथिक, मरते समय इन्द्रियों का क्रम से शान्त होना, और अन्त में तपे हुए परशु से सत्य की परीक्षा। हर दृष्टान्त के अन्त में वही वाक्य लौट आता है, स य एषो अणिमा, ऐतद् आत्म्यम् इदं सर्वम् तत् सत्यम् स आत्मा तत् त्वम् असि श्वेतकेतो। यह दोहराव बेमतलब नहीं है। एक बार सुन लेने भर से बात भीतर नहीं उतरती। बार-बार सुनना, फिर उस पर मनन करना, फिर उसी में गहरे ठहर जाना, यही श्रवण, मनन और निदिध्यासन का सीधा अभ्यास है।

नीचे हमने इसी अध्याय के सबसे केन्द्रीय प्रसंग चुने हैं, जिस क्रम में वे मूल पाठ में आते हैं। हर प्रसंग से पहले एक छोटी कथा-भूमिका है, और उसके बाद मूल संस्कृत वचन।

पिता का पहला वार सीधा अहंकार की जड़ पर पड़ता है। वो पूछते हैं, क्या आपने अपने आचार्य से वो आदेश माँगा था जिसको पाते ही अनसुना सुना हुआ हो जाता है, अनसोचा सोचा हुआ, और अनजाना जाना हुआ? और फिर वही समझाने के लिए मिट्टी का दृष्टान्त रखते हैं। एक मिट्टी का पिण्ड जान लो, तो मिट्टी की बनी हर चीज़ जान ली जाती है, क्योंकि घड़ा, सकोरा, कुल्हड़, ये सब केवल नाम हैं, बोलचाल भर का फेर हैं; सच्चाई तो बस मिट्टी है। एक मूल को पकड़ लो, उसके सारे रूप अपने-आप हाथ आ जाते हैं।

6.1.3 · 4 · जिसको जान कर सब जाना जाता है

उत तमादेशमप्राक्ष्यः येनाश्रुत{\म्+} श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञात{\म्+} स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥

फिर पिता और भी पीछे ले जाते हैं, सृष्टि से भी पहले। कुछ लोग कहते हैं कि आरम्भ में असत् था, शून्य था, और उसी शून्य से यह सब उपजा। पिता इसे सिरे से नकार देते हैं। शून्य से भला कुछ कैसे जन्मेगा? आरम्भ में तो केवल सत् था, एक ही, अपने जैसा दूसरा कोई नहीं। यहीं से वो शब्द फूटता है जिस पर आगे का सारा दर्शन खड़ा होगा, एकम् एव अद्वितीयम्, एक ही, दूसरा कोई नहीं। अद्वैत का बीज इसी एक पद में है।

6.2.1 · 2 · आरम्भ में सत् ही था

सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत । कुतस्तु खलु सोम्यैव{\म्+}स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति । सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥

आठवें खण्ड तक आते-आते भूमिका पूरी हो चुकी है, और तब पहली बार वो वाक्य आता है जो आगे नौ बार लौटेगा। जो यह सूक्ष्मतम तत्त्व है, यही पूरा जगत है, यही सत्य है, यही आत्मा है। और फिर सीधा पुत्र की ओर मुड़ कर, आप वही हैं, हे श्वेतकेतो। यहाँ से अध्याय की लय बदल जाती है। हर अगले दृष्टान्त के अन्त पर यही पंक्ति घुमड़ कर आएगी, मानो किसी मन्त्र की टेक हो।

6.8.7 · पहला तत्त्वमसि

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद{\म्+} सर्वं तत्सत्य{\म्+} स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति ॥

अब पिता दृष्टान्तों की लड़ी शुरू करते हैं। पहला है शहद का। मधुमक्खियाँ अलग-अलग पेड़ों के रस इकट्ठा करके एक ही शहद बना देती हैं, और उस शहद में फिर यह भेद नहीं रहता कि कौन-सी बूँद किस पेड़ की थी। ठीक इसी तरह सब प्राणी जब उस एक सत् में लय हो जाते हैं, तो वहाँ यह याद नहीं रहता कि हम कौन थे, किस रूप से आए थे। नाम मिट जाता है, बस सत् रह जाता है। और वही पंक्ति फिर, आप वही हैं, हे श्वेतकेतो।

6.9.1-4 · दूसरा तत्त्वमसि · मधु का दृष्टान्त

यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणा{\म्+}रसान्समवहारमेकता{\म्+}रसं गमयन्ति । ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीति । एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति । स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद{\म्+} सर्वं तत्सत्य{\म्+} स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति ॥

फिर पिता नदियों की ओर इशारा करते हैं। कोई नदी पूरब को बहती है, कोई पश्चिम को। गंगा, यमुना, सरस्वती, हर एक का अपना नाम, अपनी राह। पर समुद्र में पहुँचते ही सब समुद्र हो जाती हैं। वहाँ कोई लहर यह नहीं कहती कि मैं फलाँ नदी थी। उसी प्रकार सब प्राणी उस सत् में आकर मिल जाते हैं, और यह भी नहीं जानते कि हम उसी में आए हैं। नाम-रूप ऊपरी हैं, मूल एक ही है। आप वही हैं, हे श्वेतकेतो।

6.10.1-3 · तीसरा तत्त्वमसि · नदी और समुद्र

इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति । एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद{\म्+} सर्वं तत्सत्य{\म्+} स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति ॥

अगला दृष्टान्त किसी विशाल वृक्ष का है। उसकी जड़ काटो तो जीवित रस बहता है, बीच का तना काटो तो भी, ऊपर की डाल काटो तो भी। यह पूरा पेड़ एक ही जीव से सींचा हुआ है, और उसी रस को पी-पी कर हरा-भरा खड़ा है। पर जिस डाल से जीव हट जाता है, वही सूख जाती है। पिता कहते हैं, इसी तरह समझ लीजिए, जीव के निकल जाने पर यह देह मरती है, जीव नहीं मरता। चेतना देह से अलग है, देह के बुझ जाने पर भी वो बुझती नहीं। आप वही हैं, हे श्वेतकेतो।

6.11.1-3 · चौथा तत्त्वमसि · वृक्ष का जीव

अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेद्यो मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेद्योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन्स्रवेत्स एष जीवेनात्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ॥ अस्य यदेका{\म्+} शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति । एवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते इति ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद{\म्+} सर्वं तत्सत्य{\म्+} स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति ॥

अब पिता एक छोटा-सा प्रयोग करते हैं। बरगद का फल मँगवाते हैं, उसे तुड़वाते हैं। भीतर नन्हे-नन्हे बीज दिखते हैं। एक बीज और तुड़वाते हैं, और पूछते हैं, अब क्या दिखता है? पुत्र कहता है, कुछ नहीं, बिलकुल कुछ नहीं। पिता मुस्कुरा कर कहते हैं, जिस सूक्ष्म को आप देख नहीं पा रहे, उसी सूक्ष्म से यह इतना बड़ा बरगद खड़ा है। जो आँख से ओझल है, वही पूरे वृक्ष का कारण है। श्रद्धा रखिए। आप वही हैं, हे श्वेतकेतो।

6.12.1-3 · पाँचवाँ तत्त्वमसि · बीज और बरगद

न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किंचन भगव इति । त{\म्+} होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद{\म्+} सर्वं तत्सत्य{\म्+} स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति ॥

शायद सबसे सुन्दर दृष्टान्त यही है। पिता नमक की एक डली पानी में डलवा देते हैं, और कहते हैं, कल सुबह आइए। अगली सुबह कहते हैं, कल जो नमक डाला था, उसे निकाल लाइए। पुत्र ढूँढता है, नमक कहीं नहीं मिलता, वो घुल चुका है। पिता कहते हैं, किनारे से चखिए। नमकीन। बीच से चखिए। नमकीन। दूसरे किनारे से। नमकीन। नमक दिखता नहीं, पर पूरे पानी में मौजूद है। ब्रह्म भी ऐसा ही है, सबमें घुला हुआ, आँख से ओझल, फिर भी सर्वत्र। वो यहीं है। आप वही हैं, हे श्वेतकेतो।

6.13.1-3 · छठा तत्त्वमसि · नमक और जल

लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति । स ह तथा चकार त{\म्+} होवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद । यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते त{\म्+} होवाचात्र वाव किल तत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिद{\म्+} सर्वं तत्सत्य{\म्+} स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति ॥

अब पिता गुरु की ज़रूरत समझाते हैं। मान लीजिए किसी को गन्धार-देश से आँख पर पट्टी बाँध कर लाया जाए और किसी सुनसान जगह छोड़ दिया जाए। वो बेचारा पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण हाँफता-भटकता फिरेगा, राह उसे सूझेगी ही नहीं। पर कोई आकर उसकी पट्टी खोल दे और बता दे कि गन्धार उस ओर है, तो वो गाँव-गाँव पूछता हुआ, समझदार और सजग होकर, अपने देश पहुँच ही जाता है। ठीक इसी तरह जिसे आचार्य मिल गया, वो जान लेता है, और जान लेता है कि देह छूटने तक की ही देर है, फिर उसी मूल में मिल जाना है। आप वही हैं, हे श्वेतकेतो।

6.14.1-3 · सातवाँ तत्त्वमसि · गन्धार का पथिक

यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र प्राङ्वोदङ्वाधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः । तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन्पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य इति ॥

आठवाँ दृष्टान्त मरते समय की प्रक्रिया का है। कोई पीड़ित प्राणी अन्तिम घड़ी में पड़ा है, और उसके स्वजन पास आकर पूछते हैं, हमें पहचान रहे हैं? जब तक उसकी वाणी मन में, मन प्राण में, प्राण तेज में, और तेज परम देवता में लय नहीं होते, तब तक वो पहचानता है। पर जैसे ही ये सब एक-एक कर भीतर समा जाते हैं, पहचान छूट जाती है। इन्द्रियाँ क्रम से लौट कर अपने मूल में जा बैठती हैं। आप वही हैं, हे श्वेतकेतो।

6.15.1-3 · आठवाँ तत्त्वमसि · मरण की घड़ी

पुरुष{\म्+} सोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति । अथ यदास्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥

और अन्त में नौवाँ, जो पूरे अध्याय का शिखर है। एक व्यक्ति को हाथ पकड़ कर लाया जाता है, इस पर चोरी का आरोप है, परशु तपाओ। यदि वो सचमुच चोर है, तो वो झूठ से अपने को ढक लेता है, और तपा हुआ परशु छूते ही जल उठता है, मारा जाता है। पर यदि वो निर्दोष है, तो वो सत्य से अपने को ढक लेता है, और वही तपा परशु छूने पर भी उसे जलाता नहीं, वो छूट जाता है। जो जलता नहीं, वही सत्य है, वही आत्मा है। आप वही हैं, हे श्वेतकेतो। और यहीं वो घड़ी आती है, श्वेतकेतु ने जान लिया, जान लिया। बात आख़िर भीतर उतर गई।

6.16.1-3 · नौवाँ तत्त्वमसि · तपे परशु की परीक्षा

पुरुष{\म्+} सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसंधोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते । अथ यदि तस्याकर्ता भवति ततेव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति सन दह्यतेऽथ मुच्यते । स यथा तत्र नादाह्येतैतदात्म्यमिद{\म्+} सर्वं तत्सत्य{\म्+} स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥

उद्दालक आरुणि का नाम बृहदारण्यक उपनिषद् के तीसरे अध्याय की याज्ञवल्क्य-बहस में भी आता है, जहाँ वो अन्तर्यामी के विषय में प्रश्न रखते हैं। दोनों उपनिषदों में वो लगभग एक ही काल के जान पड़ते हैं, अनुमानतः सातवीं-छठी सदी ईसा-पूर्व के। आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में अपनी छान्दोग्य-भाष्य में इसी छठे अध्याय पर सबसे विस्तृत व्याख्या लिखी, और मध्वाचार्य ने तेरहवीं सदी में अपनी द्वैत-व्याख्या इसी अध्याय के विरुद्ध तर्क के रूप में रखी।

अध्याय एक नज़र में

खण्ड एक, श्वेतकेतु का अहंकार, पिता का प्रश्न, और मिट्टी, सोना, लोहे का दृष्टान्त।

खण्ड दो, असत् से नहीं, सत् से ही सब उपजा। सत् ही प्रथम।

खण्ड तीन, तीन प्रकार के बीज, अण्डज, जीवज और उद्भिज्ज, और देवता का तेज, अप् तथा अन्न में प्रवेश।

खण्ड चार, त्रिवृत्करण, तीनों तत्त्व हर एक में मिले हुए, इसलिए सब कुछ मिश्रित।

खण्ड पाँच और छह, अन्न, जल और तेज से मन, प्राण और वाणी का बनना। सोलह कलाएँ।

खण्ड सात, श्वेतकेतु का उपवास-प्रयोग।

खण्ड आठ से सोलह, नौ दृष्टान्त, और हर एक के बाद वही टेक, तत् त्वम् असि।

संगति

तत् त्वम् असि चार महावाक्यों में से एक है। बाक़ी तीन ऐतरेय, बृहदारण्यक और माण्डूक्य उपनिषदों से हैं, हर एक एक वेद से। पर इन चारों में केवल यही वाक्य गुरु और शिष्य के संवाद में नौ बार दोहराया गया है। यही इसके शिक्षण-भार का कारण है। एक बार सुनने से बात नहीं उतरती। बार-बार सुनना, उस पर सोचना, और गहन ध्यान में उसे थामे रखना, यही तीन-कदमों की पूरी राह है।

शंकराचार्य ने अपनी सबसे विस्तृत उपनिषद्-टीका इसी अध्याय पर लिखी। ब्रह्म-सूत्र के पहले अध्याय के सूत्र पाँच से ग्यारह तक इन्हीं तत्त्वों, तेज, अप्, अन्न, त्रिवृत्करण और वैश्वानर पर तर्क करते हैं।

आज के पाठक के लिए सबसे सहज प्रवेश-द्वार नमक-जल वाला दृष्टान्त ही है। नमक घुल कर आँखों से ओझल हो जाता है, फिर भी हर घूँट में मौजूद रहता है। सत्य भी ऐसा ही है, सबमें बसा हुआ, पर सीधे दिखता नहीं। तत् त्वम् असि।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “chhaandogya.itx” से।

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