लुल्ला परिवारLulla Family
English
उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

अध्याय 6: उद्दालक, श्वेतकेतु और तत् त्वम् असि

इस पृष्ठ पर
सामवेद · छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय 6
बारह बरस पढ़कर लौटे बेटे से पिता एक प्रश्न पूछते हैं, और फिर मिट्टी, शहद, नदी, बीज और नमक से नौ बार वही एक बात कहते हैं।

आँगन की धूप ढल रही है और द्वार पर एक नौजवान खड़ा है। कंधे पर मृगचर्म, हाथ में दण्ड, और गरदन में वह अकड़ जो चौबीस बरस की उमर में सारे वेद कंठस्थ कर लेने से आ जाती है। नाम श्वेतकेतु, आरुणि का बेटा। बारह बरस पहले यही लड़का पिता के कहने पर गुरुकुल गया था, और आज लौटा है। पिता उद्दालक उसे देर तक देखते रहते हैं, कुछ कहते नहीं। फिर पास बिठाकर एक ही प्रश्न रखते हैं, ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर बारह बरस की पढ़ाई में कहीं नहीं आया। कुछ ही क्षण में लड़के के चेहरे से सारा अभिमान उतर जाता है, और छान्दोग्य उपनिषद् का सबसे प्रसिद्ध अध्याय यहीं से खुल जाता है।

छान्दोग्य उपनिषद् के आठ अध्यायों में यह छठा अध्याय मोड़ का पत्थर है। इससे पहले के अध्याय उपासना सिखाते आए हैं: गान की भीतरी विधि, प्राण की महिमा, अग्नियों का रहस्य, पंचाग्नि और मरने के बाद की दो राहें। यहाँ उपासना पीछे छूट जाती है और तत्त्व सीधे सामने आ जाता है। सोलह खण्डों में उद्दालक आरुणि अपने बेटे को वह एक चीज़ दिखाते हैं, जिसे जान लेने पर बाकी सब अपने आप जान लिया जाता है, और नौ बार, नौ अलग दृष्टान्तों के सिरे पर, वही एक वाक्य दोहराते हैं जिसे आगे की सारी परम्परा महावाक्य कहकर सिर पर रखेगी। यह उपनिषद् यहाँ बहुत सीधा प्रश्न पूछता है: जिसे हम अपना होना कहते हैं, उसकी जड़ कहाँ है।

इस अध्याय के मुख्य किरदार

उद्दालक आरुणि: गौतम वंश के आचार्य, जो बेटे को शास्त्र से आगे ले जाकर सत् दिखाना चाहते हैं।

श्वेतकेतु: बारह बरस पढ़कर चौबीस की उमर में लौटा बेटा, जिसका अभिमान पहले ही प्रश्न पर बैठ जाता है।

सत्: वह एक और अद्वितीय होना, जिससे तेज, जल और अन्न निकले और जिसमें सब लौट जाता है।

तीन देवता: तेज, अप् और अन्न, जिनके तीन रंगों से आग, सूरज, चाँद और बिजली बुनी हुई हैं।

पुराने महाशाल और महाश्रोत्रिय: बीते युग के बड़े गृहस्थ और बड़े विद्वान, जिनके हवाले से उद्दालक कहते हैं कि यह विद्या नई नहीं है।

बारह बरस बाद लौटा बेटा, और मिट्टी का एक लोंदा (खण्ड 1)

कथा पीछे से शुरू होती है। बहुत पहले, जब श्वेतकेतु बारह बरस का था, पिता ने उससे कहा था, “श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवति”, यानी हे श्वेतकेतु, जाइए और ब्रह्मचर्य में रहकर पढ़िए, क्योंकि हे सोम्य (प्रिय), हमारे कुल में कोई बिना पढ़े केवल जन्म से ब्राह्मण कहलाने वाला नहीं होता। बात में ताना नहीं था, एक शर्त थी। इस घर में नाम से कोई बड़ा नहीं माना जाएगा, जो भीतर उतरा होगा वही गिना जाएगा। लड़का चला गया और बारह बरस वहीं रहा।

चौबीस का होकर वह लौटा। सारे वेद पढ़कर, और साथ में एक और चीज़ लेकर: यह भरोसा कि अब जानने को कुछ बचा ही नहीं। मूल पाठ उसके लिए तीन शब्द रखता है, महामना, अनूचानमानी और स्तब्ध, यानी अपने को बड़ा मानने वाला, अपने को पढ़ा हुआ समझने वाला, और अकड़ा हुआ। पिता ने यह तीनों एक नज़र में पढ़ लिए। उन्होंने डाँटा नहीं। उन्होंने सिर्फ़ पूछा कि क्या आपने अपने आचार्य से वह आदेश भी माँगा, जिससे अनसुना सुन लिया जाता है, अनसोचा सोच लिया जाता है और अनजाना जान लिया जाता है।

श्वेतकेतु के पास उत्तर नहीं था। ऐसा प्रश्न उसने सुना ही नहीं था। उसने जो पूछा, उसमें एक बच्चे जैसी ईमानदारी थी: वे आचार्य शायद इसे जानते ही नहीं होंगे, क्योंकि जानते होते तो हमें बताते क्यों नहीं। फिर उसने पिता के सामने सिर रखा और कहा कि अब आप ही बताइए। उद्दालक ने एक शब्द में हामी भरी, ठीक है प्रिय। पूरा छठा अध्याय इसी हामी से निकला हुआ है। पढ़ाई ने लड़के को भरा था, एक प्रश्न ने उसे खाली किया, और खाली होना ही यहाँ पहली योग्यता है।

अब पिता सबसे साधारण चीज़ उठाते हैं, मिट्टी। एक लोंदा हाथ में लेकर कहते हैं कि इसे जान लीजिए, तो मिट्टी से बनी हर चीज़ जान ली गई। घड़ा, कटोरा, सकोरा, नाँद, यह सब क्या हैं। मूल वाक्य यहाँ बहुत तीखा है, “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्”, यानी बदलाव तो वाणी से पकड़ में आता है, वह एक नाम भर है, और जो सचमुच है वह मिट्टी ही है। घड़ा टूटकर ठीकरा हो जाता है, ठीकरा पिसकर धूल हो जाता है, और इन सब हालतों में जो एक चीज़ बिना टूटे टिकी रहती है, वही असली है।

वही बात सोने से कही जाती है। एक सोने की डली जान लीजिए, तो हार, कुंडल, कड़ा, अँगूठी, सब जान लिए, क्योंकि इन सबका नाम अलग है और वज़न में वही सोना है। फिर लोहे से, एक नहरनी को जान लीजिए तो सारा काला लोहा जान लिया गया। तीनों बार वही टेक लौटती है, नाम बदलता है, वस्तु वही रहती है। उद्दालक तीन बार इसलिए कहते हैं कि मन एक बार में मान नहीं लेता। पहली बार यह चतुराई लगती है, दूसरी बार आदत, और तीसरी बार सुनने वाला ख़ुद ही आगे की पंक्ति बोलने लगता है।

यह दृष्टान्त सिर्फ़ तर्क का खिलौना नहीं है। उद्दालक बता रहे हैं कि ज्ञान की दो तरहें होती हैं। एक में आप चीज़ें गिनते जाते हैं और सूची कभी पूरी नहीं होती। दूसरी में आप उस एक को पकड़ लेते हैं जिससे सूची बनी है, और सूची अपने आप हल हो जाती है। बारह बरस में श्वेतकेतु ने पहली तरह का बहुत कुछ इकट्ठा किया था। पिता उसे दूसरी तरह की ओर मोड़ रहे हैं, और वह मोड़ मिट्टी के एक लोंदे से शुरू होता है, किसी ऊँचे शब्द से नहीं।

सार: घर की शर्त यह थी कि नाम से नहीं, जानने से बड़ा माना जाएगा। बेटा पढ़कर लौटा, पर वह आदेश माँगकर नहीं लौटा जिससे सब जान लिया जाता है। मिट्टी, सोना और लोहा दिखाकर पिता पहली सीढ़ी रखते हैं: आकार नाम हैं, और जो हर आकार में टिका रहता है वही सत्य है।

आरम्भ में सत् था: तेज, जल, अन्न और नाम-रूप (खण्ड 2 और 3)

अब पिता पीछे ले चलते हैं, वहाँ तक जहाँ कोई आकार ही नहीं था। वह कहते हैं, “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्”, यानी हे सोम्य, आरम्भ में यह सब सत् ही था, एक ही, और उसके सिवा दूसरा कुछ नहीं। शब्द सीधा है और भारी है। सत् का अर्थ कोई देवता नहीं, कोई आकृति नहीं, केवल होना। और अद्वितीय का अर्थ यह कि उसके बगल में रखने के लिए कुछ बचता ही नहीं, न कोई सामग्री, न कोई दूसरा कारीगर।

उद्दालक ख़ुद ही बताते हैं कि कुछ लोग इससे उलटा कहते हैं, कि आरम्भ में असत् था और उसी से यह सब निकल आया। फिर वह एक प्रश्न में उस मत को हटा देते हैं: भला यह कैसे हो सकता है, न-होने से होना निकलेगा कैसे। यही उपनिषद् का ढंग है। वह गाली नहीं देता, वह पूछ लेता है, और प्रश्न इतना सीधा होता है कि उत्तर में बचाव नहीं बचता। जिस चीज़ का कोई अस्तित्व ही नहीं, वह जनक कैसे बने। इसलिए मूल कारण खोजते जाइए, अन्त में आपको होना ही मिलेगा।

फिर सृष्टि आती है, और वह धमाके से नहीं, एक निगाह से आती है। वह सत् ने देखा, मैं बहुत हो जाऊँ, मैं फैल जाऊँ। उस देखने से तेज निकला। तेज ने वही देखा, और उससे आप् यानी जल निकला। जल ने वही देखा, और उससे अन्न निकला। बीच में उद्दालक दो रोज़मर्रा के प्रमाण रख देते हैं, जो पूरे दर्शन को रसोई और शरीर तक उतार लाते हैं। आदमी जब शोक करता है या तपता है, तब उसे पसीना आता है, यानी तेज से जल जन्मा। और जहाँ पानी बरसता है, वहीं अन्न सबसे अधिक होता है, यानी जल से अन्न जन्मा।

यह क्रम याद रखने लायक है, क्योंकि पूरा अध्याय इसी सीढ़ी पर चढ़ता-उतरता रहेगा: सत्, तेज, जल, अन्न। कोई देवदूत बीच में नहीं आता, कोई कारीगर मिट्टी नहीं गूँधता। जो है, वही अपने भीतर से फैलता है, जैसे बीज अपने भीतर से फूटता है। इसीलिए आगे जब जीव की बात आएगी, तो उसे किसी बाहरी जगह से आया हुआ मेहमान नहीं माना जाएगा। वह उसी सत् का भीतर तक चला आया सिरा होगा।

तीसरा खण्ड इसी को जीवों तक ले आता है। जन्म लेने वाले सब प्राणियों के तीन बीज बताए गए हैं: अण्डज, जो अंडे से हो, जीवज, जो जीवित माँ से हो, और उद्भिज्ज, जो धरती फोड़कर उगे। इसके बाद वह पंक्ति आती है जो इस अध्याय की रीढ़ है। उस देवता ने सोचा, “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”, यानी मैं इस जीव-आत्मा के रूप में भीतर घुसकर नाम और रूप को खोलूँ, फैलाऊँ, अलग-अलग कर दूँ।

इस एक वाक्य में जगत् का पूरा नक्शा है। नाम और रूप बाहर से चिपकाए नहीं गए, वे भीतर बैठे उसी सत् के खोले हुए हैं। और जो भीतर बैठा है, वह कोई और नहीं, वही देवता है जो जीव बनकर घुसा। फिर वह घोषणा करता है कि इन तीनों देवताओं में से हर एक को तिहरा कर दूँ, त्रिवृत्करण, यानी हर एक में बाकी दोनों का हिस्सा मिला दूँ। पिता यहाँ बेटे से कहते हैं कि अब यह समझिए कि यह तिहरा होना कैसे होता है, और अगला खण्ड आँख के सामने खुल जाता है।

सार: आरम्भ में केवल सत् था, एक और अद्वितीय, और न-होने से होना निकल ही नहीं सकता। उसी सत् से तेज, तेज से जल, जल से अन्न फैले, और पसीना तथा बारिश इसके रोज़ के प्रमाण हैं। फिर वही सत् जीव-आत्मा बनकर भीतर उतरा और नाम-रूप खोल दिए।

आग, सूरज, चाँद, बिजली: तीन रंगों का हिसाब (खण्ड 4)

चौथा खण्ड घर के चूल्हे से शुरू होता है। आग जल रही है। उद्दालक बेटे से कहते हैं कि ध्यान से देखिए, उसमें तीन रंग हैं। जो लाल है वह तेज का है, जो सफ़ेद है वह जल का है, जो काला है वह अन्न का है। जब यह तीनों पहचान लिए गए, तो आग का आगपन कहीं चला गया, बचा क्या, तीन रूप। और आग नाम एक वाणी का सहारा भर रह गया, वही वाचारम्भण वाली बात, जो मिट्टी के प्रसंग में आई थी।

फिर वही हिसाब आसमान पर लगाया जाता है। सूरज में लाल तेज का, सफ़ेद जल का, काला अन्न का; सूरज का सूरजपन उसी तरह खुल जाता है। चाँद में वही तीन। बिजली में वही तीन। चार बार यह कहना बेतुका नहीं है, यह एक अभ्यास है। शिष्य को आदत डाली जा रही है कि किसी भी चमकती हुई चीज़ के सामने खड़े होकर उसके नाम पर न रुकें, उसके अवयवों तक जाएँ, और फिर अवयवों के भी मूल तक जाएँ।

इसके बाद उद्दालक एक हवाला देते हैं जो इस अध्याय को अकेला नहीं रहने देता। वह कहते हैं कि पुराने ज़माने के जो बड़े गृहस्थ और बड़े श्रोत्रिय थे, वे यही जानकर कहा करते थे कि अब हमारे सामने कोई ऐसी चीज़ नहीं रखी जा सकती जो अनसुनी हो, अनसोची हो, अनजानी हो। यही तो वह आदेश है जिसका नाम पहले खण्ड में आया था। जिसे यह तीन रंगों वाला ढाँचा दिख गया, उसके लिए कोई नई वस्तु अजनबी नहीं रहती।

और उन्होंने यह भी कहा कि अगर कहीं कुछ अनजाना-सा दिखे भी, तो वह इन्हीं तीन देवताओं का कोई मेल है, कोई जोड़ है। लाल दिखे तो तेज, सफ़ेद दिखे तो जल, काला दिखे तो अन्न, और जो पहचान में न आए वह इन्हीं का मिश्रण। यह एक बहुत बड़ी राहत है। दुनिया की गिनती अनन्त लगती है, पर उसका ककहरा छोटा है, और ककहरा जान लेने पर हर नया शब्द पढ़ा जा सकता है।

फिर पिता अगला मोड़ रखते हैं। अब तक बात बाहर की थी, आग और सूरज और चाँद की। वह कहते हैं कि अब यह जानिए कि यही तीन देवता पुरुष में पहुँचकर कैसे तिहरे हो जाते हैं। यहाँ से यह उपनिषद् आसमान से उतरकर हमारी थाली और हमारी नींद में आ जाता है, और जो बात अब तक एक सुन्दर सिद्धान्त थी, वह शरीर के भीतर की सच्चाई बन जाती है।

सार: आग, सूरज, चाँद और बिजली को उनके तीन रंगों में खोल देने पर उनका अपना नाम एक सहारा भर रह जाता है और तेज, जल तथा अन्न ही बचते हैं। पुराने श्रोत्रिय इसी बल पर कहते थे कि अब कुछ अनजाना नहीं बचा। जो अनजाना दिखे, वह इन्हीं तीन का मेल है।

खाया हुआ अन्न और सोलह कलाओं का उपवास (खण्ड 5 से 7)

पाँचवाँ खण्ड थाली से बात उठाता है। खाया हुआ अन्न भीतर जाकर तीन हिस्सों में बँट जाता है। सबसे भारी हिस्सा मल बनकर निकल जाता है, बीचवाला माँस बनता है, और सबसे महीन हिस्सा मन बनता है। पिया हुआ जल भी तीन में बँटता है, भारी हिस्सा मूत्र, बीच का रक्त, और सबसे महीन प्राण। खाया हुआ तेज भी तीन में बँटता है, भारी हिस्सा हड्डी, बीच का मज्जा, और सबसे महीन वाणी।

इसीलिए वह पंक्ति आती है, “अन्नमयँहि सोम्य मनः आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वाक्”, यानी हे सोम्य, मन अन्न से बना है, प्राण जल से बना है और वाणी तेज से बनी है। यह सुनने में उलटा लगता है, क्योंकि हम मन को शरीर से ऊपर की चीज़ मानकर चलते हैं। उद्दालक उसे ऊँचाई से नहीं गिराते, वह केवल उसका पता बताते हैं। मन कोई हवा में लटका हुआ यन्त्र नहीं है, वह भी उसी सीढ़ी पर बैठा है जिस पर हड्डी और खून बैठे हैं, बस सबसे महीन पायदान पर।

छठे खण्ड में यह बात रसोई से सिद्ध की जाती है। दही मथा जा रहा है। जो सबसे महीन अंश है, वह ऊपर उठ आता है और घी बन जाता है। इसी तरह खाया हुआ अन्न मथा जाता है और उसका महीन अंश ऊपर उठकर मन बनता है। पिया हुआ जल मथा जाता है और उसका महीन अंश प्राण बनता है। खाया हुआ तेज मथा जाता है और उसका महीन अंश वाणी बनता है। मथानी की रस्सी की आवाज़ में यह पूरा दर्शन बैठा हुआ है।

श्वेतकेतु फिर वही कहता है जो वह अब हर बार कहेगा, और बताइए पिताजी। इस बार उद्दालक एक प्रयोग करवाते हैं। सातवाँ खण्ड पूरे उपनिषद्-साहित्य का सबसे अनोखा प्रयोग है। पिता कहते हैं कि पुरुष सोलह कलाओं का है। पन्द्रह दिन कुछ मत खाइए, जल जितना चाहे पीजिए, क्योंकि प्राण जल से बना है और पीते रहने पर वह टूटेगा नहीं। बेटा पन्द्रह दिन बिना अन्न के रहता है।

सोलहवें दिन वह पिता के पास आता है। पिता कहते हैं, सुनाइए, ऋचाएँ, यजुष्, सामन्। बेटा हाथ जोड़ता है, कुछ याद नहीं आ रहा। बारह बरस की कंठस्थ की हुई सारी विद्या भीतर कहीं है, पर उठ नहीं रही। पिता कहते हैं कि जैसे बड़े जलते अलाव में से सिर्फ़ एक अंगारा बचा रह जाए, जुगनू जितना, तो उससे बहुत नहीं जलाया जा सकता। वैसे ही आपकी सोलह कलाओं में से एक बची है, और उस एक से वेद पकड़ में नहीं आते।

फिर वह कहते हैं, अब खाइए, फिर हमारी बात समझ में आएगी। श्वेतकेतु खाता है और लौटता है। अब पिता जो पूछते हैं, वह सब का सब उसे याद आ जाता है। तब वही उपमा उलटी करके रखी जाती है: जुगनू जितने बचे उस एक अंगारे पर घास-फूस डालकर हवा दे दीजिए, वह भड़क उठता है और अब बहुत कुछ जला सकता है। उसी तरह अन्न पाकर आपकी बची हुई एक कला भड़क उठी, और वेद फिर से हाथ आ गए।

इस प्रयोग का सन्देश बहुत नम्र है। स्मृति, पाठ, विद्या, तर्क, यह सब अन्न पर टिके हैं, और अन्न उसी सत् की एक शाखा है। जिस विद्या पर श्वेतकेतु अकड़ा हुआ लौटा था, वह पन्द्रह दिन में बुझने लायक निकली। पिता ने यह उसे कहकर नहीं, चखाकर बताया। यहीं से बेटा सुनने लायक हो जाता है, और अगले खण्ड से वह महावाक्य शुरू होता है जिसके लिए यह पूरा अध्याय जाना जाता है।

सार: खाया हुआ अन्न, पिया हुआ जल और ग्रहण किया हुआ तेज भीतर तीन-तीन हिस्सों में बँटकर मन, प्राण और वाणी तक पहुँचते हैं, जैसे मथे हुए दही का महीन अंश ऊपर उठकर घी बनता है। पन्द्रह दिन के उपवास ने यही बात श्वेतकेतु को चखा दी, और खाते ही बुझती हुई स्मृति फिर भड़क उठी।

नींद, भूख और प्यास: पहली बार तत् त्वम् असि (खण्ड 8)

आठवाँ खण्ड उद्दालक के एक निमन्त्रण से खुलता है। वह कहते हैं कि हे सोम्य, नींद का छोर हमसे समझिए। जब आदमी सोता है, तब वह सत् से जुड़ जाता है, वह अपने में समा जाता है। संस्कृत में सोने के लिए जो शब्द है, स्वपिति, उसे पिता तोड़कर दिखाते हैं: स्व और अपीत, अपने में लौट गया। इसीलिए उसे सोया हुआ कहते हैं, क्योंकि वह अपने घर चला गया है। हर रात हम उसी सत् में लौटते हैं, और सुबह यह ख़बर लिए बिना उठ आते हैं।

फिर वह चिड़िया वाला दृश्य रखते हैं जो एक बार पढ़ लेने पर भूलता नहीं। एक पक्षी की टाँग में डोर बँधी है और डोर का दूसरा सिरा किसी खूँटे से। पक्षी इस दिशा उड़ता है, उस दिशा उड़ता है, कहीं ठिकाना नहीं मिलता, और थककर उसी बन्धन पर आ बैठता है जिससे वह बँधा है। ऐसे ही मन दिशा-दिशा दौड़ता है, कहीं टिकने की जगह नहीं पाता, और अन्त में प्राण से आ लगता है। पिता एक पंक्ति में बात बाँध देते हैं, “प्राणबन्धनँ हि सोम्य मनः”, मन प्राण से बँधा हुआ है।

अब भूख और प्यास। भूख को संस्कृत में अशनाया कहते हैं, और उद्दालक उसका मतलब खोलते हैं। जब आदमी को भूख लगती है, तब जल खाए हुए को भीतर ले जाता है। जैसे गाय ले जाने वाले को गोनाय कहते हैं, घोड़े ले जाने वाले को अश्वनाय और आदमी ले जाने वाले को पुरुषनाय, वैसे ही उस जल को अशनाया कहते हैं, अन्न को ले जाने वाला। यानी भूख नाम की जो बेचैनी हमें उठाती है, वह जल की करतूत है।

फिर वह अंकुर की बात करते हैं। जो चीज़ फूटकर ऊपर आई है, वह बिना जड़ के नहीं हो सकती। तो भूख का अंकुर किस जड़ पर खड़ा है। अन्न पर। अन्न किस पर, जल पर। जल किस पर, तेज पर। तेज किस पर, सत् पर। प्यास के साथ भी वही चलता है। प्यास को उदन्या कहते हैं, क्योंकि तब तेज पिए हुए को भीतर ले जाता है, और वह भी उसी सीढ़ी से उतरकर सत् पर जाकर ठहरता है।

यहाँ पिता वह वाक्य कहते हैं जो पूरे अध्याय का आधार-वाक्य है, “सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः”, यानी हे सोम्य, यह सारी प्रजाएँ सत् को जड़ बनाकर खड़ी हैं, सत् ही उनका घर है, सत् पर ही वे टिकी हैं। भूख और प्यास जैसी छोटी, रोज़ आने वाली, थोड़ी शर्मिंदा करने वाली चीज़ों को पकड़कर उद्दालक उसी जगह पहुँचा देते हैं जहाँ वे सृष्टि की कथा से पहुँचे थे। यही उनकी शिक्षा का ढंग है।

फिर वह मरने की घड़ी का नक्शा खींचते हैं, जो आगे दो बार और लौटेगा। जब कोई जाने लगता है, तब उसकी वाणी मन में समा जाती है, मन प्राण में, प्राण तेज में, और तेज उस परम देवता में। कुछ खोता नहीं, सब भीतर की ओर मुड़ता जाता है, जैसे शाम को दुकानें एक-एक करके बन्द होती जाएँ और गली अन्त में उसी अँधेरे में लौट जाए जिसमें से सुबह जागी थी।

और अब, पहली बार, वह वाक्य आता है: “स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो”, यानी जो यह बारीक-से-बारीक सार है, यह सब उसी का स्वरूप है, वही सत्य है, वही आत्मा है, और हे श्वेतकेतु, वह तत्त्व आप ही हैं। बेटा सुनता है, और फिर वही कहता है, और बताइए पिताजी। यही माँग आगे आठ बार और उठेगी, और हर बार पिता एक नया दृष्टान्त रखकर वही अन्तिम पंक्ति दोहराएँगे।

सार: नींद में आदमी हर रात उसी सत् में लौट जाता है, और जागकर भूल जाता है। मन प्राण से यों बँधा है जैसे डोर से बँधा पक्षी। भूख और प्यास की जड़ खोदते-खोदते वही सत् निकलता है जिस पर सारी प्रजाएँ खड़ी हैं। इसी जगह पहली बार वह वाक्य पड़ता है, वह तत्त्व आप ही हैं।

मधु और नदियाँ: अलग-अलग नाम, एक ही रस (खण्ड 9 और 10)

नवाँ खण्ड एक छत्ते पर खुलता है। मधुमक्खियाँ दिन भर उड़ती हैं। कोई नीम पर बैठती है, कोई महुए पर, कोई जामुन पर, कोई किसी जंगली फूल पर। सब अलग-अलग रस लेकर लौटती हैं और सब उसी एक छत्ते में डाल देती हैं। शाम तक वह सब मिलकर एक हो जाता है, और उसका नाम शहद रखा जाता है। अब उस शहद में से कोई बूँद निकालकर पूछिए कि आप किस पेड़ की हैं, तो उत्तर नहीं मिलेगा।

उद्दालक यही कहते हैं। वे रस वहाँ अलग-अलग रहकर यह नहीं जानते कि मैं फलाने पेड़ का रस हूँ, मैं फलाने पेड़ का रस हूँ। इसी तरह यह सारी प्रजाएँ सत् में जाकर मिल जाती हैं और यह नहीं जानतीं कि हम सत् में मिल रहे हैं। नींद में, प्रलय में, मृत्यु में, हर बार यही होता है। नाम वहीं रह जाते हैं, रस भीतर चला जाता है, और भीतर जाकर वह किसी से कम या अलग नहीं रहता।

फिर पिता एक ऐसी बात जोड़ते हैं जो थोड़ी कड़वी है और बहुत सच्ची। लौटते समय वे प्राणी फिर वही बन जाते हैं जो वे थे: बाघ हो तो बाघ, सिंह हो तो सिंह, भेड़िया, सूअर, कीड़ा, पतंगा, डाँस, मच्छर, जो जो होते हैं वही हो जाते हैं। यानी उस एक में लौटना अपने आप किसी को बदल नहीं देता। जिसने जागते हुए अपने को नहीं पहचाना, वह सोकर उठने पर वही पुरानी पहचान फिर पहन लेता है। पहचानना जागते हुए ही होता है।

दसवाँ खण्ड पानी पर चला जाता है। नदियाँ बहती हैं, कुछ पूरब की ओर, कुछ पश्चिम की ओर। समुद्र से उठा हुआ जल फिर समुद्र तक ही पहुँचता है, और वहाँ जाकर वही समुद्र हो जाता है। वहाँ पहुँचकर वे यह नहीं जानतीं कि मैं गंगा हूँ, मैं यमुना हूँ, मैं सिन्धु हूँ। नाम किनारों के थे, पानी का नहीं था। किनारा छूटा, नाम छूटा, और जो बहता हुआ आया था वह घटा नहीं, बस अपने बड़े रूप में आ गया।

इन दोनों दृष्टान्तों में एक बात साथ-साथ चलती है जिसे पकड़ लेना चाहिए। मिलना यहाँ मिटना नहीं है। शहद में रस मरा नहीं, समुद्र में नदी सूखी नहीं। जो छूटता है वह अलगाव का दावा है, वह सरहद है जो हमने अपने चारों ओर खींच रखी है। और जो बचता है वह होना है, जो पहले भी वही था, बस छोटे नाम के भीतर दबा हुआ था। तीसरी बार वही पंक्ति गिरती है: वह तत्त्व आप ही हैं, श्वेतकेतु।

सार: सैकड़ों पेड़ों के रस छत्ते में जाकर एक शहद बन जाते हैं और अपना पुराना पता भूल जाते हैं। सारी नदियाँ समुद्र में पहुँचकर समुद्र ही हो जाती हैं। जीव भी उसी सत् में लौटते हैं, बिना जाने। और बिना जाने लौटने से पुरानी पहचान छूटती नहीं, वह फिर वापस आ जाती है।

वृक्ष का जीव और न्यग्रोध का बीज (खण्ड 11 और 12)

ग्यारहवाँ खण्ड एक बड़े पेड़ के पास ले जाता है। उद्दालक कहते हैं कि इस पेड़ को जड़ के पास काटिए तो रस बहेगा और पेड़ जीता रहेगा। बीच में काटिए तो रस बहेगा और पेड़ जीता रहेगा। सिरे पर काटिए तो भी रस बहेगा और पेड़ जीता रहेगा। वह पूरा का पूरा जीव-आत्मा से भरा हुआ खड़ा है, रस पीता हुआ, प्रसन्न। चोट लगती है, रस बहता है, और भीतर बैठा जीव उसी तरह बना रहता है।

फिर वह उलटा दृश्य रखते हैं। उसी पेड़ की एक डाल को जीव छोड़ देता है, वह डाल सूख जाती है। दूसरी छोड़ता है, वह सूख जाती है। तीसरी छोड़ता है, वह भी सूख जाती है। और जब वह सारा पेड़ छोड़ देता है, तो सारा पेड़ सूख जाता है। यहाँ जीवन और मृत्यु की परिभाषा बहुत साफ़ हो जाती है। हरा होना उपस्थिति का चिह्न है, सूखना अनुपस्थिति का। लकड़ी वही है, मिट्टी वही है, पानी वही है, पर एक चीज़ हट गई तो सब कुछ ठूँठ हो गया।

इसी पर वह वाक्य आता है जो इस खण्ड की जान है, “जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते”, यानी जीव के हट जाने पर यह मरता है, जीव नहीं मरता। ध्यान दीजिए कि यहाँ कोई सान्त्वना नहीं दी जा रही, एक निरीक्षण रखा जा रहा है। शरीर एक ठिकाना है, और ठिकाना खाली होने पर गिर जाता है। जो खाली कर गया, उस पर गिरने का नियम लगता ही नहीं, क्योंकि वह कभी किसी दीवार पर टिका ही नहीं था।

न्यग्रोध वृक्ष के नीचे खड़े उद्दालक एक पका फल तोड़कर श्वेतकेतु की ओर बढ़ाते हैं, ऊपर टहनियों से जटाएँ लटक रही हैं
बरगद का एक फल, और उसके भीतर छिपा हुआ पूरा पेड़

बारहवाँ खण्ड वहीं पेड़ के नीचे होता है। पिता कहते हैं, वहाँ से न्यग्रोध का एक फल तोड़ लाइए। बेटा लाता है। तोड़िए। तोड़ दिया। इसमें क्या दिख रहा है। नन्हे-नन्हे दाने, पिताजी। इनमें से एक को तोड़िए। तोड़ दिया। अब इसमें क्या दिख रहा है। कुछ नहीं, पिताजी। यह छोटी-सी बातचीत पूरे अध्याय में सबसे प्यारी है, क्योंकि इसमें एक चौबीस बरस का वेदपाठी बिलकुल बच्चे की तरह हाथ फैलाकर खड़ा है।

तब पिता कहते हैं कि जिस बारीकी को आप देख नहीं पा रहे, उसी बारीकी से यह इतना बड़ा बरगद खड़ा हुआ है। और फिर वह दो शब्द कहते हैं जो इस पूरे अध्याय में सबसे कोमल हैं, “श्रद्धत्स्व सोम्य”, प्रिय, भरोसा कीजिए। यहाँ तर्क थोड़ा पीछे हट जाता है और श्रद्धा आगे आ जाती है। इसलिए नहीं कि प्रमाण नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि आँख की एक सीमा है, और जो उस सीमा के उस पार है उसे पहले मान लेना पड़ता है, तभी वह दिखना शुरू होता है।

बरगद का दृष्टान्त और भी गहरा है अगर आप बरगद को देखें। उसकी शाखाओं से जटाएँ लटकती हैं, ज़मीन छूती हैं, और नई जड़ें बन जाती हैं। एक पेड़ फैलते-फैलते एक पूरा जंगल बन जाता है, और उस जंगल का पूरा नक्शा उस अदृश्य बिन्दु में बैठा था जो चीरने पर भी नहीं दिखा। यही चौथी और पाँचवीं बार वह वाक्य कहने का आधार है: जो बारीक-से-बारीक है, वही सबका स्वरूप है, वही आप हैं।

सार: पेड़ को कहीं से भी काटिए, रस बहता है और जीव उसे छोड़ता नहीं; जिस डाल को वह छोड़ देता है वही सूख जाती है। जीव के हटने पर यह मरता है, जीव नहीं मरता। और बरगद के बीज को चीरकर देखिए, भीतर कुछ नहीं दिखता, और उसी न दिखने वाली बारीकी से वह विशाल पेड़ खड़ा है।

घुला हुआ नमक और गान्धार का राही (खण्ड 13 और 14)

मिट्टी के घड़े के पास बैठे उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु से जल चखने को कहते हैं, भोर का उजाला आँगन में फैल रहा है
रात भर घुला हुआ नमक, और हर घूँट में वही स्वाद

तेरहवाँ खण्ड रात को शुरू होता है और सुबह पूरा होता है। पिता कहते हैं कि यह नमक की डली पानी में डाल दीजिए और सुबह हमारे पास आइए। बेटा वैसा ही करता है। सुबह पिता कहते हैं, रात जो नमक पानी में डाला था, ज़रा उसे निकाल लाइए। बेटा घड़े में हाथ डालता है, टटोलता है, और कुछ नहीं मिलता। नमक घुल चुका है। जो चीज़ कल रात हथेली पर रखी हुई दिखती थी, वह आज हाथ से पकड़ी ही नहीं जाती।

तब पिता कहते हैं, ऊपर से एक घूँट लीजिए। कैसा है। खारा है। बीच से लीजिए। कैसा है। खारा है। नीचे से लीजिए। कैसा है। खारा है। पिता कहते हैं, अब इसे रख दीजिए और हमारे पास बैठिए। बेटा वैसा करता है, और नमक वहाँ वैसे ही बना रहता है, बिना दिखे। यहाँ पूरा प्रयोग एक वाक्य में बँध जाता है, “अत्र वाव किल तत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किल”, यानी प्रिय, वह यहीं है और आप उसे देख नहीं पाते, वह यहीं है।

इस दृष्टान्त की ख़ूबी यह है कि यह प्रमाण का तरीक़ा ही बदल देता है। जब तक नमक डली थी, आँख उसका प्रमाण थी। घुलने के बाद आँख बेकार हो गई और जीभ प्रमाण बन गई। सत् के साथ भी यही है। उसे बाहर खोजने वाली इन्द्रियाँ उसे कभी नहीं दिखाएँगी, क्योंकि वह किसी जगह पर रखी हुई चीज़ नहीं है। पर हर अनुभव में उसका स्वाद मौजूद है, ठीक वैसे ही जैसे घड़े के हर हिस्से में नमक मौजूद था।

चौदहवाँ खण्ड एक अपहरण की कथा से शुरू होता है। किसी आदमी को गान्धार देश से उठा लिया जाता है, उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे बहुत दूर एक निर्जन जगह छोड़ दिया जाता है। पट्टी बँधी है। वह चिल्लाता है, पूरब की ओर मुँह करके, उत्तर की ओर, दक्खिन की ओर, पश्चिम की ओर। मुझे बँधी आँखों से लाया गया, मुझे बँधी आँखों से छोड़ा गया। दिशाएँ चारों ओर हैं और एक भी काम की नहीं, क्योंकि दिखता कुछ नहीं।

फिर कोई आता है, उसकी पट्टी खोल देता है और कहता है, गान्धार उस दिशा में है, उस दिशा में चलिए। अब वह बुद्धिमान आदमी गाँव-गाँव पूछता हुआ चलता है और गान्धार पहुँच जाता है। उद्दालक कहते हैं कि जिस आदमी के पास आचार्य हो, वह ऐसे ही जान लेता है। और फिर वह पंक्ति रखते हैं जो इस खण्ड को दूसरों से अलग करती है: उसे बस इतनी ही देर लगती है जितनी देर में यह देह छूटे, फिर वह उसी में मिल जाता है।

दो बातें यहाँ साथ खड़ी हैं। पहली, आचार्य कोई नई जगह नहीं बनाता, वह पट्टी खोलता है और दिशा बताता है। चलना ख़ुद चलना पड़ता है, गाँव-गाँव पूछना पड़ता है। दूसरी, गान्धार उस आदमी का अपना घर था। उसे किसी अजनबी देश तक नहीं पहुँचना था, उसे लौटना था। यही बात इस पूरे अध्याय की है, और इसीलिए वाक्य इस रूप में आता है कि वह तत्त्व आप ही हैं, न कि आपको वह बनना है।

सार: रात को घुला नमक सुबह हाथ नहीं आता, पर हर घूँट में मिलता है, क्योंकि उसे देखने का नहीं, चखने का विषय बन जाना था। और आँखों पर पट्टी बाँधकर छोड़ा गया आदमी दिशाएँ जानकर नहीं, पट्टी खुलने पर घर पहुँचता है। आचार्य वही पट्टी खोलता है, और घर पहले से अपना ही था।

अन्तिम घड़ी और तपा हुआ परशु (खण्ड 15 और 16)

पन्द्रहवाँ खण्ड एक ऐसे कमरे में ले जाता है जिसमें हम सब कभी न कभी बैठे हैं। कोई बहुत बीमार है। घर के लोग चारों ओर बैठे हैं और बार-बार वही पूछ रहे हैं, हमें पहचान रहे हैं, हमें पहचान रहे हैं। यह दृश्य उपनिषद् ने बहुत करुणा से रखा है, बिना किसी सजावट के। जब तक उसकी वाणी मन में नहीं समाई, मन प्राण में नहीं समाया, प्राण तेज में नहीं समाया और तेज उस परम देवता में नहीं समाया, तब तक वह पहचानता है।

और जिस घड़ी यह क्रम पूरा हो जाता है, वह पहचानता नहीं। नाम पुकारे जाते रहते हैं और कोई उत्तर नहीं आता। परिवार इसे अन्त समझता है। उद्दालक इसे लौटना कहते हैं। जो पहचानने का यन्त्र था, वह भीतर समा गया, इसलिए पहचान की भाषा बन्द हो गई। यह वही सीढ़ी है जो आठवें खण्ड में नींद के प्रसंग में बताई गई थी, बस इस बार सुबह उठना नहीं है।

इस खण्ड को इस जगह रखना अपने आप में एक शिक्षा है। आठ दृष्टान्त बीत चुके हैं, मिट्टी, शहद, नदी, पेड़, बीज, नमक, पट्टी, और अब यह। पहले सात में सुनने वाला दर्शक था। इस आठवें में वह ख़ुद कहानी के भीतर आ जाता है, क्योंकि यह कमरा उसका अपना है, और उसमें लेटा हुआ आदमी एक दिन वह ख़ुद होगा। इसीलिए इसी दृश्य के बाद वही पंक्ति सबसे भारी पड़ती है, वह तत्त्व आप ही हैं।

सोलहवाँ खण्ड अदालत में ले जाता है। किसी आदमी को हाथ पकड़कर लाया जाता है। आरोप है कि इसने चोरी की, इसने चुराया है, इसके लिए परशु तपाओ। पुराने न्याय की एक कड़ी रीत थी, तपाया हुआ लोहे का फरसा अभियुक्त के हाथ में रखा जाता था। उद्दालक इस रीत को न्याय की तरह नहीं, आईने की तरह इस्तेमाल करते हैं, और उससे भीतर की एक बात निकाल लेते हैं।

वह कहते हैं, अगर उसने सचमुच चोरी की है, तो वह अपने को झूठ बना लेता है। झूठ की ओट में अपने को छिपाकर वह तपा हुआ परशु पकड़ता है, और जल जाता है, और मारा जाता है। और अगर उसने नहीं की है, तो वह अपने को सत्य बना लेता है। सत्य की ओट में अपने को रखकर वह वही तपा हुआ परशु पकड़ता है, और जलता नहीं, और छोड़ दिया जाता है।

यहाँ जो कहा जा रहा है वह चमत्कार की कथा से बड़ा है। आदमी जिस चीज़ की ओट लेता है, वही उसका कवच बन जाती है। झूठ की ओट लेने वाला उसी झूठ जितना कमज़ोर हो जाता है, और सत्य की ओट लेने वाले के चारों ओर वही सत् खड़ा हो जाता है जिससे तेज निकला था। आग तेज है, और सत्य तेज की जड़ है; जड़ के पास खड़े आदमी को शाखा जलाए, यह सम्भव नहीं रह जाता।

और इसी पर अध्याय पूरा होता है। नवीं और आख़िरी बार वही वाक्य कहा जाता है, वह तत्त्व आप ही हैं, श्वेतकेतु। इस बार बेटा यह नहीं कहता कि और बताइए। मूल पाठ केवल इतना कहता है, “तद्धास्य विजज्ञौ”, यानी उसने इसे जान लिया, जान लिया। दोहराव अन्त का चिह्न है, और साथ ही इस बात का भी कि यह जानना अब उधार का नहीं रहा। वह अकड़ जिससे यह अध्याय शुरू हुआ था, अब कहीं नहीं है।

सार: मरते हुए आदमी की वाणी मन में, मन प्राण में, प्राण तेज में और तेज उस परम देवता में समा जाता है, और तब वह पहचानता नहीं। तपे हुए परशु के सामने खड़ा आदमी जिस चीज़ की ओट लेता है वही उसका कवच बनती है। नवीं बार वही वाक्य गिरता है, और इस बार बेटा और कुछ नहीं पूछता।

और अन्त में, अपनी ओर

इस अध्याय में जो नौ दृष्टान्त आए, वे सब एक ही जगह से उठाए गए हैं: रसोई, बग़ीचा, नदी, अदालत और बीमारी का कमरा। उद्दालक कहीं आकाश की सैर पर नहीं ले गए। उन्होंने वही चीज़ें उठाईं जो श्वेतकेतु रोज़ देखता था और जिन पर उसकी नज़र कभी ठहरी नहीं थी। यह इस अध्याय की सबसे व्यावहारिक शिक्षा है। जिसे खोजना है वह किसी दूसरी जगह नहीं रखा है, बस देखने का ढंग बदलना है, और ढंग बदलने के लिए कोई सीढ़ी चाहिए, जो हाथ के पास पड़ी चीज़ों से ही बनती है।

दूसरी बात उस लड़के की है। वह घर लौटा था यह मानकर कि अब सीखना ख़त्म हुआ। पिता ने एक प्रश्न से उसका पूरा खाता खोल दिया, और उसने वह किया जो सबसे मुश्किल है: उसने मान लिया कि नहीं जानता। इसके बाद वह सोलह खण्डों तक लगातार एक ही वाक्य कहता रहा, और बताइए। हमारे जीवन में भी जो कुछ सचमुच खुला है, वह उसी वाक्य के बाद खुला है। जिस दिन हम सब जान लेने का दावा नीचे रख देते हैं, उसी दिन कोई हमारे सामने नमक का घड़ा रखकर कहता है, चखिए।

और तीसरी बात। इस अध्याय का वाक्य आपसे यह नहीं कहता कि जाइए और कुछ बन जाइए। वह आपको एक ख़बर देता है, जो पहले से सच है। नींद में आप हर रात वहीं लौटते हैं। भूख आपको हर दिन उसी जड़ की याद दिलाती है। बरगद के बीज में जो नहीं दिखता, वही आपके भीतर काम कर रहा है। इतना ही करना है कि किसी दिन, किसी घूँट के बीच में, ठहरकर उस स्वाद को पहचान लीजिए। उद्दालक ने बेटे से जो नौ बार कहा, वह उसी एक ठहराव के लिए कहा था।

आधार: छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 6, खण्ड 1 से 16; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।