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प्रजापति के आँगन में एक मिट्टी का पात्र रखा है, जल से भरा हुआ। उसके दोनों ओर दो लोग झुककर खड़े हैं। एक देवताओं का राजा है, दूसरा असुरों का। बत्तीस वर्ष ये दोनों यहीं रह चुके हैं, समिधा हाथ में लेकर आए थे और चुपचाप सेवा करते रहे, और आज गुरु ने कुल इतना कहा है कि जल में अपने को देखिए, और अपने विषय में जो समझ न आए वह हमें बता दीजिए। दोनों झुकते हैं। दोनों को वही दिखता है जो हमें और आपको दिखता, बालों से लेकर नाखूनों तक अपनी पूरी छवि। एक वहीं से उठकर संतुष्ट लौट जाता है। दूसरा रास्ते में ठिठक जाता है, और यही ठिठकना इस पूरे अध्याय की जान है।
छान्दोग्य उपनिषद् यहाँ अपने आख़िरी अध्याय पर है। पिछले अध्याय में सनत्कुमार नारद को नाम से उठाकर भूमा तक पहुँचा चुके हैं, और अब यह आठवाँ अध्याय पन्द्रह खण्डों में दो हिस्सों जैसा खुलता है। पहले हिस्से में दहर-विद्या है, हृदय के भीतर वह छोटा आकाश जिसमें द्युलोक और पृथ्वी तक रखे बताए जाते हैं, फिर वह सेतु जिसे दिन और रात नहीं लाँघते, फिर हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ। दूसरा हिस्सा कथा है, और उसमें एक ही प्रश्न का उत्तर चार बार दिया जाता है। यह अध्याय पूछता है कि जिसे हम अपना आप कहते हैं, वह ठीक-ठीक कौन है, और उत्तर तक पहुँचने में कितना समय लगता है।
इस अध्याय के मुख्य किरदार
प्रजापति: वह आचार्य जो एक घोषणा करके चुप हो जाते हैं, और फिर सौ वर्ष तक शिष्य के लौटने की प्रतीक्षा करते हैं।
इन्द्र: देवताओं के राजा, जिन्हें कथा मघवा भी कहती है; हर उत्तर पर संतुष्ट होकर चलते हैं और रास्ते में ही भय देख लेते हैं।
विरोचन: असुरों के राजा, जो पहली झलक पर रुक गए और वही समझ अपने लोगों तक पहुँचा आए।
हृदय का दहर आकाश: शरीररूपी ब्रह्मपुर के बीच वह छोटा स्थान, जिसमें सारा बाहर समाया हुआ बताया जाता है।
सम्प्रसाद: वह पूरी तरह शान्त हो चुका तत्त्व, जो शरीर से उठकर परम ज्योति तक पहुँचता है और अपने ही रूप में प्रकट होता है।
सेतु: वह बाँध जिस पर दिन, रात, बुढ़ापा, मृत्यु और शोक, सबका रास्ता रुक जाता है।
हृदय के भीतर वह छोटा आकाश (खण्ड 1)
अध्याय का पहला वाक्य एक इशारे से शुरू होता है। शरीर को यहाँ ब्रह्मपुर कहा गया है, ब्रह्म का नगर, और उस नगर के बीच एक छोटा सा कमल जैसा घर बताया गया है। उस घर के भीतर एक छोटा सा आकाश है। आचार्य का वाक्य यही है, “यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः”, इस ब्रह्मपुर में जो यह छोटा कमलरूप घर है और उसके भीतर जो यह छोटा आकाश है, उसके अन्दर जो कुछ है, वही खोजने योग्य है, वही जानने योग्य है। बाकी चौदह खण्ड इसी एक पंक्ति की व्याख्या हैं।
सुनने वाला वही पूछता है जो कोई भी पूछेगा। इतने छोटे स्थान में आख़िर रखा क्या है, जिसे खोजा जाए, जिसे जानने की इतनी ज़िद की जाए। उत्तर में जो कहा गया, वह इस उपनिषद् की सबसे बड़ी उलटबाँसी है। जितना बड़ा यह बाहर का आकाश है, उतना ही बड़ा हृदय के भीतर का वह आकाश है। “उभे अस्मिन्द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते”, द्युलोक और पृथिवी, दोनों इसी के भीतर रखे हैं। अग्नि और वायु, सूर्य और चन्द्रमा, बिजली और नक्षत्र, और जो कुछ यहाँ इसका है और जो कुछ यहाँ नहीं है, सब उसी में समाया हुआ है।
दूसरा प्रश्न और भी सीधा है। यदि सब कुछ इसी ब्रह्मपुर में रखा है, तो जिस दिन यह शरीर बूढ़ा होगा, जिस दिन यह ढह जाएगा, उस दिन उस सबका क्या होगा, पीछे बचेगा क्या। आचार्य का उत्तर एक ही साँस में आ जाता है। शरीर के बूढ़े होने से वह बूढ़ा नहीं होता, शरीर के मारे जाने से वह मारा नहीं जाता। नगर गिर सकता है, नगर के भीतर का वह आकाश जहाँ का तहाँ रहता है। यही सच्चा ब्रह्मपुर है, और सारी कामनाएँ इसी में रखी हैं।
इसके बाद उस आत्मा के आठ नाम गिनाए जाते हैं, और हर नाम एक कमी हटाकर बनाया गया है। अपहतपाप्मा, जिससे पाप झड़ चुका। विजर, जिसमें बुढ़ापा नहीं उतरता। विमृत्यु, जहाँ मृत्यु की पहुँच नहीं। विशोक, जिसमें शोक नहीं ठहरता। विजिघत्स और अपिपास, जिसे न भूख सताती है न प्यास। सत्यकाम, जिसकी इच्छाएँ सच्ची हैं। सत्यसङ्कल्प, जिसका संकल्प अपने आप फलता है। ये आठ शब्द आगे की पूरी कथा में लौट-लौटकर आएँगे, और सौ वर्ष तक इन्हीं आठ की परीक्षा चलती रहेगी।
खण्ड के अन्त में एक नाप दे दी जाती है, जिससे बाकी सब तौला जा सके। जैसे यहाँ कमाई से बना लोक एक दिन चुक जाता है, वैसे ही आगे पुण्य से जीता हुआ लोक भी चुक जाता है। जो लोग यहाँ से इस आत्मा को जाने बिना उठ जाते हैं, उनके लिए किसी लोक में अपनी मर्ज़ी से चलना नहीं है। और जो यहीं इस आत्मा को और इन सच्ची कामनाओं को जानकर जाते हैं, उनके लिए सब लोकों में कामचार है, अपनी इच्छा से आना और जाना। जो चुक जाता है और जो नहीं चुकता, दोनों के बीच की रेखा यहीं खिंच जाती है।
सार: शरीर को यह अध्याय ब्रह्म का नगर कहता है, और उस नगर के बीच हृदय में एक छोटे आकाश की ओर उँगली उठाता है। उस छोटे में उतना ही रखा है जितना सारे बाहर में है, और नगर के गिरने पर भी वह नहीं गिरता। पहले खण्ड की यही नींव आगे पन्द्रहवें खण्ड तक साथ चलती है।
संकल्प के लोक, और सच पर पड़ा झूठ का ढक्कन (खण्ड 2 और 3)
दूसरा खण्ड एक सूची है, और सूची पढ़ते-पढ़ते समझ आता है कि यह सूची किसी की भी हो सकती है। जिसे पितरों का लोक चाहिए, उसके संकल्प मात्र से पितर उठ खड़े होते हैं, और उस लोक को पाकर वह महिमा में आ जाता है। फिर माताएँ, फिर भाई, फिर बहनें, फिर मित्र। फिर गन्ध और माला, फिर अन्न और पान, फिर गीत और बाजे, फिर स्त्रियाँ। हर बार वही वाक्य लौटता है, संकल्प से ही वे उठ खड़े होते हैं, और उस लोक से भरकर वह बड़ा हो जाता है।
इस दुहराव में एक बात छिपी है। जिस जगह की बात हो रही है, वहाँ चाहने और पाने के बीच का फ़ासला मिट जाता है। यहाँ हम जो चाहते हैं, उसके लिए रास्ता, साधन, समय और अवसर, सब जोड़ने पड़ते हैं। वहाँ जिस ओर मन गया, वही उठ आता है। खण्ड अपनी बात इसी पर बन्द करता है, कि जिस किसी वस्तु को वह चाहता है, जिस कामना को चाहता है, वह उसके संकल्प से ही उठ आती है, और उसे पाकर वह महिमा में आता है। यह सूची सामर्थ्य का नाप है।
तीसरा खण्ड इसी पर एक कड़वा प्रश्न रख देता है। यदि ये कामनाएँ सच्ची हैं, तो हमें दिखतीं क्यों नहीं। उत्तर यह है कि ये सच्ची कामनाएँ हैं, और इन पर झूठ का ढक्कन पड़ा है। जो अपना यहाँ से चला गया, उसे हम यहाँ फिर देख नहीं पाते। पर जो जीवित हैं और जो जा चुके हैं, और जो कुछ चाहकर भी हाथ नहीं आता, वह सब वहाँ पहुँचकर मिल जाता है, क्योंकि उसकी सच्ची कामनाएँ वहीं रखी हैं, बस ढकी हुई।
फिर वह उपमा आती है जो एक बार पढ़ने के बाद नहीं छूटती। सोने का ख़ज़ाना ज़मीन में गड़ा है, और जिन्हें उस जगह का पता नहीं, वे उसके ऊपर से रोज़ चलते-फिरते रहते हैं और उसे कभी नहीं पाते। ठीक ऐसे ही ये सारी प्रजाएँ रोज़ इस ब्रह्मलोक तक जाती हैं और उसे नहीं पहचानतीं, “न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः”, वे उसे पाती नहीं, क्योंकि झूठ उन्हें आगे ठेल देता है। छठे खण्ड में यह बात खुलेगी कि यह रोज़ का जाना गहरी नींद में होता है। रोज़ पहुँचना, और रोज़ बिना पहचाने लौट आना।
इसी खण्ड में हृदय शब्द खुलता है। वह आत्मा हृदय में है, और इसी से उसका नाम बना, हृदि अयम्, यह जो हृदय में है, इसलिए हृदयम्। नाम को चीरकर अर्थ निकालने की यह रीति इस उपनिषद् की अपनी है, और यहाँ इसका काम केवल व्युत्पत्ति बताना नहीं है। जो यह जानता है, वह प्रतिदिन स्वर्ग लोक जाता है। जगह दूर नहीं बताई जा रही, दिशा बताई जा रही है, और दिशा भीतर की ओर मुड़ी हुई है।
खण्ड का अन्त दो वाक्यों में बहुत आगे तक चला जाता है। वह सम्प्रसाद, वह पूरी तरह शान्त हो चुका तत्त्व, इस शरीर से उठकर परम ज्योति तक पहुँचता है और अपने ही रूप में प्रकट हो जाता है। यही आत्मा है, यही अमृत, यही अभय, यही ब्रह्म। और इस ब्रह्म का नाम बताया गया है, सत्यम्। फिर उस नाम के तीन अक्षर अलग करके दिखाए जाते हैं, सत् अमृत है, ति मर्त्य है, और यम् दोनों को एक साथ थामे रखता है। यह पंक्ति बारहवें खण्ड में ज्यों की त्यों लौटेगी, तब इन्द्र सौ वर्ष पूरे कर चुके होंगे।
सार: संकल्प से उठने वाले लोक इस अध्याय में सामर्थ्य का नाप हैं, और उन तक न पहुँच पाने का कारण झूठ का वह ढक्कन बताया गया है जो सच्ची कामनाओं पर पड़ा है। गड़े ख़ज़ाने के ऊपर रोज़ चलने वाले लोगों की उपमा इसी को पकड़ती है। और आत्मा का पता हृदय में बताकर यह खण्ड सम्प्रसाद का वह वाक्य रख जाता है, जिस पर आगे पूरी कथा टिकेगी।
वह सेतु, जिसे दिन और रात नहीं लाँघते (खण्ड 4 और 5)
चौथा खण्ड एक नया शब्द लाता है, सेतु। आत्मा को यहाँ पुल भी कहा गया है और बाँध भी, वह धृति जिससे ये सारे लोक अपनी-अपनी जगह टिके हैं और आपस में घुल नहीं जाते। बाँध के इस ओर का पानी इस ओर रहता है, उस ओर का उस ओर। यदि वह बाँध न हो तो नाम और रूप, दिन और रात, लोक और लोक, सब एक-दूसरे में बह जाएँ। जिसे हम भीतर बैठा हुआ छोटा सा तत्त्व समझते हैं, उसे यह खण्ड सारी व्यवस्था का आधार बताकर खड़ा कर देता है।
फिर उस बाँध की ऊँचाई नापी जाती है, और नाप इस तरह दी गई है, “नैतꣳ सेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतꣳ”, इस सेतु को दिन और रात नहीं लाँघते, न बुढ़ापा, न मृत्यु, न शोक, न किया हुआ पुण्य, न किया हुआ पाप। जिन चीज़ों से हमारा सारा हिसाब चलता है, वे सब यहाँ आकर लौट जाती हैं। सारे पाप वहाँ से पीछे मुड़ जाते हैं, क्योंकि वह ब्रह्मलोक पाप से अछूता है।
इसके बाद जो कहा गया है, वह चिकित्सा की भाषा में कहा गया है। इस सेतु को पार करके अन्धा अनन्धा हो जाता है, बिंधा हुआ अनबिंधा, ताप से जलता हुआ शान्त। और पार करके रात भी दिन ही होकर निकलती है, क्योंकि वह ब्रह्मलोक एक ही बार सदा के लिए प्रकाशित है, सकृद्विभात। वहाँ उजाला रोज़ नया नहीं होता। वहाँ उजाला कभी बुझा ही नहीं, इसलिए वहाँ जलाने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।
पाँचवाँ खण्ड इसी पुल तक पहुँचने का साधन बताता है, और बताते हुए यज्ञशाला के सारे शब्द उठाकर एक ही जगह रख देता है। जिसे लोग यज्ञ कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही जानने वाला उसे पाता है। जिसे इष्ट कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य है, क्योंकि उसी से यजन करके मनुष्य आत्मा को पाता है। जिसे सत्त्रायण कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य है, क्योंकि उसी से सत् आत्मा का त्राण मिलता है। और जिसे मौन कहते हैं, वह भी ब्रह्मचर्य है, क्योंकि उसी से आत्मा को जानकर मनुष्य मनन करता है।
जिसे अनाशकायन कहते हैं, उपवास, वह भी ब्रह्मचर्य है, क्योंकि जिस आत्मा को ब्रह्मचर्य से पाया जाता है, वह नष्ट नहीं होता। इसके आगे का पाठ पुरानी प्रतियों में कहीं-कहीं टूटा हुआ मिलता है, और शांकरभाष्य यहाँ अरण्यायन पढ़ता है, वन की ओर जाना। फिर अचानक एक चित्र खुल जाता है। ब्रह्मलोक में अर और ण्य नाम के दो समुद्र हैं, यहाँ से तीसरे आकाश में; वहाँ ऐरं मदीयं नाम का सरोवर है, वहाँ सोम टपकाता अश्वत्थ है, और वहाँ प्रभु का मापा हुआ स्वर्णमय भवन है।
यह चित्र बाहर के नक्शे जैसा दिखता है, और पढ़ने वाला पूछ सकता है कि इतनी ठोस भूगोल यहाँ क्यों आ गई। खण्ड अपना उत्तर अगली ही पंक्ति में दे देता है। जो लोग ब्रह्मचर्य से ही उन दोनों समुद्रों को पाते हैं, ब्रह्मलोक उन्हीं का है, और सब लोकों में उनका कामचार है। शर्त वही रही जो पहले रखी गई थी। नक्शा बदलता रहता है, चलने की शर्त नहीं बदलती।
सार: आत्मा को यह खण्ड बाँध कहता है, जिस पर दिन, रात, बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, पुण्य और पाप, सबका रास्ता रुक जाता है। उसे पार करने वाले की कमियाँ पीछे छूट जाती हैं, और वह लोक एक ही बार सदा के लिए जल चुका है। और वहाँ तक ले जाने वाला साधन ब्रह्मचर्य बताया गया है, जिसके भीतर यज्ञ, इष्ट, सत्त्रायण, मौन और उपवास, सब समेट लिए गए हैं।
हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ (खण्ड 6)
छठा खण्ड शरीर के भीतर लौट आता है, और एक नक्शा खींचता है जो आज भी चौंकाता है। हृदय की नाड़ियाँ बताई जाती हैं, और उनके रंग गिनाए जाते हैं, पिङ्गल, शुक्ल, नील, पीत, लोहित। और फिर ठीक वही रंग सूर्य में दिखा दिए जाते हैं। वह सूर्य पिङ्गल है, वही शुक्ल, वही नील, वही पीत, वही लोहित। भीतर की नाड़ी और बाहर का सूर्य, दोनों एक ही रंगपट्टी पर रख दिए गए हैं, और आगे की सारी बात इसी जोड़ पर चलती है।
फिर उपमा आती है, और वह गाँव की उपमा है। जैसे एक लम्बा राजपथ खिंचा हुआ दोनों गाँवों तक जाता है, इस वाले तक भी और उस वाले तक भी, वैसे ही सूर्य की रश्मियाँ दोनों लोकों तक जाती हैं, इस लोक तक भी और उस लोक तक भी। वे उस सूर्य से फैलकर इन नाड़ियों में उतरती हैं, और इन नाड़ियों से फैलकर उस सूर्य में जा बैठती हैं। रास्ता एक ही है, और आना-जाना दोनों उसी एक रास्ते पर होता है।
इसी रास्ते से यह खण्ड नींद तक पहुँचता है। जब कोई सोया हुआ, पूरी तरह समेटा हुआ और शान्त होता है और स्वप्न तक नहीं जानता, तब वह इन्हीं नाड़ियों में उतर चुका होता है। उस समय उसे कोई पाप छूता नहीं, क्योंकि उस समय वह तेज से भर गया होता है। तीसरे खण्ड में जिस रोज़-रोज़ के जाने की बात थी, वह यही है। और यही वह अवस्था है जिस पर आगे इन्द्र एक बार अटकेंगे और वहाँ से लौट आएँगे।
फिर वह क्षण आता है जिसे यह अध्याय बिना घबराए लिखता है। जब कोई बहुत दुर्बल पड़ जाता है, तो पास बैठे लोग झुककर पूछते हैं, क्या आप हमें पहचानते हैं, क्या आप हमें पहचानते हैं। जब तक वह इस शरीर से निकला नहीं है, तब तक पहचानता है। और जब वह इस शरीर से निकलता है, तब इन्हीं रश्मियों के सहारे ऊपर चढ़ता है। ओम् के साथ वह ऊपर जाता है, और जितनी देर में मन एक बार फेंका जाए, उतनी देर में सूर्य तक पहुँच जाता है।
उसी जगह को लोकद्वार कहा गया है, लोक का दरवाज़ा, जानने वालों के लिए भीतर जाने की जगह और न जानने वालों के लिए रुकावट। और खण्ड एक श्लोक पर आकर बन्द होता है, “शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका”, हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ हैं, उनमें से एक सिर की ओर निकलती है। उसी से ऊपर जाता हुआ मनुष्य अमृतत्व पाता है, और बाकी सब निकलने के समय अलग-अलग दिशाओं में चली जाती हैं।
सार: हृदय की नाड़ियाँ और सूर्य की किरणें इस खण्ड में एक ही राजपथ के दो छोर हैं, जिस पर गहरी नींद में भी आना-जाना होता है और अन्तिम समय में भी। मरते हुए व्यक्ति के पास बैठे लोगों का पूछना और उसका पहचानना, यह दृश्य यहीं है। और अन्त में एक सौ एक नाड़ियों में से उस एक का पता दिया गया है, जो सिर की ओर निकलती है।
प्रजापति की घोषणा, और दो समिधा-धारी (खण्ड 7)
सातवें खण्ड से अध्याय का दूसरा हिस्सा शुरू होता है, और यह पूरा का पूरा कथा है। पहले एक घोषणा होती है, “य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः”, वह आत्मा जिससे पाप झड़ चुका, जिसमें बुढ़ापा नहीं, मृत्यु नहीं, शोक नहीं, भूख नहीं, प्यास नहीं, जिसकी इच्छा सच्ची और संकल्प सच्चा, उसे खोजना चाहिए, उसे जानना चाहिए। और जो उसे खोजकर जान लेता है, वह सारे लोक और सारी कामनाएँ पा लेता है। इतना कहकर प्रजापति चुप हो जाते हैं।
ये वही आठ नाम हैं जो पहले खण्ड में हृदय के भीतर वाले आकाश के लिए आए थे। वहाँ यह सिद्धान्त था, यहाँ यही कथा बनने जा रहा है। घोषणा दोनों पक्षों ने सुनी, देवताओं ने भी और असुरों ने भी। दोनों ने आपस में यही कहा कि चलिए, उस आत्मा को ढूँढ़ें जिसे पाकर सारे लोक और सारी कामनाएँ मिल जाती हैं। देवताओं की ओर से इन्द्र चले, असुरों की ओर से विरोचन। एक ही वाक्य ने दोनों को उठा दिया।
दोनों एक ही द्वार की ओर चले, और एक-दूसरे को अपनी मंशा बताए बिना चले। हाथ में समिधा थी, वह लकड़ी जो शिष्य बनकर आने का चिह्न है। और फिर बत्तीस वर्ष। इन बत्तीस वर्षों में कोई प्रश्न नहीं, कोई माँग नहीं, केवल ब्रह्मचर्य। यह अध्याय जल्दी में नहीं है, और आचार्य भी जल्दी में नहीं हैं। बत्तीस वर्ष बीतने पर प्रजापति स्वयं पूछते हैं कि आप दोनों क्या चाहते हुए यहाँ रह रहे हैं।
दोनों उत्तर में वही घोषणा दुहरा देते हैं, शब्द दर शब्द, और जोड़ते हैं कि भगवन् के वचन को हम इसी तरह समझते हैं और इसी को चाहते हुए यहाँ रहे हैं। ध्यान देने की बात यह है कि उन्हें वाक्य कण्ठस्थ है। अगले सौ वर्ष ठीक इसी पर बीतने वाले हैं, कि याद रखना और जान लेना, इन दोनों के बीच कितनी दूरी है, और वह दूरी कैसे पार होती है।
प्रजापति जो उत्तर देते हैं, वह छोटा है। “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा”, जो यह पुरुष आँख में दिखाई देता है, वही आत्मा है, यही अमृत, यही अभय, यही ब्रह्म। दोनों शिष्य तुरन्त पूछ लेते हैं कि जो जल में झलकता है और जो दर्पण में दिखता है, उनमें से कौन। प्रजापति कहते हैं, यही इन सब में दिखाई देता है। वाक्य पूरा सच है, और इतना खुला हुआ है कि सुनने वाला अपनी समझ की ऊँचाई तक ही उसे ले जा सकेगा।
सार: प्रजापति की घोषणा पहले खण्ड के उन्हीं आठ नामों को कथा में उतार देती है, और उसे सुनकर देवताओं से इन्द्र और असुरों से विरोचन, दोनों समिधा लेकर एक ही द्वार पर आ जाते हैं। बत्तीस वर्ष की सेवा के बाद जो उत्तर मिलता है, वह आँख में दिखने वाले पुरुष का है, और वह उत्तर इतना खुला है कि हर शिष्य उसमें अपनी ही समझ पढ़ लेगा।
जल के पात्र में: विरोचन का संतोष (खण्ड 8)

अब वह दृश्य आता है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था। प्रजापति जल से भरा पात्र मँगवाते हैं, उदशराव, और कहते हैं कि इसमें अपने को देखिए, और आत्मा के विषय में जो समझ न आए, वह हमें बता दीजिए। दोनों झुककर देखते हैं। प्रजापति पूछते हैं, क्या दिखता है। और वे जो उत्तर देते हैं, वही इस पूरी कथा की धुरी है।
वे कहते हैं, “सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्यः आनखेभ्यः प्रतिरूपम्”, भगवन्, हम दोनों अपने पूरे आत्मा को यहाँ देख रहे हैं, बालों से लेकर नाखूनों तक, हूबहू वही छवि। प्रजापति इस पर कुछ सुधारते नहीं। वे एक और परीक्षा ले लेते हैं। कहते हैं, जाइए, अच्छी तरह सज-सँवरकर, अच्छे वस्त्र पहनकर, साफ़-सुथरे होकर फिर इसी पात्र में देखिए। दोनों चले जाते हैं और वैसा ही करके लौटते हैं।
प्रजापति फिर वही पूछते हैं, क्या दिखता है। वे कहते हैं, जैसे हम दोनों सजे हुए, अच्छे वस्त्रों में और सँवरे हुए हैं, वैसे ही ये दोनों भी सजे हुए, अच्छे वस्त्रों में और सँवरे हुए हैं। प्रजापति कहते हैं, यही आत्मा है, यही अमृत, यही अभय, यही ब्रह्म। दोनों शान्त हृदय लेकर चल पड़ते हैं। जिस उत्तर के लिए बत्तीस वर्ष लगे, वह कुछ ही क्षणों में उन्हें पूरा लग गया।
जाते हुए दोनों की पीठ देखकर प्रजापति जो कहते हैं, वह अकेले में कहा गया वाक्य है। वे कहते हैं, ये आत्मा को पाए बिना, जाने बिना जा रहे हैं। इन दोनों में से जो भी, देवता हों या असुर, इसी को अपना उपनिषद् बना लेंगे, वे हार जाएँगे। आचार्य पीछे से पुकारते नहीं। जिसने अपना प्रश्न स्वयं बन्द कर लिया, उसे बाहर से खोला नहीं जा सकता, और यह कथा इस बात को बिना कहे कह देती है।
विरोचन शान्त हृदय लिए असुरों के पास पहुँचता है और उन्हें यही उपनिषद् सुना देता है। आत्मा ही यहाँ महिमा देने योग्य है, आत्मा ही सेवा करने योग्य है; यहाँ आत्मा की ही महिमा करता हुआ और आत्मा की ही सेवा करता हुआ मनुष्य दोनों लोक पा लेता है, इस लोक को भी और उस लोक को भी। शब्द ठीक हैं, एक-एक शब्द ठीक है। जिस आत्मा की ओर वे इशारा कर रहे हैं, वह जल में दिखी हुई देह है।
खण्ड यहाँ से सीधे हमारे समय में उतर आता है। इसीलिए, वह कहता है, आज भी जो नहीं देता, जिसमें श्रद्धा नहीं, जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए लोग कह देते हैं कि यह तो असुर है, क्योंकि यही असुरों का उपनिषद् है। और मरे हुए के शरीर को वे भिक्षा से, वस्त्र से, गहने से सजाते हैं, यह मानकर कि इसी से उस लोक को जीत लेंगे। जल के पात्र वाली उस एक जल्दबाज़ी से एक पूरी रीति निकल आई, और वह रीति आज तक चल रही है।
सार: जल के पात्र में दोनों को अपना प्रतिबिम्ब दिखता है, और सजकर दुबारा देखने पर प्रतिबिम्ब भी सजा हुआ दिखता है। विरोचन इसी पर संतुष्ट होकर लौट जाता है और यही समझ असुरों तक पहुँचा देता है। प्रजापति उसे पीछे से पुकारते नहीं, और उपनिषद् इसी जगह से देह को सजाने वाली उस पूरी रीति की जड़ दिखा देता है।
इन्द्र पहली बार लौटते हैं, और स्वप्न वाला उत्तर (खण्ड 9 और 10)
इन्द्र उसी रास्ते पर चल रहे हैं, देवताओं तक पहुँचे भी नहीं हैं, और बीच में ही ठिठक जाते हैं। जो बात उन्हें दिखी, उसे यह उपनिषद् भय कहता है। वे सोचते हैं, जैसे यह शरीर सजा हो तो वह भी सजा दिखता है, शरीर अच्छे वस्त्रों में हो तो वह भी अच्छे वस्त्रों में, शरीर सँवरा हो तो वह भी सँवरा, वैसे ही शरीर अन्धा हो तो वह भी अन्धा, लँगड़ा हो तो लँगड़ा, अंग कट जाए तो कटा हुआ। और इस शरीर के नष्ट होते ही वह भी नष्ट हो जाता है।
यहीं उनके मुँह से वह वाक्य निकलता है जो आगे तीन बार लौटेगा, “नाहमत्र भोग्यं पश्यामि”, हमें इसमें कुछ पाने योग्य नहीं दिखता। और वे मुड़ जाते हैं। फिर समिधा हाथ में लेकर उसी द्वार पर आ खड़े होते हैं। प्रजापति पूछते हैं, मघवन्, आप तो विरोचन के साथ शान्त हृदय लेकर गए थे, अब क्या चाहते हुए लौट आए। इन्द्र अपनी शंका शब्द दर शब्द दुहरा देते हैं, वही अन्धा, वही लँगड़ा, वही कटा हुआ अंग।
प्रजापति का उत्तर तीन शब्दों का है, ऐसा ही है, मघवन्। न कोई डाँट, न यह ताना कि पहले क्यों नहीं समझे, न यह कि इतने वर्ष क्या किया। वे इतना ही जोड़ते हैं कि इसी को हम आपके लिए और आगे खोलकर कहेंगे, बत्तीस वर्ष और रहिए। और इन्द्र बत्तीस वर्ष और रहते हैं। इस कथा में हर उत्तर की क़ीमत वर्षों में गिनी गई है, और यही गिनती इस कथा का असली उपदेश है।
बत्तीस वर्ष बाद दूसरा उत्तर आता है। जो स्वप्न में महिमा पाता हुआ विचरता है, वही आत्मा है, यही अमृत, यही अभय, यही ब्रह्म। यह पहले उत्तर से बहुत आगे की बात है। सपने में देखने वाला अपनी देह छोड़ आता है, अपनी दुनिया आप बना लेता है, उसका शरीर यहाँ पड़ा रहता है और वह कहीं और चलता-फिरता है। जल में दिखने वाली छवि पीछे छूट गई। इन्द्र फिर शान्त हृदय लेकर चल देते हैं।
और फिर वही ठिठकना। देवताओं तक पहुँचने से पहले ही उन्हें भय दिख जाता है। वे देखते हैं, यह शरीर अन्धा हो जाए तो वह अन्धा नहीं होता, लँगड़ा हो जाए तो लँगड़ा नहीं होता, शरीर के दोष से वह दूषित नहीं होता, शरीर के मारे जाने से वह मारा नहीं जाता। यहाँ तक सब ठीक है। पर उसी सपने में उसे मानो कोई मारता है, मानो कोई खदेड़ता है, मानो उसे अप्रिय का अनुभव होता है, वह मानो रोता भी है। जिस अवस्था में रोना बचा हुआ हो, उसे अभय कहना कठिन है।
इन्द्र दूसरी बार लौटते हैं, समिधा फिर हाथ में। प्रजापति फिर वही पूछते हैं, वे फिर वही दुहराते हैं, और प्रजापति फिर वही कहते हैं, ऐसा ही है, मघवन्; इसी को और आगे खोलेंगे; बत्तीस वर्ष और रहिए। पढ़ने वाले को अब तक यह दुहराव खटकने लगता है, और यही इस कथा का ढंग है। वही द्वार, वही समिधा, वही प्रश्न, और हर बार शिष्य अपने ही भीतर एक परत और नीचे उतर जाता है।
सार: जल में दिखी छवि पर इन्द्र रास्ते में ही ठिठक जाते हैं, क्योंकि वह छवि शरीर के साथ अन्धी, लँगड़ी और नष्ट होती दिखती है। लौटने पर उन्हें डाँट नहीं, बत्तीस वर्ष और मिलते हैं, और तब स्वप्न में विचरने वाले का उत्तर मिलता है। वह उत्तर भी उसी रास्ते पर टूट जाता है, क्योंकि सपने में रोना बचा रह जाता है।
तीसरी वापसी: गहरी नींद वाला, और पाँच वर्ष और (खण्ड 11)
तीसरा उत्तर सबसे सूक्ष्म है। प्रजापति कहते हैं, जब कोई सोया हुआ, पूरी तरह समेटा हुआ और शान्त होता है और स्वप्न तक नहीं जानता, वही आत्मा है, यही अमृत, यही अभय, यही ब्रह्म। छठे खण्ड में जिस अवस्था का ज़िक्र आ चुका था, कथा घूमकर उसी पर आ पहुँची है। यहाँ न शरीर का दुख पहुँचता है, न सपने का डर। इन्द्र शान्त हृदय लेकर चल देते हैं, और इस बार उनका संतोष पहले से ज़्यादा ठोस लगता है।
और तीसरी बार, देवताओं तक पहुँचने से पहले, उन्हें भय दिख जाता है। इस बार उनका प्रश्न सबसे तीखा है, “नाह खल्वयमेवꣳ संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मि”, यह तो इस समय अपने को यह भी नहीं जानता कि हम यह हैं। और न इन भूतों को जानता है। यह तो मानो नाश में ही समा गया। हमें इसमें कुछ पाने योग्य नहीं दिखता। जिस शान्ति में जानने वाला ही नहीं बचा, उसे लेकर वे देवताओं के पास नहीं जा सकते।
यह प्रश्न इस पूरे अध्याय का सबसे बड़ा प्रश्न है। जिस अवस्था में कोई दुख नहीं पहुँचता, उसी में जानने वाला भी नहीं बचता, और जो जानने वाला ही न बचा, उसे पाकर कोई क्या करेगा। इन्द्र तीसरी बार समिधा लेकर द्वार पर खड़े हैं। प्रजापति वही तीन शब्द कहते हैं, ऐसा ही है, मघवन्, और इस बार एक बात जोड़ देते हैं, कि इससे अन्यत्र कुछ और नहीं है। यह वाक्य सुनकर पाठक समझ जाता है कि अब आख़िरी बात कही जाने वाली है।
और फिर वह छोटी सी अवधि आती है, पाँच वर्ष और रहिए। इन्द्र पाँच वर्ष और रहते हैं। बत्तीस, बत्तीस, बत्तीस और पाँच। ये मिलकर एक सौ एक हो जाते हैं, और उपनिषद् यह गिनती स्वयं दोहराता है, इसीलिए कहते हैं कि मघवा ने प्रजापति के पास एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्य किया। एक सौ एक की यह संख्या इस अध्याय में दूसरी बार आ रही है। पहली बार वह हृदय की नाड़ियों के साथ आई थी, जिनमें से एक ही ऊपर की ओर निकलती है।
यहाँ रुककर यह पूछना बनता है कि प्रजापति ने पहले ही आख़िरी बात क्यों न कह दी। कथा इसका उत्तर अपनी बनावट में दे देती है। जाग्रत का प्रतिबिम्ब, स्वप्न का विचरने वाला, सुषुप्ति का शान्त, ये तीनों ठीक वहीं थे जहाँ इन्द्र उस समय खड़े थे। हर उत्तर उतना ही खुला था जितना शिष्य उस दिन देख सकता था, और हर बार शिष्य के अपने भीतर से वह भय उठा जिसने उसे अगली सीढ़ी पर चढ़ा दिया।
सार: गहरी नींद वाला उत्तर इन्द्र को सबसे दूर तक ले जाता है और वहीं सबसे गहरा प्रश्न खड़ा कर देता है, कि जिस शान्ति में अपना होना भी याद न रहे, उसका करना क्या। तीसरी वापसी पर प्रजापति पाँच वर्ष और माँगते हैं, और गिनती एक सौ एक पर पूरी होती है। हर पिछला उत्तर उतना ही खुला था जितना शिष्य उस दिन उठा सकता था।
अशरीर और उत्तम पुरुष: असली उत्तर, और अन्तिम वचन (खण्ड 12 से 15)
एक सौ एक वर्ष बाद प्रजापति जो कहते हैं, उसकी शुरुआत शरीर से ही होती है। मघवन्, यह शरीर मरणधर्मा है, मृत्यु ने इसे पकड़ रखा है। और यही उस अमृत, अशरीर आत्मा का अधिष्ठान है, उसके बैठने की जगह। जो शरीर वाला है, उसे प्रिय और अप्रिय पकड़ लेते हैं, और शरीर वाले रहते हुए प्रिय तथा अप्रिय से छुटकारा नहीं मिलता। जो अशरीर हो चुका, उसके लिए वाक्य यह है, “न प्रियाप्रिये स्पृशतः”, प्रिय और अप्रिय उसे छूते ही नहीं।
फिर एक उदाहरण आता है जो आकाश से उठाया गया है। वायु अशरीर है; बादल, बिजली और गरज, ये सब अशरीर हैं। जैसे ये उस आकाश से उठकर परम ज्योति तक पहुँचते हैं और अपने-अपने रूप में प्रकट हो जाते हैं, वैसे ही यह सम्प्रसाद इस शरीर से उठकर परम ज्योति तक पहुँचता है और अपने रूप में प्रकट हो जाता है। तीसरे खण्ड में यही पंक्ति एक बार आ चुकी है। सौ वर्ष घूमकर कथा ठीक उसी वाक्य पर लौट आई है, और अब उसे सुनने वाला तैयार है।
वहाँ पहुँचकर वह उत्तम पुरुष है। वह वहाँ विचरता है, खाता है, खेलता है, आनन्द करता है, स्त्रियों के साथ, वाहनों के साथ, अपने लोगों के साथ, और इस शरीर को, जो पीछे जुड़ा हुआ रह गया, याद तक नहीं करता। और फिर वह उपमा आती है जो बैलगाड़ी से उठाई गई है। जैसे जोतने वाला पशु गाड़ी में जुता रहता है, वैसे ही यह प्राण इस शरीर में जुता हुआ है। गाड़ी और जुते हुए पशु का सम्बन्ध जितना है, उतना ही इसका इस देह से है।
इसके बाद प्रजापति इन्द्रियों को एक-एक करके अलग करके दिखाते हैं। जहाँ यह आकाश में लगी हुई आँख है, वहाँ चाक्षुष पुरुष है, और आँख देखने के लिए है। जो यह जानता है कि हम सूँघें, वही आत्मा है, और नाक सूँघने के लिए है। जो जानता है कि हम बोलें, वही आत्मा है, और वाणी बोलने के लिए है। जो जानता है कि हम सुनें, वही आत्मा है, और कान सुनने के लिए है। हर इन्द्रिय को उसका काम सौंपकर वे पीछे बैठे हुए को अलग कर देते हैं।
और जो यह जानता है कि हम सोचें, वही आत्मा है, और मन उसकी दिव्य आँख है। उसी दिव्य आँख से, मन से, वह उन कामनाओं को देखता हुआ आनन्द लेता है जो ब्रह्मलोक में हैं। आँख में दिखने वाले उस पुरुष का असली अर्थ यहाँ आकर खुलता है। एक सौ एक वर्ष पहले प्रजापति ने जो कहा था, कहा वही था; पर उसे सुनने के लिए इन्द्र को अपने ही भीतर से तीन बार लौटना पड़ा, और हर बार अपनी समझ की एक परत छोड़नी पड़ी।
खण्ड का अन्त वहीं आकर होता है जहाँ से घोषणा शुरू हुई थी। इसी आत्मा की देवता उपासना करते हैं, इसीलिए उनके पास सारे लोक हैं और सारी कामनाएँ। जो उस आत्मा को खोजकर जान लेता है, वह सारे लोक और सारी कामनाएँ पा लेता है। और फिर वही वाक्य दो बार लिख दिया गया है, प्रजापतिरुवाच, प्रजापतिरुवाच, ऐसे जैसे बात पूरी करके किसी ने दरवाज़ा धीरे से बन्द कर दिया हो।
बचे हुए तीन खण्ड बहुत छोटे हैं और तीनों बिदाई के स्वर में हैं। तेरहवाँ खण्ड एक ही वाक्य है, और वह अपने ही मुँह से बोला गया है। श्याम से शबल में जाते हैं, शबल से श्याम में; जैसे घोड़ा अपने रोएँ झाड़ देता है वैसे पाप झाड़कर, जैसे चन्द्रमा राहु के मुँह से छूट आता है वैसे छूटकर, शरीर को झाड़कर, कृतात्मा होकर उस अकृत ब्रह्मलोक में पहुँच जाते हैं, जिसे किसी ने बनाया नहीं।
चौदहवाँ खण्ड आकाश पर लौट आता है, वहीं जहाँ पहला खण्ड खड़ा था। आकाश ही नाम और रूप को बाहर निकालकर रखता है, और जो इन दोनों के भीतर है, वही ब्रह्म है, वही अमृत, वही आत्मा। फिर वही स्वर, कि हम प्रजापति की सभा में, उनके भवन में प्रवेश करते हैं; हम ब्राह्मणों का यश हों, राजाओं का यश, विशों का यश; हमने यश पा लिया। और अन्त में एक छोटी सी प्रार्थना, कि उस सफ़ेद, दन्तहीन और लसलसी जगह तक हमारा जाना न हो।
पन्द्रहवाँ खण्ड परम्परा गिनाता है और गृहस्थ की दिनचर्या पर आकर रुक जाता है। यह विद्या ब्रह्मा ने प्रजापति को दी, प्रजापति ने मनु को, मनु ने प्रजा को। आचार्यकुल से विधिपूर्वक वेद पढ़कर, गुरु के काम से बचे हुए समय में, लौटकर अपने कुटुम्ब में, किसी शुद्ध स्थान पर स्वाध्याय करता हुआ, अपने लोगों को धार्मिक बनाता हुआ, सारी इन्द्रियों को आत्मा में जमाकर, तीर्थों को छोड़कर किसी भी प्राणी को न सताता हुआ, जो जीवन भर ऐसे ही चलता है, वह ब्रह्मलोक को पाता है, “न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते”, और फिर लौटकर नहीं आता, फिर लौटकर नहीं आता।
सार: आख़िरी उत्तर शरीर को मृत्यु के हाथ में सौंपकर उसे अशरीर आत्मा का अधिष्ठान बताता है, और उस सम्प्रसाद को परम ज्योति में अपने रूप में प्रकट होते दिखाता है। इन्द्रियों को उनका काम सौंपकर पीछे बैठा हुआ जानने वाला अलग कर दिया जाता है, और मन को उसकी दिव्य आँख कहा जाता है। अन्तिम तीन खण्ड पाप झाड़ने, नाम-रूप के भीतर वाले ब्रह्म, और उस गृहस्थ की चर्या पर बन्द होते हैं जो लौटकर नहीं आता।
और अन्त में, अपनी ओर
इस अध्याय की सबसे काम की चीज़ शायद इन्द्र का वह ठिठकना है। उन्हें हर बार उत्तर मिला, हर बार वे संतुष्ट होकर चले, और हर बार रास्ते में ही उन्हें दिख गया कि यह उत्तर कहाँ तक साथ देगा। संतोष उनके भीतर टिका नहीं, और यही उनकी असली पूँजी थी। विरोचन को भी वही उत्तर मिला था, उसी दिन, उसी आँगन में, उसी पात्र पर झुककर। फ़र्क़ केवल इतना रहा कि उसने आगे पूछा नहीं।
और यह दहर आकाश वाली बात। अपने बारे में जो कुछ हम जानते हैं, वह प्रायः दर्पण से आया है, दूसरों की नज़र से आया है, सजने और सँवरने से आया है, और उसे रोज़ नया सहारा चाहिए। पहला खण्ड कहता है कि हृदय के भीतर उतनी ही जगह है जितनी सारे आकाश में, और उसमें द्युलोक भी रखा है और पृथ्वी भी। जिस दिन यह बात एक क्षण के लिए भी सच लगे, उस दिन जल के पात्र वाला उत्तर अपने आप छोटा पड़ जाता है।
आख़िरी बात गिनती की है। बत्तीस, बत्तीस, बत्तीस और पाँच। इस अध्याय ने एक सौ एक वर्ष लिखकर यह कह दिया कि जिसे हम एक बार सुनकर समझ लेना चाहते हैं, वह एक बार सुनकर समझ में आता ही नहीं। और उसने यह भी कह दिया कि लौटकर आने वाले शिष्य को आचार्य कभी नहीं डाँटता। जो लौट आया, उसके लिए द्वार हर बार उतना ही खुला मिला, और अन्तिम उत्तर तक वही पहुँचा जो तीन बार लौटा।
आधार: छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 8, खण्ड 1 से 15; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।