हृदय का छोटा-आकाश और इन्द्र-विरोचन-कथा
पन्द्रह खण्ड। उपनिषद् का closing-धागा।
आठवाँ और अन्तिम अध्याय दो हिस्सों में बँटा है। पहला, दहर-विद्या (पहले छह खण्ड), जिसमें कहा जाता है कि हृदय के अन्दर एक छोटा-कमल-आकार-स्थान है, और उसी छोटे-स्थान के अन्दर एक आकाश है। उसी आकाश में जो-कुछ है, वो ही अन्वेष्टव्य है, वो ही विज्ञेय।

तीसरे खण्ड की पंक्ति विशेष है, “जैसा बाह्य आकाश है, वैसा ही यह हृदय-अन्तर का आकाश। दोनों में द्यो-पृथ्वी, अग्नि-वायु, सूर्य-चन्द्र, विद्युत्-नक्षत्र, सब-कुछ इसमें समाहित है। जो-कुछ यहाँ है, और जो-कुछ यहाँ नहीं है, वो भी इसमें।” यह एक powerful-वाक्य है, क्योंकि यह कहता है कि अनुभव-योग्य अनुभव-योग्य-न-होने-वाली सब-चीज़ें इस छोटे-से-स्थान में हैं।
दूसरा हिस्सा (खण्ड सात से बारह तक) “इन्द्र-विरोचन-कथा” है, उपनिषद्-साहित्य का एक प्रसिद्ध-दर्शन-शास्त्रीय moment। प्रजापति एक घोषणा करते हैं, “वो आत्मा जो पाप-मुक्त, अजर, अमर, अशोक, बिना-भूख-प्यास, सत्य-काम, सत्य-संकल्प है, वो ही अन्वेष्टव्य है।” यह सुनकर दो शिष्य आते हैं, इन्द्र (देवताओं की ओर से) और विरोचन (असुरों की ओर से)। प्रजापति उन्हें बत्तीस-साल पास रखते हैं, फिर एक-by-एक चार-स्तर पर शिक्षा देते हैं।
पहले शिक्षण-स्तर पर, वो उन्हें एक तालाब के पास भेज कर कहते हैं, “अपने-आप को पानी में देखो।” दोनों देखते हैं, और प्रजापति कहते हैं, “वो ही आत्मा।” विरोचन यहीं रुक जाता है, सोचता है, “आत्मा यानी शरीर। समझ गया।” वो असुरों के पास लौट कर यही शिक्षा देता है। इन्द्र थोड़ी देर बाद वापस आता है, संदेह में, “अगर शरीर ही आत्मा, तो शरीर के अंध-लंगड़े होने पर आत्मा अंध-लंगड़ी होगी, मरने पर मर जाएगी। यह सही नहीं हो सकता।” प्रजापति प्रसन्न होते हैं, उसे आगे की शिक्षा देते हैं।
Key passages
अर्थ: यह जो इस ब्रह्म-पुर (शरीर) में छोटा (दहर) पुण्डरीक (कमल) वेश्म (घर) है, उसके अंदर एक छोटा-आकाश है। उसी में जो-है, वो ही अन्वेष्टव्य (खोज-योग्य), वो ही विज्ञेय (जानने-योग्य) है।
अर्थ: जैसा यह बाहर का आकाश है, वैसा ही यह हृदय-अंदर का आकाश। दोनों में द्यो-पृथ्वी, अग्नि-वायु, सूर्य-चन्द्र, विद्युत्-नक्षत्र, सब-कुछ इस-में समाहित है। जो-कुछ यहाँ है और जो-कुछ यहाँ नहीं, सब इस-में समाहित।
अर्थ: वो आत्मा जो पापमुक्त, अजर, अमर, अशोक, अभूख-अप्यास, सत्य-काम, सत्य-संकल्प है, वो ही अन्वेष्टव्य, वो ही विज्ञेय। जो उसको खोज कर जान लेता है, वो सब-लोक और सब-काम पाता है। यह प्रजापति ने कहा।
अर्थ: इसी-तरह, हे मघवन् (इन्द्र), यह शरीर। इसी-तरह यह शरीर अशन-पिपासा से पीड़ित है। जो इस आत्मा को इस-तरह जानता है, फिर वो किस-को किस-से देखे? किस-को सुने? किस-को सूँघे? किस-को बोले? किस-को सोचे? यह सब का प्रभु। यह सब का ईशान। यह सब का अधिपति। यह मेरा आत्मा, हृदय में। आत्मा से ही यह आत्मा होता है, जो ऐसा जानता है। यह जानता है। यह जानता है।
अध्याय-overview
Khanda 1-3 दहर-विद्या: हृदय में आकाश, उसमें ब्रह्म।
Khanda 4-6 कुछ-यो-योगिक practices।
Khanda 7-12 इन्द्र-विरोचन कथा। चार-step: शरीर, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय।
Khanda 13 दिग्-यन्त्र-दिव्य-काल। ब्रह्म-लोक।
Khanda 14-15 brahma-loka-path। अंतिम-दर्शन।
संगति
इन्द्र-विरोचन कथा पूरे वेदान्त-pedagogy का सबसे detailed-example है। चार-स्तर of consciousness, जागृत-स्वप्न-सुषुप्ति-तुरीय, यहाँ explicit हैं, और बाद में माण्डूक्य उपनिषद् इसी क्रम का सूत्र-संक्षेप करती है। विरोचन का शरीर-पर रुकना सब materialism-philosophies (आधुनिक atheism, scientific-reductionism) का root है। इन्द्र का तुरीय-पार जाना सब realisation-philosophies का।
दहर-विद्या स्वयं भी एक खास शिक्षा है। हृदय के “छोटे-स्थान” के अन्दर पूरी-cosmos का होना एक तरह की micro-in-macro-वाक्य है। यह विचार बाद की तन्त्र-परम्पराओं में, और कुछ-कुछ आधुनिक quantum-physics-discourse में भी अपनी प्रतिध्वनि पाता है।
छान्दोग्य उपनिषद् का closing-वाक्य, “एवम् जरति-इति जरति-इति जरति-इति” (वो जानता है, जानता है, जानता है), तीन-बार-दोहराव के साथ ख़त्म होता है। यह तीन-दोहराव एक संरचनात्मक-seal है, जैसे संगीत में triple-cadence गायन के अन्त को पक्का करता है। पाठक को यह संकेत है कि अध्याय और पूरी उपनिषद् यहीं पूर्ण होती है।