छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 5

छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय पाँच

प्राण, पंच-अग्नि, और वैश्वानर

चौबीस खण्ड। उपनिषद् का सबसे cosmology-rich अध्याय।

पाँचवें अध्याय का पहला हिस्सा एक छोटी मगर अर्थ-घन कथा है। पाँच इन्द्रियाँ, वाक्, चक्षु, श्रोत्र, मन, और प्राण, प्रजापति के पास जा कर पूछती हैं, “हम पाँचों में से सबसे श्रेष्ठ कौन है?” प्रजापति कहते हैं, “जिसके निकल जाने पर शरीर सबसे बुरा हाल हो, वो श्रेष्ठ।”

तब प्रयोग होता है। पहले वाक् निकल जाती है, एक साल के लिए। मनुष्य गूँगा रह कर भी जीवित। फिर चक्षु, एक साल अन्धा भी जीवित। फिर श्रोत्र, बहरा भी। फिर मन, मूढ़ भी रह कर जीवित। आख़िर में प्राण निकलने लगते हैं। जैसे एक अच्छा घोड़ा अपनी खूँटियाँ उखाड़ कर भागने लगता है, वैसे ही प्राण निकलते देख चारों इन्द्रियाँ डर कर कहती हैं, “रुको, रुको। तुम ही श्रेष्ठ हो।”

दूसरा बड़ा हिस्सा “पंच-अग्नि-विद्या” है। पाँच क्रमिक यज्ञ कल्पित किए जाते हैं, द्यो (आकाश), पर्जन्य (बादल), पृथ्वी, पुरुष, और स्त्री। हर एक में सोम-जीव क्रम-से क्रिया करता हुआ अंतिम-रूप से मनुष्य-योनि में पुनर्जन्म लेता है। यह उपनिषद्-साहित्य की पुनर्जन्म-cosmology का सबसे विस्तृत वर्णन है, और दशवें खण्ड का पुनर्जन्म-वाक्य आज तक भी एक तरह की उत्साह-मिश्रित-विवाद से पढ़ा जाता है, “रमणीय कर्म करने वाले रमणीय-योनि पाते, कपूय कर्म करने वाले कपूय-योनि।”

तीसरा हिस्सा वैश्वानर-विद्या है। पाँच ब्राह्मण उद्दालक-आरुणि के पास ब्रह्म-तत्त्व सीखने जाते हैं। उद्दालक उन्हें सीधे जवाब देने के बजाय कहते हैं, “चलो, राजा अश्वपति-कैकेय के पास चलते हैं, वो हम सबको सिखाएँगे।” राजा से शिक्षा लेने जाना एक रोचक उलट-पुलट है, जहाँ क्षत्रिय एक ब्राह्मण को सिखा रहा है।

Key passages

5.1.6-7प्राण-वरण
तान्वरीयांस{\म्+} च श्रेष्ठं च विदा{\म्+}चकाराथ हैनानुवाच । प्राणे वाव निधनीभूतः प्राणः स{\म्+}वर्गः । प्राणे वाव प्रतिष्ठितम् । प्राणातीदं सर्वं जायते प्राणे सर्वं प्रतितिष्ठति प्राणे सर्वं प्रतितिष्ठति ॥
tānvarīyāṃsa{\m+} ca śreṣṭhaṃ ca vidā{\m+}cakārātha hainānuvāca । prāṇe vāva nidhanībhūtaḥ prāṇaḥ sa{\m+}vargaḥ । prāṇe vāva pratiṣṭhitam । prāṇātīdaṃ sarvaṃ jāyate prāṇe sarvaṃ pratitiṣṭhati prāṇe sarvaṃ pratitiṣṭhati ॥

अर्थ: उन्होंने (वाक्-दर्शन-श्रोत-मन-इन्द्रिय) ने जान-लिया कि प्राण ही सबसे-वरीयस्तर और श्रेष्ठ है। फिर उन्होंने प्राण को कहा, ‘प्राण में ही निधन (समाप्ति), प्राण ही संवर्ग। प्राण में ही सब-कुछ प्रतिष्ठित। प्राण से ही यह सब-उत्पन्न, प्राण में सब-प्रतिष्ठित।’

संगति: Hierarchy of life-functions। प्राण = life का सार = breath = consciousness-carrier। यह कथा बाद-में बृहदारण्यक में अधिक-विस्तार से आती है।
5.10.7पुनर्जन्म-घोषणा
तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्न्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥
tadya iha ramaṇīyacaraṇā abhyāśo ha yatte ramaṇīyāṃ yonimāpadyerannbrāhmaṇayoniṃ vā kṣatriyayoniṃ vā vaiśyayoniṃ vātha ya iha kapūyacaraṇā abhyāśo ha yatte kapūyāṃ yonimāpadyeranśvayoniṃ vā sūkarayoniṃ vā caṇḍālayoniṃ vā ॥

अर्थ: इस-लोक में जो रमणीय (अच्छा) आचरण करते हैं, वो रमणीय-योनि पाते हैं, ब्राह्मण-योनि, क्षत्रिय-योनि, या वैश्य-योनि। और जो कपूय (बुरा) आचरण करते हैं, वो कपूय-योनि पाते हैं, श्व-योनि (कुत्ता), सूकर-योनि (सूअर), या चाण्डाल-योनि।

संगति: बहुत-direct karma-rebirth statement। आज के time में controversial है, मगर तब-time में यह दार्शनिक के संदर्भ में था, सामाजिक-judgement नहीं। यह वाक्य कह रही है कर्म-resultant। और ‘चाण्डाल’ मनुष्य-योनि है, गाली नहीं।

अध्याय-overview

Khanda 1-2 प्राण-वरण कथा, मुख्य-इन्द्रिय।

Khanda 3-10 पंच-अग्नि-विद्या, द्यू-वर्षा-इस-पृथ्वी-पुरुष-स्त्री, और देव-यान-पितृ-यान-दो-मार्ग।

Khanda 11-24 वैश्वानर-विद्या, पाँच-छात्र-with-उद्दालक राजा अश्वपति-कैकेय के पास।

संगति

पंच-अग्नि-विद्या वेदान्तिक cosmology का सबसे detailed की नींव है। पाँच यज्ञों के through सोम-जीव का flow एक प्रकार का life-cycle-model है, जो आधुनिक जीव-विज्ञान से बहुत अलग है, मगर अपनी अंतर्संगति में consistent है। ब्रह्म-सूत्र के तीसरे अध्याय का पहला और दूसरा अधिकरण इसी पर तर्क करते हैं।

वैश्वानर-विद्या एक विशेष पहचान-दान-शिक्षा है। ब्रह्म को “सब-शरीरों में रहने वाला वैश्वानर-अग्नि” कहा गया है। यह पंच-कोश-system (पाँच परतों वाले शरीर-मॉडल) का भी foundation है, जो आगे तैत्तिरीय उपनिषद् में पूर्ण रूप पाता है।

दशवें खण्ड का पुनर्जन्म-वाक्य बहुत-बार पढ़ा गया है, और इसमें कुछ शब्द (कपूय-योनि का अर्थ क्या, चाण्डाल-योनि की प्रतिष्ठा क्या) आज एक तरह की सामाजिक-असुविधा पैदा करते हैं। मूल पाठ-व्यवस्था में यह कर्म-resultant-tatva का दार्शनिक-कथन है,मगर बाद की परम्पराओं में इसे कैसे पढ़ा गया, यह अपने आप में एक अलग विषय है।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “chhaandogya.itx” से।

license: मूल text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।