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वाणी एक बरस के लिए देह छोड़कर चली गई थी। लौटी तो उसने देखा कि जिन्हें वह अपने बिना अधूरा समझती थी, वे सब जी रहे थे। गूँगों की तरह बोले बिना, पर साँस लेते हुए, आँख से देखते हुए, कान से सुनते हुए, मन से सोचते हुए। वाणी चुपचाप भीतर लौट आई। फिर आँख गई, कान गया, मन गया, और हर बार वही दृश्य दुहराया गया। कोई भी अपने जाने से देह को गिरा न सका। तब प्राण ने जाना चाहा, और जैसे कोई तेज़ घोड़ा अपने पाँव बाँधने वाली खूँटियाँ एक झटके में उखाड़ देता है, वैसे ही उसने बाक़ी सबको जड़ समेत हिला दिया। सब दौड़कर उसके चारों ओर जमा हो गए।
छान्दोग्य उपनिषद् का यह पाँचवाँ अध्याय चौबीस खण्डों में फैला है और इसमें तीन बड़े प्रसंग एक के बाद एक खुलते हैं। पहले प्राण की श्रेष्ठता और उससे जुड़ी मन्थ नाम की एक विधि, फिर पांचाल के राजा प्रवाहण जैवलि की सभा में श्वेतकेतु की वह हार जिससे पंचाग्नि-विद्या और मरने के बाद की दो राहें खुलती हैं, और अन्त में राजा अश्वपति कैकेय के आँगन में छह बड़े श्रोत्रियों को दी गई वैश्वानर-विद्या। तीनों प्रसंगों का प्रश्न एक ही है: जो सबको धारण किए हुए है, वह कहाँ बैठा है और उसे किस रूप में उपासा जाए। उत्तर धीरे-धीरे बाहर से भीतर की ओर सरकता है, आकाश और सूर्य से होता हुआ अपनी ही देह के भीतर।
इस अध्याय के मुख्य किरदार
प्राण: वह मुख्य साँस जिसके उठ जाने पर देह ढह जाती है, इस अध्याय का पहला और आख़िरी नायक।
प्रजापति: प्राणों के पिता, जिन्होंने झगड़े का फ़ैसला सुनाने के बदले एक कसौटी थमा दी।
श्वेतकेतु आरुणेय: पढ़े-लिखे युवा, जो पांचालों की सभा में पाँच प्रश्नों पर निरुत्तर रह गए।
उद्दालक आरुणि: श्वेतकेतु के पिता, गौतम गोत्र के आचार्य, जो न जानना मान लेने और फिर सीखने चले जाने का साहस रखते हैं।
प्रवाहण जैवलि: पांचाल देश के राजा, जिनके पास वह विद्या थी जो तब तक क्षत्रियों के हाथ में रही।
अश्वपति कैकेय: वह राजा जिसके राज्य में चोर नहीं था और जिसने छह श्रोत्रियों को पूरा वैश्वानर दिखाया।
छह महाशाल: प्राचीनशाल औपमन्यव, सत्ययज्ञ पौलुषि, इन्द्रद्युम्न भाल्लवेय, जन शार्कराक्ष्य, बुडिल आश्वतराश्वि और स्वयं उद्दालक।
सबसे बड़ा कौन है: इन्द्रियों की होड़ और प्रजापति की कसौटी (खण्ड 1)
अध्याय की शुरुआत पाँच छोटे-छोटे सूत्रों से होती है, जिनमें देह के भीतर बैठी शक्तियों को उनके नाम दिए जाते हैं। जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठ को जान ले, वह अपने लोगों में ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है, और “प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च”, प्राण ही वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो वसिष्ठ को जाने, वह वसिष्ठ होता है, और वसिष्ठ वाणी है। जो प्रतिष्ठा को जाने, वह इस लोक और उस लोक दोनों में टिक जाता है, और प्रतिष्ठा आँख है। जो सम्पद् को जाने, उसके पास देवों और मनुष्यों की कामनाएँ चलकर आती हैं, और सम्पद् कान है। जो आयतन को जाने, वह अपने लोगों का आश्रय बनता है, और आयतन मन है।
नाम बँटते ही होड़ शुरू हो गई। हर एक कहने लगा कि मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ। यह बड़ी सच्ची तस्वीर है, क्योंकि हमारे भीतर भी यही होड़ चलती रहती है। कभी आँख सब कुछ तय करती है, कभी कान, कभी मन अपने ही तर्कों को पूरी दुनिया मान बैठता है। हारकर वे सब अपने पिता प्रजापति के पास पहुँचे और पूछा कि भगवन्, हम में श्रेष्ठ कौन है। प्रजापति ने फ़ैसला सुनाने से इनकार कर दिया। उन्होंने बस एक कसौटी दी: जिसके निकल जाने पर यह देह और भी बिगड़ी हुई जान पड़े, वही आप सबमें श्रेष्ठ है।
वाणी पहले उठी। एक बरस बाहर बिताकर लौटी और उसने पूछा, “कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति”, मेरे बिना आप जी कैसे सके। उत्तर मिला, जैसे गूँगे जीते हैं, बोले बिना, पर प्राण से साँस लेते हुए, आँख से देखते हुए, कान से सुनते हुए, मन से सोचते हुए। वाणी भीतर लौट आई। फिर आँख गई, एक बरस बाहर रही, और उसे वही उत्तर मिला, जैसे अंधे जीते हैं, देखे बिना। कान गया, और सुना कि जैसे बहरे जीते हैं। मन गया, और उसे बताया गया कि जैसे नन्हे बालक जीते हैं, बिना मन के भी साँस लेते, बोलते, देखते और सुनते हुए। हर बार देह बची रही।
अब प्राण ने जाना चाहा। उसने उठने भर का उपक्रम किया और बाक़ी सब जड़ से हिल गए, जैसे कोई बढ़िया घोड़ा अपने पैरों की बेड़ी वाली खूँटियाँ एक ही झटके में उखाड़ फेंके। इस उपमा में कुछ ऐसा है जो पढ़कर देह में उतर जाता है। यह वह क्षण है जिसे हर आदमी किसी न किसी दिन किसी प्रिय की चारपाई के पास खड़े होकर देखता है। तब सब दौड़कर आए और बोले कि भगवन्, आप ही रहिए, आप ही हम सबमें श्रेष्ठ हैं, आप मत जाइए।
इसके बाद जो हुआ, वह इस खण्ड की सबसे सुंदर बात है। वाणी ने कहा कि जो वसिष्ठपन मेरा है, वह आपका है। आँख ने कहा कि जो प्रतिष्ठा मैं हूँ, वह आप हैं। कान ने अपनी सम्पद् प्राण को सौंप दी, मन ने अपना आयतन। होड़ हार से नहीं, समर्पण से ख़त्म हुई। इसीलिए यह उपनिषद् कहता है कि लोग इन्हें अलग-अलग वाणियाँ, आँखें, कान और मन कहकर नहीं पुकारते, इन्हें प्राण ही कहते हैं, क्योंकि प्राण ही यह सब हो जाता है। भाषा ने वही मान लिया जो देह पहले से जानती थी।
सार: भीतर की हर शक्ति अपने को केन्द्र मानती है, और कसौटी सिर्फ़ एक है, किसके हटते ही सब ढह जाता है। एक-एक करके वाणी, आँख, कान और मन बाहर रहकर लौट आए और देह चलती रही। प्राण के हिलते ही सब हिल गए, और तब हर एक ने अपना गुण उसी के नाम कर दिया।
प्राण का भोजन, प्राण का वस्त्र, और मन्थ की वह रात (खण्ड 2)
श्रेष्ठता मान लेने के बाद प्राण ने बहुत घरेलू-सा प्रश्न पूछा: मेरा भोजन क्या होगा। उत्तर मिला, “यत्किञ्चिदिदमा श्वभ्य आ शकुनिभ्य इति”, जो कुछ भी यह सब है, कुत्तों तक और पक्षियों तक, वह सब आपका अन्न है। यहाँ यह उपनिषद् एक शब्द-सूत्र खोलता है। अन्न को यहाँ अन का अन्न कहा गया, और अन प्राण का ही प्रत्यक्ष नाम है। जो इस तरह जानता है, उसके लिए कोई चीज़ अनन्न नहीं रह जाती, कुछ भी ऐसा नहीं बचता जो पोषण न दे सके। कुत्तों और पक्षियों तक का उल्लेख इस बात को जान-बूझकर नीचे तक खींच लाता है, ताकि कोई कोना पवित्रता के नाम पर छूटा न रह जाए।
फिर प्राण ने पूछा कि मेरा वस्त्र क्या होगा, और उत्तर मिला कि जल। इसीलिए, यह उपनिषद् कहता है, खाने से पहले और खाने के बाद जल से आचमन किया जाता है, जिससे प्राण को वस्त्र मिल जाए और वह नंगा न रहे। भोजन के आगे-पीछे पानी का घूँट, जो हमारे घरों में आज भी चलता है, यहाँ एक अर्थ पा जाता है। एक साधारण आदत के पीछे एक चित्र रख दिया गया, और आदत उसी क्षण संस्कार बन गई। इस जानकारी को सत्यकाम जाबाल ने गोश्रुति वैयाघ्रपद्य को देते हुए कहा था कि यदि यह बात किसी सूखे ठूँठ से भी कह दी जाए, तो उसमें भी शाखाएँ फूट पड़ें और पत्ते उग आएँ।
इसके बाद खण्ड एक विधि बताता है, उनके लिए जो कुछ बड़ा पाना चाहते हैं। अमावस्या को दीक्षा लेकर, पूर्णिमा की रात सब ओषधियों को दही और मधु में मथकर एक पेय तैयार किया जाता है, जिसे मन्थ कहते हैं। फिर अग्नि में घी की आहुतियाँ दी जाती हैं, एक-एक करके उन्हीं पाँच नामों से जो पहले खण्ड में बँटे थे: ज्येष्ठ और श्रेष्ठ के लिए, वसिष्ठ के लिए, प्रतिष्ठा के लिए, सम्पद् के लिए, आयतन के लिए। हर आहुति के बाद चम्मच में बचा हुआ अंश उसी मन्थ में उँडेल दिया जाता है। पाँचों नाम इस तरह एक ही पात्र में उतर आते हैं।
फिर साधक अंजुलि में वह मन्थ लेकर जप करता है। वह कहता है कि आपका नाम अम है, क्योंकि यह सब कुछ आपके ही साथ है, आप ही ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, राजा और अधिपति हैं, और वह प्रार्थना करता है कि वही ज्येष्ठता, श्रेष्ठता, राज्य और आधिपत्य उसे भी मिले, वह स्वयं यह सब हो जाए। इसके बाद सविता की एक ऋचा के एक-एक पद पर वह घूँट भरता है और अन्तिम पद पर सारा पेय पी जाता है। बर्तन माँजकर वह अग्नि के पीछे मृगचर्म पर या साफ़ भूमि पर लेट जाता है, वाणी रोके हुए, बिना किसी आग्रह के। नींद में यदि उसे कोई स्त्री दिखाई दे, तो जान ले कि कर्म फल गया। खण्ड यहाँ एक श्लोक रखता है, कि काम्य कर्मों में जब लोग स्वप्न में स्त्री को देखें, वहीं समृद्धि जानें, उसी स्वप्न-दर्शन में।
यह प्रसंग पढ़ने में अजीब लग सकता है, ऊँचे ज्ञान के बीच में अचानक एक इच्छा-पूर्ति की विधि। पर यहीं इस अध्याय का ढंग खुलता है। कामना को छिपाया नहीं गया, उसे प्राण की ओर मोड़ दिया गया। जो आदमी बड़ा बनना चाहता है, उससे कहा जा रहा है कि बड़प्पन जिस जड़ से उगता है उसी जड़ को सींचिए, और वह जड़ आपके भीतर चल रही साँस है। आगे के खण्डों में यही चाल दुहराई जाएगी, पहले वह वस्तु जो आदमी सचमुच चाहता है, फिर उस वस्तु के पीछे खड़ा वह जो चाहने वाले का अपना स्वरूप है।
सार: प्राण का भोजन सब कुछ है, कुत्तों और पक्षियों तक, इसलिए जानने वाले के लिए कोई वस्तु अन्न होने से बाहर नहीं रहती। प्राण का वस्त्र जल है, और भोजन के आगे-पीछे का आचमन उसी को पहनाना है। मन्थ की विधि कामना को दबाती नहीं, उसे उसी जड़ पर ले जाती है जहाँ से सारी समृद्धि उठती है।
पांचाल की सभा में पाँच प्रश्न (खण्ड 3)
अरुण के पौत्र श्वेतकेतु पांचालों की समिति में पहुँचे। विद्या का तेज चेहरे पर था, और सभा में बैठने का चाव भी। प्रवाहण जैवलि ने उन्हें देखा और पूछा, कुमार, क्या पिता ने आपको शिक्षा दी है। श्वेतकेतु ने कहा, जी भगवन्, दी है। राजा का अगला वाक्य किसी परीक्षा की घंटी जैसा था। उन्होंने पूछना शुरू किया, और एक के बाद एक पाँच प्रश्न सभा के बीच रख दिए, ऐसे प्रश्न जिन पर पढ़ा हुआ आदमी पहली बार ठिठकता है, क्योंकि वे किसी पाठ से नहीं, जीवन के दोनों सिरों से उठते हैं।
पहला, क्या आप जानते हैं कि यहाँ से प्रजाएँ कहाँ जाती हैं। दूसरा, क्या जानते हैं कि वे फिर लौटती कैसे हैं। तीसरा, क्या जानते हैं कि देवयान और पितृयाण, इन दोनों राहों का बँटवारा कहाँ होता है। चौथा, क्या जानते हैं कि वह लोक भर क्यों नहीं जाता। और पाँचवाँ, “वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति”, क्या आप जानते हैं कि पाँचवीं आहुति में जल किस तरह पुरुष कहलाने लगता है। हर प्रश्न पर श्वेतकेतु का एक ही उत्तर था, नहीं भगवन्, और पाँचवें पर तो उन्होंने कहा, बिल्कुल नहीं।
राजा ने तब वह बात कही जो चुभ गई: फिर आपने कैसे कहा कि आपको शिक्षा मिल चुकी है, जो इन्हें न जाने, वह अपने को शिक्षित कैसे कहे। श्वेतकेतु खिन्न होकर पिता के पास लौटे और शिकायत की, कि आपने बिना पूरी शिक्षा दिए ही कह दिया था कि शिक्षा दे दी। उन्होंने बताया कि एक राजन्य ने पाँच प्रश्न पूछे और एक का भी उत्तर नहीं बना। पिता का उत्तर इस अध्याय की सबसे सीधी बात है। उद्दालक ने कहा कि जैसे आपने अभी ये प्रश्न मुझे सुनाए, वैसे ही मैं भी इनमें से एक भी नहीं जानता, और यदि जानता होता तो आपको क्यों न बताता।
फिर आचार्य स्वयं राजा के पास गए। राजा ने उनका आदर किया, और सुबह सभा में बैठकर कहा कि भगवन् गौतम, मनुष्यों के धन में से जो चाहिए माँग लीजिए। उद्दालक का उत्तर तना हुआ था और विनम्र भी: राजन्, मनुष्यों का धन आपका ही रहे, मुझे तो वही वाणी सुनाइए जो आपने कुमार के सामने कही थी। राजा कठिनाई में पड़ गए। उन्होंने आचार्य को बहुत काल तक वहीं रहने की आज्ञा दी। इस एक वाक्य में गुरुकुल का सारा नियम बैठा है, कि जो विद्या जीवन बदल देती है, वह सुनकर नहीं, साथ रहकर मिलती है।
ठहराव पूरा होने पर राजा ने कहा कि जैसा आपने मुझसे कहा, गौतम, वैसे ही यह विद्या आपसे पहले कभी ब्राह्मणों तक नहीं गई, “तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति”, इसीलिए सब लोकों में शासन क्षत्रिय का ही रहा। यह वाक्य इस उपनिषद् की एक पुरानी ईमानदारी है। ज्ञान का स्रोत यहाँ वंश से नहीं, पात्रता से तय होता है, और एक राजा एक आचार्य का गुरु बनकर बैठता है, बिना किसी को छोटा किए। फिर राजा ने वह रहस्य खोला, जो अगले छह खण्डों में पाँच आगों के रूप में सामने आता है।
सार: पाँच प्रश्नों ने एक पढ़े-लिखे युवक की पूरी शिक्षा को एक क्षण में तौल दिया। पिता ने सफ़ाई देने के बदले अपना न जानना मान लिया और स्वयं शिष्य बनकर चल पड़े। राजा ने विद्या तुरन्त नहीं दी, पहले साथ रहने को कहा, क्योंकि ऐसी विद्या ठहरे हुए आदमी में ही उतरती है।
पाँच आगें: वह यज्ञ जिसमें हम आहुति हैं (खण्ड 4 से 9)
राजा ने उत्तर एक विचित्र ढंग से शुरू किया। उन्होंने कहा, गौतम, वह जो ऊपर का लोक है, वही अग्नि है। उसकी समिधा सूर्य है, धुआँ किरणें हैं, ज्वाला दिन है, अंगारे चन्द्रमा हैं, और चिनगारियाँ नक्षत्र हैं। रात के आकाश को इस तरह देखना एक बार सीख लीजिए, फिर वह पुराना नहीं होता। “तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति”, इस अग्नि में देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं, और उस आहुति से सोम राजा उपजता है। यज्ञ की शब्दावली से पूरे आकाश को एक हवनकुण्ड बना दिया गया, और पहली आहुति कोई वस्तु नहीं, श्रद्धा है।
दूसरी अग्नि पर्जन्य है, वर्षा का वह देवता जो बादलों में गरजता है। उसकी समिधा वायु है, धुआँ बादल है, ज्वाला बिजली है, अंगारे वज्र हैं, चिनगारियाँ ओले और गड़गड़ाहट हैं। इस अग्नि में देवता सोम राजा को होमते हैं, और उस आहुति से वर्षा उपजती है। तीसरी अग्नि यह पृथ्वी है। उसकी समिधा संवत्सर है, धुआँ आकाश है, ज्वाला रात्रि है, अंगारे दिशाएँ हैं, चिनगारियाँ बीच की दिशाएँ हैं। इस अग्नि में देवता वर्षा को होमते हैं, और उससे अन्न उपजता है। यहाँ तक की कड़ी किसान भी जानता है, पर उसे यज्ञ कहकर देखना अलग बात है।
चौथी अग्नि स्वयं पुरुष है। उसकी समिधा वाणी है, धुआँ प्राण है, ज्वाला जीभ है, अंगारे आँखें हैं, चिनगारियाँ कान हैं। इस अग्नि में देवता अन्न होमते हैं, और उससे रेतस् बनता है। पाँचवीं अग्नि स्त्री है, और यह उपनिषद् यहाँ न झिझकता है न फिसलता है। उसकी समिधा उपस्थ है, धुआँ वह आमन्त्रण है जो दोनों के बीच चलता है, ज्वाला योनि है, अंगारे वह हैं जो भीतर घटित होता है, और चिनगारियाँ वे आनन्द हैं जो उस घड़ी में उठते हैं। इस अग्नि में देवता रेतस् होमते हैं, और उस आहुति से गर्भ बनता है।
अब राजा उसी प्रश्न पर लौटते हैं जिस पर श्वेतकेतु अटके थे। पाँचवीं आहुति में जल पुरुष कहलाने लगता है। जो श्रद्धा के रूप में ऊपर से चला था, वह सोम बना, वर्षा बना, अन्न बना, रेतस् बना, और अब एक गर्भ है। वह गर्भ उल्ब में लिपटा हुआ दस या नौ महीने, या जितना उसका काल हो, भीतर सोता है, फिर जन्म लेता है। जन्म लेकर वह जितनी आयु मिली हो उतना जीता है। और जब वह चला जाता है, तो उसे यहाँ से उसी अग्नि की ओर ले जाते हैं जहाँ से वह आया था, जहाँ से वह उपजा था। चिता को इस वाक्य के बाद पढ़िए, तो वह एक लौटती हुई आहुति दिखती है।
इस विद्या की चोट इसकी सूक्ष्मता में नहीं, इसके फैलाव में है। एक बच्चे का जन्म यहाँ एक घर की घटना बनकर नहीं रह जाता। उसमें सूर्य की किरण भी लगी है, बादल की गरज भी, खेत का अन्न भी, और दो देहों का मिलन भी, और इन सबको एक ही क्रम में पिरो दिया गया है। जो आदमी अपने को इस क्रम में देख लेता है, उसका अपनापन थोड़ा पतला पड़ जाता है, और उसी पतलेपन में से वह प्रश्न निकलता है जिसका उत्तर अगला खण्ड देता है: इस क्रम से बाहर निकलने की कोई राह है या नहीं।
सार: द्युलोक, पर्जन्य, पृथ्वी, पुरुष और स्त्री, ये पाँच अग्नियाँ हैं, और श्रद्धा से चला हुआ वही तत्त्व सोम, वर्षा, अन्न, रेतस् और गर्भ बनता चला जाता है। पाँचवीं आहुति पर जल पुरुष कहलाने लगता है। जन्म इस तरह एक कड़ी बन जाता है, और मृत्यु उसी अग्नि की ओर वापसी, जहाँ से यात्रा शुरू हुई थी।
अर्चि की राह और धूम की राह (खण्ड 10)
अब वे दो राहें खुलती हैं जो प्रश्नों का मर्म थीं। जो इसे इस तरह जानते हैं, और जो वन में रहकर श्रद्धा और तप की उपासना करते हैं, वे ज्वाला में पहुँचते हैं। ज्वाला से दिन में, दिन से शुक्ल पक्ष में, शुक्ल पक्ष से उन छह महीनों में जिनमें सूर्य उत्तर की ओर चलता है, उन महीनों से संवत्सर में, संवत्सर से आदित्य में, आदित्य से चन्द्रमा में, और चन्द्रमा से विद्युत् में। यह पूरी सूची प्रकाश की बढ़ती हुई मात्राओं की सूची है, जैसे कोई सीढ़ी दर सीढ़ी उजाले में चढ़ता जाए, और हर पायदान पहले वाले से खुला हो।
वहाँ, विद्युत् के आगे, एक अमानव पुरुष खड़ा है। वह इन्हें ब्रह्म तक पहुँचा देता है। “देवयानः पन्था इति”, यही देवयान मार्ग है, देवों की वह राह जिसका अन्तिम पग आदमी अपने बल पर नहीं चलता। यह वाक्य इस पूरे अध्याय की सबसे बड़ी राहत है। जितना चला जा सकता है, वहाँ तक साधक चलता है, और उसके बाद कोई हाथ थामने आता है। इस राह से लौटना नहीं होता, इसलिए यह उपनिषद् इसके आगे कुछ नहीं कहता, वहाँ कहने को बचता भी नहीं।
दूसरी ओर वे हैं जो गाँव में रहकर इष्टापूर्त और दान की उपासना करते हैं, यज्ञ कराते हैं, कुएँ और बावड़ियाँ बनवाते हैं, देते रहते हैं। वे धुएँ में पहुँचते हैं। धुएँ से रात्रि में, रात्रि से कृष्ण पक्ष में, कृष्ण पक्ष से उन छह महीनों में जिनमें सूर्य दक्षिण की ओर चलता है। यहाँ यह उपनिषद् एक बारीक बात जोड़ता है: ये संवत्सर तक नहीं पहुँचते। यहीं दोनों राहें बँट जाती हैं। महीनों से वे पितृलोक में, पितृलोक से आकाश में, आकाश से चन्द्रमा में पहुँचते हैं। वही सोम राजा है, वही देवताओं का अन्न है, और देवता उसे खाते हैं।
फिर जब तक पुण्य का बचा हुआ अंश रहता है, वे वहाँ रहते हैं, और उसके बाद उसी राह से लौट आते हैं। आकाश में, आकाश से वायु में, वायु होकर धुआँ, धुआँ होकर अभ्र, अभ्र होकर मेघ, और मेघ होकर वे बरस पड़ते हैं। यहाँ वे धान और जौ, ओषधि और वनस्पति, तिल और उड़द बनकर उगते हैं। इससे निकल पाना बहुत कठिन है, क्योंकि जो अन्न खाता है और जो रेतस् सींचता है, वह फिर वही हो जाता है। कड़ी वहीं से दुबारा शुरू हो जाती है, और पाँच अग्नियों का वही चक्र फिर घूमने लगता है।
आगे दो वाक्य कठोर हैं और सीधे हैं। जिनका आचरण यहाँ रमणीय रहा, उनके लिए सम्भावना यही है कि वे रमणीय योनि पाएँ, ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य की। जिनका आचरण दुर्गन्ध भरा रहा, उनके लिए सम्भावना बुरी योनि की है, कुत्ते की, सूअर की, चाण्डाल की। इसके बाद यह उपनिषद् एक तीसरी जगह बताता है, उन क्षुद्र प्राणियों की जो बार-बार लौटते रहते हैं, जिनके बारे में केवल इतना कहा जा सकता है, “जायस्व म्रियस्व”, जन्मिए और मरिए। यही तीसरा स्थान है, और इसी से वह ऊपर वाला लोक कभी भरता नहीं। इसीलिए इससे बचते रहना चाहिए।
फिर एक श्लोक आता है, जो पाँच गिनाता है: सोने का चोर, सुरा पीने वाला, गुरु की शय्या पर बैठने वाला, ब्रह्महत्या करने वाला, और पाँचवाँ वह जो इन चारों के साथ चलता रहे। खण्ड का अन्तिम वाक्य इस सबको पलट देता है। जो इन पाँच अग्नियों को इस तरह जान लेता है, वह इनके साथ रहकर भी पाप से लिप्त नहीं होता, वह शुद्ध रहता है, पवित्र रहता है, पुण्यलोक वाला होता है। जानना यहाँ सूचना जमा कर लेना नहीं है। यह वह जानना है जो आदमी का बरताव बन जाए, और तब उस पर वह नियम चलता ही नहीं जिससे बाक़ी बँधे रहते हैं।
सार: एक राह ज्वाला, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण से होती हुई विद्युत् तक जाती है, जहाँ अमानव पुरुष हाथ थामकर ब्रह्म तक पहुँचा देता है। दूसरी राह धुएँ, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन से चन्द्रलोक तक जाती है, जहाँ पुण्य चुकते ही वर्षा के साथ लौटना पड़ता है। दोनों के बाहर एक तीसरी जगह है, जहाँ बस जन्मना और मरना चलता रहता है।
छह महाशाल और अश्वपति कैकेय का द्वार (खण्ड 11)
अध्याय का तीसरा प्रसंग एक बैठक से शुरू होता है। प्राचीनशाल औपमन्यव, सत्ययज्ञ पौलुषि, इन्द्रद्युम्न भाल्लवेय, जन शार्कराक्ष्य और बुडिल आश्वतराश्वि, ये पाँचों महाशाल थे, बड़े घरों वाले, और महाश्रोत्रिय थे, बहुत सुने हुए। वे एक साथ बैठे और मीमांसा करने लगे, “को नु आत्मा किं ब्रह्मेति”, आत्मा आख़िर है क्या, ब्रह्म क्या है। ध्यान दीजिए कि यह प्रश्न उन लोगों के बीच उठा जिनके पास उत्तर होने चाहिए थे। शास्त्र पढ़ चुकने के बाद भी एक प्रश्न बचा रह जाता है, और वह प्रश्न अक्सर बहुत सीधा होता है।
उन्होंने आपस में तय किया कि उद्दालक आरुणि इस समय वैश्वानर आत्मा का अध्ययन कर रहे हैं, चलिए उन्हीं के पास चलें। और वे चल पड़े। उद्दालक ने उन्हें आता देखकर मन में सोचा कि ये सब महाशाल और महाश्रोत्रिय हैं, ये मुझसे पूछेंगे और मैं शायद सब कुछ न बता पाऊँ, इसलिए अच्छा हो कि मैं इन्हें किसी और के पास भेज दूँ। यह वही उद्दालक हैं जो पिछले प्रसंग में अपने बेटे के सामने अपनी अनभिज्ञता मान चुके थे। इस अध्याय में उनका यही स्वभाव दो बार काम आता है, और दोनों बार उससे एक नई विद्या खुलती है।
उन्होंने कहा कि अश्वपति कैकेय इस समय उसी वैश्वानर आत्मा को जानते हैं, चलिए उन्हीं के पास चलें, और सब मिलकर राजा के पास पहुँचे। राजा ने हर एक के लिए अलग-अलग सत्कार की व्यवस्था कराई। सुबह उठते ही उन्होंने कहा कि मेरे जनपद में न कोई चोर है, न कंजूस, न मद्यप, न कोई ऐसा जिसने अग्नि न रखी हो, न कोई अविद्वान्, न कोई स्वैरी, फिर स्वैरिणी कहाँ से होगी। मैं यज्ञ करने जा रहा हूँ, और एक-एक ऋत्विक् को जितना धन दूँगा, उतना ही आप सबको दूँगा, आप यहीं ठहरिए।

उत्तर में उन्होंने एक वाक्य कहा जो शिष्टाचार का पाठ है: आदमी जिस प्रयोजन से चलकर आया हो, उसे वही कह देना चाहिए। आप इस समय वैश्वानर आत्मा को जानते हैं, वही हमें बताइए। धन का प्रस्ताव उन्होंने टाल दिया, बिना राजा को छोटा दिखाए, और अपनी असली माँग सामने रख दी। राजा ने कहा कि कल सुबह मैं आपको उत्तर दूँगा। अगले दिन वे सब हाथों में समिधा लिए हुए आए, जैसे शिष्य आते हैं। समिधा गुरु के सामने रखने का अर्थ ही यह है कि आदमी अपनी उपाधि उतारकर आया है।
राजा ने उनका उपनयन नहीं किया, कोई औपचारिक संस्कार नहीं कराया, और सीधे यह विद्या कह दी। यह छोटा-सा वाक्य इस प्रसंग की गरिमा बढ़ा देता है। सामने खड़े लोग उम्र में उनसे बड़े थे, वेद में उनसे बहुत पढ़े हुए थे, और शायद इसीलिए राजा ने किसी विधि की आड़ नहीं ली। जो पूछने की मुद्रा में आ गया, वह पहले से शिष्य है, और जिसके पास उत्तर है, उसे उत्तर देने में देर नहीं करनी चाहिए। यहीं से वे छह प्रश्नोत्तर शुरू होते हैं जो इस अध्याय की सबसे प्यारी बातचीत हैं।
सार: पाँच बड़े श्रोत्रिय आपस में यह तय नहीं कर सके कि आत्मा क्या है, और उद्दालक ने अपनी अधूरी जानकारी छिपाने के बदले सबको राजा अश्वपति के पास ले जाना चुना। राजा ने धन देना चाहा, उन्होंने विद्या माँगी। अगली सुबह वे समिधा लेकर आए, और राजा ने बिना किसी औपचारिकता के कहना शुरू किया।
छह उत्तर, और हर उत्तर में एक अधूरापन (खण्ड 12 से 17)
राजा ने एक-एक से वही प्रश्न पूछा, “कं त्वमात्मानमुपास्स इति”, आप किस आत्मा की उपासना करते हैं। औपमन्यव ने कहा, भगवन् राजन्, मैं द्युलोक की ही उपासना करता हूँ। राजा बोले कि जिसे आप आत्मा मानकर उपासते हैं, वह सुतेज नाम का वैश्वानर आत्मा है, इसीलिए आपके कुल में सोम का रस निकाला जाता दिखता है, निचोड़ा जाता दिखता है, ढाला जाता दिखता है। आप अन्न खाते हैं और प्रिय देखते हैं, और जो इस आत्मा को इस तरह उपासता है उसके कुल में अन्न और प्रिय और ब्रह्मतेज रहता है। पर, राजा ने जोड़ा, यह तो आत्मा का सिर भर है, और यदि आप मेरे पास न आते तो आपका सिर गिर जाता।
सत्ययज्ञ पौलुषि ने कहा कि मैं आदित्य की उपासना करता हूँ। राजा बोले कि वह विश्वरूप नाम का वैश्वानर आत्मा है, इसीलिए आपके कुल में बहुत कुछ और बहुत तरह का दिखाई देता है, खच्चरियों वाला रथ, दासी, गले का निष्क। और यह आत्मा की आँख है, यदि आप न आते तो अंधे हो जाते। इन्द्रद्युम्न भाल्लवेय ने वायु को अपना आत्मा बताया। राजा ने कहा कि वह पृथग्वर्त्मा है, अलग-अलग राहों से चलने वाला, इसीलिए आपके पास भेंटें अलग-अलग आती हैं और रथों की श्रेणियाँ अलग-अलग पीछे चलती हैं। पर वह आत्मा का प्राण है, यदि आप न आते तो आपका प्राण निकल जाता।
जन शार्कराक्ष्य आकाश की उपासना करते थे। राजा बोले कि वह बहुल नाम का वैश्वानर है, इसीलिए आप सन्तान और धन दोनों से भरे-पूरे हैं, पर वह आत्मा का सन्देह है, यानी वह मध्य भाग जहाँ धड़ फैला हुआ है, और यदि आप न आते तो वह बिखर जाता। बुडिल आश्वतराश्वि जल की उपासना करते थे। राजा ने कहा कि वह रयि है, सम्पत्ति, इसीलिए आप धनवान और पुष्ट हैं, पर वह आत्मा की बस्ति है, नीचे का वह कोष जिसमें जल इकट्ठा होता है, और यदि आप न आते तो वह फट जाती।
अन्त में बारी उद्दालक आरुणि की आई। उन्होंने कहा, भगवन् राजन्, मैं पृथ्वी की उपासना करता हूँ। राजा बोले कि वह प्रतिष्ठा नाम का वैश्वानर आत्मा है, इसीलिए आप सन्तान और पशुओं से प्रतिष्ठित हैं, पर वे तो आत्मा के दोनों पाँव हैं, और यदि आप न आते तो आपके पाँव सूख जाते। छहों उत्तर एक ही साँचे में ढले हैं। हर उपासक को उसकी उपासना का ठीक-ठीक फल मिला हुआ है, कोई झूठा नहीं निकला, और हर एक के फल में उसकी उपासना का आकार साफ़ दिखता है, सिर वाले को तेज, आँख वाले को रूप, प्राण वाले को अनुचर।
राजा की चेतावनियाँ पढ़ने में डरावनी लगती हैं, पर उनमें एक सीधी बात है। जो आदमी विराट के एक अंग को पूरा मान लेता है, उसकी उपासना उसी अंग जितनी मज़बूत और उसी अंग जितनी नाज़ुक हो जाती है। सिर को सब कुछ मानने वाले का सिर ही उसकी सीमा बन जाता है, पाँव को सब कुछ मानने वाले के पाँव ही उसकी सीमा। राजा उन्हें उनके फल से वंचित नहीं करते, वे उस फल के चारों ओर बाक़ी देह खड़ी कर देते हैं। छह अलग-अलग उपासनाएँ इस तरह एक ही देह के छह अंग बनकर आपस में जुड़ जाती हैं।
सार: द्युलोक सिर है, आदित्य आँख, वायु प्राण, आकाश धड़, जल बस्ति और पृथ्वी दोनों पाँव। हर उपासक को उसका फल मिला हुआ था, और हर एक का फल उसकी उपासना जितना ही सीमित था। अंश को पूरा मान लेने से उपासना टूटती नहीं, अधूरी रह जाती है, और राजा ने वह अधूरापन एक-एक करके सामने रख दिया।
एक बालिश्त का विराट और भोजन का अग्निहोत्र (खण्ड 18 से 24)
छहों को एक साथ सम्बोधित करते हुए राजा ने कहा कि आप लोग इस वैश्वानर आत्मा को अलग-अलग-सा जानते हुए अन्न खाते हैं। फिर उन्होंने असली बात रखी। “प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते”, जो इस वैश्वानर आत्मा को प्रादेशमात्र, यानी एक बालिश्त भर के नाप वाला, और अभिविमान, यानी हर ओर से नापा हुआ और हर ओर भरा हुआ, मानकर उपासता है, वह सब लोकों में, सब भूतों में, सब आत्माओं में अन्न खाता है। जो अभी-अभी आकाश जितना बड़ा था, वह अचानक अपनी ही देह के नाप में उतर आया।
इसके बाद राजा वह पूरा नक्शा खोलते हैं। इस वैश्वानर आत्मा का सिर ही सुतेज है, आँख विश्वरूप है, प्राण पृथग्वर्त्मा है, धड़ बहुल है, बस्ति ही रयि है, और पृथ्वी ही उसके दोनों पाँव हैं। फिर वे देह को यज्ञशाला बना देते हैं। छाती वेदी है, रोएँ कुश हैं, हृदय गार्हपत्य अग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन है, और मुख आहवनीय है। जिस आदमी ने जीवन भर बाहर आग जलाई है, उससे कहा जा रहा है कि तीनों आगें उसके भीतर पहले से जल रही हैं, और वह हर दिन उनमें आहुति डालता आया है, बिना जाने।
अब विधि आती है, और वह इतनी सरल है कि पहली बार पढ़कर हँसी आ जाती है। भोजन में जो पहला कौर सामने आए, वही होम है। पहली आहुति देते हुए कहिए, प्राणाय स्वाहा, और प्राण तृप्त हो जाता है। प्राण के तृप्त होने पर आँख तृप्त होती है, आँख के तृप्त होने पर आदित्य, आदित्य के तृप्त होने पर द्युलोक, और द्युलोक के तृप्त होने पर वह सब तृप्त होता है जिस पर द्युलोक और आदित्य टिके हैं। और उस सबकी तृप्ति के पीछे-पीछे वह स्वयं तृप्त होता है, सन्तान से, पशुओं से, अन्न से, तेज से और ब्रह्मवर्चस से।
दूसरी आहुति व्यान के लिए है। व्यान तृप्त होता है, तो कान, कान से चन्द्रमा, चन्द्रमा से दिशाएँ, और दिशाओं के साथ वह सब जो उन पर टिका है। तीसरी अपान के लिए है। अपान तृप्त होता है, तो वाणी, वाणी से अग्नि, अग्नि से पृथ्वी, और पृथ्वी के साथ वह सब जो उस पर टिका है। चौथी समान के लिए है, और उससे मन, पर्जन्य और विद्युत् तृप्त होते हैं। पाँचवीं उदान के लिए है, और उससे त्वचा, वायु और आकाश तृप्त होते हैं। हर बार वही पंक्ति लौटती है, कि उस सबकी तृप्ति के पीछे उपासक भी तृप्त होता है। पाँच कौर, और पूरा ब्रह्माण्ड भोजन कर चुका।
अन्तिम खण्ड में राजा दोनों तरह के यज्ञकर्ताओं को आमने-सामने रख देते हैं। जो यह जाने बिना अग्निहोत्र करता है, उसका करना ऐसा है जैसे कोई दहकते अंगारों को हटाकर राख में आहुति डाल दे। रूप पूरा है, आग नदारद है। और जो यह जानते हुए अग्निहोत्र करता है, उसकी आहुति सब लोकों में, सब भूतों में, सब आत्माओं में पड़ती है। उसके सारे पाप वैसे ही जल जाते हैं जैसे सरकंडे की रूई आग में रखते ही भक से उड़ जाती है।
फिर एक वाक्य आता है जिसे उस समय के समाज के बीच रखकर देखिए। ऐसा जानने वाला यदि अपने भोजन का उच्छिष्ट किसी चाण्डाल को दे दे, तो वह भी उसकी अपनी वैश्वानर आत्मा में ही हवन हो जाता है। जो देह-देह में एक ही विराट देखता है, उसके लिए देने का कोई ठिकाना अपवित्र रह ही नहीं जाता। और खण्ड का अन्तिम श्लोक इस पूरे अध्याय को एक घरेलू चित्र में समेट देता है: “यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत”, जैसे यहाँ भूखे बच्चे माँ को घेरकर बैठ जाते हैं, वैसे ही सारे प्राणी अग्निहोत्र को घेरकर बैठे हैं।
सार: विराट को एक बालिश्त के नाप में, अपनी ही देह में उपासिए, और वह हर लोक और हर प्राणी तक फैल जाता है। छाती वेदी है, हृदय गार्हपत्य है, मुख आहवनीय है, और भोजन का पहला कौर ही आहुति। जो यह जाने बिना हवन करता है, वह अंगारे हटाकर राख में डालता है, और जो जानकर खाता है, उसके एक कौर से आदित्य तक तृप्त होता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस अध्याय की तीनों कथाएँ एक ही जगह पर आकर मिलती हैं, हमारी अपनी देह पर। पहली कथा ने बताया कि भीतर की सारी होड़ एक साँस के सहारे चलती है। बीच वाली कथा ने जन्म और मृत्यु को एक ही यज्ञ की आहुतियाँ बना दिया, जिसमें सूर्य की किरण, बादल का पानी और खेत का अन्न सब लगे हुए हैं। और आख़िरी कथा ने उस पूरे विराट को उठाकर छाती और पेट के बीच रख दिया। तीनों मिलकर एक ही बात कहते हैं, कि जिसे हम बाहर, ऊपर, दूर ढूँढ़ते रहे, उसका नाप एक बालिश्त है और उसका पता हमारा अपना शरीर है।
इसका असर सबसे पहले खाने की थाली पर पड़ता है। जो आदमी यह पढ़ चुका है, उसके लिए पहला कौर उठाना एक छोटा-सा संस्कार बन जाता है। ज़रूरी नहीं कि वह कुछ बोले; इतना याद रहना काफ़ी है कि यह कौर जिस साँस को पहुँच रहा है, वही साँस आँख को, आँख आदित्य को, और आदित्य पूरे आकाश को छू रही है। इसी तरह जल का वह घूँट, जो भोजन के आगे-पीछे लिया जाता है, प्राण को पहनाया गया वस्त्र बन जाता है। रोज़ की दो-तीन आदतें इस तरह दिन में दो-तीन बार हमें अपनी जगह याद दिला देती हैं।
दूसरी बात उस साहस की है जो इस अध्याय में दो लोगों ने दिखाया। उद्दालक ने अपने बेटे के सामने कहा कि मैं नहीं जानता, और फिर एक राजा के द्वार पर जाकर बहुत काल तक ठहरे। छह बड़े श्रोत्रिय समिधा हाथ में लेकर एक गृहस्थ राजा के सामने बैठ गए। न जानना मान लेना और फिर सीखने चल देना, इस अध्याय में यही दो काम हर बड़ी विद्या के ठीक पहले होते हैं। जिस दिन हम किसी से यह कह सकें कि यह मुझे नहीं आता, कृपया सिखाइए, उस दिन अर्चि वाली राह का पहला पायदान अपने आप सामने आ जाता है।
आधार: छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 5, खण्ड 1 से 24; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।