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उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

अध्याय 4: रैक्व, सत्यकाम और बोलती अग्नियाँ

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सामवेद · छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय 4
हंसों की एक रात की बात, गाड़ी के नीचे बैठा एक ज्ञानी, अपना गोत्र न जानने वाला बालक, और वे अग्नियाँ जो बारह बरस बाद बोल पड़ीं।

रात का दूसरा पहर है। जानश्रुति पौत्रायण अपने महल की छत पर लेटे हैं और नीचे, हर सड़क पर, उनके बनवाए हुए अन्नसत्रों के चूल्हे जल रहे हैं। उन्होंने ये सब इसी संतोष से बनवाए थे कि हर दिशा में लोग उन्हीं का अन्न खाएँगे। तभी ऊपर से हंसों की एक पाँत गुज़रती है। पीछे उड़ता हंस आगे वाले को पुकारता है, “ओ भल्लाक्ष, ओ चौड़ी आँखों वाले, सँभलकर उड़िए। नीचे जानश्रुति का तेज आकाश तक फैला हुआ है, उसे छू मत जाइएगा, जल मत जाइएगा।” आगे वाला हंस हँस देता है। उसी हँसी से यह अध्याय खुलता है, और राजा की नींद उस रात के बाद फिर कभी पहले जैसी नहीं होती।

छान्दोग्य उपनिषद् के पहले तीन अध्याय गान और उपासना की भीतरी विधि पर टिके थे। चौथा अध्याय सत्रह खण्डों में उस विधि को उठाकर खुले जीवन के बीच रख देता है, और ब्रह्मविद्या उन हाथों में सौंपता है जिनके पास कोई प्रमाण-पत्र नहीं है: एक गाड़ी के नीचे बैठा खुजलाता हुआ आदमी, एक ऐसी माँ का बेटा जिसे अपने कुल का नाम मालूम नहीं, और बारह बरस चुपचाप आग सेवता हुआ एक भुला दिया गया ब्रह्मचारी। यह उपनिषद् यहाँ एक ही बात घुमा-फिराकर कहता है, कि जिसमें सब समा जाता है वही देने वाला है, और जो सच पर अड़ा रहता है उसके आगे सृष्टि स्वयं बोलने लगती है। यहीं इस उपनिषद् की दो सबसे सुन्दर कथाएँ बैठी हैं।

इस अध्याय के मुख्य किरदार

जानश्रुति पौत्रायण: श्रद्धा से देने वाला, बहुत देने वाला, बहुत पकवाने वाला राजा, जिसका सारा दान एक रात में छोटा पड़ जाता है।

रैक्व: अपनी गाड़ी के साथ रहने वाला वह ज्ञानी, जो संवर्ग विद्या जानता है और गायों के ढेर पर हँस देता है।

सत्यकाम: गुरुकुल जाने से पहले माँ से अपना गोत्र पूछने वाला बालक, जिसका सच ही उसका परिचय बन जाता है।

जबाला: सत्यकाम की माँ, जो अपने बेटे को झूठ का सहारा देने के बजाय अपनी पूरी सच्चाई सौंप देती हैं।

हारिद्रुमत गौतम: वह आचार्य, जो गोत्र के उत्तर में सत्य सुनकर बालक को उसी क्षण अपना लेते हैं।

उपकोसल कामलायन: सत्यकाम का वह शिष्य, जिसकी बारह बरस की आग-सेवा अन्त में आग से ही उत्तर पाती है।

हंसों की बात और गाड़ी के नीचे बैठा आदमी (खण्ड 1 और 2)

जानश्रुति पौत्रायण के बारे में यह उपनिषद् तीन बातें एक साँस में कहता है: वे श्रद्धा से देते थे, बहुत देते थे, और उनके यहाँ बहुत पकता था। उन्होंने चारों ओर धर्मशालाएँ और अन्नसत्र खड़े करवा रखे थे, इस भाव के साथ कि सब जगह लोग उन्हीं का अन्न खाएँगे। सुबह चारण आते और उनका यश गाते, और राजा उस यश को अपने भीतर एक गहरी संतुष्टि की तरह सँजोते जाते। यह कोई छोटा आदमी नहीं था। दान उनके लिए दिखावा नहीं था, स्वभाव था। पर स्वभाव के साथ एक महीन नशा भी चिपक गया था, अपने ही अन्न की गिनती का नशा, और उसी को तोड़ने के लिए इस उपनिषद् ने दो हंस उड़ाए।

पीछे वाले हंस ने आगे वाले को चेताया कि नीचे जानश्रुति का तेज दिन की तरह फैला है, उसमें जल मत जाइए। आगे वाला हंस बोला, “यह कौन है, जिसे आप ऐसे कह रहे हैं मानो वह गाड़ी वाला रैक्व हो?” सयुग्वा रैक्व, यानी अपनी गाड़ी के साथ रहने वाला रैक्व; इस नाम के साथ उसने पासे का एक चित्र जोड़ दिया: “यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्ति”, जैसे कृत नाम का सबसे ऊँचा दाँव पड़ जाने पर बाक़ी सारे दाँव उसी में समा जाते हैं, वैसे ही प्रजा जो भी भला काम करती है, वह सब उस रैक्व में समा जाता है। पुण्य की सारी गिनती एक जानने वाले के आगे एक ही दाँव में समेट दी गई थी।

राजा ने यह सुन लिया। सुनकर वे सो नहीं पाए। भोर में उठते ही उन्होंने अपने क्षत्ता को, अपने सारथी-सेवक को, बुलाया और हंसों की पूरी बात उसके सामने दोहरा दी, वही पासे वाली उपमा भी, और पूछा कि यह गाड़ी वाला रैक्व है कौन। सेवक उसे ढूँढने निकला। वह नगरों में घूमा, बाज़ारों में पूछा, सभाओं में देखा, और लौटकर हाथ जोड़ दिए कि मुझे वह कहीं नहीं मिला। राजा का उत्तर इस पूरी कथा की सबसे काम की पंक्ति है: जहाँ किसी ब्राह्मण की खोज की जाती है, वहीं जाकर उसे खोजिए। नगर की भीड़ में उस आदमी को ढूँढ़ना व्यर्थ था जिसने भीड़ छोड़ रखी थी।

इस बार सेवक नदी के किनारों पर गया, एकान्त की ओर गया, उन जगहों पर गया जहाँ ब्रह्म के जानने वाले टिकते हैं। और उसे वह मिल गया। मूल पाठ इस दृश्य में एक भी शब्द नहीं सजाता। गाड़ी के नीचे वह आदमी बैठा था और अपनी खाल की खुजली खुजला रहा था। न कोई आश्रम, न शिष्यों की पाँत, न कोई चिह्न। सेवक ने झुककर पूछा, “क्या आप भगवन् गाड़ी वाले रैक्व हैं?” उत्तर उतना ही बेपरवाह आया, हाँ, वही हूँ मैं। सेवक दौड़ता हुआ लौटा कि मिल गए। जिस तेज से हंस डरने की बात कर रहे थे, वह एक टूटी गाड़ी की छाया में बैठा था।

गाँव के छोर पर एक गाड़ी के नीचे बैठा दुबला ज्ञानी रैक्व, अपनी खाल खुजलाता हुआ, सामने खड़ा राजा का सेवक झुककर पूछता हुआ
गाड़ी के नीचे बैठा रैक्व, जिसे नगर में कोई नहीं खोज सका

अब राजा स्वयं चले। छह सौ गायें, एक निष्क यानी सोने का हार, और खच्चरों का रथ लेकर वे रैक्व के सामने पहुँचे और बोले, “रैक्व, ये छह सौ गायें, यह हार, यह रथ; भगवन्, मुझे उस देवता की उपासना सिखा दीजिए जिसकी आप उपासना करते हैं।” रैक्व ने आँख उठाई और दो टूक कह दिया, “अरे शूद्र, यह सब अपनी गायों समेत अपने ही पास रहने दीजिए।” शूद्र शब्द पर बहुत बहस हुई है, और शांकरभाष्य इसे जाति का नाम मानने से रोकता है; वहाँ यह शुच् से, यानी शोक से, बना सम्बोधन है। राजा क्षत्रिय थे और शोक से भरकर आए थे, इसीलिए उन्हें इस नाम से पुकारा गया। जिस आदमी ने अपना सारा दान गिन रखा था, उसे पहली बार अपनी गिनती वापस लेकर लौटना पड़ा।

राजा दोबारा आए, और इस बार और भी भरकर आए: एक हज़ार गायें, वही हार, वही रथ, वह गाँव जिसमें रैक्व रहते थे, और साथ अपनी पुत्री भी। उन्होंने फिर वही प्रार्थना दोहराई कि भगवन्, अब तो मुझे सिखा दीजिए। रैक्व ने कन्या का मुख अपने हाथों में लेकर ऊपर उठाया और कहा, “अरे शूद्र, ये सब तो आप ले ही आए; इस मुख से ही आप मुझे बोलने पर मजबूर कर देंगे।” उस पूरी भेंट में जो एक चीज़ रैक्व को छू गई, वह गायें या सोना नहीं थी, वह राजा की वह तड़प थी जो अपनी सबसे प्रिय चीज़ तक उतर आई थी। महावृष देश के वे गाँव तभी से रैक्वपर्ण कहलाए, जहाँ रैक्व बसे रहे। और वहीं, उसी गाँव में, उन्होंने राजा से वह विद्या कही।

सार: दान की गिनती और यश का गान एक ऐसा सुख देते हैं जिसे केवल कोई बड़ी चोट तोड़ पाती है, और जानश्रुति के लिए वह चोट दो हंसों की बातचीत बनकर आई। ज्ञान गायों से नहीं खरीदा जाता; वह उस दिन मिलता है जिस दिन भीतर का शोक इतना सच्चा हो जाए कि आदमी दोबारा, तीसरी बार, अपनी सबसे बड़ी चीज़ लेकर उसी दरवाज़े पर जा खड़ा हो।

संवर्ग: जिसमें सब समा जाता है (खण्ड 3)

रैक्व ने जो कहा, वह चार वाक्यों में पूरा हो जाता है, और फिर भी उसे पचाने में उम्र लग सकती है। पहला वाक्य बाहर की ओर देखता है: “वायुर्वाव संवर्गः”, वायु ही वह समेट लेने वाला है। जब आग बुझती है, वह वायु में ही चली जाती है। जब सूरज डूबता है, वह वायु में ही समाता है। जब चाँद ढलता है, वह भी वायु में। जब जल सूखता है, वह भी वायु में ही जाता है। इन सबको वायु अपने भीतर खींच लेता है। दीपक बुझाइए और पूछिए कि वह लौ कहाँ गई; उत्तर हाथ नहीं आता, पर वह गई कहीं नहीं, समा गई। यह उपनिषद् इसे अधिदैवत कहता है, देवताओं के स्तर पर देखा गया रूप।

दूसरा वाक्य भीतर की ओर मुड़ता है: “प्राणो वाव संवर्गः”, प्राण ही वह समेट लेने वाला है। इसकी गवाही हर रात मिलती है। जब हम सो जाते हैं, वाणी प्राण में चली जाती है, आँख प्राण में, कान प्राण में, मन प्राण में। नींद में हमारे पास न कोई दृश्य बचता है, न शब्द, न विचार; सब एक ही जगह लौट जाते हैं, और सुबह वहीं से फिर निकलते हैं। यह उपनिषद् इसे अध्यात्म कहता है, अपने ही भीतर देखा गया वही रूप। और फिर वह दोनों को एक पंक्ति में जोड़ देता है: ये दो समेटने वाले हैं, देवों में वायु और इन्द्रियों में प्राण।

इस जोड़ में ही पूरी विद्या है। बाहर का आकाश जिस साँस से भरा है और हमारी छाती जिस साँस से उठती-गिरती है, वे दोनों एक ही सत्ता के दो चेहरे हैं। जिसने यह देख लिया, उसके लिए अपने और जगत् के बीच की दीवार पतली पड़ जाती है। और तब पुण्य की गिनती अपने आप बेमानी हो जाती है, क्योंकि जो सबको अपने भीतर समेटे हुए है उसके आगे टुकड़ों का हिसाब कैसा। जानश्रुति ने छह सौ गायों के साथ जो खरीदना चाहा था, वह यही था, और यही वह चीज़ थी जो गायों से मिल ही नहीं सकती थी।

इसी विद्या के साथ यह उपनिषद् एक छोटी सी घटना जोड़ देता है, जो पूरे अध्याय का स्वाद बदल देती है। शौनक कापेय और अभिप्रतारिन् काक्षसेनि भोजन परोसे जाने की घड़ी में बैठे थे कि एक ब्रह्मचारी भिक्षा माँगने आ गया। दोनों ने उसे कुछ नहीं दिया। ब्रह्मचारी लौटा नहीं। उसने वहीं खड़े-खड़े एक पहेली उछाल दी, “वह कौन एक देव है जिसने चार महात्माओं को निगल लिया, वह जो भुवन का रक्षक है? हे कापेय, मरणधर्मा उसे देख नहीं पाते; हे अभिप्रतारिन्, वह अनेक रूपों में बसता है। जिसका यह अन्न है, उसी को यह अन्न नहीं दिया गया।”

शौनक कापेय ने सुना, ठहरकर सोचा, और उठकर उत्तर दिया कि वह देवों का आत्मा है, प्रजाओं का जन्मदाता, सुनहरी दाढ़ों वाला, खा जाने वाला, सचमुच का ज्ञानी; वह स्वयं खाया नहीं जाता और जो अन्न नहीं है उसे भी खा जाता है। “हे ब्रह्मचारी, हम इसी की उपासना करते हैं। इन्हें भिक्षा दीजिए।” और भिक्षा दी गई। उपनिषद् फिर हिसाब खोलता है: बाहर वायु के साथ अग्नि, सूर्य, चन्द्र और जल, भीतर प्राण के साथ वाणी, आँख, कान और मन; दोनों पाँच-पाँच, मिलकर दस, और दस ही कृत है, वही सबसे ऊँचा दाँव। इसी दस को यह उपनिषद् विराट् कहता है, अन्न खाने वाली विराट्, जिससे यह सब देखा जाता है, और जो इसे जानता है वह स्वयं अन्न का भोक्ता हो जाता है।

सार: संवर्ग वह है जिसमें सब लौटकर समा जाता है, बाहर वायु और भीतर प्राण, और दोनों एक ही सत्ता हैं। भूखे ब्रह्मचारी की पहेली इसी को खोलती है, कि जिस अन्न को हम अपना कहकर बाँटते या रोकते हैं, वह असल में उसी का है जो सबको खा रहा है और जिसे कोई नहीं खा सकता।

जबाला का उत्तर और गौतम की समिधा (खण्ड 4)

अब यह उपनिषद् राजमहल और गाड़ी को पीछे छोड़कर एक झोपड़ी के भीतर चला आता है। एक बालक अपनी माँ के सामने खड़ा है। उसका नाम सत्यकाम है और माँ का नाम जबाला है। उसे गुरुकुल जाना है, और उन दिनों गुरु के सामने अपना गोत्र बताना पड़ता था, पिता के कुल का वह नाम जो बताता था कि आप किस परम्परा की शाखा हैं। बालक पूछता है, “माँ, मैं ब्रह्मचर्य में रहने जाना चाहता हूँ। मैं किस गोत्र का हूँ, यह बता दीजिए।” यह प्रश्न घर में सबसे कठिन घड़ी ले आता है, क्योंकि इसका सीधा उत्तर माँ के पास है ही नहीं।

जबाला ने जो किया, वह इस अध्याय की सबसे ऊँची बात है। उन्होंने न कोई कुल गढ़ा, न कोई नाम उधार लिया, न बेटे को चुप रहना सिखाया। उन्होंने सीधे कहा, “बेटा, मुझे यह मालूम नहीं कि आप किस गोत्र के हैं। अपनी जवानी में मैं बहुत घूमी, बहुत घरों में सेवा-टहल की, और उसी समय मैंने आपको पाया। इसलिए मैं यह नहीं जानती कि आप किस कुल के हैं।” और फिर उन्होंने उसे वह वाक्य दिया जो उसका जीवन भर का परिचय बन गया: “जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि”, मेरा नाम जबाला है और आपका नाम सत्यकाम है, इसलिए आप अपने को सत्यकाम जाबाल ही कहिएगा। एक माँ ने अपनी सबसे कठिन सच्चाई को अपने बेटे का कुलनाम बना दिया।

बालक यही लेकर हारिद्रुमत गौतम के पास पहुँचा और बोला, “भगवन्, मैं आपके पास रहकर ब्रह्मचर्य करना चाहता हूँ, मुझे शिष्य बना लीजिए।” गौतम ने वही पूछा जो पूछा जाना था, “सौम्य, आप किस गोत्र के हैं?” यही वह क्षण था जहाँ बालक कुछ भी कह सकता था। कोई नाम, कोई अनुमान, कोई सुविधाजनक चुप्पी। उसने इसके बजाय माँ की पूरी बात, एक शब्द घटाए बिना, जैसी की तैसी दोहरा दी, उनका बहुत घूमना, बहुत घरों में सेवा करना, उनका न जानना, और अन्त में वह नाम। “इसलिए मैं सत्यकाम जाबाल हूँ, भगवन्।”

गौतम ने जो उत्तर दिया, उसमें ब्राह्मणत्व की परिभाषा एक पंक्ति में उतर आई: “नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति”, ऐसा साफ़ सच कोई ब्राह्मण ही बोल सकता है। फिर उन्होंने कहा, “सौम्य, समिधा ले आइए, मैं आपका उपनयन करूँगा, क्योंकि आप सत्य से नहीं डिगे।” परीक्षा गोत्र की नहीं थी, उत्तर के ढंग की थी, और बालक उसमें उस जगह खरा उतरा जहाँ बड़े-बड़े फिसल जाते हैं। जिस लड़के के पास पिता का नाम नहीं था, उसे उसके सच ने वह दरवाज़ा खोल दिया जो नाम कभी नहीं खोल पाता।

उपनयन के बाद गौतम ने दूसरी परीक्षा रख दी, और यह पहली से भी लम्बी थी। उन्होंने चार सौ दुबली और कमज़ोर गायें अलग कीं, उन्हें बालक के आगे हाँका और कहा, “सौम्य, इनके पीछे-पीछे चले जाइए।” सत्यकाम ने गायों को आगे बढ़ाते हुए एक संकल्प कहा, कि इनके एक हज़ार हुए बिना मैं नहीं लौटूँगा। और फिर वह वर्षों वन में रहा, अकेला, कमज़ोर पशुओं की सेवा करता हुआ, बिना किसी पाठ के, बिना किसी शास्त्र के। न गुरु का संदेश आया, न अपनी ओर से कोई शिकायत गई। गायें धीरे-धीरे बढ़ती गईं। एक दिन उनकी गिनती एक हज़ार तक पहुँच गई।

सार: जबाला ने अपने बेटे को कुल के बदले सच दिया, और वही सच गुरु के सामने उसका सबसे मज़बूत प्रमाण बना। गौतम ने उसे शिष्य बनाकर सीधे पाठ नहीं पढ़ाया; उन्होंने उसे दुबली गायों के पीछे वन में भेज दिया, क्योंकि जिस विद्या की तैयारी हो रही थी वह किसी बरामदे में नहीं, अकेलेपन और सेवा में पकती है।

वृषभ, अग्नि, हंस और मद्गु: ब्रह्म के चार पाद (खण्ड 5 से 8)

जिस दिन झुंड पूरा हुआ, उसी दिन एक आवाज़ आई। झुंड के वृषभ ने उसे पुकारा, “सत्यकाम!” और उसने वही उत्तर दिया जो वह अपने गुरु को देता, “भगवन्।” वृषभ ने कहा, “सौम्य, हम एक हज़ार हो गए हैं, अब हमें आचार्यकुल पहुँचा दीजिए। और लीजिए, मैं आपको ब्रह्म का एक पाद बता देता हूँ।” बालक ने हाथ जोड़कर कहा, “भगवान् मुझे बताइए।” वृषभ बोला, पूर्व दिशा एक कला है, पश्चिम एक कला, दक्षिण एक कला, उत्तर एक कला। “एष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम”, सौम्य, यह चार कलाओं वाला ब्रह्म का पाद प्रकाशवान् नाम का है। जो इसे इस तरह जानकर उपासता है, वह इस लोक में प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान् लोक जीत लेता है।

वन में गायों के झुंड के बीच खड़ा किशोर सत्यकाम जाबाल, सामने खड़ा वृषभ उसे चार दिशाओं वाला ब्रह्म का पाद सुना रहा है
झुंड का वृषभ सत्यकाम को पहला पाद सुनाता है

वृषभ ने बात अधूरी छोड़ी और आगे का पता दे दिया, कि अगला पाद आपको अग्नि बताएगी। अब यहाँ से आगे इस कथा में एक शान्त लय बैठ जाती है, जिसे मूल पाठ हर बार लगभग उन्हीं शब्दों में दोहराता है। दूसरे दिन वह गायों को आगे हाँकता है। जहाँ साँझ पड़ती है, वहीं आग जलाता है, गायों को घेरकर बैठाता है, आग में समिधा डालता है, और आग के पीछे पूर्व की ओर मुँह करके बैठ जाता है। यही उसका पूरा दिन है, यही उसकी संध्या है। इस दोहराव में ही उसकी साधना है, और इसी दोहराव के बीच हर बार कोई आकर बोल पड़ता है।

उस रात अग्नि ने उसे पुकारा, “सत्यकाम!” “भगवन्।” अग्नि ने कहा, सौम्य, मैं आपको ब्रह्म का एक पाद बताता हूँ। पृथ्वी एक कला, अन्तरिक्ष एक कला, द्युलोक एक कला, समुद्र एक कला; यह चार कलाओं वाला पाद अनन्तवान् नाम का है। जो इसे इस तरह जानकर उपासता है, वह इस लोक में अनन्तवान् होता है और अनन्त लोक जीतता है। पहले पाद ने दिशाओं का घेरा दिया था, इसने उस घेरे में भरी हुई दुनिया दे दी, नीचे की धरती से लेकर ऊपर के आकाश तक और किनारों पर फैले समुद्र तक। बालक सुनता है, चुप रहता है, और अगली सुबह फिर गायों के पीछे चल देता है।

तीसरी बार एक हंस उड़ता हुआ नीचे उतरा और उसी नाम से पुकारा। उसने कहा, अग्नि एक कला, सूर्य एक कला, चन्द्र एक कला, विद्युत् एक कला; यह पाद ज्योतिष्मान् नाम का है, और जो इसे जानकर उपासता है वह इस लोक में ज्योतिष्मान् होता है और ज्योतिवाले लोक जीतता है। धरती और समुद्र के बाद अब उसे वे चीज़ें मिलीं जो स्वयं जलती हैं, चूल्हे की आग से लेकर बादल में कौंधती बिजली तक। जो कुछ भी चमकता है, वह उसी एक के चौथाई भर का चौथाई है। तीन रातें, तीन शिक्षक, और हर बार वही विनम्र उत्तर, भगवान् मुझे बताइए।

चौथी बार जो आया, वह सबसे छोटा जीव था, एक मद्गु, पानी में डुबकी मारने वाला पक्षी। उसने कहा, प्राण एक कला, आँख एक कला, कान एक कला, मन एक कला; यह पाद आयतनवान् नाम का है, आश्रय वाला, और जो इसे जानकर उपासता है वह इस लोक में आयतनवान् होता है और आश्रयवाले लोक जीतता है। यहाँ आकर पूरा चक्र भीतर मुड़ जाता है। दिशाएँ, लोक, ज्योतियाँ, और अन्त में यह देह, जिसकी साँस, जिसकी आँख, जिसका कान और जिसका मन उसी ब्रह्म की कलाएँ हैं। जिसे बाहर चारों दिशाओं में खोजा जा रहा था, वह अन्तिम पाठ में साधक की अपनी छाती के भीतर से बोला।

चार पाद, हर पाद में चार कलाएँ, कुल सोलह कलाओं में एक पूरा ब्रह्म; और इसे सिखाने के लिए न कोई सभा जुड़ी, न कोई ग्रन्थ खुला। एक बैल, एक आग, एक हंस और एक जलपक्षी इस बालक के आचार्य हो गए, और चारों ने एक जैसे ढंग से पहले उसका नाम पुकारा, फिर उसकी सहमति ली, फिर बताया। यह उपनिषद् यहाँ चुपचाप एक बात रख देता है, कि जब मन इतना निर्मल हो जाए कि उसमें अपने लिए कोई माँग न बचे, तब सृष्टि में कुछ भी गूँगा नहीं रहता। वर्षों की सेवा ने सत्यकाम के भीतर वही सन्नाटा बना दिया था जिसमें ये चारों आवाज़ें सुनाई दे सकीं।

सार: ब्रह्म के चार पाद प्रकाशवान्, अनन्तवान्, ज्योतिष्मान् और आयतनवान् हैं, और वे क्रम से दिशाओं, लोकों, ज्योतियों और अपनी ही इन्द्रियों में खुलते हैं। सत्यकाम को यह क्रम किसी पाठशाला में नहीं मिला; वह उसे वन की उन साँझों में मिला जब वह रोज़ एक ही तरह आग जलाकर, गायें बाँधकर, चुपचाप बैठ जाता था।

आचार्य के सामने दमकता हुआ मुख (खण्ड 9)

गायें आचार्यकुल पहुँच गईं और उनके पीछे वह लड़का, जो अब लड़का नहीं रह गया था। गौतम ने उसे देखते ही पुकारा, “सत्यकाम!” “भगवन्।” और फिर उन्होंने वह कहा जो केवल एक गुरु देख सकता है: “ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि”, सौम्य, आप ब्रह्म के जानने वाले की तरह दमक रहे हैं; आपको किसने पढ़ाया? विद्या ने उसके चेहरे पर वह चीज़ छोड़ दी थी जिसे छिपाया नहीं जा सकता। वर्षों की धूल और वन की थकान के नीचे से कुछ ऐसा झाँक रहा था जिसे गौतम पहचानते थे।

सत्यकाम ने झूठ यहाँ भी नहीं बोला और बड़ाई भी नहीं की। उसने केवल इतना माना कि सिखाने वाले मनुष्यों से अलग थे। और फिर उसने वह माँगा जो इस पूरी कथा का ताला खोलता है, “पर भगवान् ही मुझे बताएँ, यही मेरी इच्छा है।” उसे चार आवाज़ों से पूरा ब्रह्म मिल चुका था, फिर भी वह गुरु के सामने हाथ फैलाकर खड़ा था। उसका कारण उसने स्वयं बताया, कि आप जैसों से मैंने यही सुना है: “आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापति”, आचार्य से जानी हुई विद्या ही सबसे ठीक तरह लक्ष्य तक पहुँचाती है।

गौतम ने उसे वही सब कहा, और मूल पाठ एक छोटी सी टिप्पणी के साथ इस कथा को बन्द कर देता है, कि यहाँ कुछ भी छूटा नहीं, कुछ भी घटा नहीं। जो वन में मिला था और जो गुरु के मुख से मिला, दोनों में रत्ती भर का अन्तर नहीं निकला। यही इस प्रसंग की सबसे बड़ी गवाही है। भीतर से उठी हुई सच्ची अनुभूति और गुरु परम्परा की वाणी, जब दोनों खरी हों, तो एक ही जगह जाकर मिलती हैं, और शिष्य को दोनों की ज़रूरत रहती है, एक जगाने के लिए और दूसरी टिकाने के लिए।

सार: विद्या चेहरे पर आ जाती है, और गुरु उसे पहले ही पल में पहचान लेता है। सत्यकाम के पास सब कुछ होने के बाद भी उसने गुरु से दोहराना चाहा, और गुरु के कहने पर उसमें कुछ भी घटा नहीं; अपनी अनुभूति और परम्परा की वाणी का यही मेल इस उपनिषद् को प्रिय है।

उपकोसल कामलायन और वे अग्नियाँ जो बोल पड़ीं (खण्ड 10 से 13)

अब वही सत्यकाम आचार्य बन चुका है, और यह उपनिषद् एक ऐसी कथा कहता है जिसमें गुरु की भूमिका पहली बार कठोर दिखती है। उपकोसल कामलायन उसके यहाँ ब्रह्मचारी होकर रहा और बारह वर्ष तक उसने आचार्य की अग्नियों की सेवा की, उन्हें जलाए रखा, उन्हें सँभाला, उन्हें कभी बुझने नहीं दिया। बारह वर्ष कोई छोटी अवधि नहीं होती। इस बीच सत्यकाम दूसरे शिष्यों को पढ़ा-लिखाकर समावर्तन करा देते रहे, यानी उन्हें विदा करते रहे, पर उपकोसल को उन्होंने न पढ़ाया और न विदा किया। लड़का चुपचाप आग के पास बैठा रहा, बिना पूछे, बिना शिकायत किए।

घर में यह बात आचार्य की पत्नी से न देखी गई। उन्होंने पति से कहा, “यह ब्रह्मचारी तप चुका है, इसने आपकी अग्नियों की बड़ी कुशलता से सेवा की है। कहीं ऐसा न हो कि ये अग्नियाँ आपसे पहले इसे कुछ कह दें। इसे पढ़ा दीजिए।” सत्यकाम ने सुन लिया, और फिर भी बिना कुछ कहे परदेस चले गए। यह चुप्पी क्रूर लगती है, और यही इस कथा की सबसे महीन जगह है, क्योंकि आगे जो होने वाला है वह उसी चुप्पी में पकता है। कुछ शिष्य शब्दों से तैयार होते हैं और कुछ प्रतीक्षा से।

उपकोसल टूट गया। बीमारी ने उसे घेरा और उसने खाना छोड़ देने का निश्चय कर लिया। आचार्य की पत्नी ने देखा और कहा, “ब्रह्मचारी, खाइए, क्यों नहीं खाते?” उसका उत्तर इस पूरे उपनिषद् की सबसे मानवीय पंक्तियों में है, “इस पुरुष में बहुत सारी कामनाएँ हैं, अलग-अलग दिशाओं में भागने वाली; मैं व्याधियों से भरा हुआ हूँ; मैं नहीं खाऊँगा।” उसने अपनी पीड़ा को छिपाया नहीं और उसे किसी पर फेंका भी नहीं। यह वही निरी सच्चाई है जो उसके गुरु ने कभी अपनी माँ से पाई थी, और उसी सच्चाई ने यहाँ भी दरवाज़ा खोला।

तब वे अग्नियाँ आपस में बोलीं, “यह ब्रह्मचारी तप चुका है, इसने हमारी बड़ी कुशल सेवा की है। आइए, इसे बता ही दें।” और उन्होंने उससे कहा, “प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म”, प्राण ब्रह्म है, कं ब्रह्म है, खं ब्रह्म है। उपकोसल का उत्तर एक सच्चे विद्यार्थी का उत्तर है, कि मैं इतना समझता हूँ कि प्राण ब्रह्म है, पर कं और खं को नहीं समझता। उसने सुनी हुई बात को समझी हुई बात कहकर आगे नहीं बढ़ाया। अग्नियों ने तब वह वाक्य कहा जो इस उपनिषद् की सबसे प्यारी परिभाषाओं में गिना जाता है, कि जो कं है वही खं है और जो खं है वही कं है, यानी जो सुख है वही आकाश है।

फिर एक-एक करके तीनों अग्नियों ने अपना-अपना पाठ दिया। गार्हपत्य ने कहा, पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य; और जो पुरुष आदित्य में दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ। दूसरी अग्नि ने कहा, जल, दिशाएँ, नक्षत्र और चन्द्रमा; और जो पुरुष चन्द्रमा में दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ। तीसरी ने कहा, प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत्; और जो पुरुष विद्युत् में दिखाई देता है, वह मैं ही हूँ। शांकरभाष्य इन दो को अन्वाहार्यपचन और आहवनीय बताता है, वही दक्षिण और पूर्व वाली अग्नियाँ जिन्हें उपकोसल बारह बरस से सेवता आया था। हर अग्नि ने एक ही फल जोड़ा, कि जो इसे इस तरह जानकर उपासता है वह पाप-कर्म से छूट जाता है, पूरी आयु पाता है और चमककर जीता है।

इन तीनों पाठों का ढाँचा एक जैसा है और उसी में उनका मर्म है। हर बार बाहर की चार चीज़ें गिनाई जाती हैं, फिर उनके बीच चमकते हुए किसी एक पुरुष की ओर उँगली उठती है, और फिर वह अग्नि कहती है कि वही मैं हूँ। जिस आग को यह लड़का बारह बरस से लकड़ी और घी देता आ रहा था, वह उसके सामने सूरज, चाँद और बिजली बनकर खड़ी हो गई। सेवा का यही प्रतिदान है। जिसे हम बरसों बिना हिसाब के सँभालते हैं, वह एक दिन हमें अपना पूरा परिचय दे देता है।

सार: बारह बरस की चुपचाप की गई सेवा उपकोसल के लिए व्यर्थ नहीं गई; जिस गुरु ने उसे पढ़ाया नहीं, उसकी अग्नियों ने उसे पढ़ा दिया। उनका पाठ यही है कि प्राण, सुख और आकाश तीनों ब्रह्म के नाम हैं, और सूरज, चाँद और बिजली के भीतर जो पुरुष दिखता है वह सेवा किए हुए उसी अग्नि-तत्त्व का चेहरा है।

आँख का पुरुष और देवयान का रास्ता (खण्ड 14 और 15)

अग्नियों ने अपना पाठ पूरा करके एक ईमानदार सीमा खींच दी, “उपकोसल, सौम्य, यह हमारी विद्या है और आत्मविद्या भी; पर आगे की गति आपको आपके आचार्य बताएँगे।” उन्होंने जो दिया था वह लोकों तक जाने वाला ज्ञान था; जो आगे था वह उनका विषय नहीं था। तभी आचार्य लौट आए। उन्होंने उसे देखा और पुकारा, “उपकोसल!” “भगवन्।” और फिर वही वाक्य, जो कभी उन्होंने अपने गुरु से सुना था: “सौम्य, आपका मुख ब्रह्मविद् की तरह दमक रहा है, आपको किसने पढ़ाया?”

यहाँ मूल पाठ में एक बारीक और सुन्दर मोड़ है। उपकोसल टाल गया, “मुझे कौन पढ़ाता, भगवन्।” उसने जैसे बात छिपा ली, और फिर अग्नियों की ओर इशारा करते हुए इतना कह गया कि ये अब ऐसी हैं, पहले कुछ और थीं। आग की ओर देखकर कही हुई यह अधूरी बात ही उसे पकड़ा गई। गुरु ने पूछा, “सौम्य, इन्होंने आपसे क्या कहा?” उसने स्वीकार कर लिया कि यह और यह कहा। सत्यकाम बोले, “सौम्य, इन्होंने आपको लोकों के बारे में बताया; मैं आपको वह बताऊँगा जो इससे आगे है।” और फिर उन्होंने एक उपमा दी जिसे यह उपनिषद् आगे भी नहीं भूलता: “यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्ते”, जैसे कमल के पत्ते पर पानी नहीं चिपकता, वैसे ही ऐसे जानने वाले पर पाप-कर्म नहीं चिपकता।

फिर वे उस बात पर आए जिसके लिए बारह बरस बीते थे: “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मा”, जो यह आँख में दिखाई देने वाला पुरुष है, वही आत्मा है। यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म है। और इसके साथ उन्होंने एक ऐसा दृष्टान्त जोड़ा जो किसी को भी अपनी हथेली पर परखा जा सकता है, कि इस आँख में घी डालिए या पानी, वह किनारों पर, पलकों की ओर बह जाता है, भीतर वाले तक कुछ नहीं पहुँचता। जो भीतर देख रहा है, वह हर गीलेपन से अछूता रहता है। कमल के पत्ते वाली उपमा और आँख वाली उपमा एक ही बात के दो चित्र हैं।

इसी पुरुष के तीन नाम भी उन्होंने बताए। उसे संयद्वाम कहते हैं, क्योंकि सारी प्रिय और कल्याणकारी वस्तुएँ उसी में आकर मिलती हैं; और जो यह जानता है, उसके पास भी सारी प्रिय वस्तुएँ आ मिलती हैं। उसे वामनी कहते हैं, क्योंकि वही सारी कल्याणकारी वस्तुओं को ले चलता है। और उसे भामनी कहते हैं, क्योंकि वही सब लोकों में चमकता है। तीनों नाम एक ही दिशा में इशारा करते हैं, कि जिस भीतरी बिन्दु से हम संसार को देखते हैं, वही बिन्दु संसार का सारा सौन्दर्य अपने पास खींचता भी है और आगे बढ़ाता भी है।

और फिर यह उपनिषद् उस रास्ते को खोल देता है जिसे अग्नियों ने आचार्य के लिए छोड़ रखा था। ऐसे जानने वाले के लिए लोग अन्तिम संस्कार करें या न करें, वह अर्चि तक पहुँचता है, अर्चि से दिन तक, दिन से शुक्ल पक्ष तक, शुक्ल पक्ष से उन छह महीनों तक जिनमें सूर्य उत्तर की ओर चलता है, महीनों से संवत्सर तक, संवत्सर से आदित्य तक, आदित्य से चन्द्रमा तक, चन्द्रमा से विद्युत् तक। और वहाँ एक पुरुष है, अमानव, मनुष्य नहीं। वही इन्हें ब्रह्म तक ले जाता है। यह देवपथ है, ब्रह्मपथ है; जो इससे चलते हैं वे इस मनुष्य वाले चक्कर में फिर नहीं लौटते। जो नाम उपकोसल ने अग्नियों से सुने थे, वे इस मार्ग के पड़ाव बनकर फिर सामने आ जाते हैं।

सार: आँख के भीतर जो देखने वाला बैठा है, वही आत्मा है, अमृत और अभय, और उस पर पाप वैसे ही नहीं ठहरता जैसे कमल के पत्ते पर पानी। अग्नियों ने लोक दिए थे, आचार्य ने गति दी, और वह गति अर्चि से लेकर विद्युत् तक के पड़ावों से होती हुई उस अमानव पुरुष तक जाती है जो लौटना समाप्त कर देता है।

बहती हवा का यज्ञ और ब्रह्मा का मौन (खण्ड 16 और 17)

अन्तिम दो खण्डों में यह उपनिषद् कथा छोड़कर यज्ञशाला में लौट आता है, पर अपनी पकड़ ढीली नहीं करता। वह कहता है कि यह जो बहती है, यही यज्ञ है। वायु चलती हुई इस सबको पवित्र करती चलती है, इसीलिए वही यज्ञ है। और फिर वह एक चित्र देता है जिस पर पूरा खण्ड खड़ा है: “तस्य मनश्च वाक्च वर्तनी”, उस यज्ञ की दो लीकें हैं, मन और वाणी। जिस संवर्ग को रैक्व ने राजा को बताया था, वही वायु यहाँ चलते हुए यज्ञ का रूप ले लेती है, और उसके पहिये के नीचे दो पटरियाँ बिछ जाती हैं।

इनमें से एक लीक को ब्रह्मा नाम का ऋत्विक् अपने मन से सँवारता है, और दूसरी को होता, अध्वर्यु और उद्गाता अपनी वाणी से। तीन पुरोहित बोलते हैं, चौथा चुप रहकर देखता है। यह चौथा ही पूरे यज्ञ को अपनी चुप्पी में थामे रहता है। उपनिषद् इसका नियम भी बता देता है, कि प्रातरनुवाक आरम्भ हो जाने के बाद, परिधानीया ऋचा से पहले, यदि ब्रह्मा बोल पड़े तो उसने केवल एक लीक सँवारी और दूसरी छूट गई।

और तब जो होता है, उसकी उपमा घर-आँगन की है। जैसे एक ही पैर से चलता हुआ आदमी, या एक ही पहिये पर दौड़ता हुआ रथ, टूट जाता है, वैसे ही उसका यज्ञ टूट जाता है; और टूटते हुए यज्ञ के पीछे-पीछे यजमान भी टूटता है, और यज्ञ करके भी वह पहले से बुरी दशा में पहुँच जाता है। इसके उलट, जहाँ प्रातरनुवाक के बाद परिधानीया तक ब्रह्मा मौन रहा, वहाँ दोनों लीकें सँवरती हैं, कोई छूटती नहीं। दोनों पैरों से चलता आदमी और दोनों पहियों पर दौड़ता रथ जैसे टिका रहता है, वैसे ही उसका यज्ञ टिकता है, यजमान टिकता है, और यज्ञ करके वह श्रेष्ठ हो जाता है।

अन्तिम खण्ड में यह उपनिषद् बताता है कि इस ब्रह्मा के पास मरम्मत की शक्ति कहाँ से आती है। प्रजापति ने लोकों को तपाया, और तपते हुए लोकों से उनके रस निकाले: पृथ्वी से अग्नि, अन्तरिक्ष से वायु, द्युलोक से आदित्य। फिर उन्होंने इन तीन देवताओं को तपाया और उनसे रस निकाले: अग्नि से ऋचाएँ, वायु से यजुष्, आदित्य से सामन्। फिर उन्होंने इस त्रयी विद्या को तपाया और उससे रस निकाले: ऋचाओं से भूः, यजुषों से भुवः, सामों से स्वः। तीन बार का यह निचोड़ ही तीन व्याहृतियाँ हैं, वे तीन छोटे शब्द जिनमें सारे लोक और सारे वेद सिमटे हुए हैं।

इसीलिए यदि यज्ञ ऋक् की ओर से टूटे, तो ब्रह्मा गार्हपत्य में भूः स्वाहा कहकर आहुति दे; इससे वह ऋचाओं के रस और उनके वीर्य से यज्ञ की टूट जोड़ देता है। यजुष् की ओर से टूटे तो भुवः स्वाहा, और सामन् की ओर से टूटे तो स्वः स्वाहा। जोड़ने का चित्र भी पुराने कारीगर का है: जैसे नमक से सोना जोड़ा जाता है, सोने से चाँदी, चाँदी से राँगा, राँगे से सीसा, सीसे से लोहा, लोहे से लकड़ी, और लकड़ी चमड़े से जुड़ती है, वैसे ही इन लोकों, इन देवताओं और इस त्रयी विद्या के वीर्य से यज्ञ की टूट जोड़ी जाती है। जहाँ ऐसा जानने वाला ब्रह्मा होता है, वहाँ वह यज्ञ औषधि से भरा हुआ होता है, भीतर ही भीतर अपना घाव भरता हुआ।

और अन्त में उपनिषद् एक पुरानी गाथा की ओर संकेत करता है, कि ऋत्विजों में ब्रह्मा ही वह मनुष्य है जो सबको बचा ले जाता है; शांकरभाष्य इस अटपटी पंक्ति को घोड़ी के दृष्टान्त से जोड़ता है, जो अपने बछेड़ों की तरह यज्ञ की रक्षा करती चलती है। जो इस तरह जानता है वह ब्रह्मा होकर यज्ञ की, यजमान की और सारे ऋत्विजों की रक्षा करता है। इसीलिए उपनिषद् आग्रह के साथ दो बार दोहराता है कि ऐसे ही जानने वाले को ब्रह्मा बनाइए, न जानने वाले को नहीं। पूरे अध्याय की मूल बात यहाँ अपने अन्तिम रूप में आ जाती है, कि जानने वाले का मौन बोलने वालों की पूरी सभा को सँभाले रखता है।

सार: बहती वायु ही चलता हुआ यज्ञ है, और उसकी दो लीकें मन और वाणी हैं; तीन पुरोहित वाणी सँभालते हैं और ब्रह्मा अपने मौन से मन। जिस ब्रह्मा ने प्रजापति का वह निचोड़ जान लिया है जो भूः, भुवः और स्वः में बैठा है, वह टूटे हुए यज्ञ को भी जोड़ देता है, इसलिए वही इस पद के योग्य है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस अध्याय के तीनों मुख्य आदमी एक ही जगह से गुज़रे हैं। जानश्रुति को अपने दान की गिनती छोड़नी पड़ी, सत्यकाम को अपने कुल का नाम छोड़ना पड़ा, और उपकोसल को अपनी बारी आने की उम्मीद छोड़नी पड़ी। हम अपने जीवन में यही तीन चीज़ें सबसे कसकर पकड़ते हैं: अपना किया हुआ, अपना नाम, और अपनी बारी। इनमें से किसी एक का हाथ से छूट जाना हमें उसी रात की छत पर ले जाता है जहाँ ऊपर से हंस गुज़रते हैं। वह रात बुरी नहीं होती। उस रात के बाद ही आदमी नगर छोड़कर नदी के किनारे खोजने निकलता है।

दूसरी सीख इस अध्याय की गति में छिपी है। सत्यकाम को ब्रह्म एक साथ नहीं मिला, चार साँझों में चार बार मिला, और हर बार थोड़ा और भीतर की ओर सरकता हुआ, दिशाओं से लोकों तक, लोकों से ज्योतियों तक, और ज्योतियों से अपनी ही साँस और अपने ही मन तक। जो काम हमारे सामने पड़ा है, उसे भी शायद इसी तरह करना है, रोज़ एक जैसी साँझ में, आग जलाकर, अपनी गायें बाँधकर, चुपचाप बैठकर। इस दोहराव में कुछ नीरस लगता है, पर बोलने वाली आवाज़ें उसी नीरसता के भीतर से आती हैं। जो लोग बीच में उठ जाते हैं, वे प्रायः चौथी साँझ से ठीक पहले उठते हैं।

और अन्तिम बात उस चुप ब्रह्मा की है जो यज्ञ के कोने में बैठा रहता है। हमारे हर काम में, हर घर में, हर सभा में तीन बोलने वाले होते हैं और एक देखने वाला होना चाहिए, जो पूरी बात को मन में जोड़े रखे और बीच में न बोले। वही एक आदमी सारा काम टिकाए रखता है, और उसके बोल पड़ते ही रथ एक पहिये पर आ जाता है। अपने भीतर उस ब्रह्मा को बिठाइए। और जब कभी लगे कि किए हुए पर मैल जम रहा है, आँख के उस भीतर वाले को याद कर लीजिए, जिस पर घी डालिए या पानी, वह किनारों से बह जाता है और भीतर वाला सूखा ही रहता है, कमल के पत्ते की तरह।

आधार: छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 4, खण्ड 1 से 17; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।