छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 4

छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय चार

सत्यकाम और रैक्व की कथाएँ

सत्रह खण्ड। उपनिषद्-साहित्य का सबसे कथाओं से भरा हिस्सा।

चौथा अध्याय छान्दोग्य का सबसे कथाओं से भरा हिस्सा है। तीन प्रसिद्ध कथाएँ यहाँ एक के बाद एक चलती हैं, और हर एक के पीछे एक सामाजिक-तात्पर्य है जो आज भी पठनीय है।

पहली कथा है रैक्व की। राजा जानश्रुति, जो अपने दान-यश के लिए प्रसिद्ध है, एक रात अपनी छत पर बैठा है, जब वो दो हंसों की बातचीत सुनता है। एक हंस दूसरे से कहता है, “मूर्ख! इस राजा का दान-यश रैक्व के सामने कुछ नहीं है, जैसे कौड़ी सोने के सामने।” राजा अपमानित होता है, मगर शिक्षित भी। वो रैक्व को ढूँढने निकलता है। एक गाँव में, एक टूटी गाड़ी के नीचे बैठा एक भिखारी मिलता है, खुजली खुजाते हुए। यही रैक्व है।

राजा उसे शिक्षा देने को कहता है। रैक्व पहले मना करता है, फिर एक बहुत-सा धन और एक सुन्दर पुत्री लेने पर शिक्षा देता है। शिक्षा का नाम “सम्वर्ग-विद्या” है, यानी “सब-कुछ-एक-में-समा-जाने-वाली विद्या”।और गुरु बाहर से कैसा भी दिखे, अन्दर से अनिवार्य रूप से एक तत्त्व-स्पर्शी होता है।

दूसरी कथा है सत्यकाम-जाबाला की। यह उपनिषद्-साहित्य का शायद सबसे socially-radical passage है। एक बालक अपनी माँ से पूछता है, “माँ, मैं ब्रह्मचर्य के लिए जाऊँगा। मेरा गोत्र क्या है?” माँ का उत्तर: “बेटा, यह मुझे नहीं पता। मैं अपनी जवानी में बहुत-घूम कर सेवा करती थी, तब तू मुझे मिला। तेरा गोत्र मुझे नहीं पता। मेरा नाम जबाला है, तेरा नाम सत्यकाम। तू सत्यकाम-जाबाल कह देना।” गौतम-ऋषि के पास पहुँचने पर, सत्यकाम यही उत्तर दोहराता है, और गौतम तुरंत कहते हैं, “यह कोई अब्राह्मण नहीं बोल सकता। तू सत्य से नहीं गिरा। समिधा ले आ, मैं तुझे शिष्य बनाऊँगा।”

Key passages

4.4.1-3सत्यकाम-जाबाला
सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयांचक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किंगोत्रो न्वहमस्मीति । सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि स सत्यकाम एव जाबालो ब्रवीथा इति ॥
satyakāmo ha jābālo jabālāṃ mātaramāmantrayāṃcakre brahmacaryaṃ bhavati vivatsyāmi kiṃgotro nvahamasmīti । sā hainamuvāca nāhametadveda tāta yadgotrastvamasi bahvahaṃ carantī paricāriṇī yauvane tvāmalabhe sāhametanna veda yadgotrastvamasi jabālā tu nāmāhamasmi satyakāmo nāma tvamasi sa satyakāma eva jābālo bravīthā iti ॥

अर्थ: सत्यकाम जाबाला अपनी माँ जबाला से बोला, ‘माँ, मैं ब्रह्मचर्य के लिए जाऊँगा। मेरा गोत्र क्या है?’ माँ ने कहा, ‘बेटा, यह मुझे नहीं पता। मैं अपनी जवानी में बहुत-घूम-कर सेवा करती थी, उस-समय आप मुझे मिला। तो आपका गोत्र मुझे नहीं पता। मेरा नाम जबाला है, आपका नाम सत्यकाम। आप सत्यकाम जाबाल कह देना।’

संगति: यह कथा social-revolution का statement है। एक illegitimate-birth वाला, अकेली-माँ का बेटा, फिर भी ब्रह्म-realisation पाता है। और कैसे? सिर्फ़-सत्य-बोल कर। यह ‘सत्य ही गोत्र’ का message।
4.4.5गौतम का स्वीकार
स होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिध\म्+ सोम्याहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति ॥
sa hovāca naitadabrāhmaṇo vivaktumarhati samidha\m+ somyāharopa tvā neṣye na satyādagā iti ॥

अर्थ: गौतम ने कहा, ‘यह कोई अब्राह्मण नहीं बोल सकता (सत्य बोलना ही ब्राह्मण-लक्षण है)। बेटा, समिधा ले आएँ, मैं आपको शिष्य बनाऊँगा। आप सत्य से नहीं गिरा।’

संगति: ब्राह्मणत्व जन्म-से नहीं, सत्य-से। यह वाक्य काफी-revolutionary है, और बाद के time में जातिवाद के against weapon बना।

अध्याय-overview

Khanda 1-3 रैक्व-कथा, राजा जानश्रुति की कथा। ‘सम्वर्ग-विद्या’ (सब-merge into one)।

Khanda 4-9 सत्यकाम-जाबाला कथा, उसका 400-गायें-charing, और चार-पाद-ब्रह्म-realisation।

Khanda 10-15 उपकोसल-कामलायन कथा। तीन-अग्नियाँ उसको ज्ञान देती हैं।

Khanda 16-17 ब्रह्मा-यज्ञ का ब्रह्म-स्वरूप।

संगति

सत्यकाम-कथा का सामाजिक-message स्पष्ट है, “ब्राह्मण-त्व जन्म से नहीं, सत्य से।” यह वाक्य गौतम के मुँह से निकलता है, सबसे वैदिक-शास्त्रीय परम्परा के ठीक केन्द्र से। और यह एक चुपचाप-radical-declaration है, जो आज तक भारतीय सामाजिक-सोच में दूर तक गूँजती है।

तीसरी कथा उपकोसल-कामलायन की है। एक शिष्य जो बारह-साल अपने गुरु के घर रह कर सेवा करता है, मगर गुरु उसे शिक्षा नहीं देते। फिर तीन-अग्नियाँ (गार्हपत्य, अन्वाहार्य-पचन, और आहवनीय) उससे प्रत्यक्ष-संवाद करती हैं, और उसको ब्रह्म-तत्त्व सिखाती हैं। यह कथा एक प्रकार की alternative-pedagogy का इशारा है, जब परम्परागत गुरु-शिष्य-संगति में देरी हो, तो प्रकृति स्वयं शिक्षा देने आती है।

तीनों कथाओं को एक साथ रख कर देखें तो एक pattern मिलता है। ज्ञान का मार्ग कोई एक नहीं है। यह बाह्य-भिखारी से भी आ सकता है, अपने-जन्म-को-न-जानने वाले बालक से भी, या आन्तरिक-अग्नियों के संवाद से भी। उपनिषद् कह रही है, सच्चे जिज्ञासु के लिए मार्ग रोक नहीं सकता।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “chhaandogya.itx” से।

license: मूल text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।