सूर्य-मधु और शाण्डिल्य-विद्या
उन्नीस खण्ड। दो प्रसिद्ध तत्त्व-शिक्षाओं का सह-घर।
तीसरा अध्याय छान्दोग्य की सबसे प्रसिद्ध शिक्षाओं में से एक का घर है। चौदहवें खण्ड की पहली पंक्ति, “सर्वम् खल्व् इदम् ब्रह्म” (यह सब निश्चय ब्रह्म है), पूरे वेदान्त-दर्शन का संक्षिप्ततम सूत्र-वाक्य बन गया। यह वाक्य पहली बार यहीं रखा गया, और बाद के सहस्रों साल इस एक पंक्ति पर भाष्य-दर-भाष्य लिखे गए हैं।

शाण्डिल्य-विद्या नाम इसी ऋषि से है, जिन्होंने यह वाक्य कहा। पूरा शाण्डिल्य-उपदेश छोटा है, लगभग दो-तीन मन्त्रों का। पहले “यह सब ब्रह्म है”। फिर “मनुष्य संकल्पमय है, जैसा संकल्प इस-लोक में, वैसा ही मनुष्य परलोक में बनता है”। फिर एक paradoxical-दृष्टिकोण, “यह आत्मा हृदय के अन्दर, चावल-दाने से, यव-दाने से, सरसों-दाने से भी छोटा। और यह आत्मा, हृदय के अन्दर, पृथ्वी से, अन्तरिक्ष से, द्यो से, सब-लोकों से भी बड़ा।” सबसे छोटा और सबसे बड़ा, एक ही श्वास में।
अध्याय का पहला भाग, खण्ड एक से ग्यारह तक, “मधु-विद्या” है। सूर्य ब्रह्म-शहद है, और उसको पाँच-मधु-नाडियों (ऋग्-यजुर्-साम-अथर्व-इतिहास) ने भरा है। यह एक vivid-image-शिक्षा है, सूर्य को एक छत्ता मान कर, और जिस devata इसका शहद इकट्ठा करता है उसे “मधुपिता” कह कर।
Key passages
अर्थ: सब-कुछ निश्चय ही ब्रह्म है। उसमें ही उत्पन्न, उसमें ही लीन, उसमें ही जीवित। शान्त-हो कर उसकी उपासना करनी चाहिए। मनुष्य संकल्प-मय (कल्पना-मय) है। जैसा संकल्प इस-लोक में, वैसा ही मनुष्य परलोक में बन जाता है। तो संकल्प सोच-समझ कर करें।
अर्थ: यह मेरा आत्मा, हृदय के अन्दर, चावल-दाने से, यव-दाने से, सरसों-दाने से, छोटा। यह मेरा आत्मा, हृदय के अन्दर, पृथ्वी से बड़ा, अन्तरिक्ष से बड़ा, द्यो (आकाश) से बड़ा, इन-सब लोकों से बड़ा।
अध्याय-overview
Khanda 1-11 मधु-विद्या: सूर्य के पाँच-रंग, पाँच-वेद, पाँच-स्थानों के देवता।
Khanda 12 गायत्री-साम और गायत्री-तत्त्व।
Khanda 13 हृदय-कोश, पाँच-द्वार।
Khanda 14 शाण्डिल्य-विद्या, सबसे-famous: सर्वम् खल्विदम् ब्रह्म।
Khanda 15 कोश-निधि-विद्या।
Khanda 16-17 यज्ञ-स्वरूप मनुष्य।
Khanda 18-19 मन-आकाश-दिव्य ब्रह्म।
संगति
शाण्डिल्य-विद्या (3.14.1) अद्वैत वेदान्त की सबसे important non-Brahmasutra उपनिषद्-passage है। शंकराचार्य ने इसका विस्तृत वर्णन किया, और ब्रह्म-सूत्र का तीसरा अध्याय (शाण्डिल्य-अधिकरण) इसी पर तर्क करता है। यदि वेदान्त-परम्परा के सबसे केन्द्रीय वाक्यों की एक सूची बनायी जाए, तो “सर्वम् खल्व् इदम् ब्रह्म” शीर्ष पाँच में अवश्य होगा।
दूसरी पंक्ति, “तज्जलान्” (वो ही उत्पन्न करता, धारण करता, और लीन करता), को एक तरह की संक्षिप्त-कोश-समीकरण कहा जा सकता है। तीन क्रियाओं को एक शब्द में बाँधना संस्कृत-व्याकरण की एक खास क्षमता है, और यहाँ इसका उत्कृष्ट उपयोग है।
हृदय-आत्मा का छोटा-बड़ा paradox बाद-वाले कठोपनिषद् (“अणोर्-अणीयान्, महतो-महीयान्”) में और अधिक powerful रूप में आता है। मगर वहाँ की रचना यहाँ की प्रतिध्वनि है, इसका मूल यहीं है।