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उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

अध्याय 3: सूर्य का मधु और हृदय का आकाश

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सामवेद · छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय 3
सूर्य को छत्ते की तरह देखता हुआ यह अध्याय वेदों को मधुमक्खियाँ बनाता है, फिर गायत्री से होता हुआ हृदय के भीतर उतर आता है।

कल्पना कीजिए कि कोई आचार्य आपको आँगन में ले जाकर दोपहर के सूर्य की ओर उँगली उठाए और कहे कि वह जलती हुई थाली नहीं, एक छत्ता है। ऊपर जो आकाश तना है, वह आड़ी लकड़ी है जिससे छत्ता लटका है। बीच का जो अन्तरिक्ष है, वह मोम की वह पर्त है जिसमें खाने बने हैं। और जो किरणें चारों ओर फैली हैं, वे छत्ते के बच्चे हैं, अभी-अभी जन्मे हुए। “असौ वा आदित्यो देवमधु”, वह जो सूर्य है, वही देवताओं का मधु है। तीसरा अध्याय इसी एक वाक्य से खुलता है, और अगले पाँच खण्डों तक इस छत्ते के भीतर हमें घुमाता रहता है, जब तक हम यह न मान लें कि जो रोज़ सिर के ऊपर से गुज़र जाता है, उसमें कुछ ऐसा भरा है जिसे चखा जा सकता है।

छान्दोग्य उपनिषद् के पहले दो अध्याय गान की भीतरी विधि सिखाते हैं, उद्गीथ और साम की उपासनाएँ। तीसरा अध्याय उस गान को आकाश में टाँग देता है और फिर धीरे-धीरे वापस नीचे लाता है। उन्नीस खण्डों में यह एक ही यात्रा कराता है: पहले सूर्य का मधु, फिर उस मधु पर जीने वाले देवगण, फिर वह अवस्था जहाँ सूर्य न उगता है न डूबता, फिर गायत्री जो वाणी से होती हुई हृदय तक सिकुड़ आती है, फिर हृदय के पाँच द्वार, फिर शाण्डिल्य की वह घोषणा जिसे परम्परा ने महावाक्य की तरह सँभाला, फिर जीवन का यज्ञ-रूप, और अन्त में वह कथा जिसमें असत् से एक अण्डा बनता है और अण्डे से सूर्य निकल आता है। यह उपनिषद् यहाँ बड़े से छोटे की ओर चलता है, और छोटे में पहुँचकर पाता है कि वहाँ बड़ा पहले से बैठा है।

इस अध्याय के मुख्य किरदार

आदित्य: वह सूर्य जिसे यह अध्याय देवों का मधु कहता है, जिसकी किरणें मधु की नालियाँ हैं और जिसके पाँच रंगों में पाँच अमृत रखे हैं।

वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्य: पाँच देवगण, जो उन पाँच अमृतों पर जीते हैं; इनके मुख क्रमशः अग्नि, इन्द्र, वरुण, सोम और ब्रह्मा हैं।

ब्रह्मा, प्रजापति, मनु और उद्दालक आरुणि: वह क्रम जिससे यह मधु-विद्या उतरी, और जिसके अन्त में एक पिता अपने ज्येष्ठ पुत्र को यह रहस्य सौंपता है।

गायत्री: चौबीस अक्षरों का वह छन्द, जो इस अध्याय में वाणी बनता है, फिर पृथ्वी, फिर शरीर, और अन्त में हृदय।

शाण्डिल्य: वह ऋषि जिसने हृदय के भीतर बैठे आत्मा को चावल के दाने से छोटा और सारे लोकों से बड़ा बताया, और अपने नाम पर एक पूरी विद्या छोड़ गए।

महिदास ऐतरेय: वह ज्ञानी जिसने अपनी बीमारी से ही सवाल किया कि वह उसे क्यों तपा रही है, और एक सौ सोलह वर्ष जिया।

घोर आङ्गिरस और कृष्ण देवकीपुत्र: गुरु और शिष्य, जिनके बीच सत्रहवें खण्ड में जीवन को यज्ञ मानने का उपदेश हुआ।

सूर्य का छत्ता: मधु-विद्या (खण्ड 1 से 5)

छत्ते का ढाँचा पहले ही वाक्य में खड़ा हो जाता है। सूर्य मधु है, द्युलोक वह आड़ी बल्ली है जिससे छत्ता टँगा रहता है, अन्तरिक्ष वह मोम-पिण्ड है जिसमें खाने बने हैं, और किरणें उस छत्ते की सन्तानें हैं। अब इस छत्ते में मधु कहाँ से आता है, यह उपनिषद् दिशावार बताता है। सूर्य की जो किरणें पूरब की ओर जाती हैं, वे उसकी पूर्वी मधु-नालियाँ हैं। उन नालियों में मधु भरने वाली मक्खियाँ ऋचाएँ हैं। जिस फूल पर वे बैठती हैं, वह ऋग्वेद है। और जो रस वे लाती हैं, वे अमृत जल हैं।

फिर मधु बनने की प्रक्रिया आती है, और यहाँ उपनिषद् एक बहुत पुराना शब्द उठाता है, तप। ऋचाओं ने उस ऋग्वेद-रूपी फूल को तपाया, उस पर ध्यान गड़ाया, उसे भीतर तक गरम किया। और जो तपाया गया, उससे यश निकला, तेज निकला, इन्द्रिय-शक्ति निकली, वीर्य निकला, खाने योग्य अन्न निकला, रस निकला। वह सब बहकर सूर्य के चारों ओर जा बैठा। जो कोई सुबह उगते सूर्य की लाल आभा देखता है, वह ऋग्वेद का निचोड़ देख रहा है। यह उपनिषद् यही कहता है: सूर्य का जो रोहित रूप है, वह ऋचाओं का बनाया हुआ मधु है।

दक्षिण की किरणें दूसरी नालियाँ हैं। वहाँ मक्खियाँ यजुष् मन्त्र हैं, फूल यजुर्वेद है, और तपने पर जो रस निकला वह सूर्य के चारों ओर जमकर उसका शुक्ल रूप बना, वह सफ़ेद चमक जो दोपहर में आँख नहीं सह पाती। पश्चिम की किरणों में मक्खियाँ साम हैं, फूल सामवेद है, और उनका रस सूर्य का कृष्ण रूप बना, वह गहरा रंग जो डूबते समय किनारों पर बैठता है। उत्तर की किरणों में मक्खियाँ अथर्वाङ्गिरस मन्त्र हैं, फूल इतिहास और पुराण हैं, और उनका रस सूर्य का परम कृष्ण रूप बना, सबसे गाढ़ा वाला।

चारों दिशाएँ हो चुकीं, पर एक दिशा बची है, ऊपर की। और ऊपर की किरणों में उपनिषद् वेदों का नाम नहीं लेता। वहाँ मधु बनाने वाली मक्खियाँ गुह्य आदेश हैं, वे गुप्त उपदेश जो कान के पास मुँह ले जाकर दिए जाते थे। फूल स्वयं ब्रह्म है। और उनका रस जब सूर्य के चारों ओर जा बैठा, तो उसका कोई रंग नहीं बना। उपनिषद् कहता है कि सूर्य का मध्य भाग जो काँपता हुआ सा दिखता है, वह वही है। जहाँ वेद रंग देते हैं, वहाँ रहस्य कँपकँपी देता है।

पाँचवें खण्ड का अन्तिम वाक्य इस पूरे छत्ते को एक तराज़ू पर रख देता है। ये जो पाँच रस हैं, ये रसों के भी रस हैं, क्योंकि वेद स्वयं रस हैं और ये उन वेदों के रस हैं। ये अमृतों के भी अमृत हैं, क्योंकि वेद स्वयं अमृत हैं और ये उनके अमृत हैं। सोचिए इस क्रम को। सुनी हुई ऋचा एक रस है। उस ऋचा पर बरसों बैठकर जो निकलता है, वह उस रस का रस है। पढ़ना पहली परत है, तपना दूसरी, और मधु तीसरी परत पर बनता है।

यह पूरी मधु-विद्या एक बात सिखाने के लिए बनी है, कि ऊपर जो दिख रहा है और भीतर जो हो रहा है, दोनों एक ही रसायन हैं। जिसने वेद को गाकर छोड़ दिया, उसके हिस्से शब्द आए। जिसने उसे तपाया, उसके हिस्से मधु आया। और मधु का लक्षण यह है कि वह बनाने वाले के भीतर नहीं रुकता, छत्ते में जमा होता है और जो आए उसे मिलता है। इसीलिए आगे के खण्डों में यह मधु देवताओं का भोजन बनता है, और उससे भी आगे, उस मनुष्य का भी, जो इसे जान ले।

सार: सूर्य देवों का छत्ता है, आकाश उसकी बल्ली, अन्तरिक्ष उसका मोम, किरणें उसकी सन्तानें। चारों दिशाओं की किरणों में चार वेद मक्खियों की तरह मधु भरते हैं और सूर्य के चार रंग बनाते हैं; ऊपर की किरणों में गुह्य उपदेश ब्रह्म-फूल से रस लाते हैं और सूर्य के मध्य को कँपा देते हैं। जो निकलता है, वह रसों का रस है।

पाँच अमृत और उन पर जीते पाँच देवगण (खण्ड 6 से 10)

छठे खण्ड में भोजन परोसा जाता है, पर मेज़ पर कोई थाली नहीं है। पहला अमृत, सूर्य का वह लाल रस, वसुओं की जीविका है, और वे उसे अग्नि के मुख से लेते हैं। फिर एक वाक्य आता है जो पूरे अध्याय का स्वाद बदल देता है: “न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्ति”, देवता न खाते हैं न पीते हैं। वे उस अमृत को देखकर ही तृप्त हो जाते हैं। वे उसी रूप में समा जाते हैं और उसी रूप से फिर बाहर उठ आते हैं। तृप्ति का यह ढंग हमारे ढंग से अलग है, यहाँ आँख ही मुँह का काम कर लेती है।

और फिर उपनिषद् यह दरवाज़ा मनुष्य के लिए खोल देता है। जो इस अमृत को इस तरह जान ले, वह वसुओं में से एक होकर, अग्नि को ही मुख बनाकर, उसी अमृत को देखकर तृप्त होता है। वह उसी रूप में समाता है और उसी रूप से उठता है। जब तक सूर्य पूरब में उगता और पश्चिम में डूबता रहेगा, तब तक वसुओं का आधिपत्य और स्वराज्य उसे मिलता रहेगा। ध्यान दीजिए कि यहाँ इनाम किसी दूर के लोक का टिकट नहीं है, यह उसी क्रम में शामिल हो जाना है जो पहले से चल रहा है।

दूसरा अमृत, सूर्य का सफ़ेद रस, रुद्रों की जीविका है, और वे उसे इन्द्र के मुख से लेते हैं। यहाँ भी वही नियम चलता है, देखना ही खाना है। पर अवधि दुगुनी हो जाती है। जितनी देर सूर्य पूरब में उगकर पश्चिम में डूबता है, उससे दुगुनी देर वह दक्षिण से उगकर उत्तर में डूबेगा, और उतनी देर जानने वाले को रुद्रों का आधिपत्य मिलेगा। तीसरा अमृत, काला रस, आदित्यों का है, वरुण उनका मुख है, और अवधि फिर दुगुनी होकर पश्चिम से उगने और पूरब में डूबने तक चली जाती है।

चौथा अमृत, परम कृष्ण रस, मरुतों का है और सोम उनका मुख है; यहाँ सूर्य उत्तर से उगता है और दक्षिण में डूबता है, और अवधि फिर दुगुनी। पाँचवाँ अमृत, वह जो सूर्य के मध्य में काँपता दिखता है, साध्यों का है और ब्रह्मा उनका मुख है; यहाँ सूर्य ऊपर की ओर उगता है और नीचे की ओर डूबता है, और अवधि एक बार फिर दुगुनी। पाँच सीढ़ियाँ, हर सीढ़ी पर समय दुगुना, और हर सीढ़ी पर दिशाओं का ढाँचा एक बार घूम जाता है, जब तक कि उगना और डूबना अपनी जगह ही खो न दे।

इन पाँच खण्डों को पढ़ते हुए एक बात साफ़ दिखती है। उपनिषद् बार-बार एक ही वाक्य दोहराता है, जैसे किसी मन्त्र की आवृत्ति हो, और सिर्फ़ नाम बदलता जाता है। यह दोहराव आलस्य नहीं है, यह विधि है। छन्दोगों की परम्परा में सीखना कान से होता था, और कान वही पकड़ता है जो लौट-लौटकर आए। जो पाँच बार एक ही ढाँचे से गुज़रता है, उसके भीतर छठी बार वह ढाँचा अपने आप खड़ा हो जाता है। यही कारण है कि ग्यारहवें खण्ड की छलाँग तब चौंकाती नहीं, तब तक पैर तैयार हो चुके होते हैं।

सार: सूर्य के पाँच रंग पाँच अमृत हैं, और उन पर क्रमशः वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्य जीते हैं, जिनके मुख अग्नि, इन्द्र, वरुण, सोम और ब्रह्मा हैं। देवता खाते-पीते नहीं, देखकर तृप्त होते हैं। जो यह जान ले, वह उसी गण में एक होकर उसी तृप्ति में हिस्सा पाता है, और हर सीढ़ी पर अवधि दुगुनी होती जाती है।

जो न उगता है न डूबता, और वह रहस्य जो ज्येष्ठ पुत्र को मिलता है (खण्ड 11)

ग्यारहवाँ खण्ड एक वाक्य में सारी घड़ियाँ रोक देता है। उसके बाद, ऊपर उठकर, वह न उगेगा न डूबेगा; अकेला ही बीच में खड़ा रहेगा। पाँच बार दिशाएँ घुमाने के बाद उपनिषद् दिशा नाम की चीज़ ही हटा देता है। जहाँ न पूरब बचा न पश्चिम, वहाँ उगना किस ओर से हो और डूबना किस ओर। और इसी जगह पर एक श्लोक रखा है, जो इस पूरे अध्याय की सबसे ऊँची पंक्ति है: “न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन”, वहाँ कभी कुछ डूबा नहीं, कभी कुछ उगा नहीं। और फिर एक प्रार्थना, कि हे देवो, इस सत्य के बल पर मैं ब्रह्म से विमुख न होऊँ।

यह “वहाँ” कहाँ है, इसका उत्तर अगली ही पंक्ति देती है। जो इस ब्रह्म-उपनिषद् को इस तरह जान ले, उसके लिए न कुछ उगता है न डूबता; उसके लिए एक ही बार का दिन हो जाता है, सकृद् दिवा। यह वाक्य आकाश की बात करते-करते चुपचाप अनुभव की बात पर आ जाता है। दिन और रात का हिसाब उसी के लिए चलता है जो हिसाब के भीतर खड़ा है। जिसने वह देख लिया जो बदलता नहीं, उसके भीतर एक ऐसी रोशनी ठहर जाती है जिसका कोई सूर्यास्त तय नहीं है।

अब उपनिषद् इस विद्या का पता बताता है, कि यह आई कहाँ से। ब्रह्मा ने इसे प्रजापति से कहा, प्रजापति ने मनु से, मनु ने अपनी सन्तानों से। और फिर यही ब्रह्म एक पिता ने अपने ज्येष्ठ पुत्र उद्दालक आरुणि को कहा। छान्दोग्य का पाठक यह नाम पहचानता है, क्योंकि छठे अध्याय में यही उद्दालक अपने बेटे श्वेतकेतु के सामने बैठकर बरगद का फल तुड़वाएगा। यहाँ वह पाने वाले की जगह पर है, वहाँ देने वाले की।

और फिर एक शर्त आती है, जो आज के कान को कठोर लग सकती है। यही ब्रह्म पिता अपने ज्येष्ठ पुत्र को कहे, या किसी ऐसे अन्तेवासी को जो सचमुच योग्य हो। किसी और को नहीं। चाहे कोई उसे जल से घिरी यह सारी पृथ्वी धन से भरकर दे दे, तब भी नहीं, क्योंकि “एतदेव ततो भूय इति”, यह उससे भी बड़ा है, यह उससे भी बड़ा है। उपनिषद् वाक्य को दो बार कहता है, जैसे दाम पूछने वाले को दूसरी बार में समझ आ जाए।

इस शर्त का असली मतलब बिक्री का निषेध नहीं, पात्रता की माँग है। जो विद्या पाकर आदमी बदलता नहीं, वह विद्या उसके पास जाकर मर जाती है। ज्येष्ठ पुत्र और योग्य अन्तेवासी, दोनों उस व्यक्ति के नाम हैं जिसने रहने का समय दिया हो, जिसने पास बैठकर वर्षों गँवाए हों। और जिस पृथ्वी को उपनिषद् ठुकरा रहा है, वह भी कोई तुच्छ चीज़ नहीं है; बात यह है कि जो न उगता न डूबता, उसकी तुलना में हर वह चीज़ छोटी पड़ जाती है जिसका उगना और डूबना तय है।

सार: पाँच सीढ़ियों के बाद सूर्य ऊपर उठकर न उगता है न डूबता, अकेला बीच में ठहर जाता है; और जो इसे जान ले, उसके लिए एक ही बार का दिन हो जाता है। यह विद्या ब्रह्मा से प्रजापति, मनु और उद्दालक आरुणि तक उतरी, और इसे ज्येष्ठ पुत्र या योग्य शिष्य के सिवा किसी को नहीं दिया जाता, धन से भरी पृथ्वी के बदले भी नहीं।

गायत्री: वाणी से हृदय तक सिकुड़ता हुआ छन्द (खण्ड 12)

बारहवाँ खण्ड एक चौंकाने वाले दावे से शुरू होता है: “गायत्री वा ईदꣳ सर्वं भूतं यदिदं किं च”, गायत्री ही यह सब है, जो कुछ भी है। फिर वह इस दावे को खोलता है। गायत्री वाणी है, और वाणी ही यह सब है, क्योंकि वाणी गाती भी है और बचाती भी है। नाम में ही दोनों क्रियाएँ बैठी हैं, गायति और त्रायते। जो गाया जाए वह सुनने वाले तक पहुँचता है, और जो पहुँचता है वह उसे किसी गड्ढे से निकाल भी लाता है। छन्द को यहाँ अक्षरों की गिनती से नहीं, उसके काम से पहचाना गया है।

अब उपनिषद् एक सीढ़ी उतरता है। जो वह गायत्री है, वही यह पृथ्वी है, क्योंकि सारे प्राणी इसी पर टिके हैं और इससे बाहर नहीं जाते। फिर एक और सीढ़ी। जो वह पृथ्वी है, वही यह शरीर है जो मनुष्य के भीतर है, क्योंकि इसी में ये प्राण टिके हैं और इससे बाहर नहीं जाते। फिर एक और। जो वह शरीर है, वही यह हृदय है जो मनुष्य के भीतर है, क्योंकि इसी में ये प्राण टिके हैं। चार पग में यह छन्द ब्रह्माण्ड से मुट्ठी भर जगह में उतर आता है, और हर सीढ़ी पर तर्क एक ही रहता है, टिकने की जगह ही असली चीज़ है।

यही वह गायत्री है जिसे उपनिषद् चार पाद वाली और छह प्रकार वाली कहता है, और इस पर एक ऋचा उद्धृत करता है: “पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि”, इसका एक पाद सारे प्राणी हैं और तीन पाद द्युलोक में अमृत हैं। जो दिखता है, वह चौथाई है। यह पंक्ति पुरुषसूक्त के पाठकों को परिचित लगेगी, और यहाँ इसका काम यह याद दिलाना है कि जिस महिमा की बात चल रही है, उसका बड़ा हिस्सा गिनती में आता ही नहीं।

और फिर खण्ड का अन्तिम मोड़। जिसे ब्रह्म कहते हैं, वह यह आकाश है जो मनुष्य के बाहर है। जो वह बाहर का आकाश है, वही मनुष्य के भीतर का आकाश है। और जो वह भीतर का आकाश है, वही हृदय के भीतर का आकाश है। तीन वाक्यों में बाहर और भीतर की दीवार गिरा दी गई। यह आकाश पूर्ण है और अप्रवर्ति है, इसमें कुछ जुड़ता या घटता नहीं। जो इसे इस तरह जानता है, उसे भी वैसी ही पूर्ण और कभी न घटने वाली श्री मिलती है।

इस खण्ड की चाल पर ठहरकर देखिए। शुरुआत एक छन्द से हुई जो सब कुछ है, और अन्त एक खाली जगह पर हुआ जो हृदय के भीतर है। बीच में हर कड़ी इसी सवाल से जुड़ी कि यह किस पर टिका है। उपनिषद् की यह आदत आगे भी दिखेगी: वह बड़ी चीज़ों की सूची नहीं बनाता, वह उन्हें एक-दूसरे में डालता जाता है जब तक सबसे छोटा डिब्बा न आ जाए। और फिर उस डिब्बे को खोलकर दिखाता है कि भीतर वही आकाश है जिससे शुरू किया था।

सार: गायत्री ही सब कुछ है; वह वाणी है, वाणी पृथ्वी है, पृथ्वी शरीर है, शरीर हृदय है, क्योंकि हर बार प्राण उसी पर टिके मिलते हैं। इसका एक पाद सारे प्राणी हैं और तीन पाद द्युलोक में अमृत। और जिसे ब्रह्म कहते हैं, वह बाहर का आकाश है, वही भीतर का, वही हृदय के भीतर का, पूर्ण और कभी न घटने वाला।

हृदय के पाँच द्वार, और भीतर जलती वह ज्योति (खण्ड 13)

अगर हृदय में आकाश है तो उसमें भीतर जाने के रास्ते भी होंगे। तेरहवाँ खण्ड उन रास्तों की गिनती करता है और उन्हें देव-सुषि कहता है, देवताओं के छेद। पूरब की ओर जो छिद्र है, वह प्राण है, वही आँख है, वही आदित्य है; इसकी उपासना तेज और अन्न के रूप में करनी चाहिए, और जो ऐसा जानता है वह तेजस्वी और अन्न खाने वाला होता है। दक्षिण का छिद्र व्यान है, वही कान है, वही चन्द्रमा है; इसकी उपासना श्री और यश के रूप में, और जानने वाला श्रीमान् और यशस्वी होता है।

पश्चिम का छिद्र अपान है, वही वाणी है, वही अग्नि है; इसकी उपासना ब्रह्मतेज और अन्न के रूप में की जाती है। उत्तर का छिद्र समान है, वही मन है, वही पर्जन्य है; इसकी उपासना कीर्ति और व्युष्टि के रूप में, यानी नाम और उस उजाले के रूप में जो भोर में फूटता है। और ऊपर का छिद्र उदान है, वही वायु है, वही आकाश है; इसकी उपासना ओज और महत्ता के रूप में। पाँच छेद, पाँच प्राण, पाँच इन्द्रियाँ, पाँच देवता, और हर एक के साथ एक फल जुड़ा हुआ।

फिर उपनिषद् इन पाँचों को एक नाम देता है, ब्रह्मपुरुष, और एक काम, स्वर्गलोक के द्वारपाल। जो इन पाँच द्वारपालों को इस तरह जान ले, उसके कुल में वीर पैदा होता है और वह स्वर्गलोक तक पहुँचता है। द्वारपाल का रूपक अपने आप में एक उपदेश है। हृदय कोई खुला मैदान नहीं है जहाँ कोई भी टहल आए। उस तक जाने वाले हर रास्ते पर एक पहरा बैठा है, और पहरे का नाम है, उस रास्ते को ठीक से जानना।

खण्ड का सातवाँ मन्त्र अचानक आँख ऊपर उठा देता है। जो ज्योति इस द्युलोक से भी परे चमकती है, सबकी पीठ पर, सबसे ऊँचे लोकों में, वही यह ज्योति है जो मनुष्य के भीतर है। और फिर वह सवाल उठता है जिसकी उम्मीद कोई नहीं करता: इस भीतर की ज्योति को देखा कैसे जाए, सुना कैसे जाए। उपनिषद् इसका उत्तर देता है, और उत्तर इतना सीधा है कि उसे पढ़कर हाथ अपने आप शरीर पर चला जाता है।

उस ज्योति का दिखना यह है कि जब हम इस शरीर को छूकर उसमें गरमी पहचानते हैं, वह गरमी उसी की है। और उसका सुनाई देना यह है कि जब हम दोनों कान बन्द कर लें और भीतर कुछ गूँजता हुआ सुनाई दे, कोई गड़गड़ाहट जैसी, जलती हुई आग की सी आवाज़, वह भी उसी की है। इसी को देखा हुआ और सुना हुआ मानकर उपासना करनी चाहिए; जो ऐसा जानता है वह आँख को भाने वाला और नाम वाला होता है। जिस ज्योति को खोजने लोग लोकों के पार जाते हैं, उसका प्रमाण हथेली की गरमी और बन्द कान की गूँज में रख दिया गया।

सार: हृदय के पाँच छिद्र पाँच प्राणों, पाँच इन्द्रियों और पाँच देवताओं से जुड़े हैं, और ये पाँचों ब्रह्मपुरुष स्वर्गलोक के द्वारपाल हैं। इसी खण्ड में द्युलोक के पार चमकती ज्योति को भीतर की ज्योति कहा गया, और उसे पहचानने के दो चिह्न दिए गए: शरीर को छूने पर मिलने वाली गरमी, और कान बन्द करने पर सुनाई देती आग जैसी गूँज।

शाण्डिल्य-विद्या: सर्वं खल्विदं ब्रह्म (खण्ड 14)

ध्यान में बैठे शाण्डिल्य, हृदय के भीतर जलती एक नन्ही लौ, चारों ओर गहरा शान्त अँधेरा और भोर की हल्की आभा
हृदय के भीतर वह लौ, जो सरसों से छोटी और लोकों से बड़ी है।

चौदहवाँ खण्ड छोटा है, चार मन्त्रों का, और छान्दोग्य में सबसे ज़्यादा दोहराई जाने वाली पंक्तियों में से एक इसी में है। “सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत”, यह सब निश्चय ही ब्रह्म है, इसी से जन्मा, इसी में लीन होता, इसी में साँस लेता; इसलिए शान्त होकर उसकी उपासना करे। तीन क्रियाएँ एक ही शब्द में बाँध दी गई हैं, निकलना, लौटना, और बीच में चलते रहना। और उपासना की शर्त एक ही रखी गई, शान्ति। जो भीतर हिल रहा हो, वह इस वाक्य को दोहरा तो सकता है, बरत नहीं सकता।

अगली ही साँस में शाण्डिल्य एक ऐसी बात कहते हैं जो पूरे जीवन का हिसाब बदल देती है। यह पुरुष क्रतुमय है, संकल्प का बना हुआ। इस लोक में मनुष्य जैसा संकल्प रखता है, यहाँ से जाकर वैसा ही हो जाता है। इसलिए उसे संकल्प करना चाहिए। यह कर्म से बड़ी बात कही गई है, क्योंकि कर्म बाहर दिखता है और संकल्प भीतर पकता है। जिस चीज़ की ओर मन लगातार लौटता है, वही धीरे-धीरे उस आदमी की बनावट बन जाती है, और वही आगे लेकर जाती है।

अब शाण्डिल्य उस आत्मा का वर्णन करते हैं, और वर्णन विशेषणों की एक लड़ी है जो साँस नहीं लेने देती। वह मन से बना है, प्राण जिसका शरीर है, प्रकाश जिसका रूप है, जिसका संकल्प सत्य होता है, आकाश जिसका स्वरूप है, जो सारे कर्म वाला है, सारी कामनाओं वाला, सारी गन्धों वाला, सारे रसों वाला; इस सब में व्याप्त, और फिर भी चुप, और फिर भी किसी माँग के बिना। सब कुछ अपने में समेटे हुए और कुछ भी माँगे बिना, यह जोड़ ही शाण्डिल्य की पहचान है।

और फिर वह वाक्य जो चित्र बनकर मन में बैठ जाता है। यह जो मेरा आत्मा है, हृदय के भीतर, यह चावल के दाने से छोटा है, जौ से छोटा, सरसों से छोटा, साँवाँ से छोटा, साँवाँ के भीतर के दाने से भी छोटा। “अणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद्वा”, और छोटेपन की यह सीढ़ी रुकती नहीं, हर पायदान पर दाना और महीन होता जाता है। फिर उसी साँस में वह पलट जाती है: यही मेरा आत्मा, हृदय के भीतर, पृथ्वी से बड़ा है, अन्तरिक्ष से बड़ा, द्युलोक से बड़ा, इन सारे लोकों से बड़ा।

खण्ड का अन्त एक प्रतिज्ञा है। यही ब्रह्म है; यहाँ से जाकर मैं यही हो जाऊँगा। और जिसके भीतर यह बात पक्की तरह बैठ जाए, उसके लिए कोई सन्देह बचता ही नहीं। ऐसा शाण्डिल्य ने कहा, शाण्डिल्य ने। नाम दो बार लिखा गया है, जैसे परम्परा ने इस पर मुहर लगाई हो। इसी दोहराव के कारण यह चार मन्त्रों का खण्ड एक स्वतन्त्र विद्या बन गया, और आगे चलकर वेदान्त की बहसों में बार-बार इसी पर लौटा गया।

एक बात यहाँ ध्यान देने लायक़ है। शाण्डिल्य यह नहीं कहते कि आत्मा को खोजना है। वह कहते हैं, यह मेरा आत्मा है, हृदय के भीतर, और यहाँ से जाकर मैं यही हो जाऊँगा। भाषा पाने वाले की नहीं, पहचानने वाले की है। यही कारण है कि यह खण्ड उपासना की सूची में होते हुए भी सूची से ऊपर उठ जाता है: यहाँ उपासक और उपास्य के बीच की दूरी घटते-घटते सिर्फ़ एक स्वीकार भर रह जाती है।

सार: यह सब ब्रह्म है, इसी से जन्मा और इसी में लीन; शान्त होकर उसकी उपासना करनी चाहिए। मनुष्य संकल्प का बना है, और जैसा संकल्प, वैसा ही वह आगे होता है। हृदय के भीतर बैठा आत्मा सरसों के दाने से छोटा और सारे लोकों से बड़ा है; यहाँ से जाकर मैं वही हो जाऊँगा, यह जिसके भीतर बैठ जाए उसे कोई सन्देह नहीं रहता।

वसुधान कोश और दिशाओं का बछड़ा (खण्ड 15)

पन्द्रहवाँ खण्ड एक सन्दूक खोलता है। उसका पेट अन्तरिक्ष है, उसका पेंदा पृथ्वी है, और वह कभी जीर्ण नहीं होता। दिशाएँ उसके कोने हैं और द्युलोक उसका ऊपरी मुँह है। यही वह कोश है जिसे वसुधान कहते हैं, धन रखने वाला, और इसी में यह सारा विश्व रखा हुआ है। सन्दूक का रूपक यहाँ इसलिए सटीक है कि सन्दूक बाहर से एक दिखता है और भीतर से बहुत कुछ निकलता है, और उसकी असली क़ीमत उसकी लकड़ी में नहीं, उसके भरे होने में है।

फिर दिशाओं के नाम आते हैं, और ये नाम रोज़मर्रा के नहीं हैं। पूरब का नाम जुहू है, वह करछी जिससे यज्ञ में आहुति डाली जाती है। दक्षिण का नाम सहमाना है, सहने वाली। पश्चिम का नाम राज्ञी है, रानी। उत्तर का नाम सुभूता है, जो अच्छी तरह हुई हो। चारों दिशाएँ यहाँ गायें बन जाती हैं, और वायु उनका बछड़ा है। जो इस वायु को दिशाओं का बछड़ा जान ले, वह पुत्र के लिए रोने वाला रोना नहीं रोता।

और फिर उपनिषद् एक बहुत निजी वाक्य कहता है, पहले पुरुष में। मैं इस वायु को दिशाओं का बछड़ा इस तरह जानता हूँ, “मा पुत्ररोदꣳरुदम्”, मुझे पुत्र के लिए रोना न पड़े। पूरे अध्याय में यह अकेला मौक़ा है जहाँ कहने वाला अपनी आवाज़ में उतर आता है और एक डर का नाम लेता है। सन्तान का शोक उन दिनों की सबसे बड़ी चोट थी, और यह विद्या उस चोट के सामने रखी जा रही है। ज्ञान यहाँ ऊँचाई नहीं दे रहा, वह एक ढाल की तरह आगे किया जा रहा है।

बाक़ी खण्ड एक प्रार्थना-सूत्र है, जिसे बोलते हुए साधक बार-बार कहता है कि मैं इस अरिष्ट कोश की शरण लेता हूँ, इससे, इससे, इससे; मैं प्राण की शरण लेता हूँ; मैं भूः की, भुवः की, स्वः की शरण लेता हूँ। और फिर वह स्वयं ही खोलता है कि उसने क्या कहा। प्राण की शरण का अर्थ यह था कि प्राण ही यह सब कुछ है। भूः की शरण का अर्थ पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक की शरण। भुवः का अर्थ अग्नि, वायु और आदित्य। और स्वः का अर्थ ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद।

यह आत्म-व्याख्या इस खण्ड की सबसे सुन्दर चीज़ है। मन्त्र बोलने वाला रुककर बताता है कि उसके शब्दों के भीतर क्या भरा था, जैसे कोई अपनी ही गाँठ अपने सामने खोलकर दिखा दे। तीन व्याहृतियाँ, जो हर सन्ध्या में लाखों बार दोहराई जाती हैं, यहाँ नौ चीज़ों में खुल जाती हैं, और कोश की तस्वीर पूरी हो जाती है: लोक, देवता और वेद, तीनों उसी सन्दूक में रखे हैं जिसका पेंदा पृथ्वी और मुँह आकाश है।

सार: विश्व एक ऐसा सन्दूक है जिसका पेट अन्तरिक्ष, पेंदा पृथ्वी, कोने दिशाएँ और ऊपरी मुँह द्युलोक है, और जो कभी जीर्ण नहीं होता। चारों दिशाएँ जुहू, सहमाना, राज्ञी और सुभूता हैं, वायु उनका बछड़ा; जो यह जान ले वह पुत्र-शोक का रोना नहीं रोता। शरण-सूत्र में भूः, भुवः और स्वः तीन लोकों, तीन देवताओं और तीन वेदों में खुलते हैं।

पुरुष ही यज्ञ है: महिदास की आयु और घोर आङ्गिरस का उपदेश (खण्ड 16 और 17)

सोलहवाँ खण्ड एक वाक्य में पूरे जीवन को यज्ञशाला बना देता है: “पुरुषो वाव यज्ञः”, यह मनुष्य ही यज्ञ है। और फिर हिसाब शुरू होता है। उसके पहले चौबीस वर्ष प्रातःसवन हैं, सुबह वाला सोम-पेषण, क्योंकि गायत्री चौबीस अक्षरों की होती है और प्रातःसवन गायत्री का होता है। इस सवन के साथ वसु जुड़े हैं, और वसु कौन हैं, तो प्राण ही वसु हैं, क्योंकि वे ही इस सबको बसाते हैं। एक ही सूत्र में छन्द, आयु, देवता और शरीर की साँस, चारों एक धागे में पिरो दिए गए।

फिर एक व्यावहारिक बात आती है, जो इस अध्याय को अचानक बहुत क़रीब ले आती है। अगर इसी उम्र में उसे कुछ कष्ट हो, कोई रोग तपाने लगे, तो वह कहे: हे प्राणो, हे वसुओ, मेरे इस प्रातःसवन को माध्यन्दिन सवन तक खींच दीजिए; मैं यज्ञ हूँ, प्राणों और वसुओं के बीच यह यज्ञ बीच में टूटे नहीं। उपनिषद् कहता है कि वह उस कष्ट से उठ जाता है और नीरोग हो जाता है। बीमार आदमी के मुँह में यहाँ कोई गिड़गिड़ाहट नहीं रखी गई, एक याद दिलाना रखा गया, कि जो चल रहा है वह अधूरा नहीं छूटना चाहिए।

इसके बाद के चवालीस वर्ष माध्यन्दिन सवन हैं, क्योंकि त्रिष्टुप् चवालीस अक्षरों का होता है, और इस सवन के साथ रुद्र जुड़े हैं; प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि वे ही इस सबको रुलाते हैं। और उसके बाद के अड़तालीस वर्ष तृतीय सवन हैं, क्योंकि जगती अड़तालीस अक्षरों की होती है, और इसके साथ आदित्य जुड़े हैं; प्राण ही आदित्य हैं, क्योंकि वे ही इस सबको ग्रहण करते हैं। हर सवन में वही प्रार्थना दोहराई जाती है, बस अगला पड़ाव बदल जाता है, और तीसरे में वह पूरी आयु तक खींचने की होती है।

चौबीस, चवालीस और अड़तालीस जोड़िए तो एक सौ सोलह वर्ष बनते हैं, और खण्ड के अन्त में यही आयु एक आदमी की कथा बनकर आती है। यह जानने वाले महिदास ऐतरेय ने अपने रोग से कहा था, हे रोग, आप मुझे क्यों तपा रहे हैं, मैं तो इससे मरने वाला नहीं। और वह एक सौ सोलह वर्ष जिए। उपनिषद् जोड़ता है कि जो यह इस तरह जान ले, वह भी एक सौ सोलह वर्ष जीता है। रोग से सीधा सम्बोधन, और उसमें कोई घबराहट नहीं, यह चित्र इस अध्याय का सबसे मानवीय चित्र है।

सत्रहवाँ खण्ड इसी यज्ञ-रूपक को बारीकी में ले जाता है, और यहाँ रूपक रोज़ के जीवन पर बैठ जाता है। जब मनुष्य को भूख लगती है, प्यास लगती है, जब उसका मन किसी चीज़ में नहीं रमता, वे उसकी दीक्षाएँ हैं, यज्ञ से पहले का वह कठिन व्रत। जब वह खाता है, पीता है, रमता है, तब वह उपसदों के साथ चलता है। जब वह हँसता है, खाता है, मैथुन करता है, तब वह स्तुति और शस्त्र के साथ चलता है। और जो तप, दान, सरलता, अहिंसा और सत्य बोलना है, वे उसकी दक्षिणाएँ हैं।

इसीलिए, उपनिषद् कहता है, लोग जन्म के लिए सोष्यति और असोष्ट जैसे शब्द बोलते हैं; उसका फिर से उत्पन्न होना ही उसका पुनर्जन्म-संस्कार है, और उसका मरण ही उसका अवभृथ है, यज्ञ के अन्त का वह स्नान जिसके बाद यजमान घर लौटता है। मृत्यु को यहाँ यज्ञ की समाप्ति का स्नान कहा गया, न कि दुर्घटना। जिसने पूरा जीवन यज्ञ मान लिया, उसके लिए अन्तिम दिन भी विधि का ही एक अंग है, कोई बाहरी चीज़ नहीं जो अचानक आकर सब तोड़ दे।

और यहीं, इसी खण्ड के छठे मन्त्र में, वह वाक्य आता है जिस पर बाद की सदियों ने बहुत कुछ टिकाया। मूल इतना ही कहता है: यही बात घोर आङ्गिरस ने देवकी के पुत्र कृष्ण से कहकर आगे कहा, और वह निष्प्यास ही हो गया, उसकी प्यास ही जाती रही। इसके सिवा यहाँ कृष्ण देवकीपुत्र के बारे में कुछ नहीं है, न कोई जन्म-कथा, न कोई स्थान, न कोई और प्रसंग। एक गुरु का नाम, एक शिष्य का नाम, और उपदेश का एक परिणाम, बस इतना ही इस उपनिषद् के हाथ में है।

उपदेश का बाक़ी हिस्सा भी वहीं रखा है। अन्तिम वेला में साधक इन तीन वाक्यों की शरण ले: “अक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसꣳशितमसि”, आप अक्षय हैं, आप अच्युत हैं, आप प्राण की तीक्ष्ण धार हैं। और फिर दो ऋचाएँ आती हैं, जिनमें से दूसरी इस अध्याय का अन्तिम स्वर तय कर देती है: अन्धकार के पार ऊपर उठती ज्योति को देखते हुए, उस उत्तम को देखते हुए, देवों में देव सूर्य के पास हम पहुँचे, उस सर्वोत्तम ज्योति तक। जो अध्याय सूर्य को छत्ता कहकर शुरू हुआ था, वह यहाँ सूर्य को ज्योति कहकर विदा लेता है।

सार: मनुष्य ही यज्ञ है; उसके चौबीस, चवालीस और अड़तालीस वर्ष तीन सवन हैं, जिनसे गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती तथा वसु, रुद्र और आदित्य जुड़े हैं, और बीमारी में वह प्राणों से अपना सवन आगे खींचने की प्रार्थना करता है। भूख और तृप्ति, हँसी और संयम, सब यज्ञ के अंग हैं, और मरण उसका अवभृथ स्नान। यही उपदेश घोर आङ्गिरस ने कृष्ण देवकीपुत्र से कहा, और उनकी प्यास जाती रही।

मन और आकाश, और असत् से उगा हुआ सूर्य (खण्ड 18 और 19)

अठारहवाँ खण्ड दो आदेश एक साथ देता है। मन को ब्रह्म मानकर उपासना करे, यह अध्यात्म की ओर से; और आकाश को ब्रह्म मानकर उपासना करे, यह अधिदैवत की ओर से। दोनों पक्ष एक साथ दिखा दिए गए, भीतर वाला और बाहर वाला, ताकि उपासक किसी एक किनारे पर अटककर न रह जाए। छान्दोग्य की यह आदत तीसरे अध्याय में बार-बार दिखती है: जो भी कहा जाए, उसका एक सिरा शरीर में गड़ा हो और दूसरा ब्रह्माण्ड में।

फिर यह ब्रह्म चार पैरों वाला बताया जाता है। अध्यात्म की ओर से वाणी एक पाद है, प्राण एक पाद, आँख एक पाद, कान एक पाद। अधिदैवत की ओर से अग्नि एक पाद, वायु एक पाद, आदित्य एक पाद, दिशाएँ एक पाद। दोनों सूचियाँ आमने-सामने रखी गई हैं, और हर जोड़ी अपने आप बन जाती है, वाणी के सामने अग्नि, प्राण के सामने वायु, आँख के सामने सूर्य, कान के सामने दिशाएँ। जो भीतर काम कर रहा है, उसका एक साथी बाहर बैठा है।

इसके बाद हर पाद पर एक ही वाक्य दोहराया जाता है, और उस दोहराव में एक वादा छिपा है। वाणी ही ब्रह्म का चौथा पाद है; वह अग्नि रूपी ज्योति से चमकती भी है और तपती भी है; और जो यह जानता है, वह भी कीर्ति, यश और ब्रह्मतेज से चमकता और तपता है। यही बात प्राण के लिए वायु के साथ कही जाती है, आँख के लिए आदित्य के साथ, और कान के लिए दिशाओं के साथ। चमकना और तपना, दोनों क्रियाएँ हर बार साथ आती हैं, क्योंकि जो सिर्फ़ चमके वह दिखता है, और जो तपे वह बदलता भी है।

और फिर उन्नीसवाँ खण्ड आता है, इस अध्याय का आख़िरी दरवाज़ा, जो सीधे सृष्टि की ओर खुलता है। आदेश यह है कि आदित्य को ब्रह्म मानकर उपासना की जाए, और उसकी व्याख्या एक कथा से होती है। शुरुआत में यह असत् ही था, जो अभी कुछ हुआ नहीं था। वही सत् हुआ। वह बढ़ा। वह एक अण्डा बन गया। वह अण्डा एक वर्ष की अवधि तक पड़ा रहा। फिर वह फूटा। और अण्डे के दो कपाल निकले, एक चाँदी का और एक सोने का।

अब कथा एक-एक टुकड़े को नाम देती जाती है, और सुनने वाले के सामने संसार खड़ा हो जाता है। जो चाँदी का कपाल था, वह यह पृथ्वी है। जो सोने का था, वह द्युलोक है। जो बाहरी झिल्ली थी, वे पर्वत हैं। जो भीतरी झिल्ली थी, वह बादल और कुहरा है। जो नसें थीं, वे नदियाँ हैं। और जो भीतर भरा हुआ जल था, वह समुद्र है। अण्डे का कोई हिस्सा बेकार नहीं गया; शरीर के भूगोल से पृथ्वी का भूगोल बना दिया गया।

और फिर उस अण्डे से जो जन्मा, वही यह आदित्य है। उसके जन्म के समय चारों ओर हर्ष की ध्वनियाँ और उल्लू-ध्वनियाँ उठीं, और सारे प्राणी उठ खड़े हुए, और सारी कामनाएँ भी। इसीलिए, उपनिषद् कहता है, आज भी उसके उगने पर और उसके लौटने पर वैसी ही ध्वनियाँ उठती हैं, और सारे प्राणी और सारी कामनाएँ उठ खड़े होते हैं। सुबह की चहचहाहट यहाँ कोई साधारण आवाज़ नहीं रह जाती, वह पहले सूर्योदय की गूँज है जो रोज़ दोहराई जाती है।

अध्याय का अन्तिम वाक्य एक कोमल आशीर्वाद है। जो इस तरह जानकर आदित्य की ब्रह्म-रूप में उपासना करता है, उसके पास अच्छी ध्वनियाँ आने और उसे सुख देने की सम्भावना बनी रहती है। उन्नीस खण्डों में जो सूर्य देवों का छत्ता था, फिर पाँच अमृतों का पात्र, फिर वह ज्योति जो न उगती न डूबती, वह अन्त में एक ऐसा देवता बनकर खड़ा है जिसकी उपासना का फल कानों तक पहुँचने वाली मीठी आवाज़ है।

सार: मन को ब्रह्म मानकर भीतर से और आकाश को ब्रह्म मानकर बाहर से उपासना करनी चाहिए; यह ब्रह्म चार पाद वाला है, वाणी, प्राण, आँख और कान, जिनके साथी अग्नि, वायु, आदित्य और दिशाएँ हैं। अन्तिम खण्ड में असत् से सत् होता है, सत् से अण्डा, अण्डे के दो कपालों से पृथ्वी और द्युलोक, और उससे जन्मा सूर्य, जिसके उदय पर आज भी सारे प्राणी और सारी कामनाएँ उठ खड़े होते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस अध्याय की सबसे काम की चीज़ शायद वह तराज़ू है जो पाँचवें खण्ड के अन्त में रखा है, रसों का रस। हम सब कुछ न कुछ इकट्ठा करते रहते हैं, पढ़ा हुआ, सुना हुआ, देखा हुआ। वह सब रस है। पर मधु तब बनता है जब कोई एक चीज़ हमारे भीतर देर तक तपती रहे। जिस पंक्ति पर हम वर्षों लौटते हैं, जिस काम को हम बिना गिनती के करते रहते हैं, जिस व्यक्ति के पास हम बार-बार बैठते हैं, वहीं से वह निकलता है जिसे यह उपनिषद् रस का रस कहता है। बाक़ी सब जमा रहता है, यही बहता है।

दूसरी चीज़ शाण्डिल्य का वह वाक्य है कि मनुष्य संकल्प का बना हुआ है, और जैसा संकल्प वैसा वह आगे होता है। इसे किसी दूर के हिसाब-किताब की तरह पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। आज रात सोने से पहले जिस चीज़ की ओर हमारा मन अपने आप लौटता है, कल सुबह की हमारी बनावट उसी से थोड़ी सी बदल चुकी होगी। और उसी शाण्डिल्य ने यह भी बता दिया कि जिसकी उपासना करनी है वह कहीं दूर नहीं मिलेगा, वह हृदय के भीतर है, सरसों के दाने से छोटा और सारे लोकों से बड़ा, दोनों बातें एक साथ सच हैं।

और तीसरी चीज़, जो शायद सबसे सीधी है। तेरहवें खण्ड ने भीतर की ज्योति के दो प्रमाण दिए थे, हथेली के नीचे शरीर की गरमी और कान बन्द करने पर उठती गूँज। दोनों इसी क्षण जाँचे जा सकते हैं, बिना किसी तैयारी के, बिना किसी की अनुमति के। और सोलहवें खण्ड ने बता दिया कि हमारा जीवन पहले से एक यज्ञ है, उसकी दीक्षा भूख है, उसकी दक्षिणा सत्य बोलना और किसी को न सताना है, और उसका अन्तिम स्नान वह दिन है जो कभी आएगा। यह उपनिषद् हमसे कोई नई साधना शुरू करने को नहीं कहता, वह उस साधना का नाम बता देता है जो चल ही रही है।

आधार: छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 3, खण्ड 1 से 19; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।