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उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

अध्याय 2: साम के पाँच और सात टुकड़े

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सामवेद · छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय 2
चौबीस खण्डों में यह अध्याय गान के पाँच और सात टुकड़ों को धरती, वर्षा, ऋतु, पशु, प्राण और सूर्य पर बिछाकर दिखाता है।

यज्ञशाला में तीनों अग्नियाँ जग चुकी हैं। ऋचा पढ़ी जा चुकी है, अब गान की बारी है। तीन गायक कुश की चटाइयों पर बैठे हैं, गले साफ़, आँखें आधी मुँदी। सबसे पहले एक हल्की-सी गूँज उठती है, हुम्, जैसे कोई भारी दरवाज़ा खुलने से पहले अपनी चूल पर ज़रा हिला हो। फिर प्रस्तोता स्वर उठाता है और गान के लिए रास्ता बिछा देता है। उसी बिछे रास्ते पर उद्गाता ओ३म् कहकर सबसे ऊँचा हिस्सा चढ़ाता है। प्रतिहर्ता उसे बीच से थाम लेता है, और अन्त में तीनों एक साथ उतरकर गान को धीरे से ज़मीन पर रख देते हैं। पाँच टुकड़े, एक ही साँस की तरह आपस में जुड़े हुए।

छान्दोग्य उपनिषद् का पहला अध्याय एक ही अक्षर पर टिका था, ॐ, जिसे वहाँ उद्गीथ कहकर उपासा गया। दूसरा अध्याय उस एक अक्षर से हटकर पूरे गान पर आता है, समस्त साम पर, और चौबीस खण्डों में एक ही अभ्यास बार-बार कराता है: गान के टुकड़ों को संसार के टुकड़ों पर बिठाना। यहाँ कोई गुरु-शिष्य का संवाद नहीं है, कोई राजा का दरबार नहीं, कोई भूखा ब्राह्मण नहीं। यहाँ एक हुनर है, और वह हुनर यह है कि गाने वाला जिस ढाँचे को अपने गले में रोज़ बरतता है, उसी ढाँचे से दुनिया को पढ़ना सीख ले। इसी वजह से यह पूरे उपनिषद् का सबसे सूखा हिस्सा माना जाता है, और इसी वजह से यह सबसे बारीक भी है।

इस अध्याय के मुख्य किरदार

उद्गाता: वह ऋत्विक् जो ॐ से गान का सबसे ऊँचा हिस्सा उठाता है, और जिसके आगे-पीछे बाक़ी सारे टुकड़े सजते हैं।

प्रस्तोता और प्रतिहर्ता: दो साथी गायक, एक गान का रास्ता बिछाता है, दूसरा उसे बीच में थामकर लौटाता है।

साम के सात अंग: हिंकार, प्रस्ताव, आदि, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव और निधन, इस पूरे अध्याय के असली किरदार यही हैं।

प्रजापति: जिनके तप से तीनों विद्याएँ निकलीं, उनसे भूः भुवः स्वः, और उन तीन से ॐ।

यजमान: वह गृहस्थ जिसके ख़र्च और संकल्प पर यज्ञ खड़ा होता है, और जो चौबीसवें खण्ड में अपना छूटा हुआ लोक माँगता है।

वसु, रुद्र, आदित्य और विश्वेदेव: तीनों सवनों के स्वामी, जो जानकार यजमान को उसका हिस्सा अपने हाथ से सौंप देते हैं।

साधु ही साम है: गान के नाम में छिपा हुआ अर्थ (खण्ड 1)

अध्याय अपनी पहली ही पंक्ति में एक बड़ी बात बहुत सादगी से रख देता है। पूरे साम की उपासना भली है, और भला जो कुछ है उसी को लोग साम कहते हैं। “यत्खलु साधु तत्सामेत्याचक्षते” (जो सचमुच भला है, उसी को साम कहते हैं), और जो भला नहीं, उसे असाम कहते हैं। यह कोई दार्शनिक दावा नहीं जिसे सिद्ध करना पड़े; यह उस ज़माने की रोज़मर्रा की ज़बान से उठाया गया सबूत है। जिस समाज में गान इतना गहरा उतर चुका हो कि भलाई और गान के लिए एक ही शब्द चल पड़े, उस समाज के लिए यह वाक्य एक याददिहानी भर है।

उपनिषद् इसके बाद बोलचाल के दो मुहावरे गिनाता है। लोग कहते हैं, फ़लाँ आदमी उसके पास साम लेकर गया, और उनका मतलब होता है कि वह भलमनसाहत लेकर गया। और कहते हैं, वह उसके पास असाम लेकर गया, तो मतलब होता है कि वह बदनीयती लेकर गया। दूसरा मुहावरा और भी घरेलू है। कोई अच्छी बात हो जाए तो मुँह से निकलता है, वाह, साम हुआ, यानी वाह, भला हुआ। कोई बुरी बात हो जाए तो निकलता है, हाय, असाम हुआ, यानी हाय, बुरा हुआ। भाषा ने भलाई और सुर को एक ही खूँटी पर टाँग रखा है।

यह इत्तिफ़ाक़ नहीं है। साम का काम ही जोड़ना है। जिस गान में सात गले अलग-अलग हिस्से गाते हैं और फिर भी एक ही चीज़ बनती है, उसमें कोई एक भी स्वर अपनी जगह से हिल जाए तो सब बिखर जाता है। ठीक वैसे ही भलाई भी एक तरह का मिलान है, अपने और दूसरे के बीच का, कहे और किए के बीच का, इरादे और नतीजे के बीच का। जहाँ यह मिलान टूटता है, वहाँ जीवन बेसुरा हो जाता है, और बेसुरेपन को हम कड़वाहट कहते हैं, बेईमानी कहते हैं, टूटन कहते हैं।

खण्ड अपना फल भी बता देता है। जो इसे इस तरह जानकर उपासना करता है, उसके पास भले धर्म अपने-आप आने लगते हैं, और सिर झुकाकर आते हैं। शब्द है अभ्याश, यानी यह बहुत सम्भव है, यह पास ही खड़ा है। उपनिषद् यह नहीं कहता कि आकाश से कुछ बरसेगा। वह इतना कहता है कि जिसके भीतर यह पहचान बैठ गई कि भला होना और सुर में होना एक ही बात है, उसके आस-पास भलाई अपने-आप जुटने लगती है, जैसे तानपूरे के खुले तार पास बजते सुर के साथ अपने-आप गूँजने लगते हैं।

सार: पूरा अध्याय इसी एक नींव पर खड़ा है कि साम और साधु एक ही चीज़ के दो नाम हैं। गान का ढाँचा बाहर की कोई कारीगरी नहीं, वह भलाई का ही आकार है। इसलिए आगे जो चौबीस उपासनाएँ आएँगी, वे सब असल में यही सिखा रही हैं कि दुनिया को बिखरे टुकड़ों की तरह नहीं, एक बँधे हुए गान की तरह देखना सीखिए।

पाँच टुकड़ों का गान, और उसे दुनिया पर बिछाना (खण्ड 2 से 6)

आगे बढ़ने से पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि साम है क्या। सामवेद का गायक ऋचा को पढ़ता नहीं, उस पर धुन चढ़ाता है, और वह धुन एक तय क्रम में पाँच हिस्सों में बँटी होती है। सबसे पहले हिंकार, वह गहरी गूँज जिससे गान का गला खुलता है, बिना शब्द का एक हुम्। फिर प्रस्ताव, जिसमें प्रस्तोता धुन का रास्ता बिछाता है। फिर उद्गीथ, सबसे ऊँचा और सबसे लम्बा हिस्सा, जिसे उद्गाता ॐ से शुरू करता है। फिर प्रतिहार, जिसमें प्रतिहर्ता उस ऊँचाई को थामकर वापस मोड़ता है। और अन्त में निधन, वह ठहराव जिसमें सब मिलकर गान को उतार देते हैं।

अब इस ढाँचे को ध्यान से देखिए। इसमें एक शुरुआत है, एक चढ़ाव है, एक शिखर है, एक उतार है, और एक ठहराव। यही पाँच कड़ियाँ हर उस चीज़ में मिल जाएँगी जो शुरू होती है, बढ़ती है, पूरी होती है और थमती है। गायक के लिए यह ढाँचा उसकी उँगलियों जितना जाना-पहचाना है। उपनिषद् यही जानी-पहचानी चीज़ उठाकर उसके हाथ में देता है और कहता है, अब इसी से दुनिया को नापिए। यही इस पूरे अध्याय की तरकीब है, और यही इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी।

पहली बिछावट लोकों पर है। ऊपर की ओर चढ़ते हुए पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव, अन्तरिक्ष उद्गीथ, आदित्य प्रतिहार, और द्युलोक निधन। फिर वही क्रम उलटकर उतरता है, द्युलोक हिंकार, आदित्य प्रस्ताव, अन्तरिक्ष उद्गीथ, अग्नि प्रतिहार और पृथिवी निधन। ध्यान दीजिए कि दोनों तरफ़ बीच में अन्तरिक्ष ही रहता है, उद्गीथ की जगह पर, जैसे किसी झूले की डोर का बीच का बिन्दु दोनों झोंकों में अपनी जगह नहीं छोड़ता। जो इसे इस तरह जानता है, कहा गया है कि उसके लिए दोनों तरफ़ के लोक सज जाते हैं, ऊपर चढ़ते हुए भी और नीचे उतरते हुए भी।

दूसरी बिछावट वर्षा पर है, और यहाँ ढाँचा और भी साफ़ दिखता है क्योंकि बरसात हर आदमी ने देखी है। आगे-आगे दौड़ती पुरवाई हिंकार है, वह जो धूल उठाकर ख़बर दे जाती है। बादल का बनना प्रस्ताव है। पानी का गिरना उद्गीथ है, गान का सबसे भरा हुआ हिस्सा। बिजली का चमकना और गरजना प्रतिहार है। और बादल का उठ जाना, बरसात का थम जाना, निधन है। जो इस तरह उपासना करता है, कहा गया है कि उसके लिए वर्षा होती है, और वह दूसरों के लिए वर्षा करा भी देता है।

तीसरी बिछावट सब जलों पर है। बादल का घिर आना हिंकार, उसका बरसना प्रस्ताव, पूरब की ओर बहती धाराएँ उद्गीथ, पश्चिम की ओर बहती धाराएँ प्रतिहार, और समुद्र निधन, वह जगह जहाँ हर धारा जाकर ठहर जाती है और अपना नाम छोड़ देती है। इस उपासना का फल बड़े ठोस शब्दों में रखा गया है: वह जल में मरता नहीं, वह जल वाला हो जाता है। जिसने पानी के पूरे चक्र को एक गान की तरह जान लिया, पानी उसका दुश्मन नहीं रह जाता।

चौथी बिछावट ऋतुओं पर है, और यह शायद सबसे सुन्दर है, क्योंकि साल का पहिया अपने-आप गान की शक्ल में घूमता है। “वसन्तो हिङ्कारः ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनम्” (वसन्त हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव, वर्षा उद्गीथ, शरद् प्रतिहार, हेमन्त निधन)। वसन्त में साल गला साफ़ करता है, ग्रीष्म में रास्ता बनाता है, वर्षा में अपनी पूरी आवाज़ खोलता है, शरद् में उसे थामता है, और हेमन्त में चुप हो जाता है। जो ऐसा जानता है, ऋतुएँ उसके लिए सज जाती हैं और वह ऋतुमान् हो जाता है, यानी मौसम उसके ख़िलाफ़ नहीं, उसके साथ चलते हैं।

पाँचवीं बिछावट पशुओं पर है, और यहाँ क्रम कद के हिसाब से चढ़ता है। बकरियाँ हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव, गायें उद्गीथ, घोड़े प्रतिहार, और पुरुष निधन। गायें बीच में, उद्गीथ की जगह पर, क्योंकि गोधन उस समाज की सबसे भरी हुई आवाज़ था। और आदमी अन्त में, निधन पर, वहाँ जहाँ गान ठहरता है, क्योंकि यही वह जगह है जहाँ सारा पशुधन आकर टिकता है। जो ऐसा जानता है, उसके पास पशु होते हैं और वह पशुमान् हो जाता है।

सार: पाँच खण्डों में एक ही ढाँचा पाँच जगह रखकर देखा गया है, लोक, वर्षा, जल, ऋतु और पशु। हर बार वही पाँच कड़ियाँ निकल आती हैं, शुरुआत, चढ़ाव, शिखर, उतार, ठहराव। उपासना का असली काम कोई जादू नहीं, यह आदत डालना है कि जो भी सामने आए, उसे बिखरी घटनाओं की जगह एक पूरे गान की तरह सुना जाए।

प्राणों में परोवरीय साम: भीतर की सीढ़ी (खण्ड 7)

अब तक जो कुछ बिछाया गया था, वह सब बाहर था। सातवाँ खण्ड पहली बार भीतर मुड़ता है और इसी पाँच टुकड़ों वाले गान को प्राणों पर रखता है, यानी उन इन्द्रियों पर जिनसे हम दुनिया से जुड़ते हैं। “प्राणो हिङ्कारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः” (प्राण हिंकार है, वाणी प्रस्ताव, आँख उद्गीथ), और आगे कान प्रतिहार है और मन निधन। पर यहाँ एक शब्द जुड़ जाता है जो पहले नहीं था, परोवरीयस्, यानी एक से बढ़कर एक, ऊपर और ऊपर।

इस शब्द का मतलब समझिए। साँस चलती है, यह सबसे नीची सीढ़ी है, हर जीव में है। वाणी साँस से ऊपर है, क्योंकि वह साँस को अर्थ में ढाल देती है। आँख वाणी से ऊपर है, क्योंकि वह एक ही पल में वह सब पकड़ लेती है जिसे कहने में घण्टों लगें। कान आँख से ऊपर है, क्योंकि वह अँधेरे में भी काम करता है और पीठ पीछे से भी ख़बर लाता है। और मन सबसे ऊपर है, क्योंकि बाक़ी चारों जो भी लाते हैं, वह मन तक पहुँचकर ही कुछ बनता है। पाँचों एक लाइन में नहीं खड़े, वे एक सीढ़ी बनाते हैं।

यही इस खण्ड की ख़ास बात है। पहले की बिछावटों में क्रम बाहर की चीज़ों का था, ऊपर से नीचे या पहले से बाद में। यहाँ क्रम भीतर की गहराई का है। और इसीलिए फल भी उसी शक्ल का है: जो इसे जानता है, उसका अपना जीवन एक से बढ़कर एक होता चला जाता है, और वह ऊँचे से ऊँचे लोक जीतता जाता है। सीढ़ी को सीढ़ी की तरह पहचान लेना ही ऊपर चढ़ने की पहली शर्त है। इसके बाद उपनिषद् एक पंक्ति में पाँच टुकड़ों वाला हिस्सा बन्द कर देता है और सात टुकड़ों की ओर मुड़ता है।

सार: पाँचवें अंग वाली उपासनाओं का आख़िरी क़दम बाहर से भीतर आता है। प्राण, वाणी, आँख, कान और मन को एक गान के पाँच हिस्सों की तरह जानना, और उन्हें एक चढ़ती सीढ़ी की तरह पहचानना, यही परोवरीय साम है। जो ऐसा जानता है, उसका अपना क़द भी उसी सीढ़ी पर चढ़ता जाता है।

वाणी में सात टुकड़े: बोलने का पूरा गान (खण्ड 8)

आठवें खण्ड से गिनती बदल जाती है। अब तक पाँच अंग थे, अब सात हो जाते हैं। जुड़ते क्या हैं, यह जान लेना चाहिए। प्रस्ताव के बाद एक हिस्सा और आता है, आदि, यानी वह पहला खुला स्वर जिससे धुन अपना असली शरीर पाती है। और प्रतिहार के बाद एक और आता है, उपद्रव, यानी वह हिस्सा जिसमें उद्गाता एक बार फिर ऊपर की ओर दौड़ लगाता है, इससे पहले कि सब मिलकर निधन पर उतरें। तो पूरा क्रम बनता है हिंकार, प्रस्ताव, आदि, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव, निधन।

यह सात वाला गान वाणी पर बिछाया गया है, और बिछावट का ढंग बिलकुल अनोखा है। यहाँ चीज़ें नहीं, आवाज़ें बिछाई गई हैं। बोलने में वाणी का जो कुछ हुम् जैसा है, वह हिंकार है। जो प्र जैसा है, वह प्रस्ताव है। जो अ जैसा है, वह आदि है। जो उद् जैसा है, वह उद्गीथ है। जो प्रति जैसा है, वह प्रतिहार है। जो उप जैसा है, वह उपद्रव है। और जो नि जैसा है, वह निधन है।

ग़ौर कीजिए, ये सातों गान के हिस्सों के नाम के ही पहले टुकड़े हैं। प्र से प्रस्ताव, उद् से उद्गीथ, प्रति से प्रतिहार, उप से उपद्रव, नि से निधन। यानी बोली में जब-जब ये उपसर्ग आते हैं, तब-तब मानो गान के हिस्से ही ज़बान पर आ बैठते हैं। हमारी रोज़ की भाषा उन्हीं ईंटों से बनी है जिनसे साम बना है। यह बात बहुत बारीक है और बहुत ठोस भी: बोलना अपने-आप में एक गान है, और जो इसे जान ले, उसके लिए बोलना एक विधि बन जाता है।

फल भी वाणी के ही रंग का है। कहा गया है कि उसके लिए वाणी अपना दूध दे देती है, जो कुछ वाणी में दूध जैसा है वह उसे मिल जाता है, और वह अन्नवान् तथा अन्नाद हो जाता है, यानी अन्न वाला और अन्न को पचा लेने वाला। पुरानी भाषा में यह कहने का ढंग था कि वाणी उसके लिए बाँझ नहीं रहती, वह जो बोलता है, वह फलता है। जिस आदमी की बात में सुर है, उसकी बात का असर भी है, और असर से रोटी भी आती है।

सार: सात अंगों वाला साम आदि और उपद्रव को जोड़कर बनता है, और उसकी पहली बिछावट ख़ुद वाणी पर है। हमारे उपसर्ग ही गान के हिस्सों के नाम हैं, इसलिए हर वाक्य में एक छोटा साम छिपा हुआ है। जो इसे पहचानकर बोलता है, उसकी वाणी उसे अन्न तक ले जाती है।

सूर्य का पूरा दिन, सात हिस्सों में (खण्ड 9)

नवाँ खण्ड इस अध्याय का सबसे सधा हुआ चित्र है। यहाँ सात अंगों वाला साम उस सूर्य पर बिछाया गया है, और बिछाने से पहले उपनिषद् नाम का कारण बताता है। सूर्य हमेशा एक-सा रहता है, इसलिए वह सम है, इसलिए साम है। और वह हर किसी की ओर एक-सा है; जो भी उसे देखे, उसे लगता है कि वह मेरी ओर है, मेरी ओर है। जिसका सबके साथ एक ही बरताव हो, वही सम है, और सम ही साम है। इसके बाद कहा गया है कि ये सारे प्राणी उसी पर टिके हुए हैं।

अब दिन बँटता है। सूर्य निकलने से पहले का वक़्त हिंकार है, वह सुरमई घड़ी जब उजाला अभी सिर्फ़ इशारा है। इस हिस्से पर पशु टिके हैं, और इसीलिए उसी घड़ी वे हुँकारते हैं, गोशाला में पहली रँभाहट उसी अँधेरे में उठती है। पहला उजाला फूटते ही प्रस्ताव शुरू होता है, और उस पर मनुष्य टिके हैं; इसीलिए आदमी की भूख यही रहती है कि उसका नाम लिया जाए, उसकी तारीफ़ हो, उसका ज़िक्र छिड़े। दिन का पहला हिस्सा और आदमी का पहला स्वभाव, दोनों एक ही जगह पर बैठे हैं।

फिर सङ्गव की बेला आती है, वह मध्य-प्रातः जब गायें चरने के लिए इकट्ठी होती हैं। यह आदि है, और इस पर पक्षी टिके हैं। इसीलिए वे आकाश में बिना किसी सहारे के, अपने ही बल पर अपने को थामे हुए उड़ते रहते हैं। दोपहर उद्गीथ है, दिन का सबसे ऊँचा और सबसे भरा हुआ हिस्सा, और इस पर देव टिके हैं; इसीलिए प्रजापति की सन्तानों में वे सबसे भले माने जाते हैं। गान का शिखर और दिन का शिखर, दोनों पर वही बैठे हैं जो सबसे ऊपर हैं।

दोपहर ढलने के बाद और तीसरे पहर से पहले का समय प्रतिहार है, और इस पर दर्भ टिके हैं। इसीलिए वे बटोरे हुए से बने रहते हैं, बिखरकर गिरते नहीं। तीसरे पहर के बाद और सूरज डूबने से पहले का समय उपद्रव है, और इस पर जंगली जानवर टिके हैं। इसीलिए उसी घड़ी, आदमी को देखते ही, वे झाड़ी की ओर या किसी बिल की ओर दौड़ पड़ते हैं। साँझ का वह घबराया हुआ दौड़ना, गान के उस हिस्से का नाम बन गया है जिसमें स्वर एक बार फिर ऊपर भागता है।

और जैसे ही सूर्य डूबता है, निधन आता है। इस पर पितर टिके हैं, इसीलिए उन्हें रखा जाता है, उन्हें सुलाया जाता है, उनका नाम लेकर उन्हें ठहरा दिया जाता है। इस तरह एक पूरा दिन एक पूरा गान बन जाता है, जिसकी शुरुआत मवेशियों की हुँकार से होती है और जिसका ठहराव पुरखों के नाम पर होता है। जो सूर्य को इस तरह सात अंगों वाला साम जानकर उपासता है, वह उस गान के भीतर रहने लगता है जिसे वह रोज़ अपनी आँखों के सामने बजते देखता है।

सार: सूर्य का एक दिन सात हिस्सों में बँटता है, और हर हिस्से पर एक अलग कुटुम्ब टिका है, पशु, मनुष्य, पक्षी, देव, दर्भ, वन्य जीव और पितर। यह उपासना यह सिखाती है कि सुबह से साँझ तक का वक़्त कोई सपाट पट्टी नहीं, उसमें उतार-चढ़ाव है, और हर घड़ी किसी न किसी की अपनी घड़ी है।

बाईस अक्षर और मृत्यु के पार का साम (खण्ड 10)

दसवाँ खण्ड सबसे अजीब लगता है और सबसे गहरा निकलता है। यहाँ साम को किसी बाहरी चीज़ पर नहीं बिछाया गया। यहाँ गान के सात हिस्सों के नाम ख़ुद गिन लिए गए हैं, अक्षर-दर-अक्षर। इसे कहा गया है आत्मसंमित, यानी अपने ही नाप का, और अतिमृत्यु, यानी मृत्यु के पार ले जाने वाला। बाक़ी सब उपासनाएँ आदमी को दुनिया से जोड़ती थीं। यह उसे उस सीमा के पार ले जाने का दावा करती है जिसके आगे दुनिया साथ नहीं आती।

गिनती इस तरह चलती है। हिंकार तीन अक्षर का है, प्रस्ताव भी तीन का, दोनों बराबर हो गए। आदि दो अक्षर का है और प्रतिहार चार का; प्रतिहार से एक अक्षर उधार लेकर आदि को दे दीजिए, दोनों तीन-तीन के हो गए, फिर बराबर। उद्गीथ तीन का है और उपद्रव चार का; तीन-तीन बराबर हो जाते हैं और एक अक्षर बच रहता है, उसे भी जोड़ लीजिए तो वह भी तीन ही बनता है। और निधन तीन अक्षर का है, अपने-आप बराबर। सब मिलाकर बाईस अक्षर हो जाते हैं।

यह जोड़-घटाव सिर्फ़ गिनती का खेल नहीं है। इसमें बरताव छिपा है। जिस हिस्से के पास कम था उसे उससे मिला जिसके पास ज़्यादा था, और किसी को घटाया नहीं गया, सिर्फ़ बराबर किया गया। पूरा गान इसी बराबरी पर खड़ा होता है, और यही बराबरी उसे सम बनाती है, यानी साम बनाती है। पहली पंक्ति में जो बात कही गई थी कि साधु ही साम है, वह यहाँ अक्षरों की गिनती में उतरकर दिखा दी गई है।

अब बाईस की गिनती का मर्म। कहा गया है कि इक्कीस से आदमी सूर्य तक पहुँच जाता है, क्योंकि यहाँ से गिनने पर वह सूर्य इक्कीसवाँ पड़ता है। शांकरभाष्य इस गिनती को खोलकर रखता है, बारह महीने, पाँच ऋतुएँ और तीन लोक, ये बीस हुए, और इक्कीसवाँ सूर्य। यानी इक्कीस पर आदमी वहाँ पहुँच जाता है जहाँ से आगे इस जगत् में कुछ नहीं। और बाईसवें से वह सूर्य के भी पार जीत लेता है, “तन्नाकं तद्विशोकम्” (वह नाक है, वह शोक से रहित है)। सूर्य तक पहुँचना बड़ी बात है, पर उपनिषद् एक अक्षर और रख देता है, और उसी एक अक्षर से शोक ख़त्म होता है।

खण्ड के आख़िर में कहा गया है कि ऐसा जानने वाला सूर्य की जीत पा लेता है, और उससे भी ऊपर की जीत। और फिर वाक्य दोहराया गया है, सामोपास्ते सामोपास्ते, जैसा उपनिषदों में किसी हिस्से के पूरा होने पर किया जाता है। सात अंगों वाला साम यहाँ पूरा होता है, और इसके साथ ही गान के भीतरी हिसाब का हिस्सा बन्द हो जाता है।

सार: गान के सात नामों के अक्षर गिनकर बराबर किए जाते हैं और बाईस बनते हैं। इक्कीस पर आदमी सूर्य तक पहुँचता है, और बाईसवें अक्षर से उसके पार, उस जगह जिसे शोक-रहित कहा गया है। इसी को आत्मसंमित और अतिमृत्यु साम कहा गया है, अपने ही नाप का गान, जो मृत्यु की सीमा से आगे निकल जाता है।

नाम वाले साम और उनके व्रत (खण्ड 11 से 20)

ग्यारहवें से बीसवें खण्ड तक एक नई लय शुरू होती है, और यह लय दस बार दोहराई जाती है। हर खण्ड में सामवेद के एक नामी साम को उठाया जाता है, गायत्र, रथन्तर, वामदेव्य, बृहत्, वैरूप, वैराज, शक्वरी, रेवती, यज्ञायज्ञीय और राजन। ये गायकों के बीच रोज़ बरते जाने वाले नाम थे, जैसे किसी घराने में रागों के नाम होते हैं। हर खण्ड कहता है कि यह साम फ़लाँ चीज़ में बुना हुआ है, प्रोत है, जैसे कपड़े में ताना-बाना। फिर वह उसके पाँच हिस्से गिनाता है, फिर फल बताता है, और अन्त में एक व्रत देता है।

यह व्रत ही इस पूरे हिस्से की जान है। पहले नौ खण्डों में उपासना का फल बताया गया था, यहाँ पहली बार उपासक से कुछ माँगा जा रहा है। और जो माँगा जा रहा है वह साधना का कोई कठिन नियम नहीं, वह एक बहुत सीधा-सा बरताव है: जिस चीज़ में आपने गान देखा, उस चीज़ की निन्दा मत कीजिए। यही शर्त है। उपासना अपने-आप में अधूरी रहती है जब तक उपासक उस चीज़ के साथ अपने रोज़ के बरताव में भी वही आदर न रखे।

गायत्र प्राणों में बुना है: मन हिंकार है, वाणी प्रस्ताव, आँख उद्गीथ, कान प्रतिहार, और प्राण निधन। जो ऐसा जानता है वह प्राणवान् होता है, पूरी उम्र जीता है, प्रजा और पशुओं से बड़ा होता है, कीर्ति से बड़ा होता है। इसका व्रत है महामना होना, यानी दिल बड़ा रखना। रथन्तर अग्नि में बुना है: लकड़ियाँ रगड़ना हिंकार, धुआँ उठना प्रस्ताव, लौ जलना उद्गीथ, अंगारे बनना प्रतिहार, और आग का शान्त हो जाना निधन। इसका व्रत है कि आग की ओर मुँह करके न तो पानी पीजिए, न थूकिए।

वामदेव्य मिथुन में बुना है, स्त्री और पुरुष के मिलन में। पास आना हिंकार है, राज़ी करना प्रस्ताव, साथ होना उद्गीथ, एक-दूसरे के साथ रहना प्रतिहार, और समय के पार पहुँच जाना निधन। इस पर उपनिषद् एक पल भी ठिठकता नहीं, न शरमाता है न सजाता है; वह गृहस्थ के इस अंग को भी वैसा ही सुर मानता है जैसा आग को या बरसात को। फल है कि वह जोड़ा बनता है और जोड़े से जोड़ा बढ़ता है। और व्रत है कि किसी को दुत्कारिए मत।

बृहत् सूर्य में बुना है: उगता सूरज हिंकार, उगा हुआ प्रस्ताव, दोपहर उद्गीथ, तीसरा पहर प्रतिहार, डूबना निधन। इसका व्रत है कि तपते सूरज की निन्दा मत कीजिए, चाहे धूप कितनी ही जलाए। वैरूप पर्जन्य में बुना है: बादलों का घिरना, बादल का बनना, बरसना, बिजली और गरज, और फिर उठ जाना। फल है कि उसे भाँति-भाँति के और सुन्दर पशु मिलते हैं। व्रत है कि बरसते आकाश की निन्दा मत कीजिए, चाहे खेत का काम रुक जाए।

वैराज ऋतुओं में बुना है, वही वसन्त से हेमन्त तक वाला क्रम जो पाँचवें खण्ड में आ चुका था, और यहाँ उसे साफ़ शब्दों में ऋतुओं में बुना हुआ कहा गया है। फल है कि वह प्रजा, पशु और ब्रह्म-तेज से विराजता है, और व्रत है कि ऋतुओं की निन्दा मत कीजिए। शक्वरी लोकों में बुनी है: पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ और समुद्र। फल है कि वह लोकों वाला हो जाता है, और व्रत है कि लोकों की निन्दा मत कीजिए।

रेवती पशुओं में बुनी है, वही बकरी, भेड़, गाय, घोड़ा और पुरुष वाला क्रम। व्रत है कि पशुओं की निन्दा मत कीजिए। यज्ञायज्ञीय अंगों में बुना है, और यह बिछावट अपने ही शरीर पर है: रोम हिंकार, त्वचा प्रस्ताव, मांस उद्गीथ, हड्डी प्रतिहार, मज्जा निधन। फल है कि वह पूरे अंगों वाला होता है और किसी अंग से लँगड़ाता नहीं। व्रत यहाँ थोड़ा अलग है, मज्जा न खाई जाए, एक बरस तक, या जीवन भर। राजन देवताओं में बुना है: अग्नि, वायु, आदित्य, नक्षत्र और चन्द्रमा। फल है कि वह उन्हीं देवताओं का लोक, उन्हीं का वैभव और उन्हीं से मिलन पाता है, और व्रत है कि ब्राह्मणों की निन्दा मत कीजिए।

दस बार दोहराए जाने पर यह ढाँचा एक चीज़ बहुत साफ़ कर देता है। जिस चीज़ में आपने गान देखा है, उसका बुरा कहना अपने ही गान को बेसुरा करना है। धूप जब जलाए तब भी वह उसी साम का शिखर है जिसे आपने सुबह उपासा था। बरसात जब रास्ता रोके तब भी वह उद्गीथ है। बूढ़ा होता शरीर भी वही यज्ञायज्ञीय है जिसे आपने अपना गान माना था। उपासना की सच्ची परीक्षा शान्त बैठक में नहीं, उस पल में होती है जब वही चीज़ असुविधा बनकर सामने आती है।

सार: दस खण्डों में दस नामी साम दस चीज़ों में बुने हुए दिखाए गए हैं, प्राण से लेकर देवताओं तक, और शरीर की हड्डी-मज्जा तक। हर एक के साथ एक व्रत जुड़ा है, और लगभग हर व्रत एक ही बात कहता है: जिसमें गान देखा है, उसे कोसिए मत। यही वह जगह है जहाँ उपासना बरताव बन जाती है।

सब में बुना हुआ एक साम, और गाने वाले का ढंग (खण्ड 21 और 22)

इक्कीसवाँ खण्ड सारी बिछावटें समेटकर एक कर देता है। अब किसी एक चीज़ में नहीं, सब में एक ही साम बुना हुआ दिखाया जाता है। तीनों विद्याएँ हिंकार हैं। तीनों लोक प्रस्ताव हैं। अग्नि, वायु और आदित्य उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पक्षी और किरणें प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितर निधन हैं। ध्यान दीजिए कि हर हिस्सा अब एक चीज़ नहीं, तीन का समूह है, जैसे कोई बड़ा गान जिसमें हर सुर के भीतर तीन सुर और बज रहे हों।

इसके बाद एक श्लोक आता है, और वह इस पूरे अध्याय का सबसे ऊँचा वाक्य है। जो पाँच तरह से तीन-तीन हैं, “तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति” (उनसे बड़ा या उनसे परे कुछ और नहीं है)। पन्द्रह चीज़ें गिनाकर उपनिषद् कह देता है कि इनसे बाहर कुछ बचा ही नहीं। जिसने इसे जान लिया, उसने सब जान लिया, और सब दिशाएँ उसे भेंट लाकर देती हैं। और फिर आख़िरी व्रत आता है, जो पिछले सारे व्रतों से अलग जाति का है, “सर्वमस्मीत्युपासित” (मैं सब हूँ, ऐसी उपासना करे)।

यह पलटा बहुत बड़ा है। अब तक उपासक बाहर खड़ा था और गान को दुनिया पर बिछा रहा था। यहाँ वह ख़ुद उसी गान के भीतर आ जाता है और कहता है, यह सारा फैलाव मेरा ही विस्तार है। पहले अध्याय में जो उद्गीथ एक अक्षर था, वह अब पूरे जगत् के बराबर हो गया, और गाने वाला उस पूरे जगत् के बराबर हो गया। छान्दोग्य उपनिषद् आगे चलकर जो तत्त्वमसि कहेगा, उसकी पहली आहट यहीं सुनाई देती है।

बाईसवाँ खण्ड फिर से ज़मीन पर उतर आता है और बहुत बारीक बात करता है, गले की। उद्गाता चुनता है कि वह किस तरह की आवाज़ में गाएगा, और हर तरह की आवाज़ किसी न किसी देवता की मानी गई है। दहाड़ती हुई आवाज़ अग्नि की है, वह पशुओं के लिए भली है। बिना साफ़ पकड़ में आने वाली आवाज़ प्रजापति की है, और साफ़ पकड़ में आने वाली सोम की। नरम और चिकनी वायु की है, चिकनी पर दमदार इन्द्र की, और क्रौंच पक्षी की पुकार जैसी बृहस्पति की। पर एक आवाज़ है जो टूटी हुई और बुझी हुई है, वह वरुण की है।

यहीं उपनिषद् एक साफ़ हिदायत देता है, “तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत्” (उन सबका अभ्यास करे, पर वरुण वाली को छोड़ दे)। गायक हर रंग साधे, पर वह रंग नहीं जिसमें आवाज़ बैठी हुई, टूटी हुई, बुझी हुई लगे। बात गले की है और बात उससे बड़ी भी है। जिस काम में सुर बुझने लगे, वहाँ रुककर सुर ठीक करना चाहिए, क्योंकि बुझी हुई आवाज़ सुनने वाले तक बुझापन ही पहुँचाती है।

फिर गाने से पहले की भावना बताई जाती है, और यह इस अध्याय के सबसे कोमल हिस्सों में है। गाते समय मन में यह रखिए: देवताओं के लिए अमृत गाऊँ, “स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः” (पितरों के लिए स्वधा, मनुष्यों के लिए आशा, पशुओं के लिए घास और पानी), यजमान के लिए स्वर्ग, और अपने लिए अन्न। इन्हें मन से ध्याता हुआ, बिना चूके, वह स्तुति करे। पाँच माँगें, और अपनी माँग सबसे आख़िर में, और वह भी सिर्फ़ रोटी की। मनुष्यों के हिस्से में आशा रखी गई है; पूरे अध्याय में इससे सटीक कोई बात नहीं कही गई।

आख़िर में उच्चारण की बात है। सारे स्वर इन्द्र के शरीर हैं, सारी ऊष्म ध्वनियाँ प्रजापति के, और सारे स्पर्श वर्ण मृत्यु के। अगर कोई गायक के स्वरों पर उँगली उठाए तो वह कहे कि मैं इन्द्र की शरण में हूँ, वही उत्तर देंगे; ऊष्म ध्वनियों पर उँगली उठे तो प्रजापति की शरण, और स्पर्शों पर उठे तो मृत्यु की। और बरतने का ढंग यह है: स्वर गूँज के साथ और बलवान बोले जाएँ, इस भाव से कि इन्द्र को बल दूँ; ऊष्म ध्वनियाँ न निगली जाएँ, न फेंकी जाएँ, खुली रहें, इस भाव से कि अपने को प्रजापति के हवाले करूँ; और स्पर्श वर्ण हल्के से, ज़रा-सा छूकर, एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड हुए बिना बोले जाएँ, इस भाव से कि अपने को मृत्यु से खींच लूँ।

सार: इक्कीसवें खण्ड में सारी बिछावटें एक हो जाती हैं और व्रत बदल जाता है, मैं सब हूँ। बाईसवाँ खण्ड फिर गले पर लौटता है और बताता है कि कौन-सी आवाज़ किसकी है, बुझी हुई आवाज़ से बचना है, गाते समय किसके लिए क्या माँगना है, और हर अक्षर को किस भाव से छूना है। ज्ञान की ऊँचाई और उच्चारण की बारीकी, दोनों एक ही साँस में रखी गई हैं।

तीन धर्मस्कन्ध, ॐ, और लोक का द्वार (खण्ड 23 और 24)

तेईसवाँ खण्ड एक ऐसी बात से शुरू होता है जो गान के इस लम्बे सिलसिले में अचानक आई हुई लगती है, और है नहीं। “त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति” (धर्म के तीन स्कन्ध हैं, पहला यज्ञ, अध्ययन और दान)। दूसरा स्कन्ध केवल तप है। और तीसरा वह ब्रह्मचारी है जो आचार्य के घर में रहता है, जो अपने को आचार्य के कुल में पूरी तरह घुला देता है। ये तीनों पुण्य लोक पाते हैं, और फिर एक पंक्ति सबको पीछे छोड़ देती है, “ब्रह्मसꣳस्थोऽमृतत्वमेति” (जो ब्रह्म में जमा है, वह अमृत को पाता है)।

यह वही बात है जो अभी-अभी इक्कीसवें खण्ड में सर्वमस्मि कहकर कही गई थी, अब कर्म की भाषा में रखी गई है। यज्ञ, पढ़ाई, दान, तप और गुरुकुलवास, ये सब बहुत ऊँचे लोक दिलाते हैं, पर लोक का मतलब है कोई जगह, और हर जगह से लौटना पड़ता है। ब्रह्म में जम जाना जगह नहीं है, इसलिए वहाँ से लौटना भी नहीं है। पूरा अध्याय उपासनाओं से भरा है, और यहीं वह उपासनाओं की हद भी बता देता है।

इसके बाद एक बहुत पुरानी कथा दो पंक्तियों में कही गई है। प्रजापति ने लोकों पर तप किया, तपे हुए लोकों से तीनों विद्याएँ निकलीं। उन्होंने उन पर तप किया, तपी हुई विद्याओं से तीन अक्षर निकले, भूः भुवः स्वः। उन्होंने उन पर तप किया, और तपे हुए उन तीन से ॐ निकला। तप यहाँ कोई दण्ड नहीं, यह निचोड़ने की क्रिया है; हर बार जो बचता है वह छोटा होता जाता है और गाढ़ा होता जाता है, जब तक एक ही अक्षर बाक़ी न रह जाए।

और फिर वह उपमा आती है जो सुनते ही घर कर जाती है। “यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि” (जैसे एक सींक से सारे पत्ते पिरो दिए जाते हैं), वैसे ही ॐ से सारी वाणी पिरोई हुई है। दोने बनाने वाली उँगलियाँ रोज़ यही करती हैं, ढेर सारे बिखरे पत्तों में एक तिनका चुभोकर उन्हें एक चीज़ बना देती हैं। और अन्तिम वाक्य में उपनिषद् यह भी कह देता है कि यह सब ॐ ही है। पहले अध्याय का उद्गीथ यहाँ लौटकर पूरे अध्याय को बाँध देता है।

चौबीसवाँ खण्ड, जो इस अध्याय का आख़िरी है, एक सवाल से शुरू होता है और उसमें एक हल्की-सी बेचैनी है। ब्रह्मवादी कहते हैं कि प्रातःसवन वसुओं का है, माध्यन्दिन सवन रुद्रों का, और तीसरा सवन आदित्यों तथा विश्वेदेवों का। तो फिर यजमान का लोक कहाँ है? सारा यज्ञ उसी के संकल्प पर खड़ा है, ख़र्च उसी का है, और तीनों हिस्से देवताओं के नाम बँट गए। जो इसे नहीं जानता, वह यज्ञ करे भी तो कैसे करे। जानकर करे।

और फिर विधि बताई जाती है, बहुत बारीकी से, जगह और दिशा तक। प्रातरनुवाक शुरू होने से पहले यजमान गार्हपत्य अग्नि के पीछे बैठे, मुँह उत्तर की ओर, और वासव साम गाए: लोक का द्वार खोलिए, हम आपको देख सकें, राज्य के लिए। फिर आहुति दे और कहे, “नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते” (पृथिवी में बसने वाली, लोक में बसने वाली अग्नि को नमस्कार), मेरे लिए, इस यजमान के लिए लोक ढूँढ़ दीजिए; यही तो यजमान का लोक है, वहीं मैं जाऊँगा। फिर वह उठ खड़ा हो, और वसु उसे प्रातःसवन सौंप देते हैं।

माध्यन्दिन सवन से पहले वही क्रम, पर जगह बदल जाती है: अब वह आग्नीध्रीय अग्नि के पीछे बैठता है, मुँह फिर उत्तर की ओर, और रौद्र साम गाता है, वैराज्य के लिए। आहुति वायु के नाम है, जो अन्तरिक्ष में बसते हैं। रुद्र उसे माध्यन्दिन सवन सौंप देते हैं। तीसरे सवन से पहले वह आहवनीय अग्नि के पीछे बैठता है और आदित्य तथा वैश्वदेव साम गाता है, स्वाराज्य और साम्राज्य के लिए। आहुति आदित्यों और विश्वेदेवों के नाम है, जो द्युलोक में बसते हैं। और वे उसे तीसरा सवन सौंप देते हैं।

हर बार वही पुकार दोहराई जाती है, हर बार वही वाक्य कि यही यजमान का लोक है और वहीं वह जाएगा, और हर बार वही अनुरोध कि आगल हटा दीजिए, सिटकनी खोल दीजिए। तीन आग, तीन दिशाओं में बसे देवता, तीन सवन, और तीनों बार एक ही आदमी अपने लिए एक जगह माँग रहा है। खण्ड आख़िर में कहता है कि जो ऐसा जानता है, वही यज्ञ की पूरी माप जानता है। सारे अध्याय का हिसाब यहाँ बराबर हो जाता है: जिसने गान के हिस्सों को दुनिया पर बिछाना सीखा, उसे अन्त में उस दुनिया में अपनी जगह भी मिल जाती है।

सार: धर्म के तीन स्कन्ध गिनाकर उपनिषद् कहता है कि ब्रह्म में जमा हुआ ही अमृत पाता है। फिर प्रजापति के तप से निकला ॐ सारी वाणी को एक सींक की तरह पिरो देता है। और आख़िरी खण्ड में यजमान तीनों अग्नियों के पीछे बैठकर लोक का द्वार माँगता है, और तीनों बार देवता उसका हिस्सा उसे सौंप देते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस अध्याय में कोई कथा नहीं है, कोई गुरु किसी शिष्य को नहीं समझा रहा, कोई राजा किसी ऋषि के आगे नहीं झुक रहा। यहाँ बस एक ही अभ्यास चौबीस बार दोहराया गया है। पर दोहराव ही उसका ढंग है, और अभ्यास ही उसका मर्म। जो गायक रोज़ हिंकार से निधन तक जाता है, उसकी उँगलियों में वह क्रम बस जाता है; और जिसके भीतर वह क्रम बस जाता है, उसे बरसात, ऋतु, दिन, साँस और शरीर भी उसी क्रम में बजते सुनाई देने लगते हैं। यह बाहर कुछ जोड़ने की विद्या नहीं है, यह सुनने के ढंग को बदल देने की विद्या है।

इसमें आपके अपने दिनों के लिए एक बहुत सीधा-सा औज़ार रखा है। जो काम आपके हाथ में है, उसे पाँच हिस्सों में सुनकर देखिए। एक गूँज जिससे वह शुरू होता है, एक रास्ता जो आप बिछाते हैं, एक ऊँचाई जहाँ वह पूरी आवाज़ में आता है, एक मोड़ जहाँ उसे थामना होता है, और एक ठहराव जहाँ उसे छोड़ देना होता है। जो लोग शिखर पर ही अटक जाते हैं, उनका काम बेसुरा हो जाता है, क्योंकि निधन के बिना कोई गान पूरा नहीं होता। छोड़ना भी गान का एक हिस्सा है, उतना ही सधा हुआ जितना उठाना।

और आख़िर में वह व्रत, जो इस अध्याय ने दस बार दोहराया। तपते सूरज को कोसिए मत, बरसते आकाश को कोसिए मत, ऋतुओं को, लोकों को, पशुओं को, अपने ही अंगों को कोसिए मत। जिस चीज़ में आपने कभी सुर सुना है, उसके बेसुरे दिन में भी उसका आदर छोड़िए मत, क्योंकि उपासना वहीं परखी जाती है। और जब यह आदर पका हुआ हो, तब उपनिषद् आख़िरी बात कहता है, सर्वमस्मि, मैं सब हूँ। बाहर बिछाया हुआ गान लौटकर अपने ही भीतर बैठ जाता है, और यही इस अध्याय का सबसे बड़ा फल है।

आधार: छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 2, खण्ड 1 से 24; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।