छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 2

छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय दो

साम-गायन की भीतरी संरचना

चौबीस खण्ड। साम-वेद-गायन के सात अंग और उनके अन्तर्मूल्य।

दूसरा अध्याय एक तकनीकी अध्याय है। साम-वेद-गायन के सात अंगों, हिङ्कार, प्रस्ताव, आदि, उद्गीथ, प्रतिहार, उपद्रव, और निधन, को क्रम से उठा कर हर एक का तत्त्व-सम्बन्ध बताया जाता है। आधुनिक पाठक के लिए यह सम्भवतः सबसे अरुचिकर अध्याय हो सकता है, क्योंकि यह विधि-शास्त्रीय है। मगर वैदिक-शिक्षा की दृष्टि से, यह अध्याय वह जगह है जहाँ “कैसे गाना है” और “गायन का अर्थ क्या है” एक हो जाते हैं।

इस अध्याय का अधिक प्रसिद्ध हिस्सा तेईसवाँ खण्ड है, जिसमें तीन-धर्म-स्कन्ध बताए जाते हैं। पहला, यज्ञ-अध्ययन-दान (गृहस्थ-धर्म)। दूसरा, तप (वान-प्रस्थ या तपस्या)। तीसरा, ब्रह्मचारी-आचार्य-कुल-वासी (विद्यार्थी या संन्यासी, गुरु के घर रहने वाला)। यह तीन-वर्गीकरण भारतीय धर्म-शास्त्र की मूल संरचना का सबसे प्राचीन सूत्र है, और बाद के मनु-स्मृति-इत्यादि ग्रंथों में यह कई-तरह से विस्तार पाता है।

Key passages

2.1.1सर्व-साम
समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु यत्खलु साधु तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥
samastasya khalu sāmna upāsanaṃ sādhu yatkhalu sādhu tatsāmetyācakṣate yadasādhu tadasāmeti ॥

अर्थ: पूरे-साम की उपासना साधु (अच्छी) है। जो भी ‘साधु’ है, वो ही ‘साम’ कहलाता है। जो ‘असाधु’ है, वो ‘असाम’ कहलाता है।

संगति: एक-word-play: साम = साधु। साम-गायन सिर्फ़-धर्म-कर्म नहीं, यह ‘अच्छाई’-को-recognize-करने का तरीक़ा। साम-वेदी सब-अच्छाई को embrace करते हैं।
2.23.1धर्म-स्कन्ध
त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मस{\म्+}स्थोऽमृतत्वमेति ॥
trayo dharmaskandhā yajño’dhyayanaṃ dānamiti prathamastapa eva dvitīyo brahmacāryācāryakulavāsī tṛtīyo’tyantamātmānamācāryakule’vasādayan sarva ete puṇyalokā bhavanti brahmasa{\m+}stho’mṛtatvameti ॥

अर्थ: तीन-धर्म-स्कन्ध हैं: यज्ञ-अध्ययन-दान, यह पहला। तप, यह दूसरा। ब्रह्मचारी आचार्य-कुल-वासी, यह तीसरा। सब-ये पुण्य-लोक पाते हैं। ब्रह्म-में स्थित अमृत-तत्व पाता।

संगति: बहुत-important verse: हिन्दू-धर्म के तीन-foundational-धर्म-paths। गृहस्थ (यज्ञ-अध्ययन-दान), वन-प्रस्थ (तप), और संन्यासी (आचार्य-कुल). फिर इन-सब के ऊपर ‘ब्रह्म-निष्ठ’ अमृत पाता।

अध्याय-overview

Khanda 1-7 साम-गायन के 5-7 अंग वाला breakdown। हर-अंग को एक देवता/लोक के साथ identify किया जाता है।

Khanda 8-10 हिंकार, प्रस्ताव, आदि, इत्यादि individual-syllables पर deep-meditation।

Khanda 11-21 various-sAman (गायत्री-साम, रथन्तर-साम, बृहत्-साम) के significations।

Khanda 22 लौकिक्-साम, day-night-संधि।

Khanda 23 धर्म-स्कन्ध, तीन-धर्म-paths।

Khanda 24 ब्रह्म-uddha (brahma-orientation) सब-कर्म-end।

संगति

तेईसवें खण्ड का धर्म-स्कन्ध-सूत्र विशेष महत्त्व का है, क्योंकि यह बाद-वाले दर्शन-शास्त्र की एक central की नींव है। तीन-धर्म-paths की संरचना ने हजार-वर्षों तक भारतीय समाज को आकार दिया, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी। बौद्ध और जैन परम्पराओं ने अपनी आलोचनात्मक भिन्नताएँ रखीं, मगर मूल त्रिविभाजन को अधिकांश-तौर पर स्वीकार किया।

शेष अध्याय की विधि-सामग्री आज के पाठक के लिए शायद कम-उपयोगी है। यह जान लेना उपयोगी है कि साम-वेद-गायन के अंगों पर इस तरह की detailed-व्याख्या क्यों ज़रूरी समझी गयी, क्योंकि वैदिक-काल में संगीत और दर्शन एक ही disciplinary-thread के दो छोर थे। आज ये पृथक-disciplines हो गए हैं, मगर तब इनका एकीकरण ही ज्ञान-शास्त्र का स्वरूप था।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “chhaandogya.itx” से।

license: मूल text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।