छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 1

छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय एक

उद्गीथ-विद्या

ॐ-कार और साम-वेद-गायन का तत्त्व। तेरह खण्ड।

छान्दोग्य उपनिषद् का पहला अध्याय ॐ-कार के चारों ओर बुना गया है। ॐ ही उद्गीथ है, यानी साम-वेद-गायन का केन्द्रीय अंश, और ॐ ही ब्रह्म। यह तीन-समीकरण पहले मन्त्र में ही रख दिया जाता है, और शेष तेरह खण्ड इसी पर एक के ऊपर एक परतें चढ़ाते जाते हैं।

उद्गीथ साम-वेद-गायन के पाँच अंशों में से मध्य का है, हिङ्कार-प्रस्ताव-उद्गीथ-प्रतिहार-निधन इस क्रम में। इन पाँच अंशों का प्रत्येक एक देवता और एक तत्त्व के साथ identify किया जाता है। आधुनिक पाठक के लिए यह विधि शायद बहुत-तकनीकी लगे, मगर यह वैदिक-विद्या-परम्परा की एक केन्द्रीय शैली है, कि बाह्य-क्रिया का अन्तर्मूल्य खोजा जाए।

पहले अध्याय की एक कथा विशेष ध्यान-योग्य है। उषस्ति-चाक्रायण नामक ऋषि अपनी पत्नी सहित अकाल-समय में भटक रहे हैं। एक हाथी-संग्राहक के यहाँ से थोड़े-से उबले हुए चने माँग कर खाते हैं। पत्नी पीने का जल भी माँगती है, मगर वो कहते हैं, “अब तो हम पहले से तृप्त हैं, जल अलग से क्या चाहिए?” फिर उन्हीं उबले-हुए-चनों के बल पर वो एक यज्ञ का सम्पादन कर देते हैं, अपनी गायन-विद्या से तीनों मुख्य पुरोहितों को मात देते हुए। यह कथा एक तरह की knowledge-versus-comfort-समीक्षा है, और इस अध्याय की दूसरी आधी का प्रमुख आधार।

Key passages

1.1.1ओम् ही उद्गीथ
Oमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । Oमिति ह्युद्गायति । तस्योपव्याख्यानम् ॥
Omityetadakṣaramudgīthamupāsīta । Omiti hyudgāyati । tasyopavyākhyānam ॥

अर्थ: इस अक्षर ॐ की उद्गीथ-तरह उपासना करनी चाहिए। ‘ओम्’ कहते-हुए उद्गायन (गाना) किया जाता है। उसका explanation यह है,

संगति: उपनिषद् का opening-mantra। ॐ-कार उपासना का अर्थ है, just-meditate on the sound, on what it points to, on what it carries।
1.1.10विद्या और अविद्या
यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति । इति खल्वेतस्यैवाक्शरस्योपव्याख्यानं भवति ॥
yadeva vidyayā karoti śraddhayopaniṣadā tadeva vīryavattaraṃ bhavati । iti khalvetasyaivākśarasyopavyākhyānaṃ bhavati ॥

अर्थ: जो-कुछ विद्या से, श्रद्धा से, उपनिषद् से करते हैं, वो ही वीर्यवत्तर (अधिक-शक्तिशाली) होता है। यह उस-अक्षर (ॐ) का explanation है।

संगति: यह वाक्य पूरे-Veda की परम्परा की epistemology कहती है: कर्म ज्ञान के साथ हो, तभी powerful है। ‘श्रद्धा’ और ‘उपनिषद्’ दोनों ज़रूरी।

अध्याय-overview

Khanda 1-3 ॐ-कार और उद्गीथ की तत्त्व-व्याख्या। प्राण, इन्द्रिय, और देवताओं का relationship।

Khanda 4-6 उद्गीथ-गायन के विभिन्न-aspects (कौन गाता है, क्यों गाता है)। बक-कथा (बक-दालभ्य की कथा) के साथ।

Khanda 7-9 ब्रह्मा के तीन-स्वरूप: स्वर, उद्गीथ, और ओम्।

Khanda 10-12 ख-कथा (आकाश): आकाश ही असली ॐ-कार। उषस्ति-चाक्रायण की कथा।

Khanda 13 stobha (vocal-syllable) सबकी essence।

संगति

पहले अध्याय का मूल बौद्धिक-कार्य ॐ-कार को केन्द्र में रखना है। ॐ केवल एक ध्वनि नहीं है। यह ब्रह्म का vibrational-रूप है, और साम-वेद-परम्परा की पूरी संरचना इसी एक स्वर पर खड़ी है। पाठक यह जान कर थोड़ा-सा हैरान हो सकता है कि एक अक्षर पर एक पूरी उपनिषद् लिखी जा सकती है, मगर वही इस ग्रंथ की विशेषता है, सूक्ष्मतम बात की गहनतम परत।

आगे के अध्याय इस foundation पर बैठते हैं। तीसरा शाण्डिल्य-विद्या लाएगा, छठा तत्त्वमसि पर पहुँचेगा, सातवाँ भूमा-विद्या तक। मगर पहले के बिना यह सब असम्भव है, क्योंकि ॐ-कार-उपासना ही वो प्रवेश-द्वार है जिससे शेष ग्रंथ की वाणी संगति में आती है।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “chhaandogya.itx” से।

license: मूल text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।