लुल्ला परिवारLulla Family
English
उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

अध्याय 1: ॐ, रसों का रस और उद्गीथ की उपासना

इस पृष्ठ पर
सामवेद · छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय 1
साम गायकों का यह उपनिषद् ॐ को उद्गीथ कहकर खुलता है, और देवों, ऋषियों, एक भूखे विद्वान और कुत्तों की कथाओं से प्राण की महिमा गाता है।

भोर अभी फूटी नहीं है। कुरु-पांचाल की धरती पर किसी वन-गुरुकुल में, यज्ञशाला के बाहर, तीन गायक कुश की चटाइयों पर बैठे हैं। बीच वाला साँस भीतर भरता है और एक लम्बा स्वर छोड़ता है: ओ३म्। स्वर उठता है, ठहरता है, और जब तक वह थमे, पूरब की ओर पेड़ों की चोटियों पर सुनहरी रेखा खिंच आती है। शिष्य आँखें मूँदे सुन रहे हैं। उन्हें बताया गया है कि इस एक अक्षर में सारे रसों का रस बैठा है, वह रस जिसे निचोड़ते-निचोड़ते धरती से जल, जल से ओषधि, ओषधि से पुरुष, पुरुष से वाणी, वाणी से ऋचा, ऋचा से साम और साम से यह उद्गीथ निकला है। आठवाँ, और सबसे ऊपर।

छान्दोग्य उपनिषद् सामवेद का उपनिषद् है, उन छन्दोगों (साम गाने वालों) का, जिनके लिए वेद पढ़ा नहीं, गाया जाता था। इसके आठ अध्यायों में से पहले दो उसी गान की भीतरी विधि सिखाते हैं, और यह पहला अध्याय तेरह खण्डों में एक ही प्रश्न को घुमा-फिराकर पूछता है: जब उद्गाता (साम गाने वाला मुख्य ऋत्विक्) ॐ कहकर गान उठाता है, तो वह किसका गान कर रहा है? उत्तर में यह अध्याय एक-एक करके देवों और असुरों की लड़ाई, मृत्यु से भागते देवों, तीन विद्वानों की बहस, एक भूखे ब्राह्मण के यज्ञ और अन्त में कुत्तों के गान तक ले जाता है। हर कथा में उत्तर एक ही निकलता है, प्राण, और उस प्राण के पीछे खड़ा वह जिसे यहाँ आकाश कहा गया है।

इस अध्याय के मुख्य किरदार

अङ्गिरा, बृहस्पति और अयास्य: तीन प्राचीन ऋषि, जिन्होंने मुख्य प्राण को ही उद्गीथ जानकर उसकी उपासना की; तीनों के नाम इस अध्याय में प्राण के ही नाम ठहरते हैं।

बक दाल्भ्य: नैमिष के ऋषियों का उद्गाता, जो लोगों की कामनाएँ गाकर पूरी करता था; कुत्तों का उद्गीथ भी इसी ने देखा (पाठ इसे ग्लाव मैत्रेय भी कहता है)।

कौषीतकि: वह पिता जिसने अपने इकलौते बेटे को बताया कि उसने सूर्य को एक जानकर गाया था, इसलिए बेटा भी एक ही हुआ।

शिलक शालावत्य, चैकितायन दाल्भ्य और प्रवाहण जैवलि: उद्गीथ के तीन कुशल जानकार, जिनकी बहस साम की गति को आकाश तक ले जाती है।

उषस्ति चाक्रायण: ओलों से उजड़े कुरु देश का एक भूखा विद्वान, जो अपनी पत्नी आटिकी के बचाये उड़द खाकर राजा के यज्ञ में पहुँचा और तीनों ऋत्विजों को चुप करा गया।

देव और असुर: प्रजापति की दो सन्तानें, जिनकी होड़ में देवों ने उद्गीथ को हथियार बनाया।

ॐ, रसों का रस (खण्ड 1)

भोर के धुँधलके में वन-गुरुकुल की यज्ञशाला के आगे बैठे गायक ॐ का उद्गान कर रहे हैं, पीछे पेड़ों पर पहली किरण
भोर के वन-गुरुकुल में ॐ का उद्गान, सूर्य से पहले उठता स्वर

“ओमित्येतदक्षरमुपासीत”, इस ॐ अक्षर की उपासना करनी चाहिए: यही इस उपनिषद् का पहला वाक्य है। उपासना शब्द बना ही उप और आस से है, पास बैठना; किसी चीज़ को मन में इतनी देर, इतनी बार बिठाना कि वह अपने दिखते रूप से बड़ी हो जाए। उद्गाता जब साम गाने बैठता है तो ॐ से ही गान उठाता है, इसलिए यह उपनिषद् कहता है कि ॐ ही उद्गीथ है, और फिर उसी की व्याख्या में उतरता है। पहला ही खण्ड इस एक अक्षर को पूरे ब्रह्माण्ड के बराबर तौलता है, और तौलने की विधि रस की है।

सारे भूतों का रस पृथिवी है, पृथिवी का रस जल, जल का रस ओषधियाँ, ओषधियों का रस पुरुष, पुरुष का रस वाणी, वाणी का रस ऋचा, ऋचा का रस साम, और “साम्न उद्गीथो रसः”, साम का रस उद्गीथ है। गिनिए तो उद्गीथ आठवाँ पड़ता है, और उपनिषद् उसे परार्ध्य कहता है, वह जिसके आगे और कुछ रखा ही न जा सके। एक गन्ने को कोल्हू में डालिए, रस निकलेगा; रस को पकाइए, गुड़; गुड़ को और पकाइए, खाँड़। हर बार चीज़ छोटी हुई, पर तत्त्व गाढ़ा होता गया। उद्गीथ इसी तरह सारे जगत् का गाढ़ा किया हुआ तत्त्व है।

फिर प्रश्न उठता है, यह ऋचा कौन है, साम कौन, उद्गीथ कौन? उत्तर भीतर की ओर मुड़ता है: वाणी ही ऋचा है, प्राण ही साम है, और ॐ यह अक्षर उद्गीथ है। वाणी और प्राण एक मिथुन (जोड़ा) हैं, और यह जोड़ा ॐ अक्षर में मिलता है। जैसे जोड़े के मिलने पर दोनों एक दूसरे की कामना पूरी करते हैं, वैसे ही ॐ में मिले वाणी और प्राण से कामनाएँ पूरी होती हैं; जो इस प्रकार जानकर इस अक्षर की उपासना करता है, वह कामनाओं को पूरा करने वाला, आपयिता, हो जाता है। बोलिए तो साँस लगती है, साँस लीजिए तो बोल बनता है: इन दोनों के बीच का जो बिन्दु है, वहीं ॐ बैठा है।

इसी खण्ड में एक और सुराग़ है। संस्कृत में जब कोई किसी बात पर हामी भरता है तो ओम् कहता है, जैसे हम जी कहते हैं। इसलिए ॐ अनुज्ञा (स्वीकृति) का अक्षर है, और उपनिषद् कहता है कि स्वीकृति ही समृद्धि है; जो हामी भरता है, वह बढ़ाता है। तीनों वेद इसी अक्षर पर चलते हैं: अध्वर्यु ॐ कहकर आज्ञा देता है, होता ॐ कहकर ऋचाएँ पढ़ता है, उद्गाता ॐ कहकर गाता है। यह सब इस अक्षर की महिमा से, इसके रस से हो रहा है, इसकी पूजा में हो रहा है।

खण्ड का अन्तिम मन्त्र एक कड़वा सच रखता है। यज्ञ में गाता वह भी है जो यह सब जानता है, और वह भी जो नहीं जानता; दोनों के स्वर बाहर से एक जैसे सुनाई देते हैं। पर “नाना तु विद्या चाविद्या च”, विद्या और अविद्या अलग-अलग हैं। जो कर्म विद्या से, श्रद्धा से और उपनिषद् (रहस्य-ज्ञान) से किया जाता है, वही वीर्यवत्तर, अधिक बलवान होता है। दो गायक एक ही साम गाएँ, एक जानता हो कि वह प्राण को गा रहा है और दूसरा सिर्फ़ सुर साध रहा हो, तो सुनने वाले को फ़र्क़ न दिखे, पर गाने वाले के भीतर दोनों अलग जगहों पर खड़े हैं।

सार: पहला खण्ड ॐ को साम का रस, आठवाँ और अन्तिम तत्त्व, बताता है; वाणी और प्राण का जोड़ा इसी अक्षर में मिलता है। जो जानकर गाता है, उसका गान बलवान होता है, क्योंकि विद्या और अविद्या का फल अलग है।

देव, असुर और वह प्राण जिसे पाप छू न सका (खण्ड 2)

अब कथा। देव और असुर, दोनों प्रजापति की सन्तान, जब आपस में लड़े, तो देवों ने सोचा कि उद्गीथ से इन्हें जीत लेंगे, और उद्गीथ को उठा लिया। हथियार तो मिल गया, पर उसे रखा कहाँ जाए? उन्होंने सबसे पहले नाक के प्राण को उद्गीथ मानकर उपासना की। असुरों ने उसे पाप से बेध दिया। “पाप्मना ह्येष विद्धः”, वह पाप से बिंधा हुआ है, इसीलिए नाक आज सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों सूँघती है। यानी नाक चुनती है, मुँह बनाती है, और जहाँ चुनाव है वहाँ असुर का तीर घुस सकता है।

देवों ने फिर वाणी को उद्गीथ माना; असुरों ने उसे भी बेधा, इसलिए वाणी सत्य भी बोलती है और असत्य भी। फिर आँख: वह देखने योग्य भी देखती है और न देखने योग्य भी। फिर कान: वह सुनने योग्य और न सुनने योग्य दोनों सुनता है। फिर मन: वह ठीक संकल्प भी करता है और ग़लत भी। हर इन्द्रिय में एक दरार निकली, और हर दरार से पाप भीतर आया। यह दरार दरअसल उनका पक्ष लेना है; जो पक्ष लेता है, उसे ललचाया और डराया जा सकता है।

अन्त में देवों ने उस प्राण को उद्गीथ माना जो मुख में रहता है, मुख्य प्राण। असुर उस पर टूटे और वैसे ही चूर हो गये जैसे मिट्टी का ढेला कड़े पत्थर से टकराकर बिखर जाता है। उपनिषद् कहता है कि जो ऐसा जानने वाले का बुरा चाहता है या उसे सताता है, वह इसी तरह बिखर जाता है, क्योंकि “स एषोऽश्माखणः”, वह जानने वाला स्वयं वह कड़ा पत्थर है। इस प्राण से आप सुगन्ध भी नहीं पहचानते, दुर्गन्ध भी नहीं; वह अपहतपाप्मा है, पाप उससे झड़ चुका है। जो आप खाते-पीते हैं, वह इसी प्राण से खाते हैं और इसी से बाक़ी प्राण पलते हैं। अन्त में जब इसे खाना नहीं मिलता तो यह निकल जाता है, और मरते हुए का मुँह खुला रह जाता है।

फिर उपनिषद् तीन पुराने ऋषियों के नाम लेता है और हर नाम को इसी प्राण पर खोल देता है। अङ्गिरा ने इसकी उपासना की, इसलिए लोग इसे ही आङ्गिरस मानते हैं, क्योंकि यह अङ्गों का रस है। बृहस्पति ने इसकी उपासना की, इसलिए यही बृहस्पति है, क्योंकि वाणी बृहती (बड़ी) है और यह उसका पति है। अयास्य ने इसकी उपासना की, इसलिए यही अयास्य है, क्योंकि यह आस्य (मुख) से अयन करता है, चलता है। फिर बक दाल्भ्य ने इसे जाना; वह नैमिष के ऋषियों का उद्गाता हुआ और उनकी कामनाएँ गा-गाकर पूरी करता था। जो इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह भी कामनाओं का आगाता, गाकर ला देने वाला, हो जाता है। यह अध्यात्म दृष्टि है, अपने भीतर देखकर उद्गीथ की उपासना।

सार: देवों ने नाक, वाणी, आँख, कान और मन में उद्गीथ रखा, पर हर एक पाप से बिंध गया, क्योंकि हर एक चुनाव करता है। मुख्य प्राण पर असुर ढेले की तरह चूर हुए; अङ्गिरा, बृहस्पति, अयास्य और बक दाल्भ्य ने इसी प्राण को गाया।

सूर्य, व्यान और उद्-गी-थ के तीन अक्षर (खण्ड 3)

भीतर देखने के बाद तीसरा खण्ड आँख बाहर उठाता है, यह अधिदैवत दृष्टि है। जो वह सूर्य तप रहा है, उसे उद्गीथ मानकर उपासना कीजिए; उगता हुआ वह प्रजा के लिए ऊँचा गान करता है, और उगते ही अँधेरे और भय को मार देता है। “भयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद”, वह भय को मार देता है, और जो ऐसा जानता है वह भी भय और अँधेरे का हन्ता हो जाता है। फिर उपनिषद् प्राण और सूर्य को बराबर खड़ा करता है: यह भी गर्म है, वह भी गर्म है; इसे स्वर कहते हैं, उसे स्वर और प्रत्यास्वर (जो जाकर लौटता है) कहते हैं। साँस उठकर लौटती है, सूर्य उगकर लौटता है। इसलिए इस भीतर वाले को और उस बाहर वाले को, दोनों को उद्गीथ मानिए।

अब एक और सूक्ष्म बात। जो साँस बाहर जाती है वह प्राण है, जो भीतर आती है वह अपान; इन दोनों की सन्धि, वह बीच का ठहराव, व्यान है, और व्यान ही वाणी है। क्योंकि हम बोलते तब हैं जब साँस न बाहर जा रही हो न भीतर आ रही हो। आज़माकर देखिए: गहरी साँस लेते हुए एक वाक्य बोलने की कोशिश कीजिए, बोल टूट जाएगा। वाणी ऋचा है, तो ऋचा भी बिना साँस लेते-छोड़ते बोली जाती है; ऋचा साम है, तो साम भी उसी ठहराव में गाया जाता है; साम उद्गीथ है, तो उद्गीथ भी। और जितने भी वीर्यवान काम हैं, अग्नि मथना, दौड़ में भागना, कड़े धनुष को खींचना, सब आदमी साँस रोककर करता है। इस कारण व्यान को ही उद्गीथ मानकर उपासना कीजिए।

फिर उपनिषद् उद्गीथ शब्द को तीन टुकड़ों में तोड़कर हर टुकड़े पर एक जगत् बिठाता है। उत् प्राण है, क्योंकि प्राण से ही आदमी उठता है; गी वाणी है, क्योंकि वाणी को गिरा कहते हैं; थ अन्न है, क्योंकि यह सब अन्न में ही स्थित है। उत् द्युलोक, गी अन्तरिक्ष, थ पृथिवी। उत् आदित्य, गी वायु, थ अग्नि। उत् सामवेद, गी यजुर्वेद, थ ऋग्वेद। जो इन अक्षरों को इस प्रकार जानकर उपासना करता है, उसके लिए वाणी दूध देती है, और वह अन्नवान और अन्न खाने वाला होता है। तीन अक्षर, और हर अक्षर में ऊपर, बीच और नीचे का पूरा लोक।

खण्ड का अन्त उद्गाता के लिए एक विधि है, जो किसी भी काम करने वाले की विधि हो सकती है। जिस साम से स्तुति करनी हो, पहले उस साम के पास जाइए; जिस ऋचा में वह साम है, उस ऋचा के पास; जिस ऋषि ने उसे देखा, उस ऋषि के पास; जिस देवता की स्तुति करनी है, उस देवता के पास; जिस छन्द में, जिस स्तोम (गान की गिनती) में, जिस दिशा की ओर मुख करके गाना है, उन सबके पास। और अन्त में अपने आत्मा के पास आकर, अपनी कामना का ध्यान करते हुए, अप्रमत्त होकर, बिना चूके, स्तुति कीजिए। तब जो कामना लेकर स्तुति की है, वह शीघ्र पूरी होती है। गाने से पहले गायक को पूरी परम्परा को छूकर, फिर अपने भीतर लौटकर बैठना है।

सार: बाहर सूर्य और भीतर प्राण, दोनों गर्म, दोनों जाकर लौटते हैं, दोनों उद्गीथ हैं। वाणी साँसों के बीच के ठहराव, व्यान, पर टिकी है; उद्-गी-थ के तीन अक्षरों में तीनों लोक हैं; और गाने से पहले गायक को पूरी परम्परा छूकर अपने भीतर लौटना है।

मृत्यु से भागते देव और अमर स्वर (खण्ड 4 और 5)

चौथा खण्ड फिर उसी वाक्य से खुलता है, ॐ अक्षर की उद्गीथ रूप में उपासना कीजिए, और फिर एक छोटी कथा कहता है। देव मृत्यु से डरे हुए थे। बचने के लिए वे त्रयी विद्या में, तीन वेदों में, घुस गये और छन्दों से अपने को ढँक लिया। छन्द शब्द वहीं से बना, छद् से, ढँकने से। पर मृत्यु ने उन्हें वहाँ भी देख लिया, जैसे कोई साफ़ पानी में मछली को देख लेता है; ऋचा में, साम में, यजुष में, वे साफ़ दिखाई दे रहे थे। कर्मकाण्ड का हर शब्द, हर मन्त्र, हर छन्द, अन्त में मृत्यु की पहुँच में है, क्योंकि उसका फल कभी न कभी चुक जाता है।

तब देवों ने यह जानकर ऋचा, साम और यजुष से ऊपर उठकर स्वर में प्रवेश किया। स्वर कौन? जब ऋचा पूरी होती है तो उद्गाता ॐ कहकर उसे स्वर देता है; साम पूरा होता है तो ॐ, यजुष पूरा होता है तो ॐ। “यदेतदक्षरमेतदमृतमभयं”, यह जो अक्षर है, यही अमृत है, यही अभय है। इसमें प्रवेश करके देव अमर और अभय हुए। और जो मनुष्य इसे ऐसा जानकर इस अक्षर की स्तुति करता है, वह भी इसी अमृत, अभय स्वर में प्रवेश करता है और वैसा ही अमर हो जाता है जैसे देव। हर मन्त्र के छोर पर जो ॐ लगता है, वह मन्त्र से ऊपर का दरवाज़ा है, और शब्द को चुप में उतारने की सीढ़ी।

पाँचवाँ खण्ड यहीं से आगे चलता है: “य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ”, जो उद्गीथ है वही प्रणव है, जो प्रणव है वही उद्गीथ। प्रणव, यानी ॐ, ऋग्वेदियों का नाम है और उद्गीथ सामवेदियों का, पर चीज़ एक है। वह सूर्य उद्गीथ है, वह प्रणव है, क्योंकि वह ओम् की ध्वनि करता हुआ चलता है। यहाँ एक पिता-पुत्र का प्रसंग आता है। ऋषि कौषीतकि ने अपने पुत्र से कहा, “हमने उस सूर्य को एक जानकर गाया, इसीलिए आप हमारे एक ही पुत्र हुए। आप उसकी किरणों की ओर मुड़कर उन्हें अनेक जानकर गाइए, तो आपके पुत्र अनेक होंगे।” यह अधिदैवत कथन है।

फिर वही बात अध्यात्म में। जो यह मुख्य प्राण है, उसे उद्गीथ मानिए, क्योंकि यह भी ओम् करता हुआ चलता है। कौषीतकि ने पुत्र से कहा, “हमने इस प्राण को एक जानकर गाया, इसीलिए आप एक हुए; आप प्राणों को भूमा, बहुत, जानकर गाइए, तो आपके अनेक होंगे।” हम जिस चीज़ को जैसा देखते हैं, वैसा ही उसका फल हम पर उतरता है; एक को एक देखिए तो एक मिलता है, अनेक को अनेक देखिए तो अनेक। खण्ड का अन्तिम मन्त्र एक व्यावहारिक बात कहता है: क्योंकि उद्गीथ और प्रणव एक ही हैं, इसलिए उद्गाता से गान में कोई भूल हो जाए तो होता अपनी बैठक से प्रणव पढ़कर उसे सुधार देता है। ॐ हर टूटे गान को जोड़ देता है।

सार: तीन वेदों में छिपे देवों को मृत्यु ने मछली की तरह देख लिया; वे ॐ के स्वर में घुसकर अमर और अभय हुए। उद्गीथ और प्रणव एक हैं; कौषीतकि की सीख है कि हम जिस चीज़ को जैसा जानकर गाते हैं, वैसा ही फल पाते हैं।

ऋचा पर बैठा साम: सूर्य के भीतर और आँख के भीतर का पुरुष (खण्ड 6 और 7)

छठा खण्ड साम शब्द को ही खोलकर दिखाता है। पृथिवी ऋचा है, अग्नि साम; यह साम उस ऋचा पर बैठा है, इसीलिए साम ऋचा पर चढ़कर गाया जाता है। पृथिवी सा है, अग्नि अम है, दोनों मिलकर साम। इसी तरह अन्तरिक्ष ऋचा और वायु साम; द्युलोक ऋचा और आदित्य साम; नक्षत्र ऋचा और चन्द्रमा साम। फिर सूर्य के ही भीतर: उसकी जो सफ़ेद चमक है वह ऋचा है, और जो नीला, गहरे काले से भी परे रंग है, वह साम। सामगान का ढाँचा यही है, नीचे ऋचा के शब्द, ऊपर उन पर तैरता स्वर; और उपनिषद् कहता है कि पूरा जगत् इसी ढाँचे में बना है, नीचे आधार, ऊपर उस पर तैरता प्राण।

और तब उपनिषद् उस दृश्य पर ले जाता है जो इस अध्याय का सबसे चमकीला चित्र है। सूर्य के भीतर एक हिरण्मय, सुनहरा, पुरुष दिखाई देता है, सुनहरी दाढ़ी, सुनहरे केश, नखों की नोक तक सारा सोना। उसकी दोनों आँखें कप्यास कमल जैसी हैं। इस कप्यास शब्द पर पाठक बँटे हुए हैं: शांकरभाष्य इसे कपि के आसन की तरह लाल, खिले कमल का रंग पढ़ता है, जबकि बाद के वैष्णव आचार्यों ने इसमें सूर्य की किरण से खिले कमल का अर्थ लिया।

उसका नाम उत् है, क्योंकि वह सारे पापों से ऊपर उठा हुआ है, और जो ऐसा जानता है वह भी सारे पापों से ऊपर उठ जाता है। ऋचा और साम उसके दो गेष्ण (जोड़, या गाने वाले) हैं, इसीलिए वह उद्गीथ है और उसका गाने वाला उद्गाता। वह सूर्य से परे के लोकों पर और देवों की कामनाओं पर शासन करता है। यह अधिदैवत दृष्टि हुई।

सातवाँ खण्ड वही ढाँचा देह के भीतर उतारता है। वाणी ऋचा, प्राण साम; आँख ऋचा, आत्मा (आँख में झलकती छाया) साम; कान ऋचा, मन साम। आँख की सफ़ेद चमक ऋचा, और उसका नीला, गहरे काले से परे रंग, साम। और जो पुरुष इस आँख के भीतर दिखाई देता है, वही ऋचा है, वही साम, वही उक्थ, वही यजुष, वही ब्रह्म। उसका रूप उस सूर्यवाले पुरुष का रूप है, उसके जोड़ उसी के जोड़, उसका नाम उसी का नाम। वह इस ओर के लोकों पर और मनुष्यों की कामनाओं पर शासन करता है। जो लोग वीणा पर गाते हैं, वे इसी को गाते हैं, इसीलिए वे धन पाते हैं। सूर्य में जो देखा, वही अपनी पुतली में देखा; बाहर और भीतर की दूरी इस उपनिषद् में बार-बार इसी तरह मिटती है।

फिर फल। जो ऐसा जानकर साम गाता है, वह दोनों को गाता है: उस सूर्यवाले से वह परे के लोक और देवों की कामनाएँ पाता है, इस आँखवाले से इस ओर के लोक और मनुष्यों की कामनाएँ। इसलिए ऐसा जानने वाला उद्गाता यजमान से पूछ सकता है, “आपकी कौन-सी कामना गाकर पूरी करूँ?” क्योंकि जो ऐसा जानकर साम गाता है, वही कामनाओं को गाकर पूरा करने में समर्थ है। यह अधिकार का वाक्य है, और इसका आधार सुर की मिठास से आगे, यह देखना है कि गान किसका हो रहा है।

सार: साम ऋचा पर बैठकर गाया जाता है, जैसे अग्नि पृथिवी पर, वायु अन्तरिक्ष पर; पूरा जगत् इसी ढाँचे में है। सूर्य के भीतर का सुनहरा पुरुष और आँख के भीतर का पुरुष एक ही हैं, एक ही नाम, एक ही रूप; जो दोनों को जानकर गाता है, वह देवों और मनुष्यों की कामनाओं का स्वामी होता है।

तीन उद्गीथ-कुशल और आकाश की गति (खण्ड 8 और 9)

अब उपनिषद् एक बैठक में ले जाता है। तीन जन उद्गीथ में कुशल हुए: शिलक शालावत्य, चैकितायन दाल्भ्य और प्रवाहण जैवलि। तीनों ने कहा, “हम उद्गीथ में कुशल हैं, आइए उद्गीथ पर बात करें।” तीनों बैठे। प्रवाहण जैवलि, जो क्षत्रिय थे, बोले, “आप दोनों भगवान् पहले बोलिए; दो ब्राह्मणों की बात हम सुनेंगे।” तब शिलक ने दाल्भ्य से कहा, “क्या हम आपसे कुछ पूछें?” दाल्भ्य ने कहा, “पूछिए।” यहाँ से जो प्रश्नमाला चलती है, वह एक सीढ़ी है, जिसकी हर पैड़ी पूछती है कि इसकी गति, इसका आधार, क्या है।

शिलक ने पूछा, “का साम्नो गतिः”, साम की गति क्या है? दाल्भ्य: “स्वर।” “स्वर की गति?” “प्राण।” “प्राण की?” “अन्न।” “अन्न की?” “जल।” “जल की?” “वह लोक, स्वर्ग।” “उस लोक की?” दाल्भ्य ने कहा, “स्वर्ग लोक से आगे नहीं ले जाना चाहिए। हम साम को स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठित करते हैं, क्योंकि साम की स्तुति स्वर्ग के रूप में की गई है।” शिलक शालावत्य ने कहा, “दाल्भ्य, आपका साम तो अप्रतिष्ठित है, बिना आधार का; यदि अभी कोई कहे कि आपका सिर गिर जाएगा, तो गिर ही जाएगा।” दाल्भ्य झुके, “तो हम यह आपसे जान लें।” “जानिए।”

शिलक ने वही सीढ़ी आगे बढ़ाई: “उस लोक की गति?” “यह लोक।” “इस लोक की?” शिलक ने कहा, “प्रतिष्ठा लोक से आगे नहीं ले जाना चाहिए; हम साम को प्रतिष्ठा में, इस पृथिवी में, स्थापित करते हैं, क्योंकि साम की स्तुति प्रतिष्ठा के रूप में हुई है।” अब प्रवाहण जैवलि बोले, “शालावत्य, आपका साम तो अन्तवाला है, उसका छोर आ जाता है; यदि अभी कोई कहे कि आपका सिर गिर जाएगा, तो गिर ही जाएगा।” शिलक ने कहा, “तो हम यह आपसे जान लें।” “जानिए।” जो दोनों ब्राह्मणों को सुनने बैठा था, वही अन्त में गुरु ठहरा।

नवें खण्ड में प्रवाहण उत्तर देते हैं। “इस लोक की गति क्या है?” “आकाश। ये सारे भूत आकाश से ही उत्पन्न होते हैं और आकाश में ही अस्त होते हैं। आकाश ही इन सबसे बड़ा है, आकाश ही परायण, परम आश्रय, है।” यह आकाश खुली हवा का नाम है और उससे बहुत आगे उस खुलेपन का भी, जिसमें सारे लोक बसते और मिटते हैं; शांकरभाष्य यहाँ आकाश को परब्रह्म का ही नाम मानता है। “स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः”, यही उद्गीथ परोवरीयान् है, उत्तर से उत्तर, श्रेष्ठ से श्रेष्ठ, और यही अनन्त है। जो इसे ऐसा जानकर उपासना करता है, उसका जीवन उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता जाता है और वह श्रेष्ठ से श्रेष्ठ लोक जीतता है।

खण्ड एक और नाम जोड़ता है। अतिधन्वा शौनक ने यही उद्गीथ उदरशाण्डिल्य को बताकर कहा था, “जब तक आपके वंश में लोग इस उद्गीथ को जानते रहेंगे, तब तक इस लोक में उनका जीवन औरों से ऊँचा रहेगा, और उस लोक में उनकी स्थिति भी।” जो ऐसा जानकर उपासना करता है, उसका जीवन यहाँ श्रेष्ठ होता है और वहाँ लोक भी। साम की जो गति स्वर्ग पर रुक रही थी, या धरती पर, वह आकाश पर आकर ठहरी, जिसका कोई छोर है ही नहीं।

सार: साम की गति स्वर से प्राण, प्राण से अन्न, अन्न से जल, जल से स्वर्ग और फिर इस लोक तक जाती है, पर दाल्भ्य और शिलक दोनों बीच में रुक गये। प्रवाहण जैवलि ने आकाश को परम आश्रय बताया; वही उद्गीथ है, उत्तरोत्तर श्रेष्ठ और अनन्त।

उषस्ति चाक्रायण: भूखे विद्वान का यज्ञ (खण्ड 10 और 11)

कुरु देश पर ओलों की मार पड़ी थी (मटची शब्द को कुछ पाठक टिड्डी-दल पढ़ते हैं; शांकरभाष्य ओलों की चोट ही मानता है) और खेत उजड़ चुके थे। उन्हीं दिनों उषस्ति चाक्रायण अपनी पत्नी आटिकी के साथ हाथीवालों के एक गाँव में बेहाल पड़े थे। भूख ऐसी थी कि विद्वान ब्राह्मण एक इभ्य (हाथी रखने वाले धनी, या महावत) के द्वार पर जा खड़े हुए, जो घटिया उड़द के दाने, कुल्माष, खा रहा था। उषस्ति ने भिक्षा माँगी। उसने कहा, “और कुछ है ही नहीं। बस यही हैं, जो हमारे आगे रखे हैं।” उषस्ति ने कहा, “तो इन्हीं में से हमें दे दीजिए।” उसने दे दिये।

फिर बोला, “लीजिए, पीने का पानी भी।” उषस्ति ने कहा, “वह तो आपका उच्छिष्ट, जूठा, पीना हुआ।” इभ्य चौंका, “तो क्या ये दाने जूठे नहीं हैं?” उषस्ति ने उत्तर दिया, “इन्हें न खाते तो हम जीते ही नहीं; पानी तो हमें जहाँ चाहें मिल जाएगा।” यह वाक्य इस कथा की धुरी है। धर्म की रेखा वहाँ हटती है जहाँ प्राण जाने का डर हो; जहाँ प्राण सुरक्षित हो, वहाँ वही रेखा फिर लौट आती है। उषस्ति ने जितने खाये, बचे हुए दाने पत्नी के लिए ले आये। पत्नी को उस दिन अच्छी भिक्षा मिल चुकी थी; उसने दाने लेकर सँभालकर रख दिये।

सुबह उठते ही उषस्ति ने कहा, “काश हमें थोड़ा अन्न मिल जाए, तो थोड़ा धन भी मिल सकता है। वह जो राजा हैं, यज्ञ करने वाले हैं; वे हमें सारे ऋत्विज् कर्मों के लिए चुन सकते हैं।” पत्नी ने कहा, “लीजिए स्वामी, यही कल के उड़द रखे हैं।” उन्हें खाकर उषस्ति उस विस्तृत यज्ञ में पहुँचे। वहाँ आस्ताव (स्तुति गाने की जगह) पर उद्गाता लोग गाने को बैठे थे। उषस्ति उनके पास जाकर बैठ गये और प्रस्तोता (साम का पहला भाग, प्रस्ताव, गाने वाला) से बोले, “प्रस्तोता, जो देवता प्रस्ताव के पीछे है, उसे बिना जाने यदि आप प्रस्ताव गाएँगे, तो आपका सिर गिर जाएगा।”

यही उन्होंने उद्गाता से कहा, “जो देवता उद्गीथ के पीछे है, उसे बिना जाने गाएँगे तो सिर गिर जाएगा,” और प्रतिहर्ता (साम का उत्तर-भाग, प्रतिहार, गाने वाला) से भी। तीनों ऋत्विज् रुक गये और चुपचाप बैठ रहे। फटे कपड़ों वाले एक अजनबी ने, जो कल तक जूठे उड़द के लिए झगड़ रहा था, राजा का यज्ञ थाम दिया। यजमान (यज्ञ कराने वाले राजा) ने पास आकर कहा, “भगवन्, हम जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं।” “हम उषस्ति चाक्रायण हैं।” राजा बोले, “इन सारे ऋत्विज् कर्मों के लिए हमने आपको ही खोजा था; आप न मिले तो औरों को चुना। अब आप ही हमारे सब कर्मों के ऋत्विज् हों।”

उषस्ति ने कहा, “ठीक है। पर ये ही लोग, हमारी अनुमति से, स्तुति गाएँ; और जितना धन आप इन्हें दें, उतना ही हमें दें।” राजा ने कहा, “ऐसा ही हो।” तब प्रस्तोता पास आये, “भगवन्, आपने कहा कि बिना जाने गाने से सिर गिर जाएगा; वह देवता कौन है?” उषस्ति बोले, “प्राण। ये सारे भूत प्राण में ही समाते हैं और प्राण से ही उठते हैं; वही देवता प्रस्ताव के पीछे है। उसे बिना जाने गाते तो आपका सिर गिर जाता, जैसा हमने कहा था।”

उद्गाता आये, “उद्गीथ का देवता कौन?” “आदित्य। ये सारे भूत ऊँचे उठे हुए आदित्य को ही गाते हैं।” प्रतिहर्ता आये, “प्रतिहार का देवता कौन?” “अन्न। ये सारे भूत अन्न को ही ग्रहण करते हुए जीते हैं।” जिस आदमी को कल अन्न ने जिलाया था, उसने आज अन्न को देवता कहा, और यह बात उसके मुँह से किसी और से ज़्यादा सच निकली। तीन उत्तर, और तीनों में वही एक धागा जो पहले खण्ड से चला आ रहा है: प्राण, उसका बाहरी रूप सूर्य, और उसका भोजन अन्न। यज्ञ फिर चला, पर अब गाने वाले जानते थे कि किसे गा रहे हैं।

सार: उजड़े कुरु देश में भूखे उषस्ति ने जूठे उड़द खाये, पर पानी लेने से मना किया, क्योंकि प्राण का संकट वहाँ नहीं था। राजा के यज्ञ में उन्होंने तीनों ऋत्विजों को चुप कराकर बताया कि प्रस्ताव के पीछे प्राण, उद्गीथ के पीछे आदित्य और प्रतिहार के पीछे अन्न देवता है।

कुत्तों का उद्गीथ और स्तोभों का पाठ (खण्ड 12 और 13)

अब शौव उद्गीथ, कुत्तों का उद्गीथ। बक दाल्भ्य, जिन्हें ग्लाव मैत्रेय भी कहते हैं, स्वाध्याय के लिए गाँव से बाहर निकले। उनके सामने एक सफ़ेद कुत्ता प्रकट हुआ। दूसरे कुत्ते उसके पास आकर बोले, “अन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा”, भगवन्, हमारे लिए अन्न गाइए, हम भूखे हैं। सफ़ेद कुत्ते ने उन्हें कहा, “कल सुबह यहीं मेरे पास आइए।” बक दाल्भ्य वहीं रुककर प्रतीक्षा करते रहे, क्योंकि यह दृश्य छूटने वाला नहीं था।

सुबह कुत्ते आये। जैसे बहिष्पवमान स्तोत्र गाने वाले ऋत्विज् एक दूसरे को थामे पंक्ति में सरकते हुए आस्ताव तक जाते हैं, वैसे ही वे एक दूसरे से जुड़े सरकते हुए आये, बैठे, और पहले हिं की ध्वनि की, जैसे उद्गाता गान से पहले हिंकार करता है। फिर गाया: “ओ३मदा३मों३पिबा३मों३”, ॐ हम खाएँ, ॐ हम पिएँ; ॐ, देव वरुण, प्रजापति, सविता यहाँ अन्न लाएँ; हे अन्न के स्वामी, यहाँ अन्न लाइए, लाइए, ॐ। स्वर वही, हिंकार वही, ढंग वही, बस गाने वाले कुत्ते। और उनकी प्रार्थना में वह सारा कर्मकाण्ड जिस एक शब्द पर उतर आया, वह अन्न था।

इस दृश्य को उपनिषद् बिना टिप्पणी छोड़ देता है, और वही इसकी ताक़त है। एक पढ़ने वाला इसमें यज्ञ के गायकों पर हँसी देख सकता है, जो बड़े-बड़े देवताओं का नाम लेकर दरअसल अन्न और दक्षिणा गा रहे हैं। दूसरा इसमें एक बड़ी बात देख सकता है, कि उद्गीथ कुत्तों तक फैला है, कि जो भूखा है वह भी उसी प्राण को गा रहा है जिसे उद्गाता गाता है, और अन्न की पुकार जगत् की सबसे ईमानदार पुकार है। उषस्ति की कथा के ठीक बाद यह कथा रखी गई है, और दोनों में एक ही सूत्र है: प्राण को अन्न चाहिए, और जो यह जानता है, वही असली गायक है।

तेरहवाँ खण्ड साम गायकों की एक भीतरी विद्या है, स्तोभों की। स्तोभ वे अतिरिक्त ध्वनियाँ हैं, हाउ, हाइ, अथ, इह, ई, ऊ, ए, औहोयि, हिं, जिन्हें सामगान में ऋचा के शब्दों के बीच भरा जाता है; बाहर से वे बेमानी लगती हैं। उपनिषद् हर स्तोभ पर एक देवता रखता है: हाउ यह लोक है, हाइ वायु, अथ चन्द्रमा, इह आत्मा, ई अग्नि; ऊ आदित्य, ए निहव (आह्वान), औहोयि विश्वेदेव, हिं प्रजापति; स्वर प्राण है, या अन्न है, और वाक् विराट् है। तेरहवाँ स्तोभ हुं अनिरुक्त है, जिसे कोई एक नाम नहीं दिया गया, जो इधर-उधर संचरण करता रहता है। जो सामों के इस उपनिषद् को, इस रहस्य को, इस प्रकार जानता है, उसके लिए वाणी दूध देती है और वह अन्नवान, अन्न खाने वाला होता है।

सार: बक दाल्भ्य ने देखा कि कुत्ते भी ऋत्विजों की तरह पंक्ति बाँधकर, हिंकार करके, अन्न के लिए ॐ गाते हैं; भूख की यह पुकार पूरे उद्गीथ का सबसे सीधा रूप है। स्तोभ, सामगान की बेमानी-सी ध्वनियाँ, हर एक किसी लोक या देवता का नाम हैं; और तेरहवाँ, हुं, अनिरुक्त है, जिसका कोई नाम नहीं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस अध्याय को पढ़कर उठिए तो एक साधारण बात हाथ में रह जाती है: हम दिन भर कुछ न कुछ गा रहे हैं। दफ़्तर की बात, घर की बात, मन के भीतर चलती हुई बात, सब में एक सुर है और उस सुर के नीचे एक साँस। यह उपनिषद् पूछता है कि वह गान किसका हो रहा है। देवों ने नाक, वाणी, आँख, कान और मन में अपना उद्गीथ रखा और हर बार बिंध गये, क्योंकि हर इन्द्रिय अपनी पसन्द रखती है। हमारी हार भी अक्सर वहीं होती है जहाँ हम अपनी पसन्द को सत्य समझ लेते हैं। वह प्राण, जो सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों को बराबर लेता है, हमारे भीतर आज भी चल रहा है; उसे दिन में एक बार सुनना उपासना की शुरुआत है।

उषस्ति की कथा हमें अपने कठिन दिनों की याद दिलाती है। जूठे उड़द खाने पड़ें, तो खाइए, क्योंकि प्राण से बड़ा नियम कोई है ही नहीं; पर जहाँ प्राण को ख़तरा न हो, वहाँ रेखा फिर खींच लीजिए, जैसे उषस्ति ने पानी के लिए खींची। और भूखे पेट भी अपनी विद्या मत छोड़िए, क्योंकि वही एक दिन आपको राजा के यज्ञ में बैठने का अधिकार देगी। कुत्तों का गान अपने साथ रखिए, ताकि जब कभी अपने ज्ञान या अपनी प्रार्थना पर गर्व आये, याद रहे कि हर जीव उसी अन्न, उसी प्राण को गा रहा है।

और सबसे अन्त में वह सीढ़ी, जिस पर शिलक और दाल्भ्य रुक गये और प्रवाहण चढ़ गये। स्वर से प्राण, प्राण से अन्न, अन्न से जल, जल से लोक, लोक से आकाश। हमारे जीवन में भी हर चीज़ किसी पर टिकी है, और वह किसी और पर; पूछते जाइए कि इसकी गति क्या है, तो एक दिन उत्तर खुले आकाश जैसा आता है, जिसमें सब उगता और सब मिटता है, और जो स्वयं कहीं नहीं जाता। वहाँ पहुँचकर ॐ कहिए। साम गायकों का यह उपनिषद् आगे के अध्यायों में इसी आकाश को नये नामों से पुकारेगा, और छठे अध्याय में उद्दालक इसे अपने बेटे से कहेंगे, वह तत्त्व आप ही हैं।

आधार: छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 1, खण्ड 1 से 13; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।