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आसमान में बादल घिर आये हैं। गरज उठती है और गुरुकुल के आँगन में बैठा कोई पुराना आचार्य सिर उठाकर मुस्कुराता है। उसे उस गरज में तीन बार एक ही अक्षर सुनाई देता है, “द, द, द”। वह अपने शिष्यों से कहता है, सुनिए, यह वही आवाज़ है जो सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ने अपने तीन तरह के बेटों को दी थी, और हर बेटे ने उसमें अपनी ही ज़रूरत का आदेश सुना था। बृहदारण्यक का पाँचवाँ अध्याय ऐसे ही छोटे, चमकते टुकड़ों से बना है, जहाँ एक अक्षर, एक शब्द, एक साँस के भीतर पूरा ब्रह्म समेट दिया गया है।
चार अध्यायों तक यह उपनिषद् बड़े संवादों में चला है, जनक की सभा, गार्गी के प्रश्न, मैत्रेयी का धन को ठुकराना। पाँचवें अध्याय में उसकी चाल बदल जाती है। यहाँ पन्द्रह छोटे ब्राह्मण (खण्ड) हैं, और हरेक एक अलग उपासना है, यानी किसी एक चीज़ को ब्रह्म की तरह देखने का अभ्यास। हृदय को, सत्य को, बिजली को, वाणी को, भीतर की आग को, साँस को, गायत्री को। परम्परा इस भाग को खिल काण्ड कहती है, यानी पूरक भाग, पर इसमें ठहरकर देखिए तो यह अध्याय पूछता है कि जो ज्ञान पिछले अध्यायों में सुना गया, वह रोज़ की साँस, रोज़ की रोटी और आख़िरी घड़ी में कहाँ बैठता है।
इस अध्याय के मुख्य किरदार
प्रजापति: सब प्राणियों के पिता, जो अपने तीन तरह के बेटों को एक ही अक्षर में तीन उपदेश देते हैं।
देव, मनुष्य और असुर: प्रजापति की तीन संतानें, जो ब्रह्मचर्य पूरा करके एक ही “द” को तीन तरह से सुनती हैं।
कौरव्यायणीपुत्र: वह आचार्य जिनका एक वाक्य, आकाश ही ब्रह्म है, इस अध्याय की पहली पंक्तियों में दर्ज है।
प्रातृद और उनके पिता: पिता-पुत्र की छोटी बातचीत, जिसमें अन्न और प्राण के जोड़ का रहस्य दो अक्षरों में खुलता है।
जनक वैदेह और बुडिल आश्वतराश्वि: विदेह का सम्राट और वह विद्वान जो गायत्री जानने का दावा करके भी उसका मुख नहीं जानता था।
पूषन्, सूर्य: वह देवता जिनसे अन्तकाल में सोने का ढक्कन हटाने की प्रार्थना की जाती है।
पूर्ण से पूर्ण उठता है: शान्ति-मन्त्र और आकाश
अध्याय की पहली पंक्ति वही है जो आज हर सत्संग के आरम्भ में गूँजती है, “पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते”, वह पूर्ण है, यह पूर्ण है, पूर्ण से ही पूर्ण उठता है। और फिर अगली पंक्ति, पूर्ण में से पूर्ण निकाल लीजिए तो पीछे पूर्ण ही बचता है। मन्त्र में अदः यानी वह, परोक्ष, इन्द्रियों से परे ब्रह्म है, और इदम् यानी यह, सामने फैला हुआ जगत। दोनों पूर्ण हैं। जगत ब्रह्म से निकला है, पर निकलने से ब्रह्म में कोई घट नहीं हुआ, जैसे दीये से दीया जलाने पर पहली लौ छोटी नहीं पड़ती।
गणित की भाषा में इसे समझना कठिन है, क्योंकि गणित में किसी चीज़ से कुछ निकालें तो बाक़ी कम होता है। उपनिषद् यहाँ गणित छोड़कर अनुभव की ओर ले जाता है। समुद्र की एक लहर उठती है, उसका अपना आकार है, अपना नाम, अपना उठना और गिरना। पर लहर के उठने से समुद्र में कितना पानी कम हुआ? लहर पूरी की पूरी समुद्र है, और समुद्र लहर के उठने के बाद भी पूरा का पूरा समुद्र है। ऐसा ही यह जगत है, और ऐसे ही हम हैं। इसलिए यह मन्त्र शान्ति-मन्त्र कहलाता है, क्योंकि जो इसे मान लेता है, उसके भीतर से कमी का डर उतर जाता है।
इसके बाद उपनिषद् एक पुराने आचार्य का वचन दर्ज करता है। कौरव्यायणीपुत्र कहते थे, “खं ब्रह्म”, आकाश ही ब्रह्म है। वह आकाश पुराण है, यानी पुरातन, सृष्टि से पहले का, और उसमें वायु बहती है, इसलिए वह वायु से भरा आकाश है। यहाँ आकाश शब्द से मतलब उस अनन्त खुलेपन से है जिसमें सब कुछ जगह पाता है और जो स्वयं किसी से घिरा नहीं है। कुछ पाठों में इस वाक्य के आरम्भ में ओंकार भी है, और शांकरभाष्य उसी ओम् को लेकर आगे की पंक्ति पढ़ता है: ब्राह्मण इस वेद को जानते हैं, यानी इस अक्षर को, और इसी से जानने योग्य सब कुछ जाना जाता है।
पहली ही पंक्तियों में यह अध्याय अपना ढंग बता देता है। यहाँ छोटे-छोटे सूत्र हैं, जिन्हें बार-बार दोहराकर, आँख बन्द करके, अपने भीतर उतारना है। पूर्ण से पूर्ण उठता है। आकाश ब्रह्म है। यह जानना पढ़ने की चीज़ से ज़्यादा जीने की चीज़ है, और आगे के चौदह ब्राह्मण इसी जीने के अलग-अलग द्वार खोलते हैं। कोई द्वार बादल की गरज से खुलता है, कोई अपनी धड़कन से, कोई कान बन्द करके सुनी गयी गूँज से, और आख़िरी द्वार डूबते सूरज के सामने खड़े एक मनुष्य की प्रार्थना से।
सार: पहला ब्राह्मण दो बातें रखता है: ब्रह्म पूर्ण है और उससे निकला जगत भी पूर्ण है, क्योंकि पूर्ण से लेने पर पूर्ण घटता नहीं। और आकाश, वह अनन्त खुलापन जिसमें सब टिका है, ब्रह्म का सबसे सहज प्रतीक है। दोनों बातें कमी के डर को हटाने के लिए कही गयी हैं।
“द, द, द”: एक अक्षर, तीन आदेश

बात सृष्टि के आदि की है। प्रजापति (सृष्टि के रचयिता, सब प्राणियों के पिता) के पास तीन तरह की संतानें ब्रह्मचर्य का व्रत पूरा करके खड़ी थीं, यानी गुरु के घर रहकर अध्ययन समाप्त कर चुकी थीं। पहले देवता आये, फिर मनुष्य, और अन्त में असुर। तीनों ने हाथ जोड़कर कहा, “हमें कुछ उपदेश दीजिए।” प्रजापति ने हर बार बस एक अक्षर बोला, “द”। और हर बार पूछा, “क्या आप समझे?” पाठ में यह प्रश्न एक खिंचे हुए स्वर के साथ लिखा है, व्यज्ञासिष्टा३, जैसे कोई गुरु सिर तिरछा करके पूछे, समझे भी?
देवताओं ने कहा, “हम समझ गये। आप हमसे कहते हैं दाम्यत, अपने को साधो, इन्द्रियों को क़ाबू में रखो।” प्रजापति ने कहा, “ओम्, आप ठीक समझे।” फिर मनुष्य आये। वही “द”। मनुष्यों ने कहा, “आप कहते हैं दत्त, दो, बाँटो।” प्रजापति बोले, “ओम्, यही।” फिर असुर आये, वही “द”, और असुरों ने कहा, “आप कहते हैं दयध्वम्, दया करो।” प्रजापति ने फिर वही “ओम्” कहा। ध्यान दीजिए, गुरु का हाँ कहना भी यहाँ ओंकार से है। एक ही अक्षर, तीन शिष्य, तीन अलग आदेश, और तीनों पर गुरु की मुहर।
उपनिषद् इसके बाद कहता है कि यह कथा बीते समय से आगे चलती है। आज भी जब बादल गरजते हैं, तो वह दैवी वाणी वही अक्षर दोहराती है, द, द, द। दम्यत, दत्त, दयध्वम्। और फिर आदेश की तरह वाक्य आता है कि इन तीनों को सीखना चाहिए, दम, दान और दया। यह वाक्य हर उस कान के लिए है जो गरज सुन सकता है। खेत में खड़ा किसान, महल में बैठा राजा, वन में बैठा तपस्वी, आकाश तीनों से एक ही स्वर में बोलता है।
यहाँ चमत्कार यह है कि गुरु ने तीनों को अलग-अलग शिक्षा दी ही नहीं। शब्द एक था। फ़र्क़ सुनने वाले के भीतर था। हर शिष्य ने उस अधूरे अक्षर को अपनी गहरे-से-गहरी ज़रूरत से भर दिया। जिसको जिस बात की कमी थी, उसने वही सुना। देवता सुख और भोग में डूबे रहने वाले हैं, इसलिए उन्हें साधने का आदेश सुनाई दिया। मनुष्य संग्रह करते हैं, मुट्ठी बाँधे रखते हैं, इसलिए उन्हें बाँटने का आदेश सुनाई दिया। असुरों का स्वभाव क्रूरता की ओर झुका है, इसलिए उन्हें दया सुनाई दी। हरेक ने अपने रोग की दवा सुनी।
और फिर एक बात जो पढ़ने वाले को अपनी ओर मोड़ देती है। देव, मनुष्य और असुर तीनों प्रजापति की ही संतानें हैं, और तीनों एक ही घर में ब्रह्मचर्य पालते हैं। यानी ये तीन स्वभाव किसी दूर की जाति के नाम से आगे, एक ही मन के तीन झुकाव हैं। किसी दिन हमारा मन भोग की ओर दौड़ता है, किसी दिन बटोरने की ओर, किसी दिन किसी को चुभती बात कहकर सुख लेने की ओर। उस दिन जो गरज सुनाई दे, उसमें अपने लिए सही “द” चुन लेना ही इस ब्राह्मण का अभ्यास है।
सार: प्रजापति ने देव, मनुष्य और असुर तीनों को एक ही अक्षर “द” दिया, और तीनों ने अपनी कमी के अनुसार दम, दान और दया सुना। बादल की गरज आज भी वही तीन आदेश दोहराती है। सच्चा उपदेश आईना है, और ये तीन दवाएँ हम सबके भीतर बैठे तीन झुकावों के लिए हैं।
हृदय के तीन अक्षर, और सत्य नाम का महान यक्ष
अगला ब्राह्मण एक वाक्य से खुलता है जिसे धीरे पढ़ना चाहिए, “एष प्रजापतिर्यद्धृदयम्”, यह जो हृदय है, यही प्रजापति है। फिर, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है। पिछले ब्राह्मण में प्रजापति गुरु की तरह बाहर बैठे थे। यहाँ वे भीतर, छाती के बीच, धड़कते हुए मिलते हैं। हृदय शब्द से उपनिषद् का मतलब माँस के उस टुकड़े से बहुत आगे जाता है जो रक्त भेजता है। हृदय वह जगह है जहाँ मन, प्राण और जानने की शक्ति एक साथ बैठते हैं, जहाँ हम सोते समय लौटते हैं और जहाँ से जागते समय निकलते हैं।
फिर उपनिषद् इस शब्द को तोड़कर दिखाता है। हृदयम् में तीन अक्षर हैं: हृ, द, यम्। हृ का सम्बन्ध हरण से है, लाना; जो इसे जानता है, उसके अपने लोग और दूसरे लोग भी उसके लिए भेंट लेकर आते हैं। द का सम्बन्ध देने से है; उसे अपने और पराये दोनों देते हैं। यम् का सम्बन्ध जाने से है, एति; वह स्वर्ग लोक को जाता है। यह अक्षरों का खेल आज के पढ़ने वाले को अजीब लग सकता है, पर उपनिषद् की परम्परा में शब्द की ध्वनि और उसका अर्थ एक-दूसरे में गुँथे माने जाते हैं। शब्द को अक्षर-अक्षर सुनना उस चीज़ को अक्षर-अक्षर जानना है।
चौथा ब्राह्मण उसी हृदय को दूसरा नाम देता है। वह जो हृदय था, वही यह था, और वह सत्य ही है। फिर बड़ा वाक्य आता है: जो इसे महद्यक्ष, यानी महान पूजनीय सत्ता, और प्रथमज, यानी सबसे पहले जन्मा, जानकर सत्यं ब्रह्म कहता है, वह इन लोकों को जीत लेता है। यक्ष शब्द यहाँ उस विराट, अद्भुत, पूज्य सत्ता के लिए आया है जो सबसे पहले प्रकट हुई, वही जिसे केन उपनिषद् में भी यक्ष कहा गया है। हृदय, प्रजापति, सत्य, महान यक्ष, चार नाम एक ही चीज़ के लिए, और वह चीज़ अपनी ही छाती में धड़क रही है।
इस ब्राह्मण के बीच में एक छोटा सा प्रश्न-उत्तर छिपा है। पाठ कहता है, जित इन्न्वसावसत्, क्या वह कभी जीता जायेगा? और उत्तर पाठ के स्वर में ही है, ऐसा जानने वाला कभी हारता नहीं। यह पंक्ति संधि में इतनी दबी है कि पढ़ने वाले इसे अलग-अलग तरह से तोड़ते रहे हैं; शांकरभाष्य इसे इसी तरह पढ़ता है कि जो सत्य को ब्रह्म जानता है, उसे कोई शत्रु जीत नहीं सकता। और अन्त में सीधा वाक्य, “सत्यं ह्येव ब्रह्म”, सत्य ही तो ब्रह्म है। जो है, वही ब्रह्म है। सत्य यहाँ बोलने की सच्चाई से शुरू होकर होने की सच्चाई तक फैला है।
सार: हृदय ही प्रजापति है, ब्रह्म है, सब कुछ है; उसके तीन अक्षर हृ, द, यम् लाने, देने और जाने का फल बताते हैं। वही हृदय सत्य है, सबसे पहले जन्मा महान यक्ष, और जो इसे सत्यं ब्रह्म जानकर उपासना करता है, वह लोकों को जीतता है और स्वयं कभी हारता नहीं।
स, ति, यम्: सत्य के भीतर घिरा असत्य, और सूर्य में बैठा पुरुष
पाँचवाँ ब्राह्मण सृष्टि की कथा को पानी से शुरू करता है। आरम्भ में यह सब जल ही था। उस जल ने सत्य को रचा, सत्य ब्रह्म है, ब्रह्म ने प्रजापति को रचा, प्रजापति ने देवों को। और देव उसी सत्य की उपासना करते हैं। यहाँ क्रम देखने लायक है: जल, फिर सत्य, फिर प्रजापति, फिर देव। यानी देवता भी सत्य के बाद आते हैं, और उनकी उपासना का विषय भी सत्य ही है। जो देवों का आराध्य है, वह मनुष्य के लिए भी सबसे ऊँचा आराध्य है।
फिर वही अक्षर-विद्या, इस बार सत्य शब्द पर। उपनिषद् इसे सतियम् कहकर तीन टुकड़े करता है: स, ति, यम्। पहला और आख़िरी अक्षर सत्य हैं, और बीच का अक्षर, ति, अनृत यानी असत्य है। ध्वनि की दृष्टि से स सत् से जुड़ता है और यम् भी सत्य के अन्त से, जबकि बीच का ति उन शब्दों की याद दिलाता है जिनमें असत्य छिपा है। और फिर वाक्य आता है कि यह असत्य दोनों ओर से सत्य से घिरा हुआ है, इसलिए सत्य ही हो जाता है। जो ऐसा जानता है, उसे असत्य हानि नहीं पहुँचाता।
इस छोटी बात में एक बड़ी करुणा है। उपनिषद् जानता है कि मनुष्य के जीवन के बीच में असत्य आता ही है, कभी डर से, कभी चूक से। वह यह भी जानता है कि यदि जीवन की शुरुआत सत्य पर हो और अन्त सत्य पर, तो बीच का वह टेढ़ा टुकड़ा दोनों ओर के सत्य से घिरकर धुल जाता है। यह उस आदमी के लिए हिम्मत की बात है जो एक ठोकर के बाद सोचता है कि अब सब बेकार हो गया। सिरे सच्चे रखिए, बीच का टेढ़ापन सिरों के दबाव में सीधा हो जाता है।
फिर उपनिषद् कहता है कि वह सत्य वही आदित्य है, आकाश का सूर्य। और यहाँ एक सुन्दर जोड़ रखा जाता है। सूर्य-मण्डल में जो पुरुष है और हमारी दाहिनी आँख में जो पुरुष है, ये दोनों एक-दूसरे पर टिके हैं। सूर्य का पुरुष किरणों के सहारे आँख के पुरुष में बसा है, और आँख का पुरुष प्राणों के सहारे सूर्य के पुरुष में। बाहर की रौशनी और भीतर की देखने की शक्ति एक ही सत्य के दो सिरे हैं। और जब आँख वाला पुरुष देह छोड़ने को होता है, तो उसे सूर्य-मण्डल शुद्ध, बिना किरणों का दिखता है; किरणें अब उसकी ओर लौटती नहीं। पुराने लोग कहते थे कि मरने वाले को सूर्य फीका दिखने लगता है; यह पंक्ति उसी अनुभव को दर्ज करती है।
दोनों पुरुषों का एक ही शरीर-चित्र दिया गया है। भूः उनका सिर है, एक अक्षर, एक सिर। भुवः दो बाहें हैं, दो अक्षर, दो बाहें। स्वः उनकी प्रतिष्ठा यानी पैर हैं, दो अक्षर, दो पैर। यही तीन व्याहृतियाँ हैं जिनसे गायत्री का जप शुरू होता है, और यहाँ वे एक पुरुष का शरीर बन जाती हैं। फिर हरेक का गुप्त नाम बताया जाता है, जिसे पाठ स्वयं उपनिषद् कहता है, यानी रहस्य-नाम। सूर्य के पुरुष का रहस्य-नाम है अहः, दिन; और आँख के पुरुष का रहस्य-नाम है अहम्, मैं। दोनों नाम हन् और हा धातुओं से खींचे गये हैं, पाप को मारना और छोड़ना; जो ऐसा जानता है, वह पाप को मारता और छोड़ता है।
उस अहम् पर एक पल ठहरिए। जो आँख से देख रहा है, उसका असली नाम मैं है, और वही सूर्य में बैठे दिन का जोड़ा है। छठा ब्राह्मण इसी पुरुष को हृदय में रखता है: यह मनोमय पुरुष है, मन ही जिसका उपादान है, भाःसत्य है, यानी प्रकाश ही जिसका सत्य रूप है, और वह हृदय के भीतर चावल या जौ के दाने बराबर है। इतना छोटा, और फिर भी सबका ईशान, सबका अधिपति, जो कुछ है उस सबका शासक। सातवाँ ब्राह्मण उसी को आकाश की बिजली में देखता है: विद्युत् ब्रह्म है, क्योंकि वह विदान करती है, यानी अँधेरे को चीरकर काटती है; जो ऐसा जानता है, उसके पापों को वह वैसे ही काट देती है।
सार: सत्य के तीन अक्षरों में बीच का असत्य दोनों ओर के सत्य से घिरकर सत्य हो जाता है। वही सत्य सूर्य है, और सूर्य का पुरुष तथा दाहिनी आँख का पुरुष एक-दूसरे पर टिके हैं; उनके रहस्य-नाम अहः और अहम् हैं। वही पुरुष हृदय में जौ के दाने बराबर बैठा सबका शासक है, और आकाश में बिजली बनकर अँधेरा काटता है।
वाणी नाम की गाय, और भीतर की आग का शोर
आठवाँ ब्राह्मण एक चरवाहे की तरह बात करता है, “वाचं धेनुमुपासीत”, वाणी की उपासना गाय की तरह करनी चाहिए। उस गाय के चार थन हैं: स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार। ये चारों यज्ञ और दान के शब्द हैं। स्वाहा और वषट् कहकर देवों को आहुति दी जाती है, इसलिए इन दो थनों से देवता जीते हैं। हन्त कहकर, यानी लीजिए कहकर, मनुष्यों को भोजन दिया जाता है, इसलिए वह थन मनुष्यों का है। स्वधा कहकर पितरों को अर्पण होता है, इसलिए वह थन पितरों का है। प्राण उस गाय का बैल है, और मन उसका बछड़ा।
इस चित्र को खोलिए तो यह वाणी की पूरी अर्थ-व्यवस्था है। बोला हुआ शब्द तीन लोकों को पालता है, ऊपर के देवों को, सामने के मनुष्यों को, पीछे छूट गये पितरों को। और गाय दूध तभी देती है जब बछड़ा पास हो; वाणी तभी सार्थक होती है जब मन उसके साथ हो। बैल प्राण है, क्योंकि साँस के बिना कोई शब्द बनता ही नहीं। जिस घर में वाणी इस तरह पली हो, वहाँ हर शब्द किसी को खिलाता है। जहाँ बछड़ा यानी मन कहीं और भागा हो, वहाँ थन सूख जाते हैं और शब्द खोखले पड़ जाते हैं।
नौवाँ ब्राह्मण भीतर उतरता है। यह जो पुरुष के भीतर अग्नि है, वह वैश्वानर है, सब मनुष्यों में रहने वाली आग, जिससे खाया हुआ अन्न पकता है। और फिर एक ऐसी बात, जो हर पढ़ने वाला अभी, इसी क्षण जाँच सकता है। उपनिषद् कहता है, इस आग का एक घोष है, एक गूँज, जो कान बन्द करके सुनने पर सुनाई देती है। दोनों हथेलियों से कान ढँक लीजिए, और भीतर एक हल्की, लगातार आवाज़ है, जैसे दूर कोई आग जल रही हो। यही वैश्वानर का शब्द है। और जब मनुष्य देह छोड़ने को होता है, तो उसे यह घोष सुनाई देना बन्द हो जाता है।
पाँचवें ब्राह्मण में मरते हुए को सूर्य बिना किरण दिखता था; यहाँ भीतर की आग चुप हो जाती है। दोनों पंक्तियाँ मृत्यु को डराने वाली शक्ल से उतारकर एक संकेत बना देती हैं: बाहर की रौशनी और भीतर की गूँज, दोनों प्राण के साथ हैं, और प्राण के जाने पर अपने स्रोत में लौट जाती हैं। जो जीते-जी इस घोष को सुनकर उसे ब्रह्म की तरह देखता है, उसके लिए भीतर की आग रोटी पकाने के साथ-साथ ध्यान का द्वार भी बन जाती है। हर भोजन के बाद पेट में जो गरमी उठती है, वह भी उसी वैश्वानर का काम है, और उसे इस तरह जानना भी एक उपासना है।
सार: वाणी को गाय की तरह देखिए, जिसके चार थन देवों, मनुष्यों और पितरों को पालते हैं; प्राण उसका बैल है और मन उसका बछड़ा, जिसके बिना दूध नहीं आता। भीतर की वैश्वानर आग अन्न पकाती है और कान बन्द करने पर उसकी गूँज सुनाई देती है; यह गूँज प्राण के जाते समय थम जाती है।
देह छोड़ने के बाद का रास्ता, परम तप, और अन्न-प्राण का जोड़ा
दसवाँ ब्राह्मण उस रास्ते का नक़्शा है जिस पर देह छोड़ने के बाद उपासक चलता है। जब पुरुष इस लोक से जाता है, वह वायु के पास आता है। वायु उसके लिए वहाँ खुल जाती है, जितना रथ के पहिये का छेद होता है, और उससे वह ऊपर चढ़ता है। फिर वह आदित्य के पास आता है; सूर्य उसके लिए खुलता है, जितना लम्बर यानी एक बड़े ढोल का मुख होता है। फिर वह चन्द्र के पास आता है; चन्द्र उसके लिए खुलता है, जितना दुन्दुभि का मुख। हर द्वार पिछले से बड़ा है, जैसे रास्ता जितना ऊपर जाता है, उतना चौड़ा होता जाता है।
और फिर वह पंक्ति जो इस पूरे नक़्शे का गन्तव्य है, “स लोकमागच्छत्यशोकमहिमम्”, वह उस लोक में पहुँचता है जहाँ शोक नहीं है और हिम यानी ठण्ड नहीं है। वहाँ वह शाश्वत वर्षों तक बसता है। शोक और ठण्ड, ये दो चीज़ें हैं जिनसे वन में रहने वाले ऋषि सबसे ज़्यादा परिचित थे: भीतर का दुख और बाहर की कँपकँपी। जिस लोक में ये दोनों नहीं, वही उनके लिए स्वर्ग की सबसे सीधी परिभाषा थी। इस ब्राह्मण को परम्परा में पिछली सब उपासनाओं के फल की घोषणा माना गया है।
ग्यारहवाँ ब्राह्मण तप शब्द को उठाकर उसका अर्थ बदल देता है। तप का सामान्य अर्थ है जान-बूझकर कष्ट सहना, उपवास, ठण्ड में खड़े रहना। उपनिषद् कहता है, परम तप यह है कि जब मनुष्य रोग से पीड़ित हो और तपे। परम तप यह है कि जब मरे हुए को अरण्य में ले जायें। परम तप यह है कि जब मरे हुए को आग में रखें। जो ऐसा जानता है, वह परम लोक को जीतता है। यानी रोग, मृत्यु और दाह, जो हरेक पर बिना माँगे आते हैं, उन्हें तप की तरह देखने वाला उन्हें यज्ञ बना देता है। जो कष्ट हमने चुना नहीं, उसे स्वीकार से चुन लेना ही यहाँ तप है।
बारहवाँ ब्राह्मण एक पुरानी बहस से खुलता है। कुछ कहते हैं अन्न ब्रह्म है। उपनिषद् उत्तर देता है, ऐसा नहीं है, क्योंकि प्राण के बिना अन्न सड़ जाता है। कुछ कहते हैं प्राण ब्रह्म है। उत्तर वही, ऐसा नहीं, क्योंकि अन्न के बिना प्राण सूख जाता है। ये दो देवता एक होकर ही परम पद को पाते हैं। रोटी और साँस, शरीर और चेतना, दोनों का जोड़ा ही जीवन है, और यही जोड़ा ब्रह्म के द्वार तक ले जाता है। जो केवल देह को पालता है और जो केवल साँस को साधता है, दोनों को उपनिषद् यहाँ एक साथ बैठने को कहता है।
इसी बात पर एक पिता-पुत्र की छोटी बातचीत दर्ज है। प्रातृद ने अपने पिता से कहा, “जो ऐसा जानता है, उसके लिए मैं क्या भला कर सकता हूँ, और क्या बुरा?” पिता ने हाथ के संकेत से उन्हें रोका, मा प्रातृद, यानी रुकिए, ऐसा मत पूछिए। पाठ में यहाँ पाणिना शब्द है, हाथ से; शांकरभाष्य इसे इसी तरह पढ़ता है कि पिता ने हाथ उठाकर बेटे को चुप कराया, क्योंकि ऐसे ज्ञानी का भला-बुरा किसी और के हाथ में होता ही नहीं। फिर पिता ने पूछा, “इन दोनों में एक होकर कौन परम पद को पाता है?” और स्वयं उत्तर दिया, दो अक्षरों में।
पहला अक्षर वि: अन्न वि है, क्योंकि सब प्राणी अन्न में विष्ट हैं, यानी प्रवेश किये हुए हैं। दूसरा अक्षर रम्: प्राण रम् है, क्योंकि सब प्राणी प्राण में रमते हैं। दोनों को जोड़िए तो विरम् बनता है, और उपनिषद् कहता है कि जो ऐसा जानता है, उसमें सब प्राणी प्रवेश करते हैं और उसमें रमते हैं। यहाँ भी वही ढंग है जो हृदय और सत्य के अक्षरों में था: शब्द को खोलकर उसके भीतर बैठा अर्थ दिखाना। एक पिता अपने बेटे को दो अक्षर देकर पूरा जीवन-दर्शन दे देता है, और बेटा उसे पीढ़ियों तक ले जाता है।
सार: देह छोड़ने के बाद उपासक वायु, सूर्य और चन्द्र के खुलते द्वारों से ऊपर चढ़कर उस लोक में पहुँचता है जहाँ शोक और ठण्ड दोनों नहीं। रोग, मृत्यु और दाह को तप की तरह लेना परम तप है। अन्न और प्राण, दोनों मिलकर ही परम पद पाते हैं; प्रातृद के पिता ने इसे वि और रम्, दो अक्षरों में समेट दिया।
उक्थ, यजुः, साम, क्षत्र: चारों प्राण
तेरहवाँ ब्राह्मण चार शब्द लेता है और हरेक को प्राण में बदल देता है। पहला है उक्थ, यानी ऋग्वेद का वह स्तोत्र जो यज्ञ में ऊँचे स्वर से गाया जाता है। उपनिषद् कहता है, प्राण ही उक्थ है, क्योंकि प्राण ही इस सब को उत्थापित करता है, उठाता है। सुबह जो हमें बिस्तर से उठाता है, वह भी प्राण है; जो बीज को मिट्टी से उठाता है, वह भी। और फल: उक्थ को जानने वाले के घर वीर पुत्र उठ खड़ा होता है, और वह उक्थ के साथ सायुज्य, यानी एकता, और सलोकता, यानी एक ही लोक में वास पाता है।
दूसरा शब्द यजुः, यानी यज्ञ के वे गद्य-मन्त्र जो क्रियाओं को जोड़ते हैं। प्राण ही यजुः है, क्योंकि प्राण में ही सब प्राणी युक्त हैं, जुड़े हैं। जब तक साँस है, हाथ-पैर, आँख-कान, सब एक साथ जुड़े काम करते हैं; साँस गयी, तो सब अलग-अलग पड़ जाते हैं। तीसरा शब्द साम, यानी गाया हुआ मन्त्र। प्राण ही साम है, क्योंकि प्राण में सब प्राणी सम्यक् मिलते हैं, एक स्वर में आते हैं। जो ऐसा जानता है, उसके लिए सब प्राणी मिलकर उसकी श्रेष्ठता के लिए तैयार होते हैं।
चौथा शब्द यज्ञ से बाहर का है, क्षत्र, यानी राज-शक्ति, रक्षा करने का बल। प्राण ही क्षत्र है, क्योंकि प्राण ही चोट से त्राण करता है, बचाता है। जब शरीर कहीं कटता है तो उसे भरने वाला भी प्राण है; इसीलिए क्षत्र, जिसका काम रक्षा है, उसका असली रूप प्राण है। जो ऐसा जानता है, वह ऐसा क्षत्र पाता है जिसे किसी और की रक्षा की ज़रूरत नहीं, और क्षत्र के साथ एकता और एक लोक पाता है। तीन वेदों के तीन अंग और राजा का बल, चारों को इस ब्राह्मण ने एक ही साँस में समेट दिया।
इस ब्राह्मण की चाल पर ध्यान दीजिए। वह उन्हीं शब्दों के भीतर प्राण को दिखा देता है जो उपासक रोज़ यज्ञ में बोलता है। यह उपनिषद् बार-बार यही करता है। कर्मकाण्ड के आदमी से उसका कर्म छीने बिना, उस कर्म का अर्थ भीतर की ओर मोड़ देता है। उक्थ गाते हुए जो यह जानता है कि गाने वाली साँस ही उक्थ है, उसका गाना प्रार्थना से ध्यान बन जाता है। और राजा, जो अपने बल पर गर्व करता है, यहाँ सीख लेता है कि उसका बल भी उसी साँस से उधार लिया हुआ है जो उसकी प्रजा के हर आदमी में चल रही है।
सार: उक्थ, यजुः, साम और क्षत्र, चारों प्राण हैं: प्राण उठाता है, जोड़ता है, एक स्वर में लाता है, और चोट से बचाता है। जो यह जानता है, वह इनके साथ एकता और एक लोक पाता है। रोज़ के यज्ञ के शब्दों को भीतर की साँस में देखना ही यह उपासना है।
गायत्री के चार पद, और जनक का बुडिल से प्रश्न
चौदहवाँ ब्राह्मण इस अध्याय का सबसे लम्बा और सबसे प्यारा हिस्सा है, और उसका विषय वह मन्त्र है जो हर उपनयन में बच्चे के कान में दिया जाता है, गायत्री। पर उपनिषद् गायत्री के शब्दों को छोड़कर उसके पदों की गिनती से शुरू करता है। भूमिः, अन्तरिक्षम्, द्यौः, ये तीन शब्द आठ अक्षर हैं, और गायत्री का एक पद भी आठ अक्षर का है। इसलिए पहला पद तीन लोक हैं; जो इसे जानता है, तीनों लोकों में जितना है, उतना जीत लेता है। ऋचः, यजूंषि, सामानि, फिर आठ अक्षर; दूसरा पद तीन वेद हैं। प्राणः, अपानः, व्यानः, फिर आठ अक्षर; तीसरा पद प्राण है, जो साँस लेता है वह सब।
और फिर चौथा पद, जिसे पाठ तुरीय कहता है, दर्शत यानी दिखने वाला, और परोरजस्, यानी सब रज से, सब लोकों से ऊपर तपता हुआ। वह यह सूर्य है जो तप रहा है। तुरीय का अर्थ है चौथा; दर्शत इसलिए कि वह दिखता है; परोरजस् इसलिए कि वह इन सब लोकों के ऊपर-ऊपर तपता है। जो इस चौथे पद को जानता है, वह श्री और यश से इसी तरह तपता है। यानी गायत्री के तीन पद गिने जा सकते हैं, लोक, वेद, प्राण, पर चौथा पद केवल देखा जा सकता है, वह गिनती में नहीं आता।
यहाँ से ब्राह्मण एक सुन्दर सोपान बनाता है। गायत्री उस चौथे पद पर टिकी है। वह पद सत्य पर टिका है। और सत्य क्या है? “चक्षुर्वै सत्यम्”, आँख ही सत्य है। क्योंकि जब दो आदमी झगड़ते हुए आयें, एक कहे मैंने देखा और दूसरा कहे मैंने सुना, तो हम उसी पर भरोसा करते हैं जिसने देखा। फिर वह सत्य बल पर टिका है, और बल प्राण है। इसीलिए कहा जाता है, बलं सत्यादोगीयः, बल सत्य से भी बढ़कर है। यह पंक्ति चौंकाती है, और इसके पाठ पर भी मत भिन्न हैं; शांकरभाष्य इसे ओजीयः पढ़कर यही अर्थ लेता है कि बल यानी प्राण के सहारे ही सत्य टिक पाता है, बिना बल के कोई सत्य बोल भी नहीं सकता। इस तरह गायत्री अध्यात्म में, अपने ही शरीर में, प्रतिष्ठित है।
फिर नाम का रहस्य। गायत्री ने गयों की रक्षा की; गय यानी प्राण; उसने प्राणों की रक्षा की, इसीलिए उसका नाम गायत्री है। और जो सावित्री आचार्य उपनयन में शिष्य को सुनाता है, वह यही है; जिसे वह सुनाता है, उसके प्राणों की रक्षा करता है। कुछ आचार्य सावित्री को अनुष्टुप् छन्द में सुनाते हैं, यह कहकर कि अनुष्टुप् वाक् है और हम वाक् सुना रहे हैं। उपनिषद् कहता है, ऐसा मत कीजिए; गायत्री ही सावित्री के रूप में सुनाइए। और फिर एक बहुत मानवीय बात: जो इसे जानता है, वह यदि बहुत दान भी ले ले, तो भी वह गायत्री के एक पद के बराबर भी नहीं होता।
उपनिषद् इसे नापकर दिखाता है। यदि कोई तीन लोक भरकर दान ले, तो उसने गायत्री का पहला पद पाया; यदि कोई तीन वेदों के बराबर ले, तो दूसरा पद; यदि जो कुछ साँस लेता है वह सब ले, तो तीसरा पद। और चौथा पद, वह तपता हुआ सूर्य, किसी से पाया ही नहीं जा सकता, तो उतना दान कोई कहाँ से ले? यानी गायत्री जानने वाले पर दान का बोझ चढ़ ही नहीं सकता, क्योंकि उसकी विद्या हर दान से बड़ी है। यही बात आगे जनक की कथा में उलटकर दिखाई जायेगी, जहाँ एक विद्वान पर यह बोझ चढ़ गया था।
फिर गायत्री का उपस्थान, यानी उसके सामने खड़े होकर कही जाने वाली वन्दना। “गायत्री, आप एकपदी हैं, द्विपदी हैं, त्रिपदी हैं, चतुष्पदी हैं। और आप अपद हैं, क्योंकि आप पायी नहीं जातीं। उस तुरीय, दर्शत, परोरजस् पद को नमस्कार।” फिर उपासक अपनी कामना जोड़ता है: यह कामना मुझे मिले; या, जिससे द्वेष हो उसके लिए, उसकी वह कामना पूरी न हो। उपनिषद् सीधा कहता है कि जिसके लिए ऐसा उपस्थान किया जाये, उसकी वह कामना पूरी नहीं होती। यह पंक्ति आज के पढ़ने वाले को असहज कर सकती है; पाठ इसे ईमानदारी से दर्ज करता है, क्योंकि वैदिक उपासना मनुष्य की सब कामनाओं को, अच्छी और कड़वी, सामने रखकर चलती थी।
और ब्राह्मण का अन्त एक कथा से होता है। विदेह के राजा जनक ने बुडिल आश्वतराश्वि से कहा, “आप तो कहते थे कि आप गायत्री-विद् हैं, गायत्री जानते हैं। फिर हाथी बनकर बोझ कैसे ढो रहे हैं?” बुडिल ने कहा, “सम्राट, हमने उसका मुख नहीं जाना था।” और उपनिषद् बताता है कि गायत्री का मुख अग्नि है। जैसे आग में कितनी भी लकड़ी डाल दें, वह सब जला देती है, वैसे ही जो ऐसा जानता है, वह कितना भी पाप करे, उसे सब जलाकर शुद्ध, पूत, अजर और अमृत हो जाता है। मुख जानना यानी यह जानना कि जो लिया है, वह किस आग में अर्पित करना है। बुडिल पद जानते थे, पर भस्म करने वाला मुख उनसे छूट गया था।
सार: गायत्री के तीन पद तीन लोक, तीन वेद और प्राण हैं; चौथा पद सूर्य है, जो देखा तो जा सकता है, पर पाया नहीं जा सकता। गायत्री सत्य पर, सत्य बल पर, बल प्राण पर टिका है, और प्राणों की रक्षा करने से ही उसका नाम गायत्री है। जनक और बुडिल की कथा कहती है कि गायत्री का मुख अग्नि है; उसे जाने बिना विद्या भी बोझ बन जाती है।
सोने का ढक्कन, और अन्तकाल की प्रार्थना
अध्याय की आख़िरी पंक्तियाँ एक मन्त्र-माला हैं, जिसे मरते हुए मनुष्य के लिए, या स्वयं मरते हुए मनुष्य द्वारा, कहा जाता है। यही मन्त्र ईशावास्य उपनिषद् के अन्त में भी मिलते हैं, क्योंकि ईशावास्य इसी शुक्ल यजुर्वेद का हिस्सा है। यहाँ इन्हें पूरे अध्याय की सब उपासनाओं की परिणति की तरह पढ़ना चाहिए। पहली पंक्ति है, “हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्”, सोने के पात्र से सत्य का मुख ढँका हुआ है। सूर्य का चमकता मण्डल ही वह सोने का ढक्कन है, और उसके पीछे वह सत्य है जिसकी बात यह अध्याय पाँचवें ब्राह्मण से करता आया है।
फिर प्रार्थना: हे पूषन्, आप उसे हटा दीजिए, ताकि जिसका धर्म सत्य है, वह उसे देख सके। पूषन् सूर्य का ही एक नाम है, पोषण करने वाला। फिर उन्हें और नामों से पुकारा जाता है: एकर्षि, अकेले द्रष्टा; यम, नियन्ता; सूर्य; प्राजापत्य, प्रजापति के पुत्र। अपनी किरणों को समेट लीजिए, अपने तेज को एकत्र कर लीजिए। यह उलटी प्रार्थना है; सारा जीवन हम सूर्य से प्रकाश माँगते हैं, और यहाँ उससे प्रकाश समेटने की विनती है, ताकि चमक के पीछे का रूप दिखे। और फिर, आपका जो सबसे कल्याणकारी रूप है, उसे मैं देख रहा हूँ।
और उसी साँस में वह वाक्य आता है जो इस पूरे उपनिषद् का सार है, “योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि”, जो वह, वह पुरुष है, वह मैं हूँ। पाँचवें ब्राह्मण में जो जोड़ा बनाया गया था, सूर्य का पुरुष और आँख का पुरुष, अहः और अहम्, वह यहाँ अन्तिम क्षण में एक हो जाता है। मरने वाला सूर्य को देखता है और कहता है, वह मैं हूँ। पहले अध्याय का अहं ब्रह्मास्मि यहाँ प्राण छोड़ते आदमी की ज़बान पर उतर आया है। जो बात एक बार सभा में तर्क से सिद्ध हुई थी, वह अब किसी नदी-तट पर, डूबते सूरज के सामने, फुसफुसाकर कही जा रही है।
फिर देह की बात, बिना किसी रुदन के: वायु अनिल है, अमृत है, और यह शरीर भस्म में समाप्त होने वाला है। साँस उस अमर वायु में मिल जायेगी, और देह राख होगी। इसके बाद, “ओं क्रतो स्मर कृतं स्मर”, ओम्, हे क्रतु, स्मरण कीजिए, किये हुए का स्मरण कीजिए। क्रतु यानी संकल्प करने वाला मन। मरते समय मन से कहा जा रहा है, याद रखिए, जो किया है उसे याद रखिए; यह पंक्ति दो बार दोहराई गयी है, जैसे कोई फिसलते हुए को पकड़कर दोहराये। परम्परा मानती है कि अन्त समय की स्मृति ही अगली दिशा तय करती है, और गीता में अन्तकाल के स्मरण की जो बात है, वह इसी बीज से उगी है।
अन्तिम मन्त्र अग्नि से है: “अग्ने नय सुपथा रायेऽस्मान्”, हे अग्नि, हमें अच्छे मार्ग से सम्पत्ति की ओर ले चलिए; आप हमारे सब कर्मों को जानते हैं। हमसे टेढ़े पाप को दूर कर दीजिए। हम आपको बार-बार नमस्कार के वचन देते हैं। यह वही अग्नि है जिसे चौदहवें ब्राह्मण में गायत्री का मुख कहा गया था, और जिसमें ग्यारहवें ब्राह्मण में मरे हुए को रखना परम तप कहा गया था। जो आग शरीर को भस्म करेगी, उसी से मार्ग दिखाने की प्रार्थना है। इस तरह अध्याय अपने सब सूत्रों को एक जगह गूँथकर बन्द होता है: सत्य, सूर्य, पुरुष, अहम्, प्राण, स्मृति, अग्नि।
सार: अन्तकाल की प्रार्थना सूर्य से सोने का ढक्कन हटाने को कहती है, ताकि उसके पीछे का सत्य दिखे, और फिर कहती है, जो वह पुरुष है, वह मैं हूँ। देह भस्म होगी, साँस अमर वायु में मिलेगी, मन को किये हुए का स्मरण रखना है, और अग्नि से अच्छे मार्ग की विनती है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस अध्याय को बन्द करते समय बादल की गरज फिर याद आती है। अगली बार जब आसमान गरजे, एक पल रुककर सुनिए कि आज हमें कौन-सा “द” सुनाई देता है। जिस दिन मन भोग की ओर भागे, उस दिन दम। जिस दिन मुट्ठी बँधी रहे, उस दिन दान। जिस दिन किसी की चूक पर भीतर कुछ कड़वा सुख उठे, उस दिन दया। प्रजापति ने तीन बार वही अक्षर कहा था; हमारे लिए भी वह रोज़ वही कहता है, और रोज़ हम अपनी ज़रूरत से उसे भरते हैं।
और दो छोटे अभ्यास, जो यह अध्याय सीधे हाथ में रख देता है। एक, कान बन्द करके भीतर की आग का घोष सुनना, और उसे बस सुनना, यह जानकर कि यह प्राण की गूँज है जो साथ चल रही है। दो, सुबह के सूरज को देखते हुए, बिना कुछ माँगे, एक बार मन में कहना, जो वह पुरुष है, वह मैं हूँ। उपनिषद् ने यह वाक्य मरते हुए की ज़बान पर रखा है, पर जो इसे जीते-जी हर सुबह कह ले, उसके लिए वह घड़ी अजनबी नहीं रहेगी।
सत्य के तीन अक्षरों वाली बात भी साथ ले जाने की है। हम सबके जीवन के बीच में कोई ति है, कोई मोड़ जहाँ हम सच से हट गये। यह अध्याय कहता है, सिरे सच्चे रखिए। शुरुआत सत्य पर, अन्त सत्य पर, और बीच का टेढ़ापन दोनों ओर के दबाव में सीधा हो जाता है। पूर्ण से पूर्ण उठता है और पीछे पूर्ण ही रहता है; हमसे कुछ घटा नहीं है, बस सोने का ढक्कन बीच में है, और उसे हटाने की प्रार्थना हमें सिखा दी गयी है।
आधार: बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 5, ब्राह्मण/खण्ड 1 से 15; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।