पूर्ण-मन्त्र, “द द द”, और हिरण्मय-पात्र
पन्द्रह ब्राह्मण। बृहदारण्यक के सबसे recited-passages का घर।
पाँचवाँ अध्याय “खिल-काण्ड” का पहला हिस्सा है, यानी “परिशिष्ट-काण्ड”। मगर यह नाम भ्रामक है, क्योंकि इस अध्याय में बृहदारण्यक के कुछ सबसे प्रसिद्ध passages हैं, जो दैनिक प्रार्थनाओं में आज भी जीवित हैं।

पहले ब्राह्मण का पहला मन्त्र है, “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।” (वो पूर्ण है, यह पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न होता है। पूर्ण से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही बचता है।) यह वैदान्तिक-गणित का सूत्र-वाक्य है, अनन्त-minus-अनन्त-equals-अनन्त। यह वाक्य आज भी हर बड़े धार्मिक अनुष्ठान के पहले बोला जाता है।
दूसरे ब्राह्मण की कथा एक छोटी-सी उपकथा है। प्रजापति के तीन-तरह के पुत्र, देव, मनुष्य, और असुर, सब उनके पास ब्रह्म-चर्य करते। पाठ पूरा होने पर हर समूह को प्रजापति एक ही अक्षर देते हैं, “द”। देव सुनकर समझ जाते हैं, “दाम्यत” (इन्द्रिय-संयम)। मनुष्य समझते हैं, “दत्त” (दान)। असुर समझते हैं, “दयध्वम्” (दया)। एक ही अक्षर, तीन-अलग-meanings, हर एक के अपने स्वभाव-दोष के अनुसार। यही “द द द” वाला passage T.S. Eliot ने “The Waste Land” के अन्त में लिया था।
पन्द्रहवें ब्राह्मण की प्रार्थना “हिरण्मय-पात्र” से शुरू होती है, “हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्य अपिहितम् मुखम्। तत् त्वं पूषन् अपावृणु सत्य-धर्माय दृष्टये।” (सोने के पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है। हे पूषन्, उसे खोल दे, सत्य-धर्म के लिए, दर्शन के लिए।) यही प्रार्थना ईशावास्य उपनिषद् के अन्त में भी आती है, identical। यह दोनों उपनिषदों के बीच का shared-mantra है।
Key passages
अर्थ: ॐ। पूर्ण है वो, पूर्ण है यह। पूर्ण से ही पूर्ण उत्पन्न। पूर्ण से पूर्ण ले ले, फिर भी पूर्ण ही बचता है। ॐ शान्ति-शान्ति-शान्ति।
अर्थ: तीन-तरह के प्रजापति-पुत्र थे: देव, मनुष्य, असुर। तीनों ने पिता प्रजापति के पास ब्रह्मचर्य किया। ब्रह्मचर्य पूरा होने पर देवताओं ने कहा, ‘भगवन्, हमें कुछ सिखाओ।’ प्रजापति ने एक-अक्षर कहा, ‘द।’ ‘समझे?’ ‘हाँ, समझे: दाम्यत (control your senses)।’ देवताओं को इसी की ज़रूरत थी। फिर मनुष्यों ने पूछा। प्रजापति ने वही ‘द’ कहा। ‘समझे?’ ‘हाँ: दत्त (give, charity)।’ फिर असुरों ने पूछा। प्रजापति ने ‘द’ कहा। ‘समझे?’ ‘हाँ: दयध्वम् (be compassionate)।’ यह तीन-शिक्षा सब-को सीखनी चाहिए: दाम (संयम), दान (giving), दया (compassion)।
अर्थ: सोने के पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है। हे पूषन्! उसको खोल दे, सत्य-धर्म के लिए, दर्शन के लिए। हे पूषन्, एकर्षि, यम, सूर्य, प्राजापत्य! अपनी किरणें फैला, अपना तेज समेट। आपका जो कल्याणतम रूप है, वो मैं देख रहा हूँ। वो जो पुरुष है, मैं वही हूँ। वायु अनिल (life-breath) अमृत, यह शरीर भस्म-अंत। ॐ हे क्रतो (intention)! स्मरण कर, किए-कर्म-को स्मरण कर। हे अग्ने! हमें सु-पथ पर रख, हे विश्व-वायन-वित् देव! हमारे जुहुराण-एनस (पाप-घेरी) को हम-से हटा। आपको बार-बार नमस्कार-वचन समर्पित करते हैं।
संगति
“पूर्णमद” मन्त्र संख्या-दर्शन का एक अत्यन्त-उच्चतम-कथन है। एक तरह की infinity-mathematics, जहाँ infinity-minus-infinity बराबर infinity है। यह बौद्धिक-paradox नहीं है, यह एक experiential-वाक्य है। ब्रह्म infinity है, उससे जगत् निकलता है (एक finite-appearance), मगर ब्रह्म कम नहीं होता। यह वाक्य पाठक को एक तरह की प्रथम-गणितीय-शान्ति देता है, जो पूरे वेदान्त के बौद्धिक-शिखर पर बैठा है।
“द द द” वाला passage T.S. Eliot का सबसे प्रसिद्ध-Western-Eastern-cross-reference है। 1922 में “The Waste Land” प्रकाशित हुआ, और कविता का अन्तिम भाग बृहदारण्यक की इस पंक्ति पर खड़ा है। Eliot ने Sanskrit का अध्ययन किया था Harvard में, और बाद में अंग्रेज़ी-modernism की एक छाप यह बन गयी कि वैदिक-शब्दावली का संदर्भ “intellectually-sophisticated” माना जाता है।
हिरण्मय-पात्र की प्रार्थना मरण-समय की प्रार्थना है। पारम्परिक-तौर पर इसे अन्तिम-संस्कार से ठीक पहले बोला जाता है, जब आत्मा शरीर छोड़ने वाली होती है, “हे पूषन्, अपनी किरणें फैला, अपना तेज समेट, आपका कल्याणतम रूप मैं देखूँ। वो जो असौ पुरुष है, सो अहम् अस्मि।” यह अन्तिम-वाक्य एक तरह की self-recognition है, मरते-समय की।