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सभा सजी है और सम्राट जनक अपने आसन पर बैठे हैं। द्वार से याज्ञवल्क्य भीतर आते हैं। जनक उन्हें देखते ही सीधा सवाल दागते हैं, “याज्ञवल्क्य, आज किस काम से आना हुआ, गायें चाहिए या सूक्ष्म प्रश्नों की टक्कर?” आचार्य हँसकर कहते हैं, “दोनों ही, हे सम्राट।” यह एक वाक्य पूरे अध्याय का मिज़ाज खोल देता है। यहाँ न कोई विद्या छिपाई जाती है, न कोई इच्छा। राजा के पास हज़ार गायें और एक बैल-हाथी हर उत्तर पर तैयार खड़े हैं, और आचार्य के पास हर उत्तर के नीचे एक और गहरा उत्तर।
यह चौथा अध्याय बृहदारण्यक के बीचोंबीच की वह लम्बी बातचीत है जहाँ पूरा उपनिषद् अपने एक ही प्रश्न पर आ टिकता है, कि यह भीतर बैठा जानने वाला कौन है और उसका सहारा कहाँ है। तीसरे अध्याय में याज्ञवल्क्य ने सभा के पंडितों के प्रश्न झेले थे। यहाँ प्रश्न पूछने वाला अकेला जनक है, और उसके पास कामप्रश्न का वरदान है, यानी जब मन चाहे तब पूछ लेने की छूट। छह ब्राह्मणों में यह अध्याय छह आचार्यों के अधूरे उत्तरों से चलकर आत्मज्योति तक, स्वप्न और सुषुप्ति से होकर मृत्यु और पुनर्जन्म तक, और मैत्रेयी के उस प्रश्न तक जाता है जिसके बाद याज्ञवल्क्य घर छोड़ देते हैं।
इस अध्याय के मुख्य किरदार
याज्ञवल्क्य: विदेह की सभा के आचार्य, जो हर उत्तर को उसकी आख़िरी सीढ़ी तक ले जाते हैं और वहीं छोड़कर उठ जाते हैं।
जनक वैदेह: विदेह के सम्राट, जिनके पास कामप्रश्न का वरदान है और जो हर उत्तर पर अपना राज-कोष खोल देते हैं।
छह आचार्य: जित्वा शैलिनि, उदङ्क शौल्बायन, बर्कु वार्ष्ण, गर्दभीविपीत भारद्वाज, सत्यकाम जाबाल और विदग्ध शाकल्य, जिनके उत्तर जनक अपनी स्मृति से एक-एक करके सामने रखते हैं।
मैत्रेयी: याज्ञवल्क्य की ब्रह्मवादिनी पत्नी, जो बँटवारे में सम्पत्ति की जगह अमरता का रास्ता माँग लेती हैं।
कात्यायनी: याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नी, जिनका मन गृहस्थी की समझ में रमता है।
वंश के आचार्य: पौतिमाष्य से लेकर स्वयम्भू ब्रह्म तक की वह लम्बी कतार, जिसने यह विद्या एक कान से दूसरे कान तक पहुँचाई।
छह आचार्यों के छह उत्तर, और हर उत्तर का एक ही पाँव
जनक ने अपने जीवन में बहुत आचार्य सुने हैं और हर एक से एक वाक्य सम्भालकर रखा है। अब वे उन वाक्यों को याज्ञवल्क्य के सामने रखते हैं, जैसे कोई तिजोरी खोलकर सारे सिक्के मेज़ पर उलट दे। हर बार का ढर्रा वही रहता है। जनक कहते हैं, फ़लाँ आचार्य ने हमसे यह कहा था। याज्ञवल्क्य सुनकर सिर हिलाते हैं, “जिसके माता हों, पिता हों, आचार्य हों, वह ऐसा ही कहेगा”, यानी बात सही परम्परा से आई है। फिर वे एक कील ठोक देते हैं, “उन्होंने इसका आयतन (बैठक) और प्रतिष्ठा (टेक) भी बताई?” जनक हर बार हारकर कहते हैं, “नहीं बताई।” और आचार्य का फ़ैसला आता है, “एकपाद्वा एतत्सम्राट्”, यह तो एक ही पाँव पर खड़ी बात है, हे सम्राट।
पहला सिक्का जित्वा शैलिनि का है, “वाणी ही ब्रह्म है”। याज्ञवल्क्य उसे पूरा करते हैं। वाणी ही उसकी बैठक है, आकाश उसकी टेक, और उसे प्रज्ञा मानकर उपासना कीजिए। जनक पूछते हैं, प्रज्ञा क्या है। उत्तर मिलता है, वाणी ही। वाणी से ही अपना सगा पहचाना जाता है, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, जो हवन किया गया, जो खिलाया और पिलाया गया, यह लोक, परलोक और सारे प्राणी, सब वाणी से ही जाने जाते हैं। जो ऐसा जानकर उपासना करता है, वाणी उसे नहीं छोड़ती, सारे प्राणी उसकी ओर बहते हैं, और वह देव होकर देवों में मिल जाता है।
दूसरा सिक्का उदङ्क शौल्बायन का, “प्राण ही ब्रह्म है”, क्योंकि बिना साँस के किसका क्या रह जाएगा। याज्ञवल्क्य कहते हैं, प्राण ही उसकी बैठक है, आकाश टेक, और उसे प्रिय मानकर उपासना कीजिए। प्रियता कहाँ दिखती है, इसका उत्तर बड़ा बेधक है। प्राण के मोह में ही आदमी उससे यज्ञ करा बैठता है जिससे नहीं कराना चाहिए, उससे दान ले लेता है जिससे नहीं लेना चाहिए, और उस दिशा में भी चल पड़ता है जहाँ मारे जाने का डर हो। साँस बची रहे, इस एक चाह के लिए मनुष्य अपने सारे नियम झुका देता है। इसीलिए प्राण परम ब्रह्म है, और जो उसे जानता है, प्राण उसे नहीं छोड़ता।
तीसरा सिक्का बर्कु वार्ष्ण का, “चक्षु ही ब्रह्म है”, और यहाँ उपासना सत्य की है। किसी देखने वाले से पूछिए कि आपने देखा था। वह कहता है, हाँ, हमने देखा। बस, वह सत्य हो जाता है। जिस बात का साक्षी आँख है, उसी पर दुनिया का लेन-देन टिका है। चौथा सिक्का गर्दभीविपीत भारद्वाज का है, “श्रोत्र ही ब्रह्म है”, और यहाँ उपासना अनन्त की है। अनन्तता क्या है, तो उत्तर मिलता है, दिशाएँ। आप किसी भी दिशा में चलते चले जाइए, उसका छोर नहीं आता, क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं, और दिशाएँ ही कान हैं। जो आवाज़ किसी भी ओर से आ सकती है, वह कान को चारों ओर तक फैला देती है।
पाँचवाँ सिक्का सत्यकाम जाबाल का, “मन ही ब्रह्म है”। इसकी उपासना आनन्द की है। मन से ही मनुष्य अपनी संगिनी की ओर खिंचता है, उससे अपने ही रूप का पुत्र जन्म लेता है, और वही आनन्द है। छठा सिक्का विदग्ध शाकल्य का, “हृदय ही ब्रह्म है”, और इसकी उपासना स्थिति की है, यानी ठहराव की। हृदय ही सब प्राणियों की बैठक है, हृदय ही सबकी टेक है, हृदय में ही सारे प्राणी ठहरे हुए हैं। छहों बार, हर उत्तर पूरा होने पर जनक कहते हैं, “हम आपको एक बैल-हाथी के साथ हज़ार गायें देते हैं।” और छहों बार याज्ञवल्क्य वही उत्तर दोहराते हैं, “हमारे पिता का मत था कि बिना पूरी शिक्षा दिए कुछ नहीं लेना चाहिए।” दान वहीं रुक जाता है, पाठ आगे बढ़ जाता है।
ध्यान दीजिए कि आचार्य ने किसी आचार्य को झूठा नहीं ठहराया। छहों द्वार सच्चे हैं और छहों परम ब्रह्म कहे गए हैं। हर द्वार को उसकी बैठक और उसकी टेक के साथ देखना भर बाक़ी था, और वह टेक हर बार एक ही निकलती है, आकाश। उपासना का नाम हर बार बदल जाता है, प्रज्ञा, प्रिय, सत्य, अनन्त, आनन्द, स्थिति, मानो एक ही रत्न के छह पहलू बारी-बारी से रोशनी में आ रहे हों।
सार: सुनी हुई सच्ची बात भी अधूरी रह सकती है, अगर उसका ठिकाना और उसकी टेक न जानी जाए। वाणी, प्राण, आँख, कान, मन और हृदय, छहों ब्रह्म तक ले जाते हैं, बशर्ते उन्हें आकाश की टेक पर देखा जाए। और शिक्षा पूरी हुए बिना दक्षिणा लेने से आचार्य हर बार हाथ खींच लेते हैं।
दाहिनी आँख का इन्ध, और “नेति नेति” का अभय
छह उत्तर खुल चुके हैं और सभा में एक ठहराव है। तब जनक वह करते हैं जो सम्राट कम ही करते हैं। वे अपने कूर्च से, उस बुने हुए ऊँचे आसन से नीचे उतर आते हैं और कहते हैं, “नमस्तेऽस्तु याज्ञवल्क्य, अनु मा शाधि”, आपको नमस्कार हो, अब हमें शिक्षा दीजिए। सत्ता नीचे उतरकर बैठ गई है, और यहीं से इस अध्याय का दूसरा हिस्सा खुलता है। याज्ञवल्क्य उनकी तैयारी को सराहते हैं, “जैसे कोई लम्बी राह पर निकलने वाला रथ जुतवा लेता है या नाव बाँध लेता है, वैसे ही आप इन उपनिषदों से अपने को साध चुके हैं।”
फिर वे वह प्रश्न रखते हैं जिससे राजा का सारा वैभव काँप जाता है। “आप आदरणीय हैं, धनी हैं, वेद पढ़ चुके हैं, उपनिषदों को सुन चुके हैं। यहाँ से छूटकर कहाँ जाएँगे?” जनक सीधा स्वीकार करते हैं, “भगवन्, हम नहीं जानते कि कहाँ जाएँगे।” यह स्वीकार ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। इसी पर आचार्य कहते हैं, “तो हम आपको बताते हैं कि आप कहाँ जाएँगे।” और तब वे भीतर का वह नक़्शा खोलते हैं जो देह के भीतर ही बसा है।
दाहिनी आँख में जो पुरुष है, उसका नाम इन्ध है, यानी जलाने वाला, दीप्त। पर लोग उसे परोक्ष में इन्द्र कहकर पुकारते हैं। इस पर उपनिषद् एक बड़ी मीठी बात जोड़ता है, कि देवताओं को परोक्ष नाम प्रिय हैं और सीधा नाम उन्हें नहीं भाता। बाईं आँख में जो रूप है, वह उसकी पत्नी विराट् है। इन दोनों के मिलने की जगह हृदय के भीतर का आकाश है। इनका भोजन हृदय के भीतर का वह लाल पिंड है, इनका ओढ़ना हृदय के भीतर की वह जाली जैसी रचना है, और इनके आने-जाने का रास्ता वह नाड़ी है जो हृदय से ऊपर की ओर चढ़ती है। जैसे एक बाल को हज़ार बार चीर दिया गया हो, इतनी महीन हिता नाम की नाड़ियाँ हृदय में जमी हुई हैं, और उन्हीं से यह भीतर का रस बहता रहता है।
यह पूरा चित्र बहुत ठोस है, लगभग किसी शरीर-रचना के पन्ने जैसा। फिर आचार्य एक झटके में उसे भी पीछे छोड़ देते हैं। वे दिशाओं और प्राणों का जोड़ा मिलाते हैं, पूरब, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, ऊपर, नीचे, और कहते हैं कि सारी दिशाएँ ही सारे प्राण हैं। और तब वह वाक्य आता है जिस पर पूरा बृहदारण्यक टिका है, “स एष नेति नेत्यात्मा”, वह आत्मा यही है, जिसके बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि यह वह नहीं, यह भी वह नहीं। वह पकड़ में नहीं आता क्योंकि पकड़ा नहीं जाता, टूटता नहीं क्योंकि उसमें टूटन है ही नहीं, चिपकता नहीं, बँधता नहीं, न व्यथित होता है, न उसका नाश होता है।
इसके बाद आचार्य वह घोषणा करते हैं जो इस अध्याय में बार-बार लौटेगी, “अभयं वै जनक प्राप्तोऽसि”, हे जनक, आप अभय को पा चुके हैं। यह पूरी विद्या का फल एक शब्द में है, निर्भयता। जनक तत्काल उसे लौटाते हैं, “आपको भी अभय मिले, याज्ञवल्क्य, आप ही तो हमें अभय का पता देते हैं। नमस्कार। ये विदेह आपके हैं, और यह हम भी आपके हैं।” राजा ने राज्य और अपने आप को एक साथ रख दिया है, और आचार्य इस बार मना नहीं करते, क्योंकि शिक्षा अब अधूरी नहीं रही।
सार: याज्ञवल्क्य पहले देह के भीतर का बारीक नक़्शा खोलते हैं, आँखों का जोड़ा, हृदय का आकाश, बाल से हज़ार गुना महीन नाड़ियाँ। फिर उसी नक़्शे को पार करके “नेति नेति” पर ठहरते हैं। जिसे कोई नाम पूरा नहीं पकड़ पाता, वही पकड़ से बाहर होने के कारण अभय है, और वही जनक को मिल जाता है।
इस पुरुष की ज्योति क्या है: सूरज से उतरकर आत्मा तक
अगली भेंट में याज्ञवल्क्य स्वयं चलकर जनक के पास आते हैं। बात अग्निहोत्र पर छिड़ती है, और उस चर्चा से प्रसन्न होकर आचार्य राजा को एक वर देते हैं। जनक कामप्रश्न माँग लेते हैं, यानी जो मन में आए वही पूछ लेने की खुली छूट। अब पहला प्रश्न सम्राट का होता है, और वह छोटा-सा प्रश्न पूरे अध्याय का मेरुदंड बन जाता है, “याज्ञवल्क्य, इस पुरुष की ज्योति क्या है?” यानी यह आदमी किस रोशनी के सहारे उठता-बैठता है और काम करता है।
आचार्य सहज उत्तर देते हैं, “आदित्य ही इसकी ज्योति है, सम्राट।” जनक तुरन्त कील ठोकते हैं, “और जब सूरज डूब जाए?” “तब चाँद इसकी ज्योति बनता है।” “और जब चाँद भी डूब जाए?” “तब अग्नि।” “और जब अग्नि भी शान्त हो जाए?” “तब वाणी ही इसकी ज्योति है।” यहाँ आचार्य एक बहुत मानवीय दृश्य रखते हैं। अँधेरा इतना गाढ़ा हो कि अपना हाथ भी न सूझे, तभी कहीं से कोई बोल उठे, तो आदमी उसी आवाज़ के सहारे उस ओर चल पड़ता है। स्वर ही उस घड़ी का दीपक है।
जनक अब आख़िरी पर्दा खींचते हैं, “सूरज डूब गया, चाँद डूब गया, आग बुझ गई, वाणी भी थम गई, तब इस पुरुष की ज्योति क्या है?” और उत्तर आता है, “आत्मैवास्य ज्योतिर्भवति”, आत्मा ही इसकी ज्योति हो जाती है। आत्मा की ही रोशनी में यह बैठता है, चलता है, काम करता है, लौट आता है। बाहर की चार रोशनियाँ उधार की थीं, वे एक-एक करके बुझ गईं, और जो शेष बचा वह अपनी ही है।
राजा यहाँ रुकते नहीं। वे पूछ बैठते हैं कि वह आत्मा आख़िर कौन-सी है। और यहीं से यह अध्याय अपना सबसे गहरा हिस्सा खोलता है। आचार्य कहते हैं, प्राणों के बीच जो विज्ञानमय पुरुष है, जो हृदय के भीतर की ज्योति है, वही। वह एक ही रहते हुए दोनों लोकों में आता-जाता है। वह मानो सोचता है, मानो हिलता-डुलता है। स्वप्न बनकर वह इस लोक को लाँघ जाता है और मृत्यु के रूपों को पीछे छोड़ देता है। यहाँ मृत्यु के रूप उन्हीं चीज़ों को कहा गया है जिनके पीछे इन्द्रियाँ दिन भर दौड़ती हैं और थककर लौटती हैं।
फिर एक पंक्ति आती है जो जन्म और मृत्यु का पूरा हिसाब दो साँसों में कह देती है। यह पुरुष जन्म लेते हुए, शरीर से जुड़ते हुए, पापों से जुड़ जाता है। और यही पुरुष निकलते हुए, मरते हुए, उन पापों को छोड़ देता है। आचार्य आगे बताते हैं कि इस पुरुष के दो ही स्थान हैं, यह लोक और परलोक। और इन दोनों के बीच एक तीसरा, सन्धि का स्थान है, स्वप्न का स्थान। उसी सन्धि में खड़े होकर वह दोनों स्थानों को देखता है, यह भी और वह भी। जो कुछ उसे परलोक में पहुँचना है, उस चढ़ाई को थामकर वह दोनों तरफ़ के दुख और सुख देख लेता है।
सार: सूरज, चाँद, आग और आवाज़, चारों बाहरी रोशनियाँ एक-एक कर बुझा दीजिए, तो जो शेष रह जाता है वही आत्मा है। और वह आत्मा प्राणों के बीच बैठा विज्ञानमय पुरुष है, जो जागने और परलोक, दोनों किनारों के बीच स्वप्न की सन्धि में खड़ा होकर दोनों देख लेता है।
सपने का रचयिता: रथ, रास्ते और तालाब जो वहीं गढ़े जाते हैं
अब आचार्य नींद के दरवाज़े पर हाथ रखते हैं। जब यह पुरुष सोता है, तब वह इस सारे समेटे हुए जगत् से उसकी मात्रा भर उठा लेता है, स्वयं ही उसे गिराता है, स्वयं ही उसे गढ़ता है, और अपनी ही आभा से, अपनी ही ज्योति से सो जाता है। और तब वह वाक्य आता है जो इस पूरे ब्राह्मण की धुरी है, “अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति”, यहाँ यह पुरुष स्वयं-ज्योति हो जाता है। सपने में कोई सूरज नहीं उगता, कोई दीया नहीं जलता, फिर भी वहाँ सब कुछ दिखता है। जो दिख रहा है, वह अपनी ही रोशनी में दिख रहा है।
इसके बाद का चित्र बहुत सीधा है। वहाँ रथ नहीं होते, घोड़े नहीं होते, रास्ते नहीं होते, और तब वह रथ, घोड़े और रास्ते रच लेता है। वहाँ आनन्द, हर्ष और उल्लास नहीं होते, और वह उन्हें रच लेता है। वहाँ ताल, कमल-भरी बावड़ियाँ और बहती नदियाँ नहीं होतीं, और वह उन्हें भी रच लेता है। फिर उपनिषद् तीन अक्षरों में मुहर लगा देता है, “स हि कर्ता”, क्योंकि वही तो कर्ता है। जिस मसाले से वह रचता है, वह मसाला भी उसी का है।
यहाँ कुछ श्लोक इस दशा को चित्र बना देते हैं। स्वप्न से शरीर को गिराकर, स्वयं न सोता हुआ, वह सोए हुओं को देखता रहता है, फिर तेज समेटकर अपने स्थान पर लौट आता है, वह सुनहरा पुरुष, वह अकेला हंस। प्राण से नीचे के घोंसले की रखवाली करता हुआ वह घोंसले के बाहर अमर घूमता है और जहाँ चाहे चला जाता है, और स्वप्न के भीतर ऊँचा-नीचा होता हुआ वह देव अनेक रूप गढ़ लेता है।
फिर एक बहुत कोमल पंक्ति आती है। लोग उसके खेल का मैदान देख लेते हैं, पर उसे कोई नहीं देख पाता। इसीलिए कहते हैं कि सोते हुए को अचानक झकझोरकर नहीं जगाना चाहिए, क्योंकि जिस तक वह लौटकर नहीं पहुँच पाता, उसका इलाज कठिन हो जाता है। कुछ और लोग कहते हैं कि उसकी स्वप्न-दशा जागने की दशा जैसी ही है, क्योंकि जागते हुए जो देखता है, वही सोते हुए भी देख लेता है। यह छोटा-सा मतभेद उपनिषद् ने दर्ज कर लिया है, जैसे कोई सभा की दोनों आवाज़ें लिख ले।
अब वही हिता नाड़ियाँ फिर लौटती हैं, बाल को हज़ार बार चीरने जितनी महीन, सफ़ेद, नीले, पीले, हरे और लाल रस से भरी हुई। सपने में जब लगता है कि कोई मार रहा है, कोई दबोच रहा है, कोई हाथी दौड़ा रहा है, या पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गई और गड्ढे में गिरे जा रहे हैं, तब जागते हुए का देखा हुआ डर ही अविद्या के कारण वहाँ फिर खड़ा हो जाता है। और जब वह अपने को देव जैसा, राजा जैसा अनुभव करता है, और भीतर से उठता है कि यह सब हम ही हैं, तब वह उसका परम लोक होता है। एक ही नींद में डर और वैभव, दोनों उसी के गढ़े हुए।
सार: सपने में बाहर से कुछ नहीं आता, रथ, रास्ते, तालाब और डर, सब वहीं गढ़े जाते हैं, और गढ़ने वाला अपनी ही रोशनी में काम करता है। इसीलिए उपनिषद् यहाँ आदमी को कर्ता कहता है। जागते हुए का डर रात में लौटकर सामने खड़ा हो जाता है, और वही मन जब अपनी विशालता पहचानता है, उसे अपना परम लोक मिल जाता है।
गहरी नींद का निर्भय आलिंगन, और आनन्द की सीढ़ी
स्वप्न के बाद आचार्य उससे भी गहरे उतरते हैं। वे एक चित्र रखते हैं। जैसे बाज़ या कोई बड़ा पंछी आकाश में उड़ता-उड़ता थक जाए, फिर पंख समेटकर सीधा अपने ठिकाने की ओर गिरने लगे, वैसे ही यह पुरुष उस छोर की ओर दौड़ता है जहाँ सोया हुआ वह किसी कामना की चाह नहीं करता और कोई स्वप्न नहीं देखता। दिन भर की उड़ान के बाद पंख समेट लेने का यह चित्र गहरी नींद को समझाने के लिए काफ़ी है।
यही उसका वह रूप है जो चाह के पार है, पाप से रहित है, निर्भय है। इसे समझाने के लिए उपनिषद् एक बहुत मानवीय उपमा उठाता है। जैसे कोई अपनी प्रिय संगिनी के आलिंगन में हो और उसे बाहर का कुछ भी पता न रहे, भीतर का भी नहीं, वैसे ही यह पुरुष प्राज्ञ आत्मा के आलिंगन में होकर बाहर का कुछ नहीं जानता, भीतर का भी नहीं। यह उसका आप्तकाम रूप है, जहाँ आत्मा ही कामना है, जहाँ कामना शेष नहीं रहती, जहाँ शोक का किनारा आ जाता है।
और तब वह विलक्षण सूची आती है जो हर पहचान को उसी जगह उतार देती है। वहाँ पिता पिता नहीं रहता, माता माता नहीं रहती, लोक लोक नहीं रहते, देव देव नहीं रहते, वेद वेद नहीं रहते। वहाँ चोर चोर नहीं रहता, भ्रूणहत्या करने वाला वह नहीं रहता, चाण्डाल चाण्डाल नहीं रहता, पौल्कस पौल्कस नहीं रहता, श्रमण श्रमण नहीं रहता, तपस्वी तपस्वी नहीं रहता। पुण्य उस तक नहीं पहुँचता, पाप उस तक नहीं पहुँचता, क्योंकि उस घड़ी वह हृदय के सारे शोक पार कर चुका होता है। जो नाम हमें दिन भर ढोने पड़ते हैं, वे सब हर रात हमारे कंधे से उतर जाते हैं।
तब कोई पूछ सकता है कि वहाँ देखना, सूँघना, सुनना सब बन्द हो गया तो क्या चेतना बुझ गई। आचार्य इसका उत्तर आठ बार, एक ही साँचे में देते हैं। जब वह नहीं देखता, तब भी देखता हुआ ही नहीं देखता, क्योंकि द्रष्टा की दृष्टि का कभी लोप नहीं होता, वह अविनाशी है। वहाँ उससे अलग कोई दूसरी वस्तु बची ही नहीं जिसे वह देखे। यही बात सूँघने, चखने, बोलने, सुनने, सोचने, छूने और जानने के लिए दोहराई जाती है। और जहाँ सब कुछ अपना ही आत्मा हो जाए, वहाँ “सलिल एको द्रष्टाद्वैतो भवति”, वह जल की तरह एक, अद्वैत द्रष्टा हो जाता है। यही ब्रह्मलोक है, हे सम्राट।
इसके बाद उपनिषद् आनन्द की एक सीढ़ी बनाता है, जिसकी हर पायदान सौ गुनी है। मनुष्यों में जो सबसे सफल, सबसे समृद्ध, दूसरों का अधिपति और सारे मानवीय भोगों से भरा हुआ हो, वह मनुष्यों का परम आनन्द है। ऐसे सौ आनन्द मिलकर उन पितरों का एक आनन्द बनते हैं जिन्होंने अपना लोक जीत लिया है। उनके सौ आनन्द गन्धर्वलोक का एक आनन्द, उसके सौ कर्म से देवत्व पाने वाले कर्मदेवों का एक, उसके सौ आजानदेवों का एक, उसके सौ प्रजापतिलोक का एक, और उसके सौ मिलकर ब्रह्मलोक का एक आनन्द बनते हैं। और हर पायदान पर एक पंक्ति लौटती रहती है, कि वही आनन्द उस श्रोत्रिय का भी है जो कुटिलता से मुक्त है और कामना से आहत नहीं। यानी यह सीढ़ी सिर्फ़ ऊपर के लोकों की नहीं, उस आदमी की भी है जो यहीं रहकर निष्कपट और अनाहत हो गया।
जनक हर उत्तर पर वही दोहराते हैं, “हम आपको हज़ार देते हैं, अब इससे आगे, मोक्ष के लिए कहिए।” और यहाँ उपनिषद् एक ऐसी बात लिख देता है जो किसी आचार्य के बारे में कम ही लिखी जाती है। इस मोड़ पर याज्ञवल्क्य को डर लगा, कि यह राजा बुद्धिमान है, इसने हमें हर कोने से बाहर निकाल दिया है। पूछने वाले का धीरज इतना बड़ा है कि उत्तर देने वाला अपनी आख़िरी बात तक खींच लिया गया है।
सार: गहरी नींद पंख समेटकर अपने घोंसले में गिर पड़ने जैसी है, जहाँ हर नाम और हर लांछन उतर जाता है। वहाँ चेतना बुझती नहीं, बस देखने के लिए कोई दूसरा बचता नहीं। और आनन्द की जो सीढ़ी सौ-सौ गुना होकर ब्रह्मलोक तक जाती है, उसकी हर पायदान उस निष्कपट श्रोत्रिय के लिए भी खुली है जो कामना से आहत नहीं।
जाने की घड़ी: भरी गाड़ी, पका फल, और पत्ते के सिरे पर इल्ली

आत्मा की आवाजाही समझाने के लिए आचार्य एक नदी का चित्र रखते हैं। जैसे कोई बड़ी मछली नदी के दोनों किनारों के साथ-साथ तैरती रहती है, वैसे ही यह पुरुष अपने दोनों छोरों के साथ चलता रहता है, स्वप्न का छोर और जागने का छोर। और हर बार जो वहाँ देखा, उससे वह लिपटा नहीं रहता, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है।
फिर वह चित्र आता है जो आख़िरी घड़ी का है। जैसे बोझ से लदी गाड़ी चरमराती हुई चलती है, वैसे ही यह शरीर वाला आत्मा, प्राज्ञ आत्मा को अपने ऊपर लिए, चरमराता हुआ चलता है, उस समय जब साँस ऊपर की ओर उठने लगती है। और जब यह देह बुढ़ापे से या रोग से क्षीण होकर पतली पड़ जाती है, तब जैसे आम, गूलर या पीपल का फल अपनी डंठल से अपने आप ढीला होकर छूट जाता है, वैसे ही यह पुरुष इन अंगों से छूटकर उसी रास्ते से प्राण की ओर लौट जाता है। फल पककर अपने आप छूटता है।
इसी के साथ दो और चित्र आते हैं, दोनों राजा के। जैसे किसी आते हुए राजा के लिए अधिकारी, सारथी और गाँव के मुखिया अन्न, जल और ठहरने का इन्तज़ाम पहले से जुटा लेते हैं, वैसे ही जो यह जान लेता है उसके लिए सारे प्राणी तैयारी करते हैं, यह कहते हुए कि ब्रह्म आ रहा है। और जैसे जाने को तैयार राजा के चारों ओर वही अधिकारी इकट्ठे हो जाते हैं, वैसे ही अन्तकाल में सारे प्राण इस आत्मा के चारों ओर इकट्ठे हो जाते हैं।
अब आचार्य ठीक उस क्षण का वर्णन करते हैं। यह आत्मा निर्बल होकर मानो मूर्छा जैसी दशा में आ जाता है। तब ये प्राण उसके पास इकट्ठे होते हैं। वह तेज की उन मात्राओं को समेटता हुआ हृदय की ओर उतरता है। और जब आँख में बैठा वह पुरुष लौटकर पीछे मुड़ जाता है, तब वह रूपों को पहचानना छोड़ देता है। आसपास खड़े लोग कहते हैं कि अब एक हो गया, अब देखता नहीं, एक हो गया, अब सूँघता नहीं, अब चखता नहीं, बोलता नहीं, सुनता नहीं, सोचता नहीं, छूता नहीं, जानता नहीं। बाहर से यही दिखता है।
भीतर जो होता है, वह उपनिषद् बताता है। उसी हृदय का अगला सिरा दीप की तरह जगमगा उठता है। उसी उजाले के सहारे यह आत्मा बाहर निकलता है, कभी आँख के रास्ते, कभी सिर के, कभी देह के किसी और द्वार से। उसके निकलते ही प्राण उसके पीछे निकलता है, और प्राण के पीछे बाक़ी सारे प्राण। वह चेतना सहित निकलता है, चेतना ही उसके पीछे-पीछे चलती है। और उसके साथ तीन चीज़ें जुड़ जाती हैं, विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा, यानी पहले का जाना-समझा हुआ। जो जीवन में ओढ़ी हुई पोशाक भर था, वह यहीं रह जाता है। जो भीतर तक उतर गया, वही साथ चलता है।
और अब वह उपमा आती है जिस पर यह पूरा ब्राह्मण टिका है। जैसे इल्ली, वह तृणजलायुका जो घास और पत्ते पर रेंगती है, एक पत्ते के सिरे तक पहुँचकर अपना अगला हिस्सा आगे बढ़ाती है, नई पकड़ थामती है, और तब अपने को सिकोड़कर उस पकड़ तक खींच लेती है, वैसे ही यह आत्मा इस शरीर को गिराकर, अविद्या को हटाकर, दूसरी पकड़ थामता है और अपने को उसमें समेट लेता है। पुरानी टहनी तब तक नहीं छूटती जब तक अगली टहनी हाथ न आ जाए। और दूसरी उपमा कारीगरी की है। जैसे कोई पेशस्कारी सोने का एक टुकड़ा लेकर उससे और नया, और सुन्दर रूप गढ़ देता है, शांकरभाष्य इसे सुनार पढ़ता है, वैसे ही यह आत्मा इस शरीर को गिराकर, अविद्या को हटाकर, एक और नया, और सुन्दर रूप बना लेता है, कभी पितरों का, कभी गन्धर्वों का, कभी देवों का, कभी प्रजापति का, कभी ब्रह्मा का, कभी दूसरे प्राणियों का। सोना वही रहता है, गहना बदल जाता है।
सार: मृत्यु का चित्र यहाँ डरावना नहीं रखा गया, वह पके फल के डंठल से छूटने जैसा है। हृदय का सिरा जगमगाता है, प्राण पीछे चलते हैं, और विद्या, कर्म और पुरानी समझ साथ जाती है। इल्ली की तरह आत्मा अगली पकड़ थामे बिना पुरानी नहीं छोड़ता, और सुनार की तरह उसी सोने से नया गहना गढ़ लेता है।
जैसा करता है वैसा हो जाता है, और जो कुछ नहीं चाहता
अगला कदम कारण की ओर है। आचार्य कहते हैं कि यह आत्मा ब्रह्म ही है, और वह विज्ञानमय है, मनोमय, प्राणमय, पृथिवीमय, आपोमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय और अतेजोमय, काममय और अकाममय, धर्ममय और अधर्ममय, सर्वमय। और तब वह सूत्र आता है जिसे यह उपनिषद् बार-बार लौटाता है, “यथाकारी यथाचारी तथा भवति”, जो जैसा करता है, जैसा बरतता है, वैसा ही हो जाता है। भला करने वाला भला, बुरा करने वाला बुरा, पुण्य से पुण्यवान, पाप से पापी।
फिर उपनिषद् एक और मत दर्ज करता है, जो और भी भीतर जाता है। कुछ कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है, यानी अपनी गहरी चाह का बना हुआ। जैसी उसकी कामना होती है वैसा उसका क्रतु यानी पक्का इरादा बनता है, जैसा इरादा वैसा कर्म, और जैसा कर्म वैसी ही उपलब्धि। चाह से इरादा, इरादे से काम, काम से मंज़िल। इस एक कड़ी में पूरा कर्म-सिद्धान्त बँधा हुआ है, और उसका सिरा किसी बाहरी हिसाब-किताब में नहीं, आदमी की अपनी सबसे भीतरी चाह में है।
इस पर श्लोक आता है। जिस चीज़ में मन लिपटा है, वहीं वह अपने कर्म के साथ चला जाता है। यहाँ जो कुछ किया, उस कर्म का छोर पाकर, वह उस लोक से फिर इसी लोक में, फिर कर्म के लिए लौट आता है। यह उसकी बात है जो चाहता है। और फिर दूसरा छोर खुलता है। जो नहीं चाहता, जो निष्काम है, जिसकी कामना पूरी हो चुकी है, जिसकी कामना स्वयं आत्मा है, उसके प्राण नहीं निकलते। वह ब्रह्म होकर ब्रह्म में ही मिल जाता है। एक और श्लोक इसे और खोल देता है, कि हृदय में टिकी सारी कामनाएँ जब छूट जाती हैं, तब मरणधर्मा अमर हो जाता है और यहीं ब्रह्म को पा लेता है। फिर वह चित्र, जैसे साँप की केंचुल उतरकर बाँबी पर मरी हुई पड़ी रहती है, वैसे ही यह देह पड़ी रह जाती है, और जो शरीर-रहित, अमर प्राण है वह ब्रह्म ही है, तेज ही है।
इसके बाद श्लोकों की एक लड़ी चलती है जो इस अध्याय का सबसे सघन हिस्सा है। एक पतला, दूर तक फैला हुआ, पुराना रास्ता है, जो छू गया है और जिसे पा लिया गया है। उसी से ब्रह्म को जानने वाले धीर ऊपर उठकर मुक्त हो जाते हैं। उसी में सफ़ेद, नीला, पीला, हरा और लाल कहा जाता है। जो अविद्या की उपासना करते हैं वे घने अँधेरे में जाते हैं, और जो केवल विद्या में रमे रहते हैं वे मानो उससे भी गहरे अँधेरे में। आनन्दहीन कहे जाने वाले वे लोक अँधेरे से ढके हैं, और अनजान, बिना जागे लोग मरने के बाद वहीं पहुँचते हैं।
और फिर वह पंक्ति जो पूरी बात पलट देती है। अगर आदमी आत्मा को यों जान ले कि यह हम ही हैं, तो किस चीज़ की चाह में, किसकी कामना के लिए वह इस देह के पीछे जलता-झुलसता रहेगा। जिसने इस गहन, दुर्गम झाड़ी जैसी देह में घुसे हुए आत्मा को पा लिया और जगा लिया, वही सबका कर्ता है, वही सबका रचयिता है, उसका ही लोक है, वही लोक है। और उससे भी सीधी चेतावनी, कि यहीं रहते हुए हमने उसे जान लिया तो ठीक, न जाना तो बड़ी हानि है। जो उसे जानते हैं वे अमर होते हैं, बाक़ी दुख की ओर ही जाते हैं।
इसी लड़ी में वह वाक्य है जो बृहदारण्यक की पहचान बन गया, “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति”, जो यहाँ अनेकता जैसा देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु तक जाता रहता है। उसे मन से ही देखना चाहिए, यहाँ कोई नानात्व है ही नहीं। उसे एक ही रूप में देखिए, वह नापा नहीं जा सकता, वह ध्रुव है, निर्मल है, आकाश से भी परे है, अजन्मा है, महान् है। और उसे जानकर धीर ब्राह्मण प्रज्ञा को साधे, बहुत शब्दों के पीछे न भागे, क्योंकि वह वाणी को थका देना भर है।
अन्त में आचार्य उस महान् अजन्मा आत्मा पर लौटते हैं, जो प्राणों के बीच विज्ञानमय है और हृदय के भीतर के आकाश में सोता है। वह सबका वशी है, सबका ईशान, सबका अधिपति। अच्छे कर्म से वह बड़ा नहीं होता, बुरे कर्म से छोटा नहीं होता। वही सबका ईश्वर है, प्राणियों का अधिपति, प्राणियों का पालक। वही वह सेतु है जो इन लोकों को आपस में घुलने से रोके हुए है। उसी को ब्राह्मण वेद के पाठ से, यज्ञ से, दान से, तप से और अनशन से जानना चाहते हैं। उसी को जानकर आदमी मुनि हो जाता है, और उसी लोक की चाह में संन्यासी घर छोड़ते हैं। जो ऐसा जान लेता है, वह शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मा में ही आत्मा को देखता है, सबको आत्मा देखता है। पाप उसे पार नहीं करता, वह सारे पाप पार कर जाता है। यहीं आचार्य कहते हैं कि यही ब्रह्मलोक है, हे सम्राट, और आप इस तक पहुँचा दिए गए हैं। जनक उत्तर में विदेह का राज्य और अपने आप को दास बनाकर सौंप देते हैं। और यह महान् अजन्मा आत्मा अजर है, अमर है, अभय है, ब्रह्म है, क्योंकि ब्रह्म ही अभय है।
सार: अगली देह की लिखावट किसी बाहरी बही में नहीं, आज की सबसे भीतरी चाह में लिखी जाती है। चाह से इरादा, इरादे से कर्म, कर्म से मंज़िल। और जिसकी चाह आत्मा पर आकर ठहर जाती है, उसके प्राण कहीं नहीं जाते, केंचुल पड़ी रह जाती है और वह यहीं ब्रह्म हो जाता है।
मैत्रेयी से फिर वही बात: नमक की डली और वह जो जानता है
सभा का पर्दा गिरता है और दृश्य घर का हो जाता है। याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं, मैत्रेयी और कात्यायनी। मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थीं, ब्रह्म की बात करने और सुनने वाली, और कात्यायनी का मन गृहस्थी की समझ में रमता था। अब याज्ञवल्क्य दूसरा जीवन-क्रम शुरू करने जा रहे हैं। वे पुकारते हैं, “मैत्रेयी, हम इस स्थान से जाने वाले हैं। आइए, आपके और कात्यायनी के बीच बँटवारा कर दें।” घर छोड़ने से पहले वे हिसाब साफ़ कर देना चाहते हैं।
मैत्रेयी का प्रश्न वहीं ठहर जाता है जहाँ सारे बँटवारे ठहर जाते हैं। “भगवन्, यह सारी पृथ्वी धन से भरी हुई हमें मिल जाए, तो क्या हम उससे अमर हो जाएँगे?” याज्ञवल्क्य दो अक्षर में उत्तर देते हैं, “नहीं। जैसा जीवन साधन-सम्पन्न लोगों का होता है, वैसा ही आपका हो जाएगा। धन से अमरता की आशा नहीं है।” और तब मैत्रेयी वह वाक्य बोलती हैं जो इस उपनिषद् का सबसे साफ़ प्रश्न है, “जिससे हम अमर न हों, उसका हम क्या करेंगे? आप जो जानते हैं, वही हमें बताइए।”
आचार्य पिघल जाते हैं। “आप हमें प्रिय थीं ही, और अब आपने प्रिय बात कही है। आइए, हम इसे खोलते हैं। जब हम कहें, तब आप उस पर निदिध्यासन कीजिए”, यानी बार-बार उसी में मन को बैठाइए। फिर वह लम्बी लड़ी आती है जो हर रिश्ते को उसकी जड़ तक ले जाती है। पति पति के लिए प्रिय नहीं होता, आत्मा के लिए प्रिय होता है। पत्नी पत्नी के लिए नहीं, आत्मा के लिए प्रिय होती है। पुत्र, धन, पशु, ब्रह्म, क्षत्र, लोक, देव, वेद, सारे प्राणी, सब कुछ, सबकी प्रियता का सिरा वहीं जाकर बँधता है। और तब वह प्रसिद्ध उपदेश, “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः”, हे मैत्रेयी, आत्मा ही देखने योग्य है, सुनने योग्य है, मनन करने योग्य है, निदिध्यासन करने योग्य है। आत्मा के देखे, सुने, माने और जाने जाने पर यह सब जान लिया जाता है।
आगे आचार्य उसी बात को उल्टी ओर से कहते हैं। जो आत्मा से अलग कहीं ब्रह्म को जानता है, उसे ब्रह्म छोड़ देता है। यही क्षत्र का, लोकों का, देवों का, वेदों का और सारे प्राणियों का हाल है, क्योंकि यह सब वही आत्मा है। फिर तीन आवाज़ों के दृष्टान्त आते हैं। दुन्दुभि बज रही हो तो बाहर बिखरती अलग-अलग ध्वनियाँ पकड़ में नहीं आतीं, पर दुन्दुभि को या उसके बजाने वाले को पकड़ लीजिए तो सारी ध्वनि पकड़ में आ जाती है। शंख के साथ यही, वीणा के साथ भी यही।
फिर वह उपमा जो पूरे वेद-राशि को एक साँस में समेट देती है। जैसे गीली लकड़ी की आग से चारों ओर अलग-अलग धुएँ उठते हैं, वैसे ही इस महान् भूत के निःश्वास से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, यज्ञ, हवन, अन्न, जल, यह लोक, परलोक और सारे प्राणी निकले हैं। ये सब उसी के निःश्वास हैं। और जैसे सारे जल का एक ही ठिकाना समुद्र है, वैसे सारे स्पर्शों का ठिकाना त्वचा है, सारी गन्धों का नासिका, सारे रसों का जीभ, सारे रूपों का आँख, सारे शब्दों का कान, सारे संकल्पों का मन, सारी विद्याओं का हृदय, सारे कर्मों का हाथ, सारी तृप्तियों का अपना-अपना द्वार, सारी राहों का पैर, और सारे वेदों का ठिकाना वाणी है।
अब वह डली आती है जिसके बिना यह प्रसंग अधूरा है। जैसे नमक की डली न भीतर से अलग होती है न बाहर से, पूरी की पूरी एक रस-पिंड ही होती है, वैसे ही यह आत्मा पूरा का पूरा प्रज्ञान का पिंड है, प्रज्ञानघन। इन्हीं भूतों से उठकर यह उन्हीं में लीन हो जाता है। और आचार्य जोड़ते हैं कि मरने के बाद अलग-अलग जानने वाली वह संज्ञा शेष नहीं रहती। मैत्रेयी यहीं उलझ जाती हैं, “भगवन्, यहाँ आकर आपने हमें मोह में डाल दिया, हम इसे नहीं समझ पा रहीं।”
याज्ञवल्क्य का उत्तर बहुत कोमल है। “हम कोई मोह की बात नहीं कह रहे। यह आत्मा अविनाशी है, इसका उच्छेद होता ही नहीं। बात इतनी है कि जहाँ द्वैत जैसा कुछ होता है, वहीं एक दूसरे को देखता है, सूँघता है, चखता है, बोलता है, सुनता है, सोचता है, छूता है, जानता है। और जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया, वहाँ कौन किसे किससे देखे, किससे सुने, किससे जाने? जिससे यह सब जाना जाता है, उसे किससे जानें? विज्ञातारमरे केन विजानीयात्।” वह आत्मा वही “नेति नेति” वाला है, अगृह्य, अशीर्य, असङ्ग, अबद्ध, न व्यथित होने वाला, न नष्ट होने वाला। “हे मैत्रेयी, आपको शिक्षा मिल चुकी। अमरता इतनी ही है।” इतना कहकर याज्ञवल्क्य चले गए।
सार: मैत्रेयी सम्पत्ति के बँटवारे में से अमरता का सवाल निकाल लेती हैं, और वही सवाल याज्ञवल्क्य की आख़िरी शिक्षा खोल देता है। हर प्रियता का सिरा आत्मा पर बँधा है, और आत्मा नमक की डली की तरह भीतर-बाहर एक ही प्रज्ञान है। जानने वाले को किसी और से जाना नहीं जा सकता, और यह जानना ही अमरता है।
वंश: एक कान से दूसरे कान तक, स्वयम्भू ब्रह्म तक
इतनी बड़ी बात कहने के बाद उपनिषद् एक अनोखा काम करता है। वह नामों की एक लम्बी कतार लिख देता है, और उसके ऊपर बस इतना लिखता है कि अब वंश। पौतिमाष्य ने गौपवन से पाया, गौपवन ने पौतिमाष्य से, पौतिमाष्य ने फिर गौपवन से, गौपवन ने कौशिक से, कौशिक ने कौण्डिन्य से, कौण्डिन्य ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कौशिक और गौतम से। फिर अग्निवेश्य, गार्ग्य, गौतम, सैतव, पाराशर्यायण, गार्ग्यायण, उद्दालकायन, जाबालायन, माध्यन्दिनायन, सौकरायण, काषायण, सायकायन, कौशिकायनि। फिर घृतकौशिक, पाराशर्य, जातुकर्ण्य, आसुरायण और यस्क, त्रैवणि, औपजन्धनि, आसुरि, भारद्वाज, आत्रेय, माण्टि, गौतम, वात्स्य, शाण्डिल्य, कैशोर्य काप्य, कुमारहरित, गालव, विदर्भीकौण्डिन्य।
कतार यहीं रुकती नहीं। वत्सनपात् बाभ्रव, पन्था सौभर, अयास्य आङ्गिरस, आभुति त्वाष्ट्र, विश्वरूप त्वाष्ट्र, फिर दोनों अश्विन, फिर आथर्वण दध्यङ्, फिर दैव अथर्वा, फिर प्राध्वंसन मृत्यु, फिर एकर्षि, विप्रजित्ति, व्यष्टि, सनारु, सनातन, सनग, परमेष्ठी, और परमेष्ठी ने ब्रह्म से पाया। और अन्तिम पंक्ति, “ब्रह्म स्वयम्भु, ब्रह्मणे नमः”, ब्रह्म स्वयम्भू है, उस ब्रह्म को नमस्कार।
पहली नज़र में यह सूची सूखी लगती है। पर ठहरकर देखिए तो अभी-अभी जो बात कही गई, कि आत्मा अगृह्य है, कि जानने वाले को किससे जानें, वह हवा में नहीं टँगी है। वह एक कान से दूसरे कान तक, नाम दर नाम, पीढ़ी दर पीढ़ी चलकर यहाँ तक पहुँची है। जिन नामों को आज कोई नहीं पहचानता, उन्होंने इसे सँभाले रखा।
ध्यान देने लायक़ एक बात और है। इसी कतार में अश्विनों और दध्यङ् आथर्वण का नाम आता है, वही दध्यङ् जिनकी कथा इसी उपनिषद् के दूसरे अध्याय में मधु-विद्या के साथ आई थी, जहाँ अश्विनों ने घोड़े का सिर लगाकर वह विद्या सुनी थी। तो यह वंश केवल गुरु-शिष्य की पंजी नहीं है, इसमें उन कथाओं के सूत्र भी बँधे हैं जो पहले कही जा चुकी हैं। पूरा उपनिषद् यहाँ आकर अपनी ही गाँठ बाँध लेता है और अपनी विनम्रता एक नमस्कार में रख देता है।
सार: अध्याय का अन्त किसी घोषणा से नहीं, एक कतार से होता है, जिसमें हर नाम एक कान और एक जीभ है। जो विद्या अभी पकड़ से बाहर बताई गई, वही इन नामों के सहारे यहाँ तक पहुँची है। और कतार का सिरा किसी व्यक्ति पर नहीं, स्वयम्भू ब्रह्म पर जाकर टिकता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस अध्याय की सबसे बड़ी बात शायद वह छोटा-सा दृश्य है जहाँ सम्राट जनक अपने ऊँचे आसन से नीचे उतर आते हैं। उनके पास सब कुछ था, राज्य, यज्ञ, और छह आचार्यों से सुने हुए छह सही उत्तर। फिर भी जब पूछा गया कि यहाँ से छूटकर कहाँ जाएँगे, उन्होंने कहा, हम नहीं जानते। वह एक स्वीकार ही उन्हें आगे ले गया। हमारे पास भी बहुत-से सही उत्तर जमा हैं, पढ़े हुए, सुने हुए, दोहराए हुए। पूछने लायक़ बात यही है कि उनमें से कितने अपने पाँव पर खड़े हैं और कितने एक ही पाँव पर डोल रहे हैं।
दूसरी बात रोशनी की सीढ़ी है। दिन भर हम उधार की रोशनियों में चलते हैं, किसी की सराहना, कोई पद, कोई संगत। जब तक वे जलती हैं, अपनी ज्योति पर ध्यान नहीं जाता। जिस रात सब बुझ जाएँ, वही रात यह पता देती है कि भीतर कुछ अपना जलता रहा है। और वह ज्योति कोई दूर की चीज़ नहीं, हर रोज़ गहरी नींद में हम उसे छूकर लौटते हैं, बिना नाम के, बिना पद के, बिना किसी लांछन के, और सुबह उठकर जो हल्कापन महसूस होता है, वह उसी छूने का बचा हुआ स्वाद है।
और तीसरी बात इल्ली की है। यह अध्याय हमें डराता नहीं, वह हमें एक चाल दिखाता है। अगली पकड़ मिलने से पहले पुरानी पकड़ नहीं छूटती। जीवन में भी, देह के मामले में भी। जो चाह आज सबसे भीतर बैठी है, वही अगली पकड़ चुन रही है। तो आज की चाह को थोड़ी देर देख लेना, उसे नाम दे देना, और उसे थोड़ा ऊपर उठा देना, यही इस पूरे अध्याय का सबसे व्यावहारिक काम है। बाक़ी जो अभय याज्ञवल्क्य ने जनक को दिया, वह किसी उत्तर में नहीं, इसी देखने के अभ्यास में उतरकर आता है।
आधार: बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 4, ब्राह्मण 1 से 6; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।