जनक-याज्ञवल्क्य का गहन-संवाद
छह ब्राह्मण। एक राजा और एक ऋषि की भीतरी बातचीत।
चौथा अध्याय तीसरे का सीधा continuation है, मगर tone में बहुत-कुछ बदला हुआ। तीसरा अध्याय public-बहस था, अनेक ऋषियों के साथ। चौथा एक intimate-संवाद है, राजा जनक और याज्ञवल्क्य के बीच। दोनों के बीच एक गहन-मित्रता थी, और यह संवाद उसी की प्रमाण है।

तीसरे ब्राह्मण की केन्द्रीय कथा है, “स्वप्न-तत्त्व” पर। याज्ञवल्क्य जनक से कहते हैं कि स्वप्न में मनुष्य अपनी ही रचना देखता है, अपनी ही तेज से उजाला करता है। यह एक तरह का proto-phenomenology है, चेतना के अन्दर का संसार बाह्य-संसार जैसा real मगर बाह्य-नहीं।
चौथा ब्राह्मण मरण-कथा पर है, और इसमें कुछ सबसे-गहरे वाक्य हैं। “यथा तृणजलूका” से एक आधुनिक-दिखने वाला उदाहरण आता है, जैसे जोंक एक तृण के अग्र-भाग से दूसरे पर जाने के लिए पहले-स्थान को नहीं छोड़ती बिना दूसरे को पकड़े, वैसे ही आत्मा एक शरीर से दूसरे में जाती है। यह उपमा अद्भुत है, और बायोलॉजिकल-imagery से कैसे दार्शनिक-थीसिस उठायी जा सकती है, इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण।
पाँचवाँ ब्राह्मण मैत्रेयी-संवाद का दूसरा-version है, अब अधिक विस्तार के साथ। दूसरे अध्याय में जो पहले-संक्षेप में था, यहाँ पूर्ण-रूप पाता है। पारम्परिक-व्याख्या के अनुसार, दोनों version एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं, एक प्रकार की “जो-कहा-गया-वो-इस-तरह-है” की पुष्टि।
Key passages
अर्थ: जैसे एक बड़ा मत्स्य (मछली) दोनों-किनारों के बीच आगे-पीछे जाता है, उसी-तरह यह पुरुष (जीव) दोनों-states के बीच आगे-पीछे चलता है: स्वप्न-state और जागृत-state।
अर्थ: वो यह महान-अज (अजन्मा) आत्मा। जो इस विज्ञान-मय (consciousness-मय), प्राणों में, हृदय-अन्दर के आकाश में, वहीं सोता है। सब का वशी, सब का ईशान, सब का अधिपति। साधु-कर्म से बढ़ता नहीं, असाधु-कर्म से घटता नहीं। यह सब-ईश्वर। यह भूत-अधिपति। यह भूत-पाल। यह सेतु, जो इन-लोकों का अ-संभेद-कारक (विभाजन-रोकने वाला) है।
अर्थ:आत्मा-की-इच्छा है। हे मैत्रेयी, आत्मा को ही देखना, सुनना, मनन करना, निदिध्यासन करना है। आत्मा को देख कर, सुन कर, मनन कर के, जान कर, यह सब-कुछ जान लिया जाता है।
संगति
चौथे ब्राह्मण का बाईसवाँ मन्त्र विशेष है, “स वा एष महान् अज आत्मा, यो अयम् विज्ञानमयः, प्राणेषु, य एषो अन्तर्-हृदय आकाशः, तस्मिन् शेते।” (वो जो महान् अजन्मा आत्मा, जो विज्ञानमय है प्राणों में, जो हृदय के अन्दर आकाश में बैठा है।) यह संक्षेप में पूरी अद्वैत-स्थिति है, आत्मा सब का अधिपति है, मगर साधु-असाधु कर्म से बढ़ता-घटता नहीं।
तेईसवाँ मन्त्र शायद इस उपनिषद् का सबसे प्रसिद्ध है, “एतम् एव विदित्वा मुनिर्भवति। एतम् एव प्रव्राजिनो लोकम् इच्छन्तः प्रव्रजन्ति।” (इसी को जान कर मुनि होते हैं। इसी लोक की कामना से प्रव्राजिनी निकलते हैं।) मुनि-त्व का सबसे संक्षिप्त सूत्र-वाक्य।
मैत्रेयी-संवाद के दूसरे-version में एक नया additional-thought है, समुद्र-नमक का दृष्टान्त। “जैसे नमक का एक पिण्ड पानी में डाल देने पर, बाद में उसका रूप नहीं दिखता, मगर पानी की हर बूँद नमकीन हो जाती है, वैसे ही आत्मा सब-तत्त्वों में लीन है।” यह उपमा छान्दोग्य के तत्त्वमसि-दृष्टान्त-तेरह की प्रतिध्वनि है।