बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 6

बृहदारण्यक उपनिषद् · अध्याय छह

प्राण-कथा और गुरु-शिष्य-वंश

पाँच ब्राह्मण। उपनिषद् का closing-धागा।

छठा और अन्तिम अध्याय पाँच ब्राह्मणों में है। पहले ब्राह्मण की कथा छान्दोग्य उपनिषद् के पाँचवें अध्याय की एक versions का retelling है। पाँच इन्द्रियाँ, मुख, नाक, कान, आँख, और मन, बहस करते हैं कि उनमें कौन सबसे श्रेष्ठ है। बारी-बारी निकल कर देखते हैं। हर बार शरीर बच जाता है, कुछ कमी के साथ ही सही। आख़िर में जब प्राण निकलने लगता है, सब-इन्द्रियाँ डर कर कहती हैं, “रुको, तुम ही श्रेष्ठ।” तभी प्राण की primacy सिद्ध होती है।

दूसरा ब्राह्मण “पंच-अग्नि-विद्या” है, जो छान्दोग्य के पाँचवें अध्याय में भी है। दो उपनिषदों में एक ही कथा का होना दुर्लभ नहीं है, क्योंकि वैदिक-शिक्षा मौखिक-थी और कथाएँ कई शाखाओं में फैल गयी थीं।

अध्याय के तीसरे और चौथे ब्राह्मण specific यज्ञ-कर्म-संस्कारों के विषय में हैं, और सन्तति-प्रार्थना से जुड़े मन्त्र हैं। यह हिस्सा आज के पाठक के लिए शायद कम-प्रासंगिक है, और हम इसका सूक्ष्म-विवरण नहीं दे रहे।

पाँचवाँ ब्राह्मण उपनिषद् का closing-खण्ड है, गुरु-शिष्य-वंश की एक लम्बी सूची। पन्द्रह-बीस-गुरुओं तक की एक chain, जिसमें हर शिक्षक के नाम के साथ उनके शिक्षक का नाम भी है। यह “गुरु-शिष्य-परम्परा” का सबसे प्राचीन document है, और बाद की वंशावलियों का प्रोटोटाइप।

Key passages

6.1.1-3प्राण-वरण कथा
ॐ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति । प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति । वाग् वै वसिष्ठा । यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे । चक्षुर् वै प्रतिष्ठा । यो ह वै सम्पदं वेद स{\म्+} हास्मै कामाः पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च । श्रोत्रं वै सम्पत् ।
oṃ yo ha vai jyeṣṭhaṃ ca śreṣṭhaṃ ca veda jyeṣṭhaśca śreṣṭhaśca svānāṃ bhavati । prāṇo vai jyeṣṭhaśca śreṣṭhaśca । yo ha vai vasiṣṭhaṃ veda vasiṣṭho ha svānāṃ bhavati । vāg vai vasiṣṭhā । yo ha vai pratiṣṭhāṃ veda pratitiṣṭhati same pratitiṣṭhati durge । cakṣur vai pratiṣṭhā । yo ha vai sampadaṃ veda sa{\m+} hāsmai kāmāḥ padyante daivāśca mānuṣāśca । śrotraṃ vai sampat ।

अर्थ: जो ज्येष्ठ-श्रेष्ठ को जानता है, वो अपनी community में ज्येष्ठ-श्रेष्ठ बनता है। प्राण ही ज्येष्ठ-श्रेष्ठ है। जो वसिष्ठ को जानता है, वो वसिष्ठ। वाक् वसिष्ठ। जो प्रतिष्ठा को जानता है, वो प्रतिष्ठित। चक्षु प्रतिष्ठा। जो सम्पद् को जानता है, उसको सब-दैव-मानुष काम पद-में आ जाते। श्रोत्र सम्पद्।

संगति: इन्द्रियों के बीच एक hierarchy। प्राण top, फिर वाक्, चक्षु, श्रोत्र। यह कथा छान्दोग्य 5.1 में भी है, और एक-classic-Vedantic format है।
6.5.4 (final)गुरु-शिष्य-वंश
स एष व्याहृतशून्यो धर्मः । ॐ खम् ब्रह्म । ॐ खम् ब्रह्म ॥ ॐ ॥ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यम् करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
sa eṣa vyāhṛtaśūnyo dharmaḥ । oṃ kham brahma । oṃ kham brahma ॥ oṃ ॥ saha nāvavatu । saha nau bhunaktu । saha vīryam karavāvahai । tejasvi nāvadhītamastu । mā vidviṣāvahai । oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ॥

अर्थ: वो यह व्याहृति-शून्य धर्म। ॐ खम् ब्रह्म (आकाश ब्रह्म)। ॐ खम् ब्रह्म। ॐ। साथ हम-दोनों की रक्षा हो। साथ हम-दोनों खाएँ। साथ वीर्य करें। हमारा पठित तेजस्वी हो। हम विद्वेष न करें। ॐ शान्ति-शान्ति-शान्ति।

संगति: यह famous गुरु-शिष्य-prayer है, ‘सह नाव-वतु’। बहुत-सी उपनिषदों के opening-closing में आती है। बृहदारण्यक यहीं ख़त्म होती है, इस-prayer पर।

संगति

उपनिषद् का closing-वाक्य है, “ॐ खम् ब्रह्म।” (आकाश ब्रह्म है।) पहले अध्याय के चौथे ब्राह्मण में “ब्रह्म वा इदम् अग्र आसीत्” से शुरू हुई वाणी, अन्त में “ॐ खम् ब्रह्म” पर शान्त होती है। दोनों के बीच चौंसठ ब्राह्मण और सैंकड़ों मन्त्र हैं, मगर मूल-वाक्य एक ही है, ब्रह्म-सर्वत्र-व्यापी।

“सह नाव-वतु” वाली प्रार्थना भी इसी अध्याय में है, जो अधिकांश उपनिषदों की opening और closing प्रार्थना है। “साथ हम-दोनों की रक्षा हो। साथ हम-दोनों खाएँ। साथ वीर्य करें। हमारा पठित तेजस्वी हो। हम विद्वेष न करें।” यह गुरु-शिष्य-प्रार्थना अब विश्व-भर के योग-कक्षाओं में सुनाई देती है।

बृहदारण्यक उपनिषद् “सबसे बड़ी” क्यों कही जाती है? Volume में, content में, शिक्षण-range में, और दार्शनिक-तीव्रता में। 1.4 से 5.15 तक पूरा वेदान्त-दर्शन compressed है। यह उपनिषद् पढ़ कर बाक़ी-सब supplement की तरह लगते हैं।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “bribasic.itx” से।

license: मूल text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।