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उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

अध्याय 6: पाँच अग्नियाँ, दो राहें और वंश की डोर

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शुक्ल यजुर्वेद · बृहदारण्यक उपनिषद् · अध्याय 6
प्राणों का पुराना झगड़ा फिर उठता है, एक लड़का पाँच सवालों पर चुप हो जाता है, और उपनिषद् अपना आख़िरी ब्राह्मण गुरुओं के नाम गिनते हुए पूरा करता है।

पंचाल देश की सभा। राजा प्रवाहण जैवलि अपने सेवकों से घिरे बैठे हैं, और दरवाज़े से एक युवक भीतर आता है, चाल में वह आत्मविश्वास जो केवल उस लड़के में होता है जिसका पिता विद्वानों में गिना जाता हो। नाम है श्वेतकेतु, उद्दालक आरुणि का बेटा। राजा उसे देखते हैं और लम्बी तान के साथ पुकारते हैं, कुमार! लड़का उसी तान में जवाब देता है, भो! राजा पूछते हैं, पिता ने पढ़ा दिया आपको? युवक ओम् कहकर हाँ भरता है। फिर राजा एक के बाद एक पाँच सवाल रखते हैं, और उन पाँच में से एक का भी उत्तर उस पढ़े-लिखे लड़के के पास नहीं होता।

यह बृहदारण्यक उपनिषद् का छठा और आख़िरी अध्याय है, खिल-काण्ड (पूरक खण्ड) का दूसरा हिस्सा। पिछले अध्यायों में यह उपनिषद् मैत्रेयी के सवाल से लेकर जनक की सभा और नेति-नेति की ऊँचाई तक जा चुका है। अब वह ऊँचाई से उतरकर गृहस्थ के आँगन में आता है और उन बातों को समेटता है जो एक जीते-जागते घर में काम आती हैं: प्राण की बड़ाई, मरने के बाद की दो राहें, बड़ाई चाहने वाले का यज्ञ, सन्तान चाहने वाले का यज्ञ, और अन्त में उन गुरुओं की सूची जिनके मुँह से यह सारा ज्ञान बहता हुआ हम तक आया। यह अध्याय पूछता है कि जिस आग में सारा संसार पक रहा है, क्या हम उसे देख पाते हैं, और यह भी कि जो हमें मिला, हम उसे किसे सौंपेंगे।

इस अध्याय के मुख्य किरदार

प्राण: शरीर की वह एक साँस-शक्ति जिसके जाने का डर बाक़ी इन्द्रियों को उसका बड़प्पन मानने पर मजबूर कर देता है।

श्वेतकेतु आरुणेय: उद्दालक आरुणि का बेटा, विद्या के अभिमान से भरा युवक, जो पंचालों की सभा में पाँच सवालों पर चुप हो जाता है।

उद्दालक आरुणि (गौतम): श्वेतकेतु के पिता, बड़े आचार्य, जो बेटे की हार को अपनी सीख का मौक़ा बनाते हैं और राजा के पास शिष्य बनकर जाते हैं।

प्रवाहण जैवलि: पंचाल देश के क्षत्रिय राजा, पंचाग्नि-विद्या के धारक, जो कहते हैं कि यह विद्या आज तक किसी ब्राह्मण के पास नहीं गई थी।

याज्ञवल्क्य: वाजसनेय, जिन्हें उद्दालक श्रीमन्थ सिखाते हैं और जिनके ज़रिये शुक्ल यजुर्वेद की धारा आगे बहती है।

सत्यकाम जाबाल: वह छात्र जो अपनी माँ का नाम लेकर गुरु के पास गया था, यहाँ श्रीमन्थ की परम्परा का छठा धारक।

प्रजापति: सृष्टि के रचयिता, जो प्राणों का झगड़ा निपटाते हैं और पुत्र-मन्थ के ब्राह्मण में स्त्री को रचकर सृष्टि की आगे की राह बनाते हैं।

ज्येष्ठ और श्रेष्ठ: प्राणों का झगड़ा, एक बार फिर

कहानी की शुरुआत एक सूची से होती है, और सूची भी ऐसी जिसमें हर पंक्ति एक वादा है। जो ज्येष्ठ (सबसे बड़ा) और श्रेष्ठ (सबसे उत्तम) को जानता है, वह अपने लोगों में सबसे बड़ा और सबसे उत्तम हो जाता है, और उपनिषद् कहता है, “प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च”, प्राण ही ज्येष्ठ है और प्राण ही श्रेष्ठ। फिर उसी साँचे में पाँच और पंक्तियाँ आती हैं। वाणी वसिष्ठा है, सबसे अधिक बसने वाली, सबसे धनी। आँख प्रतिष्ठा है, वह आधार जिसके बल पर आदमी समतल पर भी खड़ा रहता है और ऊबड़-खाबड़ पर भी। कान सम्पद् है, क्योंकि सारे वेद कान में ही आकर पूरे हुए हैं। मन आयतन है, सबका घर। और रेतस् (वीर्य, सृजन की शक्ति) प्रजाति है, क्योंकि उससे ही सन्तान और पशु बढ़ते हैं।

यह सूची इसलिए दी गई कि आगे की कहानी समझ में आए। ये छह प्राण, यानी शरीर की छह शक्तियाँ, आपस में लड़ पड़े कि हममें बड़ा कौन है। हर एक को अपनी उपमा याद थी। लड़ते-लड़ते वे ब्रह्मा के पास गए, यानी प्रजापति के पास, और पूछा कि हममें वसिष्ठ कौन है। प्रजापति ने वह उत्तर दिया जो हर झगड़े को तौलने की कसौटी बन सकता है, “यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापियो मन्यते स वो वसिष्ठ इति”, जिसके निकल जाने पर यह शरीर सबसे बुरी हालत में समझा जाए, वही आप लोगों में सबसे बड़ा है। बड़प्पन का पैमाना यह हुआ कि किसकी कमी सबसे ज़्यादा महसूस होती है।

तो परीक्षा शुरू हुई। पहले वाणी बाहर निकल गई और एक बरस बाहर रहकर लौटी। लौटकर उसने पूछा, “कथमशकत मदृते जीवितुमिति”, मेरे बिना आप कैसे जी सके? बाक़ी ने कहा, जैसे गूँगे जीते हैं, बोलते नहीं, पर साँस लेते हैं, आँख से देखते हैं, कान से सुनते हैं, मन से जानते हैं, सन्तान पैदा करते हैं। वाणी चुपचाप वापस भीतर आ गई। फिर आँख गई, बरस भर बाद लौटी, वही सवाल किया, और उत्तर मिला, जैसे अंधे जीते हैं। कान गया, जवाब मिला, जैसे बहरे जीते हैं। मन गया, जवाब मिला, जैसे मुग्ध (जड़बुद्धि) जीते हैं। रेतस् गया, जवाब मिला, जैसे क्लीब (नपुंसक) जीते हैं। हर एक की कमी महसूस हुई, पर हर एक के बिना जीना चलता रहा।

अब प्राण की बारी थी। और यहाँ उपनिषद् एक ऐसी उपमा देता है जो पढ़ते ही आँखों के सामने खड़ी हो जाती है। प्राण ने निकलने की तैयारी की, तो जैसे सिन्धु देश का कोई बड़ा घोड़ा अपने पैर बाँधने वाले खूँटों को एक झटके में ज़मीन से उखाड़ ले, वैसे ही उसने बाक़ी सब प्राणों को अपनी जगह से उखाड़ दिया। वाणी, आँख, कान, मन, रेतस्, सब अपनी जड़ से हिल गए। तब वे एक साथ बोले, “मा भगव उत्क्रमीः”, हे भगवन्, मत जाइए, आपके बिना हम जी नहीं सकेंगे। प्राण ने कहा, तो फिर मुझे बलि दीजिए, यानी मेरा कर चुकाइए। उन्होंने कहा, ठीक है।

फिर एक-एक करके हर शक्ति ने अपना ताज प्राण के सिर पर रख दिया। वाणी ने कहा, जो मैं वसिष्ठा हूँ, वह आप हैं। आँख ने कहा, जो मैं प्रतिष्ठा हूँ, वह आप हैं। कान ने कहा, जो मैं सम्पद् हूँ, वह आप हैं। मन ने कहा, जो मैं आयतन हूँ, वह आप हैं। रेतस् ने कहा, जो मैं प्रजाति हूँ, वह आप हैं। हर गुण जो अलग-अलग इन्द्रियों ने अपना समझा था, वह असल में प्राण का था, इन्द्रियाँ बस उसे उधार लेकर बरत रही थीं। फिर प्राण ने पूछा, मेरा अन्न क्या होगा और मेरा वस्त्र क्या होगा। उत्तर मिला, कुत्तों से लेकर कीड़ों और पतंगों तक, जो कुछ भी खाया जाता है, वह सब आपका अन्न है, और जल आपका वस्त्र है।

यहीं से एक छोटी-सी रोज़ की आदत का जन्म होता है। जो यह जानता है कि प्राण का अन्न सब कुछ है, उसके लिए कुछ भी अखाद्य नहीं रहता, कुछ भी ऐसा नहीं जिसे लेना अशुद्ध हो। और जल प्राण का वस्त्र है, इसीलिए श्रोत्रिय (वेद जानने वाले) खाने से पहले आचमन करते हैं और खाने के बाद भी। उपनिषद् कहता है कि वे ऐसा करते हुए यही मानते हैं कि हम अन्न को, यानी प्राण को, नंगा नहीं छोड़ रहे, उसे पहले और बाद में जल का वस्त्र ओढ़ा रहे हैं। यह कहानी इस उपनिषद् के पहले अध्याय में देवासुर संग्राम के रूप में भी आई थी। यहाँ बस भाई-बहनों का झगड़ा है और एक बरस की जुदाई, जो सबको उनकी सही जगह दिखा देती है।

सार: बड़ा वह है जिसकी कमी सबसे ज़्यादा महसूस हो, और शरीर में वह प्राण है। वाणी, आँख, कान, मन, हर एक के बिना जीवन चलता है, पर प्राण के हिलते ही सब हिल जाता है। जो यह जानता है, उसके लिए हर अन्न प्राण का अन्न है, और आचमन उस प्राण को वस्त्र पहनाने का छोटा-सा रोज़ का काम।

पंचालों की सभा में पाँच सवाल

अब वह दृश्य जिससे हमने शुरुआत की थी। श्वेतकेतु आरुणेय, यानी अरुण के पोते उद्दालक का बेटा, पंचालों की परिषद् में पहुँचा। राजा प्रवाहण जैवलि ने पूछा कि क्या पिता ने पढ़ा दिया, और लड़के की हाँ सुनकर एक के बाद एक पाँच सवाल रखे। पहला, क्या आप जानते हैं कि ये प्राणी मरने के बाद अलग-अलग राहों पर कैसे बँट जाते हैं? नहीं। दूसरा, क्या आप जानते हैं कि वे इस लोक में वापस कैसे आते हैं? नहीं। तीसरा, क्या आप जानते हैं कि इतने लोग बार-बार मरकर जाते हैं, फिर भी वह परलोक भरता क्यों नहीं? नहीं। चौथा, क्या आप जानते हैं कि कितनी आहुतियाँ हवन होने पर जल उठकर मनुष्य की आवाज़ में बोलने लगता है? नहीं।

और पाँचवाँ सवाल, जो असल में इस पूरे ब्राह्मण की चाभी है। क्या आप देवयान (देवताओं की राह) और पितृयाण (पितरों की राह) पर क़दम रखने का रास्ता जानते हैं, यानी क्या करके लोग एक पर जाते हैं और क्या करके दूसरी पर? राजा ने एक ऋषि का वचन भी सुना दिया, “द्वे सृती अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम्”, मैंने मरने वालों के लिए दो राहें सुनी हैं, एक पितरों की और एक देवताओं की, और इन्हीं दो के बीच से यह सारा चलता-फिरता संसार चलता है, जो पिता और माता के बीच है, यानी आकाश और पृथिवी के बीच। लड़के ने कहा, इनमें से एक भी मैं नहीं जानता।

राजा ने उसे रात ठहरने का न्योता दिया। पर अपमान इतना ताज़ा था कि श्वेतकेतु न्योते को अनसुना करके सीधा भागा और पिता के पास पहुँचा। पिता से उसने वह कहा जो हर पढ़ा-लिखा बेटा किसी दिन कहता है, आप तो कहते थे कि हमें सब सिखा दिया, फिर यह क्या? उद्दालक ने शान्त स्वर में पूछा, क्या हुआ, सुमेधा? लड़का बोला, उस राजन्यबन्धु ने, यानी उस क्षत्रिय ने, मुझसे पाँच सवाल पूछे, और मैं एक का भी उत्तर न दे सका। कौन-से? और लड़के ने पाँचों सवाल पिता के सामने रख दिए, वैसे ही, संकेतों में, जैसे राजा ने पूछे थे।

यहाँ इस कहानी का सबसे सुन्दर मोड़ आता है। उद्दालक ने बेटे से कहा, बेटा, आप इतना जान लीजिए कि जो कुछ हमें मालूम था, सब आपको बता दिया था। यह मुझे भी नहीं आता। चलिए, दोनों वहाँ जाकर ब्रह्मचारी बनकर रहेंगे। लड़के ने कहा, आप ही जाइए। और उस ज़माने का एक प्रकांड आचार्य, जिसके पास शिष्य दूर-दूर से आते थे, चुपचाप उठा और उस क्षत्रिय राजा के दरवाज़े पर पहुँचा, जहाँ उसका बेटा कुछ घण्टे पहले हारकर लौटा था। राजा ने उठकर आसन दिया, जल लाया, अर्घ्य दिया, और कहा, भगवान् गौतम को हम वर देते हैं, जो चाहें माँग लें।

गौतम ने कहा, वर तो आपने दे ही दिया, अब वह बात कहिए जो आपने मेरे बेटे के सामने कही थी। राजा ने टालने की कोशिश की, गौतम, वह तो दैवी वरों में गिना जाता है, आप मानुषी वर माँगिए। गौतम ने उत्तर दिया कि हाथी, सोना, गाय, घोड़े, दासियाँ, वस्त्र, यह सब मेरे पास है, आप उस चीज़ में कंजूसी न करें जो बहुत बड़ी, अनन्त और अपार है। राजा ने कहा, गौतम, आप इसे विधि से माँगिए, तीर्थ से, यानी जैसे शिष्य गुरु से माँगता है। और उद्दालक ने कहा, मैं आपकी शरण में आता हूँ। यह वही वचन था जिससे पुराने लोग गुरु के पास जाते थे, और उद्दालक उसी घोषणा के साथ वहाँ रह गए।

तब राजा ने वह कहा जो इस उपनिषद् में एक असाधारण स्वीकारोक्ति है। गौतम, आप और आपके पितामह हमारा दोष न मानें, क्योंकि यह विद्या आज से पहले किसी ब्राह्मण के पास नहीं रही थी, हमेशा क्षत्रियों में रही। फिर भी मैं आपको बताऊँगा, क्योंकि जो इस तरह शरण में आकर बोले, उसे कौन लौटा सकता है। ब्रह्म-विद्या के इतिहास में यह क्षण याद रखने का है, एक ब्राह्मण आचार्य विनम्र होकर एक राजा से सीखता है, और राजा उसे यह कहकर सिखाता है कि अब यह विद्या आपके घराने की भी हुई।

सार: पाँच सवाल, और एक पढ़े-लिखे लड़के के पास एक भी उत्तर नहीं। उसके पिता उद्दालक हार को अपनी सीख का मौक़ा बनाते हैं और राजा के शिष्य बन जाते हैं। इस उपनिषद् में ज्ञान की राह केवल इतना देखती है कि माँगने वाला विधि से आया या नहीं।

पाँच अग्नियाँ: जिस आग में संसार पक रहा है

राजा ने जो सिखाया, वह पंचाग्नि-विद्या है, पाँच अग्नियों का ज्ञान। इसे समझने के लिए यज्ञ की वेदी को याद कीजिए। हर हवन में एक अग्नि होती है, उसका ईंधन (समित्) होता है, धुआँ, लपट (अर्चि), अंगारे, चिनगारियाँ, और उसमें डाली जाने वाली आहुति, जिससे कुछ जन्म लेता है। राजा ने कहा कि पूरा ब्रह्माण्ड ऐसी पाँच वेदियों की एक कतार है, और एक वेदी से जो निकलता है, वह अगली वेदी की आहुति बन जाता है। पहली वेदी, “असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम”, वह द्युलोक (स्वर्ग-लोक) ही अग्नि है, गौतम। उसका ईंधन सूर्य है, किरणें धुआँ हैं, दिन लपट है, दिशाएँ अंगारे हैं, और कोने की उपदिशाएँ चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवता श्रद्धा की आहुति डालते हैं, और उस आहुति से सोम राजा, यानी चन्द्रमा, जन्म लेता है।

दूसरी वेदी पर्जन्य है, बादलों का देवता। उसका ईंधन संवत्सर (बरस) है, बादल धुआँ हैं, बिजली लपट, वज्र अंगारे, और गड़गड़ाहट चिनगारियाँ। इसमें देवता सोम की आहुति डालते हैं, और उससे वृष्टि जन्म लेती है। तीसरी वेदी यह लोक है, यह पृथिवी। उसका ईंधन धरती ही है, अग्नि धुआँ है, रात लपट है, चन्द्रमा अंगारे हैं, नक्षत्र चिनगारियाँ। इसमें देवता वृष्टि की आहुति डालते हैं, और उससे अन्न जन्म लेता है। यहाँ तक की तीन वेदियाँ आकाश से धरती तक उतरती हैं, और हर बार ऊपर की आहुति नीचे का फल बन जाती है।

चौथी वेदी पुरुष है, आदमी। उसका ईंधन खुला हुआ मुँह है, प्राण धुआँ है, वाणी लपट है, आँख अंगारे हैं, कान चिनगारियाँ। इसमें देवता अन्न की आहुति डालते हैं, और उससे रेतस् जन्म लेता है। पाँचवीं वेदी योषा है, स्त्री। उसका ईंधन, धुआँ, लपट, अंगारे और चिनगारियाँ उसकी देह के अंग और उसका सुख हैं, और इसमें देवता रेतस् की आहुति डालते हैं, जिससे पुरुष, यानी नया मनुष्य, जन्म लेता है। वह जीता है, जब तक जीता है। और फिर, जब वह मरता है।

तब लोग उसे अग्नि के पास ले जाते हैं। यहाँ उपनिषद् की भाषा अचानक सादी हो जाती है, और उतनी ही गहरी। उस चिता की अग्नि ही अग्नि हो जाती है, ईंधन ईंधन, धुआँ धुआँ, लपट लपट, अंगारे अंगारे, चिनगारियाँ चिनगारियाँ। कोई उपमा नहीं बचती, क्योंकि अब सचमुच की आग है। और इस अग्नि में देवता स्वयं उस मनुष्य की आहुति डालते हैं, जिससे भास्वरवर्ण पुरुष, यानी चमकते रंग का पुरुष, जन्म लेता है। यही राजा के चौथे सवाल का उत्तर है। श्रद्धा, जो जल की तरह है, बार-बार आहुति बनकर उतरती है, और पाँचवीं आहुति में वह जल उठकर आदमी की आवाज़ में बोलता है, यानी बच्चा रोता है।

इस विद्या को ध्यान से देखिए तो इसमें एक चक्र दिखता है। श्रद्धा से सोम, सोम से वृष्टि, वृष्टि से अन्न, अन्न से रेतस्, रेतस् से मनुष्य, और मनुष्य फिर से अग्नि में। जिसे हम अपना जन्म कहते हैं, वह इस चक्र की एक कड़ी है, और जिसे मृत्यु कहते हैं, वह इसी चक्र की एक और आहुति। वैदिक ऋषि ने यज्ञ का रूपक इसलिए चुना कि यज्ञ में कोई भी चीज़ यों ही नहीं जलती, हर आहुति किसी को दी जाती है और उससे कुछ जन्म लेता है। वैसे ही यह संसार भी यों ही नहीं चल रहा, इसमें हर चीज़ अगली चीज़ की आहुति है, और देवता, यानी प्रकृति की शक्तियाँ, इस हवन को लगातार कर रही हैं।

सार: द्युलोक, पर्जन्य, पृथिवी, पुरुष और स्त्री, ये पाँच अग्नियाँ हैं, और श्रद्धा की आहुति इनसे गुज़रते हुए सोम, वृष्टि, अन्न, रेतस् और मनुष्य बनती है। पाँचवीं आहुति में जल मनुष्य की आवाज़ में बोलता है। जो यह जानता है, वह अपने जन्म को भी एक आहुति के रूप में देखने लगता है।

देवयान, पितृयाण, और वे जो किसी राह पर नहीं

अब बाक़ी सवालों के उत्तर, और यहीं वह हिस्सा है जिसे पढ़ने वाले सदियों से याद रखते आए हैं। जो लोग इस पंचाग्नि-विद्या को इस तरह जानते हैं, और जो वन में रहकर श्रद्धा को सत्य के रूप में उपासते हैं, वे मरने पर अर्चि में, यानी लपट में, पहुँचते हैं। लपट से दिन में, दिन से शुक्ल पक्ष में, शुक्ल पक्ष से उन छह महीनों में जब सूर्य उत्तर की ओर चलता है, उन महीनों से देवलोक में, देवलोक से आदित्य में, आदित्य से विद्युत् में। वहाँ एक मानस पुरुष, मन से रचा हुआ जन, आकर उन्हें ब्रह्मलोकों में ले जाता है। वे उन ब्रह्मलोकों में दूर, बहुत दूर बसते हैं, और उपनिषद् कहता है, “तेषां न पुनरावृत्तिः”, उनका लौटना फिर नहीं होता। यह देवयान है।

शांकरभाष्य यहाँ एक बारीक बात रखता है। श्रद्धा को सत्य के रूप में उपासने का अर्थ वह यह लेता है कि वे लोग हिरण्यगर्भ की, यानी समष्टि-प्राण की, श्रद्धा से उपासना करते हैं, और इसीलिए उनकी राह चन्द्रमा की ओर उतरने की जगह सूर्य और विद्युत् से होकर ऊपर जाती है। मानस पुरुष को भी वह ब्रह्मलोक से भेजा हुआ एक अमानुष जन मानता है, जो द्वार तक आए हुए को भीतर ले जाता है। मूल पाठ की चाल सीधी है: श्रद्धा, सत्य, वन, और फिर लपट से लपट की ओर एक ऐसी यात्रा जो पीछे मुड़कर नहीं देखती।

दूसरी राह उनकी है जो यज्ञ, दान और तप से लोक जीतते हैं, यानी जो अच्छे कर्म करते हैं पर इस विद्या को नहीं जानते। वे धुएँ में पहुँचते हैं। धुएँ से रात में, रात से कृष्ण पक्ष में, कृष्ण पक्ष से उन छह महीनों में जब सूर्य दक्षिण की ओर चलता है, उन महीनों से पितृलोक में, और पितृलोक से चन्द्रमा में। चन्द्रमा में पहुँचकर वे अन्न बन जाते हैं, और देवता उन्हें वहाँ वैसे ही भोगते हैं जैसे सोम राजा से कहते हैं, बढ़िए, घटिए। यानी जिस पुण्य के बल पर वे वहाँ गए, वह पूर्णिमा से अमावस तक की तरह भरता और रीतता रहता है।

और जब वह पुण्य चुक जाता है, तो वे उसी रास्ते उतरते हैं जिस रास्ते पंचाग्नि की आहुति उतरी थी। चन्द्रमा से आकाश में, आकाश से वायु में, वायु से वृष्टि में, वृष्टि से पृथिवी में। पृथिवी पर पहुँचकर वे अन्न बनते हैं, फिर पुरुष की अग्नि में आहुति बनते हैं, फिर स्त्री की अग्नि में जन्म लेते हैं। और इस तरह लोकों की ओर बार-बार उठते हुए वे उसी चक्र में घूमते रहते हैं। यह पितृयाण है। इससे राजा के पहले दो सवालों का उत्तर मिल गया, प्राणी मरने पर दो राहों पर बँटते हैं, और लौटते वही हैं जो धुएँ की राह से गए थे।

तीसरे सवाल का उत्तर, कि परलोक भरता क्यों नहीं, इन्हीं दो राहों में छिपा है। जो देवयान से गए, वे उसे भरते नहीं क्योंकि वे लोक से परे चले गए, और जो पितृयाण से गए, वे भरते नहीं क्योंकि वे लौट आते हैं। पर उपनिषद् यहाँ एक और वाक्य जोड़ता है, छोटा और कड़ा। जो इन दोनों में से किसी राह को नहीं जानते, जिनके पास विद्या भी नहीं और यज्ञ-दान-तप भी नहीं, वे कीट, पतंगे और ये डसने वाले जीव हो जाते हैं। यह तीसरी जगह है, जिसे उपनिषद् राह भी नहीं कहता। बस एक बार-बार का जन्म, जिसमें ऊपर की चढ़ाई भी नहीं और चन्द्रमा तक की यात्रा भी नहीं। इसी ओर श्वेतकेतु का सारा घमण्ड और उसके पिता की सारी विनम्रता खिंची चली आई थी।

सार: जो इस विद्या को जानते और श्रद्धा से सत्य को उपासते हैं, वे लपट की राह से ब्रह्मलोक जाते हैं और लौटते नहीं। जो यज्ञ, दान, तप करते हैं, वे धुएँ की राह से चन्द्रमा तक जाते हैं और पुण्य चुकने पर बारिश बनकर फिर धरती पर उतरते हैं। और जो दोनों नहीं जानते, वे कीट-पतंगों का जन्म पाते हैं।

श्रीमन्थ: सूखे ठूँठ पर भी पत्ते निकल आएँ

तीसरे ब्राह्मण में उपनिषद् उस आदमी की ओर मुड़ता है जो कहता है कि मुझे बड़ाई चाहिए, महत्त्व चाहिए। उसे वह एक पूरा अनुष्ठान देता है, जिसका नाम परम्परा में श्रीमन्थ पड़ा। मन्थ का अर्थ है मथकर बनाया गया घोल, और श्री का अर्थ है समृद्धि, तेज, वह चमक जो दूसरों को अपनी ओर खींचती है। समय चुना गया उत्तरायण का, शुक्ल पक्ष का, किसी पुण्य दिन का। बारह दिन तक यजमान उपसद् व्रत रखता है, यानी सीमित आहार पर रहता है। गूलर की लकड़ी के कटोरे या चमस में वह सब ओषधियाँ और फल इकट्ठे करता है, ज़मीन साफ़ करता है, लीपता है, अग्नि जलाता है, और किसी पुरुष नक्षत्र में मन्थ तैयार करके हवन शुरू करता है।

पहली आहुति की प्रार्थना ही इस अनुष्ठान का मन खोल देती है। हे जातवेदस् (अग्नि), आपके भीतर जितने देवता तिरछे पड़े हुए मनुष्य की कामनाओं को मारते रहते हैं, उन सबको मैं उनका भाग देता हूँ, वे तृप्त होकर मुझे सब कामनाओं से तृप्त करें। यानी यह मान लिया गया कि हमारी अधूरी रह जाने वाली इच्छाओं के पीछे कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं जिन्हें उनका हिस्सा नहीं मिला। फिर आहुतियों की एक लम्बी माला आती है, और हर आहुति के बाद स्रुवा में बचा हुआ घी मन्थ में उँडेल दिया जाता है, ताकि हर देवता का अंश उस घोल में उतर आए।

किसे-किसे आहुति दी जाती है, यह सूची अपने आप में इस अध्याय का सार है। ज्येष्ठ को, श्रेष्ठ को, प्राण को, वसिष्ठा को, वाणी को, प्रतिष्ठा को, आँख को, सम्पद् को, कान को, आयतन को, मन को, प्रजाति को, रेतस् को। यानी पहले ब्राह्मण की वह पूरी सूची, जिसमें हर इन्द्रिय ने अपना ताज प्राण को सौंप दिया था, यहाँ आहुति बनकर वापस आती है। फिर अग्नि, सोम, भूः, भुवः, स्वः, तीनों एक साथ, ब्रह्म (ब्राह्मण-शक्ति), क्षत्र (क्षत्रिय-शक्ति), भूत, भविष्यत्, विश्व, सर्व, और प्रजापति। जो हो चुका और जो होगा, जो कुछ है और जो सब है, हर एक को उसका भाग, और हर भाग का बचा हुआ अंश उस एक कटोरे में।

फिर यजमान उस मन्थ को छूकर उससे बात करता है, जैसे कोई जीवित चीज़ सामने हो। वह उसे घूमता हुआ कहता है, जलता हुआ, पूर्ण, स्थिर, एक सभा वाला, हिंकार किया हुआ और किया जा रहा, उद्गीथ गाया हुआ और गाया जा रहा, अन्न, ज्योति, निधन (गान का अन्त), संवर्ग (सब को अपने में खींच लेने वाला)। साम-गान की सारी मंज़िलें उस कटोरे पर उतार दी जाती हैं। फिर वह उसे ऊपर उठाता है और कहता है, आप जानने वाले हैं, हम आपकी महिमा जानते हैं, आप राजा हैं, ईशान हैं, अधिपति हैं, आप मुझे भी राजा, ईशान और अधिपति बनाइए।

अब वह उसे पीता है, और पीते-पीते एक अनोखे ढंग से गायत्री का जाप करता है। गायत्री के तीन पद और ऋग्वेद के मधु-मन्त्र एक दूसरे में गूँथे जाते हैं। सविता के वरणीय तेज वाले पहले पद के बाद वह कहता है, हवाएँ ऋतु के अनुसार मधु बहाएँ, नदियाँ मधु बहाएँ, ओषधियाँ हमारे लिए मधुर हों, भूः स्वाहा। देव के तेज का ध्यान करने वाले दूसरे पद के बाद, रात मधु हो, उषा मधु हो, धरती की धूल मधुमय हो, पिता आकाश हमारे लिए मधु हो, भुवः स्वाहा। बुद्धियों को प्रेरित करने वाले तीसरे पद के बाद, वनस्पति मधुमान् हो, सूर्य मधुमान् हो, गौएँ हमारे लिए मधुर हों, स्वः स्वाहा। और अन्त में वह वाक्य जिसके लिए यह सब किया गया, मैं ही यह सब हो जाऊँ।

हाथ धोकर वह अग्नि के पीछे पूर्व की ओर सिर करके लेट जाता है। सुबह उठकर सूर्य की उपासना करता है और कहता है, आप दिशाओं के अकेले कमल हैं, और फिर, “अहं मनुष्याणामेकपुण्डरीकं भूयासमिति”, मैं मनुष्यों में अकेला कमल हो जाऊँ। फिर लौटकर अग्नि के पीछे बैठकर वंश का जाप करता है, यानी उन गुरुओं के नाम जिनसे यह विद्या मिली। बड़ाई चाहने वाले का यह यज्ञ सूर्य के आगे कमल बनने की प्रार्थना पर पहुँचकर गुरुओं के नाम लेने पर पूरा होता है। जो ऊपर उठना चाहता है, उसे पहले वह जड़ याद रखनी है जिससे वह उठा।

इसके बाद उपनिषद् ख़ुद वह वंश सुनाता है, और उसके साथ एक वाक्य छह बार दोहराता है। उद्दालक आरुणि ने यह अनुष्ठान अपने शिष्य वाजसनेय याज्ञवल्क्य को बताया और कहा, “अपि य एनं शुष्के स्थाणौ निषिञ्चेज्जायेरञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति”, कोई इसे सूखे ठूँठ पर भी छिड़क दे तो उसमें डालियाँ निकल आएँ और पत्ते फूट पड़ें। याज्ञवल्क्य ने यही वाक्य मधुक पैङ्ग्य को कहा। मधुक ने चूल भागवित्ति को। चूल ने जानकि आयःस्थूण को। जानकि ने सत्यकाम जाबाल को, उसी सत्यकाम को जो छान्दोग्य में अपनी माँ का नाम लेकर गुरु के पास गया था। और सत्यकाम ने अपने शिष्यों को। हर बार वही वाक्य, सूखे ठूँठ पर पलाश के पत्ते।

अन्त में एक कड़ी शर्त और साज-सामान की सूची। यह अनुष्ठान केवल पुत्र को या अन्तेवासी (साथ रहने वाले शिष्य) को बताना चाहिए, किसी और को नहीं। सामान में चार चीज़ें गूलर की लकड़ी की होती हैं, स्रुवा, चमस, समिधा और मथने की दो लकड़ियाँ। दस गाँव के धान्य होते हैं, चावल, जौ, तिल, उड़द, अणु, प्रियंगु (कंगनी), गेहूँ, मसूर, खल्व और खलकुल। इन्हें पीसकर दही, मधु और घी में भिगोया जाता है, और घी की आहुति दी जाती है। उपनिषद् यह ब्यौरा इसलिए देता है क्योंकि यह किसी घर की रसोई और आँगन में सचमुच किया जाने वाला काम था।

सार: जो बड़ाई चाहे, उसके लिए उपनिषद् एक अनुष्ठान रखता है जिसमें प्राण से प्रजापति तक हर शक्ति को उसका भाग मिलता है और सबका शेष एक ही कटोरे में उतरता है। पीने वाला कहता है कि मैं ही यह सब हो जाऊँ, और सुबह सूर्य से माँगता है कि मनुष्यों में अकेला कमल बनूँ। छह गुरुओं ने इसे सूखे ठूँठ पर भी पत्ते निकाल देने वाला कहा।

पुत्र-मन्थ: रस की सीढ़ी और एक बच्चे का गुप्त नाम

चौथा ब्राह्मण एक सीढ़ी से शुरू होता है, और सीढ़ी का हर डण्डा पिछले का रस है। “एषां वै भूतानां पृथिवी रसः”, इन सब भूतों (प्राणियों और तत्त्वों) का रस पृथिवी है। पृथिवी का रस जल है, जल का रस ओषधियाँ, ओषधियों का रस फूल, फूलों का रस फल, फलों का रस पुरुष, और पुरुष का रस रेतस्। यानी जो बीज एक नए मनुष्य को जन्म देता है, वह पूरी धरती का निचोड़ है, मिट्टी से पानी, पानी से पौधे, पौधे से फूल-फल, और फल से हम तक चला आया। प्रजापति ने इस रस को देखा और सोचा कि इसके लिए एक प्रतिष्ठा (ठहरने की जगह) बनाऊँ, और उन्होंने स्त्री की रचना की। यही इस ब्राह्मण का आधार है, स्त्री सृष्टि के इस सबसे गाढ़े रस की प्रतिष्ठा है।

फिर उपनिषद् वह करता है जो केवल वैदिक ऋषि कर सकता था। वह पति-पत्नी के संयोग को एक यज्ञ की तरह देखता है, वेदी, कुश, सोमरस निचोड़ने के पत्थर, बीच में जलती अग्नि, सब। और कहता है कि जो इसे इस दृष्टि से जानकर करता है, उसे वाजपेय यज्ञ करने वाले का लोक मिलता है, वह स्त्रियों का सुकृत अपनी ओर खींच लेता है, और जो इसे बिना जाने केवल भोग की तरह करता है, उसका सुकृत स्त्रियाँ खींच ले जाती हैं। उद्दालक आरुणि, नाक मौद्गल्य और कुमारहारित, तीन आचार्यों का नाम लेकर उपनिषद् कहता है कि बहुत से मरणधर्मा लोग, नाम के ब्राह्मण, इन्द्रियहीन और सुकृतहीन होकर इस लोक से चले जाते हैं, क्योंकि वे बिना जाने यह करते हैं।

शांकरभाष्य इस पूरे ब्राह्मण को सकाम पुरुष का मार्ग कहता है, यानी उस आदमी का जो अभी संसार चाहता है, सन्तान चाहता है। उपनिषद् उसकी इच्छा को विद्या की रौशनी में रख देता है, ताकि वह इच्छा भी यज्ञ हो जाए। इसीलिए यहाँ शरीर के सबसे निजी कामों के लिए भी मन्त्र हैं। गिरे हुए रेतस् के लिए एक प्रार्थना है, मेरा तेज, मेरा इन्द्रिय-बल, मेरा भाग मुझमें लौट आए, अग्नियाँ अपनी जगह पर फिर बैठ जाएँ। पानी में अपना चेहरा दिखे तो कहना है, मुझमें तेज हो, इन्द्रिय-बल हो, यश हो, धन हो, सुकृत हो। हर छोटे क्षण के लिए एक वाक्य, ताकि कोई क्षण अंधा न रहे।

इस ब्राह्मण में कुछ पंक्तियाँ अपने युग की हैं, जिनमें स्त्री की अनिच्छा पर पुरुष के दबाव की बात है। हम उन्हें बिना छिपाए दर्ज करते हैं और वहीं छोड़ देते हैं, क्योंकि ब्राह्मण का अपना स्वर अगली ही पंक्ति में बदल जाता है, जहाँ वह कहता है कि जो स्त्री अपनी इच्छा से देती है, उसके साथ दोनों यशस्वी होते हैं। उसी स्वर में आगे गर्भ रोकने और गर्भ धारण करने के मन्त्र हैं, और फिर एक कड़ा शाप उस पुरुष के लिए जो किसी विद्वान् की पत्नी के साथ अनुचित करे, और साथ में एक चेतावनी कि जानने वाले श्रोत्रिय की पत्नी से हँसी-ठिठोली की भी इच्छा न करे। ऋतुकाल के तीन दिनों के नियम भी यहीं हैं, और उनके बाद स्नान।

फिर आती है वह सूची जो इस ब्राह्मण को अचानक बहुत मानवीय बना देती है। जो चाहे कि मेरा पुत्र गोरा हो, एक वेद पढ़े, पूरी आयु जिए, वह पति-पत्नी दूध में पका चावल घी के साथ खाएँ। जो चाहे कि पुत्र कपिल-पिंगल रंग का हो और दो वेद पढ़े, वे दही में पका चावल खाएँ। जो चाहे कि पुत्र श्याम हो, लाल आँखों वाला हो, तीन वेद पढ़े, वे पानी में पका चावल खाएँ।

और जो चाहे कि मेरी बेटी पण्डिता हो, विदुषी हो, और पूरी आयु जिए, वे तिल में पका चावल खाएँ। एक वैदिक ग्रन्थ, ढाई-तीन हज़ार बरस पहले, पण्डिता बेटी को माँगने का मन्त्र दे रहा है। इसके बाद सबसे बड़ी माँग, पुत्र पण्डित हो, प्रसिद्ध हो, सभाओं में जाने वाला हो, ऐसी बात बोले जिसे लोग सुनना चाहें, सारे वेद पढ़े, तो मांस के साथ पका चावल, बछड़े या बैल का।

अब घर का यज्ञ। सुबह-सुबह स्थालीपाक (पात्र में पका अन्न) तैयार करके पति अग्नि को, अनुमति देवी को, और सत्य-प्रसव वाले देव सविता को आहुति देता है, बचा हुआ स्वयं खाता है, फिर पत्नी को देता है। हाथ धोकर जल का पात्र भरकर पत्नी पर तीन बार छिड़कता है, और फिर वह वाक्य कहता है जो इस ब्राह्मण की आत्मा है, मैं अम हूँ, यानी प्राण, आप सा हैं, यानी वाणी, मैं साम हूँ और आप ऋक्, मैं आकाश हूँ और आप पृथिवी। आइए, हम दोनों मिलकर पुत्र के लिए, धन के लिए, बीज धारण करें।

इसके बाद विष्णु, त्वष्टा, प्रजापति, धाता, सिनीवाली और अश्विनी कुमारों से गर्भ के लिए प्रार्थना है, और एक सुन्दर उपमा, जैसे पृथिवी के गर्भ में अग्नि है और आकाश इन्द्र से गर्भवान् है, जैसे वायु दिशाओं का गर्भ है, वैसे ही मैं आपमें गर्भ रखता हूँ। प्रसव के समय पत्नी पर जल छिड़ककर कहा जाता है, जैसे हवा तालाब को चारों ओर से हिलाती है, वैसे ही आपका गर्भ हिले और जरायु के साथ बाहर आए।

जब बच्चा जन्म ले लेता है, तो पिता उसे गोद में लेकर अग्नि के पास बैठता है, दही-घी की आहुति देता है, और कहता है, इस घर में बढ़ता हुआ मैं इसमें हज़ार का पोषण करूँ, सन्तान और पशुओं से इसका वंश न टूटे, अपने प्राण मैं आपमें मन से हवन करता हूँ। जो कर्म में अधिक हुआ या कम रहा, अग्नि उसे ठीक करे। फिर वह बच्चे के दाहिने कान के पास मुँह लाकर तीन बार वाक्, वाक्, वाक् कहता है। फिर दही, मधु और घी को सोने से छूकर चटाता है और कहता है, भूः मैं आपमें रखता हूँ, भुवः रखता हूँ, स्वः रखता हूँ, तीनों लोक आपमें रखता हूँ।

और तब नामकरण। पिता कहता है, “वेदोऽसीति”, आप वेद हैं। उपनिषद् कहता है कि यह उस बच्चे का गुह्य नाम होता है, गुप्त नाम, जो दुनिया के दिए हुए नाम के नीचे रहता है। फिर बच्चे को माँ को सौंपकर स्तन दिया जाता है, और उस पर सरस्वती से प्रार्थना है कि जिस स्तन से आप सारे वरणीय पदार्थ पुष्ट करती हैं, वह यहाँ इसके पीने के लिए हो।

माँ को सम्बोधन है, आप इला हैं, मित्र और वरुण की पुत्री, आपने वीर से वीर को जन्म दिया, आप वीरों वाली हों, जैसे आपने हमें वीर वाला बनाया। और ऐसे बच्चे के बारे में लोग कहते हैं, आप पिता से आगे गए, पितामह से आगे गए, श्री, यश और ब्रह्मवर्चस में आप उस चोटी पर पहुँचे जहाँ से आगे कुछ नहीं। हर बच्चे का पहला सुना हुआ वाक्य यही हो, यह इस ब्राह्मण की मूल चाह है।

सार: धरती से जल, जल से पौधे, फूल, फल, मनुष्य और बीज, यह रस की सीढ़ी है, और स्त्री उस रस की प्रतिष्ठा। उपनिषद् गृहस्थ के सबसे निजी क्षणों को यज्ञ बना देता है, पण्डिता बेटी माँगने का मन्त्र देता है, और नवजात के कान में वाक् कहकर उसे गुप्त नाम देता है, वेद।

वंश: माँओं के नाम से गिने हुए गुरु

और अब वह, जिससे यह उपनिषद् अपना अन्त करता है, वंश। एक सूची, जिसमें केवल नाम हैं, इससे उसने, उसने उससे। पर पढ़ते ही एक बात चौंकाती है। पौतिमाषीपुत्र ने कात्यायनीपुत्र से पाया, कात्यायनीपुत्र ने गौतमीपुत्र से, गौतमीपुत्र ने भारद्वाजीपुत्र से, भारद्वाजीपुत्र ने पाराशरीपुत्र से। हर गुरु का नाम उसकी माँ के नाम से है। पौतिमाषी का बेटा, कात्यायनी का बेटा, गौतमी का बेटा। यह सिलसिला दो मन्त्रों तक चलता है, चालीस से अधिक नाम, हर एक अपनी माँ का बेटा, और अन्त में आसुरि पर टिकता है।

यह वंश माँओं के नाम से क्यों चलता है, इस पर परम्परा ने कई बातें कही हैं। सबसे सादी यह कि उस समय ब्रह्मचारी की पहचान उसकी माँ से होती थी, जैसे सत्यकाम जाबाल की हुई, जबाला का बेटा। इसी उपनिषद् के दूसरे और चौथे अध्याय के अन्त में भी ऐसे ही वंश आए थे, मधु-काण्ड का और मुनि-काण्ड का, और वे भी माँओं के नामों से चलते थे। यहाँ खिल-काण्ड का वंश है, और यह इस पूरे ग्रन्थ को बन्द करने का वंश भी है। इसीलिए यह दो हिस्सों में है, पहले शिष्य-परम्परा की वह लम्बी लड़ी जो हम तक आई, और फिर वह ऊपर की ओर जाने वाली लड़ी जो बताती है कि यह ज्ञान कहाँ से उतरा।

तीसरे मन्त्र में वह ऊपर की लड़ी आती है, और यहाँ नाम हमें परिचित लगने लगते हैं। याज्ञवल्क्य ने उद्दालक से पाया, वही उद्दालक जो इसी अध्याय में राजा प्रवाहण के शिष्य बने थे। उद्दालक ने अरुण से, अरुण ने उपवेशि से, उपवेशि ने कुश्रि से, कुश्रि ने वाजश्रवा से, वाजश्रवा ने जिह्वावान् बाध्योग से, जिह्वावान् ने असित वार्षगण से, असित ने हरित कश्यप से, हरित ने शिल्प कश्यप से, शिल्प ने कश्यप नैध्रुवि से, कश्यप नैध्रुवि ने वाक् से, वाक् ने अम्भिणी से, और अम्भिणी ने आदित्य से। उपनिषद् कहता है कि आदित्य से आए हुए ये शुक्ल यजु वाजसनेय याज्ञवल्क्य द्वारा कहे जाते हैं।

यह वह पुरानी कथा है जिसे शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा अपनी पहचान मानती है, कि याज्ञवल्क्य ने अपने यजु सूर्य से पाए, और इसी से इस शाखा का नाम वाजसनेयी पड़ा और इसका पाठ शुक्ल, यानी उजला, कहलाया। वंश की इस लड़ी में वाक् और अम्भिणी के नाम मनुष्यों की गिनती से ऊपर उठ जाते हैं। वाक् वाणी है, अम्भिणी जल से जुड़ी शक्ति, और आदित्य सूर्य। यानी शब्द से पहले वाणी थी, वाणी के पीछे कोई और गहरी शक्ति, और उसके पीछे प्रकाश। गुरुओं के नाम गिनते-गिनते यह उपनिषद् मनुष्य से देवता तक की सीढ़ी चढ़ जाता है।

चौथा और आख़िरी मन्त्र साञ्जीवीपुत्र तक की लड़ी को वही मानता है और उससे आगे एक और शाखा गिनता है, माण्डूकायनि, माण्डव्य, कौत्स, माहित्थि, वामकक्षायण, शाण्डिल्य, वात्स्य, कुश्रि, यज्ञवचा राजस्तम्बायन, तुर कावषेय, और तुर कावषेय ने प्रजापति से पाया, प्रजापति ने ब्रह्म से। और फिर वह वाक्य जिस पर यह पूरा उपनिषद् थमता है, “ब्रह्म स्वयंभु । ब्रह्मणे नमः”, ब्रह्म स्वयम्भू है, अपने आप से है, उस ब्रह्म को नमस्कार। जिस ग्रन्थ ने अहं ब्रह्मास्मि कहा था और नेति-नेति से हर पकड़ छुड़ाई थी, वह अपनी आख़िरी पंक्ति में सिर झुकाता है। यह नमस्कार उसी को है जो हर नाम की जड़ में बैठा है और जिससे यह लड़ी शुरू हुई थी।

सार: उपनिषद् अपने अन्त में गुरुओं की लड़ी गिनता है, पहले माँओं के नाम से पहचाने गए आचार्य, फिर याज्ञवल्क्य से उद्दालक, वाक्, अम्भिणी और आदित्य तक। शुक्ल यजु सूर्य से आए, यह इस परम्परा की अपनी पहचान है। और सबसे ऊपर ब्रह्म स्वयम्भू, जिसे आख़िरी पंक्ति में नमस्कार है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस अध्याय में तीन बार सूची आती है और तीनों बार सूची के पीछे एक ही बात है। इन्द्रियाँ अपना ताज प्राण को सौंपती हैं, आहुतियाँ अपना शेष एक कटोरे में उतारती हैं, और गुरु अपना नाम अगले गुरु के हवाले करते हैं। हर बार कोई अपने आप को किसी बड़े में रख देता है, और उसी से बड़ा होता है। हम भी दिन भर अपनी वाणी, अपनी आँख, अपने मन को अलग-अलग इनाम दिलाने में लगे रहते हैं। यह अध्याय पूछता है कि इन सबके पीछे वह कौन है जिसके हिलने से सब हिल जाता है, और क्या हमने कभी उसका कर चुकाया, एक साँस भर उसका ध्यान।

पंचाग्नि-विद्या को एक बार अपने ऊपर रखकर देखिए। जो अन्न आज थाली में है, वह बारिश था, बारिश से पहले चन्द्रमा की रौशनी, और उससे पहले किसी की श्रद्धा। जो हम हैं, वह धरती का रस है जो फूल और फल से होकर यहाँ तक आया। यह जानकर खाना थोड़ा धीमा हो जाता है, और जीना थोड़ा हल्का। और उद्दालक को याद रखिए, जो अपने बेटे की हार सुनकर ख़ुद उठे और उसी दरवाज़े पर शिष्य बनकर खड़े हो गए। जिस उम्र में लोग केवल सिखाते हैं, वह सीखने गए। हम जो जानते हैं, उसका घमण्ड जितना कम होगा, हमारे लिए उतने दरवाज़े खुले रहेंगे।

और आख़िर में वह गुप्त नाम। एक नवजात के कान में तीन बार वाक् कहकर पिता उसे नाम देता है, आप वेद हैं। हममें से हर एक को यह नाम कभी मिला था, चाहे किसी ने कान में कहा हो या न कहा हो। दुनिया के दिए हुए नाम के नीचे वह नाम अब भी है। यह उपनिषद् गुरुओं की लड़ी गिनकर और स्वयम्भू ब्रह्म को नमस्कार करके बन्द होता है, पर उसकी असली गिनती उस दिन पूरी होती है जब हम अपने भीतर के उस गुप्त नाम को याद कर लें, और जो हमें मिला है, उसे किसी को सौंपने की तैयारी करें, जैसे छह गुरुओं ने एक ही वाक्य छह बार दोहराया, सूखे ठूँठ पर भी पत्ते निकल आएँगे।

आधार: बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 6, ब्राह्मण/खण्ड 1 से 5; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।