जनक की सभा और याज्ञवल्क्य की बहस
नौ ब्राह्मण। आठ ऋषियों के प्रश्न।
तीसरा अध्याय भारतीय दार्शनिक-इतिहास का सबसे प्रसिद्ध public-debate है। मंच, राजा जनक-विदेह का अश्व-मेध-यज्ञ। राजा एक हजार गायों को इकट्ठा करते हैं, हर गाय की सींगों के बीच एक सोने का पाँव बँधा हुआ। फिर घोषणा, “जो सबसे बड़ा ब्रह्म-वित् होगा, वो ये सब ले जाए।”

उपस्थित सब ऋषियों में सबसे प्रसिद्ध हैं याज्ञवल्क्य। वो अपने शिष्य सामश्रवस से कह देते हैं कि गायों को घर ले चलो। यह declaration खुले-आम है। बाक़ी ऋषि नाराज़, और एक के बाद एक उठते हैं, याज्ञवल्क्य को challenge करने।
पहला है अश्वल, जनक का अपना होतृ (पुरोहित)। फिर आर्तभाग, फिर भुज्यु-लाह्यायनी, फिर उषस्त-चाक्रायण, फिर कहोल-कौषीतक, फिर गार्गी-वाचक्नवी (एक स्त्री-ऋषि!), फिर उद्दालक-आरुणि, फिर गार्गी फिर एक बार, और अन्त में शाकल्य। हर एक का एक specific-दार्शनिक-प्रश्न है, और याज्ञवल्क्य हर एक का स्व-निश्चित उत्तर देते हैं।
अन्तिम बहस शाकल्य के साथ है, जो विद्वान-तौर पर सबसे demanding है। याज्ञवल्क्य उसको चेतावनी देते हैं, “अगर अब तू और प्रश्न पूछेगा और उत्तर नहीं समझेगा, तेरा सिर गिर जाएगा।” शाकल्य फिर भी प्रश्न पूछते हैं। और परम्परा बताती है कि सभा छोड़ने से पहले ही उनकी मृत्यु हो जाती है। कथा शायद अतिशयोक्ति है, मगर यह बताती है कि उस सभा का दार्शनिक-स्तर कितना तेज़ था।
Key passages
अर्थ: जो पृथ्वी में स्थित है, पृथ्वी के अन्दर है, जिसको पृथ्वी नहीं जानती, जिसका शरीर पृथ्वी है, जो पृथ्वी को अन्दर से नियंत्रण करता है, वो ही आपका आत्मा, अन्तर्यामिन्, अमृत है।
अर्थ: (याज्ञवल्क्य ने कहा,) ‘यह वो अक्षर है, हे गार्गी, जिसको ब्राह्मण कहते हैं। अ-स्थूल (न-मोटा), अ-अणु (न-छोटा), अ-ह्रस्व (न-कम), अ-दीर्घ (न-लम्बा), अ-लोहित (न-लाल), अ-स्निग्ध (न-चिकना)। अ-छाय (छाया-रहित), अ-तम (अंधकार-रहित), अ-वायु, अ-आकाश। अ-सङ्ग, अ-रस, अ-गन्ध, अ-चक्षुष्क, अ-श्रोत्र। अ-वाक्, अ-मन, अ-तेजस्क, अ-प्राण, अ-मुख, अ-मात्र, अ-नन्तर, अ-बाह्य। उसको कुछ-नहीं खाता, उसको कोई-नहीं खाता।’
अर्थ: वो यह आत्मा, ‘न-यह, न-यह’। अग्राह्य (पकड़ा नहीं जा सकता), क्योंकि नहीं पकड़ा जाता। अ-शीर्य (टूटता नहीं), क्योंकि नहीं टूटता। अ-संग, क्योंकि लिप्त नहीं होता। अ-सीत, बँधा नहीं। न-विथता है, न-गिरता है।
संगति
“अन्तर्यामिन्-ब्राह्मण” (तीसरे अध्याय का सातवाँ ब्राह्मण) में याज्ञवल्क्य उद्दालक से कहते हैं कि एक “अन्तर्यामिन्” (अन्दर से नियंत्रण करने वाला) हर तत्त्व में बैठा है। पृथ्वी में, जल में, अग्नि में, सूर्य में, दिशाओं में, चन्द्र में, आकाश में, अन्तरिक्ष में, हर-एक के अन्दर से उसको चलाने वाला एक तत्त्व है, जिसको “यह नहीं जानता मगर यही उसको चलाता है।” यह एक powerful-concept है, क्योंकि यह ब्रह्म को सर्वत्र, मगर अदृश्य, मानता है।
आठवें ब्राह्मण में गार्गी का “अक्षर-ब्रह्म-प्रश्न” है। याज्ञवल्क्य का उत्तर पारम्परिक “नेति-नेति” की शैली में है, “यह अक्षर है, हे गार्गी, जिसको ब्राह्मण कहते हैं, अ-स्थूल, अ-अणु, अ-ह्रस्व, अ-दीर्घ, अ-लोहित, अ-स्निग्ध, अ-छाय, अ-तम, अ-वायु, अ-आकाश, अ-संग, अ-रस…” तीस से अधिक नकारात्मक-विशेषण। यह “नेति-नेति” का सबसे प्रबल-रूप है, जहाँ हर सम्भव-attribute को denied किया जाता है।
नौवें ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य की प्रसिद्ध एक-पंक्ति निकलती है, “स एष नेति नेति आत्मा, अगृह्यः न हि गृह्यते, अशीर्यः न हि शीर्यते, असंगो न हि सज्यते, असितो न व्यथते न रिष्यति।” यह वाक्य आदि शंकर की सबसे-पसंदीदा-quote रहा है, और उन्होंने इसका विवेकचूडामणि में extensive-treatment किया।