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विदेह की राजधानी में यज्ञ की धूनी अभी ठंडी भी न हुई थी। सभा-मंडप के बाहर एक हज़ार गायें खड़ी थीं, और हर गाय के दोनों सींगों पर दस-दस पाद (सोने के छोटे टुकड़े) बँधे थे। सुबह की रौशनी में दो हज़ार सींग एक साथ चमक रहे थे, और भीतर कुरु और पांचाल देश के सैकड़ों विद्वान चुप बैठे थे। राजा जनक ने अभी-अभी कहा था कि आप में जो सबसे बड़ा ब्रह्मवेत्ता हो, वह उठे और इन गायों को हाँक ले जाए। कोई नहीं उठा। तभी एक आवाज़ आई, धीमी और बेफ़िक्र, अपने शिष्य से कही हुई, “सौम्य, इन्हें घर हाँक ले चलिए।” यह याज्ञवल्क्य थे, और उस एक वाक्य ने पूरी सभा को उनके विरुद्ध खड़ा कर दिया।
बृहदारण्यक के पहले दो अध्याय, जिन्हें मधुकाण्ड कहते हैं, उपदेश की तरह चलते हैं। तीसरे अध्याय से याज्ञवल्क्यकाण्ड शुरू होता है, और यहाँ यह उपनिषद् अपना ढंग बदलता है। अब मंच पर एक भरी सभा है, एक-एक करके उठते प्रश्नकर्ता हैं, और बीच में बैठा एक आदमी है जिसे गायें तो चाहिए पर हार किसी क़ीमत पर नहीं। नौ ब्राह्मणों (खण्डों) में आठ लोग प्रश्न करते हैं, गार्गी दो बार। सवाल यज्ञ से शुरू होते हैं, मौत से गुज़रते हैं, लोकों की सीढ़ी चढ़ते हैं, और अन्त में उस पर टिकते हैं जिसे देखा नहीं जा सकता क्योंकि वही देख रहा है। यह अध्याय पूछता है कि जब हर उत्तर के पीछे एक और प्रश्न खड़ा हो, तो प्रश्न रुकते कहाँ हैं।
इस अध्याय के मुख्य किरदार
जनक वैदेह: विदेह के राजा, जो जानना चाहते हैं कि उनकी सभा में सबसे बड़ा ब्रह्मवेत्ता कौन है, और इसके लिए हज़ार गायें दाँव पर रख देते हैं।
याज्ञवल्क्य: जनक के प्रिय आचार्य, जो गायें पहले हाँकते हैं और उन पर अपना हक़ बाद में साबित करते हैं।
अश्वल: जनक के होता (ऋग्वेद के मन्त्र पढ़ने वाले पुरोहित), जिनका पहला ही सवाल मौत के पार जाने का है।
जारत्कारव आर्तभाग: जो पूछते हैं कि मरने पर आदमी का क्या नहीं छूटता, और जिन्हें उत्तर सभा से बाहर एकान्त में मिलता है।
गार्गी वाचक्नवी: सभा की अकेली स्त्री, जो दो बार उठती हैं, दूसरी बार धनुर्धर की तरह दो प्रश्न लेकर।
उद्दालक आरुणि: गौतम गोत्र के आचार्य, जो सूत्र और अन्तर्यामी का सवाल एक गन्धर्व से सीखकर लाते हैं।
विदग्ध शाकल्य: जो देवताओं की गिनती पूछते हैं, और रुकना नहीं जानते।
हज़ार गायें और अश्वल की चुनौती

जनक वैदेह ने बहुत दक्षिणा वाला यज्ञ रचाया था। कुरु और पांचाल देश के ब्राह्मण उसमें जुटे थे, और राजा के मन में एक जिज्ञासा जागी, इनमें अनूचानतम कौन है, यानी वेद को सबसे गहरे पढ़ा हुआ। परखने का उपाय उन्होंने सीधा रखा। एक हज़ार गायें घेरकर खड़ी करवाईं, हर एक के सींगों में दस-दस पाद सोना बँधवाया, और सभा से कहा, “भगवन्तो, आप में जो ब्रह्मिष्ठ हो, वह इन गायों को ले जाए।” मूल कहता है कि वे ब्राह्मण हिम्मत न कर सके। इनाम सामने था, पर उसे उठाने का अर्थ था भरी सभा में अपने को सबसे बड़ा कहना, और फिर उस दावे को हर चुनौती के आगे निभाना।
याज्ञवल्क्य ने वह दावा किया ही नहीं। उन्होंने अपने ब्रह्मचारी सामश्रवा की ओर देखा और बस इतना कहा, “सौम्य, इन्हें हाँक ले चलिए।” शिष्य गायें ले चला और सभा में ग़ुस्से की लहर दौड़ गई, यह हमारे बीच अपने को ब्रह्मिष्ठ कैसे कह गया? जनक के होता अश्वल उठे और सीधा पूछा, “याज्ञवल्क्य, तो आप ही हम सबमें ब्रह्मिष्ठ हैं?” उत्तर में जो कहा गया वह इस पूरे अध्याय की चाबी है, “नमो वयं ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयं स्म”, जो ब्रह्मिष्ठ है उसे हमारा नमन, हम तो बस गायों के चाहने वाले हैं। अश्वल ने इसे टालना समझा और प्रश्नों पर उतर आए।
पहला प्रश्न सबसे भारी था। “यह सब कुछ मृत्यु से व्याप्त है। यजमान मृत्यु की इस पकड़ से कैसे पार जाए?” याज्ञवल्क्य ने कहा, होता ऋत्विज से, अग्नि से, वाक् से। वाक् ही यज्ञ का होता है; यह जो वाक् है वही अग्नि है, वही होता है, वही मुक्ति है, वही अतिमुक्ति। फिर अश्वल ने दिन और रात की पकड़ पूछी, तो उत्तर मिला अध्वर्यु से, चक्षु से, आदित्य से। शुक्ल और कृष्ण पक्ष की पकड़ पूछी, तो उद्गाता से, प्राण से, वायु से। और यह पूछा कि बिना सहारे के अन्तरिक्ष को पार कर यजमान स्वर्ग तक किस सीढ़ी से चढ़े, तो ब्रह्मा ऋत्विज से, मन से, चन्द्र से। चार पुरोहित, चार इन्द्रियाँ, चार देवता, और हर बार वही एक बात।
बात का मर्म साफ़ है। मृत्यु, दिन-रात, पक्ष, ये सब सीमाएँ हैं, और सीमा में बँधा हुआ कोई भी अपने बल पर सीमा से पार नहीं जा सकता। यज्ञ में बैठा होता जब यह जान लेता है कि उसकी वाणी और आकाश में जलती अग्नि एक ही तत्त्व हैं, आँख और सूरज एक ही देखने की शक्ति हैं, साँस और हवा एक ही चलना है, मन और चाँद एक ही रौशनी है, तब वह छोटी सीमा में रहते हुए भी बड़े का हिस्सा हो जाता है। जिसकी पहुँच सूरज तक है, उसे दिन-रात कैसे पकड़ें। यज्ञ यहाँ बाहर की क्रिया के साथ भीतर की एक पहचान बन जाता है, और उसी पहचान का नाम अतिमुक्ति है।
अश्वल फिर यज्ञ की गिनती पर आए, जिसे मूल सम्पद् कहता है, यानी संगतियाँ। आज होता कितनी ऋचाओं से काम करेगा? तीन से, पुरोनुवाक्या, याज्या और शस्या, और उनसे वह जीतता है जो कुछ प्राणधारी है। अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ देगा? तीन। जो जलकर ऊपर उठती हैं, वे देवलोक जिताती हैं, क्योंकि देवलोक दीप्त है; जो चटचटाहट के साथ शोर करती हैं, वे पितृलोक, क्योंकि पितृलोक अति है; जो नीचे बैठ जाती हैं, वे मनुष्यलोक, क्योंकि मनुष्यलोक नीचे है। ब्रह्मा कितने देवताओं से यज्ञ की दक्षिण दिशा से रक्षा करेगा? एक से, मन से; मन अनन्त है, विश्वेदेव अनन्त हैं, और उससे अनन्त लोक जीता जाता है। उद्गाता की तीन स्तोत्रियाँ प्राण, अपान और व्यान हैं, जिनसे पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्युलोक जीते जाते हैं। इसके बाद होता अश्वल चुप हो गए।
सार: यज्ञ की हर क्रिया का एक भीतरी रूप है: वाणी अग्नि है, आँख सूरज, साँस हवा, मन चाँद। जो अपने को इन बड़े रूपों में पहचान लेता है, वह मृत्यु और काल की पकड़ में रहते हुए भी उनके पार खड़ा होता है। याज्ञवल्क्य ने गायें पहले लीं और यह हक़ बाद में दिखाया।
आर्तभाग: आठ पकड़, और मौत का भोजन
अब जारत्कारव आर्तभाग उठे। उनका पहला प्रश्न गिनती का था, “याज्ञवल्क्य, ग्रह कितने हैं, अतिग्रह कितने?” ग्रह यानी पकड़ने वाला, अतिग्रह यानी पकड़ने वाले को भी पकड़ लेने वाला। उत्तर, आठ और आठ। प्राण ग्रह है, उसे गन्ध ने पकड़ रखा है, क्योंकि प्राण से ही आदमी गन्ध सूँघता है। वाक् ग्रह है, नाम ने उसे पकड़ा है। जिह्वा को रस ने, चक्षु को रूप ने, श्रोत्र को शब्द ने, मन को काम ने, हाथों को कर्म ने, त्वचा को स्पर्श ने। हम सोचते हैं कि आँख रूप को थामती है; याज्ञवल्क्य कहते हैं कि रूप ने आँख को थाम रखा है। इन्द्रिय अपने विषय की ओर बढ़ती है और विषय उसे बाँध लेता है, और यही जकड़ जन्म-भर चलती है।
आर्तभाग ने दूसरा सवाल घुमाकर पूछा, “यह सब कुछ मृत्यु का अन्न है। पर वह कौन देवता है जिसका अन्न मृत्यु है?” याज्ञवल्क्य ने कहा, अग्नि ही मृत्यु है, और वह जल का अन्न है। जो ऐसा जानता है, वह पुनर्मृत्यु को जीत लेता है। अग्नि सबको खाती है, हर देह को, हर ईंधन को, पर जल के आगे वह बुझ जाती है। जिस चीज़ को खाया जा सकता है, वह अन्तिम नहीं हो सकती, और मृत्यु भी उन्हीं में है जो खाई जाती हैं। इसलिए जो मृत्यु से बड़ा है, वह मृत्यु को खा जाता है। पुनर्मृत्यु, यानी बार-बार का मरना, उसी की समझ से रुकता है।
तीसरा प्रश्न और भीतर गया, “जब यह पुरुष मरता है, तब उसके प्राण उसमें से ऊपर निकल जाते हैं या नहीं?” याज्ञवल्क्य ने कहा, नहीं। वे यहीं समेट लिए जाते हैं। शरीर फूलता है, हवा से भरता है, और फूला हुआ मरा पड़ा रहता है। “और जब यह पुरुष मरता है, तब उसे क्या नहीं छोड़ता?” नाम। नाम अनन्त है, विश्वेदेव अनन्त हैं, और नाम से वह अनन्त लोक जीतता है। शरीर टूटता है, पर जिस नाम से उसे पुकारा जाता था, वह पुकार बची रहती है; यह उत्तर सरल दिखता है और उसकी तह में वह सब है जो देह के साथ मरता नहीं।
फिर वह सवाल आया जिसके लिए यह ब्राह्मण याद किया जाता है। “जब यह पुरुष मर जाता है और उसकी वाक् अग्नि में चली जाती है, प्राण वायु में, चक्षु आदित्य में, मन चन्द्र में, श्रोत्र दिशाओं में, शरीर पृथिवी में, हृदय का आकाश आकाश में, रोम ओषधियों में, केश वनस्पतियों में, और रक्त तथा रेतस जल में रख दिए जाते हैं, तब यह पुरुष कहाँ होता है?” याज्ञवल्क्य ने सभा में उत्तर देना ठीक नहीं समझा। “सौम्य आर्तभाग, हाथ दीजिए। इसे हम दोनों ही जानेंगे, यह भीड़ में कहने की बात नहीं।” दोनों बाहर गए और आपस में बात की। जो उन्होंने कहा, वह कर्म था; जो सराहा, वह कर्म था।
मूल इतना ही बताता है, “पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन”, पुण्य कर्म से आदमी पुण्य होता है, पाप कर्म से पाप। यह उत्तर बाहर की भीड़ से क्यों छिपाया गया? शायद इसलिए कि ग़लत हाथों में यह एक साधारण नियम बनकर रह जाता, अच्छा करो तो अच्छा मिलेगा। एकान्त में यह कुछ और कहता है। देह, इन्द्रियाँ, साँस, सब अपने-अपने देवता में लौट जाते हैं, और जो बचता है वह जीवन-भर के चुनावों का बना हुआ एक आकार है। आदमी अपने कर्म में रहता है। जिस ओर वह झुका था, वही झुकाव अगली देह ढूँढ़ता है। यह सुनकर जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गए।
सार: इन्द्रियाँ विषयों को पकड़ती हैं और विषय इन्द्रियों को, यही आठ-आठ की जकड़ है। मृत्यु सबको खाती है, पर जो उससे बड़ा है उसका वह अन्न है। और मरने पर सब कुछ अपने-अपने देवता में लौट जाता है; जो बचता है वह नाम और कर्म है, यानी वह आकार जो हमने अपने जीवन को दिया।
भुज्यु का क़िस्सा: पारिक्षित कहाँ गए
अब भुज्यु लाह्यायनि उठे, और एक क़िस्से से शुरू किया। “याज्ञवल्क्य, हम मद्र देश में चरक बनकर, घूमते हुए विद्यार्थी, फिर रहे थे। पतंचल काप्य के घर पहुँचे। उनकी बेटी को एक गन्धर्व ने पकड़ लिया था। हमने उससे पूछा, आप कौन हैं? उसने कहा, सुधन्वा आंगिरस। फिर हमने उससे लोकों के अन्त पूछे, और पूछा, पारिक्षित कहाँ गए? अब वही प्रश्न आपसे है, याज्ञवल्क्य, पारिक्षित कहाँ हुए?” पारिक्षित यानी परीक्षित के वंशज, वे राजा जिनके अश्वमेध यज्ञों की ख्याति थी। भुज्यु के पास गन्धर्व का उत्तर था; वे देखना चाहते थे कि यह आदमी उसी उत्तर तक पहुँचता है या नहीं।
याज्ञवल्क्य ने कहा, “उसने आपको बताया होगा कि वे वहाँ गए जहाँ अश्वमेध करने वाले जाते हैं।” “और अश्वमेध करने वाले कहाँ जाते हैं?” उत्तर में एक नक़्शा खुला। यह लोक देवताओं के रथ की बत्तीस दिनों की दौड़ के बराबर है। उसे चारों ओर से पृथिवी घेरे है, दुगुनी। पृथिवी को समुद्र घेरे है, फिर दुगुना। और वहाँ बीच में जितना छुरे की धार, जितना मक्खी का पंख, बस उतना अन्तर है। इन्द्र ने सुपर्ण बनकर, यानी बड़े पंखों वाला पक्षी बनकर, उन्हें वायु को सौंप दिया। वायु ने उन्हें अपने में धारण किया और वहाँ ले गई जहाँ अश्वमेधयाजी थे। इस तरह उस गन्धर्व ने वायु की ही प्रशंसा की।
फिर निचोड़: वायु ही व्यष्टि है, अलग-अलग में बहती हुई, और वायु ही समष्टि है, सबमें एक। जो ऐसा जानता है, वह पुनर्मृत्यु को जीत लेता है। भुज्यु लाह्यायनि चुप हो गए। इस उत्तर में दो बातें साथ चलती हैं। एक तो यह कि लोकों के जितने भी घेरे हों, उनके बीच से निकलने की जगह छुरे की धार जितनी पतली है; यज्ञ का फल भी उसी दरार से गुज़रता है। दूसरी यह कि गुज़ारने वाली शक्ति एक ही है, वायु, वही जो हमारी साँस में है और वही जो लोकों को बाँधे है। पारिक्षित उसी में समा गए जो हर साँस में आता-जाता है।
सार: भुज्यु का प्रश्न पुराने राजाओं के ठिकाने का था और उत्तर वायु पर आकर ठहरा। लोकों के घेरे बड़े हैं, उनके बीच की दरार छुरे की धार जितनी पतली, और उससे पार ले जाने वाला एक ही है। जो साँस में है वही सबको थामे है, व्यष्टि भी, समष्टि भी।
उषस्त और कहोल: जो देखने वाले को देखना चाहे
उषस्त चाक्रायण ने सवाल को सीधा ब्रह्म पर ले जाकर रखा। “याज्ञवल्क्य, जो साक्षात् है, अपरोक्ष है, वह ब्रह्म, जो आत्मा सबके भीतर है, उसे हमें समझाइए।” याज्ञवल्क्य ने कहा, “एष त आत्मा सर्वान्तरः”, यह आपकी आत्मा है, सबके भीतर। “कौन, याज्ञवल्क्य?” जो प्राण से प्राणन करता है, वही आपकी सर्वान्तर आत्मा है। जो अपान से अपानन करता है, जो व्यान से व्यानन करता है, जो उदान से उदानन करता है, वही आपकी आत्मा है। साँस लेने वाला, साँस छोड़ने वाला, बीच में थामने वाला, ऊपर उठाने वाला, इन सबके पीछे का एक।
उषस्त को यह उत्तर खोखला लगा। उन्होंने कहा, “यह तो ऐसे हुआ जैसे कोई कहे, वह गाय है, वह घोड़ा है। इशारा कर दिया, बताया कुछ नहीं। जो साक्षात्, अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबके भीतर की आत्मा है, उसे ही समझाइए।” तब वह वाक्य आया जो इस ब्राह्मण की जान है, “न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः”, देखने के देखने वाले को आप देख नहीं सकते। सुनने के सुनने वाले को सुन नहीं सकते, मनन के मनन करने वाले को मन नहीं सकते, जानने के जानने वाले को जान नहीं सकते। यही आपकी आत्मा है, सबके भीतर। “अतोऽन्यदार्तम्”, इससे भिन्न जो कुछ है, वह आर्त है, नाशवान और दुःख में। उषस्त चाक्रायण चुप हो गए।
फिर कहोल कौषीतकेय उठे और शब्द-शब्द वही प्रश्न दोहराया, जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सर्वान्तर आत्मा है, उसे समझाइए। याज्ञवल्क्य ने कहा, यही आपकी आत्मा है, सबके भीतर। “कौन, याज्ञवल्क्य?” जो भूख और प्यास को, शोक को, मोह को, जरा को, मृत्यु को पार कर जाता है। इस आत्मा को जानकर ब्राह्मण पुत्र की एषणा (चाह) से, वित्त की एषणा से और लोक की एषणा से उठ खड़े होते हैं और भिक्षाचर्य में चलते हैं। क्योंकि जो पुत्रैषणा है वही वित्तैषणा है, और जो वित्तैषणा है वही लोकैषणा है; ये सब एषणाएँ ही हैं, एक ही चाह के तीन नाम।
फिर याज्ञवल्क्य ने साधक की सीढ़ी बताई। ब्राह्मण पाण्डित्य को पूरा जानकर, उससे तृप्त होकर, बाल्य में रहे। बाल्य और पाण्डित्य दोनों को जानकर, दोनों से तृप्त होकर, मुनि हो। मौन और अमौन दोनों को जानकर ब्राह्मण हो। “फिर वह ब्राह्मण किस तरह रहे?” जिस तरह भी रहे, वह ऐसा ही है। इससे भिन्न जो कुछ है, वह आर्त है। कहोल कौषीतकेय चुप हो गए। यहाँ बाल्य शब्द पर पाठक ठिठकते हैं; शांकरभाष्य इसे बच्चे जैसा निश्छल भाव पढ़ता है, दिखावे और चालाकी से रहित, जबकि कुछ इसे भीतर के बल के अर्थ में लेते हैं। दोनों पढ़तों में एक बात साझा है: विद्या का बोझ उतारकर ही आदमी मुनि होता है।
सार: जो देखता है उसे देखा नहीं जा सकता, जो सुनता है उसे सुना नहीं जा सकता; वही सबके भीतर की आत्मा है और वही भूख, शोक, जरा और मृत्यु के पार है। उसे जानने वाला पुत्र, धन और लोक की एक ही चाह से उठ खड़ा होता है, और पाण्डित्य से भी आगे जाकर मुनि होता है।
गार्गी का पहला सवाल: जल किस पर बुना है
अब गार्गी वाचक्नवी उठीं, इस सभा की एकमात्र स्त्री, वचक्नु के कुल की ब्रह्मवादिनी। उनका ढंग औरों से अलग था; उन्होंने एक ही प्रश्न को सीढ़ी की तरह बिछा दिया। “याज्ञवल्क्य, यह सब कुछ जल में ओत-प्रोत है, ताने-बाने की तरह बुना हुआ। तो जल किसमें ओत-प्रोत है?” “वायु में, गार्गी।” “और वायु किसमें?” “अन्तरिक्ष के लोकों में, गार्गी।” “और अन्तरिक्ष के लोक?” “गन्धर्व-लोकों में।” “और गन्धर्व-लोक?” “आदित्य-लोकों में।” “और वे?” “चन्द्र-लोकों में।” “और वे?” “नक्षत्र-लोकों में।” “और वे?” “देव-लोकों में।” “और वे?” “इन्द्र-लोकों में।” “और इन्द्र-लोक?” “प्रजापति-लोकों में, गार्गी।” “और प्रजापति-लोक किसमें ओत-प्रोत हैं?” “ब्रह्म-लोकों में, गार्गी।”
गार्गी ने साँस भी न ली, “और ब्रह्म-लोक किसमें ओत-प्रोत हैं?” यहाँ याज्ञवल्क्य ने पहली बार किसी को रोका। “गार्गि मातिप्राक्षीः”, गार्गी, हद के पार मत पूछिए, कहीं आपका सिर न गिर पड़े। जिस देवता के बारे में आगे प्रश्न नहीं बनता, उसके बारे में आप आगे पूछ रही हैं। गार्गी, हद के पार मत पूछिए। और गार्गी वाचक्नवी चुप हो गईं। सभा ने यह सुना और समझा कि जिसने अब तक हर सवाल का सीधा उत्तर दिया था, वह यहाँ जानकर रुका है।
यह रोक कठोर सुनाई देती है, पर इसे ध्यान से देखें। जल, वायु, अन्तरिक्ष, लोकों की सीढ़ी, ये सब कार्य और कारण की एक कड़ी में जुड़े हैं, और कड़ी हर बार एक और आधार माँगती है। ब्रह्म-लोक तक सीढ़ी चढ़ती है क्योंकि वहाँ तक सब कुछ कहीं टिका हुआ है। उसके बाद जो है, वह स्वयं वह ताना है जिसमें बाक़ी सब बुना है। उसके लिए “किसमें?” का प्रश्न बनता ही नहीं, जैसे कोई पूछे कि दूरी की लम्बाई कितनी लम्बी है। सिर गिरने की चेतावनी उसी उलझन का संकेत है जिसमें बुद्धि अपने ही प्रश्न के नीचे दब जाती है। गार्गी ने यह सुना, समझा, और चुप हो गईं। वे लौटकर आएँगी, और तब उनका प्रश्न इसी दीवार की दूसरी ओर से आएगा।
सार: कारण की सीढ़ी जल से ब्रह्म-लोक तक चढ़ती है, और हर सीढ़ी अपने से ऊपर एक और सीढ़ी माँगती है। जहाँ यह माँग ख़त्म होती है, वहाँ “किसमें?” का प्रश्न ही टूट जाता है। गार्गी वहाँ रुकीं, और इसी रुकने से उनका दूसरा प्रश्न तैयार हुआ।
उद्दालक: सूत्र और अन्तर्यामी

उद्दालक आरुणि उठे, अरुण के पुत्र और अपने समय के प्रकाण्ड आचार्य, जिनसे याज्ञवल्क्य ने स्वयं पढ़ा था, ऐसा यह उपनिषद् अपने छठे अध्याय में बताता है। उन्होंने भी मद्र देश का क़िस्सा छेड़ा। “याज्ञवल्क्य, हम मद्र देश में पतंचल काप्य के घर यज्ञ का अध्ययन करते हुए ठहरे थे। उनकी पत्नी को एक गन्धर्व ने पकड़ लिया था। हमने पूछा, आप कौन हैं? उसने कहा, कबन्ध आथर्वण। फिर उसने पतंचल काप्य और सब याज्ञिकों से पूछा, काप्य, क्या आप वह सूत्र जानते हैं जिसमें यह लोक, परलोक और सब प्राणी पिरोए हुए हैं? पतंचल ने कहा, भगवन्, हम नहीं जानते।”
“गन्धर्व ने फिर पूछा, काप्य, क्या आप उस अन्तर्यामी को जानते हैं जो इस लोक, परलोक और सब प्राणियों को भीतर से नियम में रखता है? पतंचल ने फिर कहा, नहीं जानते। तब गन्धर्व ने कहा, काप्य, जो उस सूत्र को जानता है और उस अन्तर्यामी को, वह ब्रह्मवित् है, लोकवित् है, देववित् है, वेदवित् है, आत्मवित् है, सर्ववित् है।” उद्दालक ने याज्ञवल्क्य की ओर देखा। “वह हम जानते हैं। याज्ञवल्क्य, यदि आप उस सूत्र को और उस अन्तर्यामी को जाने बिना ब्रह्म की गायें हाँक ले गए, तो आपका सिर गिर पड़ेगा।” याज्ञवल्क्य ने शान्त कहा, “गौतम, हम उस सूत्र को जानते हैं और उस अन्तर्यामी को भी।” उद्दालक ने टोका, “जानता हूँ, जानता हूँ तो कोई भी कह देता है। जैसा जानते हैं, वैसा कहिए।”
याज्ञवल्क्य ने पहले धागे को खोला। गौतम, वायु ही वह सूत्र है। वायु के ही सूत्र से यह लोक, परलोक और सब प्राणी पिरोए हुए हैं। इसीलिए, गौतम, मरे हुए आदमी के बारे में कहते हैं कि उसके अंग ढीले पड़ गए, क्योंकि वायु के सूत्र से ही वे बँधे थे। जब तक साँस देह में बहती है, हाथ, पैर, आँख, कान सब एक लय में जुड़े रहते हैं; साँस निकली तो हर अंग अकेला पड़ जाता है, जैसे धागा टूटने पर मनके बिखर जाते हैं। उद्दालक ने सिर हिलाया, “ठीक ऐसा ही है, याज्ञवल्क्य। अब अन्तर्यामी को कहिए।”
और तब वह लय शुरू हुई जिसे अन्तर्यामी-ब्राह्मण कहते हैं। जो पृथिवी में रहता हुआ पृथिवी के भीतर है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसका शरीर पृथिवी है, जो पृथिवी को भीतर से नियम में रखता है, “एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः”, वह आपकी आत्मा है, अन्तर्यामी, अमृत। फिर यही वाक्य जल के साथ, अग्नि, अन्तरिक्ष, वायु, द्यु, आदित्य, दिशाओं, चन्द्र और तारों, आकाश, अन्धकार और तेज के साथ; यह अधिदैवत है। फिर सब प्राणियों के साथ; यह अधिभूत है। फिर प्राण, वाक्, चक्षु, श्रोत्र, मन, त्वचा, विज्ञान और रेतस के साथ; यह अध्यात्म है। एक ही ढाँचा, इक्कीस बार, बाहर के सबसे बड़े लोक से भीतर के सबसे गुप्त कोने तक।
लय के अन्त में याज्ञवल्क्य ने वह कहा जो उषस्त को कहा था, अब दूसरे शब्दों में: “अदृष्टो द्रष्टाश्रुतः श्रोता”, वह देखा नहीं जाता और देखता है, सुना नहीं जाता और सुनता है, मना नहीं जाता और मनन करता है, जाना नहीं जाता और जानता है। इसके सिवा कोई द्रष्टा नहीं, कोई श्रोता नहीं, कोई मन्ता नहीं, कोई विज्ञाता नहीं। यही आपकी आत्मा है, अन्तर्यामी, अमृत; इससे भिन्न सब आर्त है। उद्दालक आरुणि चुप हो गए। पहनी हुई माला में धागा दिखता नहीं, हर मनका दिखता है; पर माला उसी धागे से माला है। अन्तर्यामी वैसा ही है, हर लोक और हर इन्द्रिय उसका मनका है, और वह उनमें से किसी को ज्ञात हुए बिना सबको थामे है।
सार: वायु वह सूत्र है जिसमें लोक और देह के अंग पिरोए हैं; साँस निकलते ही अंग ढीले पड़ जाते हैं। उसके भीतर अन्तर्यामी है, जो पृथिवी से लेकर हमारे विज्ञान तक हर चीज़ में रहकर उसे चलाता है और जिसे वह चीज़ नहीं जानती। वही देखता है, वही सुनता है, वही आपकी आत्मा है।
गार्गी के दो बाण, और अक्षर

अब गार्गी फिर उठीं, और इस बार पहले सभा से बोलीं। “भगवन्तो ब्राह्मणो, हम इनसे दो प्रश्न पूछेंगे। यदि ये दोनों का उत्तर दे दें, तो आप में से कोई इन्हें ब्रह्मोद्य में, ब्रह्म की इस बहस में, कभी नहीं जीत पाएगा।” याज्ञवल्क्य ने कहा, “पूछिए, गार्गी।” गार्गी ने अपनी चुनौती की तस्वीर ख़ुद खींची। “याज्ञवल्क्य, जैसे काशी या विदेह का कोई वीर-पुत्र ढीले धनुष को चढ़ाकर, दो तीखे, शत्रु-भेदी बाण हाथ में लेकर सामने आ खड़ा हो, वैसे ही हम दो प्रश्नों के साथ आपके सामने खड़े हैं। इनका उत्तर दीजिए।” “पूछिए, गार्गी।”
पहला बाण। “जो द्यु के ऊपर है, जो पृथिवी के नीचे है, जो इन दोनों के बीच है, और जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं, वह किसमें ओत-प्रोत है?” “गार्गी, वह आकाश में ओत-प्रोत है।” गार्गी ने सिर झुकाया, “नमस्कार, याज्ञवल्क्य, आपने इसे सुलझा दिया। अब दूसरे के लिए तैयार रहिए।” “पूछिए, गार्गी।” और दूसरा बाण वही था, शब्द-शब्द वही, ऊपर, नीचे, बीच, तीनों काल, किसमें ओत-प्रोत? “गार्गी, आकाश ही में।” “और आकाश किसमें ओत-प्रोत है?” गार्गी फिर वहाँ पहुँच गई थीं जहाँ पहले उन्हें रोका गया था। इस बार याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया।
“एतद्वै तदक्षरं गार्गि”, गार्गी, यही वह अक्षर है, जिसे ब्राह्मण कहते हैं: न स्थूल, न अणु, न ह्रस्व, न दीर्घ, न लाल, न स्निग्ध, न छाया, न अन्धकार, न वायु, न आकाश, असंग, न रस, न गन्ध, बिना आँख, बिना कान, बिना वाक्, बिना मन, बिना तेज, बिना प्राण, बिना मुख, बिना माप, बिना भीतर, बिना बाहर। वह कुछ नहीं खाता, उसे कोई नहीं खाता। जो कुछ कहा जा सकता है, वह सब यहाँ हटा दिया गया है, और हटाने के बाद जो बचा, वही अक्षर है, वह जो क्षरित नहीं होता। शांकरभाष्य यहाँ गार्गी के प्रश्न के आकाश को अव्याकृत पढ़ता है, वह बिना नाम-रूप वाला बीज जिसमें सृष्टि सोई रहती है; अक्षर उससे भी परे है।
फिर याज्ञवल्क्य ने बताया कि यह अक्षर क्या करता है। “गार्गी, इसी अक्षर के प्रशासन में सूर्य और चन्द्र थमे हुए हैं। इसी के प्रशासन में द्यु और पृथिवी अपनी जगह हैं। इसी के प्रशासन में निमेष, मुहूर्त, दिन-रात, पखवाड़े, महीने, ऋतुएँ और वर्ष अपनी लय में हैं। इसी के प्रशासन में कुछ नदियाँ श्वेत पर्वतों से पूर्व की ओर बहती हैं, कुछ पश्चिम की ओर, जिस-जिस दिशा में जो बहती है। इसी के प्रशासन में मनुष्य यजमान की प्रशंसा करते हैं, देवता दर्वी की आहुति के आसरे हैं, और पितर उसी आहुति के पीछे लगे हैं।” प्रशासन शब्द ध्यान देने का है; यह हुक्म चलाने की भाषा है, पर यह हुक्म बिना मुख वाले का है। अक्षर अपने होने भर से सब थामे है।
फिर चेतावनी और वादा, एक साँस में। “गार्गी, जो इस अक्षर को जाने बिना इस लोक में हवन करता है, यज्ञ करता है, हज़ारों वर्ष तप करता है, उसका वह सब अन्त वाला ही होता है। जो इस अक्षर को जाने बिना इस लोक से जाता है, वह कृपण है। और जो इस अक्षर को जानकर इस लोक से जाता है, वह ब्राह्मण है।” वह अक्षर देखा नहीं जाता और देखता है, सुना नहीं जाता और सुनता है, जाना नहीं जाता और जानता है; उसके सिवा कोई द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, विज्ञाता नहीं। “गार्गी, इसी अक्षर में आकाश ओत-प्रोत है।” गार्गी सभा की ओर मुड़ीं, “भगवन्तो, इन्हें नमस्कार करके छूट जाएँ, तो इसे ही बहुत मानिए। आप में से कोई इन्हें ब्रह्मोद्य में कभी नहीं जीत पाएगा।” और वाचक्नवी बैठ गईं।
सार: गार्गी ने वही सीढ़ी दूसरी ओर से चढ़ी और इस बार आकाश से आगे का उत्तर मिला: अक्षर, जिसे केवल हटाकर कहा जा सकता है, जो कुछ खाता नहीं और जिसे कोई खाता नहीं, और जिसके प्रशासन में सूरज से नदी तक सब अपनी लय में है। उसे जाने बिना हज़ार वर्ष का तप भी अन्त वाला है।
शाकल्य का सवाल: आख़िर कितने देवता हैं
सात प्रश्नकर्ता बैठ चुके थे। अब विदग्ध शाकल्य उठे, वेदपाठ में पगे हुए, और सबसे सरल दिखने वाला प्रश्न किया, “याज्ञवल्क्य, देवता कितने हैं?” याज्ञवल्क्य ने वैश्वदेव शस्त्र की निविद् से उत्तर दिया, यानी उस सूची से जिसमें सब देवताओं का बखान है, “तीन सौ तीन, और तीन हज़ार तीन।” शाकल्य ने ओम् कहा, यानी ठीक, और फिर पूछा, “पर सच में देवता कितने हैं?” “तैंतीस।” “ठीक। पर सच में कितने?” “छह।” “ठीक। सच में कितने?” “तीन।” “कितने?” “दो।” “कितने?” “डेढ़।” “कितने, याज्ञवल्क्य?” “एक।” शाकल्य ने तब पहला धागा पकड़ा, “तो वे तीन सौ तीन और तीन हज़ार तीन कौन हैं?”
“वे इन्हीं की महिमाएँ हैं,” याज्ञवल्क्य ने कहा, “देवता तो तैंतीस ही हैं।” “कौन तैंतीस?” आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, ये इकतीस, और इन्द्र तथा प्रजापति मिलाकर तैंतीस। “वसु कौन?” अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यु, चन्द्र, नक्षत्र; इनमें यह सारा वसु, यानी सारा धन, रखा हुआ है, इसीलिए वसु। “रुद्र कौन?” इस पुरुष में दस प्राण, यानी दस इन्द्रियाँ, और ग्यारहवाँ आत्मा, मन। जब ये इस मरणशील शरीर से निकलते हैं तो रुलाते हैं, इसीलिए रुद्र। “आदित्य कौन?” संवत्सर के बारह महीने। ये सब कुछ लेते हुए चलते हैं, आदान करते हुए, इसीलिए आदित्य। “इन्द्र कौन, प्रजापति कौन?” गर्जन ही इन्द्र है, यज्ञ ही प्रजापति। “गर्जन क्या?” अशनि, बिजली। “यज्ञ क्या?” पशु।
फिर गिनती नीचे उतरी। “छह कौन?” अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यु; यह सब कुछ इन छह में है। “तीन कौन?” ये तीन लोक, क्योंकि इन्हीं में सब देवता हैं। “दो कौन?” अन्न और प्राण। “डेढ़ कौन?” यह जो बहता है, वायु। “पर यह तो एक ही बहता है, फिर डेढ़ क्यों?” क्योंकि इसमें यह सब कुछ अध्यार्ध्नोत्, यानी बढ़ता-फैलता है, इसीलिए अध्यर्ध। “और एक देवता कौन?” प्राण। उसे ही ब्रह्म कहते हैं, त्यत्, वह। तैंतीस से एक तक की यह उतराई इस अध्याय के सबसे सुन्दर हिस्सों में है। हर संख्या सही है, और हर संख्या उससे छोटी संख्या का विस्तार है; देवता गिने जाते रहे, और गिनती के नीचे एक ही साँस निकली।
अब शाकल्य आठ पुरुषों पर आए। “जिसका आयतन पृथिवी है, लोक अग्नि, ज्योति मन, जो उस पुरुष को जानता है जो सबकी आत्मा का परायण है, वही वेदिता है। याज्ञवल्क्य, क्या आप उसे जानते हैं?” “हाँ, वह यही शारीर पुरुष है। कहिए, शाकल्य, उसका देवता कौन है?” शाकल्य ने कहा, “अमृत।” फिर काम जिसका आयतन, हृदय लोक: वह काममय पुरुष है, देवता स्त्रियाँ। रूप जिसका आयतन, चक्षु लोक: आदित्य में बसा पुरुष, देवता सत्य। आकाश जिसका आयतन, श्रोत्र लोक: प्रतिध्वनि का पुरुष, देवता दिशाएँ। तम जिसका आयतन: छायामय पुरुष, देवता मृत्यु। रूप और हृदय: दर्पण में दिखता पुरुष, देवता सत्य। जल: जल में बसा पुरुष, देवता वरुण। रेतस: पुत्रमय पुरुष, देवता प्रजापति। हर बार याज्ञवल्क्य ने पुरुष पहचाना और देवता का प्रश्न शाकल्य को लौटा दिया।
यह आठ बार का खेल ख़त्म हुआ तो याज्ञवल्क्य ने पहली बार शाकल्य को सीधे देखा। “शाकल्य, क्या इन ब्राह्मणों ने आपको अंगारे उठाने की चिमटी बना लिया है?” यानी आप सबकी ओर से जलते कोयले उठा रहे हैं और हाथ आपका जल रहा है। यह ताना सभा की पूरी तस्वीर बताता है। सात लोग हारकर बैठे थे और आठवाँ उनकी लड़ाई अपने कंधे पर लेकर लड़ रहा था। शाकल्य ने इसे नहीं सुना। उन्होंने उत्तर में वही प्रश्न किया जो अश्वल ने शुरू में किया था, इस बार और तीखा, “याज्ञवल्क्य, आपने कुरु और पांचाल के इन ब्राह्मणों को बोलकर मात दे दी है; आप कौन-सा ब्रह्म जानते हैं?”
सार: देवता तीन हज़ार तीन सौ छह भी हैं, तैंतीस भी, और एक भी; हर गिनती सच है और हर छोटी गिनती बड़ी का मूल। वसु वे हैं जिनमें धन बसा है, रुद्र वे जो जाते हुए रुलाते हैं, आदित्य वे जो सब कुछ ले जाते हैं; और सबके नीचे प्राण है, जिसे ब्रह्म कहते हैं। शाकल्य ने यह सब सुना और फिर भी लड़ाई जारी रखी।
दिशाएँ, हृदय, और नेति नेति: शाकल्य का अन्त
याज्ञवल्क्य ने कहा, “हम दिशाओं को जानते हैं, उनके देवताओं और उनकी प्रतिष्ठा के साथ।” शाकल्य ने पकड़ लिया, “तो कहिए, पूर्व दिशा में आप किस देवता वाले हैं?” “आदित्य देवता वाले।” “वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है?” “चक्षु में।” “चक्षु किसमें?” “रूपों में, क्योंकि चक्षु से ही रूप देखे जाते हैं।” “और रूप किसमें?” “हृदय में। हृदय से ही रूप जाने जाते हैं।” “ठीक ऐसा ही है, याज्ञवल्क्य।” दक्षिण में यम, यम यज्ञ में, यज्ञ दक्षिणा में, दक्षिणा श्रद्धा में, क्योंकि श्रद्धा हो तो ही दक्षिणा दी जाती है, और श्रद्धा हृदय में। पश्चिम में वरुण, वरुण जल में, जल रेतस में, रेतस हृदय में; इसीलिए पिता जैसे बेटे को कहते हैं, यह हृदय से निकला है, हृदय से बना है।
उत्तर में सोम, सोम दीक्षा में, दीक्षा सत्य में, इसीलिए दीक्षित को कहते हैं सत्य बोलिए, और सत्य हृदय में। ऊपर की ध्रुवा दिशा में अग्नि, अग्नि वाक् में, वाक् हृदय में। पाँच दिशाएँ, पाँच देवता, और हर रास्ता हृदय पर आकर मिला। तब शाकल्य ने पूछा, “और हृदय किसमें प्रतिष्ठित है?” याज्ञवल्क्य का धीरज यहाँ टूटा। उन्होंने शाकल्य को अहल्लिक कहा, यानी प्रेत, और बोले, “यदि आप हृदय को हमसे बाहर कहीं मानते हैं, तो जान लीजिए कि वह हमसे बाहर होता तो इस शरीर को कुत्ते खा गए होते, पक्षी नोच ले गए होते।” हृदय जहाँ है, वहीं आदमी है; उसके ठिकाने के लिए देह से बाहर कोई जगह पूछना जीते हुए आदमी को लाश मानना है।
शाकल्य ने आख़िरी सीढ़ी पर पैर रखा, “तो आप और आत्मा, दोनों किसमें प्रतिष्ठित हैं?” “प्राण में।” “प्राण किसमें?” “अपान में।” “अपान किसमें?” “व्यान में।” “व्यान किसमें?” “उदान में।” “उदान किसमें?” “समान में।” और फिर याज्ञवल्क्य ने सीढ़ी को वहाँ रोका जहाँ वह ख़ुद रुकती है, “स एष नेति नेत्यात्मा”, वह यह आत्मा है, “ऐसा नहीं, ऐसा नहीं”। अगृह्य है, पकड़ा नहीं जाता। अशीर्य है, टूटता नहीं। असंग है, चिपकता नहीं। बँधा नहीं है, व्यथित नहीं होता, घायल नहीं होता। जो कुछ कहा जाए, उस पर “यह वह नहीं” कहकर आगे जाना ही उस तक जाने का रास्ता है, क्योंकि वह कही जाने वाली हर चीज़ के पीछे कहने वाला है।
फिर याज्ञवल्क्य ने अपना प्रश्न किया। “ये आठ आयतन हैं, आठ लोक, आठ देवता, आठ पुरुष। जो इन पुरुषों को अलग-अलग निकालकर, फिर लौटाकर, इन सबके पार चला गया, उस औपनिषद पुरुष को हम आपसे पूछते हैं। यदि आप उसे हमें नहीं बता सकेंगे, तो आपका सिर गिर पड़ेगा।” शाकल्य उसे नहीं जानते थे। उनका सिर गिर पड़ा। और मूल एक कठोर पंक्ति जोड़ता है, चोर उनकी हड्डियाँ भी कुछ और समझकर उठा ले गए। जो आठ पुरुषों में बँटी हुई विद्या जानता था, वह उन आठों के पीछे खड़े एक को नहीं जानता था, और सिर वही गिरता है जो जाने बिना दावा करता है। गार्गी को यही चेतावनी मिली थी, और वे रुकी थीं। शाकल्य रुके नहीं।
फिर याज्ञवल्क्य ने सभा से कहा, “भगवन्तो, आप में से जो चाहे हमसे पूछे, या सब मिलकर पूछें। या हम आप में से जिसे चाहें उससे पूछें, या सबसे पूछें।” ब्राह्मण हिम्मत न कर सके। तब याज्ञवल्क्य ने उन्हें श्लोकों से पूछा। जैसे वृक्ष वनस्पति है, वैसे ही पुरुष है, यह सच है। उसके रोम पत्ते हैं, त्वचा बाहरी छाल। त्वचा से रक्त बहता है जैसे छाल से रस, इसीलिए घायल आदमी से रक्त वैसे ही निकलता है जैसे चोट खाए वृक्ष से रस। उसका मांस भीतरी छाल है, स्नायु उसके रेशे, हड्डियाँ भीतर की लकड़ी, मज्जा मज्जा जैसी। कटा हुआ वृक्ष जड़ से फिर उगता है; मृत्यु से कटा मनुष्य किस जड़ से उगता है?
“रेतस से, यह मत कहिए,” याज्ञवल्क्य ने ख़ुद उत्तर रोका, “रेतस तो जीते हुए से उपजता है। वृक्ष बीज से उगता है, वृक्ष के मर जाने के बाद भी। पर जिसे जड़ समेत उखाड़ लें, वह वृक्ष फिर नहीं उगता। तो मृत्यु से कटा मनुष्य किस जड़ से उगता है?” सभा चुप रही। और तब अन्तिम श्लोक आया, जो उत्तर भी है और द्वार भी। जो जन्मा हुआ है, वह फिर नहीं जन्मता; कौन उसे फिर जन्माए? “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म”, ब्रह्म विज्ञान है और आनन्द है, देने वाले के दान का परायण, और उसका भी परायण जो उसे जानकर स्थिर खड़ा है। जन्म और मरण की जड़ खोजते-खोजते सभा उस तक पहुँची जो कभी जन्मा ही नहीं, और इसीलिए फिर से जन्मने के प्रश्न से बाहर है।
सार: हर दिशा का रास्ता हृदय पर आकर मिलता है, और हृदय का ठिकाना पूछने वाले को याज्ञवल्क्य याद दिलाते हैं कि जीता हुआ आदमी ही उसका ठिकाना है। आत्मा नेति नेति है, पकड़ में न आने वाला, टूटने वाला नहीं, और उसे जाने बिना किया गया दावा शाकल्य के सिर की तरह गिरता है। अन्त में एक प्रश्न बचा रहता है जिसका उत्तर सभा नहीं दे पाती: मृत्यु से कटा मनुष्य किस जड़ से फिर उगता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस सभा से हम क्या लेकर उठें? सबसे पहले शायद वह वाक्य जो याज्ञवल्क्य ने अश्वल को कहा था, कि ब्रह्मिष्ठ को हमारा नमन, हम तो गायों के चाहने वाले हैं। जानने वाला दावा करने की ज़रूरत से छूट जाता है; उसे गायें चाहिए तो वह गायें ले लेता है, और उसकी विद्या बाद में अपने आप बोलती है। हम में से अधिकतर उल्टे क्रम में चलते हैं, दावा पहले, और उसकी रक्षा में पूरी उम्र। इस अध्याय के आठ प्रश्नकर्ता उसी क्रम में फँसे थे, और उनमें से सात ने समय रहते बैठ जाना सीख लिया।
दूसरी बात गार्गी की है। उन्हें एक बार रोका गया और वे बैठ गईं; पर बैठकर उन्होंने प्रश्न को तराशा। जब वे दूसरी बार उठीं तो उनके हाथ में वही प्रश्न था, बस उसका मुख दूसरी ओर था, और इस बार उन्हें अक्षर तक का उत्तर मिला। हमारे जीवन में भी कुछ दीवारें आती हैं जिन पर सिर पटकने से सिर ही टूटता है; उनके आगे रुकना हार से अलग चीज़ है। रुककर सोचा गया प्रश्न दीवार में दरवाज़ा ढूँढ़ लेता है। और शाकल्य की कथा उसी दीवार का दूसरा पहलू है, कि जो रुकना नहीं जानता, वह अपने ही प्रश्न के नीचे आ जाता है।
और तीसरी बात वह है जो इस अध्याय में तीन बार दोहराई गई, उषस्त के लिए, उद्दालक के लिए, गार्गी के लिए: देखने के देखने वाले को आप देख नहीं सकते। आज रात जब आप आँखें बन्द करें, तो एक क्षण के लिए यह देखने की कोशिश कीजिए कि देखने की कोशिश कौन कर रहा है। जो मिलेगा वह विचार होगा, चित्र होगा, आवाज़ होगी; और उन सबके पीछे कोई होगा जो उन्हें देख रहा है और ख़ुद पकड़ में नहीं आता। यह उपनिषद् उसे आपकी आत्मा कहता है, अन्तर्यामी, अमृत, और इस पूरी सभा का शोर उसी एक चुप तक पहुँचने के लिए था।
आधार: बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 3, ब्राह्मण/खण्ड 1 से 9; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।