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काशी का राजभवन। एक आदमी भीतर के कक्ष में गहरी नींद में सोया है, और उसके सिरहाने दो लोग खड़े हैं: एक राजा, एक पंडित। राजा अजातशत्रु झुककर उस सोये हुए को पुकारते हैं, “हे बृहत्, हे श्वेत वस्त्र वाले, हे सोम राजा!” आदमी करवट भी नहीं लेता। राजा फिर पुकारते हैं। कुछ नहीं होता। तब वे हाथ से उसका कंधा दबाते हैं, और वह चौंककर उठ बैठता है। पास खड़े पंडित गार्ग्य, जो अभी-अभी बारह बार ब्रह्म की परिभाषा दे चुके हैं, चुपचाप देखते रह जाते हैं। जिस चन्द्र-पुरुष को वे ब्रह्म कहकर पूजते थे, उसके नाम की पुकार इस आदमी को जगा न सकी। जगाया उसे किसी और ने, जो भीतर था।
बृहदारण्यक का यह दूसरा अध्याय मधु-काण्ड का उत्तरार्ध है। पहले अध्याय ने सृष्टि की कथा कही थी और “मैं ब्रह्म हूँ” की उस घोषणा तक पहुँचा था; यह अध्याय उसी बात को चार अलग-अलग दरवाज़ों से भीतर ले जाता है। पहले दरवाज़े पर एक सोया हुआ आदमी है, दूसरे पर ब्रह्म के दो रूप और “नेति नेति” का आदेश, तीसरे पर घर छोड़ने से पहले पत्नी से हुआ एक संवाद, और चौथे पर वह मधु-विद्या जिसे कहने के लिए एक ऋषि को घोड़े का सिर लगाना पड़ा। अन्त में गुरुओं की एक लम्बी सूची है, जो इस विद्या को स्वयंभू ब्रह्म तक ले जाती है। यह उपनिषद् यहाँ बार-बार एक ही सवाल पूछता है: जो जानता है, उसे कौन जानेगा?
इस अध्याय के मुख्य किरदार
अजातशत्रु: काशी के राजा, जो एक अभिमानी पंडित को शिष्य बनाकर उसे सोये हुए आदमी के पास ले जाते हैं और वहीं ब्रह्म दिखा देते हैं।
दृप्तबालाकि गार्ग्य: गर्ग-वंश के विद्वान, जिनके नाम में ही “दृप्त” (अभिमानी) जुड़ गया; बारह उत्तर देकर चुप हो जाते हैं।
याज्ञवल्क्य: शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा के ऋषि, जो घर से निकलने से पहले अपनी पत्नी से जीवन की सबसे गहरी बात कहते हैं।
मैत्रेयी: याज्ञवल्क्य की पत्नी, जो धन का हिस्सा लेने के बजाय अमरता का सवाल पूछती हैं।
कात्यायनी: याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नी, जिनके और मैत्रेयी के बीच सम्पत्ति का बँटवारा होना है।
दध्यङ् आथर्वण और अश्विनीकुमार: वह ऋषि जिन्होंने घोड़े के सिर से मधु-विद्या कही, और देवताओं के जुड़वाँ वैद्य जिन्होंने वह सिर जोड़ा।
गार्ग्य के बारह उत्तर, और राजा का एक ही जवाब
दृप्तबालाकि गार्ग्य गर्ग-वंश के एक अनूचान (वेद पढ़े और पढ़ाए हुए) विद्वान थे, और अपनी विद्या पर उन्हें इतना भरोसा था कि नाम के आगे “दृप्त”, यानी अभिमानी, अपने आप जुड़ गया। वे काशी के राजा अजातशत्रु के पास आए और बिना किसी भूमिका के कहा, “हम आपको ब्रह्म बताएँगे।” अजातशत्रु ने यह सुनते ही कहा, “इस एक वाक्य पर हम आपको हज़ार गायें देते हैं। लोग ‘जनक, जनक’ कहते हुए दौड़ते हैं, मानो विद्या का आदर करने वाला राजा एक ही हो; हमें भी वह अवसर दीजिए।” राजा की इस उदारता में एक हल्की चुनौती भी छिपी थी, जिसे गार्ग्य ने अभी नहीं सुना।
गार्ग्य ने पहला उत्तर रखा, “जो पुरुष सूर्य में है, उसी को हम ब्रह्म मानकर उपासना करते हैं।” अजातशत्रु ने बीच में ही रोक दिया, “मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः”, इस विषय में हमसे बहस न कीजिए। फिर बोले, “हम इसे सब प्राणियों का मूर्धा, सबसे ऊपर बैठा राजा मानकर उपासते हैं। जो ऐसा उपासता है, वह सब प्राणियों का शिरोमणि राजा होता है।” यह राजा का तरीक़ा था। गार्ग्य जो रूप बताते, राजा उसे उसका ठीक नाम और उसका ठीक फल देकर स्वीकार कर लेते थे, और उसी स्वीकार में दिखा देते थे कि वह फल कितना सीमित है। सूर्य-पुरुष की उपासना का फल राज्य है, और ब्रह्म का बोध उससे कहीं आगे की चीज़ है।
इसी तरह एक-एक करके ग्यारह और उत्तर आए। चन्द्र में बसा पुरुष, जिसे राजा ने बृहत्, श्वेतवस्त्र सोम राजा कहा, जिसके उपासक का अन्न कभी नहीं घटता। बिजली का पुरुष, जो तेजस्वी है। आकाश का पुरुष, जो पूर्ण और अचल है। वायु का पुरुष, जो इन्द्र वैकुण्ठ है, कभी न हारने वाली सेना। अग्नि का पुरुष, जो सब कुछ सह लेने वाला विषासहि है। जल का पुरुष, जो प्रतिरूप है, हर चीज़ का अनुरूप। दर्पण का पुरुष, जो चमकने वाला रोचिष्णु है। चलते हुए आदमी के पीछे उठती आवाज़ का पुरुष, जो असु, यानी प्राण है। दिशाओं का पुरुष, जो द्वितीय है, कभी साथ न छोड़ने वाला साथी। छाया का पुरुष, जो मृत्यु है। और अन्त में अपने ही भीतर का पुरुष, जिसे राजा ने आत्मन्वी, आत्मा वाला कहा।
बारहवें उत्तर के बाद गार्ग्य चुप हो गए। उनके पास अब कोई और रूप नहीं बचा था। अजातशत्रु ने पूछा, “बस इतना ही?” गार्ग्य ने कहा, “इतना ही।” राजा बोले, “इतने से जाना नहीं जाता।” यह वाक्य इस पूरे ब्राह्मण की धुरी है। गार्ग्य ने बारह जगह उँगली रखी थी, और हर जगह कोई सीमित पुरुष निकला, जिसकी उपासना का कोई सीमित फल था। ब्रह्म वह है जो इन बारहों को देखता है और स्वयं किसी जगह पर टिका हुआ नहीं मिलता। गार्ग्य ने अभिमान उतार दिया और कहा, “हम आपके पास शिष्य होकर आते हैं।” जो ब्रह्म सिखाने आया था, वह अब सीखने के लिए हाथ जोड़े खड़ा था।
सार: गार्ग्य ने बारह रूपों में ब्रह्म खोजा, और राजा ने हर रूप को उसका सही नाम और सीमित फल देकर लौटा दिया। ब्रह्म हर रूप के पीछे का देखने वाला है, और इसी कारण वह किसी एक रूप में पकड़ में नहीं आता। अभिमान का उतरना ही सीखने की पहली शर्त निकली।
सोया हुआ आदमी: स्वप्न, गहरी नींद, मकड़ी और चिंगारियाँ
अजातशत्रु ने एक क्षण रुककर कहा, “यह उलटा क्रम है कि कोई ब्राह्मण किसी क्षत्रिय के पास यह सोचकर आए कि वह उसे ब्रह्म बताएगा। फिर भी, हम आपको जना देंगे।” शांकरभाष्य यहाँ लिखता है कि राजा ने यह कहकर परम्परा का मान रखा और फिर भी सिखाना स्वीकार किया। राजा ने गार्ग्य का हाथ पकड़ा और उठ खड़े हुए। दोनों एक ऐसे आदमी के पास पहुँचे जो गहरी नींद में था। राजा ने उसे उन्हीं नामों से पुकारा जो गार्ग्य ने चन्द्र-पुरुष को दिए थे, “हे बृहत्, हे श्वेत वस्त्र वाले, हे सोम राजा!” वह नहीं उठा। राजा ने हाथ से दबाकर उसे जगाया, और वह उठ बैठा।
अब राजा ने वह प्रश्न रखा जिसके लिए यह सारा दृश्य रचा गया था, “गार्ग्य, यह विज्ञानमय पुरुष, यह जानने वाला, जब सोया हुआ था, तब कहाँ था? और अब कहाँ से लौट आया?” मूल यहाँ केवल इतना कहता है कि गार्ग्य ने इसे नहीं जाना। बात सीधी थी। जिस चन्द्र-पुरुष के नाम पर गार्ग्य टिके थे, उस नाम की पुकार सोये हुए तक नहीं पहुँची। नाम बाहर रह गया। जो जागा, वह भीतर से जागा, किसी ऐसे कोने से जहाँ न सूर्य पहुँचता है, न चन्द्र, न बिजली, न कोई दिशा। बारह उत्तरों में से कोई भी उस कोने तक नहीं जाता था।
तब अजातशत्रु ने स्वयं समझाया। जब यह विज्ञानमय पुरुष सोता है, तो इन प्राणों, यानी इन्द्रियों, की जानने की शक्ति को अपने विज्ञान में समेट लेता है और हृदय के भीतर जो आकाश है, उसमें लेट जाता है। जब वह इन्हें इस तरह पकड़ लेता है, तब कहते हैं कि पुरुष सो रहा है। उस समय प्राण पकड़ा हुआ है, वाणी पकड़ी हुई है, आँख पकड़ी हुई है, कान पकड़ा हुआ है, मन पकड़ा हुआ है। बाहर से देखने वाले को लगता है कि आदमी कहीं चला गया। मूल के अनुसार वह अपनी फैली हुई शक्तियाँ खींचकर अपने पास रख लेता है, जैसे कोई दुकानदार शाम को सामान भीतर समेट ले, और उसी समेटे हुए रूप में वहीं रहता है।
फिर स्वप्न की बात आई। जब यह पुरुष स्वप्न में विचरता है, तो वे उसके अपने लोक होते हैं। वहाँ वह कभी महाराजा हो जाता है, कभी महाब्राह्मण, कभी ऊँचे-नीचे न जाने कैसे-कैसे ठिकानों में जा पहुँचता है। उपनिषद् यहाँ एक सुन्दर उपमा देता है: जैसे कोई महाराजा अपने जनपद के लोगों को साथ लेकर अपने ही देश में जहाँ चाहे घूमे, वैसे ही यह पुरुष प्राणों को लेकर अपने ही शरीर में जहाँ चाहे विचरता है। स्वप्न का सारा वैभव, सारा भय, सारी यात्रा, अपने ही भीतर की ज़मीन पर होती है। बाहर से एक भी चीज़ उधार नहीं ली जाती।
और जब वह सुषुप्त होता है, यानी गहरी नींद में, जब किसी को कुछ नहीं जानता, तब क्या होता है? मूल एक शरीर-चित्र देता है। हिता नाम की बहत्तर हज़ार नाड़ियाँ हृदय से निकलकर पुरीतत् तक फैली हैं; पुरीतत् हृदय के चारों ओर की झिल्ली है। इन्हीं नाड़ियों से उतरकर वह पुरीतत् में सोता है। और उसकी नींद कैसी होती है? जैसे कोई कुमार, कोई महाराजा, या कोई महाब्राह्मण आनन्द की चरम सीमा तक पहुँचकर सो जाए, ठीक वैसे यह सोता है। राजा हो या भिखारी, विद्वान हो या गार्ग्य जैसा अभिमानी, गहरी नींद में सबका आनन्द एक जैसा है, क्योंकि वहाँ अलग-अलग करने वाली चीज़ें समेट ली गई हैं।
अन्त में अजातशत्रु ने दो उपमाएँ दीं जो इस अध्याय से आगे भी गूँजती रहती हैं। जैसे मकड़ी अपने धागे के सहारे ऊपर चढ़ती है, और जैसे आग से छोटी-छोटी चिंगारियाँ चारों ओर छिटकती हैं, वैसे ही इस आत्मा से सब प्राण, सब लोक, सब देव, सब प्राणी निकलते हैं। और उसका रहस्य-नाम, उसका उपनिषद्, है “सत्यस्य सत्यम्”, सत्य का सत्य। प्राण सत्य हैं, और यह उनका सत्य है। यानी जो कुछ जीवित और सच्चा दिखता है, वह सब इस एक के भरोसे सच्चा है। गार्ग्य सूर्य में ब्रह्म खोज रहे थे; राजा ने दिखा दिया कि सूर्य भी उसी चिंगारी-झुंड की एक चिंगारी है।
सार: सोते समय जानने वाला इन्द्रियों को समेटकर हृदय के आकाश में ठहर जाता है। स्वप्न अपनी ही ज़मीन पर की यात्रा है, और गहरी नींद वह आनन्द है जिसमें राजा और बच्चा एक हो जाते हैं। इस आत्मा से सब कुछ चिंगारियों की तरह निकलता है, इसीलिए इसका नाम सत्य का सत्य है।
प्राण नाम का शिशु, और उलटा रखा प्याला
दूसरा ब्राह्मण एक पहेली से खुलता है, जैसे कोई बड़ा-बूढ़ा बच्चों को बुझौवल सुनाए। जो शिशु को उसके आधान (जिस पर रखा जाता है), प्रत्याधान (जिस पर टिका है), स्थूणा (खम्भा) और दाम (रस्सी) के साथ जानता है, वह अपने सात द्वेषी भ्रातृव्यों, यानी शत्रु बने हुए अपने ही बन्धुओं, को रोक देता है। फिर उपनिषद् स्वयं पहेली खोलता है। शिशु यह मध्यम प्राण है, शरीर के बीच बसी हुई साँस। उसका आधान यह शरीर है, प्रत्याधान यह सिर, स्थूणा प्राण की शक्ति, और दाम अन्न, क्योंकि अन्न ही वह रस्सी है जिससे यह बछड़ा खूँटे से बँधा रहता है।
इस शिशु की सेवा में सात अक्षिति, यानी कभी न घटने वाले, उपस्थित रहते हैं। और वे सातों हमारी आँख में बैठे हैं। आँख की लाल रेखाओं से रुद्र इस प्राण के साथ जुड़ा है। आँख के जल से पर्जन्य, वर्षा का देवता। पुतली से आदित्य। काले भाग से अग्नि। सफ़ेद भाग से इन्द्र। नीचे की पलक से पृथिवी, और ऊपर की पलक से द्यौ, यानी आकाश। जो ऐसा जानता है, उसका अन्न कभी नहीं घटता। इस छोटी-सी आँख में सात देवता बैठे हैं और सातों मिलकर उस शिशु को पालते हैं जो हमारे भीतर साँस ले रहा है।
फिर एक श्लोक आता है, “अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः”, यानी ऐसा प्याला जिसका मुँह नीचे है और तला ऊपर। उपनिषद् कहता है कि यह हमारा सिर है: मुँह नीचे की ओर खुला, कपाल ऊपर। उस प्याले में विश्वरूप यश रखा है, और यश का अर्थ यहाँ प्राण हैं, जो हर रूप में उतरते हैं। उस प्याले के किनारे पर सात ऋषि बैठे हैं, और ये सात ऋषि भी प्राण ही हैं। आठवीं वाक् है, जो ब्रह्म से, यानी वेद से, जुड़ी हुई है। एक साधारण खोपड़ी को इस उपनिषद् ने ऋषियों की सभा बना दिया है।
और ये सात ऋषि कौन हैं? ये दो कान गोतम और भरद्वाज हैं। ये दो आँखें विश्वामित्र और जमदग्नि। ये दो नथुने वसिष्ठ और कश्यप। और वाक् अत्रि है, क्योंकि वाक् से, यानी मुँह से, अन्न खाया जाता है; जो खाता है वह अत्ति, और उसी से अत्रि नाम बना। जो ऐसा जानता है, वह सबका अत्ता, यानी खाने वाला, होता है; सब कुछ उसका अन्न हो जाता है। सप्तर्षि आकाश में तारों की तरह चमकते हैं, और यहाँ वही सात हमारे चेहरे पर खुले हुए द्वार हैं।
इस पहेली का मर्म क्या है? शांकरभाष्य सात द्वेषी भ्रातृव्यों को इन्हीं सात द्वारों से बाहर की ओर भागने वाली आसक्तियाँ मानता है, जो प्राण की शक्ति को खींचकर बिखेर देती हैं। जो जान लेता है कि यह शरीर एक प्याला है, ये इन्द्रियाँ ऋषि हैं, और भीतर एक शिशु अन्न की डोर से बँधा हुआ साँस ले रहा है, वह अपने ही शरीर का यजमान हो जाता है। यह उपनिषद् बार-बार यही करता है: जो चीज़ बाहर विराट लगती थी, उसे हमारी देह के भीतर बैठा दिखा देता है, ताकि खोज के लिए कहीं दूर जाना न पड़े।
सार: भीतर की साँस एक शिशु है, जिसे शरीर, सिर, बल और अन्न सँभालते हैं, और जिसकी सेवा में आँख के सात देवता खड़े हैं। सिर एक उलटा प्याला है जिसके किनारे सात ऋषि बैठे हैं। जो अपनी देह को इस तरह देख लेता है, उसका अन्न घटता नहीं और वह सबका भोक्ता हो जाता है।
ब्रह्म के दो रूप, और आदेश: नेति नेति
“द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे”, ब्रह्म के दो ही रूप हैं। तीसरा ब्राह्मण इसी वाक्य से खुलता है और फिर इन दो रूपों को चार जोड़ों में बाँटता है: मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और अमृत, स्थित और गतिशील, सत् और त्य। सत् का अर्थ यहाँ है जो सामने ठहरा हुआ प्रत्यक्ष है, और त्य का अर्थ है “वह”, जो परोक्ष है, जिसकी ओर केवल संकेत हो सकता है। इन चार जोड़ों को उपनिषद् पहले बाहर के जगत में (अधिदैवत) और फिर अपने भीतर (अध्यात्म) खोजता है, ताकि पाठक देख सके कि जो बाहर है, वही भीतर भी बैठा है।
बाहर देखिए। वायु और अन्तरिक्ष को छोड़कर जो कुछ है, पृथ्वी, जल, अग्नि, पहाड़, नदियाँ, यह मूर्त है, मर्त्य है, स्थित है, सत् है। इस सारे मूर्त का रस, यानी उसका सार, वह है जो तपता है, सूर्य। और वायु तथा अन्तरिक्ष अमूर्त हैं, अमृत हैं, गतिशील हैं, त्य हैं। इस अमूर्त का रस वह पुरुष है जो सूर्य के मण्डल में है। ध्यान दीजिए, सूर्य का पिण्ड मूर्त का सार है, और उसी पिण्ड के भीतर बैठा पुरुष अमूर्त का सार है। एक ही सूर्य दोनों रूपों की चोटी है।
अब भीतर आइए। प्राण और अन्तरात्मा के आकाश को छोड़कर जो कुछ है, हड्डी, मांस, त्वचा, यह मूर्त, मर्त्य, स्थित, सत् है। इसका रस आँख है, जैसे बाहर के मूर्त का रस सूर्य था। और प्राण तथा भीतर का आकाश अमूर्त, अमृत, गतिशील, त्य हैं। इनका रस वह पुरुष है जो दाहिनी आँख में है, जैसे बाहर सूर्य-मण्डल में पुरुष था। जिसे हम सूर्य कहकर पूजते हैं, उसका ही जोड़ हमारी दाहिनी आँख में देखता हुआ बैठा है। इसीलिए गार्ग्य का सूर्य-पुरुष एक अधूरा उत्तर था: उसने बाहर की चोटी देख ली थी, पर भीतर बैठा उसका जोड़ छूट गया था।
उस पुरुष का रूप कैसा है? उपनिषद् छह उपमाएँ देता है, और हर उपमा किसी रंग की कौंध है। जैसे माहारजन, यानी हल्दी के रंग में रँगा वस्त्र। जैसे पाण्डु रंग की भेड़ की ऊन। जैसे इन्द्रगोप, वह लाल बीरबहूटी जो बरसात में घास पर चलती है। जैसे अग्नि की लपट। जैसे पुण्डरीक, श्वेत कमल। जैसे एक बार कौंधी बिजली। और फिर फल: जो ऐसा जानता है, उसकी श्री एक बार कौंधी बिजली जैसी हो जाती है। यह रंगों का उत्सव किसी चित्रकार की सूची जैसा है, और इसका आशय यह है कि वह पुरुष हर रंग में झलकता है और किसी एक रंग में पकड़ा नहीं जाता।
और इसके तुरन्त बाद वह वाक्य आता है जिसने वेदान्त की पूरी भाषा तय कर दी: “नेति नेति”, यह भी नहीं, यह भी नहीं। यही आदेश है। मूल कहता है कि इस “नहीं” से परे और कोई ऊँचा कथन नहीं है। और फिर नाम आता है, सत्य का सत्य: प्राण सत्य हैं, यह उनका सत्य है। शांकरभाष्य “नेति नेति” को दोनों रूपों का निषेध पढ़ता है, मूर्त का भी और अमूर्त का भी, जिससे इशारा उस ओर चला जाता है जो दोनों से परे है और दोनों को सम्भव करता है। जितने रंग गिनाए गए थे, वे सब उस पुरुष की झलक थे; पुरुष स्वयं झलकों की गिनती से बाहर रह जाता है।
सार: ब्रह्म बाहर और भीतर दो रूपों में दिखता है, ठोस और सूक्ष्म, और दोनों की चोटी पर एक पुरुष है, बाहर सूर्य-मण्डल में, भीतर दाहिनी आँख में। वह हल्दी, ऊन, बीरबहूटी, लपट, कमल और बिजली जैसा झलकता है। और फिर उपनिषद् कहता है: नेति नेति, यह भी नहीं, इससे परे कोई कथन नहीं।
याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी: जो अमर न करे, उसका हम क्या करें
चौथा ब्राह्मण घर की देहरी पर खुलता है। याज्ञवल्क्य, शुक्ल यजुर्वेद की परम्परा के वे ऋषि जिनसे जनक की सभा में कोई जीत न सका, अब गृहस्थ जीवन से ऊपर उठकर वन की राह पकड़ने वाले हैं। मूल में वे कहते हैं कि हम इस स्थान से ऊपर जाने वाले हैं। जाने से पहले घर का हिसाब बराबर करना है। उनकी दो पत्नियाँ हैं, मैत्रेयी और कात्यायनी। उन्होंने मैत्रेयी को पुकारा, “मैत्रेयी, हम इस स्थान से उठकर जाने वाले हैं। आइए, आपके और कात्यायनी के बीच हम सम्पत्ति का बँटवारा कर दें।” बात सीधी थी, गृहस्थ का अन्तिम कर्तव्य, और वे उसे निभाकर निकलना चाहते थे।

मैत्रेयी ने बँटवारे की बात पर हाथ नहीं बढ़ाया। उन्होंने प्रश्न किया, “भगवन्, यदि धन से भरी यह सारी पृथ्वी हमारी हो जाए, तो क्या हम उससे अमर हो जाएँगे?” याज्ञवल्क्य ने कहा, “नहीं। जैसा जीवन साधन-सम्पन्न लोगों का होता है, वैसा ही आपका भी हो जाएगा। ‘अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन’, धन से अमरता की कोई आशा नहीं।” यह उत्तर उन्होंने बिना घुमाए दिया। वे जानते थे कि सामने बैठी स्त्री सान्त्वना के लिए नहीं पूछ रही। मैत्रेयी को यह उपनिषद् आगे चलकर ब्रह्मवादिनी कहता है, ब्रह्म की बात करने वाली, और यह प्रश्न उसी की पहली झलक है।
मैत्रेयी ने कहा, “जिससे हम अमर न हों, उसे लेकर हम क्या करें? जो आप जानते हैं, बस वही हमें कह दीजिए।” याज्ञवल्क्य का स्वर बदल गया। “आप हमें पहले भी प्रिय थीं, और अब आप प्रिय बात कह रही हैं। आइए, बैठिए। हम आपको समझाते हैं, और हम जब समझाते जाएँ, आप उस पर ठहरकर मनन करती जाइए।” यह वाक्य सुनने की शर्त भी बताता है: समझाने वाला बोलता जाए और सुनने वाला हर वाक्य पर निदिध्यासन करे, यानी उसे भीतर उतरने दे। घर की जिस देहरी पर सम्पत्ति का बँटवारा होने वाला था, वहाँ अब ब्रह्मविद्या का आसन बिछ गया।
याज्ञवल्क्य ने जो पहली बात कही, वह इस पूरे उपनिषद् की सबसे प्रसिद्ध पंक्तियों में है। “पति की कामना से पति प्रिय नहीं होता, अपने आत्मा की कामना से पति प्रिय होता है।” फिर यही बात एक-एक करके पत्नी के लिए, पुत्रों के लिए, धन के लिए, ब्राह्मण-वर्ग के लिए, क्षत्रिय-वर्ग के लिए, लोकों के लिए, देवताओं के लिए, प्राणियों के लिए, और अन्त में सब कुछ के लिए दोहराई गई। हम जिसे भी प्रेम करते हैं, उसमें असल में अपने ही आत्मा को प्रेम करते हैं। पति, पत्नी, बच्चे, धन, ये सब उस प्रेम के आधार हैं, और प्रेम का असली ठिकाना वह आत्मा है जो इन सबके पीछे से देख रहा है।
फिर वह वचन आया जो साधना का पूरा मार्ग एक साँस में कह देता है: “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि”, मैत्रेयी, आत्मा ही देखने योग्य है, सुनने योग्य है, मनन करने योग्य है, निदिध्यासन करने योग्य है। आत्मा के दर्शन से, श्रवण से, मति से, विज्ञान से यह सब कुछ जाना जाता है। और फिर चेतावनी: जो ब्राह्मण-वर्ग को आत्मा से अलग कहीं और जानता है, उसे ब्राह्मण-वर्ग त्याग देता है। क्षत्र, लोक, देव, प्राणी, सब उसे त्याग देते हैं जो उन्हें आत्मा से बाहर खोजता है। क्योंकि यह ब्रह्म, यह क्षत्र, ये लोक, ये देव, ये प्राणी, यह सब कुछ, यही आत्मा है।
सार: घर छोड़ने से पहले याज्ञवल्क्य ने सम्पत्ति बाँटनी चाही, और मैत्रेयी ने अमरता पूछी। उत्तर यह मिला कि हम जिसे भी प्रेम करते हैं, उसमें अपने ही आत्मा को प्रेम करते हैं, इसलिए आत्मा ही सुनने, मनन और निदिध्यासन योग्य है। जो उसे बाहर खोजता है, उसे सब कुछ छोड़ देता है।
नगाड़ा, शंख, वीणा, और पानी में घुली नमक की डली
अब याज्ञवल्क्य उपमाओं की एक लड़ी बाँधते हैं, और हर उपमा एक ही बात को नए कोण से दिखाती है। जैसे कोई बजते हुए नगाड़े की बाहर फैली ध्वनियों को अलग-अलग पकड़ न सके, पर नगाड़े को पकड़ लेने से, या बजाने वाले को पकड़ लेने से, ध्वनि पकड़ी जाती है। वैसे ही शंख की फूँक की ध्वनियों को अलग से नहीं पकड़ा जा सकता, पर शंख या फूँकने वाले को पकड़ लें तो ध्वनि पकड़ में आ जाती है। और वैसे ही वीणा के स्वर, जो वीणा या वादक को पकड़ने पर पकड़े जाते हैं। संसार के असंख्य रूप ये बिखरी ध्वनियाँ हैं, और आत्मा वह वादक है जिसे पकड़ लें तो सब पकड़ में आ जाए।
फिर एक और चित्र। जैसे गीली लकड़ी की आग से धुआँ अलग-अलग दिशाओं में निकलता है, वैसे ही इस महान् सत्ता का निःश्वास, यानी उसकी छोड़ी हुई साँस, है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषदें, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान। ये सब उसी की साँसें हैं। जिस ग्रन्थ को हम पढ़ रहे हैं, वह भी उसी साँस का धुआँ है। याज्ञवल्क्य इस सूची से वेदों का मान भी रखते हैं और मैत्रेयी को उस ओर भी मोड़ते हैं जिसकी साँस से वेद निकले हैं, क्योंकि जिसकी साँस वेद हैं, वह वेदों से बड़ा है।
तीसरा चित्र एकायन का है, यानी वह एक जगह जहाँ सब कुछ जाकर मिल जाता है। जैसे समुद्र सब जलों का एकायन है, वैसे त्वचा सब स्पर्शों का, नासिका सब गन्धों का, जिह्वा सब रसों का, आँख सब रूपों का, कान सब शब्दों का, मन सब संकल्पों का, हृदय सब विद्याओं का, हाथ सब कर्मों का, उपस्थ सब आनन्दों का, पायु सब विसर्गों का, पाँव सब मार्गों का, और वाक् सब वेदों का एकायन है। हज़ार स्पर्श एक त्वचा में, हज़ार रास्ते दो पाँवों में। और ये सब इन्द्रियाँ स्वयं किसमें मिलती हैं? इसका उत्तर अगली उपमा देती है।
जैसे नमक की डली पानी में डाल दी जाए, तो वह पानी में ही घुल जाती है, उसे फिर निकाला नहीं जा सकता, पर जहाँ से भी पानी चखिए, नमकीन लगता है। वैसे ही, मैत्रेयी, यह महान् सत्ता अनन्त है, अपार है, विज्ञानघन ही है, ठोस जानना ही उसका स्वरूप है। इन भूतों से उठकर वह उन्हीं के साथ विलीन हो जाती है। और फिर याज्ञवल्क्य ने कहा, “न प्रेत्य संज्ञास्ति”, मरने के बाद संज्ञा नहीं रहती। मैत्रेयी ठिठक गईं। “भगवन्, यहीं आपने हमें मोह में डाल दिया। पहले कहा विज्ञानघन, फिर कहा कि मरने पर संज्ञा नहीं रहती।”
याज्ञवल्क्य ने कहा, “हम मोह की बात नहीं कह रहे। यह जानने के लिए पर्याप्त है।” और फिर समझाया। जहाँ द्वैत जैसा कुछ होता है, वहाँ एक दूसरे को सूँघता है, एक दूसरे को देखता है, सुनता है, बोलता है, मनन करता है, जानता है। पर जहाँ सब कुछ आत्मा ही हो गया, वहाँ कौन किससे किसको सूँघे, किससे किसको देखे, किससे किसको जाने? “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्”, जानने वाले को किससे जानें? शांकरभाष्य यहाँ “संज्ञा” को देह और इन्द्रियों से बँधी विशेष पहचान पढ़ता है: वह पहचान मिटती है, विज्ञानघन बना रहता है। नमक की डली हर बूँद में फैल जाती है, और उसी तरह जानने वाला हर जानने में मौजूद रहता है।
सार: नगाड़े की ध्वनियाँ बजाने वाले को पकड़ने से पकड़ी जाती हैं, वैसे ही जगत आत्मा को जानने से जाना जाता है। वेद उसकी साँस हैं, इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों का समुद्र हैं, और वह स्वयं पानी में घुले नमक की तरह हर जगह है। जानने वाले को जानने का कोई दूसरा उपकरण नहीं, क्योंकि दूसरा कोई बचता ही नहीं।
मधु-विद्या: हर चीज़ हर दूसरी का मधु है
पाँचवाँ ब्राह्मण एक वाक्य से शुरू होता है जो शहद की तरह धीरे-धीरे फैलता है: “इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मधु”, यह पृथ्वी सब प्राणियों का मधु है, और सब प्राणी इस पृथ्वी के मधु हैं। मधु का अर्थ यहाँ मिठास से आगे जाता है। शहद हज़ार फूलों से बनता है और हज़ार जीवों को पालता है; उसमें कोई एक फूल अलग करके नहीं दिखाया जा सकता। पृथ्वी हर प्राणी से बनी है और हर प्राणी को पालती है, और हर प्राणी पृथ्वी से बना है और पृथ्वी को पालता है। यह दोनों ओर का रसपान है, जिसमें खाने वाला और खाया जाने वाला एक-दूसरे में घुले हुए हैं।
फिर वाक्य का दूसरा भाग आता है, जो हर बार दोहराया जाएगा। जो इस पृथ्वी में तेजोमय, अमृतमय पुरुष है, और जो अपने भीतर, इस शरीर में तेजोमय, अमृतमय पुरुष है, वह यही है, जो यह आत्मा है। यही अमृत है, यही ब्रह्म है, यही सब कुछ है। यानी बाहर पृथ्वी और भीतर देह, ये दो छोर हैं, और दोनों में एक ही चमकता हुआ अमर पुरुष बैठा है। मधु-विद्या का रहस्य इस तीसरे में है: बाहर और भीतर को जोड़ने वाला वह एक, जिसकी वजह से एक चीज़ दूसरी की मधु बन सकती है। बिना उस एक के, पृथ्वी और प्राणी दो अजनबी रह जाते।
और फिर यह साँचा चौदह बार चलता है, हर बार एक बाहरी तत्व और उसका भीतर का जोड़। जल का जोड़ रेतस, यानी वीर्य। अग्नि का जोड़ वाणी। वायु का जोड़ प्राण। सूर्य का जोड़ आँख। दिशाओं का जोड़ कान और उसमें लौटती गूँज। चन्द्र का जोड़ मन। बिजली का जोड़ शरीर का तेज। मेघ-गर्जन का जोड़ हमारा स्वर और शब्द। आकाश का जोड़ हृदय का आकाश। धर्म का जोड़ भीतर का धर्म-भाव। सत्य का जोड़ भीतर का सत्य-भाव। मनुष्य-जाति का जोड़ भीतर का मनुष्य। और चौदहवाँ, आत्मा का जोड़ आत्मा। हर बार वही घोषणा: यह पुरुष वही है जो यह आत्मा है, यही अमृत, यही ब्रह्म, यही सब।
चौदह के बाद उपनिषद् कहता है कि यह आत्मा सबका अधिपति है, सब प्राणियों का राजा है। और फिर रथ का चित्र: जैसे रथ की नाभि में और नेमि, यानी पहिए के घेरे, में सब अरे, यानी तीलियाँ, जुड़ी रहती हैं, वैसे ही इस आत्मा में सब प्राणी, सब देव, सब लोक, सब प्राण, और ये सब आत्माएँ जुड़ी हुई हैं। तीलियाँ आपस में एक-दूसरे को नहीं छूतीं, फिर भी एक ही पहिया हैं, क्योंकि हर तीली नाभि में धँसी है। ठीक यही मधु का रहस्य है: प्राणी एक-दूसरे को नाभि के रास्ते छूते हैं, और वह नाभि आत्मा है।
मधु शब्द यहाँ दो काम एक साथ करता है: जो किसी से बना है, और जो किसी को पालता है। हम जो खाते हैं, उसमें पृथ्वी, जल, सूर्य और वायु घुले हुए हैं; और एक दिन हम पृथ्वी का अन्न बनेंगे। हमारी वाणी में वही आग है जो चूल्हे में है। हमारी साँस में वही हवा है जो पीपल के पत्तों में चल रही है। उपनिषद् इसे चौदह बार गिनकर बताए गए हिसाब की तरह रखता है, और हिसाब के अन्त में एक ही आत्मा बचता है। जो इस हिसाब को एक बार ठीक से देख ले, उसके लिए किसी को अजनबी कहना कठिन हो जाता है।
सार: पृथ्वी से लेकर आत्मा तक चौदह तत्व हैं, और हर एक बाकी सबका मधु है, उनसे बना हुआ और उन्हें पालता हुआ। हर तत्व में और हर देह में एक ही तेजोमय अमृत पुरुष बैठा है, इसीलिए यह मिठास दोनों ओर बहती है। सब प्राणी उस आत्मा में रथ की तीलियों की तरह जुड़े हैं।
घोड़े के सिर से कही गई विद्या, और गुरुओं की डोर
चौदह घोषणाओं के बाद उपनिषद् तीन बार दोहराता है: यही वह मधु है जो दध्यङ् आथर्वण ने अश्विनीकुमारों को कहा। और हर बार ऋग्वेद का एक मन्त्र लाता है जिसे ऋषि ने देखकर कहा था। पहले मन्त्र में ऋषि अश्विनीकुमारों से कहता है कि आपके उस उग्र कर्म को हम वैसे प्रकट करते हैं जैसे मेघ-गर्जन वर्षा को प्रकट करता है, कि दध्यङ् आथर्वण ने घोड़े के सिर से आपको मधु कहा। दूसरा मन्त्र और साफ़ है: हे अश्विनीकुमारों, आपने आथर्वण दध्यङ् को घोड़े का सिर लगा दिया, और उसने ऋत की राह चलते हुए आपको त्वष्टा का वह मधु कहा जो आपके लिए गुप्त था।

मूल यहाँ केवल इतना संकेत करता है; कथा को शांकरभाष्य और ऋग्वेद की व्याख्या-परम्परा पूरा करती है, और वह कथा इस तरह है। इन्द्र ने दध्यङ् आथर्वण को यह विद्या सिखाई थी और कहा था, “यदि आपने यह किसी और को सिखाया, तो हम आपका सिर काट देंगे।” अश्विनीकुमार, देवताओं के जुड़वाँ वैद्य, यह विद्या सीखने आए। ऋषि ने ख़तरा बताया। अश्विनीकुमारों ने कहा, “आप चिन्ता न करें। हम आपका असली सिर निकालकर सुरक्षित रख लेंगे और उसकी जगह घोड़े का सिर जोड़ देंगे। आप उसी मुँह से विद्या कह दीजिए। इन्द्र जो सिर काटेंगे, वह घोड़े का होगा। फिर हम आपका सिर वापस जोड़ देंगे।” और ठीक वैसा ही हुआ।
यह कथा पढ़ने वाले को दो बातें बता जाती है। पहली, यह विद्या इतनी बड़ी मानी गई कि उसके लिए सिर देना और सिर बदलना भी सस्ता सौदा लगा। दूसरी, उपनिषद् उसी मुँह से बोलता है जिसमें ब्रह्म हो, चाहे वह घोड़े का ही क्यों न हो; सिर की जाति से विद्या की जाति तय नहीं होती। तीसरा मन्त्र फिर पुरुष की ओर मुड़ता है: उसने दो पैर वालों के पुर, यानी नगर बनाए, चार पैर वालों के पुर बनाए, और पक्षी बनकर उन पुरों में पुरुष होकर प्रविष्ट हुआ। यह पुरुष सब पुरों में पुरिशय है, हर नगर में सोया हुआ; इससे कुछ भी ढँका हुआ नहीं बचा, कुछ भी बाहर नहीं बचा। “पुरुष” शब्द का यही अर्थ मूल स्वयं खोल देता है।
चौथी बार वह मन्त्र आता है जो इस अध्याय की अन्तिम कुंजी है: “रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव”, हर रूप में वह उसी रूप का प्रतिरूप हो गया, और यह उसका रूप उसी को पहचानने के लिए है। इन्द्र अपनी मायाओं से बहुरूप होकर चलता है; उसके साथ दस सौ, यानी हज़ार, घोड़े जुड़े हैं। और उपनिषद् कहता है, यह आत्मा ही वे घोड़े हैं, यही दस, यही हज़ार, यही अनेक, यही अनन्त। यह ब्रह्म है जिसके पहले कुछ नहीं, बाद कुछ नहीं, भीतर कुछ नहीं, बाहर कुछ नहीं। “अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः”, यह आत्मा ब्रह्म है, सबका अनुभव करने वाला। यही अनुशासन है, यही उपदेश।
पक्षी के साँचे में वह पक्षी दिखता है, घोड़े के साँचे में घोड़ा, मनुष्य के साँचे में मनुष्य। इतने रूप क्यों? मूल का उत्तर है, प्रतिचक्षणाय, पहचानने के लिए। हर रूप उसी का चेहरा है ताकि हम किसी न किसी चेहरे में उसे पहचान लें। हमारी उलझन यह है कि हम एक चेहरा देखकर उसे बाक़ी चेहरों से जोड़ नहीं पाते, और यही अलगाव दुख बन जाता है। मधु-विद्या इसी अलगाव की दवा है: जिस दिन एक को छूते ही सब छू जाए, उस दिन कोई विरोध नहीं बचता, कोई अकेलापन नहीं बचता। इन्द्र इस विद्या को छिपाना चाहते थे, और उपनिषद् इसे खुले में रख देता है।
छठा ब्राह्मण गुरुओं की एक लम्बी सूची है, और उपनिषद् इसे वंश कहता है। पौतिमाष्य ने गौपवन से सीखा, गौपवन ने पौतिमाष्य से, और इसी तरह एक नाम दूसरे को थामे हुए ऊपर चढ़ता जाता है: कौशिक, कौण्डिन्य, शाण्डिल्य, गौतम, आग्निवेश्य, भारद्वाज, पाराशर्य, जातूकर्ण्य, आत्रेय, गालव, और आगे। सूची के अन्त में वही नाम मिलते हैं जिनकी कथा हमने अभी पढ़ी: अश्विनीकुमारों ने दध्यङ् आथर्वण से, दध्यङ् ने अथर्वा दैव से, अथर्वा ने मृत्यु प्राध्वंसन से, मृत्यु ने प्रध्वंसन से, और फिर एकर्षि, विप्रचित्ति, व्यष्टि, सनारु, सनातन, सनग, परमेष्ठी, और परमेष्ठी ने ब्रह्म से। ब्रह्म स्वयंभू है। सूची एक नमस्कार पर रुकती है: ब्रह्म को नमन। यह विद्या भी मधु की तरह हाथ से हाथ, मुँह से कान चलती आई है।
सार: मधु-विद्या इतनी बड़ी मानी गई कि दध्यङ् ने उसे घोड़े के सिर से कहा। वह पुरुष हर पुर में सोया है और हर रूप में अपना प्रतिरूप बना है, ताकि पहचाना जा सके। यह आत्मा ब्रह्म है, सबका अनुभव करने वाला, और यह ज्ञान गुरुओं की एक अटूट डोर से स्वयंभू ब्रह्म तक जाता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस अध्याय में तीन लोग सीखते हैं, और तीनों अपनी-अपनी जगह से। गार्ग्य विद्या के अभिमान से भरे आते हैं और एक सोये हुए आदमी के सिरहाने चुप हो जाते हैं। मैत्रेयी बँटवारे की बैठक में बैठती हैं और सम्पत्ति के बजाय अमरता उठा लेती हैं। अश्विनीकुमार ऐसा ज्ञान चाहते हैं जिसके लिए एक ऋषि को अपना सिर दाँव पर लगाना पड़ता है। हम इनमें किसके पास बैठे हैं? शायद तीनों के। हमारे पास भी बारह उत्तर हैं, जो ब्रह्म के बारे में हमने पढ़-सुन रखे हैं। हमारे पास भी कोई बँटवारा है जिसमें हम हिस्सा तो चाहते हैं, पर जानते हैं कि वह अमर नहीं करेगा।
यह अध्याय एक सरल अभ्यास सुझाता है। आज रात जब नींद आए, उस क्षण को देखिए जब आँख, कान और मन एक-एक करके भीतर समेटे जाते हैं। कल सुबह जब जागें, उस क्षण को देखिए जब वे फिर बाहर बिछते हैं। जो समेटता और बिछाता है, वह न सोया था, न जागा। अजातशत्रु ने गार्ग्य को यही दिखाया था, और वह दृश्य हमारे अपने बिस्तर पर हर रात दोहराया जाता है। और दिन में, जब किसी अपने को देखकर मन भर आए, याज्ञवल्क्य का वाक्य याद कीजिए: यह प्रेम उस आत्मा के लिए है जो इस चेहरे से झाँक रहा है। इससे प्रेम की जड़ दिखने लगती है, और वह और गहरा हो जाता है।
और अन्त में मधु। अगली बार जब रोटी हाथ में हो, एक क्षण रुककर देखिए कि उसमें कितनी पृथ्वी, कितना जल, कितना सूर्य घुला है, और यह कि एक दिन हम भी इसी हिसाब में लौट जाएँगे। इसमें उस पहिये की पहचान है जिसकी नाभि में हम सबकी तीलियाँ धँसी हैं। दध्यङ् ने यह बात घोड़े के सिर से कही थी। हम इसे अपने ही सिर से, अपने ही मुँह से, अपने ही घर में कह सकते हैं। उपनिषद् हमसे बस इतना ही माँगता है।
आधार: बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 2, ब्राह्मण/खण्ड 1 से 6; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।