बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 2

बृहदारण्यक उपनिषद् · अध्याय दो

गार्ग्य की हार, मैत्रेयी की उठान

छह ब्राह्मण। तीन प्रसिद्ध संवाद।

दूसरा अध्याय मधु-काण्ड का continuation है, और इसमें तीन प्रसिद्ध संवाद बैठे हैं। पहला, गार्ग्य-अजातशत्रु का। गार्ग्य एक मान्यता-प्राप्त ब्राह्मण-विद्वान हैं, राजा अजातशत्रु को ब्रह्म-तत्त्व सिखाने आते हैं, बारह-तरह से। हर बार अजातशत्रु,गार्ग्य की व्याख्या को आगे ले जाते हैं, गहरी जगह तक। यह क्षत्रिय-ब्राह्मण-role-reversal एक रोचक scene है, जहाँ शिक्षा का प्रवाह उल्टा होता है।

दूसरा संवाद चौथे ब्राह्मण में है, याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी का पहला संवाद। याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी से कहते हैं कि वो गृहस्थ-जीवन छोड़ कर वन-वासी होने जा रहे हैं, और अपनी सम्पत्ति उनके और दूसरी पत्नी कात्यायनी के बीच बाँट देंगे। मैत्रेयी का उत्तर एक तरह का दार्शनिक-निर्णायक-क्षण है, “अगर सारी पृथ्वी मेरी हो जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी?” “नहीं”, याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं। “धन से जीवन वैसा होगा जैसा धनवानों का होता है, मगर अमरता का धन से कोई सम्बन्ध नहीं।” इस वाक्य के बाद का संवाद आत्मा को कैसे जानना है इस विषय की पहली विस्तृत चर्चा है। यही संवाद चौथे अध्याय के पाँचवें ब्राह्मण में दोबारा, और भी विस्तार के साथ, आता है।

पाँचवाँ ब्राह्मण “मधु-ब्राह्मण” है, जहाँ बार-बार दोहराई गयी पंक्ति है, “अयम् वै सर्वस्य मधु अस्ति।” सूर्य-पृथ्वी-अन्तरिक्ष-इत्यादि सब-कुछ एक-दूसरे के लिए “मधु” (शहद, sweet का सार) हैं। यह interdependence का सबसे काव्यिक-कथन है।

Key passages

2.4.1-3मैत्रेयी का प्रश्न
मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्य उद्यास्यन्वा अरेऽहमस्मात्स्थानादस्मि । हन्त तेऽनया कात्यायन्या अन्तं करवाणीति ॥ सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति । नेति होवाच याज्ञवल्क्यः । यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्यात् । अमृतत्वस्य तु न आशा अस्ति वित्तेनेति ॥ सा होवाच मैत्रेयी । येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम् । यदेव भगवान्वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥
maitreyīti hovāca yājñavalkya udyāsyanvā are’hamasmātsthānādasmi । hanta te’nayā kātyāyanyā antaṃ karavāṇīti ॥ sā hovāca maitreyī । yannu ma iyaṃ bhagoḥ sarvā pṛthivī vittena pūrṇā syāt kathaṃ tenāmṛtā syāmiti । neti hovāca yājñavalkyaḥ । yathaivopakaraṇavatāṃ jīvitaṃ tathaiva te jīvitaṃ syāt । amṛtatvasya tu na āśā asti vitteneti ॥ sā hovāca maitreyī । yenāhaṃ nāmṛtā syāṃ kimahaṃ tena kuryām । yadeva bhagavānveda tadeva me brūhīti ॥

अर्थ: याज्ञवल्क्य ने कहा, ‘मैत्रेयी! मैं इस-स्थान (गृहस्थ-जीवन) से जाने वाला हूँ। हाँ, चलो आपका हिस्सा कात्यायनी (दूसरी-पत्नी) के साथ-कर देता हूँ।’ मैत्रेयी ने कहा, ‘भगवन्! अगर पूरी-पृथ्वी मेरे लिए धन से भर जाए, तो क्या मैं अमृत हो जाऊँगी?’ ‘नहीं,’ याज्ञवल्क्य ने कहा। ‘धन-वालों के जीवन-जैसा आपका जीवन हैं जाएगा। अमृत-तत्व की धन से कोई आशा नहीं।’ मैत्रेयी ने कहा, ‘जिससे मैं अमृत नहीं होऊँगी, उसका मुझे क्या करना है? आप जो जानते हैं, वही मुझे बताओ।’

संगति: एक powerful-opening।ब्रह्म-ज्ञान माँगती है। यह feminist-Upanishad है। और मैत्रेयी की रोल-model कई-तरह से ratified है: brahma-vAdinI के रूप में, अमृत-seeker के रूप में।
2.4.5आत्मा-दर्शन (दूसरा महावाक्य-तरह)
न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति आत्मनस्त्वेवकामाय पतिः प्रियो भवति । न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवति आत्मनस्त्वेव कामाय जाया प्रिया भवति । न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति आत्मनस्त्वेVअ कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः । मैत्रेयी । आत्मनः वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेन इदं सर्वं विदितम् ॥
na vā are patyuḥ kāmāya patiḥ priyo bhavati ātmanastvevakāmāya patiḥ priyo bhavati । na vā are jāyāyai kāmāya jāyā priyā bhavati ātmanastveva kāmāya jāyā priyā bhavati । na vā are putrāṇāṃ kāmāya putrāḥ priyā bhavanti ātmanastveVa kāmāya putrāḥ priyā bhavanti । ātmā vā are draṣṭavyaḥ śrotavyo mantavyo nididhyāsitavyaḥ । maitreyī । ātmanaḥ vā are darśanena śravaṇena matyā vijñānena idaṃ sarvaṃ viditam ॥

अर्थ:आत्मा-की-इच्छा है।आत्मा-की-इच्छा है।आत्मा-की-इच्छा है। हे मैत्रेयी! आत्मा को ही देखना चाहिए, सुनना चाहिए, मनन करना चाहिए, निदिध्यासन करना चाहिए। हे मैत्रेयी! आत्मा को देख कर, सुन कर, मनन कर के, जान कर, यह सब जान लिया जाता है।

संगति: विश्व-famous statement: ‘श्रवण, मनन, निदिध्यासन’ (सुनना, सोचना, गहन-ध्यान), यह त्रिकूट की विधि सभी Vedanta-pedagogy का foundation। और ‘पति-पत्नी-पुत्र, सब-आत्मा के लिए प्रिय हैं’, यह deep-psychological observation है।

संगति

मैत्रेयी-संवाद का शिक्षण-वज़न विशेष है। एक पत्नी अपने पति से धन के बजाय ब्रह्म-ज्ञान माँगती है। यह feminist-Upanishad है, इस सीमित अर्थ में कि यहाँ एक स्त्री वैदिक-शास्त्र की केन्द्रीय जिज्ञासु है। बाद की हिन्दू-परम्परा में मैत्रेयी का स्थान एक “ब्रह्म-वादिनी” के रूप में सुरक्षित है।

संवाद के अन्त में याज्ञवल्क्य कहते हैं, “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।” (आत्मा को ही देखना, सुनना, मनन करना, निदिध्यासन करना चाहिए।) यह त्रिपदी-पाठ-विधि श्रवण-मनन-निदिध्यासन सदियों तक वेदान्त-शिक्षा का foundational पाठ-क्रम रही है। आज भी अद्वैत-गुरुकुलों में यह व्यवस्था है।

गार्ग्य-संवाद का अन्तिम मन्त्र दिलचस्प है। बारह-व्याख्याओं के बाद, गार्ग्य चुप हो जाते हैं। अजातशत्रु तेरहवीं-व्याख्या देते हैं, जो प्राण-तत्त्व पर land होती है, “जो प्राणों का प्राण है, उसको ही ब्रह्म जानो।” यह वाक्य पाँचवें अध्याय में फिर एक centerpiece बनेगा।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “bribasic.itx” से।

license: मूल text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।