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1427
सलोक महला 9
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- जिह सिमरत गति पाईऐ तिह भजु रे तै मीत ॥
- पांच तत को तनु रचिओ जानहु चतुर सुजान ॥
- घट घट मै हरि जू बसै संतन कहिओ पुकारि ॥
- सुखु दुखु जिह परसै नही लोभु मोहु अभिमानु ॥
- उसतति निंदिआ नाहि जिहि कंचन लोह समानि ॥
- हरखु सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥
- भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन ॥
- जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥
- जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥
- जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥
- भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥
- जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥
- जो प्रानी ममता तजै लोभ मोह अहंकार ॥
- जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥
- निसि दिनु माइआ कारने प्रानी डोलत नीत ॥
- जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥
- प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
- जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ॥
- माइआ कारनि धावही मूरख लोग अजान ॥
- जो प्रानी निसि दिनु भजै रूप राम तिह जानु ॥
· सलोक
जिह सिमरत गति पाईऐ तिह भजु रे तै मीत ॥
जिह सिमरत गति पाईऐ तिह भजु रे तै मीत ॥
कहु नानक सुनु रे मना अउध घटत है नीत ॥10॥
कहु नानक सुनु रे मना अउध घटत है नीत ॥10॥
हिन्दी अर्थ: हे मित्र! आप उस परमात्मा का भजन किया करें। जिसका नाम सिमरने से ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त होती है। हे नानक! कहें: हे मन! सुनें। उम्र घटती जा रही है (परमात्मा का सिमरन ना बिसारें)। 10।
· सलोक
पांच तत को तनु रचिओ जानहु चतुर सुजान ॥
पांच तत को तनु रचिओ जानहु चतुर सुजान ॥
जिह ते उपजिओ नानका लीन ताहि मै मानु ॥11॥
जिह ते उपजिओ नानका लीन ताहि मै मानु ॥11॥
हिन्दी अर्थ: हे समझदार मनुष्य! आप जानते हैं कि यह शरीर पाँच तत्वों से बना है। नानक कहते हैं: यह भी जान लें कि जिन तत्वों से यह बना है, उन्हीं में फिर लीन हो जाएगा। फिर शरीर के मोह में फँसकर परमात्मा का स्मरण क्यों भुला रहे हैं? 11।
· सलोक
घट घट मै हरि जू बसै संतन कहिओ पुकारि ॥
घट घट मै हरि जू बसै संतन कहिओ पुकारि ॥
कहु नानक तिह भजु मना भउ निधि उतरहि पारि ॥12॥
कहु नानक तिह भजु मना भउ निधि उतरहि पारि ॥12॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: हे मन! संत जनों ने ऊँचा-ऊँचा पुकार के बता दिया है कि परमात्मा हरेक शरीर में बस रहा है। आप उस (परमात्मा) का भजन किया करें। (भजन की बरकति से) संसार-समुंद्र से आप पार लांघ जाएँगे। 12।
· सलोक
सुखु दुखु जिह परसै नही लोभु मोहु अभिमानु ॥
सुखु दुखु जिह परसै नही लोभु मोहु अभिमानु ॥
कहु नानक सुनु रे मना सो मूरति भगवान ॥13॥
कहु नानक सुनु रे मना सो मूरति भगवान ॥13॥
हिन्दी अर्थ: नानक कहते हैं: हे मन! सुनें। जिस मनुष्य का हृदय सुख-दुख से विचलित नहीं होता और जिस पर लोभ, मोह तथा अहंकार का जोर नहीं चलता, वह मनुष्य साक्षात परमात्मा का रूप है। 13।
· सलोक
उसतति निंदिआ नाहि जिहि कंचन लोह समानि ॥
उसतति निंदिआ नाहि जिहि कंचन लोह समानि ॥
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥14॥
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥14॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के मन को प्रशंसा और निंदा डाँवाडोल नहीं कर सकतीं, जिसको सोना और लोहा एक समान (दिखते हैं। भाव, जो लालच में नहीं फसता)। हे नानक! कहें: हे मन! सुनें। यह बात (पक्की) समझिए कि उसको मोह से छुटकारा मिल चुका है। 14।
· सलोक
हरखु सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥
हरखु सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥15॥
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥15॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के हृदय में खुशी-ग़मी अपना जोर नहीं डाल सकती। जिसको वैरी और मित्र एक जैसे (मित्र ही) प्रतीत होते हैं। हे नानक! कहें: हे मन! सुनें। आप ये बात पक्की समझ लें कि उसको माया के मोह से निजात मिल चुकी है। 15।
· सलोक
भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन ॥
भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन ॥
कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि ॥16॥
कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि ॥16॥
हिन्दी अर्थ: नानक कहते हैं: हे मन! सुनें। जो मनुष्य किसी को डराता नहीं और किसी के डराने से भयभीत नहीं होता, उसे आत्मिक जीवन की सूझ रखने वाला ज्ञानी समझें। 16।
· सलोक
जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥
जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह नर माथै भागु ॥17॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह नर माथै भागु ॥17॥
हिन्दी अर्थ: नानक कहते हैं: हे मन! सुनें, जिसने काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, निंदा और ईर्ष्या आदि विकारों से भरी माया का मोह छोड़ दिया है, उसी ने सच्चा वैराग्य धारण किया है। उस मनुष्य के भाग्य जाग उठे हैं। 17।
· सलोक
जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥
जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह घटि ब्रहम निवासु ॥18॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह घटि ब्रहम निवासु ॥18॥
हिन्दी अर्थ: जिस (मनुष्य) ने माया का मोह छोड़ दिया। (जो मनुष्य माया के कामादिक) सारे विकारों से उपराम हो गया। हे नानक! कहें: हे मन! सुनें। उसके दिल में (प्रत्यक्ष तौर पर) परमात्मा का निवास हो जाता है। 18।
· सलोक
जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥
जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥
कहु नानक वहु मुकति नरु इह मन साची मानु ॥19॥
कहु नानक वहु मुकति नरु इह मन साची मानु ॥19॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने करतार सृजनहार के साथ गहरी सांझ डाल के (अपने अंदर से) अहंकार त्याग दिया। हे नानक! कहें: हे मन! ये बात सच्ची समझें कि वह मनुष्य (ही) मुक्त है। 19।
· सलोक
भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥
भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥
निसि दिनु जो नानक भजै सफल होहि तिह काम ॥20॥
निसि दिनु जो नानक भजै सफल होहि तिह काम ॥20॥
हिन्दी अर्थ: इस कलेशों भरे संसार में परमात्मा का नाम (ही) सारे डर नाश करने वाला है। खोटी मति दूर करने वाला है। हे नानक! (कहें: हे भाई!) जो मनुष्य प्रभू का नाम रात दिन जपता रहता है उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। 20।
· सलोक
जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥
जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥
कहु नानक सुनि रे मना परहि न जम कै धाम ॥21॥
कहु नानक सुनि रे मना परहि न जम कै धाम ॥21॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई! (अपनी) जीभ से परमात्मा के गुणों का जाप किया करें। (अपने) कानों से परमात्मा का नाम सुना करें। हे नानक! कहें: हे मन! (जो मनुष्य नाम जपते हैं। वे) जमों के वश नहीं पड़ते। 21।
· सलोक
जो प्रानी ममता तजै लोभ मोह अहंकार ॥
जो प्रानी ममता तजै लोभ मोह अहंकार ॥
कहु नानक आपन तरै अउरन लेत उधार ॥22॥
कहु नानक आपन तरै अउरन लेत उधार ॥22॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: (हे भाई!) जो मनुष्य (अपने अंदर से माया की) ममता त्यागता है। लोभ मोह और अहंकार को दूर करता है। वह स्वयं (भी इस संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है और औरों को भी (विकारों से) बचा लेता है। 22।
· सलोक
जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥
जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥
इन मै कछु साचो नही नानक बिनु भगवान ॥23॥
इन मै कछु साचो नही नानक बिनु भगवान ॥23॥
हिन्दी अर्थ: नानक कहते हैं: हे भाई! जैसे नींद में सपना आता है और उसमें अनेक दृश्य दिखाई देते हैं, वैसे ही इस जगत को समझें। यहाँ दिखाई देने वाले पदार्थों में कोई भी सदा साथ निभाने वाला नहीं है; परमात्मा का नाम ही स्थायी सहारा है। 23।
· सलोक
निसि दिनु माइआ कारने प्रानी डोलत नीत ॥
निसि दिनु माइआ कारने प्रानी डोलत नीत ॥
कोटन मै नानक कोऊ नाराइनु जिह चीति ॥24॥
कोटन मै नानक कोऊ नाराइनु जिह चीति ॥24॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कहें: हे भाई!) माया (इकट्ठी करने) की खातिर मनुष्य सदा रात-दिन भटकता फिरता है। करोड़ों (लोगों) में कोई विरला (ऐसा होता) है। जिसके मन में परमात्मा की याद टिकी होती है। 24।
· सलोक
जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥
जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥
जग रचना तैसे रची कहु नानक सुनि मीत ॥25॥
जग रचना तैसे रची कहु नानक सुनि मीत ॥25॥
हिन्दी अर्थ: नानक कहते हैं: हे मित्र! सुनें। जैसे पानी में बुलबुला पैदा होकर मिट जाता है, वैसे ही परमात्मा ने जगत की रचना की है। 25।
· सलोक
प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन परत ताहि जम फंध ॥26॥
कहु नानक बिनु हरि भजन परत ताहि जम फंध ॥26॥
हिन्दी अर्थ: पर माया के नशे में आत्मिक जीवन से अनजान हुआ मनुष्य इसके बारे में कुछ भी नहीं सोचता। नानक कहते हैं: परमात्मा के भजन के बिना ऐसे मनुष्य को मृत्यु के फंदे घेरे रहते हैं। 26।
· सलोक
जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ॥
जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ॥
कहु नानक सुनि रे मना दुरलभ मानुख देह ॥27॥
कहु नानक सुनि रे मना दुरलभ मानुख देह ॥27॥
हिन्दी अर्थ: यदि मनुष्य सदा आत्मिक आनंद चाहता है, तो उसे परमात्मा की शरण में रहना चाहिए। नानक कहते हैं: हे मन! सुनें। यह मनुष्य शरीर बड़ी कठिनाई से मिलता है; इसे माया के पीछे भटकने में व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। 27।
· सलोक
माइआ कारनि धावही मूरख लोग अजान ॥
माइआ कारनि धावही मूरख लोग अजान ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन बिरथा जनमु सिरान ॥28॥
कहु नानक बिनु हरि भजन बिरथा जनमु सिरान ॥28॥
हिन्दी अर्थ: मूर्ख बेसमझ बंदे (निरी) माया (इकट्ठी करने) के लिए भटकते रहते हैं। हे नानक! कहें: (हे भाई!) परमात्मा के भजन के बिना (उनका ये मनुष्य-) जनम व्यर्थ बीत जाता है। 28।
· सलोक
जो प्रानी निसि दिनु भजै रूप राम तिह जानु ॥
जो प्रानी निसि दिनु भजै रूप राम तिह जानु ॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य रात-दिन (हर वक्त परमात्मा का नाम) जपता रहता है। उसको परमात्मा का रूप समझिए।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 9: गुरु तेग बहादुर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1427 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।