सलोक महला 9 का हिस्सा। पूरे 57 सलोक की commentary /salok-mahalla-9/ पर है।
जिह सिमरत गति पाईऐ तिह भजु रे तै मीत ॥ कहु नानक सुनु रे मना अउध घटत है नीत ॥१०॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: हे मित्र ! आप उस परमात्मा का भजन किया कर। जिसका नाम सिमरने से ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त होती है। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। उम्र घटती जा रही है (परमात्मा का सिमरन ना बिसार)। 10।
पांच तत को तनु रचिओ जानहु चतुर सुजान ॥ जिह ते उपजिओ नानका लीन ताहि मै मानु ॥११॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) हे चतुर मनुष्य ! हे समझदार मनुष्य ! आप जानता है कि (आपका ये) शरीर (परमात्मा ने) पाँच तत्वों से बनाया है। (ये भी) यकीन जान कि जिन तत्वों से (ये शरीर) बना है (दोबारा) उनमें ही लीन हो जाएगा (फिर इस शरीर के झूठे मोह में फस के परमात्मा का सिमरन क्यों भुला रहा है। 11।
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- हे मन ! संत जनों ने ऊँचा-ऊँचा पुकार के बता दिया है कि परमात्मा हरेक शरीर में बस रहा है। आप उस (परमात्मा) का भजन किया कर। (भजन की बरकति से) संसार-समुंद्र से आप पार लांघ जाएगा। 12।
सुखु दुखु जिह परसै नही लोभु मोहु अभिमानु ॥ कहु नानक सुनु रे मना सो मूरति भगवान ॥१३॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य (के हृदय) को सुख-दुख नहीं छू सकता। लोभ मोह अहंकार नहीं पोह सकता (भाव। जो मनुष्य सुख-दुख के समय आत्मिक जीवन से नहीं डोलता। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। जिस पर लोभ-मोह-अहंकार अपना जोर नहीं डाल सकता) वह मनुष्य (साक्षात) परमात्मा का रूप है। 13।
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य (के मन) को उस्तति नहीं (डाँवा-डोल कर सकती)। जिसको सोना और लोहा एक समान (दिखते हैं। भाव। जो लालच में नहीं फसता)। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। यह बात (पक्की) समझो कि उसको मोह से छुटकारा मिल चुका है। 14।
हरखु सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥ कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥१५॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के हृदय में खुशी-ग़मी अपना जोर नहीं डाल सकती। जिसको वैरी और मित्र एक जैसे (मित्र ही) प्रतीत होते हैं। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। आप ये बात पक्की समझ कि उसको माया के मोह से निजात मिल चुकी है। 15।
भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन ॥ कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि ॥१६॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य किसी को (कोई) डरावे नहीं देता। और किसी से भयभीत (भी) नहीं होता (धमकियों डरावों से घबराता नहीं) हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। उसको आत्मिक जीवन की सूझ वाला समझ। 16।
जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥ कहु नानक सुनु रे मना तिह नर माथै भागु ॥१७॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: जिस (मनुष्य) ने (काम क्रोध लोभ मोह अहंकार निंदा ईष्या आदि) सारी की सारी माया त्याग दी। (उसने ही सही) वैराग का (सही) भेष धारण किया (समझो)। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। उस मनुष्य के माथे पर (अच्छे) भाग्य (जागे समझ)। 17।
जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥ कहु नानक सुनु रे मना तिह घटि ब्रहम निवासु ॥१८॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: जिस (मनुष्य) ने माया का मोह छोड़ दिया। (जो मनुष्य माया के कामादिक) सारे विकारों से उपराम हो गया। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। उसके दिल में (प्रत्यक्ष तौर पर) परमात्मा का निवास हो जाता है।
जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥ कहु नानक वहु मुकति नरु इह मन साची मानु ॥१९॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने करतार सृजनहार के साथ गहरी सांझ डाल के (अपने अंदर से) अहंकार त्याग दिया। हे नानक ! कह- हे मन ! ये बात सच्ची समझ कि वह मनुष्य (ही) मुक्त है। 19।
भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥ निसि दिनु जो नानक भजै सफल होहि तिह काम ॥२०॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: इस कलेशों भरे संसार में परमात्मा का नाम (ही) सारे डर नाश करने वाला है। खोटी मति दूर करने वाला है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जो मनुष्य प्रभू का नाम रात दिन जपता रहता है उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। 20।
जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥ कहु नानक सुनि रे मना परहि न जम कै धाम ॥२१॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (अपनी) जीभ से परमात्मा के गुणों का जाप किया करो। (अपने) कानों से परमात्मा का नाम सुना करो। हे नानक ! कह- हे मन ! (जो मनुष्य नाम जपते हैं। वे) जमों के वश नहीं पड़ते। 21।
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह- (हे भाई !) जो मनुष्य (अपने अंदर से माया की) ममता त्यागता है। लोभ मोह और अहंकार को दूर करता है। वह स्वयं (भी इस संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है और औरों को भी (विकारों से) बचा लेता है। 22।
जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥ इन मै कछु साचो नही नानक बिनु भगवान ॥२३॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) जैसे (सोए हुए) सपना (आता है) और (और उस सपने में कई पदार्थ हम) देखते हैं। वैसे ही इस जगत को समझ ले। परमात्मा के नाम के बिना (जगत में दिखाई दे रहे) इन (पदार्थों) में कोई भी पदार्थ सदा साथ निभाने वाला नहीं। 23।
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- हे भाई !) माया (इकट्ठी करने) की खातिर मनुष्य सदा रात-दिन भटकता फिरता है। करोड़ों (लोगों) में कोई विरला (ऐसा होता) है। जिसके मन में परमात्मा की याद टिकी होती है। 24।
जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥ जग रचना तैसे रची कहु नानक सुनि मीत ॥२५॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: जैसे पानी से सदा बुलबुला पैदा होता है और नाश होता रहता है। हे नानक ! कह- हे मित्र ! सुन। वैसे ही (परमात्मा ने) जगत की (यह) खेल बनाई हुई है। 25। पर।
प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥ कहु नानक बिनु हरि भजन परत ताहि जम फंध ॥२६॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: माया के नशे में (आत्मिक जीवन से) अंधा हुआ मनुष्य (आत्मिक जीवन के बारे में) कुछ भी नहीं सोचता। हे नानक ! कह- परमात्मा के भजन के बिना (ऐसे मनुष्य को) जमों के फंदे पड़े रहते हैं। 26।
जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ॥ कहु नानक सुनि रे मना दुरलभ मानुख देह ॥२७॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: जो (मनुष्य) आत्मिक आनंद (हासिल करना) चाहता है। तो (उसको चाहिए कि) परमात्मा की शरण पड़ा रहे। हे नानक ! कह- हे मन ! सुन। ये मनुष्य-शरीर बड़ी मुश्किल से मिलता है (इसको माया की खातिर भटकने में ही नहीं व्यर्थ गवा देना चाहिए)। 27।
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।
हिन्दी अर्थ: मूर्ख बेसमझ बंदे (निरी) माया (इकट्ठी करने) के लिए भटकते रहते हैं। हे नानक ! कह- (हे भाई !) परमात्मा के भजन के बिना (उनका ये मनुष्य-) जनम व्यर्थ बीत जाता है। 28।
जो प्रानी निसि दिनु भजै रूप राम तिह जानु ॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य रात-दिन (हर वक्त परमात्मा का नाम) जपता रहता है। उसको परमात्मा का रूप समझो।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। 1675 में औरंगज़ेब के हुक्म पर उन्हें दिल्ली के चाँदनी चौक के पास शहीद किया गया, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धर्मांतरण से इनकार किया था। उनकी शहादत के स्थल पर आज सीस-गंज गुरुद्वारा है।
इस अंग पर 20 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मित्र ! आप उस परमात्मा का भजन किया कर।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।