अंग 1424

अंग
1424
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सतिगुर विचि अंम्रित नामु है अंम्रितु कहै कहाइ ॥
गुरमती नामु निरमलोु निरमल नामु धिआइ ॥
अंम्रित बाणी ततु है गुरमुखि वसै मनि आइ ॥
हिरदै कमलु परगासिआ जोती जोति मिलाइ ॥
नानक सतिगुरु तिन कउ मेलिओनु जिन धुरि मसतकि भागु लिखाइ ॥२५॥
अंदरि तिसना अगि है मनमुख भुख न जाइ ॥
मोहु कुटंबु सभु कूड़ु है कूड़ि रहिआ लपटाइ ॥
अनदिनु चिंता चिंतवै चिंता बधा जाइ ॥
जंमणु मरणु न चुकई हउमै करम कमाइ ॥
गुर सरणाई उबरै नानक लए छडाइ ॥२६॥
सतिगुर पुरखु हरि धिआइदा सतसंगति सतिगुर भाइ ॥
सतसंगति सतिगुर सेवदे हरि मेले गुरु मेलाइ ॥
एहु भउजलु जगतु संसारु है गुरु बोहिथु नामि तराइ ॥
गुरसिखी भाणा मंनिआ गुरु पूरा पारि लंघाइ ॥
गुरसिखां की हरि धूड़ि देहि हम पापी भी गति पांहि ॥
धुरि मसतकि हरि प्रभ लिखिआ गुर नानक मिलिआ आइ ॥
जमकंकर मारि बिदारिअनु हरि दरगह लए छडाइ ॥
गुरसिखा नो साबासि है हरि तुठा मेलि मिलाइ ॥२७॥
गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ जिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥
राम नामु हरि कीरति गाइ करि चानणु मगु देखाइआ ॥
हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥
गुरमती जमु जोहि न सकै सचै नाइ समाइआ ॥
सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥
जन नानकु नाउ लए तां जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥२८॥
मन अंतरि हउमै रोगु भ्रमि भूले हउमै साकत दुरजना ॥
नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजणा ॥२९॥
गुरमती हरि हरि बोले ॥
हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥
हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥
गुर सतिगुरि नामु दिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥
जन नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गुल गोले ॥३०॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (परमात्मा का) आत्मिक जीवन देने वाला नाम गुरू (के दिल) में बसता है। (गुरू स्वयं यह) अमृत नाम जपता है (व औरों से) जपाता है। गुरू की मति पर चलने से ही (यह) पवित्र नाम (प्राप्त होता है। गुरू की मति पर चल के ही मनुष्य यह) पवित्र-नाम जप (सकता है)। हे भाई ! (मनुष्य जीवन का) तत्व (हरी-नाम गुरू की) आत्मिक जीवन देने वाली बाणी से ही मिलता है। गुरू की शरण पड़ने से ही (हरी-नाम मनुष्य के) मन में आ बसता है (जिस मनुष्य के अंदर हरी-नाम आ बसता है। उसके) हृदय में कमल-फूल खिल उठता है। (उसकी) जिंद परमात्मा की जोति में मिली रहती है। पर। हे नानक ! उस (परमात्मा) ने गुरू उन (मनुष्यों) को मिलाया। जिनके माथे पर (उसने) धुर-दरगाह से (ये) अच्छी किस्मत लिख दी। 25। हे भाई ! अपने मन के मुरीद मनुष्य के हृदय में तृष्णा की (आग जलती) रहती है। (उसके अंदर से माया की) भूख (कभी) दूर नहीं होती। हे भाई ! (जगत का यह) मोह नाशवंत पसारा है। (यह) परिवार (भी) नाशवान है। (पर। मन का मुरीद मनुष्य इस) नाशवान पसारे में (सदा) फसा रहता है। हर वक्त (माया के मोह की) सोचें सोचता रहता है। सोचों में बँधा हुआ (ही जगत से) चला जाता है। अहंकार के आसरे ही (सारे) काम करता रहता है (तभी तो उसका) जनम-मरण का चक्कर (कभी) खत्म नहीं होता। पर। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (वह मनुष्य भी मोह के जाल में से) बच निकलता है। गुरू (इस मोह-जाल में से) छुड़ा लेता है। 26। हे भाई ! गुरू महापुरख साध-संगति में गुरू के प्यार में टिक के परमात्मा का सिमरन करता रहता है। (जो मनुष्य) साध-संगति में आ के गुरू की शरण पड़ते हैं। गुरू उनको परमात्मा में जोड़ देता है परमात्मा के साथ मिला देता है। (हे भाई ! वैसे तो) यह जगत इस संसार में भयानक समुंद्र है। पर गुरू-जहाज (शरण आए जीवों को) हरी-नाम में (जोड़ के इस समुंद्र से) पार लंघा देता है। (जिन) गुरसिखों ने (गुरू का) हुकम मान लिया। पूरा गुरू (उनको संसार-समुंद्र से) पार लंघाता है। हे हरी ! हम जीवों को गुरसिखों के चरणों की धूल बख्श। ताकि हम विकारी जीव भी उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर सकें। हे नानक ! धुर-दरगाह से हरी-प्रभू का लिखा लेख (जिस मनुष्य के) माथे पर उघड़ पड़ता है वह मनुष्य गुरू को आ मिलता है। उस (गुरू) ने (सारे) जमदूत मार के खत्म कर दिए। (गुरू उसको) परमात्मा के दरगाह में सुर्खरू करा लेता है। हे भाई ! गुरसिखों को (लोक-परलोक में) आदर-सत्कार मिलता है। प्रभू उन पर प्रसन्न हो के (उनको अपने साथ) मिला लेता है। 27। हे भाई ! (जिस) पूरे गुरू ने (जीव के अंदर सदा) परमात्मा का नाम पक्का किया है। जिस (पूरे गुरू) ने (जीव के) अंदर से भटकना (सदा) खत्म की है। (उस गुरू ने खुद) परमात्मा का नाम (सिमर के)। परमात्मा की सिफतसालाह गा गा के (शरण आए मनुष्य के दिल में आत्मिक जीवन का) प्रकाश पैदा करके (उसको आत्मिक जीवन का सही) रास्ता (सदा) दिखाया है। हे भाई ! (पूरे गुरू से) अहंकार दूर करके (जिस मनुष्य के अंदर) एक परमात्मा की लगन लग गई। (उसने अपने) दिल में परमात्मा का नाम बसा लिया। गुरू की मति पर चलने के कारण जमराज भी (उस मनुष्य की ओर) ताक नहीं सकता। (वह मनुष्य) सदा-स्थिर हरी-नाम में (सदा) लीन रहता है। (उसको यह निश्चय बन जाता है कि) हर जगह करतार स्वयं ही स्वयं मौजूद है। जो मनुष्य उसको अच्छा लगने लगता है उसको अपने नाम में जोड़ लेता है। हे भाई ! दास नानक (भी जब परमात्मा का) नाम जपता है तब आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। भाई ! परमात्मा के नाम के बिना तो जीव एक छिन में ही आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। 28। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए दुराचारी मनुष्यों के मन में अहंकार का रोग (सदा टिका रहता है)। इस अहंकार के कारण भटकना में पड़ कर वे (जीवन के) ग़लत रास्ते पड़े रहते हैं। हे नानक ! (साकत मनुष्य भी) सज्जन साधू गुरू को मिल के (अहंकार का यह) रोग दूर कर लेता है। 29। हे भाई ! (जो जीव-स्त्री) गुरू की मति पर चल कर (सदा) परमात्मा का नाम जपती रहती है। वह दिन-रात परमात्मा के प्यार में खिंची रहती है। परमात्मा (के नाम) में रति रहती है। वह परमात्मा के (प्रेम-) रंग में (आत्मिक आनंद) माणती रहती है। हे भाई ! मैंने सारा संसार तलाश के देख लिया है। परमात्मा जैसा पति (किसी और जगह) नहीं मिलता। हे भाई ! गुरू सतिगुरू ने (जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का) नाम पक्का कर दिया। (उसका) मन किसी भी और तरफ नहीं डोलता। हे भाई ! दास नानक (भी) परमात्मा का दास है। गुरू सतिगुरू के दासों के दासों का दास है। 30।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “हे भाई ! (परमात्मा का) आत्मिक जीवन देने वाला नाम गुरू (के दिल) में बसता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।