अंग
1423
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਹੈ ਦੁਖਦਾਈ ਮੋਹ ਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਦਰੀ ਆਇਆ ਮੋਹ ਮਾਇਆ ਵਿਛੁੜਿ ਸਭ ਜਾਇ ॥੧੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨੇ ਸਹ ਕੇਰਾ ਹੁਕਮੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਹੁਕਮੋ ਸੇਵੇ ਹੁਕਮੁ ਅਰਾਧੇ ਹੁਕਮੇ ਸਮੈ ਸਮਾਏ ॥
ਹੁਕਮੁ ਵਰਤੁ ਨੇਮੁ ਸੁਚ ਸੰਜਮੁ ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਣਿ ਜਿ ਹੁਕਮੈ ਬੁਝੈ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੈ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਜਿਨ ਊਪਰਿ ਤਿਨਾ ਹੁਕਮੇ ਲਏ ਮਿਲਾਏ ॥੧੮॥
ਮਨਮੁਖਿ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੁਝੇ ਬਪੁੜੀ ਨਿਤ ਹਉਮੈ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਵਰਤ ਨੇਮੁ ਸੁਚ ਸੰਜਮੁ ਪੂਜਾ ਪਾਖੰਡਿ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਅੰਤਰਹੁ ਕੁਸੁਧੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਬੇਧੇ ਜਿਉ ਹਸਤੀ ਛਾਰੁ ਉਡਾਏ ॥
ਜਿਨਿ ਉਪਾਏ ਤਿਸੈ ਨ ਚੇਤਹਿ ਬਿਨੁ ਚੇਤੇ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਪਰਪੰਚੁ ਕੀਆ ਧੁਰਿ ਕਰਤੈ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਕਮਾਏ ॥੧੯॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਤੀਤਿ ਭਈ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਅਨਦਿਨੁ ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਸਮਾਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਗੁਰੂ ਸਭ ਪੂਜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਦਰਸੁ ਦੇਖੈ ਸਭ ਆਇ ॥
ਮੰਨੀਐ ਸਤਿਗੁਰ ਪਰਮ ਬੀਚਾਰੀ ਜਿਤੁ ਮਿਲਿਐ ਤਿਸਨਾ ਭੁਖ ਸਭ ਜਾਇ ॥
ਹਉ ਸਦਾ ਸਦਾ ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਜੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਚਾ ਦੇਇ ਮਿਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਰਮੁ ਪਾਇਆ ਤਿਨ ਸਚਾ ਜੋ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਲਗੇ ਆਇ ॥੨੦॥
ਜਿਨ ਪਿਰੀਆ ਸਉ ਨੇਹੁ ਸੇ ਸਜਣ ਮੈ ਨਾਲਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਹਉ ਫਿਰਾਂ ਭੀ ਹਿਰਦੈ ਰਖਾ ਸਮਾਲਿ ॥੨੧॥
ਜਿਨਾ ਇਕ ਮਨਿ ਇਕ ਚਿਤਿ ਧਿਆਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਸਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਦੁਖ ਭੁਖ ਹਉਮੈ ਵਡਾ ਰੋਗੁ ਗਇਆ ਨਿਰਦੋਖ ਭਏ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਗੁਣ ਉਚਰਹਿ ਗੁਣ ਮਹਿ ਸਵੈ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਇਆ ਸਹਜਿ ਮਿਲਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਆਇ ॥੨੨॥
ਮਨਮੁਖਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਹੈ ਨਾਮਿ ਨ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥
ਕੂੜੁ ਕਮਾਵੈ ਕੂੜੁ ਸੰਘਰੈ ਕੂੜਿ ਕਰੈ ਆਹਾਰੁ ॥
ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ਧਨੁ ਸੰਚਿ ਮਰਹਿ ਅੰਤਿ ਹੋਇ ਸਭੁ ਛਾਰੁ ॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਸੁਚਿ ਸੰਜਮੁ ਕਰਹਿ ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਵਿਕਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨਮੁਖਿ ਜਿ ਕਮਾਵੈ ਸੁ ਥਾਇ ਨ ਪਵੈ ਦਰਗਹ ਹੋਇ ਖੁਆਰੁ ॥੨੩॥
ਸਭਨਾ ਰਾਗਾਂ ਵਿਚਿ ਸੋ ਭਲਾ ਭਾਈ ਜਿਤੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਰਾਗੁ ਨਾਦੁ ਸਭੁ ਸਚੁ ਹੈ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਰਾਗੈ ਨਾਦੈ ਬਾਹਰਾ ਇਨੀ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੂਝਿਆ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਹੁਕਮੈ ਬੂਝੈ ਤਿਨਾ ਰਾਸਿ ਹੋਇ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸ ਤੇ ਹੋਇਆ ਜਿਉ ਤਿਸੈ ਦੀ ਰਜਾਇ ॥੨੪॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਦਰੀ ਆਇਆ ਮੋਹ ਮਾਇਆ ਵਿਛੁੜਿ ਸਭ ਜਾਇ ॥੧੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨੇ ਸਹ ਕੇਰਾ ਹੁਕਮੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਹੁਕਮੋ ਸੇਵੇ ਹੁਕਮੁ ਅਰਾਧੇ ਹੁਕਮੇ ਸਮੈ ਸਮਾਏ ॥
ਹੁਕਮੁ ਵਰਤੁ ਨੇਮੁ ਸੁਚ ਸੰਜਮੁ ਮਨ ਚਿੰਦਿਆ ਫਲੁ ਪਾਏ ॥
ਸਦਾ ਸੁਹਾਗਣਿ ਜਿ ਹੁਕਮੈ ਬੁਝੈ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੈ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਜਿਨ ਊਪਰਿ ਤਿਨਾ ਹੁਕਮੇ ਲਏ ਮਿਲਾਏ ॥੧੮॥
ਮਨਮੁਖਿ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੁਝੇ ਬਪੁੜੀ ਨਿਤ ਹਉਮੈ ਕਰਮ ਕਮਾਇ ॥
ਵਰਤ ਨੇਮੁ ਸੁਚ ਸੰਜਮੁ ਪੂਜਾ ਪਾਖੰਡਿ ਭਰਮੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਅੰਤਰਹੁ ਕੁਸੁਧੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਬੇਧੇ ਜਿਉ ਹਸਤੀ ਛਾਰੁ ਉਡਾਏ ॥
ਜਿਨਿ ਉਪਾਏ ਤਿਸੈ ਨ ਚੇਤਹਿ ਬਿਨੁ ਚੇਤੇ ਕਿਉ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਪਰਪੰਚੁ ਕੀਆ ਧੁਰਿ ਕਰਤੈ ਪੂਰਬਿ ਲਿਖਿਆ ਕਮਾਏ ॥੧੯॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਤੀਤਿ ਭਈ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਅਨਦਿਨੁ ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਸਮਾਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਗੁਰੂ ਸਭ ਪੂਜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਦਰਸੁ ਦੇਖੈ ਸਭ ਆਇ ॥
ਮੰਨੀਐ ਸਤਿਗੁਰ ਪਰਮ ਬੀਚਾਰੀ ਜਿਤੁ ਮਿਲਿਐ ਤਿਸਨਾ ਭੁਖ ਸਭ ਜਾਇ ॥
ਹਉ ਸਦਾ ਸਦਾ ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਅਪੁਨੇ ਜੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਚਾ ਦੇਇ ਮਿਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਰਮੁ ਪਾਇਆ ਤਿਨ ਸਚਾ ਜੋ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਲਗੇ ਆਇ ॥੨੦॥
ਜਿਨ ਪਿਰੀਆ ਸਉ ਨੇਹੁ ਸੇ ਸਜਣ ਮੈ ਨਾਲਿ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਹਉ ਫਿਰਾਂ ਭੀ ਹਿਰਦੈ ਰਖਾ ਸਮਾਲਿ ॥੨੧॥
ਜਿਨਾ ਇਕ ਮਨਿ ਇਕ ਚਿਤਿ ਧਿਆਇਆ ਸਤਿਗੁਰ ਸਉ ਚਿਤੁ ਲਾਇ ॥
ਤਿਨ ਕੀ ਦੁਖ ਭੁਖ ਹਉਮੈ ਵਡਾ ਰੋਗੁ ਗਇਆ ਨਿਰਦੋਖ ਭਏ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਗੁਣ ਉਚਰਹਿ ਗੁਣ ਮਹਿ ਸਵੈ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤੇ ਪਾਇਆ ਸਹਜਿ ਮਿਲਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਆਇ ॥੨੨॥
ਮਨਮੁਖਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਹੈ ਨਾਮਿ ਨ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥
ਕੂੜੁ ਕਮਾਵੈ ਕੂੜੁ ਸੰਘਰੈ ਕੂੜਿ ਕਰੈ ਆਹਾਰੁ ॥
ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ਧਨੁ ਸੰਚਿ ਮਰਹਿ ਅੰਤਿ ਹੋਇ ਸਭੁ ਛਾਰੁ ॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਸੁਚਿ ਸੰਜਮੁ ਕਰਹਿ ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਵਿਕਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨਮੁਖਿ ਜਿ ਕਮਾਵੈ ਸੁ ਥਾਇ ਨ ਪਵੈ ਦਰਗਹ ਹੋਇ ਖੁਆਰੁ ॥੨੩॥
ਸਭਨਾ ਰਾਗਾਂ ਵਿਚਿ ਸੋ ਭਲਾ ਭਾਈ ਜਿਤੁ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਰਾਗੁ ਨਾਦੁ ਸਭੁ ਸਚੁ ਹੈ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਰਾਗੈ ਨਾਦੈ ਬਾਹਰਾ ਇਨੀ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੂਝਿਆ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਹੁਕਮੈ ਬੂਝੈ ਤਿਨਾ ਰਾਸਿ ਹੋਇ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸ ਤੇ ਹੋਇਆ ਜਿਉ ਤਿਸੈ ਦੀ ਰਜਾਇ ॥੨੪॥
बिनु नावै सभु दुखु है दुखदाई मोह माइ ॥
नानक गुरमुखि नदरी आइआ मोह माइआ विछुड़ि सभ जाइ ॥१७॥
गुरमुखि हुकमु मंने सह केरा हुकमे ही सुखु पाए ॥
हुकमो सेवे हुकमु अराधे हुकमे समै समाए ॥
हुकमु वरतु नेमु सुच संजमु मन चिंदिआ फलु पाए ॥
सदा सुहागणि जि हुकमै बुझै सतिगुरु सेवै लिव लाए ॥
नानक क्रिपा करे जिन ऊपरि तिना हुकमे लए मिलाए ॥१८॥
मनमुखि हुकमु न बुझे बपुड़ी नित हउमै करम कमाइ ॥
वरत नेमु सुच संजमु पूजा पाखंडि भरमु न जाइ ॥
अंतरहु कुसुधु माइआ मोहि बेधे जिउ हसती छारु उडाए ॥
जिनि उपाए तिसै न चेतहि बिनु चेते किउ सुखु पाए ॥
नानक परपंचु कीआ धुरि करतै पूरबि लिखिआ कमाए ॥१९॥
गुरमुखि परतीति भई मनु मानिआ अनदिनु सेवा करत समाइ ॥
अंतरि सतिगुरु गुरू सभ पूजे सतिगुर का दरसु देखै सभ आइ ॥
मंनीऐ सतिगुर परम बीचारी जितु मिलिऐ तिसना भुख सभ जाइ ॥
हउ सदा सदा बलिहारी गुर अपुने जो प्रभु सचा देइ मिलाइ ॥
नानक करमु पाइआ तिन सचा जो गुर चरणी लगे आइ ॥२०॥
जिन पिरीआ सउ नेहु से सजण मै नालि ॥
अंतरि बाहरि हउ फिरां भी हिरदै रखा समालि ॥२१॥
जिना इक मनि इक चिति धिआइआ सतिगुर सउ चितु लाइ ॥
तिन की दुख भुख हउमै वडा रोगु गइआ निरदोख भए लिव लाइ ॥
गुण गावहि गुण उचरहि गुण महि सवै समाइ ॥
नानक गुर पूरे ते पाइआ सहजि मिलिआ प्रभु आइ ॥२२॥
मनमुखि माइआ मोहु है नामि न लगै पिआरु ॥
कूड़ु कमावै कूड़ु संघरै कूड़ि करै आहारु ॥
बिखु माइआ धनु संचि मरहि अंति होइ सभु छारु ॥
करम धरम सुचि संजमु करहि अंतरि लोभु विकार ॥
नानक मनमुखि जि कमावै सु थाइ न पवै दरगह होइ खुआरु ॥२३॥
सभना रागां विचि सो भला भाई जितु वसिआ मनि आइ ॥
रागु नादु सभु सचु है कीमति कही न जाइ ॥
रागै नादै बाहरा इनी हुकमु न बूझिआ जाइ ॥
नानक हुकमै बूझै तिना रासि होइ सतिगुर ते सोझी पाइ ॥
सभु किछु तिस ते होइआ जिउ तिसै दी रजाइ ॥२४॥
नानक गुरमुखि नदरी आइआ मोह माइआ विछुड़ि सभ जाइ ॥१७॥
गुरमुखि हुकमु मंने सह केरा हुकमे ही सुखु पाए ॥
हुकमो सेवे हुकमु अराधे हुकमे समै समाए ॥
हुकमु वरतु नेमु सुच संजमु मन चिंदिआ फलु पाए ॥
सदा सुहागणि जि हुकमै बुझै सतिगुरु सेवै लिव लाए ॥
नानक क्रिपा करे जिन ऊपरि तिना हुकमे लए मिलाए ॥१८॥
मनमुखि हुकमु न बुझे बपुड़ी नित हउमै करम कमाइ ॥
वरत नेमु सुच संजमु पूजा पाखंडि भरमु न जाइ ॥
अंतरहु कुसुधु माइआ मोहि बेधे जिउ हसती छारु उडाए ॥
जिनि उपाए तिसै न चेतहि बिनु चेते किउ सुखु पाए ॥
नानक परपंचु कीआ धुरि करतै पूरबि लिखिआ कमाए ॥१९॥
गुरमुखि परतीति भई मनु मानिआ अनदिनु सेवा करत समाइ ॥
अंतरि सतिगुरु गुरू सभ पूजे सतिगुर का दरसु देखै सभ आइ ॥
मंनीऐ सतिगुर परम बीचारी जितु मिलिऐ तिसना भुख सभ जाइ ॥
हउ सदा सदा बलिहारी गुर अपुने जो प्रभु सचा देइ मिलाइ ॥
नानक करमु पाइआ तिन सचा जो गुर चरणी लगे आइ ॥२०॥
जिन पिरीआ सउ नेहु से सजण मै नालि ॥
अंतरि बाहरि हउ फिरां भी हिरदै रखा समालि ॥२१॥
जिना इक मनि इक चिति धिआइआ सतिगुर सउ चितु लाइ ॥
तिन की दुख भुख हउमै वडा रोगु गइआ निरदोख भए लिव लाइ ॥
गुण गावहि गुण उचरहि गुण महि सवै समाइ ॥
नानक गुर पूरे ते पाइआ सहजि मिलिआ प्रभु आइ ॥२२॥
मनमुखि माइआ मोहु है नामि न लगै पिआरु ॥
कूड़ु कमावै कूड़ु संघरै कूड़ि करै आहारु ॥
बिखु माइआ धनु संचि मरहि अंति होइ सभु छारु ॥
करम धरम सुचि संजमु करहि अंतरि लोभु विकार ॥
नानक मनमुखि जि कमावै सु थाइ न पवै दरगह होइ खुआरु ॥२३॥
सभना रागां विचि सो भला भाई जितु वसिआ मनि आइ ॥
रागु नादु सभु सचु है कीमति कही न जाइ ॥
रागै नादै बाहरा इनी हुकमु न बूझिआ जाइ ॥
नानक हुकमै बूझै तिना रासि होइ सतिगुर ते सोझी पाइ ॥
सभु किछु तिस ते होइआ जिउ तिसै दी रजाइ ॥२४॥
हिन्दी अर्थ: माया का मोह दुखदाई साबित होता है। परमात्मा के नाम के बिना और सारा (उद्यम) दुख (का ही मूल) है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (जिस मनुष्य को यह भेद) दिखाई दे जाता है। (उसके अंदर से) माया का सारा मोह दूर हो जाता है। 17। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के पति-प्रभू का हुकम मानता है। वह हुकम में टिक के ही आत्मिक आनंद भोगता है। वह मनुष्य प्रभू के हुकम को हर वक्त याद रखता है। हुकम की भगती करता है। हर वक्त हुकम में लीन रहता है। व्रत (आदि रखने का) नियम। शारीरिक पवित्रता। इन्द्रियों को रोकने का यतन- यह सब कुछ उस मनुष्य के लिए प्रभू का हुकम मानना ही है। (हुकम मान के) वह मनुष्य मन-माँगी मुराद प्राप्त करता है। हे भाई ! जो जीव-स्त्री परमात्मा की रजा को समझती है। जो सुरति जोड़ के गुरू की शरण पड़ी रहती है। वह जीव-स्त्री सदा भाग्यशाली है। हे नानक ! जिन जीवों पर (परमात्मा) मेहर करता है। उनको (अपने) हुकम में लीन कर लेता है। 18। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाली बद्-नसीब जीव-स्त्री (परमात्मा की) रज़ा को नहीं समझती। सदा अहंकार के आसरे (अपने द्वारा मिथे हुए धार्मिक) काम करती रहती है। वह व्रत-नेम। सुच-संजम-देव पूजा (आदि कर्म करती है। पर ये हैं निरे दिखावे। और) दिखावे से मन की भटकना दूर नहीं होती। हे भाई ! (जिन मनुष्यों का मन) अंदर से खोटा रहता है। जो माया के मोह में भेदे रहते हैं (उनके किए हुए धार्मिक कर्म ऐसे ही हैं) जैसे हाथी (नहा कर अपने ऊपर) मिट्टी उड़ा के डाल लेता है। वे मनुष्य उस परमात्मा को याद नहीं करते। जिसने (उनको) पैदा किया। (हरी-नाम का) सिमरन किए बिना कोई मनुष्य कभी सुख नहीं पा सकता। हे नानक ! करतार ने ही धुर-दरगाह से (अपने हुकम से) जगत-रचना की हुई है। हरेक जीव अपने पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार ही (अब भी) कर्म किए जाता है। 19। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर (गुरू के प्रति) श्रद्धा बनी रहती है। (उसका) मन (गुरू में) पतीजा रहता है। वह हर वक्त सेवा करते हुए (सेवा में) मस्त रहता है। (जिस मनुष्य के) दिल में (सदा) गुरू बसता है सबका आदर-सत्कार करता है। वह सारी लुकाई में गुरू के दर्शन करता है। हे भाई ! सबसे ऊँची आत्मिक विचार के मालिक गुरू में श्रद्धा बनानी चाहिए। जिस (गुरू) के मिलने से (माया की) सारी भूख सारी प्यास दूर हो जाती है। हे भाई ! मैं सदा ही अपने गुरू से सदके जाता हूँ क्योंकि वह गुरू सदा कायम रहने वाला परमात्मा मिल जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के चरणों में आ के टिक गए। उन्होंने सदा कायम रहने वाली (रॅबी) मेहर प्राप्त कर ली। 20। हे भाई ! जिन (सत्संगियों का) प्यारे प्रभू के साथ साथ बना हुआ है। वह सत्संगी सज्जन मेरे (सहयोगी) हैं। (उनके सत्संग की बरकति से) मैं अंदर बाहर (दुनिया के कार-व्यवहार में भी) चलता-फिरता हूँ। (फिर) भी (परमात्मा को अपने) हृदय में संभाल के रखता हूँ। 21। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरु-चरणों में चिक्त जोड़ के एकाग्र मन से एकाग्र चिक्त से (परमात्मा का नाम) सिमरा है। उनके सारे दुख दूर हो जाते हैं। उनकी माया की भूख दूर हो जाती है। उनके अंदर से अहंकार का बड़ा रोग दूर हो जाता है। (प्रभू-चरणों में) सुरति जोड़ के वे पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं। वह मनुष्य सदा प्रभू के गुण गाते हैं। गुण उचारते हैं। हे भाई ! (गुरू चरणों में सुरति जोड़ के) मनुष्य परमात्मा के गुणों में सदा लीन रहता है टिका रहता है। हे नानक ! परमात्मा पूरे गुरू के माध्यम से ही मिलता है। आत्मिक अडोलता में आ मिलता है। 22। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के अंदर माया का मोह (बना रहता) है। (इसलिए उसका परमात्मा से) नाम में प्यार नहीं बनता। वह मनुष्य ठॅगी-फरेब करता रहता है। ठॅगी-फरेब (के संस्कार अपने अंदर) इकट्ठे करता जाता है। ठॅगी-फरेब से ही अपनी आजीविका बनाए रखता है। हे भाई ! आत्मिक मौत लाने वाली माया का धन (मनुष्य के) अंत समय (उसके लिए तो) सारा राख हो जाता है। (पर। इसी) धन को जोड़-जोड़ के (जीव) आत्मिक मौत सहेड़ते रहते हैं। (अपनी तरफ से तीर्थ-यात्रा आदि मिथे हुए) धार्मिक कर्म करते रहते हैं। शारीरिक पवित्रता रखते हैं। (एक समान हरेक) संयम करते हैं। (पर। उनके) अंदर लोभ टिका रहता है विकार टिके रहते हैं। हे नानक ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (सारी उम्र) जो कुछ करता रहता है वह परमात्मा की हजूरी में परवान नहीं होता। वहाँ पर वह मुसीबत में ही रहता है। 23। हे भाई ! सारे रागों में वह (हरी-नाम-सिमरन ही) अच्छा (उद्यम) है। क्योंकि उस (सिमरन) से (ही परमात्मा मनुष्य के) मन में आ बसता है। सदा-स्थिर हरी-नाम ही (मनुष्य के लिए) राग है नाद है। (हरी-नाम के सिमरन का) मूल्य बयान नहीं किया जा सकता। परमात्मा (का मिलाप) राग (की कैद) से परे है। नाद (की कैद) से परे है। इन (रागों-नादों) से (परमात्मा की) रज़ा को समझा नहीं जा सकता। हे नानक ! (जो जो मनुष्य परमात्मा की) रज़ा को समझ लेता है उनके लिए (राग भी) सहायक हो सकता है (वैसे सिर्फ राग ही आत्मिक जीवन के रास्ते में सहायक नहीं हैं)। हे भाई ! गुरू के माध्यम से ये (बात) समझ आ जाती है कि सब कुछ उस परमात्मा से ही हो रहा है। जैसे उसकी रजा है। (वैसे ही सब कुछ हो रहा है)। हे भाई ! सदा-स्थिर हरी-नाम (का सिमरन ही मनुष्य के लिए) सब कुछ है। 24।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1423 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Vasant Vihar के market में Sunday सुबह की धीमी-धीमी activity।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 33 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1423” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1424 →, पीछे का: ← अंग 1422।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।