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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1420 · वारों से अतिरिक्त सलोक

अंग
1420
वारों से अतिरिक्त सलोक
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  1. चारे कुंडा झोकि वरसदा बूंद पवै सहजि सुभाइ ॥

गुरु अमर दास जी · सलोक

चारे कुंडा झोकि वरसदा बूंद पवै सहजि सुभाइ ॥

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चारे कुंडा झोकि वरसदा बूंद पवै सहजि सुभाइ ॥
जल ही ते सभ ऊपजै बिनु जल पिआस न जाइ ॥
नानक हरि जलु जिनि पीआ तिसु भूख न लागै आइ ॥55॥
बाबीहा तूं सहजि बोलि सचै सबदि सुभाइ ॥
सभु किछु तेरै नालि है सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥
आपु पछाणहि प्रीतमु मिलै वुठा छहबर लाइ ॥
झिमि झिमि अंम्रितु वरसदा तिसना भुख सभ जाइ ॥
कूक पुकार न होवई जोती जोति मिलाइ ॥
नानक सुखि सवनि॑ सोहागणी सचै नामि समाइ ॥56॥
धुरहु खसमि भेजिआ सचै हुकमि पठाइ ॥
इंदु वरसै दइआ करि गूड़॑ी छहबर लाइ ॥
बाबीहे तनि मनि सुखु होइ जां ततु बूंद मुहि पाइ ॥
अनु धनु बहुता उपजै धरती सोभा पाइ ॥
अनदिनु लोकु भगति करे गुर कै सबदि समाइ ॥
आपे सचा बखसि लए करि किरपा करै रजाइ ॥
हरि गुण गावहु कामणी सचै सबदि समाइ ॥
भै का सहजु सीगारु करिहु सचि रहहु लिव लाइ ॥
नानक नामो मनि वसै हरि दरगह लए छडाइ ॥57॥
बाबीहा सगली धरती जे फिरहि ऊडि चड़हि आकासि ॥
सतिगुरि मिलिऐ जलु पाईऐ चूकै भूख पिआस ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सभु किछु तिस कै पासि ॥
विणु बोलिआ सभु किछु जाणदा किसु आगै कीचै अरदासि ॥
नानक घटि घटि एको वरतदा सबदि करे परगास ॥58॥
नानक तिसै बसंतु है जि सतिगुरु सेवि समाइ ॥
हरि वुठा मनु तनु सभु परफड़ै सभु जगु हरीआवलु होइ ॥59॥
सबदे सदा बसंतु है जितु तनु मनु हरिआ होइ ॥
नानक नामु न वीसरै जिनि सिरिआ सभु कोइ ॥60॥
नानक तिना बसंतु है जिना गुरमुखि वसिआ मनि सोइ ॥
हरि वुठै मनु तनु परफड़ै सभु जगु हरिआ होइ ॥61॥
वडड़ै झालि झलुंभलै नावड़ा लईऐ किसु ॥
नाउ लईऐ परमेसरै भंनण घड़ण समरथु ॥62॥
हरहट भी तूं तूं करहि बोलहि भली बाणि ॥
साहिबु सदा हदूरि है किआ उची करहि पुकार ॥
जिनि जगतु उपाइ हरि रंगु कीआ तिसै विटहु कुरबाणु ॥
आपु छोडहि तां सहु मिलै सचा एहु वीचारु ॥
हउमै फिका बोलणा बुझि न सका कार ॥
वणु त्रिणु त्रिभवणु तुझै धिआइदा अनदिनु सदा विहाण ॥
बिनु सतिगुर किनै न पाइआ करि करि थके वीचार ॥

हिन्दी अर्थ: (हे पपीहे! यह नाम-जल) सारी सृष्टि में बरसता रहता है (पर, इसकी) बूँद (उस मनुष्य के मुँह में ही) पड़ती है (जो) आत्मिक अडोलता में है (जो परमात्मा के) प्रेम में (लीन) है। हे भाई! (प्रभू से ही। हरी नाम) जल से ही सारी सृष्टि पैदा होती है (तभी हरी-नाम) जल के बिना (किसी भी जीव की माया की) प्यास दूर नहीं होती। हे नानक! जिस (मनुष्य) ने हरी-नाम-जल पी लिया। उसको (कभी माया की) भूख नहीं व्यापती। 55। हे पपीहे! (हे आत्मिक जीवन देने वाली नाम बूँद के रसिए!) आत्मिक अडोलता में (टिक के) सदा-स्थिर प्रभू की सिफतसालाह के शबद में (जुड़ के)। (प्रभू के) प्यार में (टिक के)। आप (हरी का नाम) जपा करें। हे पपीहे! (हरी-नाम-बूँद से पैदा होने वाला) हरेक आनंद मौजूद है (पर ये आनंद उसी जीव को प्राप्त होता है। जिसको) गुरू ने (ये) दिखा दिया है। हे भाई! जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालते रहते हैं। उनको प्रीतम-प्रभू मिल जाता है। उनके अंदर (सिफतसालाह के बादल) झड़ी लगा के आ बसता है। उनके अंदर सहजे-सहजे अडोल आत्मिक जीवन वाले नाम-जल की बरखा होती रहती है (उनके अंदर से) माया की सारी तृष्णा माया की सारी भूख दूर हो जाती है। माया के मोह का सारा शोर उनके अंदर से समाप्त हो जाता है। उनकी जिंद प्रभू की जोति में मिली रहती है। हे नानक! सदा-स्थिर हरी-नाम में लीन हो के भाग्यशाली जीव-सि्त्रयां आत्मिक आनंद में टिकी रहती हैं। 56। हे भाई! सदा कायम रहने वाले मालिक प्रभू ने धुर दरगाह से (अपने) हुकम अनुसार (ही) प्रेरित कर के (इन्द्र देवते को। गुरू को सदा) भेजा है। (उसके हुकम में ही) मेहर कर के बादल (गुरू) खूब झड़ी लगा के बरखा करता है। जब पपीहा (आत्मिक जीवन देने वाली नाम-बूँद का रसिया) नाम-बूँद (अपने) मुँह में डालता है, तब उसके तन में आनंद पैदा होता है। (जैसे वर्षा से) धरती हरी-भरी हो जाती है। (उसमें) बहुत अन्न पैदा होता है (जैसे) गुरू के शबद में लीन हो के जगत हर वक्त परमात्मा की भगती करने लग जाता है। सदा कायम रहने वाला प्रभू खुद ही (गुरू की शरण पड़ी हुई दुनिया पर) बख्शिश करता है। मेहर करके अपना हुकम बरताता है। (हुकम लागू करता है)। हे जीव-स्त्री! सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी में लीन हो के परमात्मा के गुण गाया करें। (प्रभू के) डर-अदब से पैदा हुई आत्मिक अडोलता को (अपने जीवन का) शृंगार बनाए रखें। सदा-स्थिर हरी में सुरति जोड़ के टिके रहा करें। हे नानक! जिसके मन में हरी नाम ही टिका रहता है। परमात्मा उसको दरगाह में लेखे से बचा लेता है। 57। हे आत्मिक जीवन देने वाली नाम बूँद के रसिए! (गुरू को छोड़ के) आप (तीर्थ-यात्रा आदि की खातिर) सारी धरती पर रटन करते फिरें। अगर आप (मानसिक शक्तियों की मदद से) उड़ के आकाश में भी जा पहुँचें (तो भी इस तरह माया की तृष्णा की भूख नहीं मिटती। सिर्फ नाम-जल से ही माया की) भूख-प्यास मिटती है (और वह नाम-) जल गुरू के मिलने पर (ही) प्राप्त होता है। हे भाई! ये जिंद ये शरीर सब कुछ उस (परमात्मा) का ही दिया हुआ है। हरेक दाति उस के ही वश में है। (जीवों के) बोले बिना ही (हरेक जीव की) हरेक जरूरत वह जानता है। (उसको छोड़ के) और किस के आगे अरदास की जा सकती है। हे नानक! हरेक शरीर में वह परमात्मा स्वयं ही मौजूद है। (गुरू के) शबद द्वारा (हरेक जीव के अंदर आत्मिक जीवन की) रौशनी (वह खुद ही) करता है। 58। हे नानक! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (हरी नाम में) लीन रहता है उसके अंदर आत्मिक खिलाव की ऋतु बनी रहती है (जब मनुष्य के अंदर) परमात्मा आ बसता है। उसका तन उसका मन (आत्मिक आनंद से) खिल उठता है (जैसे बसंत ऋतु आने पर) सारा जगत हरा-भरा हो जाता है। 59। हे नानक! जिस (परमात्मा) ने हरेक जीव पैदा किया है (जिस मनुष्य को उसका) नाम (गुरू के) शबद से (कभी) नहीं भूलता। उसके अंदर सदा के लिए (ऐसी) खिलने की ऋतु बन जाती है जिसकी बरकति से उसका मन आनंद-भरपूर हो जाता है। 60। हे नानक! गुरू की शरण पड़ कर जिन मनुष्यों के मन में वह (परमात्मा) आ बसता है। उनके अंदर आत्मिक खिलाव का समय बना रहता है। हे भाई! (जैसे बसंत ऋतु में) सारा जगत हरा-भरा हो जाता है (वैसे ही, जिस मनुष्य के अंदर) परमात्मा आ बसता है (उसका) मन (उसका) तन खिल उठता है। 61। हे भाई सुबह प्रभात के वक्त (उठ के) किस का सुंदर नाम लेना चाहिए। उस परमेश्वर का नाम लेना चाहिए जो (जीवों को) पैदा करने व नाश करने की समर्थता वाला है। 62। (इस तरह तो) रहट भी (चलते कूँए की आवाज निकालते इस तरह लगते हैं कि) 'तूं तूं' कर रहे हैं। और मीठी सुर में आवाज़ निकालते हैं (पर, वह भगती तो नहीं कर रहे)। हे भाई! मालिक-प्रभू तो सदा आपके साथ बसता है (उस अंदर बसते प्रभू को भुला के बाहर लोक-दिखावे के लिए) आप क्यों ऊँची-ऊँची पुकारते (फिरते) हैं। हे भाई! जिस हरी ने यह जगत पैदा करके यह खेल तमाशा बनाया है। उससे सदके हुआ करें। सदा कायम रहने वाला विचार यह है कि अगर आप (अपने अंदर से) स्वै भाव छोड़ देंगे, तो आपको परमात्मा मिल जाएगा। हे भाई! अहम्-अहंकार के आसरे (तूं तूं) बोलता (भी) फीका रहता है (आत्मिक जीवन के हिलौरे पैदा नहीं कर सकता)। (अगर मैं हमेशा अहंकार के आसरे ही। अहम् में रह कर ही 'तूं तूं' बोलता रहा। तो) मैं (परमात्मा के साथ मिल सकने वाला) करतब नहीं समझ सकता। हे प्रभू! जंगल। (जंगल के) घास (से लेकर)। सारा जगत आपको ही सिमर रहा है। हरेक दिन सदा सारा समय (आपकी ही याद में) बीत रहा है। पर (अनेकों ही पंडित लोग) सोचें-विचारें करके थकते चले आ रहे हैं। गुरू की शरण पड़े बिना किसी ने आपका मिलाप प्राप्त नहीं किया।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1420 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।