गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: (हे पपीहे ! यह नाम-जल) सारी सृष्टि में बरसता रहता है (पर। इसकी) बूँद (उस मनुष्य के मुँह में ही) पड़ती है (जो) आत्मिक अडोलता में है (जो परमात्मा के) प्रेम में (लीन) है। हे भाई ! (प्रभू से ही। हरी नाम) जल से ही सारी सृष्टि पैदा होती है (तभी हरी-नाम) जल के बिना (किसी भी जीव की माया की) प्यास दूर नहीं होती। हे नानक ! जिस (मनुष्य) ने हरी-नाम-जल पी लिया। उसको (कभी माया की) भूख नहीं व्यापती। 55। हे पपीहे ! (हे आत्मिक जीवन देने वाली नाम बूँद के रसिए !) आत्मिक अडोलता में (टिक के) सदा-स्थिर प्रभू की सिफतसालाह के शबद में (जुड़ के)। (प्रभू के) प्यार में (टिक के)। आप (हरी का नाम) जपा कर। हे पपीहे ! (हरी-नाम-बूँद से पैदा होने वाला) हरेक आनंद मौजूद है (पर ये आनंद उसी जीव को प्राप्त होता है। जिसको) गुरू ने (ये) दिखा दिया है। हे भाई ! जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालते रहते हैं। उनको प्रीतम-प्रभू मिल जाता है। उनके अंदर (सिफतसालाह के बादल) झड़ी लगा के आ बसता है। उनके अंदर सहजे-सहजे अडोल आत्मिक जीवन वाले नाम-जल की बरखा होती रहती है (उनके अंदर से) माया की सारी तृष्णा माया की सारी भूख दूर हो जाती है। माया के मोह का सारा शोर उनके अंदर से समाप्त हो जाता है। उनकी जिंद प्रभू की जोति में मिली रहती है। हे नानक ! सदा-स्थिर हरी-नाम में लीन हो के भाग्यशाली जीव-सि्त्रयां आत्मिक आनंद में टिकी रहती हैं। 56। हे भाई ! सदा कायम रहने वाले मालिक प्रभू ने धुर दरगाह से (अपने) हुकम अनुसार (ही) प्रेरित कर के (इन्द्र देवते को। गुरू को सदा) भेजा है। (उसके हुकम में ही) मेहर कर के बादल (गुरू) खूब झड़ी लगा के बरखा करता है। जब पपीहा (आत्मिक जीवन देने वाली नाम-बूँद का रसिया) नाम-बूँद (अपने) मुँह में डालता है। तब उसके तन में आनंद पैदा होता है। (जैसे वर्षा से) धरती हरी-भरी हो जाती है। (उसमें) बहुत अन्न पैदा होता है (जैसे) गुरू के शबद में लीन हो के जगत हर वक्त परमात्मा की भगती करने लग जाता है। सदा कायम रहने वाला प्रभू खुद ही (गुरू की शरण पड़ी हुई दुनिया पर) बख्शिश करता है। मेहर करके अपना हुकम बरताता है। (हुकम लागू करता है)। हे जीव-स्त्री ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी में लीन हो के परमात्मा के गुण गाया कर। (प्रभू के) डर-अदब से पैदा हुई आत्मिक अडोलता को (अपने जीवन का) श्रंृगार बनाए रख। सदा-स्थिर हरी में सुरति जोड़ के टिके रहा कर। हे नानक ! जिसके मन में हरी नाम ही टिका रहता है। परमात्मा उसको दरगाह में लेखे से बचा लेता है। 57। हे आत्मिक जीवन देने वाली नाम बूँद के रसिए ! (गुरू को छोड़ के) आप (तीर्थ-यात्रा आदि की खातिर) सारी धरती पर रटन करता फिरे। अगर आप (मानसिक शक्तियों की मदद से) उड़ के आकाश में भी जा पहुँचे (तो भी इस तरह माया की तृष्णा की भूख नहीं मिटती। सिर्फ नाम-जल से ही माया की) भूख-प्यास मिटती है (और वह नाम-) जल गुरू के मिलने पर (ही) प्राप्त होता है। हे भाई ! ये जिंद ये शरीर सब कुछ उस (परमात्मा) का ही दिया हुआ है। हरेक दाति उस के ही वश में है। (जीवों के) बोले बिना ही (हरेक जीव की) हरेक जरूरत वह जानता है। (उसको छोड़ के) और किस के आगे अरदास की जा सकती है। हे नानक ! हरेक शरीर में वह परमात्मा स्वयं ही मौजूद है। (गुरू के) शबद द्वारा (हरेक जीव के अंदर आत्मिक जीवन की) रौशनी (वह खुद ही) करता है। 58। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (हरी नाम में) लीन रहता है उसके अंदर आत्मिक खिलाव की ऋतु बनी रहती है (जब मनुष्य के अंदर) परमात्मा आ बसता है। उसका तन उसका मन (आत्मिक आनंद से) खिल उठता है (जैसे बसंत ऋतु आने पर) सारा जगत हरा-भरा हो जाता है। 59। हे नानक ! जिस (परमात्मा) ने हरेक जीव पैदा किया है (जिस मनुष्य को उसका) नाम (गुरू के) शबद से (कभी) नहीं भूलता। उसके अंदर सदा के लिए (ऐसी) खिलने की ऋतु बन जाती है जिसकी बरकति से उसका मन आनंद-भरपूर हो जाता है। 60। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जिन मनुष्यों के मन में वह (परमात्मा) आ बसता है। उनके अंदर आत्मिक खिलाव का समय बना रहता है। हे भाई ! (जैसे बसंत ऋतु में) सारा जगत हरा-भरा हो जाता है (वैसे ही। जिस मनुष्य के अंदर) परमात्मा आ बसता है (उसका) मन (उसका) तन खिल उठता है। 61। हे भाई सुबह प्रभात के वक्त (उठ के) किस का सुंदर नाम लेना चाहिए। उस परमेश्वर का नाम लेना चाहिए है जो (जीवों को) पैदा करने व नाश करने की समर्थता वाला है। 62। (इस तरह तो) रहट भी (चलते कूँए की आवाज निकालते इस तरह लगते हैं कि) ‘तूं तूं’ कर रहे हैं। और मीठी सुर में आवाज़ निकालते हैं (पर। वह भगती तो नहीं कर रहे)। हे भाई ! मालिक-प्रभू तो सदा आपके साथ बसता है (उस अंदर बसते प्रभू को भुला के बाहर लोक-दिखावे के लिए) आप क्यों ऊँची-ऊँची पुकारता (फिरता) है। हे भाई ! जिस हरी ने यह जगत पैदा करके यह खेल तमाशा बनाया है। उससे सदके हुआ कर। सदा कायम रहने वाला विचार यह है कि अगर आप (अपने अंदर से) स्वै भाव छोड़ देगा। तो आपको परमात्मा मिल जाएगा। हे भाई ! अहम्-अहंकार के आसरे (तूं तूं) बोलता (भी) फीका रहता है (आत्मिक जीवन के हिलौरे पैदा नहीं कर सकता)। (अगर मैं हमेशा अहंकार के आसरे ही। अहम् में रह कर ही ‘तूं तूं’ बोलता रहा। तो) मैं (परमात्मा के साथ मिल सकने वाला) करतब नहीं समझ सकता। हे प्रभू ! जंगल। (जंगल के) घास (से लेकर)। सारा जगत आपको ही सिमर रहा है। हरेक दिन सदा सारा समय (आपकी ही याद में) बीत रहा है। पर (अनेकों ही पंडित लोग) सोचें-विचारें करके थकते चले आ रहे हैं। गुरू की शरण पड़े बिना किसी ने आपका मिलाप प्राप्त नहीं किया।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “(हे पपीहे ! यह नाम-जल) सारी सृष्टि में बरसता रहता है (पर।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।