अंग
1419
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਨ ਚੁਕਈ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਅਤਿ ਤਿਸਨਾ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਕਾ ਦੁਖੁ ਗਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥੪੯॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਮਨ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪਾਵਹਿ ਮਾਨੁ ॥
ਕਿਲਵਿਖ ਪਾਪ ਸਭਿ ਕਟੀਅਹਿ ਹਉਮੈ ਚੁਕੈ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਮਲੁ ਵਿਗਸਿਆ ਸਭੁ ਆਤਮ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਪ੍ਰਭ ਜਨ ਨਾਨਕ ਜਪਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੫੦॥
ਧਨਾਸਰੀ ਧਨਵੰਤੀ ਜਾਣੀਐ ਭਾਈ ਜਾਂ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਉਪੇ ਜੀਅ ਸਉ ਭਾਈ ਲਏ ਹੁਕਮਿ ਫਿਰਾਉ ॥
ਜਹ ਬੈਸਾਵਹਿ ਬੈਸਹ ਭਾਈ ਜਹ ਭੇਜਹਿ ਤਹ ਜਾਉ ॥
ਏਵਡੁ ਧਨੁ ਹੋਰੁ ਕੋ ਨਹੀ ਭਾਈ ਜੇਵਡੁ ਸਚਾ ਨਾਉ ॥
ਸਦਾ ਸਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਵਾਂ ਭਾਈ ਸਦਾ ਸਚੇ ਕੈ ਸੰਗਿ ਰਹਾਉ ॥
ਪੈਨਣੁ ਗੁਣ ਚੰਗਿਆਈਆ ਭਾਈ ਆਪਣੀ ਪਤਿ ਕੇ ਸਾਦ ਆਪੇ ਖਾਇ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਕਿਆ ਸਾਲਾਹੀਐ ਭਾਈ ਦਰਸਨ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਚਿ ਵਡੀਆ ਵਡਿਆਈਆ ਭਾਈ ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਤਾਂ ਪਾਇ ॥
ਇਕਿ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨਿ ਨ ਜਾਣਨੀ ਭਾਈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਫਿਰਾਇ ॥
ਸੰਗਤਿ ਢੋਈ ਨਾ ਮਿਲੈ ਭਾਈ ਬੈਸਣਿ ਮਿਲੈ ਨ ਥਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਹੁਕਮੁ ਤਿਨਾ ਮਨਾਇਸੀ ਭਾਈ ਜਿਨਾ ਧੁਰੇ ਕਮਾਇਆ ਨਾਉ ॥
ਤਿਨੑ ਵਿਟਹੁ ਹਉ ਵਾਰਿਆ ਭਾਈ ਤਿਨ ਕਉ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੫੧॥
ਸੇ ਦਾੜੀਆਂ ਸਚੀਆ ਜਿ ਗੁਰ ਚਰਨੀ ਲਗੰਨਿੑ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸੇਵਨਿ ਗੁਰੁ ਆਪਣਾ ਅਨਦਿਨੁ ਅਨਦਿ ਰਹੰਨਿੑ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇ ਮੁਹ ਸੋਹਣੇ ਸਚੈ ਦਰਿ ਦਿਸੰਨਿੑ ॥੫੨॥
ਮੁਖ ਸਚੇ ਸਚੁ ਦਾੜੀਆ ਸਚੁ ਬੋਲਹਿ ਸਚੁ ਕਮਾਹਿ ॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸਤਿਗੁਰ ਮਾਂਹਿ ਸਮਾਂਹਿ ॥
ਸਚੀ ਰਾਸੀ ਸਚੁ ਧਨੁ ਉਤਮ ਪਦਵੀ ਪਾਂਹਿ ॥
ਸਚੁ ਸੁਣਹਿ ਸਚੁ ਮੰਨਿ ਲੈਨਿ ਸਚੀ ਕਾਰ ਕਮਾਹਿ ॥
ਸਚੀ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣਾ ਸਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਚੁ ਨ ਪਾਈਐ ਮਨਮੁਖ ਭੂਲੇ ਜਾਂਹਿ ॥੫੩॥
ਬਾਬੀਹਾ ਪ੍ਰਿਉ ਪ੍ਰਿਉ ਕਰੇ ਜਲਨਿਧਿ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰਿ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲੇ ਸੀਤਲ ਜਲੁ ਪਾਇਆ ਸਭਿ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥
ਤਿਸ ਚੁਕੈ ਸਹਜੁ ਊਪਜੈ ਚੁਕੈ ਕੂਕ ਪੁਕਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਂਤਿ ਹੋਇ ਨਾਮੁ ਰਖਹੁ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥੫੪॥
ਬਾਬੀਹਾ ਤੂੰ ਸਚੁ ਚਉ ਸਚੇ ਸਉ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਬੋਲਿਆ ਤੇਰਾ ਥਾਇ ਪਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਅਲਾਇ ॥
ਸਬਦੁ ਚੀਨਿ ਤਿਖ ਉਤਰੈ ਮੰਨਿ ਲੈ ਰਜਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਅਤਿ ਤਿਸਨਾ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਕਾ ਦੁਖੁ ਗਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥੪੯॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ਮਨ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਪਾਵਹਿ ਮਾਨੁ ॥
ਕਿਲਵਿਖ ਪਾਪ ਸਭਿ ਕਟੀਅਹਿ ਹਉਮੈ ਚੁਕੈ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਮਲੁ ਵਿਗਸਿਆ ਸਭੁ ਆਤਮ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਛਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਪ੍ਰਭ ਜਨ ਨਾਨਕ ਜਪਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੫੦॥
ਧਨਾਸਰੀ ਧਨਵੰਤੀ ਜਾਣੀਐ ਭਾਈ ਜਾਂ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਉਪੇ ਜੀਅ ਸਉ ਭਾਈ ਲਏ ਹੁਕਮਿ ਫਿਰਾਉ ॥
ਜਹ ਬੈਸਾਵਹਿ ਬੈਸਹ ਭਾਈ ਜਹ ਭੇਜਹਿ ਤਹ ਜਾਉ ॥
ਏਵਡੁ ਧਨੁ ਹੋਰੁ ਕੋ ਨਹੀ ਭਾਈ ਜੇਵਡੁ ਸਚਾ ਨਾਉ ॥
ਸਦਾ ਸਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਵਾਂ ਭਾਈ ਸਦਾ ਸਚੇ ਕੈ ਸੰਗਿ ਰਹਾਉ ॥
ਪੈਨਣੁ ਗੁਣ ਚੰਗਿਆਈਆ ਭਾਈ ਆਪਣੀ ਪਤਿ ਕੇ ਸਾਦ ਆਪੇ ਖਾਇ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਕਿਆ ਸਾਲਾਹੀਐ ਭਾਈ ਦਰਸਨ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਵਿਚਿ ਵਡੀਆ ਵਡਿਆਈਆ ਭਾਈ ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਤਾਂ ਪਾਇ ॥
ਇਕਿ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨਿ ਨ ਜਾਣਨੀ ਭਾਈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਫਿਰਾਇ ॥
ਸੰਗਤਿ ਢੋਈ ਨਾ ਮਿਲੈ ਭਾਈ ਬੈਸਣਿ ਮਿਲੈ ਨ ਥਾਉ ॥
ਨਾਨਕ ਹੁਕਮੁ ਤਿਨਾ ਮਨਾਇਸੀ ਭਾਈ ਜਿਨਾ ਧੁਰੇ ਕਮਾਇਆ ਨਾਉ ॥
ਤਿਨੑ ਵਿਟਹੁ ਹਉ ਵਾਰਿਆ ਭਾਈ ਤਿਨ ਕਉ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਉ ॥੫੧॥
ਸੇ ਦਾੜੀਆਂ ਸਚੀਆ ਜਿ ਗੁਰ ਚਰਨੀ ਲਗੰਨਿੑ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸੇਵਨਿ ਗੁਰੁ ਆਪਣਾ ਅਨਦਿਨੁ ਅਨਦਿ ਰਹੰਨਿੑ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇ ਮੁਹ ਸੋਹਣੇ ਸਚੈ ਦਰਿ ਦਿਸੰਨਿੑ ॥੫੨॥
ਮੁਖ ਸਚੇ ਸਚੁ ਦਾੜੀਆ ਸਚੁ ਬੋਲਹਿ ਸਚੁ ਕਮਾਹਿ ॥
ਸਚਾ ਸਬਦੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸਤਿਗੁਰ ਮਾਂਹਿ ਸਮਾਂਹਿ ॥
ਸਚੀ ਰਾਸੀ ਸਚੁ ਧਨੁ ਉਤਮ ਪਦਵੀ ਪਾਂਹਿ ॥
ਸਚੁ ਸੁਣਹਿ ਸਚੁ ਮੰਨਿ ਲੈਨਿ ਸਚੀ ਕਾਰ ਕਮਾਹਿ ॥
ਸਚੀ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣਾ ਸਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਚੁ ਨ ਪਾਈਐ ਮਨਮੁਖ ਭੂਲੇ ਜਾਂਹਿ ॥੫੩॥
ਬਾਬੀਹਾ ਪ੍ਰਿਉ ਪ੍ਰਿਉ ਕਰੇ ਜਲਨਿਧਿ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰਿ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲੇ ਸੀਤਲ ਜਲੁ ਪਾਇਆ ਸਭਿ ਦੂਖ ਨਿਵਾਰਣਹਾਰੁ ॥
ਤਿਸ ਚੁਕੈ ਸਹਜੁ ਊਪਜੈ ਚੁਕੈ ਕੂਕ ਪੁਕਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਂਤਿ ਹੋਇ ਨਾਮੁ ਰਖਹੁ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥੫੪॥
ਬਾਬੀਹਾ ਤੂੰ ਸਚੁ ਚਉ ਸਚੇ ਸਉ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਬੋਲਿਆ ਤੇਰਾ ਥਾਇ ਪਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਅਲਾਇ ॥
ਸਬਦੁ ਚੀਨਿ ਤਿਖ ਉਤਰੈ ਮੰਨਿ ਲੈ ਰਜਾਇ ॥
माइआ मोहु न चुकई मरि जंमहि वारो वार ॥
सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ अति तिसना तजि विकार ॥
जनम मरन का दुखु गइआ जन नानक सबदु बीचारि ॥४९॥
हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥
किलविख पाप सभि कटीअहि हउमै चुकै गुमानु ॥
गुरमुखि कमलु विगसिआ सभु आतम ब्रहमु पछानु ॥
हरि हरि किरपा धारि प्रभ जन नानक जपि हरि नामु ॥५०॥
धनासरी धनवंती जाणीऐ भाई जां सतिगुर की कार कमाइ ॥
तनु मनु सउपे जीअ सउ भाई लए हुकमि फिराउ ॥
जह बैसावहि बैसह भाई जह भेजहि तह जाउ ॥
एवडु धनु होरु को नही भाई जेवडु सचा नाउ ॥
सदा सचे के गुण गावां भाई सदा सचे कै संगि रहाउ ॥
पैनणु गुण चंगिआईआ भाई आपणी पति के साद आपे खाइ ॥
तिस का किआ सालाहीऐ भाई दरसन कउ बलि जाइ ॥
सतिगुर विचि वडीआ वडिआईआ भाई करमि मिलै तां पाइ ॥
इकि हुकमु मंनि न जाणनी भाई दूजै भाइ फिराइ ॥
संगति ढोई ना मिलै भाई बैसणि मिलै न थाउ ॥
नानक हुकमु तिना मनाइसी भाई जिना धुरे कमाइआ नाउ ॥
तिन॑ विटहु हउ वारिआ भाई तिन कउ सद बलिहारै जाउ ॥५१॥
से दाड़ीआं सचीआ जि गुर चरनी लगंनि॑ ॥
अनदिनु सेवनि गुरु आपणा अनदिनु अनदि रहंनि॑ ॥
नानक से मुह सोहणे सचै दरि दिसंनि॑ ॥५२॥
मुख सचे सचु दाड़ीआ सचु बोलहि सचु कमाहि ॥
सचा सबदु मनि वसिआ सतिगुर मांहि समांहि ॥
सची रासी सचु धनु उतम पदवी पांहि ॥
सचु सुणहि सचु मंनि लैनि सची कार कमाहि ॥
सची दरगह बैसणा सचे माहि समाहि ॥
नानक विणु सतिगुर सचु न पाईऐ मनमुख भूले जांहि ॥५३॥
बाबीहा प्रिउ प्रिउ करे जलनिधि प्रेम पिआरि ॥
गुर मिले सीतल जलु पाइआ सभि दूख निवारणहारु ॥
तिस चुकै सहजु ऊपजै चुकै कूक पुकार ॥
नानक गुरमुखि सांति होइ नामु रखहु उरि धारि ॥५४॥
बाबीहा तूं सचु चउ सचे सउ लिव लाइ ॥
बोलिआ तेरा थाइ पवै गुरमुखि होइ अलाइ ॥
सबदु चीनि तिख उतरै मंनि लै रजाइ ॥
सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ अति तिसना तजि विकार ॥
जनम मरन का दुखु गइआ जन नानक सबदु बीचारि ॥४९॥
हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥
किलविख पाप सभि कटीअहि हउमै चुकै गुमानु ॥
गुरमुखि कमलु विगसिआ सभु आतम ब्रहमु पछानु ॥
हरि हरि किरपा धारि प्रभ जन नानक जपि हरि नामु ॥५०॥
धनासरी धनवंती जाणीऐ भाई जां सतिगुर की कार कमाइ ॥
तनु मनु सउपे जीअ सउ भाई लए हुकमि फिराउ ॥
जह बैसावहि बैसह भाई जह भेजहि तह जाउ ॥
एवडु धनु होरु को नही भाई जेवडु सचा नाउ ॥
सदा सचे के गुण गावां भाई सदा सचे कै संगि रहाउ ॥
पैनणु गुण चंगिआईआ भाई आपणी पति के साद आपे खाइ ॥
तिस का किआ सालाहीऐ भाई दरसन कउ बलि जाइ ॥
सतिगुर विचि वडीआ वडिआईआ भाई करमि मिलै तां पाइ ॥
इकि हुकमु मंनि न जाणनी भाई दूजै भाइ फिराइ ॥
संगति ढोई ना मिलै भाई बैसणि मिलै न थाउ ॥
नानक हुकमु तिना मनाइसी भाई जिना धुरे कमाइआ नाउ ॥
तिन॑ विटहु हउ वारिआ भाई तिन कउ सद बलिहारै जाउ ॥५१॥
से दाड़ीआं सचीआ जि गुर चरनी लगंनि॑ ॥
अनदिनु सेवनि गुरु आपणा अनदिनु अनदि रहंनि॑ ॥
नानक से मुह सोहणे सचै दरि दिसंनि॑ ॥५२॥
मुख सचे सचु दाड़ीआ सचु बोलहि सचु कमाहि ॥
सचा सबदु मनि वसिआ सतिगुर मांहि समांहि ॥
सची रासी सचु धनु उतम पदवी पांहि ॥
सचु सुणहि सचु मंनि लैनि सची कार कमाहि ॥
सची दरगह बैसणा सचे माहि समाहि ॥
नानक विणु सतिगुर सचु न पाईऐ मनमुख भूले जांहि ॥५३॥
बाबीहा प्रिउ प्रिउ करे जलनिधि प्रेम पिआरि ॥
गुर मिले सीतल जलु पाइआ सभि दूख निवारणहारु ॥
तिस चुकै सहजु ऊपजै चुकै कूक पुकार ॥
नानक गुरमुखि सांति होइ नामु रखहु उरि धारि ॥५४॥
बाबीहा तूं सचु चउ सचे सउ लिव लाइ ॥
बोलिआ तेरा थाइ पवै गुरमुखि होइ अलाइ ॥
सबदु चीनि तिख उतरै मंनि लै रजाइ ॥
हिन्दी अर्थ: (जब तक उनके अंदर से) माया का मोह खत्म नहीं होता। वह बार-बार पैदा होते रहते हैं। हे दास नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) तृष्णा आदि विकार त्याग के जिन्होंने आत्मिक आनंद हासिल कर लिया। गुरू के शबद को मन में बसा के उनका जनम-मरण (के चक्कर) का दुख दूर हे गया। 49। हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम सिमरा कर (सिमरन की बरकति से) तू परमात्मा की हजूरी में आदर प्राप्त करेगा। (सिमरन करने से मनुष्य के) सारे पाप ऐब काटे जाते हैं। (मन में से) अहम्-अहंकार दूर हो जाता है। गुरू की शरण पड़ कर (सिमरन करने से) हृदय-कमल-फूल खिल उठता है। हर जगह सर्व-व्यापक प्रभू ही साथी दिखता है। हे दास नानक ! (कह-) हे हरी ! हे प्रभू (मेरे पर) मेहर कर। मैं (सदा तेरा) नाम जपता रहूँ। 50। हे भाई ! जब कोई जीव-स्त्री गुरू के (बताए हुए) कार्य करने लग जाती है। जब वह अपना तन अपना मन अपनी जिंद समेत (अपने गुरू के) हवाले करती है। जब वह (अपने गुरू के) हुकम में जीवन-चाल चलने लग जाती है। तब उस जीव-स्त्री को नाम-धन वाली भाग्यशाली समझना चाहिए। (हे भाई ! जीव प्रभू के हुकम से आकी हो ही नहीं सकते) जहाँ प्रभू जी हम जीवों को बैठाते हैं। वहीं हम बैठते हैं। जहाँ प्रभू जी मुझे भेजते हैं। वहीं मैं जाता हूँ। हे भाई ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम (-धन) जितना कीमती है। इतना कीमती और कोईधन नहीं। हे भाई ! मैं तो सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू के गुण ही सदा गाता हूँ। सदा-स्थिर प्रभू के चरनों में ही सदा टिका रहता हूँ। हे भाई ! (जिस मनुष्य के हृदय में ईश्वरीय) गुणों (ईश्वरीय) अच्छाईयों का निवास हो जाता है (वे मनुष्य लोक-परलोक में) आदर-सत्कार हासिल करते हैं। (वे मनुष्य) अपनी (इस मिली) इज्जत का आनंद खुद ही भोगते रहते हैं (वे आनंद बयान नहीं किए जा सकते)। हे भाई ! उस मनुष्य की सिफत (पूरे तौर पर) नहीं की जा सकती। वह मनुष्य परमात्मा के दर्शन से (हमेशा) सदका होता रहता है। हे भाई ! गुरू में बड़े गुण हैं। (जब किसी मनुष्य को परमात्मा की) मेहर से (गुरू) मिल जाता है। तब वह (ये गुण) हासिल कर लेता है। पर कई लोग (ऐसे हैं जो) माया के मोह में भटक-भटक के (गुरू का) हुकम मानना नहीं जानते। हे भाई ! (ऐसे मनुष्यों को) साध-संगति में आसरा नहीं मिलता। साध-संगतिमें बैठने के लिए जगह नहीं मिलती (क्योंकि वह तो संगति की ओर जाता ही नहीं)। हे नानक ! (कह- हे भाई !) धुर दरगाह से (पिछले किए कर्मों के संस्कारोंके अनुसार) जिन मनुष्यों ने हरी-नाम सिमरन की कमाई करनी शुरू की। उन मनुष्यों से ही (परमात्मा अपनी) रज़ा (मीठी कर के) मनाता है। हे भाई ! मैं ऐसे मनुष्यों पर से कुर्बान जाता हूँ। सदके जाता हूँ। 51। उन मनुष्यों की दाढ़ियां सचमुच आदर-सत्कार की हकदार हो जाती हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के चरणों में टिके रहते हैं। जो मनुष्य हर वक्त अपने गुरू की शरण पड़े रहते हैं। और हर वक्त आत्मिक आनंद में लीन रहते हैं। हे नानक ! (उन ही मनुष्यों के) ये मुँह सदा-स्थिर प्रभू के दर पर सुंदर दिखाई देते हैं। 52। उनके मुँह सचमुच सत्कार के हॅकदार हो जाते हैं। उनकी दाढ़ियां सम्मान की हकदार हो जाती हैं। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरते हैं। सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करते रहते हैं। जिनके मन में सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह का शबद हर वक्त टिका रहता है। जो हर वक्त गुरू में लीन रहते हैं। उन मनुष्यों के पास सदा-स्थिर हरी-नाम का सरमाया धन (एकत्र हो जाता) है। वह मनुष्य (लोक-परलोक में) उच्च आत्मिक दर्जा हासिल कर लेते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य (हर वक्त) सदा-स्थिर हरी-नाम सुनते हैं। सदा-स्थिर हरी-नाम को सिदक-श्रद्धा से अपने अंदर बसा लेते हैं। सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कार करते हैं उन मनुष्यों को सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में मान-सम्मान की जगह मिलती है। वह सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में हर वक्त लीन रहते हैं। पर। हे नानक ! गुरू की शरण के बिना सदा-स्थिर हरी-नाम नहीं मिलता। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (अवश्य जिन्दगी के) ग़लत रास्ते पर पड़े रहते हैं। 53। हे भाई ! (जैसे) पपीहा बादल के प्रेम में (वर्षा की बूँद की खातिर) ‘प्रिउ प्रिउ’ पुकारता रहता है (जब वह बूँद उसको मिलती है। तो वह प्यास खत्म हो जाती है। उसकी ‘कूक पुकार’ खत्म हो जाती है। वैसे ही गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा के प्रेम-प्यार में परमात्मा का नाम उचारता रहता है)। गुरू को मिल के वह आत्मिक ठंड देने वाला नाम-जल प्राप्त कर लेता है। (वह नाम-जल) सारे दुख दूर करने की समर्थता वाला है। (इस नाम-जल की बरकति से। उसकी) तृष्णा खत्म हो जाती है (उसके अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है। (माया की खातिर उसकी) घबराहट खत्म हो जाती है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ने से (नाम की बरकति से) आत्मिक ठंड मिल जाती है। इसलिए। हे भाई ! परमात्मा का नाम हृदय में बसाए रखो। 54। हे पपीहे ! (हे आत्मिक जीवन देने वाली नाम-बूँद के रसिए !) तू सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरा कर। सदा-स्थिर प्रभू से सुरति जोड़ के रखा कर। गुरू की शरण पड़ कर (हरी-नाम) उचारा कर। (तब ही) तेरा सिमरन करने का उद्यम (प्रभू की हजूरी में) कबूल पड़ सकता है। हे भाई ! गुरू के शबद के साथ सांझ डाल के (परमात्मा के) हुकम को भला समझ के माना कर (इस तरह माया की) तृष्णा दूर हो जाती है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1419 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Rajiv Chowk metro station की platform पर 9 PM की भीड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1419” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1420 →, पीछे का: ← अंग 1418।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।