अंग
1421
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਦਰਿ ਕਰਹਿ ਜੇ ਆਪਣੀ ਤਾਂ ਆਪੇ ਲੈਹਿ ਸਵਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨੑੀ ਧਿਆਇਆ ਆਏ ਸੇ ਪਰਵਾਣੁ ॥੬੩॥
ਜੋਗੁ ਨ ਭਗਵੀ ਕਪੜੀ ਜੋਗੁ ਨ ਮੈਲੇ ਵੇਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਘਰਿ ਬੈਠਿਆ ਜੋਗੁ ਪਾਈਐ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਉਪਦੇਸਿ ॥੬੪॥
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਜੇ ਭਵਹਿ ਬੇਦ ਪੜਹਿ ਜੁਗ ਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚਾ ਭੇਟੈ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਪਾਵਹਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰ ॥੬੫॥
ਨਾਨਕ ਹੁਕਮੁ ਵਰਤੈ ਖਸਮ ਕਾ ਮਤਿ ਭਵੀ ਫਿਰਹਿ ਚਲ ਚਿਤ ॥
ਮਨਮੁਖ ਸਉ ਕਰਿ ਦੋਸਤੀ ਸੁਖ ਕਿ ਪੁਛਹਿ ਮਿਤ ॥
ਗੁਰਮੁਖ ਸਉ ਕਰਿ ਦੋਸਤੀ ਸਤਿਗੁਰ ਸਉ ਲਾਇ ਚਿਤੁ ॥
ਜੰਮਣ ਮਰਣ ਕਾ ਮੂਲੁ ਕਟੀਐ ਤਾਂ ਸੁਖੁ ਹੋਵੀ ਮਿਤ ॥੬੬॥
ਭੁਲਿਆਂ ਆਪਿ ਸਮਝਾਇਸੀ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਬਾਹਰੀ ਕਰਣ ਪਲਾਹ ਕਰੇ ॥੬੭॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਿਨੑੀ ਧਿਆਇਆ ਆਏ ਸੇ ਪਰਵਾਣੁ ॥੬੩॥
ਜੋਗੁ ਨ ਭਗਵੀ ਕਪੜੀ ਜੋਗੁ ਨ ਮੈਲੇ ਵੇਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਘਰਿ ਬੈਠਿਆ ਜੋਗੁ ਪਾਈਐ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਉਪਦੇਸਿ ॥੬੪॥
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਜੇ ਭਵਹਿ ਬੇਦ ਪੜਹਿ ਜੁਗ ਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚਾ ਭੇਟੈ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਪਾਵਹਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰ ॥੬੫॥
ਨਾਨਕ ਹੁਕਮੁ ਵਰਤੈ ਖਸਮ ਕਾ ਮਤਿ ਭਵੀ ਫਿਰਹਿ ਚਲ ਚਿਤ ॥
ਮਨਮੁਖ ਸਉ ਕਰਿ ਦੋਸਤੀ ਸੁਖ ਕਿ ਪੁਛਹਿ ਮਿਤ ॥
ਗੁਰਮੁਖ ਸਉ ਕਰਿ ਦੋਸਤੀ ਸਤਿਗੁਰ ਸਉ ਲਾਇ ਚਿਤੁ ॥
ਜੰਮਣ ਮਰਣ ਕਾ ਮੂਲੁ ਕਟੀਐ ਤਾਂ ਸੁਖੁ ਹੋਵੀ ਮਿਤ ॥੬੬॥
ਭੁਲਿਆਂ ਆਪਿ ਸਮਝਾਇਸੀ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਬਾਹਰੀ ਕਰਣ ਪਲਾਹ ਕਰੇ ॥੬੭॥
नदरि करहि जे आपणी तां आपे लैहि सवारि ॥
नानक गुरमुखि जिन॑ी धिआइआ आए से परवाणु ॥६३॥
जोगु न भगवी कपड़ी जोगु न मैले वेसि ॥
नानक घरि बैठिआ जोगु पाईऐ सतिगुर कै उपदेसि ॥६४॥
चारे कुंडा जे भवहि बेद पड़हि जुग चारि ॥
नानक साचा भेटै हरि मनि वसै पावहि मोख दुआर ॥६५॥
नानक हुकमु वरतै खसम का मति भवी फिरहि चल चित ॥
मनमुख सउ करि दोसती सुख कि पुछहि मित ॥
गुरमुख सउ करि दोसती सतिगुर सउ लाइ चितु ॥
जंमण मरण का मूलु कटीऐ तां सुखु होवी मित ॥६६॥
भुलिआं आपि समझाइसी जा कउ नदरि करे ॥
नानक नदरी बाहरी करण पलाह करे ॥६७॥
नानक गुरमुखि जिन॑ी धिआइआ आए से परवाणु ॥६३॥
जोगु न भगवी कपड़ी जोगु न मैले वेसि ॥
नानक घरि बैठिआ जोगु पाईऐ सतिगुर कै उपदेसि ॥६४॥
चारे कुंडा जे भवहि बेद पड़हि जुग चारि ॥
नानक साचा भेटै हरि मनि वसै पावहि मोख दुआर ॥६५॥
नानक हुकमु वरतै खसम का मति भवी फिरहि चल चित ॥
मनमुख सउ करि दोसती सुख कि पुछहि मित ॥
गुरमुख सउ करि दोसती सतिगुर सउ लाइ चितु ॥
जंमण मरण का मूलु कटीऐ तां सुखु होवी मित ॥६६॥
भुलिआं आपि समझाइसी जा कउ नदरि करे ॥
नानक नदरी बाहरी करण पलाह करे ॥६७॥
हिन्दी अर्थ: अगर तू मेहर की निगाह करे। तो तू स्वयं ही (जीवों के आत्मिक जीवन) सुंदर बना लेता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जिन मनुष्यों ने प्रभू का नाम सिमरा है। जगत में उन्हीं का पैदा होना (प्रभू की हजूरी में) कबूल हुआ है। 63। हे भाई ! (गृहस्त त्याग के) गेरुए रंग के कपड़ों से अथवा मैले पहरावे से (परमात्मा का) मिलाप नहीं हो जाता। पर। हाँ। हे नानक ! गुरू के उपदेश से गृहस्थ में रहते हुए ही (परमात्मा से) मिलाप हो सकता है। 64। हे भाई ! (गृहस्थ त्याग के) अगर तू (धरती पर) चारों तरफ भागता फिरे। और। अगर तू सदा ही वेद (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़ता रहे (तो भी विकारों से खलासी का रास्ता नहीं पा सकता)। हे नानक ! (कह- हे भाई !) तू विकारों से निजात का दरवाजा (तब) ढॅूँढ लेगा। जब सदा कायम रहने वाला परमात्मा तुझे मिल जाएगा। जब हरी (तेरे) मन में आ बसेगा। 65। हे नानक ! (कह- हे भाई ! तेरे भी कया वश। सारे संसार में) मालिक-प्रभू का हुकम चल रहा है (उस हुकम में ही) तेरी मति उल्टे रास्ते पर पड़ी हुई है। और तू चंचल-चिक्त हो के (धरती पर) विचर रहा है। पर। हे मित्र ! (यह तो बता कि) अपने मन के पीछे चलने वालों के साथ दोस्ती पा के तू आत्मिक आनंद की आस कैसे कर सकता है। हे भाई गुरू के सन्मुख रहने वालों के साथ मित्रता बना। गुरू (के चरणों) से चिक्त जोड़े रख। (इस तरह जब) जनम-मरण के चक्करों की जड़ काटी जाती है। तब आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 66। हे भाई ! जिन्दगी के गलत रास्ते पर पड़े हुए भी जिस मनुष्य पर (परमात्मा) मेहर की निगाह करता है। उसको खुद (ही आत्मिक जीवन की) समझ बख्श देता है। हे नानक ! परमात्मा की मेहर की निगाह से वंचित हुआ मनुष्य (सदा) विरलाप ही करता रहता है। 67।
ਸਲੋਕ ਮਹਲਾ ੪
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਵਡਭਾਗੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿਨੑਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਜੋਤਿ ਪਰਗਾਸੀਆ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਜਿਨਿ ਸਚੁ ਜਾਤਾ ਸੋਇ ॥
ਜਿਤੁ ਮਿਲਿਐ ਤਿਖ ਉਤਰੈ ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਇ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਤਿ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਜਿਸ ਨੋ ਸਮਤੁ ਸਭ ਕੋਇ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਿਰਵੈਰੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਨਿੰਦਾ ਉਸਤਤਿ ਤੁਲਿ ਹੋਇ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੁਜਾਣੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਤਰਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਹੈ ਜਿ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਜਿਸ ਤੇ ਨਾਮੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੨॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਸਚਾ ਸੋਹਿਲਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਗੋਵਿੰਦੁ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਣਾ ਹਰਿ ਜਪਿਆ ਮਨਿ ਆਨੰਦੁ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਪੂਰਨ ਪਰਮਾਨੰਦੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿਆ ਬਹੁੜਿ ਨ ਮਨਿ ਤਨਿ ਭੰਗੁ ॥੩॥
ਮੂੰ ਪਿਰੀਆ ਸਉ ਨੇਹੁ ਕਿਉ ਸਜਣ ਮਿਲਹਿ ਪਿਆਰਿਆ ॥
ਹਉ ਢੂਢੇਦੀ ਤਿਨ ਸਜਣ ਸਚਿ ਸਵਾਰਿਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੈਡਾ ਮਿਤੁ ਹੈ ਜੇ ਮਿਲੈ ਤ ਇਹੁ ਮਨੁ ਵਾਰਿਆ ॥
ਦੇਂਦਾ ਮੂੰ ਪਿਰੁ ਦਸਿ ਹਰਿ ਸਜਣੁ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉ ਪਿਰੁ ਭਾਲੀ ਆਪਣਾ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਲਿ ਦਿਖਾਲਿਆ ॥੪॥
ਹਉ ਖੜੀ ਨਿਹਾਲੀ ਪੰਧੁ ਮਤੁ ਮੂੰ ਸਜਣੁ ਆਵਏ ॥
ਕੋ ਆਣਿ ਮਿਲਾਵੈ ਅਜੁ ਮੈ ਪਿਰੁ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵਏ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਵਡਭਾਗੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿਨੑਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਜੋਤਿ ਪਰਗਾਸੀਆ ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੧॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਜਿਨਿ ਸਚੁ ਜਾਤਾ ਸੋਇ ॥
ਜਿਤੁ ਮਿਲਿਐ ਤਿਖ ਉਤਰੈ ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਹੋਇ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਤਿ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਜਿਸ ਨੋ ਸਮਤੁ ਸਭ ਕੋਇ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਿਰਵੈਰੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਨਿੰਦਾ ਉਸਤਤਿ ਤੁਲਿ ਹੋਇ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੁਜਾਣੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਤਰਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਹੈ ਜਿ ਸਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰ ਵਾਹੁ ਵਾਹੁ ਜਿਸ ਤੇ ਨਾਮੁ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੨॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਸਚਾ ਸੋਹਿਲਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਗੋਵਿੰਦੁ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਣਾ ਹਰਿ ਜਪਿਆ ਮਨਿ ਆਨੰਦੁ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਪੂਰਨ ਪਰਮਾਨੰਦੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਸਲਾਹਿਆ ਬਹੁੜਿ ਨ ਮਨਿ ਤਨਿ ਭੰਗੁ ॥੩॥
ਮੂੰ ਪਿਰੀਆ ਸਉ ਨੇਹੁ ਕਿਉ ਸਜਣ ਮਿਲਹਿ ਪਿਆਰਿਆ ॥
ਹਉ ਢੂਢੇਦੀ ਤਿਨ ਸਜਣ ਸਚਿ ਸਵਾਰਿਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੈਡਾ ਮਿਤੁ ਹੈ ਜੇ ਮਿਲੈ ਤ ਇਹੁ ਮਨੁ ਵਾਰਿਆ ॥
ਦੇਂਦਾ ਮੂੰ ਪਿਰੁ ਦਸਿ ਹਰਿ ਸਜਣੁ ਸਿਰਜਣਹਾਰਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉ ਪਿਰੁ ਭਾਲੀ ਆਪਣਾ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਲਿ ਦਿਖਾਲਿਆ ॥੪॥
ਹਉ ਖੜੀ ਨਿਹਾਲੀ ਪੰਧੁ ਮਤੁ ਮੂੰ ਸਜਣੁ ਆਵਏ ॥
ਕੋ ਆਣਿ ਮਿਲਾਵੈ ਅਜੁ ਮੈ ਪਿਰੁ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਵਏ ॥
सलोक महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वडभागीआ सोहागणी जिन॑ा गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥
अंतरि जोति परगासीआ नानक नामि समाइ ॥१॥
वाहु वाहु सतिगुरु पुरखु है जिनि सचु जाता सोइ ॥
जितु मिलिऐ तिख उतरै तनु मनु सीतलु होइ ॥
वाहु वाहु सतिगुरु सति पुरखु है जिस नो समतु सभ कोइ ॥
वाहु वाहु सतिगुरु निरवैरु है जिसु निंदा उसतति तुलि होइ ॥
वाहु वाहु सतिगुरु सुजाणु है जिसु अंतरि ब्रहमु वीचारु ॥
वाहु वाहु सतिगुरु निरंकारु है जिसु अंतु न पारावारु ॥
वाहु वाहु सतिगुरू है जि सचु द्रिड़ाए सोइ ॥
नानक सतिगुर वाहु वाहु जिस ते नामु परापति होइ ॥२॥
हरि प्रभ सचा सोहिला गुरमुखि नामु गोविंदु ॥
अनदिनु नामु सलाहणा हरि जपिआ मनि आनंदु ॥
वडभागी हरि पाइआ पूरन परमानंदु ॥
जन नानक नामु सलाहिआ बहुड़ि न मनि तनि भंगु ॥३॥
मूं पिरीआ सउ नेहु किउ सजण मिलहि पिआरिआ ॥
हउ ढूढेदी तिन सजण सचि सवारिआ ॥
सतिगुरु मैडा मितु है जे मिलै त इहु मनु वारिआ ॥
देंदा मूं पिरु दसि हरि सजणु सिरजणहारिआ ॥
नानक हउ पिरु भाली आपणा सतिगुर नालि दिखालिआ ॥४॥
हउ खड़ी निहाली पंधु मतु मूं सजणु आवए ॥
को आणि मिलावै अजु मै पिरु मेलि मिलावए ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वडभागीआ सोहागणी जिन॑ा गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥
अंतरि जोति परगासीआ नानक नामि समाइ ॥१॥
वाहु वाहु सतिगुरु पुरखु है जिनि सचु जाता सोइ ॥
जितु मिलिऐ तिख उतरै तनु मनु सीतलु होइ ॥
वाहु वाहु सतिगुरु सति पुरखु है जिस नो समतु सभ कोइ ॥
वाहु वाहु सतिगुरु निरवैरु है जिसु निंदा उसतति तुलि होइ ॥
वाहु वाहु सतिगुरु सुजाणु है जिसु अंतरि ब्रहमु वीचारु ॥
वाहु वाहु सतिगुरु निरंकारु है जिसु अंतु न पारावारु ॥
वाहु वाहु सतिगुरू है जि सचु द्रिड़ाए सोइ ॥
नानक सतिगुर वाहु वाहु जिस ते नामु परापति होइ ॥२॥
हरि प्रभ सचा सोहिला गुरमुखि नामु गोविंदु ॥
अनदिनु नामु सलाहणा हरि जपिआ मनि आनंदु ॥
वडभागी हरि पाइआ पूरन परमानंदु ॥
जन नानक नामु सलाहिआ बहुड़ि न मनि तनि भंगु ॥३॥
मूं पिरीआ सउ नेहु किउ सजण मिलहि पिआरिआ ॥
हउ ढूढेदी तिन सजण सचि सवारिआ ॥
सतिगुरु मैडा मितु है जे मिलै त इहु मनु वारिआ ॥
देंदा मूं पिरु दसि हरि सजणु सिरजणहारिआ ॥
नानक हउ पिरु भाली आपणा सतिगुर नालि दिखालिआ ॥४॥
हउ खड़ी निहाली पंधु मतु मूं सजणु आवए ॥
को आणि मिलावै अजु मै पिरु मेलि मिलावए ॥
हिन्दी अर्थ: सलोक महला ४ वह परब्रह्म केवल एक (ओंकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जिन जीव-सि्त्रयों को प्रभू-पातशाह मिल जाता है। वे अति भाग्यशाली बन जाती है। वे सोहगनें कहलाती है। प्रभू के नाम में लीन रह के उनके अंदर परमात्मा की ज्योति चमक उठती है। 1। हे भाई ! महापुरुष गुरू धन्य है धन्य है। जिस (गुरू) ने सदा कायम रहने वाले प्रभू के साथ गहरी सांझ डाली हुई है। जिस (गुरू) को मिलने से (माया की) तष्णा दूर हो जाती है। (मनुष्य का) तन और मन ठंडा शांत हो जाता है। हे भाई ! गुरू सत्पुरख सराहनीय है धन्य है। क्योंकि उसको हरेक जीव एक जैसा (दिखता) है। गुरू धन्य है। गुरू धन्य है। गुरू को किसी से वैर नहीं (कोई मनुष्य गुरू की निंदा करे) गुरू को (वह) निंदा अथवा वडिआई एक जैसी ही प्रतीत होती है। हे भाई ! गुरू धन्य है गुरू धन्य है। गुरू (आत्मिक जीवन की सूझ में) समझदार है। गुरू के अंदर परमात्मा सदा बस रहा है। गुरू सराहने-योग्य है। गुरू (उस) निरंकार (का रूप) है जिसके गुणों का अंत इस पार का-उस पार का अंत नहीं पाया जा सकता। गुरू धन्य है गुरू धन्य है। क्योंकि वह (मनुष्य के हृदय में) सदा-स्थिर प्रभू (का नाम) पक्का कर देता है। हे नानक ! जिस (गुरू) से परमात्मा का नाम हासिल होता है। उसको (सदा) धन्य-धन्य कहा करो। 2। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के लिए हरी प्रभू का नाम (ही) सदा कायम रहने वाला खुशी का गीत है। जिन मनुष्यों ने हरी-नाम की सिफत की। हरी-नाम ही जपा। उनके मन में आनंद बना रहता है। हे भाई ! बड़े भाग्यों वाले मनुष्यों ने सबसे ऊँचे आत्मिक आनंद के मालिक प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया। हे दास नानक ! (जिन्होंने हर वक्त) हरी-नाम की वडिआई की। उनके मन में उनके तन में (आत्मिक आनंद की) दोबारा कभी कमी नहीं आती। 3। हे भाई ! (अपने) प्यारे (प्रभू) के साथ मेरा प्यार है (मेरी हर वक्त तमन्ना है कि मुझे) कैसे (वह) प्यारे सज्जन मिल जाएं (जो मुझे प्रभू-पति से मिला दें)। मैं उन सज्जनों को ढूँढती फिरती हूँ। सदा-स्थिर हरी-नाम ने जिनको सुंदर जीवन वाले बना दिया है। हे भाई ! गुरू (ही) मेरा (असल) मित्र है। अगर (मुझे गुरू) मिल जाए। तो (मैं अपना) यह मन (उस पर से) सदके कर दूँ। (गुरू ही) मुझे बता सकता है कि सृजनहार हरी (ही असल) सज्जन है। हे नानक ! (कह-) हे सतिगुरू ! मैं अपना पति-प्रभू ढूँढ रही थी। तूने (मुझे मेरे) साथ (बसता) दिखा दिया है। 4। हे भाई ! मैं चाह से राह ताक रही हूँ कि शायद मेरा सज्जन आ रहा है। जो मुझे (मेरा प्रभू-) पति आज (इसी जीवन में) ला के मिला देता हो। जो मुझे मेरे प्यारे का दर्शन करा दे।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1421 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Dwarka के नए-बसे sector में पहली बार आए परिवार का घर देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1421” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1422 →, पीछे का: ← अंग 1420।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।