राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
माइआ मोहु न चुकई मरि जंमहि वारो वार ॥ सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ अति तिसना तजि विकार ॥ जनम मरन का दुखु गइआ जन नानक सबदु बीचारि ॥४९॥ हरि हरि नामु धिआइ मन हरि दरगह पावहि मानु ॥ किलविख पाप सभि कटीअहि हउमै चुकै गुमानु ॥ गुरमुखि कमलु विगसिआ सभु आतम ब्रहमु पछानु ॥ हरि हरि किरपा धारि प्रभ जन नानक जपि हरि नामु ॥५०॥ धनासरी धनवंती जाणीऐ भाई जां सतिगुर की कार कमाइ ॥ तनु मनु सउपे जीअ सउ भाई लए हुकमि फिराउ ॥ जह बैसावहि बैसह भाई जह भेजहि तह जाउ ॥ एवडु धनु होरु को नही भाई जेवडु सचा नाउ ॥ सदा सचे के गुण गावां भाई सदा सचे कै संगि रहाउ ॥ पैनणु गुण चंगिआईआ भाई आपणी पति के साद आपे खाइ ॥ तिस का किआ सालाहीऐ भाई दरसन कउ बलि जाइ ॥ सतिगुर विचि वडीआ वडिआईआ भाई करमि मिलै तां पाइ ॥ इकि हुकमु मंनि न जाणनी भाई दूजै भाइ फिराइ ॥ संगति ढोई ना मिलै भाई बैसणि मिलै न थाउ ॥ नानक हुकमु तिना मनाइसी भाई जिना धुरे कमाइआ नाउ ॥ तिन॑ विटहु हउ वारिआ भाई तिन कउ सद बलिहारै जाउ ॥५१॥ से दाड़ीआं सचीआ जि गुर चरनी लगंनि॑ ॥ अनदिनु सेवनि गुरु आपणा अनदिनु अनदि रहंनि॑ ॥ नानक से मुह सोहणे सचै दरि दिसंनि॑ ॥५२॥ मुख सचे सचु दाड़ीआ सचु बोलहि सचु कमाहि ॥ सचा सबदु मनि वसिआ सतिगुर मांहि समांहि ॥ सची रासी सचु धनु उतम पदवी पांहि ॥ सचु सुणहि सचु मंनि लैनि सची कार कमाहि ॥ सची दरगह बैसणा सचे माहि समाहि ॥ नानक विणु सतिगुर सचु न पाईऐ मनमुख भूले जांहि ॥५३॥ बाबीहा प्रिउ प्रिउ करे जलनिधि प्रेम पिआरि ॥ गुर मिले सीतल जलु पाइआ सभि दूख निवारणहारु ॥ तिस चुकै सहजु ऊपजै चुकै कूक पुकार ॥ नानक गुरमुखि सांति होइ नामु रखहु उरि धारि ॥५४॥ बाबीहा तूं सचु चउ सचे सउ लिव लाइ ॥ बोलिआ तेरा थाइ पवै गुरमुखि होइ अलाइ ॥ सबदु चीनि तिख उतरै मंनि लै रजाइ ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: (जब तक उनके अंदर से) माया का मोह खत्म नहीं होता। वह बार-बार पैदा होते रहते हैं। हे दास नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) तृष्णा आदि विकार त्याग के जिन्होंने आत्मिक आनंद हासिल कर लिया। गुरू के शबद को मन में बसा के उनका जनम-मरण (के चक्कर) का दुख दूर हे गया। 49। हे (मेरे) मन ! परमात्मा का नाम सिमरा कर (सिमरन की बरकति से) आप परमात्मा की हजूरी में आदर प्राप्त करेगा। (सिमरन करने से मनुष्य के) सारे पाप ऐब काटे जाते हैं। (मन में से) अहम्-अहंकार दूर हो जाता है। गुरू की शरण पड़ कर (सिमरन करने से) हृदय-कमल-फूल खिल उठता है। हर जगह सर्व-व्यापक प्रभू ही साथी दिखता है। हे दास नानक ! (कह-) हे हरी ! हे प्रभू (मेरे पर) मेहर कर। मैं (सदा आपका) नाम जपता रहूँ। 50। हे भाई ! जब कोई जीव-स्त्री गुरू के (बताए हुए) कार्य करने लग जाती है। जब वह अपना तन अपना मन अपनी जिंद समेत (अपने गुरू के) हवाले करती है। जब वह (अपने गुरू के) हुकम में जीवन-चाल चलने लग जाती है। तब उस जीव-स्त्री को नाम-धन वाली भाग्यशाली समझना चाहिए। (हे भाई ! जीव प्रभू के हुकम से आकी हो ही नहीं सकते) जहाँ प्रभू जी हम जीवों को बैठाते हैं। वहीं हम बैठते हैं। जहाँ प्रभू जी मुझे भेजते हैं। वहीं मैं जाता हूँ। हे भाई ! सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम (-धन) जितना कीमती है। इतना कीमती और कोईधन नहीं। हे भाई ! मैं तो सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू के गुण ही सदा गाता हूँ। सदा-स्थिर प्रभू के चरनों में ही सदा टिका रहता हूँ। हे भाई ! (जिस मनुष्य के हृदय में ईश्वरीय) गुणों (ईश्वरीय) अच्छाईयों का निवास हो जाता है (वे मनुष्य लोक-परलोक में) आदर-सत्कार हासिल करते हैं। (वे मनुष्य) अपनी (इस मिली) इज्जत का आनंद खुद ही भोगते रहते हैं (वे आनंद बयान नहीं किए जा सकते)। हे भाई ! उस मनुष्य की सिफत (पूरे तौर पर) नहीं की जा सकती। वह मनुष्य परमात्मा के दर्शन से (हमेशा) सदका होता रहता है। हे भाई ! गुरू में बड़े गुण हैं। (जब किसी मनुष्य को परमात्मा की) मेहर से (गुरू) मिल जाता है। तब वह (ये गुण) हासिल कर लेता है। पर कई लोग (ऐसे हैं जो) माया के मोह में भटक-भटक के (गुरू का) हुकम मानना नहीं जानते। हे भाई ! (ऐसे मनुष्यों को) साध-संगति में आसरा नहीं मिलता। साध-संगतिमें बैठने के लिए जगह नहीं मिलती (क्योंकि वह तो संगति की ओर जाता ही नहीं)। हे नानक ! (कह- हे भाई !) धुर दरगाह से (पिछले किए कर्मों के संस्कारोंके अनुसार) जिन मनुष्यों ने हरी-नाम सिमरन की कमाई करनी शुरू की। उन मनुष्यों से ही (परमात्मा अपनी) रज़ा (मीठी कर के) मनाता है। हे भाई ! मैं ऐसे मनुष्यों पर से कुर्बान जाता हूँ। सदके जाता हूँ। 51। उन मनुष्यों की दाढ़ियां सचमुच आदर-सत्कार की हकदार हो जाती हैं। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के चरणों में टिके रहते हैं। जो मनुष्य हर वक्त अपने गुरू की शरण पड़े रहते हैं। और हर वक्त आत्मिक आनंद में लीन रहते हैं। हे नानक ! (उन ही मनुष्यों के) ये मुँह सदा-स्थिर प्रभू के दर पर सुंदर दिखाई देते हैं। 52। उनके मुँह सचमुच सत्कार के हॅकदार हो जाते हैं। उनकी दाढ़ियां सम्मान की हकदार हो जाती हैं। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरते हैं। सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कमाई करते रहते हैं। जिनके मन में सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह का शबद हर वक्त टिका रहता है। जो हर वक्त गुरू में लीन रहते हैं। उन मनुष्यों के पास सदा-स्थिर हरी-नाम का सरमाया धन (एकत्र हो जाता) है। वह मनुष्य (लोक-परलोक में) उच्च आत्मिक दर्जा हासिल कर लेते हैं। हे भाई ! जो मनुष्य (हर वक्त) सदा-स्थिर हरी-नाम सुनते हैं। सदा-स्थिर हरी-नाम को सिदक-श्रद्धा से अपने अंदर बसा लेते हैं। सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन की कार करते हैं उन मनुष्यों को सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में मान-सम्मान की जगह मिलती है। वह सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में हर वक्त लीन रहते हैं। पर। हे नानक ! गुरू की शरण के बिना सदा-स्थिर हरी-नाम नहीं मिलता। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (अवश्य जिन्दगी के) ग़लत रास्ते पर पड़े रहते हैं। 53। हे भाई ! (जैसे) पपीहा बादल के प्रेम में (वर्षा की बूँद की खातिर) ‘प्रिउ प्रिउ’ पुकारता रहता है (जब वह बूँद उसको मिलती है। तो वह प्यास खत्म हो जाती है। उसकी ‘कूक पुकार’ खत्म हो जाती है। वैसे ही गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा के प्रेम-प्यार में परमात्मा का नाम उचारता रहता है)। गुरू को मिल के वह आत्मिक ठंड देने वाला नाम-जल प्राप्त कर लेता है। (वह नाम-जल) सारे दुख दूर करने की समर्थता वाला है। (इस नाम-जल की बरकति से। उसकी) तृष्णा खत्म हो जाती है (उसके अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है। (माया की खातिर उसकी) घबराहट खत्म हो जाती है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ने से (नाम की बरकति से) आत्मिक ठंड मिल जाती है। इसलिए। हे भाई ! परमात्मा का नाम हृदय में बसाए रखो। 54। हे पपीहे ! (हे आत्मिक जीवन देने वाली नाम-बूँद के रसिए !) आप सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरा कर। सदा-स्थिर प्रभू से सुरति जोड़ के रखा कर। गुरू की शरण पड़ कर (हरी-नाम) उचारा कर। (तब ही) आपका सिमरन करने का उद्यम (प्रभू की हजूरी में) कबूल पड़ सकता है। हे भाई ! गुरू के शबद के साथ सांझ डाल के (परमात्मा के) हुकम को भला समझ के माना कर (इस तरह माया की) तृष्णा दूर हो जाती है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “(जब तक उनके अंदर से) माया का मोह खत्म नहीं होता।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।