अंग
1418
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਕ ਕੀ ਪ੍ਰਭ ਬੇਨਤੀ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਇ ॥੪੧॥
ਮਨ ਆਵਣ ਜਾਣੁ ਨ ਸੁਝਈ ਨਾ ਸੁਝੈ ਦਰਬਾਰੁ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਪਲੇਟਿਆ ਅੰਤਰਿ ਅਗਿਆਨੁ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਤਬ ਨਰੁ ਸੁਤਾ ਜਾਗਿਆ ਸਿਰਿ ਡੰਡੁ ਲਗਾ ਬਹੁ ਭਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਾਂ ਕਰਾਂ ਉਪਰਿ ਹਰਿ ਚੇਤਿਆ ਸੇ ਪਾਇਨਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪਿ ਓਹਿ ਉਧਰੇ ਸਭ ਕੁਟੰਬ ਤਰੇ ਪਰਵਾਰ ॥੪੨॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਸੋ ਮੁਆ ਜਾਪੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਰਸਿ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹਿ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਿਞਾਪੈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਮੁਆ ਹੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਮੁਆ ਅਪੁਨਾ ਜਨਮੁ ਖੋਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਹਿ ਅੰਤਿ ਦੁਖੁ ਰੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥੪੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੁਢੇ ਕਦੇ ਨਾਹੀ ਜਿਨੑਾ ਅੰਤਰਿ ਸੁਰਤਿ ਗਿਆਨੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਰਵਹਿ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜ ਧਿਆਨੁ ॥
ਓਇ ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਬਿਬੇਕ ਰਹਹਿ ਦੁਖਿ ਸੁਖਿ ਏਕ ਸਮਾਨਿ ॥
ਤਿਨਾ ਨਦਰੀ ਇਕੋ ਆਇਆ ਸਭੁ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪਛਾਨੁ ॥੪੪॥
ਮਨਮੁਖੁ ਬਾਲਕੁ ਬਿਰਧਿ ਸਮਾਨਿ ਹੈ ਜਿਨੑਾ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਸੁਰਤਿ ਨਾਹੀ ॥
ਵਿਚਿ ਹਉਮੈ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਸਭ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕੈ ਜਾਂਹੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਛੇ ਨਿਰਮਲੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਓਨਾ ਮੈਲੁ ਪਤੰਗੁ ਨ ਲਗਈ ਜਿ ਚਲਨਿ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਜੂਠਿ ਨ ਉਤਰੈ ਜੇ ਸਉ ਧੋਵਣ ਪਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲਿਅਨੁ ਗੁਰ ਕੈ ਅੰਕਿ ਸਮਾਇ ॥੪੫॥
ਬੁਰਾ ਕਰੇ ਸੁ ਕੇਹਾ ਸਿਝੈ ॥
ਆਪਣੈ ਰੋਹਿ ਆਪੇ ਹੀ ਦਝੈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕਮਲਾ ਰਗੜੈ ਲੁਝੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਤਿਸੁ ਸਭ ਕਿਛੁ ਸੁਝੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨ ਸਿਉ ਲੁਝੈ ॥੪੬॥
ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਨ ਸੇਵਿਓ ਸਬਦਿ ਨ ਕੀਤੋ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਓਇ ਮਾਣਸ ਜੂਨਿ ਨ ਆਖੀਅਨਿ ਪਸੂ ਢੋਰ ਗਾਵਾਰ ॥
ਓਨਾ ਅੰਤਰਿ ਗਿਆਨੁ ਨ ਧਿਆਨੁ ਹੈ ਹਰਿ ਸਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਪਿਆਰੁ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮੁਏ ਵਿਕਾਰ ਮਹਿ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥
ਜੀਵਦਿਆ ਨੋ ਮਿਲੈ ਸੁ ਜੀਵਦੇ ਹਰਿ ਜਗਜੀਵਨ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਹਣੇ ਤਿਤੁ ਸਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥੪੭॥
ਹਰਿ ਮੰਦਰੁ ਹਰਿ ਸਾਜਿਆ ਹਰਿ ਵਸੈ ਜਿਸੁ ਨਾਲਿ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਰਜਾਲਿ ॥
ਹਰਿ ਮੰਦਰਿ ਵਸਤੁ ਅਨੇਕ ਹੈ ਨਵ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਧਨੁ ਭਗਵੰਤੀ ਨਾਨਕਾ ਜਿਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਧਾ ਹਰਿ ਭਾਲਿ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਗੜ ਮੰਦਰੁ ਖੋਜਿਆ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਪਾਇਆ ਨਾਲਿ ॥੪੮॥
ਮਨਮੁਖ ਦਹ ਦਿਸਿ ਫਿਰਿ ਰਹੇ ਅਤਿ ਤਿਸਨਾ ਲੋਭ ਵਿਕਾਰ ॥
ਮਨ ਆਵਣ ਜਾਣੁ ਨ ਸੁਝਈ ਨਾ ਸੁਝੈ ਦਰਬਾਰੁ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਪਲੇਟਿਆ ਅੰਤਰਿ ਅਗਿਆਨੁ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਤਬ ਨਰੁ ਸੁਤਾ ਜਾਗਿਆ ਸਿਰਿ ਡੰਡੁ ਲਗਾ ਬਹੁ ਭਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਾਂ ਕਰਾਂ ਉਪਰਿ ਹਰਿ ਚੇਤਿਆ ਸੇ ਪਾਇਨਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪਿ ਓਹਿ ਉਧਰੇ ਸਭ ਕੁਟੰਬ ਤਰੇ ਪਰਵਾਰ ॥੪੨॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਸੋ ਮੁਆ ਜਾਪੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਰਸਿ ਧ੍ਰਾਪੈ ॥
ਹਰਿ ਦਰਗਹਿ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਿਞਾਪੈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਮੁਆ ਹੈ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਮੁਆ ਅਪੁਨਾ ਜਨਮੁ ਖੋਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਹਿ ਅੰਤਿ ਦੁਖੁ ਰੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥੪੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੁਢੇ ਕਦੇ ਨਾਹੀ ਜਿਨੑਾ ਅੰਤਰਿ ਸੁਰਤਿ ਗਿਆਨੁ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਰਵਹਿ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜ ਧਿਆਨੁ ॥
ਓਇ ਸਦਾ ਅਨੰਦਿ ਬਿਬੇਕ ਰਹਹਿ ਦੁਖਿ ਸੁਖਿ ਏਕ ਸਮਾਨਿ ॥
ਤਿਨਾ ਨਦਰੀ ਇਕੋ ਆਇਆ ਸਭੁ ਆਤਮ ਰਾਮੁ ਪਛਾਨੁ ॥੪੪॥
ਮਨਮੁਖੁ ਬਾਲਕੁ ਬਿਰਧਿ ਸਮਾਨਿ ਹੈ ਜਿਨੑਾ ਅੰਤਰਿ ਹਰਿ ਸੁਰਤਿ ਨਾਹੀ ॥
ਵਿਚਿ ਹਉਮੈ ਕਰਮ ਕਮਾਵਦੇ ਸਭ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕੈ ਜਾਂਹੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਛੇ ਨਿਰਮਲੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਓਨਾ ਮੈਲੁ ਪਤੰਗੁ ਨ ਲਗਈ ਜਿ ਚਲਨਿ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਜੂਠਿ ਨ ਉਤਰੈ ਜੇ ਸਉ ਧੋਵਣ ਪਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲਿਅਨੁ ਗੁਰ ਕੈ ਅੰਕਿ ਸਮਾਇ ॥੪੫॥
ਬੁਰਾ ਕਰੇ ਸੁ ਕੇਹਾ ਸਿਝੈ ॥
ਆਪਣੈ ਰੋਹਿ ਆਪੇ ਹੀ ਦਝੈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਕਮਲਾ ਰਗੜੈ ਲੁਝੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਤਿਸੁ ਸਭ ਕਿਛੁ ਸੁਝੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨ ਸਿਉ ਲੁਝੈ ॥੪੬॥
ਜਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਨ ਸੇਵਿਓ ਸਬਦਿ ਨ ਕੀਤੋ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਓਇ ਮਾਣਸ ਜੂਨਿ ਨ ਆਖੀਅਨਿ ਪਸੂ ਢੋਰ ਗਾਵਾਰ ॥
ਓਨਾ ਅੰਤਰਿ ਗਿਆਨੁ ਨ ਧਿਆਨੁ ਹੈ ਹਰਿ ਸਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਨ ਪਿਆਰੁ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮੁਏ ਵਿਕਾਰ ਮਹਿ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥
ਜੀਵਦਿਆ ਨੋ ਮਿਲੈ ਸੁ ਜੀਵਦੇ ਹਰਿ ਜਗਜੀਵਨ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਹਣੇ ਤਿਤੁ ਸਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥੪੭॥
ਹਰਿ ਮੰਦਰੁ ਹਰਿ ਸਾਜਿਆ ਹਰਿ ਵਸੈ ਜਿਸੁ ਨਾਲਿ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਰਜਾਲਿ ॥
ਹਰਿ ਮੰਦਰਿ ਵਸਤੁ ਅਨੇਕ ਹੈ ਨਵ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥
ਧਨੁ ਭਗਵੰਤੀ ਨਾਨਕਾ ਜਿਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਧਾ ਹਰਿ ਭਾਲਿ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਗੜ ਮੰਦਰੁ ਖੋਜਿਆ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਪਾਇਆ ਨਾਲਿ ॥੪੮॥
ਮਨਮੁਖ ਦਹ ਦਿਸਿ ਫਿਰਿ ਰਹੇ ਅਤਿ ਤਿਸਨਾ ਲੋਭ ਵਿਕਾਰ ॥
नानक की प्रभ बेनती हरि भावै बखसि मिलाइ ॥४१॥
मन आवण जाणु न सुझई ना सुझै दरबारु ॥
माइआ मोहि पलेटिआ अंतरि अगिआनु गुबारु ॥
तब नरु सुता जागिआ सिरि डंडु लगा बहु भारु ॥
गुरमुखां करां उपरि हरि चेतिआ से पाइनि मोख दुआरु ॥
नानक आपि ओहि उधरे सभ कुटंब तरे परवार ॥४२॥
सबदि मरै सो मुआ जापै ॥
गुर परसादी हरि रसि ध्रापै ॥
हरि दरगहि गुर सबदि सिञापै ॥
बिनु सबदै मुआ है सभु कोइ ॥
मनमुखु मुआ अपुना जनमु खोइ ॥
हरि नामु न चेतहि अंति दुखु रोइ ॥
नानक करता करे सु होइ ॥४३॥
गुरमुखि बुढे कदे नाही जिन॑ा अंतरि सुरति गिआनु ॥
सदा सदा हरि गुण रवहि अंतरि सहज धिआनु ॥
ओइ सदा अनंदि बिबेक रहहि दुखि सुखि एक समानि ॥
तिना नदरी इको आइआ सभु आतम रामु पछानु ॥४४॥
मनमुखु बालकु बिरधि समानि है जिन॑ा अंतरि हरि सुरति नाही ॥
विचि हउमै करम कमावदे सभ धरम राइ कै जांही ॥
गुरमुखि हछे निरमले गुर कै सबदि सुभाइ ॥
ओना मैलु पतंगु न लगई जि चलनि सतिगुर भाइ ॥
मनमुख जूठि न उतरै जे सउ धोवण पाइ ॥
नानक गुरमुखि मेलिअनु गुर कै अंकि समाइ ॥४५॥
बुरा करे सु केहा सिझै ॥
आपणै रोहि आपे ही दझै ॥
मनमुखि कमला रगड़ै लुझै ॥
गुरमुखि होइ तिसु सभ किछु सुझै ॥
नानक गुरमुखि मन सिउ लुझै ॥४६॥
जिना सतिगुरु पुरखु न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥
ओइ माणस जूनि न आखीअनि पसू ढोर गावार ॥
ओना अंतरि गिआनु न धिआनु है हरि सउ प्रीति न पिआरु ॥
मनमुख मुए विकार महि मरि जंमहि वारो वार ॥
जीवदिआ नो मिलै सु जीवदे हरि जगजीवन उर धारि ॥
नानक गुरमुखि सोहणे तितु सचै दरबारि ॥४७॥
हरि मंदरु हरि साजिआ हरि वसै जिसु नालि ॥
गुरमती हरि पाइआ माइआ मोह परजालि ॥
हरि मंदरि वसतु अनेक है नव निधि नामु समालि ॥
धनु भगवंती नानका जिना गुरमुखि लधा हरि भालि ॥
वडभागी गड़ मंदरु खोजिआ हरि हिरदै पाइआ नालि ॥४८॥
मनमुख दह दिसि फिरि रहे अति तिसना लोभ विकार ॥
मन आवण जाणु न सुझई ना सुझै दरबारु ॥
माइआ मोहि पलेटिआ अंतरि अगिआनु गुबारु ॥
तब नरु सुता जागिआ सिरि डंडु लगा बहु भारु ॥
गुरमुखां करां उपरि हरि चेतिआ से पाइनि मोख दुआरु ॥
नानक आपि ओहि उधरे सभ कुटंब तरे परवार ॥४२॥
सबदि मरै सो मुआ जापै ॥
गुर परसादी हरि रसि ध्रापै ॥
हरि दरगहि गुर सबदि सिञापै ॥
बिनु सबदै मुआ है सभु कोइ ॥
मनमुखु मुआ अपुना जनमु खोइ ॥
हरि नामु न चेतहि अंति दुखु रोइ ॥
नानक करता करे सु होइ ॥४३॥
गुरमुखि बुढे कदे नाही जिन॑ा अंतरि सुरति गिआनु ॥
सदा सदा हरि गुण रवहि अंतरि सहज धिआनु ॥
ओइ सदा अनंदि बिबेक रहहि दुखि सुखि एक समानि ॥
तिना नदरी इको आइआ सभु आतम रामु पछानु ॥४४॥
मनमुखु बालकु बिरधि समानि है जिन॑ा अंतरि हरि सुरति नाही ॥
विचि हउमै करम कमावदे सभ धरम राइ कै जांही ॥
गुरमुखि हछे निरमले गुर कै सबदि सुभाइ ॥
ओना मैलु पतंगु न लगई जि चलनि सतिगुर भाइ ॥
मनमुख जूठि न उतरै जे सउ धोवण पाइ ॥
नानक गुरमुखि मेलिअनु गुर कै अंकि समाइ ॥४५॥
बुरा करे सु केहा सिझै ॥
आपणै रोहि आपे ही दझै ॥
मनमुखि कमला रगड़ै लुझै ॥
गुरमुखि होइ तिसु सभ किछु सुझै ॥
नानक गुरमुखि मन सिउ लुझै ॥४६॥
जिना सतिगुरु पुरखु न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥
ओइ माणस जूनि न आखीअनि पसू ढोर गावार ॥
ओना अंतरि गिआनु न धिआनु है हरि सउ प्रीति न पिआरु ॥
मनमुख मुए विकार महि मरि जंमहि वारो वार ॥
जीवदिआ नो मिलै सु जीवदे हरि जगजीवन उर धारि ॥
नानक गुरमुखि सोहणे तितु सचै दरबारि ॥४७॥
हरि मंदरु हरि साजिआ हरि वसै जिसु नालि ॥
गुरमती हरि पाइआ माइआ मोह परजालि ॥
हरि मंदरि वसतु अनेक है नव निधि नामु समालि ॥
धनु भगवंती नानका जिना गुरमुखि लधा हरि भालि ॥
वडभागी गड़ मंदरु खोजिआ हरि हिरदै पाइआ नालि ॥४८॥
मनमुख दह दिसि फिरि रहे अति तिसना लोभ विकार ॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! हे हरी ! (तेरे दास) नानक की (तेरे दर पर) विनती है कि जैसे हो सके मेहर कर के (जीवों को अपने चरणों में) जोड़। 41। हे मन ! (तुझे) जनम मरण का चक्कर नहीं सूझता (तुझे ये ख्याल ही नहीं आता कि जनम-मरण के चक्कर में पड़ना पड़ेगा)। (तुझे) प्रभू की हजूरी याद नहीं आती। तु (सदा) माया के मोह में फसा रहता है। तेरे अंदर आत्मिक जीवन के प्रति बेसमझी है। आत्मिक जीवन के प्रति घोर अंधकार है। हे भाई ! (माया के मोह की) नींद में पड़ा हुआ मनुष्य तब (ही) होश करता है जब (इसके) सिर पर (धर्मराज का) तगड़ा करारा डंडा पड़ता है (मौत आ दबोचती है)। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य हर वक्त परमात्मा को सिमरते रहते हैं। उस माया के मोह से खलासी का रास्ता तलाश लेते हैं। वे खुद (भी विकारों में गलने से) बच जाते हैं। उनके परिवार-कुटंब के सारे साथी भी (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 42। हे भाई ! गुरू के शबद से (मनुष्य विकारों के प्रति) मर जाता है (उस पर विकार अपना असर नहीं कर पाते) (और विकारों के प्रति) मरा हुआ मनुष्य (जगत में) शोभा कमाता है। गुरू की किरपा से हरी-नाम-रस से (मनुष्य माया की तृष्णा के प्रति) तृप्त रहता है। गुरू के शबद की बरकति से (मनुष्य) परमात्मा की हजूरी में (भी) सम्मान प्राप्त करता है। हे भाई ! गुरू के शबद के बिना हरेक जीव आत्मिक मौत मरा रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य अपना मानस-जीवन व्यर्थ गवा के आत्मिक मौत सहेड़ी रखता है। जो मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरते। वे (जिंदगी के) आखिर तक (अपना कोई ना कोई) दुख (ही) रोते रहते हैं। (पर। जीवों के भी क्या वश। ) हे नानक ! (जीवों के पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार जीव के लिए) परमात्मा जो कुछ करता है। वही होता है। 43। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले जिन मनुष्यों के अंदर प्रभू-चरणों की लगन टिकी रहती है। आत्मिक जीवन की सूझ टिकी रहती है। वह मनुष्य (आत्मिक जीवन में) कभी कमजोर नहीं होते। वे सदा ही परमात्मा केगुण याद करते रहते हैं। उनके अंदर आत्मिक अडोलता की समाधि बनी रहती है। वे मनुष्य (अच्छे बुरे काम की) परख के आनंद में सदा मगन रहते हैं। (हरेक) दुख में (हर एक) सुख में वे सदा अडोल चित्त रहते हैं। उनको हर जगह सिर्फ सर्व-व्यापक परमात्मा साथी ही बसता दिखता है। 44। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य नरोए शारीरिक अंगों (जवान) वाला होता हुआ भी (आत्मिक जीवन में) बुढ़े मनुष्य जैसा कमजोर होता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों के अंदर परमात्मा की लगन नहीं होती। वह मनुष्य (धार्मिक) कर्म (भी) अहंकार में (रह के ही) करते हैं। वे सारे धर्मराज के वश पड़ते हैं। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (प्रभू के) प्यार में टिक के सच्चे पवित्र जीवन वाले होते हैं। जो मनुष्य गुरू के अनुसार रह के जीवन चाल चलते हैं। उनको (विकारों की) रत्ती भर भी मैल नहीं लगती। पर। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की (विकारों की) झूठ (उसके मन से) कभी नहीं उतरती। चाहे वह सौ बार (उसको) धोने का यतन करता रहे। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों को गुरू की गोद में लीन कर के परमात्मा ने (स्वयं अपने चरणों में) मिलाया होता है। 45। हे भाई ! जो मनुष्य (माया आदि की खातिर किसी और के साथ) कोई बुराई कमाता है। वह जिंदगी में कामयाब नहीं समझा जा सकता। वह स्वयं भी क्रोध की ज्वाला में जलता रहता है। (उलझने के कारण) वह मनुष्य अपने ही गुस्से (की आग) में (माया की खातिर) पागल हुआ फिरता है। (दुनिया के) झगड़े-झमेले में (औरों के साथ) उलझता रहता है। (पर) गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (आत्मिक जीवन के) हरेक भेद को समझता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़े रहने वाला मनुष्य (अपने) मन से मुकाबला करता रहता है। 46। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू महापुरुख की शरण नहीं पकड़ी। जिन्होंने शबद में अपना मन नहीं जोड़ा। वे लोग मानस जून में आए हुए नहीं कहे जा सकते। वे तो पशु हैं। वे तो मरे हुए जानवर हैं। वे महा-मूर्ख हैं। उन मनुष्यों के अंदर आत्मिक जीवन की सूझ नहीं। उनके अंदर प्रभू-चरणों की लगन नहीं। प्रभू से उनका प्रेम-प्यार नहीं। अपने मन के पीछे चलने वाले वे मनुष्य विकारों में ही आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं वे बार-बार जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। हे भाई ! जो जो मनुष्य आत्मिक जीवन वाले मनुष्यों को मिलते हैं वे सारे ही जगत के जीवन हरी को हृदय में बसा के आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य उस सदा स्थिर (ईश्वरीय) दरबार में शोभा कमाते हैं। 47। हे भाई ! (मनुष्य का ये शरीर-) हरी-मन्दिर परमात्मा ने (खुद) बनाया है। इस शरीर-हरी मंदिर में परमात्मा स्वयं बसता है। (पर) गुरू की मति पर चल कर (अंदर से) माया का मोह अच्छी तरह जला के (ही। किसी भाग्यशाली के अंदर बसता) परमात्मा मिला है। हे भाई ! परमात्मा का नाम। मानो। नौ खजाने हैं (इसको हृदय में) संभाल के रख (अगर हरी-नाम संभाला जाए। तो) इस शरीर हरी मन्दिर में अनेकों ही उत्तम कीमती गुण (मिल जाते) हैं। हे नानक ! साबाश है उन भाग्यशालियों को। जिन्होंने गुरू की शरण पड़ कर (इस शरीर हरिमन्दिर में बसता) परमात्मा खोज के पा लिया है। जिन बड़े भाग्यशालियों ने इस शरीर किले को शरीर मन्दिर को खोजा। दिल में ही अपने साथ बसता परमात्मा पा लिया। 48। हे भाई ! माया की भारी तृष्णा। माया का लालच और अनेकों विकारों में फस के अपने मन के मुरीद मनुष्य दसों दिशाओं में भटकते फिरते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1418 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Nizamuddin dargah के बाहर qawwali सुनते-सुनते।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1418” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1419 →, पीछे का: ← अंग 1417।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।