अंग
1420
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਝੋਕਿ ਵਰਸਦਾ ਬੂੰਦ ਪਵੈ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਜਲ ਹੀ ਤੇ ਸਭ ਊਪਜੈ ਬਿਨੁ ਜਲ ਪਿਆਸ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਲੁ ਜਿਨਿ ਪੀਆ ਤਿਸੁ ਭੂਖ ਨ ਲਾਗੈ ਆਇ ॥੫੫॥
ਬਾਬੀਹਾ ਤੂੰ ਸਹਜਿ ਬੋਲਿ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੇਰੈ ਨਾਲਿ ਹੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਦਿਖਾਇ ॥
ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਮਿਲੈ ਵੁਠਾ ਛਹਬਰ ਲਾਇ ॥
ਝਿਮਿ ਝਿਮਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵਰਸਦਾ ਤਿਸਨਾ ਭੁਖ ਸਭ ਜਾਇ ॥
ਕੂਕ ਪੁਕਾਰ ਨ ਹੋਵਈ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਸਵਨਿੑ ਸੋਹਾਗਣੀ ਸਚੈ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੫੬॥
ਧੁਰਹੁ ਖਸਮਿ ਭੇਜਿਆ ਸਚੈ ਹੁਕਮਿ ਪਠਾਇ ॥
ਇੰਦੁ ਵਰਸੈ ਦਇਆ ਕਰਿ ਗੂੜੑੀ ਛਹਬਰ ਲਾਇ ॥
ਬਾਬੀਹੇ ਤਨਿ ਮਨਿ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਜਾਂ ਤਤੁ ਬੂੰਦ ਮੁਹਿ ਪਾਇ ॥
ਅਨੁ ਧਨੁ ਬਹੁਤਾ ਉਪਜੈ ਧਰਤੀ ਸੋਭਾ ਪਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਲੋਕੁ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥
ਆਪੇ ਸਚਾ ਬਖਸਿ ਲਏ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕਰੈ ਰਜਾਇ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਕਾਮਣੀ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥
ਭੈ ਕਾ ਸਹਜੁ ਸੀਗਾਰੁ ਕਰਿਹੁ ਸਚਿ ਰਹਹੁ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੋ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥੫੭॥
ਬਾਬੀਹਾ ਸਗਲੀ ਧਰਤੀ ਜੇ ਫਿਰਹਿ ਊਡਿ ਚੜਹਿ ਆਕਾਸਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਜਲੁ ਪਾਈਐ ਚੂਕੈ ਭੂਖ ਪਿਆਸ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸ ਕੈ ਪਾਸਿ ॥
ਵਿਣੁ ਬੋਲਿਆ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣਦਾ ਕਿਸੁ ਆਗੈ ਕੀਚੈ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਘਟਿ ਘਟਿ ਏਕੋ ਵਰਤਦਾ ਸਬਦਿ ਕਰੇ ਪਰਗਾਸ ॥੫੮॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੈ ਬਸੰਤੁ ਹੈ ਜਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਮਾਇ ॥
ਹਰਿ ਵੁਠਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸਭੁ ਪਰਫੜੈ ਸਭੁ ਜਗੁ ਹਰੀਆਵਲੁ ਹੋਇ ॥੫੯॥
ਸਬਦੇ ਸਦਾ ਬਸੰਤੁ ਹੈ ਜਿਤੁ ਤਨੁ ਮਨੁ ਹਰਿਆ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਜਿਨਿ ਸਿਰਿਆ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥੬੦॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨਾ ਬਸੰਤੁ ਹੈ ਜਿਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥
ਹਰਿ ਵੁਠੈ ਮਨੁ ਤਨੁ ਪਰਫੜੈ ਸਭੁ ਜਗੁ ਹਰਿਆ ਹੋਇ ॥੬੧॥
ਵਡੜੈ ਝਾਲਿ ਝਲੁੰਭਲੈ ਨਾਵੜਾ ਲਈਐ ਕਿਸੁ ॥
ਨਾਉ ਲਈਐ ਪਰਮੇਸਰੈ ਭੰਨਣ ਘੜਣ ਸਮਰਥੁ ॥੬੨॥
ਹਰਹਟ ਭੀ ਤੂੰ ਤੂੰ ਕਰਹਿ ਬੋਲਹਿ ਭਲੀ ਬਾਣਿ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਸਦਾ ਹਦੂਰਿ ਹੈ ਕਿਆ ਉਚੀ ਕਰਹਿ ਪੁਕਾਰ ॥
ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਕੀਆ ਤਿਸੈ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਹਿ ਤਾਂ ਸਹੁ ਮਿਲੈ ਸਚਾ ਏਹੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਹਉਮੈ ਫਿਕਾ ਬੋਲਣਾ ਬੁਝਿ ਨ ਸਕਾ ਕਾਰ ॥
ਵਣੁ ਤ੍ਰਿਣੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣੁ ਤੁਝੈ ਧਿਆਇਦਾ ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਵਿਹਾਣ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਆ ਕਰਿ ਕਰਿ ਥਕੇ ਵੀਚਾਰ ॥
ਜਲ ਹੀ ਤੇ ਸਭ ਊਪਜੈ ਬਿਨੁ ਜਲ ਪਿਆਸ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਲੁ ਜਿਨਿ ਪੀਆ ਤਿਸੁ ਭੂਖ ਨ ਲਾਗੈ ਆਇ ॥੫੫॥
ਬਾਬੀਹਾ ਤੂੰ ਸਹਜਿ ਬੋਲਿ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੇਰੈ ਨਾਲਿ ਹੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਦਿਖਾਇ ॥
ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਮਿਲੈ ਵੁਠਾ ਛਹਬਰ ਲਾਇ ॥
ਝਿਮਿ ਝਿਮਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਵਰਸਦਾ ਤਿਸਨਾ ਭੁਖ ਸਭ ਜਾਇ ॥
ਕੂਕ ਪੁਕਾਰ ਨ ਹੋਵਈ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਸਵਨਿੑ ਸੋਹਾਗਣੀ ਸਚੈ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੫੬॥
ਧੁਰਹੁ ਖਸਮਿ ਭੇਜਿਆ ਸਚੈ ਹੁਕਮਿ ਪਠਾਇ ॥
ਇੰਦੁ ਵਰਸੈ ਦਇਆ ਕਰਿ ਗੂੜੑੀ ਛਹਬਰ ਲਾਇ ॥
ਬਾਬੀਹੇ ਤਨਿ ਮਨਿ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਜਾਂ ਤਤੁ ਬੂੰਦ ਮੁਹਿ ਪਾਇ ॥
ਅਨੁ ਧਨੁ ਬਹੁਤਾ ਉਪਜੈ ਧਰਤੀ ਸੋਭਾ ਪਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਲੋਕੁ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥
ਆਪੇ ਸਚਾ ਬਖਸਿ ਲਏ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕਰੈ ਰਜਾਇ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹੁ ਕਾਮਣੀ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ॥
ਭੈ ਕਾ ਸਹਜੁ ਸੀਗਾਰੁ ਕਰਿਹੁ ਸਚਿ ਰਹਹੁ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੋ ਮਨਿ ਵਸੈ ਹਰਿ ਦਰਗਹ ਲਏ ਛਡਾਇ ॥੫੭॥
ਬਾਬੀਹਾ ਸਗਲੀ ਧਰਤੀ ਜੇ ਫਿਰਹਿ ਊਡਿ ਚੜਹਿ ਆਕਾਸਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਜਲੁ ਪਾਈਐ ਚੂਕੈ ਭੂਖ ਪਿਆਸ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸ ਕੈ ਪਾਸਿ ॥
ਵਿਣੁ ਬੋਲਿਆ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਣਦਾ ਕਿਸੁ ਆਗੈ ਕੀਚੈ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਘਟਿ ਘਟਿ ਏਕੋ ਵਰਤਦਾ ਸਬਦਿ ਕਰੇ ਪਰਗਾਸ ॥੫੮॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੈ ਬਸੰਤੁ ਹੈ ਜਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਮਾਇ ॥
ਹਰਿ ਵੁਠਾ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸਭੁ ਪਰਫੜੈ ਸਭੁ ਜਗੁ ਹਰੀਆਵਲੁ ਹੋਇ ॥੫੯॥
ਸਬਦੇ ਸਦਾ ਬਸੰਤੁ ਹੈ ਜਿਤੁ ਤਨੁ ਮਨੁ ਹਰਿਆ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਜਿਨਿ ਸਿਰਿਆ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥੬੦॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨਾ ਬਸੰਤੁ ਹੈ ਜਿਨਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥
ਹਰਿ ਵੁਠੈ ਮਨੁ ਤਨੁ ਪਰਫੜੈ ਸਭੁ ਜਗੁ ਹਰਿਆ ਹੋਇ ॥੬੧॥
ਵਡੜੈ ਝਾਲਿ ਝਲੁੰਭਲੈ ਨਾਵੜਾ ਲਈਐ ਕਿਸੁ ॥
ਨਾਉ ਲਈਐ ਪਰਮੇਸਰੈ ਭੰਨਣ ਘੜਣ ਸਮਰਥੁ ॥੬੨॥
ਹਰਹਟ ਭੀ ਤੂੰ ਤੂੰ ਕਰਹਿ ਬੋਲਹਿ ਭਲੀ ਬਾਣਿ ॥
ਸਾਹਿਬੁ ਸਦਾ ਹਦੂਰਿ ਹੈ ਕਿਆ ਉਚੀ ਕਰਹਿ ਪੁਕਾਰ ॥
ਜਿਨਿ ਜਗਤੁ ਉਪਾਇ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਕੀਆ ਤਿਸੈ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥
ਆਪੁ ਛੋਡਹਿ ਤਾਂ ਸਹੁ ਮਿਲੈ ਸਚਾ ਏਹੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਹਉਮੈ ਫਿਕਾ ਬੋਲਣਾ ਬੁਝਿ ਨ ਸਕਾ ਕਾਰ ॥
ਵਣੁ ਤ੍ਰਿਣੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣੁ ਤੁਝੈ ਧਿਆਇਦਾ ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਵਿਹਾਣ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਆ ਕਰਿ ਕਰਿ ਥਕੇ ਵੀਚਾਰ ॥
चारे कुंडा झोकि वरसदा बूंद पवै सहजि सुभाइ ॥
जल ही ते सभ ऊपजै बिनु जल पिआस न जाइ ॥
नानक हरि जलु जिनि पीआ तिसु भूख न लागै आइ ॥५५॥
बाबीहा तूं सहजि बोलि सचै सबदि सुभाइ ॥
सभु किछु तेरै नालि है सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥
आपु पछाणहि प्रीतमु मिलै वुठा छहबर लाइ ॥
झिमि झिमि अंम्रितु वरसदा तिसना भुख सभ जाइ ॥
कूक पुकार न होवई जोती जोति मिलाइ ॥
नानक सुखि सवनि॑ सोहागणी सचै नामि समाइ ॥५६॥
धुरहु खसमि भेजिआ सचै हुकमि पठाइ ॥
इंदु वरसै दइआ करि गूड़॑ी छहबर लाइ ॥
बाबीहे तनि मनि सुखु होइ जां ततु बूंद मुहि पाइ ॥
अनु धनु बहुता उपजै धरती सोभा पाइ ॥
अनदिनु लोकु भगति करे गुर कै सबदि समाइ ॥
आपे सचा बखसि लए करि किरपा करै रजाइ ॥
हरि गुण गावहु कामणी सचै सबदि समाइ ॥
भै का सहजु सीगारु करिहु सचि रहहु लिव लाइ ॥
नानक नामो मनि वसै हरि दरगह लए छडाइ ॥५७॥
बाबीहा सगली धरती जे फिरहि ऊडि चड़हि आकासि ॥
सतिगुरि मिलिऐ जलु पाईऐ चूकै भूख पिआस ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सभु किछु तिस कै पासि ॥
विणु बोलिआ सभु किछु जाणदा किसु आगै कीचै अरदासि ॥
नानक घटि घटि एको वरतदा सबदि करे परगास ॥५८॥
नानक तिसै बसंतु है जि सतिगुरु सेवि समाइ ॥
हरि वुठा मनु तनु सभु परफड़ै सभु जगु हरीआवलु होइ ॥५९॥
सबदे सदा बसंतु है जितु तनु मनु हरिआ होइ ॥
नानक नामु न वीसरै जिनि सिरिआ सभु कोइ ॥६०॥
नानक तिना बसंतु है जिना गुरमुखि वसिआ मनि सोइ ॥
हरि वुठै मनु तनु परफड़ै सभु जगु हरिआ होइ ॥६१॥
वडड़ै झालि झलुंभलै नावड़ा लईऐ किसु ॥
नाउ लईऐ परमेसरै भंनण घड़ण समरथु ॥६२॥
हरहट भी तूं तूं करहि बोलहि भली बाणि ॥
साहिबु सदा हदूरि है किआ उची करहि पुकार ॥
जिनि जगतु उपाइ हरि रंगु कीआ तिसै विटहु कुरबाणु ॥
आपु छोडहि तां सहु मिलै सचा एहु वीचारु ॥
हउमै फिका बोलणा बुझि न सका कार ॥
वणु त्रिणु त्रिभवणु तुझै धिआइदा अनदिनु सदा विहाण ॥
बिनु सतिगुर किनै न पाइआ करि करि थके वीचार ॥
जल ही ते सभ ऊपजै बिनु जल पिआस न जाइ ॥
नानक हरि जलु जिनि पीआ तिसु भूख न लागै आइ ॥५५॥
बाबीहा तूं सहजि बोलि सचै सबदि सुभाइ ॥
सभु किछु तेरै नालि है सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥
आपु पछाणहि प्रीतमु मिलै वुठा छहबर लाइ ॥
झिमि झिमि अंम्रितु वरसदा तिसना भुख सभ जाइ ॥
कूक पुकार न होवई जोती जोति मिलाइ ॥
नानक सुखि सवनि॑ सोहागणी सचै नामि समाइ ॥५६॥
धुरहु खसमि भेजिआ सचै हुकमि पठाइ ॥
इंदु वरसै दइआ करि गूड़॑ी छहबर लाइ ॥
बाबीहे तनि मनि सुखु होइ जां ततु बूंद मुहि पाइ ॥
अनु धनु बहुता उपजै धरती सोभा पाइ ॥
अनदिनु लोकु भगति करे गुर कै सबदि समाइ ॥
आपे सचा बखसि लए करि किरपा करै रजाइ ॥
हरि गुण गावहु कामणी सचै सबदि समाइ ॥
भै का सहजु सीगारु करिहु सचि रहहु लिव लाइ ॥
नानक नामो मनि वसै हरि दरगह लए छडाइ ॥५७॥
बाबीहा सगली धरती जे फिरहि ऊडि चड़हि आकासि ॥
सतिगुरि मिलिऐ जलु पाईऐ चूकै भूख पिआस ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सभु किछु तिस कै पासि ॥
विणु बोलिआ सभु किछु जाणदा किसु आगै कीचै अरदासि ॥
नानक घटि घटि एको वरतदा सबदि करे परगास ॥५८॥
नानक तिसै बसंतु है जि सतिगुरु सेवि समाइ ॥
हरि वुठा मनु तनु सभु परफड़ै सभु जगु हरीआवलु होइ ॥५९॥
सबदे सदा बसंतु है जितु तनु मनु हरिआ होइ ॥
नानक नामु न वीसरै जिनि सिरिआ सभु कोइ ॥६०॥
नानक तिना बसंतु है जिना गुरमुखि वसिआ मनि सोइ ॥
हरि वुठै मनु तनु परफड़ै सभु जगु हरिआ होइ ॥६१॥
वडड़ै झालि झलुंभलै नावड़ा लईऐ किसु ॥
नाउ लईऐ परमेसरै भंनण घड़ण समरथु ॥६२॥
हरहट भी तूं तूं करहि बोलहि भली बाणि ॥
साहिबु सदा हदूरि है किआ उची करहि पुकार ॥
जिनि जगतु उपाइ हरि रंगु कीआ तिसै विटहु कुरबाणु ॥
आपु छोडहि तां सहु मिलै सचा एहु वीचारु ॥
हउमै फिका बोलणा बुझि न सका कार ॥
वणु त्रिणु त्रिभवणु तुझै धिआइदा अनदिनु सदा विहाण ॥
बिनु सतिगुर किनै न पाइआ करि करि थके वीचार ॥
हिन्दी अर्थ: (हे पपीहे ! यह नाम-जल) सारी सृष्टि में बरसता रहता है (पर। इसकी) बूँद (उस मनुष्य के मुँह में ही) पड़ती है (जो) आत्मिक अडोलता में है (जो परमात्मा के) प्रेम में (लीन) है। हे भाई ! (प्रभू से ही। हरी नाम) जल से ही सारी सृष्टि पैदा होती है (तभी हरी-नाम) जल के बिना (किसी भी जीव की माया की) प्यास दूर नहीं होती। हे नानक ! जिस (मनुष्य) ने हरी-नाम-जल पी लिया। उसको (कभी माया की) भूख नहीं व्यापती। 55। हे पपीहे ! (हे आत्मिक जीवन देने वाली नाम बूँद के रसिए !) आत्मिक अडोलता में (टिक के) सदा-स्थिर प्रभू की सिफतसालाह के शबद में (जुड़ के)। (प्रभू के) प्यार में (टिक के)। तू (हरी का नाम) जपा कर। हे पपीहे ! (हरी-नाम-बूँद से पैदा होने वाला) हरेक आनंद मौजूद है (पर ये आनंद उसी जीव को प्राप्त होता है। जिसको) गुरू ने (ये) दिखा दिया है। हे भाई ! जो मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालते रहते हैं। उनको प्रीतम-प्रभू मिल जाता है। उनके अंदर (सिफतसालाह के बादल) झड़ी लगा के आ बसता है। उनके अंदर सहजे-सहजे अडोल आत्मिक जीवन वाले नाम-जल की बरखा होती रहती है (उनके अंदर से) माया की सारी तृष्णा माया की सारी भूख दूर हो जाती है। माया के मोह का सारा शोर उनके अंदर से समाप्त हो जाता है। उनकी जिंद प्रभू की जोति में मिली रहती है। हे नानक ! सदा-स्थिर हरी-नाम में लीन हो के भाग्यशाली जीव-सि्त्रयां आत्मिक आनंद में टिकी रहती हैं। 56। हे भाई ! सदा कायम रहने वाले मालिक प्रभू ने धुर दरगाह से (अपने) हुकम अनुसार (ही) प्रेरित कर के (इन्द्र देवते को। गुरू को सदा) भेजा है। (उसके हुकम में ही) मेहर कर के बादल (गुरू) खूब झड़ी लगा के बरखा करता है। जब पपीहा (आत्मिक जीवन देने वाली नाम-बूँद का रसिया) नाम-बूँद (अपने) मुँह में डालता है। तब उसके तन में आनंद पैदा होता है। (जैसे वर्षा से) धरती हरी-भरी हो जाती है। (उसमें) बहुत अन्न पैदा होता है (जैसे) गुरू के शबद में लीन हो के जगत हर वक्त परमात्मा की भगती करने लग जाता है। सदा कायम रहने वाला प्रभू खुद ही (गुरू की शरण पड़ी हुई दुनिया पर) बख्शिश करता है। मेहर करके अपना हुकम बरताता है। (हुकम लागू करता है)। हे जीव-स्त्री ! सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी में लीन हो के परमात्मा के गुण गाया कर। (प्रभू के) डर-अदब से पैदा हुई आत्मिक अडोलता को (अपने जीवन का) श्रंृगार बनाए रख। सदा-स्थिर हरी में सुरति जोड़ के टिके रहा कर। हे नानक ! जिसके मन में हरी नाम ही टिका रहता है। परमात्मा उसको दरगाह में लेखे से बचा लेता है। 57। हे आत्मिक जीवन देने वाली नाम बूँद के रसिए ! (गुरू को छोड़ के) तू (तीर्थ-यात्रा आदि की खातिर) सारी धरती पर रटन करता फिरे। अगर तू (मानसिक शक्तियों की मदद से) उड़ के आकाश में भी जा पहुँचे (तो भी इस तरह माया की तृष्णा की भूख नहीं मिटती। सिर्फ नाम-जल से ही माया की) भूख-प्यास मिटती है (और वह नाम-) जल गुरू के मिलने पर (ही) प्राप्त होता है। हे भाई ! ये जिंद ये शरीर सब कुछ उस (परमात्मा) का ही दिया हुआ है। हरेक दाति उस के ही वश में है। (जीवों के) बोले बिना ही (हरेक जीव की) हरेक जरूरत वह जानता है। (उसको छोड़ के) और किस के आगे अरदास की जा सकती है। हे नानक ! हरेक शरीर में वह परमात्मा स्वयं ही मौजूद है। (गुरू के) शबद द्वारा (हरेक जीव के अंदर आत्मिक जीवन की) रौशनी (वह खुद ही) करता है। 58। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (हरी नाम में) लीन रहता है उसके अंदर आत्मिक खिलाव की ऋतु बनी रहती है (जब मनुष्य के अंदर) परमात्मा आ बसता है। उसका तन उसका मन (आत्मिक आनंद से) खिल उठता है (जैसे बसंत ऋतु आने पर) सारा जगत हरा-भरा हो जाता है। । 59। हे नानक ! जिस (परमात्मा) ने हरेक जीव पैदा किया है (जिस मनुष्य को उसका) नाम (गुरू के) शबद से (कभी) नहीं भूलता। उसके अंदर सदा के लिए (ऐसी) खिलने की ऋतु बन जाती है जिसकी बरकति से उसका मन आनंद-भरपूर हो जाता है। 60। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर जिन मनुष्यों के मन में वह (परमात्मा) आ बसता है। उनके अंदर आत्मिक खिलाव का समय बना रहता है। हे भाई ! (जैसे बसंत ऋतु में) सारा जगत हरा-भरा हो जाता है (वैसे ही। जिस मनुष्य के अंदर) परमात्मा आ बसता है (उसका) मन (उसका) तन खिल उठता है। 61। हे भाई सुबह प्रभात के वक्त (उठ के) किस का सुंदर नाम लेना चाहिए। उस परमेश्वर का नाम लेना चाहिए है जो (जीवों को) पैदा करने व नाश करने की समर्थता वाला है। 62। (इस तरह तो) रहट भी (चलते कूँए की आवाज निकालते इस तरह लगते हैं कि) ‘तूं तूं’ कर रहे हैं। और मीठी सुर में आवाज़ निकालते हैं (पर। वह भगती तो नहीं कर रहे)। हे भाई ! मालिक-प्रभू तो सदा तेरे साथ बसता है (उस अंदर बसते प्रभू को भुला के बाहर लोक-दिखावे के लिए) तू क्यों ऊँची-ऊँची पुकारता (फिरता) है। हे भाई ! जिस हरी ने यह जगत पैदा करके यह खेल तमाशा बनाया है। उससे सदके हुआ कर। सदा कायम रहने वाला विचार यह है कि अगर तू (अपने अंदर से) स्वै भाव छोड़ देगा। तो तुझे परमात्मा मिल जाएगा। हे भाई ! अहम्-अहंकार के आसरे (तूं तूं) बोलता (भी) फीका रहता है (आत्मिक जीवन के हिलौरे पैदा नहीं कर सकता)। (अगर मैं हमेशा अहंकार के आसरे ही। अहम् में रह कर ही ‘तूं तूं’ बोलता रहा। तो) मैं (परमात्मा के साथ मिल सकने वाला) करतब नहीं समझ सकता। हे प्रभू ! जंगल। (जंगल के) घास (से लेकर)। सारा जगत तुझे ही सिमर रहा है। हरेक दिन सदा सारा समय (तेरी ही याद में) बीत रहा है। पर (अनेकों ही पंडित लोग) सोचें-विचारें करके थकते चले आ रहे हैं। गुरू की शरण पड़े बिना किसी ने तेरा मिलाप प्राप्त नहीं किया।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1420 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Faridabad-Delhi border के पास सर्दियों की धुंध में सुबह का सूरज।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1420” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1421 →, पीछे का: ← अंग 1419।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।