राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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नानक की प्रभ बेनती हरि भावै बखसि मिलाइ ॥४१॥ मन आवण जाणु न सुझई ना सुझै दरबारु ॥ माइआ मोहि पलेटिआ अंतरि अगिआनु गुबारु ॥ तब नरु सुता जागिआ सिरि डंडु लगा बहु भारु ॥ गुरमुखां करां उपरि हरि चेतिआ से पाइनि मोख दुआरु ॥ नानक आपि ओहि उधरे सभ कुटंब तरे परवार ॥४२॥ सबदि मरै सो मुआ जापै ॥ गुर परसादी हरि रसि ध्रापै ॥ हरि दरगहि गुर सबदि सिञापै ॥ बिनु सबदै मुआ है सभु कोइ ॥ मनमुखु मुआ अपुना जनमु खोइ ॥ हरि नामु न चेतहि अंति दुखु रोइ ॥ नानक करता करे सु होइ ॥४३॥ गुरमुखि बुढे कदे नाही जिन॑ा अंतरि सुरति गिआनु ॥ सदा सदा हरि गुण रवहि अंतरि सहज धिआनु ॥ ओइ सदा अनंदि बिबेक रहहि दुखि सुखि एक समानि ॥ तिना नदरी इको आइआ सभु आतम रामु पछानु ॥४४॥ मनमुखु बालकु बिरधि समानि है जिन॑ा अंतरि हरि सुरति नाही ॥ विचि हउमै करम कमावदे सभ धरम राइ कै जांही ॥ गुरमुखि हछे निरमले गुर कै सबदि सुभाइ ॥ ओना मैलु पतंगु न लगई जि चलनि सतिगुर भाइ ॥ मनमुख जूठि न उतरै जे सउ धोवण पाइ ॥ नानक गुरमुखि मेलिअनु गुर कै अंकि समाइ ॥४५॥ बुरा करे सु केहा सिझै ॥ आपणै रोहि आपे ही दझै ॥ मनमुखि कमला रगड़ै लुझै ॥ गुरमुखि होइ तिसु सभ किछु सुझै ॥ नानक गुरमुखि मन सिउ लुझै ॥४६॥ जिना सतिगुरु पुरखु न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥ ओइ माणस जूनि न आखीअनि पसू ढोर गावार ॥ ओना अंतरि गिआनु न धिआनु है हरि सउ प्रीति न पिआरु ॥ मनमुख मुए विकार महि मरि जंमहि वारो वार ॥ जीवदिआ नो मिलै सु जीवदे हरि जगजीवन उर धारि ॥ नानक गुरमुखि सोहणे तितु सचै दरबारि ॥४७॥ हरि मंदरु हरि साजिआ हरि वसै जिसु नालि ॥ गुरमती हरि पाइआ माइआ मोह परजालि ॥ हरि मंदरि वसतु अनेक है नव निधि नामु समालि ॥ धनु भगवंती नानका जिना गुरमुखि लधा हरि भालि ॥ वडभागी गड़ मंदरु खोजिआ हरि हिरदै पाइआ नालि ॥४८॥ मनमुख दह दिसि फिरि रहे अति तिसना लोभ विकार ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! हे हरी ! (आपके दास) नानक की (आपके दर पर) विनती है कि जैसे हैं सके मेहर कर के (जीवों को अपने चरणों में) जोड़। 41। हे मन ! (आपको) जनम मरण का चक्कर नहीं सूझता (आपको ये ख्याल ही नहीं आता कि जनम-मरण के चक्कर में पड़ना पड़ेगा)। (आपको) प्रभू की हजूरी याद नहीं आती। तु (सदा) माया के मोह में फसा रहता है। आपके अंदर आत्मिक जीवन के प्रति बेसमझी है। आत्मिक जीवन के प्रति घोर अंधकार है। हे भाई ! (माया के मोह की) नींद में पड़ा हुआ मनुष्य तब (ही) होश करता है जब (इसके) सिर पर (धर्मराज का) तगड़ा करारा डंडा पड़ता है (मौत आ दबोचती है)। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य हर वक्त परमात्मा को सिमरते रहते हैं। उस माया के मोह से खलासी का रास्ता तलाश लेते हैं। वे खुद (भी विकारों में गलने से) बच जाते हैं। उनके परिवार-कुटंब के सारे साथी भी (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। 42। हे भाई ! गुरू के शबद से (मनुष्य विकारों के प्रति) मर जाता है (उस पर विकार अपना असर नहीं कर पाते) (और विकारों के प्रति) मरा हुआ मनुष्य (जगत में) शोभा कमाता है। गुरू की किरपा से हरी-नाम-रस से (मनुष्य माया की तृष्णा के प्रति) तृप्त रहता है। गुरू के शबद की बरकति से (मनुष्य) परमात्मा की हजूरी में (भी) सम्मान प्राप्त करता है। हे भाई ! गुरू के शबद के बिना हरेक जीव आत्मिक मौत मरा रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य अपना मानस-जीवन व्यर्थ गवा के आत्मिक मौत सहेड़ी रखता है। जो मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरते। वे (जिंदगी के) आखिर तक (अपना कोई ना कोई) दुख (ही) रोते रहते हैं। (पर। जीवों के भी क्या वश।) हे नानक ! (जीवों के पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार जीव के लिए) परमात्मा जो कुछ करता है। वही होता है। 43। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले जिन मनुष्यों के अंदर प्रभू-चरणों की लगन टिकी रहती है। आत्मिक जीवन की सूझ टिकी रहती है। वह मनुष्य (आत्मिक जीवन में) कभी कमजोर नहीं होते। वे सदा ही परमात्मा केगुण याद करते रहते हैं। उनके अंदर आत्मिक अडोलता की समाधि बनी रहती है। वे मनुष्य (अच्छे बुरे काम की) परख के आनंद में सदा मगन रहते हैं। (हरेक) दुख में (हर एक) सुख में वे सदा अडोल चित्त रहते हैं। उनको हर जगह सिर्फ सर्व-व्यापक परमात्मा साथी ही बसता दिखता है। 44। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य नरोए शारीरिक अंगों (जवान) वाला होता हुआ भी (आत्मिक जीवन में) बुढ़े मनुष्य जैसा कमजोर होता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों के अंदर परमात्मा की लगन नहीं होती। वह मनुष्य (धार्मिक) कर्म (भी) अहंकार में (रह के ही) करते हैं। वे सारे धर्मराज के वश पड़ते हैं। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (प्रभू के) प्यार में टिक के सच्चे पवित्र जीवन वाले होते हैं। जो मनुष्य गुरू के अनुसार रह के जीवन चाल चलते हैं। उनको (विकारों की) रत्ती भर भी मैल नहीं लगती। पर। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की (विकारों की) झूठ (उसके मन से) कभी नहीं उतरती। चाहे वह सौ बार (उसको) धोने का यतन करता रहे। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों को गुरू की गोद में लीन कर के परमात्मा ने (स्वयं अपने चरणों में) मिलाया होता है। 45। हे भाई ! जो मनुष्य (माया आदि की खातिर किसी और के साथ) कोई बुराई कमाता है। वह जिंदगी में कामयाब नहीं समझा जा सकता। वह स्वयं भी क्रोध की ज्वाला में जलता रहता है। (उलझने के कारण) वह मनुष्य अपने ही गुस्से (की आग) में (माया की खातिर) पागल हुआ फिरता है। (दुनिया के) झगड़े-झमेले में (औरों के साथ) उलझता रहता है। (पर) गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (आत्मिक जीवन के) हरेक भेद को समझता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़े रहने वाला मनुष्य (अपने) मन से मुकाबला करता रहता है। 46। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू महापुरुख की शरण नहीं पकड़ी। जिन्होंने शबद में अपना मन नहीं जोड़ा। वे लोग मानस जून में आए हुए नहीं कहे जा सकते। वे तो पशु हैं। वे तो मरे हुए जानवर हैं। वे महा-मूर्ख हैं। उन मनुष्यों के अंदर आत्मिक जीवन की सूझ नहीं। उनके अंदर प्रभू-चरणों की लगन नहीं। प्रभू से उनका प्रेम-प्यार नहीं। अपने मन के पीछे चलने वाले वे मनुष्य विकारों में ही आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं वे बार-बार जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। हे भाई ! जो जो मनुष्य आत्मिक जीवन वाले मनुष्यों को मिलते हैं वे सारे ही जगत के जीवन हरी को हृदय में बसा के आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य उस सदा स्थिर (ईश्वरीय) दरबार में शोभा कमाते हैं। 47। हे भाई ! (मनुष्य का ये शरीर-) हरी-मन्दिर परमात्मा ने (खुद) बनाया है। इस शरीर-हरी मंदिर में परमात्मा स्वयं बसता है। (पर) गुरू की मति पर चल कर (अंदर से) माया का मोह अच्छी तरह जला के (ही। किसी भाग्यशाली के अंदर बसता) परमात्मा मिला है। हे भाई ! परमात्मा का नाम। मानो। नौ खजाने हैं (इसको हृदय में) संभाल के रख (अगर हरी-नाम संभाला जाए। तो) इस शरीर हरी मन्दिर में अनेकों ही उत्तम कीमती गुण (मिल जाते) हैं। हे नानक ! साबाश है उन भाग्यशालियों को। जिन्होंने गुरू की शरण पड़ कर (इस शरीर हरिमन्दिर में बसता) परमात्मा खोज के पा लिया है। जिन बड़े भाग्यशालियों ने इस शरीर किले को शरीर मन्दिर को खोजा। दिल में ही अपने साथ बसता परमात्मा पा लिया। 48। हे भाई ! माया की भारी तृष्णा। माया का लालच और अनेकों विकारों में फस के अपने मन के मुरीद मनुष्य दसों दिशाओं में भटकते फिरते हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “हे प्रभू ! हे हरी ! (आपके दास) नानक की (आपके दर पर) विनती है कि जैसे हैं सके मेहर कर के (जीवों को अपने चरणों में) जोड़।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।