अंग 1417

अंग
1417
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਕ ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਮਨੁ ਮਾਨੀਐ ਸਾਚੇ ਸਾਚੀ ਸੋਇ ॥੩੩॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਦੁਖੁ ਸਾਗਰੁ ਹੈ ਬਿਖੁ ਦੁਤਰੁ ਤਰਿਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਮੇਰਾ ਮੇਰਾ ਕਰਦੇ ਪਚਿ ਮੁਏ ਹਉਮੈ ਕਰਤ ਵਿਹਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖਾ ਉਰਵਾਰੁ ਨ ਪਾਰੁ ਹੈ ਅਧ ਵਿਚਿ ਰਹੇ ਲਪਟਾਇ ॥
ਜੋ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਕਮਾਵਣਾ ਕਰਣਾ ਕਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਗਿਆਨੁ ਰਤਨੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਭੁ ਦੇਖਿਆ ਬ੍ਰਹਮੁ ਸੁਭਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬੋਹਿਥੈ ਵਡਭਾਗੀ ਚੜੈ ਤੇ ਭਉਜਲਿ ਪਾਰਿ ਲੰਘਾਇ ॥੩੪॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਦਾਤਾ ਕੋ ਨਹੀ ਜੋ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੇਇ ਆਧਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਨਾਉ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਦਾ ਰਹੈ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥
ਤਿਸਨਾ ਬੁਝੈ ਤਿਪਤਿ ਹੋਇ ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਇ ਪਿਆਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਅਪਨੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ॥੩੫॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਜਗਤੁ ਬਰਲਿਆ ਕਹਣਾ ਕਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥
ਹਰਿ ਰਖੇ ਸੇ ਉਬਰੇ ਸਬਦਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਰਤਾ ਸਭ ਕਿਛੁ ਜਾਣਦਾ ਜਿਨਿ ਰਖੀ ਬਣਤ ਬਣਾਇ ॥੩੬॥
ਹੋਮ ਜਗ ਸਭਿ ਤੀਰਥਾ ਪੜਿੑ ਪੰਡਿਤ ਥਕੇ ਪੁਰਾਣ ॥
ਬਿਖੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਨ ਮਿਟਈ ਵਿਚਿ ਹਉਮੈ ਆਵਣੁ ਜਾਣੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਮਿਲਿਐ ਮਲੁ ਉਤਰੀ ਹਰਿ ਜਪਿਆ ਪੁਰਖੁ ਸੁਜਾਣੁ ॥
ਜਿਨਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੇਵਿਆ ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥੩੭॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਬਹੁ ਚਿਤਵਦੇ ਬਹੁ ਆਸਾ ਲੋਭੁ ਵਿਕਾਰ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਅਸਥਿਰੁ ਨਾ ਥੀਐ ਮਰਿ ਬਿਨਸਿ ਜਾਇ ਖਿਨ ਵਾਰ ॥
ਵਡ ਭਾਗੁ ਹੋਵੈ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਹਉਮੈ ਤਜੈ ਵਿਕਾਰ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮਾ ਜਪਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰ ॥੩੮॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਵਈ ਨਾਮਿ ਨ ਲਗੈ ਪਿਆਰੁ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਅਰਾਧਿਆ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥੩੯॥
ਲੋਭੀ ਕਾ ਵੇਸਾਹੁ ਨ ਕੀਜੈ ਜੇ ਕਾ ਪਾਰਿ ਵਸਾਇ ॥
ਅੰਤਿ ਕਾਲਿ ਤਿਥੈ ਧੁਹੈ ਜਿਥੈ ਹਥੁ ਨ ਪਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖ ਸੇਤੀ ਸੰਗੁ ਕਰੇ ਮੁਹਿ ਕਾਲਖ ਦਾਗੁ ਲਗਾਇ ॥
ਮੁਹ ਕਾਲੇ ਤਿਨੑ ਲੋਭੀਆਂ ਜਾਸਨਿ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਮੇਲਿ ਪ੍ਰਭ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥
ਜਨਮ ਮਰਨ ਕੀ ਮਲੁ ਉਤਰੈ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥੪੦॥
ਧੁਰਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭਿ ਕਰਤੈ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਮੇਟਣਾ ਨ ਜਾਇ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਦਾ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਿ ਕਰੇ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਚੁਗਲ ਨਿੰਦਕ ਭੁਖੇ ਰੁਲਿ ਮੁਏ ਏਨਾ ਹਥੁ ਨ ਕਿਥਾਊ ਪਾਇ ॥
ਬਾਹਰਿ ਪਾਖੰਡ ਸਭ ਕਰਮ ਕਰਹਿ ਮਨਿ ਹਿਰਦੈ ਕਪਟੁ ਕਮਾਇ ॥
ਖੇਤਿ ਸਰੀਰਿ ਜੋ ਬੀਜੀਐ ਸੋ ਅੰਤਿ ਖਲੋਆ ਆਇ ॥
नानक सबदि मरै मनु मानीऐ साचे साची सोइ ॥३३॥
माइआ मोहु दुखु सागरु है बिखु दुतरु तरिआ न जाइ ॥
मेरा मेरा करदे पचि मुए हउमै करत विहाइ ॥
मनमुखा उरवारु न पारु है अध विचि रहे लपटाइ ॥
जो धुरि लिखिआ सु कमावणा करणा कछू न जाइ ॥
गुरमती गिआनु रतनु मनि वसै सभु देखिआ ब्रहमु सुभाइ ॥
नानक सतिगुरि बोहिथै वडभागी चड़ै ते भउजलि पारि लंघाइ ॥३४॥
बिनु सतिगुर दाता को नही जो हरि नामु देइ आधारु ॥
गुर किरपा ते नाउ मनि वसै सदा रहै उरि धारि ॥
तिसना बुझै तिपति होइ हरि कै नाइ पिआरि ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ हरि अपनी किरपा धारि ॥३५॥
बिनु सबदै जगतु बरलिआ कहणा कछू न जाइ ॥
हरि रखे से उबरे सबदि रहे लिव लाइ ॥
नानक करता सभ किछु जाणदा जिनि रखी बणत बणाइ ॥३६॥
होम जग सभि तीरथा पड़ि॑ पंडित थके पुराण ॥
बिखु माइआ मोहु न मिटई विचि हउमै आवणु जाणु ॥
सतिगुर मिलिऐ मलु उतरी हरि जपिआ पुरखु सुजाणु ॥
जिना हरि हरि प्रभु सेविआ जन नानकु सद कुरबाणु ॥३७॥
माइआ मोहु बहु चितवदे बहु आसा लोभु विकार ॥
मनमुखि असथिरु ना थीऐ मरि बिनसि जाइ खिन वार ॥
वड भागु होवै सतिगुरु मिलै हउमै तजै विकार ॥
हरि नामा जपि सुखु पाइआ जन नानक सबदु वीचार ॥३८॥
बिनु सतिगुर भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥
जन नानक नामु अराधिआ गुर कै हेति पिआरि ॥३९॥
लोभी का वेसाहु न कीजै जे का पारि वसाइ ॥
अंति कालि तिथै धुहै जिथै हथु न पाइ ॥
मनमुख सेती संगु करे मुहि कालख दागु लगाइ ॥
मुह काले तिन॑ लोभीआं जासनि जनमु गवाइ ॥
सतसंगति हरि मेलि प्रभ हरि नामु वसै मनि आइ ॥
जनम मरन की मलु उतरै जन नानक हरि गुन गाइ ॥४०॥
धुरि हरि प्रभि करतै लिखिआ सु मेटणा न जाइ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा प्रतिपालि करे हरि राइ ॥
चुगल निंदक भुखे रुलि मुए एना हथु न किथाऊ पाइ ॥
बाहरि पाखंड सभ करम करहि मनि हिरदै कपटु कमाइ ॥
खेति सरीरि जो बीजीऐ सो अंति खलोआ आइ ॥

हिन्दी अर्थ: (पर यह ‘गुर की पउड़ी’ परमात्मा की) मेहर से ही मिलती है। हे नानक ! (जो मनुष्य गुरू के) शबद से (विकारों से) मरता है। उसका मन (परमात्मा की याद में) गिझ जात है। सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहने से उसको सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है। 33। हे भाई ! माया का मोह (मनुष्य की जिंद के लिए) दुख (का मूल) है। (मानो। दुखों का) समुंद्र है। आत्मिक मौत लाने वाला जहर (-भरा समुंद्र) है। इसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है। पार नहीं लांघा जा सकता। मेरा (धन)। मेरा (धन)’ कहते (जीव तृष्णा की आग में) जल-जल के आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं। ‘हउ हउ’ करते (जीवों की उम्र) गुजरती है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों को (मोह के समुंद्र का) ना इस पार का किनारा मिलता है ना उस पार का। (इस समुंद्र के) आधे में ही (गोते खाते मोह से) चिपके रहते हैं। पर जीव भी क्या करें। (पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार) धुर दरगाह से जो लेख (जीव के माथे पर) लिखा जाता है। वह लेख कमाना ही पड़ता है (अपनी अकल के आसरे उस लेख से बचने के लिए) कोई उद्यम नहीं किया जा सकता। गुरू की मति पर चल कर (जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा की बड़ी गहरी सांझ (का) रतन आ बसता है। प्रभू-प्रेम से वह मनुष्य सारी लुकाई में प्रभू को ही देखता है। हे नानक ! बड़े भाग्यों से ही (कोई मनुष्य) गुरू-जहाज़ में सवार होता है (और। जो मनुष्य गुरू-जहाज में चढ़ते हैं। गुरू के बताए राह पर चलते हैं) उनको संसार-समुंद्र में (डूबतों को गुरू) पार लंघा लेता है। 34। हे भाई ! गुरू के बिना (परमात्मा के नाम की) दाति देने वाला और कोई नहीं। वह गुरू ही परमात्मा का नाम (जिंद के लिए) आसरा देता है। गुरू की कृपा से परमात्मा का नाम (मनुष्य के) मन में आ बसता है। (मनुष्य हरी-नाम को अपने) हृदय में बसाए रखता है। हरी-नाम से। हरी के प्यार से (मनुष्य के अंदर से) तृष्णा (की आग) बुझ जाती है। (मनुष्य के अंदर माया के प्रति) तृप्ति हो जाती है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ने से (परमात्मा का नाम) प्रप्त हो जाता है। (गुरू की शरण पड़ने से) परमात्मा (सेवक पर) अपनी मेहर करता है। 35। हे भाई ! गुरू के शबद से वंचित रह के जगत (माया के पीछे) झल्ला हुआ फिरता है। किसी की कोई पेश नहीं जाती। जिन की रक्षा परमात्मा ने खुद की। वह (माया के असर से) बच गए। वह मनुष्य गुरू के शबद में सुरति जोड़ी रखते हैं। हे नानक ! जिस (करतार) ने यह सारी मर्यादा कायम कर रखी है। वह ही इस सारे भेद को जानता है। 36। हे भाई ! पंडित लोग हवन कर के। यज्ञ करके। सारे तीर्थ स्नान कर के। पुराण (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़ के थक जाते हैं। (पर। फिर भी) आत्मिक मौत लाने वाली माया-जहर का मोह (उनके अंदर से) नहीं मिटता। अहंकार में (फसे रहने के कारण उनका) जनम-मरण (का चक्कर बना रहता है)। पर। हे भाई ! अगर गुरू मिल जाए (तो गुरू की शरण पड़ कर जिस मनुष्य ने) अंतरजामी अकाल-पुरख का नाम जपा (उसके अंदर से विकारों की) मैल उतर गई। दास नानक उन मनुष्यों से सदा सदके जाता है। जिन्होंने सदा परमात्मा की सेवा-भगती की। 37। हे भाई ! (अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य) सदा माया का मोह ही चेते करते रहते हैं। अनेकों आशाएं बनाए रहते हैं। लोभ चितवते हैं। विकार चितवते रहते हैं। (इसीलिए) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (कभी) अडोल-चित्त नहीं होता। वह हर वक्त आत्मिक मौत मरता रहता है। जिस मनुष्य के भाग्य जाग उठें। उसको गुरू मिल जाता है। वह मनुष्य अहंकार त्याग देता है। विकार छोड़ देता है। हे नानक ! जो मनुष्य ने गुरू के शबद को (अपनी) सोच का केन्द्र (धुरा) बना लिया। वह परमात्मा का नाम जप के आत्मिक आनंद भोगने लग पड़ा। 38। हे भाई ! गुरू (की शरण पड़े) बिना (परमात्मा की) भगती नहीं हो सकती। (परमात्मा के) नाम में प्यार नहीं बन सकता। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू के प्रेम-प्यार में (रह के ही परमात्मा का नाम) सिमरा जा सकता है। 39। हे भाई ! जहाँ तक हो सके। किसी लालची मनुष्य का ऐतबार नहीं करना चाहिए। (लालची मनुष्य) आखिर उस जगह पर धोखा दे जाता है। जहाँ कोई मदद ना कर सके। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के साथ (जो मनुष्य) साथ बनाए रखता है। (वह भी) (अपने) मुँह पर (बदनामी की) कालिख लगाता है (बदनामी का) दाग़ लगाता है। उन लालची मनुष्यों के मुँह (बदनामी की कालिख से) काले हुए रहते हैं। वे मनुष्य-जनम व्यर्थ गवा के (जगत से) जाते हैं। हे प्रभू ! (अपनी) साध-संगति में मिलाए रख (साध-संगति में रहने से ही) हरी-नाम-धन मन में बस सकता है। और। हे नानक ! परमात्मा के गुण गा-गा के जनम-मरण के विकारों की मैल (मन में से) उतर जाती है। 40। हे भाई ! (जीव के पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार) करतार हरी प्रभू ने धुर-दरगाह से (जीव के माथे पर) जो लेख लिख दिए। वह लेख (किसी जीव से अपने उद्यम से) मिटाया नहीं जा सकता (क्योंकि हरेक जीव की यह) जिंद यह शरीर उस (परमात्मा) का दिया हुआ है जो प्रभू-पातशाह (सबकी) पालना भी करता है (उस दातार प्रभू को भुला के) चुगली-निंदा करने वाले मनुष्य माया की तृष्णा में फसे रह के दुखी रह के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं (इस बुरी दशा में से निकलने के लिए) कहीं भी उनका हाथ नहीं पड़ सकता (उसकी कोई पेश नहीं चल सकती)। (ऐसे मनुष्य अपने मन में) दिल में खोट कमा के बाहर (लोगों को दिखाने के लिए) दिखावे के धार्मिक कर्म करते रहते हैं। (ये कुदरती नियम है कि) इस शरीर-खेत में जो भी (अच्छा-बुरा) करम बीजा जाता है। वह जरूर प्रकट हो जाता है।

संदर्भ: यह अंग 1417 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

India Gate के लॉन में Sunday शाम की family-picnic।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1417” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1418 →, पीछे का: ← अंग 1416

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।