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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1417 · वारों से अतिरिक्त सलोक

अंग
1417
वारों से अतिरिक्त सलोक
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  1. नानक सबदि मरै मनु मानीऐ साचे साची सोइ ॥33॥

गुरु अमर दास जी · सलोक

नानक सबदि मरै मनु मानीऐ साचे साची सोइ ॥33॥

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नानक सबदि मरै मनु मानीऐ साचे साची सोइ ॥33॥
माइआ मोहु दुखु सागरु है बिखु दुतरु तरिआ न जाइ ॥
मेरा मेरा करदे पचि मुए हउमै करत विहाइ ॥
मनमुखा उरवारु न पारु है अध विचि रहे लपटाइ ॥
जो धुरि लिखिआ सु कमावणा करणा कछू न जाइ ॥
गुरमती गिआनु रतनु मनि वसै सभु देखिआ ब्रहमु सुभाइ ॥
नानक सतिगुरि बोहिथै वडभागी चड़ै ते भउजलि पारि लंघाइ ॥34॥
बिनु सतिगुर दाता को नही जो हरि नामु देइ आधारु ॥
गुर किरपा ते नाउ मनि वसै सदा रहै उरि धारि ॥
तिसना बुझै तिपति होइ हरि कै नाइ पिआरि ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ हरि अपनी किरपा धारि ॥35॥
बिनु सबदै जगतु बरलिआ कहणा कछू न जाइ ॥
हरि रखे से उबरे सबदि रहे लिव लाइ ॥
नानक करता सभ किछु जाणदा जिनि रखी बणत बणाइ ॥36॥
होम जग सभि तीरथा पड़ि॑ पंडित थके पुराण ॥
बिखु माइआ मोहु न मिटई विचि हउमै आवणु जाणु ॥
सतिगुर मिलिऐ मलु उतरी हरि जपिआ पुरखु सुजाणु ॥
जिना हरि हरि प्रभु सेविआ जन नानकु सद कुरबाणु ॥37॥
माइआ मोहु बहु चितवदे बहु आसा लोभु विकार ॥
मनमुखि असथिरु ना थीऐ मरि बिनसि जाइ खिन वार ॥
वड भागु होवै सतिगुरु मिलै हउमै तजै विकार ॥
हरि नामा जपि सुखु पाइआ जन नानक सबदु वीचार ॥38॥
बिनु सतिगुर भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥
जन नानक नामु अराधिआ गुर कै हेति पिआरि ॥39॥
लोभी का वेसाहु न कीजै जे का पारि वसाइ ॥
अंति कालि तिथै धुहै जिथै हथु न पाइ ॥
मनमुख सेती संगु करे मुहि कालख दागु लगाइ ॥
मुह काले तिन॑ लोभीआं जासनि जनमु गवाइ ॥
सतसंगति हरि मेलि प्रभ हरि नामु वसै मनि आइ ॥
जनम मरन की मलु उतरै जन नानक हरि गुन गाइ ॥40॥
धुरि हरि प्रभि करतै लिखिआ सु मेटणा न जाइ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा प्रतिपालि करे हरि राइ ॥
चुगल निंदक भुखे रुलि मुए एना हथु न किथाऊ पाइ ॥
बाहरि पाखंड सभ करम करहि मनि हिरदै कपटु कमाइ ॥
खेति सरीरि जो बीजीऐ सो अंति खलोआ आइ ॥

हिन्दी अर्थ: (पर यह 'गुर की पउड़ी' परमात्मा की) मेहर से ही मिलती है। हे नानक! (जो मनुष्य गुरू के) शबद से (विकारों से) मरता है। उसका मन (परमात्मा की याद में) गिझ जात है। सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहने से उसको सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है। 33। हे भाई! माया का मोह (मनुष्य की जिंद के लिए) दुख (का मूल) है। (मानो, दुखों का) समुंद्र है। आत्मिक मौत लाने वाला जहर (-भरा समुंद्र) है। इसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है। पार नहीं लांघा जा सकता। मेरा (धन)। मेरा (धन)' कहते (जीव तृष्णा की आग में) जल-जल के आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं। 'हउ हउ' करते (जीवों की उम्र) गुजरती है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों को (मोह के समुंद्र का) ना इस पार का किनारा मिलता है ना उस पार का। (इस समुंद्र के) आधे में ही (गोते खाते मोह से) चिपके रहते हैं। पर जीव भी क्या करें। (पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार) धुर दरगाह से जो लेख (जीव के माथे पर) लिखा जाता है। वह लेख कमाना ही पड़ता है (अपनी अकल के आसरे उस लेख से बचने के लिए) कोई उद्यम नहीं किया जा सकता। गुरू की मति पर चल कर (जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा की बड़ी गहरी सांझ (का) रतन आ बसता है। प्रभू-प्रेम से वह मनुष्य सारी लुकाई में प्रभू को ही देखता है। हे नानक! बड़े भाग्यों से ही (कोई मनुष्य) गुरू-जहाज़ में सवार होता है (और, जो मनुष्य गुरू-जहाज में चढ़ते हैं। गुरू के बताए राह पर चलते हैं) उनको संसार-समुंद्र में (डूबतों को गुरू) पार लंघा लेता है। 34। हे भाई! गुरू के बिना (परमात्मा के नाम की) दाति देने वाला और कोई नहीं। वह गुरू ही परमात्मा का नाम (जिंद के लिए) आसरा देता है। गुरू की कृपा से परमात्मा का नाम (मनुष्य के) मन में आ बसता है। (मनुष्य हरी-नाम को अपने) हृदय में बसाए रखता है। हरी-नाम से। हरी के प्यार से (मनुष्य के अंदर से) तृष्णा (की आग) बुझ जाती है। (मनुष्य के अंदर माया के प्रति) तृप्ति हो जाती है। हे नानक! गुरू की शरण पड़ने से (परमात्मा का नाम) प्रप्त हो जाता है। (गुरू की शरण पड़ने से) परमात्मा (सेवक पर) अपनी मेहर करता है। 35। हे भाई! गुरू के शबद से वंचित रह के जगत (माया के पीछे) झल्ला हुआ फिरता है। किसी की कोई पेश नहीं जाती। जिन की रक्षा परमात्मा ने खुद की। वह (माया के असर से) बच गए। वह मनुष्य गुरू के शबद में सुरति जोड़ी रखते हैं। हे नानक! जिस (करतार) ने यह सारी मर्यादा कायम कर रखी है। वह ही इस सारे भेद को जानता है। 36। हे भाई! पंडित लोग हवन कर के, यज्ञ करके, सारे तीर्थ स्नान कर के, पुराण (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़ के थक जाते हैं। (पर, फिर भी) आत्मिक मौत लाने वाली माया-जहर का मोह (उनके अंदर से) नहीं मिटता। अहंकार में (फसे रहने के कारण उनका) जनम-मरण (का चक्कर बना रहता है)। पर, हे भाई! अगर गुरू मिल जाए (तो गुरू की शरण पड़ कर जिस मनुष्य ने) अंतरजामी अकाल-पुरख का नाम जपा (उसके अंदर से विकारों की) मैल उतर गई। दास नानक उन मनुष्यों से सदा सदके जाता है। जिन्होंने सदा परमात्मा की सेवा-भगती की। 37। हे भाई! (अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य) सदा माया का मोह ही चेते करते रहते हैं। अनेकों आशाएं बनाए रहते हैं। लोभ चितवते हैं। विकार चितवते रहते हैं। (इसीलिए) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (कभी) अडोल-चित्त नहीं होता। वह हर वक्त आत्मिक मौत मरता रहता है। जिस मनुष्य के भाग्य जाग उठें। उसको गुरू मिल जाता है। वह मनुष्य अहंकार त्याग देता है। विकार छोड़ देता है। हे नानक! जो मनुष्य ने गुरू के शबद को (अपनी) सोच का केन्द्र (धुरा) बना लिया। वह परमात्मा का नाम जप के आत्मिक आनंद भोगने लग पड़ा। 38। हे भाई! गुरू (की शरण पड़े) बिना (परमात्मा की) भगती नहीं हो सकती। (परमात्मा के) नाम में प्यार नहीं बन सकता। हे दास नानक! (कहें: हे भाई!) गुरू के प्रेम-प्यार में (रह के ही परमात्मा का नाम) सिमरा जा सकता है। 39। हे भाई! जहाँ तक हो सके। किसी लालची मनुष्य का ऐतबार नहीं करना चाहिए। (लालची मनुष्य) आखिर उस जगह पर धोखा दे जाता है। जहाँ कोई मदद ना कर सके। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के साथ (जो मनुष्य) साथ बनाए रखता है। (वह भी) (अपने) मुँह पर (बदनामी की) कालिख लगाता है (बदनामी का) दाग़ लगाता है। उन लालची मनुष्यों के मुँह (बदनामी की कालिख से) काले हुए रहते हैं। वे मनुष्य-जनम व्यर्थ गवा के (जगत से) जाते हैं। हे प्रभू! (अपनी) साध-संगति में मिलाए रखें (साध-संगति में रहने से ही) हरी-नाम-धन मन में बस सकता है। और, हे नानक! परमात्मा के गुण गा-गा के जनम-मरण के विकारों की मैल (मन में से) उतर जाती है। 40। हे भाई! (जीव के पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार) करतार हरी प्रभू ने धुर-दरगाह से (जीव के माथे पर) जो लेख लिख दिए। वह लेख (किसी जीव से अपने उद्यम से) मिटाया नहीं जा सकता (क्योंकि हरेक जीव की यह) जिंद यह शरीर उस (परमात्मा) का दिया हुआ है जो प्रभू-पातशाह (सबकी) पालना भी करता है (उस दातार प्रभू को भुला के) चुगली-निंदा करने वाले मनुष्य माया की तृष्णा में फसे रह के दुखी रह के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं (इस बुरी दशा में से निकलने के लिए) कहीं भी उनका हाथ नहीं पड़ सकता (उसकी कोई पेश नहीं चल सकती)। (ऐसे मनुष्य अपने मन में) दिल में खोट कमा के बाहर (लोगों को दिखाने के लिए) दिखावे के धार्मिक कर्म करते रहते हैं। (ये कुदरती नियम है कि) इस शरीर-खेत में जो भी (अच्छा-बुरा) करम बीजा जाता है। वह जरूर प्रकट हो जाता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1417 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।