अंग 1416

अंग
1416
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਰਤੇ ਸੇ ਧਨਵੰਤ ਹੈਨਿ ਨਿਰਧਨੁ ਹੋਰੁ ਸੰਸਾਰੁ ॥੨੬॥
ਜਨ ਕੀ ਟੇਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਠਵਰ ਨ ਠਾਉ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਉ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਹਜੇ ਸਹਜਿ ਸਮਾਉ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਅਹਿਨਿਸਿ ਲਾਗਾ ਭਾਉ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਮੰਗੈ ਧੂੜਿ ਤਿਨ ਹਉ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣੈ ਜਾਉ ॥੨੭॥
ਲਖ ਚਉਰਾਸੀਹ ਮੇਦਨੀ ਤਿਸਨਾ ਜਲਤੀ ਕਰੇ ਪੁਕਾਰ ॥
ਇਹੁ ਮੋਹੁ ਮਾਇਆ ਸਭੁ ਪਸਰਿਆ ਨਾਲਿ ਚਲੈ ਨ ਅੰਤੀ ਵਾਰ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਸਾਂਤਿ ਨ ਆਵਈ ਕਿਸੁ ਆਗੈ ਕਰੀ ਪੁਕਾਰ ॥
ਵਡਭਾਗੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ਬੂਝਿਆ ਬ੍ਰਹਮੁ ਬਿਚਾਰੁ ॥
ਤਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਸਭ ਬੁਝਿ ਗਈ ਜਨ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਉਰਿ ਧਾਰਿ ॥੨੮॥
ਅਸੀ ਖਤੇ ਬਹੁਤੁ ਕਮਾਵਦੇ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਕਰਿ ਕੈ ਬਖਸਿ ਲੈਹੁ ਹਉ ਪਾਪੀ ਵਡ ਗੁਨਹਗਾਰੁ ॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਲੇਖੈ ਵਾਰ ਨ ਆਵਈ ਤੂੰ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਵਣਹਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਤੁਠੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਲਿਆ ਸਭ ਕਿਲਵਿਖ ਕਟਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਜਿਨਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਤਿਨੑ ਜੈਕਾਰੁ ॥੨੯॥
ਵਿਛੁੜਿ ਵਿਛੁੜਿ ਜੋ ਮਿਲੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੇ ਭੈ ਭਾਇ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਨਿਹਚਲੁ ਭਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥
ਗੁਰ ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਮਿਲੈ ਹੀਰੇ ਰਤਨ ਲਭੰਨਿੑ ॥
ਨਾਨਕ ਲਾਲੁ ਅਮੋਲਕਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਲਹੰਨਿੑ ॥੩੦॥
ਮਨਮੁਖ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਿਓ ਧਿਗੁ ਜੀਵਣੁ ਧਿਗੁ ਵਾਸੁ ॥
ਜਿਸ ਦਾ ਦਿਤਾ ਖਾਣਾ ਪੈਨਣਾ ਸੋ ਮਨਿ ਨ ਵਸਿਓ ਗੁਣਤਾਸੁ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਸਬਦਿ ਨ ਭੇਦਿਓ ਕਿਉ ਹੋਵੈ ਘਰ ਵਾਸੁ ॥
ਮਨਮੁਖੀਆ ਦੋਹਾਗਣੀ ਆਵਣ ਜਾਣਿ ਮੁਈਆਸੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸੁਹਾਗੁ ਹੈ ਮਸਤਕਿ ਮਣੀ ਲਿਖਿਆਸੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਉਰਿ ਧਾਰਿਆ ਹਰਿ ਹਿਰਦੈ ਕਮਲ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਆਪਣਾ ਹਉ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰੀ ਤਾਸੁ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਜਿਨ ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥੩੧॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਸੋਈ ਜਨੁ ਸਿਝੈ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਭੇਖ ਕਰਹਿ ਬਹੁ ਕਰਮ ਵਿਗੁਤੇ ਭਾਇ ਦੂਜੈ ਪਰਜ ਵਿਗੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਨਾਉ ਨ ਪਾਈਐ ਜੇ ਸਉ ਲੋਚੈ ਕੋਈ ॥੩੨॥
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਉ ਅਤਿ ਵਡ ਊਚਾ ਊਚੀ ਹੂ ਊਚਾ ਹੋਈ ॥
ਅਪੜਿ ਕੋਇ ਨ ਸਕਈ ਜੇ ਸਉ ਲੋਚੈ ਕੋਈ ॥
ਮੁਖਿ ਸੰਜਮ ਹਛਾ ਨ ਹੋਵਈ ਕਰਿ ਭੇਖ ਭਵੈ ਸਭ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਪਉੜੀ ਜਾਇ ਚੜੈ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਆਇ ਵਸੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੈ ਕੋਇ ॥
नानक नाम रते से धनवंत हैनि निरधनु होरु संसारु ॥२६॥
जन की टेक हरि नामु हरि बिनु नावै ठवर न ठाउ ॥
गुरमती नाउ मनि वसै सहजे सहजि समाउ ॥
वडभागी नामु धिआइआ अहिनिसि लागा भाउ ॥
जन नानकु मंगै धूड़ि तिन हउ सद कुरबाणै जाउ ॥२७॥
लख चउरासीह मेदनी तिसना जलती करे पुकार ॥
इहु मोहु माइआ सभु पसरिआ नालि चलै न अंती वार ॥
बिनु हरि सांति न आवई किसु आगै करी पुकार ॥
वडभागी सतिगुरु पाइआ बूझिआ ब्रहमु बिचारु ॥
तिसना अगनि सभ बुझि गई जन नानक हरि उरि धारि ॥२८॥
असी खते बहुतु कमावदे अंतु न पारावारु ॥
हरि किरपा करि कै बखसि लैहु हउ पापी वड गुनहगारु ॥
हरि जीउ लेखै वार न आवई तूं बखसि मिलावणहारु ॥
गुर तुठै हरि प्रभु मेलिआ सभ किलविख कटि विकार ॥
जिना हरि हरि नामु धिआइआ जन नानक तिन॑ जैकारु ॥२९॥
विछुड़ि विछुड़ि जो मिले सतिगुर के भै भाइ ॥
जनम मरण निहचलु भए गुरमुखि नामु धिआइ ॥
गुर साधू संगति मिलै हीरे रतन लभंनि॑ ॥
नानक लालु अमोलका गुरमुखि खोजि लहंनि॑ ॥३०॥
मनमुख नामु न चेतिओ धिगु जीवणु धिगु वासु ॥
जिस दा दिता खाणा पैनणा सो मनि न वसिओ गुणतासु ॥
इहु मनु सबदि न भेदिओ किउ होवै घर वासु ॥
मनमुखीआ दोहागणी आवण जाणि मुईआसु ॥
गुरमुखि नामु सुहागु है मसतकि मणी लिखिआसु ॥
हरि हरि नामु उरि धारिआ हरि हिरदै कमल प्रगासु ॥
सतिगुरु सेवनि आपणा हउ सद बलिहारी तासु ॥
नानक तिन मुख उजले जिन अंतरि नामु प्रगासु ॥३१॥
सबदि मरै सोई जनु सिझै बिनु सबदै मुकति न होई ॥
भेख करहि बहु करम विगुते भाइ दूजै परज विगोई ॥
नानक बिनु सतिगुर नाउ न पाईऐ जे सउ लोचै कोई ॥३२॥
हरि का नाउ अति वड ऊचा ऊची हू ऊचा होई ॥
अपड़ि कोइ न सकई जे सउ लोचै कोई ॥
मुखि संजम हछा न होवई करि भेख भवै सभ कोई ॥
गुर की पउड़ी जाइ चड़ै करमि परापति होई ॥
अंतरि आइ वसै गुर सबदु वीचारै कोइ ॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंगमें रंगे रहते हैं। वे धनवान हैं। बाकी सारा संसार कंगाल है। 26। हे भाई ! परमात्मा का नाम (ही परमात्मा के) सेवकों का सहारा है। हरी-नाम के बिना (उनको) कोई और आसरा नहीं सूझता। गुरू की मति की बरकति से परमात्मा का नाम (उनके) मन में बसा रहता है। हर वक्त आत्मिक अडोलता में (उनकी) लीनता रहती है। बड़े भाग्यों से (उन्होने दिन-रात परमात्मा का) नाम सिमरा है। दिन-रात उनका प्यार (हरी-नाम से) बना रहता है। दास नानक उनके चरणों की धूल (सदा) माँगता है (और कहता है- हे भाई !) मैं उनसे सदा सदके जाता हूँ। 27। हे भाई ! चौरासी लाख जूनियों वाली ये धरती तृष्णा (की आग) में जल रही है और पुकार रही है। माया का यह मोह सारी दुनिया में प्रभाव डाल रहा है (पर ये माया) आखिरी वक्त (किसी के भी) साथ नहीं जाती। परमात्मा के नाम के बिना (माया से किसी को) शांति भी नहीं मिलती। (गुरू के बिना) किस के आगे पुकार करूँ। (माया के मोह से और कोई नहीं छुड़ा सकता)। बहुत भाग्यशाली (जिन मनुष्यों ने) गुरू पा लिया। उन्होंने परमात्मा के साथ सांझ डाल ली। उन्होंने परमात्मा के गुणों को अपने मन में बसा लिया। हे दास नानक ! परमात्मा को दिल में बसाने के कारण (उनके अंदर से) तृष्णा की सारी आग बुझ गई। 28। हे हरी ! हम जीव बहुत भूलें करते रहते हैं। (हमारी भूलों का) अंत नहीं पाया जा सकता। (हमारी भूलों का) इस पार-उस पार का किनारा नहीं मिलता। तू मेहर करके खुद ही बख़्श ले। मैं पापी हूँ। गुनहगार हूँ। हे प्रभू जी ! (मेरे किए कर्मों के) लेखों के आसरे तो (बख्शिश हासिल करने की मेरी) बारी नहीं आ सकती। तू (ही मेरी भूलें) बख्श के (मुझे अपने चरणों में) मिलाने की समर्था वाला है। हे भाई ! (जिसके ऊपर प्रभू की मेहर हुई। उसके अंदर से) सारे पाप-विकार काट के दयावान हुए गुरू ने उसको हरी-प्रभू से मिला दिया। हे दास नाक ! (कह-) जिन लोगों ने परमात्मा का नाम सिमरा है। उनको (लोक-परलोक में) आदर-सत्कार मिलता आया है। 29। हे भाई ! (अनेकों जन्मों में परमात्मा से) बार-बार विछुड़ के जो मनुष्य (आखिर) गुरू के डर-अदब में गुरू के प्रेम में टिक गए। वे गुरू के माध्यम से परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के जनम-मरण के चक्करों से अडोल हो गए। हे नानक ! जिन मनुष्यों को साधू गुरू की संगति हासिल हो जाती है। वे (उस संगतिमें से) परमात्मा के कीमती आत्मिक गुण ढूँढ लेते हैं। परमात्मा का अत्यंत कीमती नाम-हीरा गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (संगति में से) खोज के हासिल कर लेते हैं। 30। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों ने परमात्मा का नाम नहीं सिमरा। उनका जीना धिक्कार-योग्य। उनका जगत-बसेरा तिरस्कार-योग्य ही रहता है। उनके मन में गुणों का खजाना वह प्रभू नहीं टिका। जिसका दिया हुआ अन्न और वस्त्र वे बरतते रहते हैं। उनका ये मन (कभी) गुरू के शबद में नहीं जुड़ता। फिर उन्हें प्रभू-चरनों का निवास कैसे हासिल हो। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-सि्त्रयांबद्-नसीब ही रहती हैं। वे जनम-मरण के चक्कर में पड़ी रहती हैं। वे सदा आत्मिक मौत मरती रहती हैं। हे भाई ! जो जीव-सि्त्रयां गुरू के सन्मुख हैं (उनके हृदय में बसता हरी-) नाम उनके सिर पर सोहाग है। उनके माथे पर टीका लगा हुआ है। गुरू के सन्मुख रहने वालियों ने परमात्मा का नाम सदा अपने हृदय में बसाया होता है उनके दिल का कमल-फूल खिला हुआ रहता है। वे जीव-सि्त्रयां हमेशा अपने गुरू की शरण पड़ी रहती हैं। मैं उनसे सदा सदके हूँ। हे नानक ! (कह-) जिनके दिल में (परमात्मा का) नाम (आत्मिक जीवन का) प्रकाश (किए रखता) है उनके मुँह (लोक-परलोक में) रौशन रहते हैं। 31। हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू के) शबद से (विकारों से) मर जाता है वही मनुष्य (जिंदगी में) कामयाब होता है। (गुरू के) शबद के बिना विकारों से मुक्ति नहीं मिलती। जो मनुष्य सिर्फ दिखावे के धार्मिक पहरावे पहनते हैं और दिखावे के ही धार्मिक कर्म करते हैं। वह दुखी होते रहते हैं। हे भाई ! माया के मोह में फसे रह के दुनिया दुखी होती है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा का नाम नहीं मिलता। चाहे कोई मनुष्य सौ बार तमन्ना करता रहे। 32। हे भाई ! परमात्मा की महानता ऊची से ऊँची है। बहुत ऊँची है। चाहे कोई मनुष्य सौ बार तमन्ना करता रहे। उसकी महानता तक कोई नहीं पहुँच सकता। हरेक साधू धार्मिक पहरावा पहन के फिरता है (और समझता होगा कि इस तरह उच्च जीवन में मैं परमात्मा की महानता तक पहुँच गया हूँ। पर) इन्द्रियों को वश में कर लेने की निरी ज़बानी बातें कर लेने से कोई मनुष्य पवित्र जीवन वाला नहीं हो जाता। (गुरू का शबद ही है) गुरू की (बताई हुई) सीढ़ी (जिसकी सहायता से मनुष्य प्रभू के चरणों तक) जा पहुँचता है। हे भाई ! जो कोई मनुष्य गुरू के शबद को अपने मन में बसाता है उसके अंदर परमात्मा आ बसता है।

संदर्भ: यह अंग 1416 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Karol Bagh की shopping street की भीड़, और घर लौटते वक़्त की थकान।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1416” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1417 →, पीछे का: ← अंग 1415

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।