अंग 1415

अंग
1415
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आतमा रामु न पूजनी दूजै किउ सुखु होइ ॥
हउमै अंतरि मैलु है सबदि न काढहि धोइ ॥
नानक बिनु नावै मैलिआ मुए जनमु पदारथु खोइ ॥२०॥
मनमुख बोले अंधुले तिसु महि अगनी का वासु ॥
बाणी सुरति न बुझनी सबदि न करहि प्रगासु ॥
ओना आपणी अंदरि सुधि नही गुर बचनि न करहि विसासु ॥
गिआनीआ अंदरि गुर सबदु है नित हरि लिव सदा विगासु ॥
हरि गिआनीआ की रखदा हउ सद बलिहारी तासु ॥
गुरमुखि जो हरि सेवदे जन नानकु ता का दासु ॥२१॥
माइआ भुइअंगमु सरपु है जगु घेरिआ बिखु माइ ॥
बिखु का मारणु हरि नामु है गुर गरुड़ सबदु मुखि पाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सतिगुरु मिलिआ आइ ॥
मिलि सतिगुर निरमलु होइआ बिखु हउमै गइआ बिलाइ ॥
गुरमुखा के मुख उजले हरि दरगह सोभा पाइ ॥
जन नानकु सदा कुरबाणु तिन जो चालहि सतिगुर भाइ ॥२२॥
सतिगुर पुरखु निरवैरु है नित हिरदै हरि लिव लाइ ॥
निरवैरै नालि वैरु रचाइदा अपणै घरि लूकी लाइ ॥
अंतरि क्रोधु अहंकारु है अनदिनु जलै सदा दुखु पाइ ॥
कूड़ु बोलि बोलि नित भउकदे बिखु खाधे दूजै भाइ ॥
बिखु माइआ कारणि भरमदे फिरि घरि घरि पति गवाइ ॥
बेसुआ केरे पूत जिउ पिता नामु तिसु जाइ ॥
हरि हरि नामु न चेतनी करतै आपि खुआइ ॥
हरि गुरमुखि किरपा धारीअनु जन विछुड़े आपि मिलाइ ॥
जन नानकु तिसु बलिहारणै जो सतिगुर लागे पाइ ॥२३॥
नामि लगे से ऊबरे बिनु नावै जम पुरि जांहि ॥
नानक बिनु नावै सुखु नही आइ गए पछुताहि ॥२४॥
चिंता धावत रहि गए तां मनि भइआ अनंदु ॥
गुर प्रसादी बुझीऐ सा धन सुती निचिंद ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन॑ा भेटिआ गुर गोविंदु ॥
नानक सहजे मिलि रहे हरि पाइआ परमानंदु ॥२५॥
सतिगुरु सेवनि आपणा गुर सबदी वीचारि ॥
सतिगुर का भाणा मंनि लैनि हरि नामु रखहि उर धारि ॥
ऐथै ओथै मंनीअनि हरि नामि लगे वापारि ॥
गुरमुखि सबदि सिञापदे तितु साचै दरबारि ॥
सचा सउदा खरचु सचु अंतरि पिरमु पिआरु ॥
जमकालु नेड़ि न आवई आपि बखसे करतारि ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरते। सर्व-व्यापक प्रभू की भगती नहीं करते। (भला) माया के मोह में (फसे रह के उनको) सुख कैसे मिल सकता है। उनके अंदर अहंकार की मैल टिकी रहती है जिसको वे गुरू के शबद द्वारा (अपने अंदर से) धो के नहीं निकालते। हे नानक ! नाम से वंचित हुए मनुष्य कीमती मानस जनम गवा के विकारों की मैल से भरे रहते हैं। और आत्मिक मौत सहेड़े रखते हैं। 20। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (उनकी) उस (सुरति) में तृष्णा-अग्नि का निवास हुआ रहता है (इस वास्ते आत्मिक जीवन के उपदेश से वह) अंधे और बहरे हुए रहते है। गुरू की बाणी में सुरति जोड़नी नहीं समझते। गुरू के शबद से (अपनी सुरति में आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश नहीं करते। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों के अंदर अपने आपे की समझ नहीं होती। वे गुरू के वचन में श्रद्धा नहीं लाते। पर। हे भाई ! आत्मिक जीवन की सूझ वाले बंदों के अंदर (सदा) गुरू का शबद बसता है। उनकी लगन सदा हरी में रहती है (इस वास्ते उनके अंदर) सदा (आत्मिक) खिड़ाव बना रहता है। परमात्मा आत्मिक जीवन वाले मनुष्यों की सदा (इज्जत) रखता है। मैं उन पर से सदा कुर्बान जाता हूँ। हे भाई !गुरू की शरण पड़ कर जो मनुष्य परमात्मा की सेवा-भगती करते रहते हैं। दास नानक उनका सेवक है। 21। हे भाई ! माया साँप है बड़ा साँप। आत्मिक मौत लाने वाली जहर का भरा हुआ यह माया-सर्प जगत को घेरे बैठा है। परमात्मा का नाम (ही इस) जहर का असर खत्म कर सकने वाला है। गुरू का शबद (ही) गारुड़ मंत्र है (इसको सदा अपने) मुँह में डाले रख। हे भाई ! जिनके माथे पर धुर दरगाह से ही लेख लिखा होता है। उनको गुरू आ के मिल जाता है। गुरू को मिल के उनका जीवन पवित्र हो जाता है उनके अंदर से अहंकार का जहर सदा के लिए दूर हो जाता है। परमात्मा की हजूरी में शोभा कमा के गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के मुँह रौशन हो जाते हैं। दास नानक उन मनुष्यों से सदा सदके जाता है जो गुरू की रजा में चलते हैं। 22। हे भाई ! गुरू (एक ऐसा महा-) पुरष है जिसका किसी के साथ भी वैर नहीं। गुरू हर वक्त अपने हृदय में परमात्मा के साथ लगन लगाए रखता है। जो मनुष्य (ऐसे) निर्वैर (गुरू) के साथ वैर बनाए रखता है। वह अपने (हृदय-) घर में (ईष्या की) चिंगारी जलाए रखता है। उसके अंदर क्रोध (की ज्वाला) है। उसके अंदर अहंकार (के शोले भड़कते रहते) हैं (जिसमें) वह हर वक्त जलता रहता है। और। सदा दुख पाता रहता है। हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू के विरुद्ध) झूठ बोल-बोल के अनाब-शनाब बोलते रहते हैं। माया के मोह में (वे इस तरह आत्मिक मौत मरे रहते हैं। जैसे) उन्होंने जहर खाया होता है। आत्मिक मौत लाने वाली माया-जहर की खातिर वह घर-घर (के दरवाजे) और इज्जत गवा के (हल्के पड़ के) भटकते फिरते हैं। (ऐसे मनुष्य) वेश्वा के पुत्र की तरह (नॅक-कटे होते हैं) जिसके पिता का नाम गुम हो जाता है। वह मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरते (पर उनके भी क्या वश।) करतार ने खुद (उनको) गलत रास्ते पर डाला होता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों पर हरी ने स्वयं कृपा की होती है। गुरू के माध्यम से उन विछुड़े हुओं को भी हरी खुद (अपने साथ) मिला लेता है। हे भाई ! दास नानक उस मनुष्य से सदके जाता है। जो गुरू के चरणों में पड़े रहते हैं। 23। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम में जुड़े रहे। वे (संसार-समुंद्र में डूबने से) बच गए। नाम से खाली रहने वाले मनुष्य जमराज में बस जाते हैं। हे नानक ! परमात्मा के नाम के बिना (उनको) आत्मिक आनंद नहीं मिलता। (जगत में) जनम ले के (नाम से वंचित ही) जाते हैं और पछताते रहते हैं। हे भाई ! माया की चिंता में भटक रहे जो मनुष्य (इस भटकना से) हट जाते हैं। उनके मन में आनंद पैदा हो जाता है। (पर। यह भेद) गुरू की कृपा से ही समझा जा सकता है। (जो) जीव-स्त्री (इस भेद को समझ लेती है। वह) चिंता-रहित अवस्था में लीन रहती है। हे नानक ! जिन मनुष्यों के माथे पर धुर दरगाह से लेख लिखा होता है उनको गुरू परमात्मा मिल जाता है। वह आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं। सबसे ऊँचे आत्मिक आनंद के मालिक-प्रभू (का मिलाप) वे मनुष्य प्राप्त कर लेते हैं। 25। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद में सुरति जोड़ के प्यारे गुरू की शरण पड़े रहते हैं। गुरू की रजा को (सिर माथे) मानते हैं। परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसाए रखते हैं। परमात्मा के नाम में व्यस्त रहते हैं। वे मनुष्य इस लोक में और परलोक में सत्कारे जाते हैं। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य उस सदा-स्थिर दरबार में गुरू के शबद से पहचाने जाते हैं। वे मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम का वणज (करते रहते हैं)। सदा-स्थिर हरी नाम ही आत्मिक खुराक के तौर पर बरतते रहते हैं। उनके अंदर परमात्मा का प्रेम-प्यार (सदा टिका रहता है)। उन पर करतार ने आप मेहर की होती है। मौत (का डर उनके) नजदीक नहीं फटकता (आत्मिक मौत उनके नजदीक नहीं आती)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सिमरते।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।