अंग
1414
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਹੈ ਕਿਤੁ ਖਾਧੈ ਤਿਪਤਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਜੋ ਚਲੈ ਤਿਪਤਾਸੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਧਨੁ ਧਨੁ ਕਲਜੁਗਿ ਨਾਨਕਾ ਜਿ ਚਲੇ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥੧੨॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਨ ਸੇਵਿਓ ਸਬਦੁ ਨ ਰਖਿਓ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਧਿਗੁ ਤਿਨਾ ਕਾ ਜੀਵਿਆ ਕਿਤੁ ਆਏ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਭਉ ਮਨਿ ਪਵੈ ਤਾਂ ਹਰਿ ਰਸਿ ਲਗੈ ਪਿਆਰਿ ॥
ਨਾਉ ਮਿਲੈ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਿ ॥੧੩॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਜਗੁ ਭਰਮਿਆ ਘਰੁ ਮੁਸੈ ਖਬਰਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧਿ ਮਨੁ ਹਿਰਿ ਲਇਆ ਮਨਮੁਖ ਅੰਧਾ ਲੋਇ ॥
ਗਿਆਨ ਖੜਗ ਪੰਚ ਦੂਤ ਸੰਘਾਰੇ ਗੁਰਮਤਿ ਜਾਗੈ ਸੋਇ ॥
ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਪਰਗਾਸਿਆ ਮਨੁ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਮਹੀਨ ਨਕਟੇ ਫਿਰਹਿ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਬਹਿ ਰੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਧੁਰਿ ਕਰਤੈ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਮੇਟਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਇ ॥੧੪॥
ਗੁਰਮੁਖਾ ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇਆ ਅਤੁਟ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਬਾਣੀ ਉਚਰਹਿ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭ ਕਾਰਣ ਕਰਤਾ ਕਰੈ ਵੇਖੈ ਸਿਰਜਨਹਾਰੁ ॥੧੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜੁ ਹੈ ਮਨੁ ਚੜਿਆ ਦਸਵੈ ਆਕਾਸਿ ॥
ਤਿਥੈ ਊਂਘ ਨ ਭੁਖ ਹੈ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਸੁਖ ਵਾਸੁ ॥
ਨਾਨਕ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਵਿਆਪਤ ਨਹੀ ਜਿਥੈ ਆਤਮ ਰਾਮ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥੧੬॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਕਾ ਚੋਲੜਾ ਸਭ ਗਲਿ ਆਏ ਪਾਇ ॥
ਇਕਿ ਉਪਜਹਿ ਇਕਿ ਬਿਨਸਿ ਜਾਂਹਿ ਹੁਕਮੇ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਨ ਚੁਕਈ ਰੰਗੁ ਲਗਾ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਬੰਧਨਿ ਬੰਧਿ ਭਵਾਈਅਨੁ ਕਰਣਾ ਕਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥੧੭॥
ਜਿਨ ਕਉ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀਅਨੁ ਤਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਆਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲੇ ਉਲਟੀ ਭਈ ਮਰਿ ਜੀਵਿਆ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਭਗਤੀ ਰਤਿਆ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੧੮॥
ਮਨਮੁਖ ਚੰਚਲ ਮਤਿ ਹੈ ਅੰਤਰਿ ਬਹੁਤੁ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਕੀਤਾ ਕਰਤਿਆ ਬਿਰਥਾ ਗਇਆ ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਥਾਇ ਨ ਪਾਈ ॥
ਪੁੰਨ ਦਾਨੁ ਜੋ ਬੀਜਦੇ ਸਭ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕੈ ਜਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਜਮਕਾਲੁ ਨ ਛੋਡਈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਈ ॥
ਜੋਬਨੁ ਜਾਂਦਾ ਨਦਰਿ ਨ ਆਵਈ ਜਰੁ ਪਹੁਚੈ ਮਰਿ ਜਾਈ ॥
ਪੁਤੁ ਕਲਤੁ ਮੋਹੁ ਹੇਤੁ ਹੈ ਅੰਤਿ ਬੇਲੀ ਕੋ ਨ ਸਖਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਨਾਉ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇ ਵਡੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ॥੧੯॥
ਮਨਮੁਖ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਨੀ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖ ਰੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਜੋ ਚਲੈ ਤਿਪਤਾਸੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਧਨੁ ਧਨੁ ਕਲਜੁਗਿ ਨਾਨਕਾ ਜਿ ਚਲੇ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਇ ॥੧੨॥
ਸਤਿਗੁਰੂ ਨ ਸੇਵਿਓ ਸਬਦੁ ਨ ਰਖਿਓ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਧਿਗੁ ਤਿਨਾ ਕਾ ਜੀਵਿਆ ਕਿਤੁ ਆਏ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਭਉ ਮਨਿ ਪਵੈ ਤਾਂ ਹਰਿ ਰਸਿ ਲਗੈ ਪਿਆਰਿ ॥
ਨਾਉ ਮਿਲੈ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਜਨ ਨਾਨਕ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਿ ॥੧੩॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਜਗੁ ਭਰਮਿਆ ਘਰੁ ਮੁਸੈ ਖਬਰਿ ਨ ਹੋਇ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧਿ ਮਨੁ ਹਿਰਿ ਲਇਆ ਮਨਮੁਖ ਅੰਧਾ ਲੋਇ ॥
ਗਿਆਨ ਖੜਗ ਪੰਚ ਦੂਤ ਸੰਘਾਰੇ ਗੁਰਮਤਿ ਜਾਗੈ ਸੋਇ ॥
ਨਾਮ ਰਤਨੁ ਪਰਗਾਸਿਆ ਮਨੁ ਤਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਮਹੀਨ ਨਕਟੇ ਫਿਰਹਿ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਬਹਿ ਰੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋ ਧੁਰਿ ਕਰਤੈ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਮੇਟਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਇ ॥੧੪॥
ਗੁਰਮੁਖਾ ਹਰਿ ਧਨੁ ਖਟਿਆ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇਆ ਅਤੁਟ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਬਾਣੀ ਉਚਰਹਿ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਰਾਵਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭ ਕਾਰਣ ਕਰਤਾ ਕਰੈ ਵੇਖੈ ਸਿਰਜਨਹਾਰੁ ॥੧੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਸਹਜੁ ਹੈ ਮਨੁ ਚੜਿਆ ਦਸਵੈ ਆਕਾਸਿ ॥
ਤਿਥੈ ਊਂਘ ਨ ਭੁਖ ਹੈ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਸੁਖ ਵਾਸੁ ॥
ਨਾਨਕ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਵਿਆਪਤ ਨਹੀ ਜਿਥੈ ਆਤਮ ਰਾਮ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥੧੬॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਕਾ ਚੋਲੜਾ ਸਭ ਗਲਿ ਆਏ ਪਾਇ ॥
ਇਕਿ ਉਪਜਹਿ ਇਕਿ ਬਿਨਸਿ ਜਾਂਹਿ ਹੁਕਮੇ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣੁ ਨ ਚੁਕਈ ਰੰਗੁ ਲਗਾ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਬੰਧਨਿ ਬੰਧਿ ਭਵਾਈਅਨੁ ਕਰਣਾ ਕਛੂ ਨ ਜਾਇ ॥੧੭॥
ਜਿਨ ਕਉ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀਅਨੁ ਤਿਨਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਆਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲੇ ਉਲਟੀ ਭਈ ਮਰਿ ਜੀਵਿਆ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਭਗਤੀ ਰਤਿਆ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥੧੮॥
ਮਨਮੁਖ ਚੰਚਲ ਮਤਿ ਹੈ ਅੰਤਰਿ ਬਹੁਤੁ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਕੀਤਾ ਕਰਤਿਆ ਬਿਰਥਾ ਗਇਆ ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਥਾਇ ਨ ਪਾਈ ॥
ਪੁੰਨ ਦਾਨੁ ਜੋ ਬੀਜਦੇ ਸਭ ਧਰਮ ਰਾਇ ਕੈ ਜਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰੂ ਜਮਕਾਲੁ ਨ ਛੋਡਈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਖੁਆਈ ॥
ਜੋਬਨੁ ਜਾਂਦਾ ਨਦਰਿ ਨ ਆਵਈ ਜਰੁ ਪਹੁਚੈ ਮਰਿ ਜਾਈ ॥
ਪੁਤੁ ਕਲਤੁ ਮੋਹੁ ਹੇਤੁ ਹੈ ਅੰਤਿ ਬੇਲੀ ਕੋ ਨ ਸਖਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ਨਾਉ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੇ ਵਡੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈ ॥੧੯॥
ਮਨਮੁਖ ਨਾਮੁ ਨ ਚੇਤਨੀ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖ ਰੋਇ ॥
हरि प्रभु वेपरवाहु है कितु खाधै तिपताइ ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै तिपतासै हरि गुण गाइ ॥
धनु धनु कलजुगि नानका जि चले सतिगुर भाइ ॥१२॥
सतिगुरू न सेविओ सबदु न रखिओ उर धारि ॥
धिगु तिना का जीविआ कितु आए संसारि ॥
गुरमती भउ मनि पवै तां हरि रसि लगै पिआरि ॥
नाउ मिलै धुरि लिखिआ जन नानक पारि उतारि ॥१३॥
माइआ मोहि जगु भरमिआ घरु मुसै खबरि न होइ ॥
काम क्रोधि मनु हिरि लइआ मनमुख अंधा लोइ ॥
गिआन खड़ग पंच दूत संघारे गुरमति जागै सोइ ॥
नाम रतनु परगासिआ मनु तनु निरमलु होइ ॥
नामहीन नकटे फिरहि बिनु नावै बहि रोइ ॥
नानक जो धुरि करतै लिखिआ सु मेटि न सकै कोइ ॥१४॥
गुरमुखा हरि धनु खटिआ गुर कै सबदि वीचारि ॥
नामु पदारथु पाइआ अतुट भरे भंडार ॥
हरि गुण बाणी उचरहि अंतु न पारावारु ॥
नानक सभ कारण करता करै वेखै सिरजनहारु ॥१५॥
गुरमुखि अंतरि सहजु है मनु चड़िआ दसवै आकासि ॥
तिथै ऊंघ न भुख है हरि अंम्रित नामु सुख वासु ॥
नानक दुखु सुखु विआपत नही जिथै आतम राम प्रगासु ॥१६॥
काम क्रोध का चोलड़ा सभ गलि आए पाइ ॥
इकि उपजहि इकि बिनसि जांहि हुकमे आवै जाइ ॥
जंमणु मरणु न चुकई रंगु लगा दूजै भाइ ॥
बंधनि बंधि भवाईअनु करणा कछू न जाइ ॥१७॥
जिन कउ किरपा धारीअनु तिना सतिगुरु मिलिआ आइ ॥
सतिगुरि मिले उलटी भई मरि जीविआ सहजि सुभाइ ॥
नानक भगती रतिआ हरि हरि नामि समाइ ॥१८॥
मनमुख चंचल मति है अंतरि बहुतु चतुराई ॥
कीता करतिआ बिरथा गइआ इकु तिलु थाइ न पाई ॥
पुंन दानु जो बीजदे सभ धरम राइ कै जाई ॥
बिनु सतिगुरू जमकालु न छोडई दूजै भाइ खुआई ॥
जोबनु जांदा नदरि न आवई जरु पहुचै मरि जाई ॥
पुतु कलतु मोहु हेतु है अंति बेली को न सखाई ॥
सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए नाउ वसै मनि आई ॥
नानक से वडे वडभागी जि गुरमुखि नामि समाई ॥१९॥
मनमुख नामु न चेतनी बिनु नावै दुख रोइ ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै तिपतासै हरि गुण गाइ ॥
धनु धनु कलजुगि नानका जि चले सतिगुर भाइ ॥१२॥
सतिगुरू न सेविओ सबदु न रखिओ उर धारि ॥
धिगु तिना का जीविआ कितु आए संसारि ॥
गुरमती भउ मनि पवै तां हरि रसि लगै पिआरि ॥
नाउ मिलै धुरि लिखिआ जन नानक पारि उतारि ॥१३॥
माइआ मोहि जगु भरमिआ घरु मुसै खबरि न होइ ॥
काम क्रोधि मनु हिरि लइआ मनमुख अंधा लोइ ॥
गिआन खड़ग पंच दूत संघारे गुरमति जागै सोइ ॥
नाम रतनु परगासिआ मनु तनु निरमलु होइ ॥
नामहीन नकटे फिरहि बिनु नावै बहि रोइ ॥
नानक जो धुरि करतै लिखिआ सु मेटि न सकै कोइ ॥१४॥
गुरमुखा हरि धनु खटिआ गुर कै सबदि वीचारि ॥
नामु पदारथु पाइआ अतुट भरे भंडार ॥
हरि गुण बाणी उचरहि अंतु न पारावारु ॥
नानक सभ कारण करता करै वेखै सिरजनहारु ॥१५॥
गुरमुखि अंतरि सहजु है मनु चड़िआ दसवै आकासि ॥
तिथै ऊंघ न भुख है हरि अंम्रित नामु सुख वासु ॥
नानक दुखु सुखु विआपत नही जिथै आतम राम प्रगासु ॥१६॥
काम क्रोध का चोलड़ा सभ गलि आए पाइ ॥
इकि उपजहि इकि बिनसि जांहि हुकमे आवै जाइ ॥
जंमणु मरणु न चुकई रंगु लगा दूजै भाइ ॥
बंधनि बंधि भवाईअनु करणा कछू न जाइ ॥१७॥
जिन कउ किरपा धारीअनु तिना सतिगुरु मिलिआ आइ ॥
सतिगुरि मिले उलटी भई मरि जीविआ सहजि सुभाइ ॥
नानक भगती रतिआ हरि हरि नामि समाइ ॥१८॥
मनमुख चंचल मति है अंतरि बहुतु चतुराई ॥
कीता करतिआ बिरथा गइआ इकु तिलु थाइ न पाई ॥
पुंन दानु जो बीजदे सभ धरम राइ कै जाई ॥
बिनु सतिगुरू जमकालु न छोडई दूजै भाइ खुआई ॥
जोबनु जांदा नदरि न आवई जरु पहुचै मरि जाई ॥
पुतु कलतु मोहु हेतु है अंति बेली को न सखाई ॥
सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए नाउ वसै मनि आई ॥
नानक से वडे वडभागी जि गुरमुखि नामि समाई ॥१९॥
मनमुख नामु न चेतनी बिनु नावै दुख रोइ ॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा को तो किसी चीज़ की कोई मुथाजी की आवश्यक्ता नही है। फिर वह कौन सी चीज़ खाने से खुश होता है। जो मनुष्य गुरू की रजा में जीवन-चाल चलता है और परमात्मा के गुण गाता रहता है। (उस पर परमात्मा) प्रसन्न होता है। हे नानक ! इस विकारों-भरे संसार में वह मनुष्य शोभा कमाते हैं जो गुरू की मर्जी अनुसार जीवन-राह पर चलते हैं। 12। हे भाई ! (जिन मनुष्यों ने कभी) गुरू का आसरा नहीं लिया। जिन्होंने गुरू का शबद (कभी अपने) हृदय में टिका के नहीं रखा। वे किस लिए जगत में आए। उनका जीवन-समय धिक्कार-योग्य ही रहता है (वह सारी उम्र वैसे ही काम करते रहते हैं। जिनसे जगत में उनको धिक्कारें ही पड़ती रहती हैं)। हे भाई ! जब गुरू की मति पर चल के (मनुष्य के) मन में (परमात्मा का) डर-अदब टिकता है। तब वह परमात्मा के प्यार में परमात्मा के मेल-आनंद में जुड़ता है। पर। हे नानक ! हरी-नाम धुर दरगाह से किए कर्मों के संस्कारों के लेख अनुसार ही मिलता है। और। यह नाम (मनुष्य को संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 13। हे भाई ! माया के मोह के कारण जगत भटकता फिरता है। (जीव का हृदय-) घर (आत्मिक सरमाया) लूटा जाता है (पर जीव को) यह पता ही नहीं लगता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य जगत में (आत्मिक जीवन की सूझ के प्रति) अंधा हुआ रहता है। काम ने क्रोध ने (उसके) मन को चुरा लिया होता है। हे भाई ! (जो मनुष्य) आत्मिक जीवन की सूझ की तलवार (पकड़ के कामादिक) पाँच वैरियों को मार लेता है। वह ही गुरू की मति की बरकति से (माया के हमलों से) सचेत रहता है। (उसके अंदर) परमात्मा के नाम का रतन चमक पड़ता है। उसका मन उसका तन पवित्र हो जाता है। पर। हे भाई ! नाम से वंचित मनुष्य बे-शर्मों की तरह चले-फिरते हैं। नाम से टूटा हुआ मनुष्य बैठ के रोता रहता है (सदा दुखी रहता है)। हे नानक ! (करतार की रज़ा यूँ ही होती है कि नाम-हीन प्राणी दुखी रहे। सो) करतार ने जो कुछ धुर दरगाह से यह लेख लिख दिया है। इसको कोई मिटा नहीं सकता (उल्टा नहीं सकता)। 14। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों ने गुरू के शबद से (हरी-नाम को) अपने मन में बसा के परमात्मा का नाम-धन कमा लिया है। गुरमुखों ने कीमती नाम-धन ढूँढ लिया है (उनके अंदर हरी-नाम-धन के) ना-खत्म होने वाले खजाने भरे रहते हैं। जिस परमात्मा (के गुणों) का अंत नहीं पड़ सकता। जिस परमात्मा (की हस्ती) का उरला-परला किनारा नहीं मिल सकता। उस परमात्मा के गुणों को (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरू की) बाणी के द्वारा उचारते रहते हैं। पर हे नानक ! ये सारे सबब करतार (खुद ही) बनाता है। (इस खेल को) सृजनहार (स्वयं) देख रहा है। 15 हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर आत्मिक अडोलता बनी रहती है। उसका मन (उस) दसवें द्वार में टिका रहता है (जिस शरीर पर नौ-गौलकों का प्रभाव नहीं पड़ सकता)। उस अवस्था में (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को माया के मोह की नींद नहीं आती। माया की भूख नहीं सताती)। (उस अवस्था में गुरू के अंदर) आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम टिका रहता है। आत्मिक आनंद बना रहता है। हे नानक ! जिस हृदय में सर्व-व्यापक परमात्मा का प्रकाश हो जाता है। वहाँ ना दुख ना सुख (कोई भी अपना) जोर नहीं डाल सकता। 16। हे भाई ! सारे जीव काम-क्रोध (आदि विकारों) के रंगे जा सकने वाला शरीर-चोला पहने के (जगत में) आते हैं; कई पैदा होते हैं कई मरते हैं। (सारी दुनिया परमात्मा के) हुकम में ही जनम-मरण के चक्कर में पड़ी हुई है। (जब तक जीव की) माया के मोह में प्रीत लगी हुई है (तब तक उसका) जनम-मरण का चक्कर खत्म नहीं होता। हे भाई ! परमात्मा ने (खुद ही मोह की) रस्सी बाँध के (सारी लोकाई जनम-मरण के चक्कर में) डाली हुई है। (इसमें से निकलने के लिए उसकी मेहर के बिना और) कोई उपाय किया नहीं जा सकता। 17। हे भाई ! जिन (मनुष्यों) पर उस (परमात्मा) ने मेहर कर दी। उनको गुरू मिल गया। हे भाई ! गुरू के मिलने से (जिस मनुष्य की सुरति काम-क्रोध आदि विकारों से) पलट गई। वह मनुष्य (विकारों से) मर के आत्मिक अडोलता में प्रभू-प्रेम में जी उठा (आत्मिक जीवन जीने लग गया)। हे नानक ! (परमात्मा की) भगती के रंग में रंगा हुआ मनुष्य सदा परमात्मा के नाम में लीन रहता है। 18। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों की मति हर वक्त भटकती रहती है। उनके अंदर (अपनी मति की) चतुराई (का) बहुत (घमण्ड) होता है। (अपनी अकल के आसरे पुन्य-दान आदि का) किया हुआ (उनका) सारा उद्यम व्यर्थ जाता है (उनका ये सारा उद्यम परमात्मा की हजूरी में) परवान नहीं होता। पुन्य-दान (आदि) जो भी (कर्म-बीज वे अपनी शरीर-धरती में) बीजते हैं। (उनकी यह) सारी मेहनत धर्मराज के हवाले हो जाती है (भाव। इस सारी मेहनत से तो मनुष्य धर्मराज के ही अधीन रहता है)। हे भाई !गुरू की शरण पड़े बिना (जनम) मरण का चक्कर (मनुष्य को) नहीं छोड़ता। माया के मोह के कारण (मनुष्य) दुखी ही होता है। (मनुष्य की) जवानी के गुजरते देर नहीं लगती। बुढ़ापा आ पहुँचता है। (और आखिर प्राणी) मर जाता है। पुत्र। स्त्री। माया का मोह-प्यार- (इनमें से) अंत में कोई यार नहीं बनता। कोई साथ नहीं बनता। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह आत्मिक आनंद पाता है। परमात्मा का नाम (उसके) मन में बसता है। हे नानक ! जो जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के परमात्मा के नाम में लीन रहता है। वह सारे ऊँचे जीवन वाले होते है। बड़े भाग्यों वाले होते हैं। 19। हे भाई ! परमात्मा के नाम से टूटा हुआ मनुष्य (सदा अपने) दुख फरोलता रहता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1414 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Janpath की सड़क-side चाय और बीच में एक quiet moment।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1414” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1415 →, पीछे का: ← अंग 1413।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।