अंग 1411

अंग
1411
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कीचड़ि हाथु न बूडई एका नदरि निहालि ॥
नानक गुरमुखि उबरे गुरु सरवरु सची पालि ॥८॥
अगनि मरै जलु लोड़ि लहु विणु गुर निधि जलु नाहि ॥
जनमि मरै भरमाईऐ जे लख करम कमाहि ॥
जमु जागाति न लगई जे चलै सतिगुर भाइ ॥
नानक निरमलु अमर पदु गुरु हरि मेलै मेलाइ ॥९॥
कलर केरी छपड़ी कऊआ मलि मलि नाइ ॥
मनु तनु मैला अवगुणी चिंजु भरी गंधी आइ ॥
सरवरु हंसि न जाणिआ काग कुपंखी संगि ॥
साकत सिउ ऐसी प्रीति है बूझहु गिआनी रंगि ॥
संत सभा जैकारु करि गुरमुखि करम कमाउ ॥
निरमलु न॑ावणु नानका गुरु तीरथु दरीआउ ॥१०॥
जनमे का फलु किआ गणी जां हरि भगति न भाउ ॥
पैधा खाधा बादि है जां मनि दूजा भाउ ॥
वेखणु सुनणा झूठु है मुखि झूठा आलाउ ॥
नानक नामु सलाहि तू होरु हउमै आवउ जाउ ॥११॥
हैनि विरले नाही घणे फैल फकड़ु संसारु ॥१२॥
नानक लगी तुरि मरै जीवण नाही ताणु ॥
चोटै सेती जो मरै लगी सा परवाणु ॥
जिस नो लाए तिसु लगै लगी ता परवाणु ॥
पिरम पैकामु न निकलै लाइआ तिनि सुजाणि ॥१३॥
भांडा धोवै कउणु जि कचा साजिआ ॥
धातू पंजि रलाइ कूड़ा पाजिआ ॥
भांडा आणगु रासि जां तिसु भावसी ॥
परम जोति जागाइ वाजा वावसी ॥१४॥
मनहु जि अंधे घूप कहिआ बिरदु न जाणनी ॥
मनि अंधै ऊंधै कवल दिसनि खरे करूप ॥
इकि कहि जाणनि कहिआ बुझनि ते नर सुघड़ सरूप ॥
इकना नादु न बेदु न गीअ रसु रसु कसु न जाणंति ॥
इकना सिधि न बुधि न अकलि सर अखर का भेउ न लहंति ॥
नानक ते नर असलि खर जि बिनु गुण गरबु करंत ॥१५॥
सो ब्रहमणु जो बिंदै ब्रहमु ॥
जपु तपु संजमु कमावै करमु ॥
सील संतोख का रखै धरमु ॥
बंधन तोड़ै होवै मुकतु ॥
सोई ब्रहमणु पूजण जुगतु ॥१६॥
खत्री सो जु करमा का सूरु ॥
पुंन दान का करै सरीरु ॥
खेतु पछाणै बीजै दानु ॥
सो खत्री दरगह परवाणु ॥
लबु लोभु जे कूड़ु कमावै ॥
अपणा कीता आपे पावै ॥१७॥
तनु न तपाइ तनूर जिउ बालणु हड न बालि ॥
सिरि पैरी किआ फेड़िआ अंदरि पिरी सम॑ालि ॥१८॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा (उस मनुष्य को) मेहर की निगाह से देखता है (इसलिए उसका) हाथ कीचड़ में नहीं डूबता (उसका मन विकारों में नहीं फसता)। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य (ही विकारों के कीचड़ में डूबने से) बच निकलते हैं। गुरू ही (नाम का) सरोवर है। गुरू ही सदा-स्थिर रहने वाली दीवार है (जो विकारों के कीचड़ में लिबड़ने से बचाती है)। 8। हे भाई ! (गुरू की शरण पड़ कर नाम-) जल ढूँढ ले (इस नाम-जल की बरकति से) तृष्णा की आग बुझ जाती है। (पर) गुरू (की शरण) के बिना नाम-सरोवर का यह जल मिलता नहीं। (इस जल के बिना) मनुष्य जनम-मरण के चक्करों में पड़ा रहता है। अनेकों जूनियों में घुमाया जाता है। हे भाई ! जो मनुष्य (नाम को भुला के और) लाखों करम कमाते रहें (तो भी यह अंदरूनी आग नहीं मरती)। अगर मनुष्य गुरू की रज़ा में चलता रहे। तो जमराज मसूलिया (उस पर) अपना वार नहीं कर सकता। हे नानक ! गुरू (मनुष्य) को पवित्र ऊँचा आत्मिक दर्जा बख्शता है। गुरू (मनुष्य को) परमात्मा के साथ मिला देता है। 9। हे भाई ! (विकारों की कालिख से) काले हुए मन वाला मनुष्य (विकारों के) कलॅर की छपड़ी में बड़े शौक से स्नान करता रहता है (इसलिए उसका) मन (उसका) तन विकारों (की मैल) से मैला हुआ रहता है (जैसे कौए की) चोंच गंदगी से भरी रहती है (वैसे ही विकारी मनुष्य का मुँह भी निंदा आदि के गंद से ही भरा रहता है)। हे भाई ! बुरे पंछी कौओं की संगति में (विकारी बँदों की सोहबत में परमात्मा की अंश जीव-) हँस ने (गुरू-) सरोवर (की कद्र) ना समझी। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्यों के जोड़ी हुई प्रीत ऐसी ही होती है। हे आत्मिक जीवन की सूझ हासिल करने के चाहवान मनुष्य ! परमात्मा के प्रेम में टिक के (जीवन-राह को) समझ। साध-संगति में टिक के परमात्मा की सिफत-सालाह करा कर। गुरू के सन्मुख रखने वाले करम कमाया कर- यही है पवित्र स्नान। हे नानक ! गुरू ही तीर्थ है गुरू ही दरिया है (गुरू में डुबकी लगाए रखनी ही पवित्र स्नान है)। 10। हे भाई ! जब तक (मनुष्य के हृदय में) परमात्मा की भगती नहीं। परमात्मा का प्रेम नहीं। तब तक उसके मनुष्य जन्म हासिल किए का कोई लाभ नहीं। जब तक (मनुष्य के) मन में परमात्मा के बिना और-और मोह-प्यार बसता है। तब तक उसका पहना (हुआ कीमती कपड़ा उसका) खाया हुआ (कीमती भोजन सब) व्यर्थ जाता है (क्योंकि वह) नाशवंत जगत को ही दृष्टि में रखता। नाशवंत जगत को ही कानों में बसाए रखता है। नाशवंत जगत की बातें ही मुँह से करता रहता है। हे नानक ! आप (सदा परमात्मा की) सिफत-सालाह करता रह। (सिफत-सालाह को भुला के) और (सारा उद्यम) अहंकार के कारण जनम-मरण के चक्कर बनाए रखते हैं। 11। हे भाई ! (परमात्मा की सिफतसालाह करने वाले मनुष्य) कोई विरले-विरले (बहुत कम) हैं। ज्यादा नहीं हैं। (आम तौर पर) जगत दिखावे के काम ही (करता रहता है। आत्मिक जीवन को) नीचा करने वाले बोल ही (बोलता रहता है)। 12। हे नानक ! (जिस मनुष्य के हृदय में प्रेम की चोट) लगती है (वह मनुष्य) तुरंत स्वैभाव की ओर से मर जाता है (उसके अंदर से स्वार्थ खत्म हो जाता है)। (उसके अंदर स्वार्थ के) जीवन का जोर नहीं रह जाता। हे भाई ! जो मनुष्य (प्रभू-चरनों की प्रीत की) चोट से स्वै भाव की ओर से मर जाता है (उसका जीवन प्रभू-दर पर कबूल हो जाता है) वही लगी हुई चोट (प्रभू-दर पर) प्रवान होती है। पर। हे भाई ! (यह प्रेम की चोट) उस मनुष्य को ही लगती है जिसको (परमात्मा आप) लगाता है (जब यह चोट परमात्मा की ओर से लगती है) तब ही यह लगी हुई (चोट) कबूल होती है (सफल होती है)। हे भाई ! उस समझदार (तीरंदाज-प्रभू) ने (जिस मनुष्य के हृदय में प्रेम का तीर) भेद दिया; (उस हृदय में से यह) प्रेम का तीर फिर नहीं निकलता। 13। हे भाई ! (तीर्थ-स्नान आदि से) कोई भी मनुष्य शरीर-घड़े को पवित्र नहीं कर सकता। क्योंकि ये बनाया ही ऐसा है कि इसको विकारों का कीचड़ हमेशा लगा रहता है। (हवा। पानी। मिट्टी। आग। आकाश) पाँच तत्व इकट्ठे करके यह शरीर-बर्तन एक नाशवंत सा खिलौना बनाया गया है। हाँ। हे भाई ! जब उस परमात्मा की रज़ा होती है (मनुष्य को गुरू मिलता है। गुरू मनुष्य के) शरीर-बर्तन को पवित्र कर देता है। (गुरू मनुष्य के अंदर) सबसे ऊँची रॅबी-जोति जगा के (रॅबी जोति का) बाजा बजा देता है। (रॅबी-जोति का रॅबी-सिफत सालाह का इतना प्रबल प्रभाव बना देता है कि मनुष्य के अंदर विकारों का शोर सुना ही नहीं जाता। विकारों की कोई पेश नहीं चलती कि कुकर्मों का कोई कीचड़ बिखेर सकें)। 14। हे भाई ! जो मनुष्य मन से घोर अंधे हैं (महा मूर्ख हैं) वे बताने पर भी (इन्सानी) फर्ज नहीं जानते। मन अंधा होने के कारण। हृदय केवल (धर्म की ओर से) उलटा होने के कारण वे लोग बहुत ही कोझे (विचलित जीवन वाले) लगते हैं। कई मनुष्य ऐसे होते हैं जो (खुद) बात करनी भी जानते हैं। और किसी का कहा भी समझते हें। वे मनुष्य सुचॅजे और सुंदर भी लगते हैं। कई लोगों को ना जोगियों के नाद का रस। ना वेद का शौक। ना राग की खींच- किसी भी तरह की कोमल कला की ओर उनकी रुचि ही नहीं। ना (विचारों में) सफलता। ना सुचॅजी बुद्धि। ना अकल की सार है। और एक अक्षर भी पढ़ना नहीं जानते (फिर भी। अकड़ ही अकड़ दिखाते हैं)। हे नानक ! जिनमें कोई गुण ना हो। और अहंकार किए जाएं। वह मनुष्य केवल गधे हैं। 15। हे भाई ! (हमारी नजरों में) वह (मनुष्य असल) ब्राहमण है जो परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाले रखता है। जो यही जप-कर्म करता है। यही तप कर्म करता है। यही संजम करम करता है (जो परमात्मा की भगती को ही जप-तप-संजम समझता है) जो मीठे स्वभाव और संतोख का फर्ज निभाता है। जो माया के मोह के फंदों को तोड़ लेता है और माया के मोह से आजाद हो जाता है। हे भाई ! वही ब्राहमण आदर-सत्कार का हॅकदार है। 16। हे भाई ! (हमारी नजरों में) वही मनुष्य खत्री है जो (कामादिक वैरियों को खत्म करने के लिए) नेक कर्म करने वाला शूरवीर बनता है। जो अपने शरीर को (अपने जीवन को। औरों में) भले कर्म बाँटने के लिए वसीला बनाता है। जो (अपने शरीर को किसान के खेत की तरह) खेत समझता है (और। इस खेत में परमात्मा के नाम की) दाति (नाम-बीज) बीजता है। हे भाई ! ऐसा खत्री परमात्मा की हजूरी में कबूल होता है। पर जो मनुष्य लब-लोभ और अन्य ठॅगी आदि करता रहता है (वह जनम का चाहे खत्री ही हो) वह मनुष्य (लब आदि) किए हुए कर्मों का फल खुद ही भुगतता है (वह मनुष्य कामादिक विकारों का शिकार हुआ ही रहता है। वह नहीं है सूरमा)। 17। हे भाई ! (अपने) शरीर को (धूणियों से) तंदूर की तरह ना जला। और। हड्डियों को (धूणियों के साथ) इस तरह ना जला जैसे ये ईधन है। (आपके) सिर ने (आपके) पैरों ने कुछ नहीं बिगाड़ा (इनको धूणियों के साथ क्यों दुखी करता है। इनको दुखी ना कर) परमात्मा (की याद) को अपने हृदय में संभाल के रख। 18।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “परमात्मा (उस मनुष्य को) मेहर की निगाह से देखता है (इसलिए उसका) हाथ कीचड़ में नहीं डूबता (उसका मन विकारों में नहीं फसता)।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।