अंग 1412

अंग
1412
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਭਨੀ ਘਟੀ ਸਹੁ ਵਸੈ ਸਹ ਬਿਨੁ ਘਟੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤੇ ਸੋਹਾਗਣੀ ਜਿਨੑਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥੧੯॥
ਜਉ ਤਉ ਪ੍ਰੇਮ ਖੇਲਣ ਕਾ ਚਾਉ ॥
ਸਿਰੁ ਧਰਿ ਤਲੀ ਗਲੀ ਮੇਰੀ ਆਉ ॥
ਇਤੁ ਮਾਰਗਿ ਪੈਰੁ ਧਰੀਜੈ ॥
ਸਿਰੁ ਦੀਜੈ ਕਾਣਿ ਨ ਕੀਜੈ ॥੨੦॥
ਨਾਲਿ ਕਿਰਾੜਾ ਦੋਸਤੀ ਕੂੜੈ ਕੂੜੀ ਪਾਇ ॥
ਮਰਣੁ ਨ ਜਾਪੈ ਮੂਲਿਆ ਆਵੈ ਕਿਤੈ ਥਾਇ ॥੨੧॥
ਗਿਆਨ ਹੀਣੰ ਅਗਿਆਨ ਪੂਜਾ ॥
ਅੰਧ ਵਰਤਾਵਾ ਭਾਉ ਦੂਜਾ ॥੨੨॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਗਿਆਨੁ ਧਰਮ ਬਿਨੁ ਧਿਆਨੁ ॥
ਸਚ ਬਿਨੁ ਸਾਖੀ ਮੂਲੋ ਨ ਬਾਕੀ ॥੨੩॥
ਮਾਣੂ ਘਲੈ ਉਠੀ ਚਲੈ ॥
ਸਾਦੁ ਨਾਹੀ ਇਵੇਹੀ ਗਲੈ ॥੨੪॥
ਰਾਮੁ ਝੁਰੈ ਦਲ ਮੇਲਵੈ ਅੰਤਰਿ ਬਲੁ ਅਧਿਕਾਰ ॥
ਬੰਤਰ ਕੀ ਸੈਨਾ ਸੇਵੀਐ ਮਨਿ ਤਨਿ ਜੁਝੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਸੀਤਾ ਲੈ ਗਇਆ ਦਹਸਿਰੋ ਲਛਮਣੁ ਮੂਓ ਸਰਾਪਿ ॥
ਨਾਨਕ ਕਰਤਾ ਕਰਣਹਾਰੁ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਿ ॥੨੫॥
ਮਨ ਮਹਿ ਝੂਰੈ ਰਾਮਚੰਦੁ ਸੀਤਾ ਲਛਮਣ ਜੋਗੁ ॥
ਹਣਵੰਤਰੁ ਆਰਾਧਿਆ ਆਇਆ ਕਰਿ ਸੰਜੋਗੁ ॥
ਭੂਲਾ ਦੈਤੁ ਨ ਸਮਝਈ ਤਿਨਿ ਪ੍ਰਭ ਕੀਏ ਕਾਮ ॥
ਨਾਨਕ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਸੋ ਕਿਰਤੁ ਨ ਮਿਟਈ ਰਾਮ ॥੨੬॥
ਲਾਹੌਰ ਸਹਰੁ ਜਹਰੁ ਕਹਰੁ ਸਵਾ ਪਹਰੁ ॥੨੭॥
सभनी घटी सहु वसै सह बिनु घटु न कोइ ॥
नानक ते सोहागणी जिन॑ा गुरमुखि परगटु होइ ॥१९॥
जउ तउ प्रेम खेलण का चाउ ॥
सिरु धरि तली गली मेरी आउ ॥
इतु मारगि पैरु धरीजै ॥
सिरु दीजै काणि न कीजै ॥२०॥
नालि किराड़ा दोसती कूड़ै कूड़ी पाइ ॥
मरणु न जापै मूलिआ आवै कितै थाइ ॥२१॥
गिआन हीणं अगिआन पूजा ॥
अंध वरतावा भाउ दूजा ॥२२॥
गुर बिनु गिआनु धरम बिनु धिआनु ॥
सच बिनु साखी मूलो न बाकी ॥२३॥
माणू घलै उठी चलै ॥
सादु नाही इवेही गलै ॥२४॥
रामु झुरै दल मेलवै अंतरि बलु अधिकार ॥
बंतर की सैना सेवीऐ मनि तनि जुझु अपारु ॥
सीता लै गइआ दहसिरो लछमणु मूओ सरापि ॥
नानक करता करणहारु करि वेखै थापि उथापि ॥२५॥
मन महि झूरै रामचंदु सीता लछमण जोगु ॥
हणवंतरु आराधिआ आइआ करि संजोगु ॥
भूला दैतु न समझई तिनि प्रभ कीए काम ॥
नानक वेपरवाहु सो किरतु न मिटई राम ॥२६॥
लाहौर सहरु जहरु कहरु सवा पहरु ॥२७॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! प्रभू-पति सारे शरीरों में बसता है। कोई भी शरीर (ऐसा) नहीं है जो पति-प्रभू के बिना हो (जिसमें पति-प्रभू ना बसता हो। पर बसता है गुप्त)। हे नानक ! वह जीव-सि्त्रयां भाग्यशाली हैं जिनके अंदर (वह पति’-प्रभू) गुरू के माध्यम से प्रकट हो जाता है। 19। हे भाई ! अगर तुझे (प्रभू-प्रेम की) खेल-खलने का शौक है। तो (अपना) सिर तली पर रख के मेरी गली में आ (लोक-लाज छोड़ के अहंकार दूर कर के आ)। (प्रभू-प्रीति के) इस रास्ते पर (तब ही) पैर धरा जा सकता है (जब) सिर भेटा किया जाए। पर कोई झिझक ना की जाए (अर्थात। जब बिना किसी झिझक के लोक-लाज और अहंकार छोड़ा जाए)। 20। हे भाई ! अगर हर वक्त माया की गिनती गिनने वाले मनुष्य के साथ दोस्ती बनाई जाए। (तो उस किराड़ के अंदरूनी) माया के मोह के कारण (उसकी दोस्ती की) पायां भी ऐतबार-योग्य नहीं होती। हे मूलिया ! (माया के मोह में फसा हुआ मनुष्य सदा मौत से बचे रहने के उपाय करता रहता है। पर उसको ये बात) सूझती ही नहीं कि मौत किसी भी जगह पर (किसी भी वक्त) आ सकती है। 21। हे भाई ! जो मनुष्य आत्मिक जीवन की सूझ से वंचित होते हैं। वह आत्मिक जीवन से बेसमझी को ही सदा पसंद करते हैं। हे भाई ! (जिन मनुष्यों के अंदर) माया का मोह (टिका रहता है। उनका) वर्तण-व्यवहार (आत्मिक जीवन के पक्ष से) अंधा (बनाए रखने वाला होता) है। 22। हे भाई ! गुरू (की शरण पड़े) बिना परमात्मा के साथ गहरी सांझ नहीं बनती। (इस गहरी सांझ को मनुष्य जीवन का आवश्यक) फर्ज बनाए बिना (हरी-नाम सिमरन की) लगन नहीं बनती। सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन के बिना (और-और मायावी उद्यमों की जीवन-) राहदारी के कारण (आत्मिक जीवन का वह) सरमाया भी पल्ले नहीं रह जाता (जिसने मनुष्य-जन्म ले के दिया था)। 23। हे भाई ! (परमात्मा) मनुष्य को (जगत में कोई आत्मिक लाभ कमाने के लिए) भेजता है। (पर अगर आत्मिक जीवन की कमाई कमाए बिना ही मनुष्य जगत से) उठ चलता है। (तो) इस तरह का जीवन जीने में मनुष्य (को काई) आत्मिक आनंद हासिल नहीं होता। 24। (श्री रामचंद्र उस करतार की बराबरी नहीं कर सकता। देखो। रावण के साथ लड़ने के लिए) श्री रामचंद्र फौजें इकट्ठी करता है। (उसके) अंदर (फौजें इकट्ठी करने के) अधिकार की ताकत भी है। बाँदरों की (उस) फौज से (उसकी) सेवा भी हो रही है (जिस सेना के) मन में तन में युद्ध करने का बेअंत चाव है। (फिर भी श्री) रामचंद्र (तब) दुखी होता है (दुखी हुआ। जब) सीता (जी) को रावण ले गया था। (और। फिर जब श्री रामचंद्र जी का भाई) लक्ष्मण श्राप से मर गया था। हे नानक ! करतार सब कुछ कर सकने की समर्थता वाला है (उसको कभी झुरने की दुखी होने की आवश्यक्ता नहीं)। वह तो पैदा करके नाश करके (सब कुछ करके खुद ही) देखता है। 25। श्री) रामचंद्र (अपने) मन में सीता (जी) के लिए दुखी हुआ (जब सीता जी को रावण चुरा के ले गया। फिर) दुखी हुआ लक्ष्मण की खातिर (जब रणभूमि में लक्ष्मण बरछी से मूर्छित हुआ)। (तब श्री रामचंद्र ने) हनूमान को याद किया जो (परमात्मा से बने) संजोग के कारण (श्री रामचंद्र जी की शरण) आया था। मूर्ख रावण (भी) यह बात नहीं समझा कि ये सारे काम परमात्मा ने (खुद ही) किए हैं। हे भाई ! वह परमात्मा (तो) बेमुथाज है (श्री रामचंद्र उस परमात्मा की बराबरी नहीं कर सकता)। (श्री) रामचंद्र (जी) से (भी) भावी नहीं मिट सकी। 26। हे भाई ! लोहौर का शहर (शहर निवासियों के लिए आत्मिक मौत लाए रखने के कारण) जहर (बना हुआ है। क्योंकि यहाँ नित्य सवेरे ईयवरीय सिफत-सालाह की बजाए) सवा पहर (दिन चढ़ने तक मास की खातिर पशुओं पर) कहर (होता रहता है। मास आदि खाना और विषौ भोगना ही लाहौर-निवासियों का जीवन-उद्देश्य बन रहा है)। 27।
ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਲਾਹੌਰ ਸਹਰੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰੁ ਸਿਫਤੀ ਦਾ ਘਰੁ ॥੨੮॥
महला ३ ॥
लाहौर सहरु अंम्रित सरु सिफती दा घरु ॥२८॥

हिन्दी अर्थ: महला ३। हे भाई ! (अब) लाहौर शहर अमृत का चश्मा बन गया है। परमात्मा की सिफत-सालाह का श्रोत बन गया है (क्योंकि गुरू रामदास जी का जन्म हुआ है)। 28।
ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਉਦੋਸਾਹੈ ਕਿਆ ਨੀਸਾਨੀ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਅੰਨੀ ॥
ਉਦੋਸੀਅ ਘਰੇ ਹੀ ਵੁਠੀ ਕੁੜਿੲਂੀ ਰੰਨੀ ਧੰਮੀ ॥
ਸਤੀ ਰੰਨੀ ਘਰੇ ਸਿਆਪਾ ਰੋਵਨਿ ਕੂੜੀ ਕੰਮੀ ॥
ਜੋ ਲੇਵੈ ਸੋ ਦੇਵੈ ਨਾਹੀ ਖਟੇ ਦੰਮ ਸਹੰਮੀ ॥੨੯॥
ਪਬਰ ਤੂੰ ਹਰੀਆਵਲਾ ਕਵਲਾ ਕੰਚਨ ਵੰਨਿ ॥
ਕੈ ਦੋਖੜੈ ਸੜਿਓਹਿ ਕਾਲੀ ਹੋਈਆ ਦੇਹੁਰੀ ਨਾਨਕ ਮੈ ਤਨਿ ਭੰਗੁ ॥
ਜਾਣਾ ਪਾਣੀ ਨਾ ਲਹਾਂ ਜੈ ਸੇਤੀ ਮੇਰਾ ਸੰਗੁ ॥
ਜਿਤੁ ਡਿਠੈ ਤਨੁ ਪਰਫੁੜੈ ਚੜੈ ਚਵਗਣਿ ਵੰਨੁ ॥੩੦॥
ਰਜਿ ਨ ਕੋਈ ਜੀਵਿਆ ਪਹੁਚਿ ਨ ਚਲਿਆ ਕੋਇ ॥
ਗਿਆਨੀ ਜੀਵੈ ਸਦਾ ਸਦਾ ਸੁਰਤੀ ਹੀ ਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਸਰਫੈ ਸਰਫੈ ਸਦਾ ਸਦਾ ਏਵੈ ਗਈ ਵਿਹਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਕਿਸ ਨੋ ਆਖੀਐ ਵਿਣੁ ਪੁਛਿਆ ਹੀ ਲੈ ਜਾਇ ॥੩੧॥
ਦੋਸੁ ਨ ਦੇਅਹੁ ਰਾਇ ਨੋ ਮਤਿ ਚਲੈ ਜਾਂ ਬੁਢਾ ਹੋਵੈ ॥
ਗਲਾਂ ਕਰੇ ਘਣੇਰੀਆ ਤਾਂ ਅੰਨੑੇ ਪਵਣਾ ਖਾਤੀ ਟੋਵੈ ॥੩੨॥
ਪੂਰੇ ਕਾ ਕੀਆ ਸਭ ਕਿਛੁ ਪੂਰਾ ਘਟਿ ਵਧਿ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਐਸਾ ਜਾਣੈ ਪੂਰੇ ਮਾਂਹਿ ਸਮਾਂਹੀ ॥੩੩॥
महला १ ॥
उदोसाहै किआ नीसानी तोटि न आवै अंनी ॥
उदोसीअ घरे ही वुठी कुड़िइंी रंनी धंमी ॥
सती रंनी घरे सिआपा रोवनि कूड़ी कंमी ॥
जो लेवै सो देवै नाही खटे दंम सहंमी ॥२९॥
पबर तूं हरीआवला कवला कंचन वंनि ॥
कै दोखड़ै सड़िओहि काली होईआ देहुरी नानक मै तनि भंगु ॥
जाणा पाणी ना लहां जै सेती मेरा संगु ॥
जितु डिठै तनु परफुड़ै चड़ै चवगणि वंनु ॥३०॥
रजि न कोई जीविआ पहुचि न चलिआ कोइ ॥
गिआनी जीवै सदा सदा सुरती ही पति होइ ॥
सरफै सरफै सदा सदा एवै गई विहाइ ॥
नानक किस नो आखीऐ विणु पुछिआ ही लै जाइ ॥३१॥
दोसु न देअहु राइ नो मति चलै जां बुढा होवै ॥
गलां करे घणेरीआ तां अंन॑े पवणा खाती टोवै ॥३२॥
पूरे का कीआ सभ किछु पूरा घटि वधि किछु नाही ॥
नानक गुरमुखि ऐसा जाणै पूरे मांहि समांही ॥३३॥

हिन्दी अर्थ: महला १। हे भाई ! सिर्फ माया की खातिर की हुई दौड़-भाग की क्या पहचान है। (पहचान ये है कि इस दौड़-भाग करने वाले को) अन्न-धन की कमी नहीं होती। (पर सिर्फ माया की खातिर दौड़-भाग करने के कारण हरी-नाम के प्रति) लापरवाही भी सदा हृदय-घर में बनी रहती है। माया के मोह में फसा इन्द्रियों के शोर में पड़ा रहता है। (दो आँखें। दो कान। एक नाक। एक मुँह और एक काम इन्द्री। इन) सातों ही इन्द्रियों का झगड़ा शरीर-घर में बना रहता है। ये इन्द्रियां (विकारों वाले) झूठे कामों के लिए शोर मचाती रहती हैं। (जो मनुष्य निरी माया की खातिर ही दौड़-भाग करता रहता है। वह) पैसे तो कमाता है। पर सहम में टिका रहता है। जो कुछ कमाता है वह औरों को हाथों से देता नहीं। 29। हे सरोवर ! तू (कभी) चार-चुफेरों से हरा-भरा था। (तेरे अंदर) सोने के रंग जैसे (चमकते) कमल-फूल (खिले हुए थे)। अब तू किस नुक्स के कारण जल गया है। तेरा सुंदर शरीर क्यों काला हो गया है। हे नानक ! (इस कालिख का कारण यह है कि) मेरे शरीर में (पानी की) कमी आ गई है। मुझे ये समझ आ रही है कि जिस (पानी) से मेरा (सदा) साथ (रहता था) जिस (पानी) के दर्शन करके शरीर खिला रहता है। चार-गुना रंग चढ़ा रहता है (वह) पानी अब मुझे नहीं मिलता। 30। हे भाई ! (लंबी) उम्र भोग-भोग के किसी मनुष्य की कभी तसल्ली नहीं हुई। ना कोई मनुष्य दुनिया वाले सारे धंधे खत्म करके (यहाँ से) चलता है (ना ही कोई यह कहता है कि अब मेरे काम-धंधे खत्म हो गए हैं)। हे भाई ! आत्मिक जीवन की सूझ वाला मनुष्य सदा ही आत्मिक जीवन जीता है (सदा अपनी सुरति परमात्मा की याद में जोड़ी रखता है) (परमात्मा में) सुरति जोड़े रखने वाले मनुष्य की ही (लोक-परलोक में) इज्जत होती है। पर। हे नानक ! (माया में ग्रसित मनुष्य की उम्र) सदा ही कंजूसी करते-करते इन बचतों में ही बीतती जाती है (बचत-मारे मनुष्य को भी मौत) उसकी सलाह लिए बगैर ही यहाँ से ले चलती है। किसी की भी पेश नहीं जा सकती। 31। हे भाई ! मायाधारी मनुष्य के सिर पर दोष ना थोपो (माया का मोह उसको सदा माया में ही जकड़े रखता है)। जब (माया-ग्रसित मनुष्य) बुढा (बड़ी उम्र का) हो जाता है (तब तो परमार्थ की तरफ काम करने की उसकी) बुद्धि (बिल्कुल ही) खत्म होती जाती है। (वह हर वक्त माया की ही) बहुत सारी बातें करता रहता है। हे भाई ! अंधे मनुष्य ने तो टोए-टिॅबों-गढों में ही गिरना हुआ (जिस मनुष्य को आत्मिक जीवन का रास्ता दिखे ही ना। उसने तो मोह के ठेढे खा-खा के दुखों में ही पड़े रहना हुआ)। 32। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य ये निश्चय रखता है कि सर्व गुण सम्पन्न परमात्मा की रची हुई जगत-मर्यादा अभुल है। इसमें कहीं कोई नुक्स नहीं। हे नानक ! (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य इस निश्चय की बरकति से) सारे गुणों के मालिक परमात्मा (की याद) में लीन रहते हैं। 33।

संदर्भ: यह अंग 1412 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Sarojini Nagar की hagling के बीच कोई unexpected calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1412” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1413 →, पीछे का: ← अंग 1411

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।