अंग 1410

अंग
1410
राग Salok Vaaraan Thay Vadheek
राग: Salok Vaaraan Thay Vadheek · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ ਅਕਾਲ ਮੂਰਤਿ ਅਜੂਨੀ ਸੈਭੰ ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਲੋਕ ਵਾਰਾਂ ਤੇ ਵਧੀਕ ॥
ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਉਤੰਗੀ ਪੈਓਹਰੀ ਗਹਿਰੀ ਗੰਭੀਰੀ ॥
ਸਸੁੜਿ ਸੁਹੀਆ ਕਿਵ ਕਰੀ ਨਿਵਣੁ ਨ ਜਾਇ ਥਣੀ ॥
ਗਚੁ ਜਿ ਲਗਾ ਗਿੜਵੜੀ ਸਖੀਏ ਧਉਲਹਰੀ ॥
ਸੇ ਭੀ ਢਹਦੇ ਡਿਠੁ ਮੈ ਮੁੰਧ ਨ ਗਰਬੁ ਥਣੀ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਮੁੰਧੇ ਹਰਣਾਖੀਏ ਗੂੜਾ ਵੈਣੁ ਅਪਾਰੁ ॥
ਪਹਿਲਾ ਵਸਤੁ ਸਿਞਾਣਿ ਕੈ ਤਾਂ ਕੀਚੈ ਵਾਪਾਰੁ ॥
ਦੋਹੀ ਦਿਚੈ ਦੁਰਜਨਾ ਮਿਤ੍ਰਾਂ ਕੂੰ ਜੈਕਾਰੁ ॥
ਜਿਤੁ ਦੋਹੀ ਸਜਣ ਮਿਲਨਿ ਲਹੁ ਮੁੰਧੇ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਦੀਜੈ ਸਜਣਾ ਐਸਾ ਹਸਣੁ ਸਾਰੁ ॥
ਤਿਸ ਸਉ ਨੇਹੁ ਨ ਕੀਚਈ ਜਿ ਦਿਸੈ ਚਲਣਹਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਨੑੀ ਇਵ ਕਰਿ ਬੁਝਿਆ ਤਿਨੑਾ ਵਿਟਹੁ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥੨॥
ਜੇ ਤੂੰ ਤਾਰੂ ਪਾਣਿ ਤਾਹੂ ਪੁਛੁ ਤਿੜੰਨੑ ਕਲ ॥
ਤਾਹੂ ਖਰੇ ਸੁਜਾਣ ਵੰਞਾ ਏਨੑੀ ਕਪਰੀ ॥੩॥
ਝੜ ਝਖੜ ਓਹਾੜ ਲਹਰੀ ਵਹਨਿ ਲਖੇਸਰੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਿਉ ਆਲਾਇ ਬੇੜੇ ਡੁਬਣਿ ਨਾਹਿ ਭਉ ॥੪॥
ਨਾਨਕ ਦੁਨੀਆ ਕੈਸੀ ਹੋਈ ॥
ਸਾਲਕੁ ਮਿਤੁ ਨ ਰਹਿਓ ਕੋਈ ॥
ਭਾਈ ਬੰਧੀ ਹੇਤੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਦੁਨੀਆ ਕਾਰਣਿ ਦੀਨੁ ਗਵਾਇਆ ॥੫॥
ਹੈ ਹੈ ਕਰਿ ਕੈ ਓਹਿ ਕਰੇਨਿ ॥
ਗਲੑਾ ਪਿਟਨਿ ਸਿਰੁ ਖੋਹੇਨਿ ॥
ਨਾਉ ਲੈਨਿ ਅਰੁ ਕਰਨਿ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਨ ਬਲਿਹਾਰੈ ਜਾਇ ॥੬॥
ਰੇ ਮਨ ਡੀਗਿ ਨ ਡੋਲੀਐ ਸੀਧੈ ਮਾਰਗਿ ਧਾਉ ॥
ਪਾਛੈ ਬਾਘੁ ਡਰਾਵਣੋ ਆਗੈ ਅਗਨਿ ਤਲਾਉ ॥
ਸਹਸੈ ਜੀਅਰਾ ਪਰਿ ਰਹਿਓ ਮਾ ਕਉ ਅਵਰੁ ਨ ਢੰਗੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਛੁਟੀਐ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਿਉ ਸੰਗੁ ॥੭॥
ਬਾਘੁ ਮਰੈ ਮਨੁ ਮਾਰੀਐ ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰ ਦੀਖਿਆ ਹੋਇ ॥
ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਹਰਿ ਮਿਲੈ ਬਹੁੜਿ ਨ ਮਰਣਾ ਹੋਇ ॥
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
सलोक वारां ते वधीक ॥
महला १ ॥
उतंगी पैओहरी गहिरी गंभीरी ॥
ससुड़ि सुहीआ किव करी निवणु न जाइ थणी ॥
गचु जि लगा गिड़वड़ी सखीए धउलहरी ॥
से भी ढहदे डिठु मै मुंध न गरबु थणी ॥१॥
सुणि मुंधे हरणाखीए गूड़ा वैणु अपारु ॥
पहिला वसतु सिञाणि कै तां कीचै वापारु ॥
दोही दिचै दुरजना मित्रां कूं जैकारु ॥
जितु दोही सजण मिलनि लहु मुंधे वीचारु ॥
तनु मनु दीजै सजणा ऐसा हसणु सारु ॥
तिस सउ नेहु न कीचई जि दिसै चलणहारु ॥
नानक जिन॑ी इव करि बुझिआ तिन॑ा विटहु कुरबाणु ॥२॥
जे तूं तारू पाणि ताहू पुछु तिड़ंन॑ कल ॥
ताहू खरे सुजाण वंञा एन॑ी कपरी ॥३॥
झड़ झखड़ ओहाड़ लहरी वहनि लखेसरी ॥
सतिगुर सिउ आलाइ बेड़े डुबणि नाहि भउ ॥४॥
नानक दुनीआ कैसी होई ॥
सालकु मितु न रहिओ कोई ॥
भाई बंधी हेतु चुकाइआ ॥
दुनीआ कारणि दीनु गवाइआ ॥५॥
है है करि कै ओहि करेनि ॥
गल॑ा पिटनि सिरु खोहेनि ॥
नाउ लैनि अरु करनि समाइ ॥
नानक तिन बलिहारै जाइ ॥६॥
रे मन डीगि न डोलीऐ सीधै मारगि धाउ ॥
पाछै बाघु डरावणो आगै अगनि तलाउ ॥
सहसै जीअरा परि रहिओ मा कउ अवरु न ढंगु ॥
नानक गुरमुखि छुटीऐ हरि प्रीतम सिउ संगु ॥७॥
बाघु मरै मनु मारीऐ जिसु सतिगुर दीखिआ होइ ॥
आपु पछाणै हरि मिलै बहुड़ि न मरणा होइ ॥

हिन्दी अर्थ: वह अद्वितीय ईश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल एक (ऑकार स्वरूप) है, नाम उसका सत्य है, वह देवी-देवता, मनुष्य सहित सम्पूर्ण सृष्टि की रचना करने वाला है, वह सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है, (समदृष्टि के कारण) वह निर्वेर है, वह कालातीत है (भूत, वर्तमान, भविष्य से परे) वह ब्रह्ममूर्ति अमर है, वह जन्म-मरण के बन्धन से रहित है, वह अपने आप ही प्रगट हुआ है, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है। (वे श्लोक जो ‘आदिग्रंथ’ की बाईस वारों में से बढ़ गए, जिनका उन वारों में संकलन नहीं हो सका। इसलिए गुरु अर्जुन देव जी ने उन श्लोकों का ‘सलोक वारां ते वर्धीक’ नामक शीर्षक पर संकलन किया) महला १ ॥ ऊँचे लंबे कद वाली। भरी जवानी में पहुँची हुई। माण में मॅती हुई मस्त चाल वाली (अपनी सहेली को कहती है- हे सहेलिए !) भरी हुई छाती के कारण मुझसे झुका नहीं जाता। (बता। ) मैं (अपनी) सास को नमस्कार कैसे करूँ। (कैसे माथा टेकूँ। )। (आगे से सहेली उक्तर देती है- देख। ) जो पहाड़ों जैसे पक्के महलों को चूने का पलस्तर लगा होता था। वह (पक्के महल) भी गिरते मैंने देख लिए हैं (तेरी जवानी की तो कोई बिसात ही नहीं है ) हे सहेलिए ! (इस) भरी हुई जवानी के कारण अहंकार ना कर (इस जवानी को जाते देर नहीं लगनी। )। 1। हे सुंदर नेत्रों वाली भोली जवान कन्या ! (हे जगत-रचना में से सोहणी जीव-सि्त्रऐ !) मेरी एक बहुत गहरी भेद की बात सुन। (जब कोई चीज़ खरीदने लगें। तो) पहले (उस) चीज़ को परख के तब उसका व्च्यापार करना चाहिए (तभी वह खरीदनी चाहिए)। हे भोली जवान कन्या ! (कामादिक विकार आत्मिक जीवन के वैरी हैं। इन) दुष्टों को (अंदर से निकाल भगाने के लिए प्रभू की सिफत-सालाह की) दुहाई देते रहना चाहिए (भले गुण आत्मिक जीवन के असल मित्र हैं। इन) मित्रों के साथ की खातिर (परमात्मा की) सिफत-सालाह करते रहना चाहिए। हे भोलीऐ ! जिस दोहाई की बरकति से ये सज्जन मिले रहें। (उस दोहाई की) विचार को (अपने अंदर) संभाल के रख। (इन) सज्जनों (के मिलाप) की खातिर अपना तन अपना मन भेट कर देना चाहिए (अपने मन और अपनी इन्द्रियों की नीच प्रेरणा से बचे रहना चाहिए) (इस तरह एक) ऐसा (आत्मिक) आनंद पैदा होता है (जो अन्य सारी खुशियों से श्रेष्ठ होता है)। हे भोलिऐ ! (ये जगत-पसारा) नाशवंत दिख रहा है; इससे मोह नहीं करना चाहिए। हे नानक ! (कह-) जिन (भाग्यशालियों ने) (आत्मिक जीवन के भेद को) इस तरह समझा है मैं उन पर से सदके (जाता हूँ)। 2। हे भाई ! अगर तू (संसार-समुंद्र के) पानियों का तैराक (बनना चाहता है)। (तो तैरने की जाच) उनसे पूछ (जिनको इस संसार-समुंद्र में से) पार लांघ जाने का सलीका है। हे भाई ! वह मनुष्य असल समझदार (तैराक हैं। जो संसार-समुंद्र की इन विकारों की लहरों में से पार लांघते हैं)। मैं (भी उनकी संगति में ही) इन लहरों से पार लांघ सकता हूँ। 3। हे भाई ! (इस संसार-समुंद्र में विकारों की) झड़ियां (लगीं हुई हैं। विकारों के) झक्खड़ (झूल रहे हैं। विकारों की) बाढ़ (आ रही हैं। विकारों की) लाखों लहरें उठ रही हैं। (अगर तू अपनी जिंदगी की बेड़ी को बचाना चाहता है। तो) गुरू के पास पुकार कर (इस तरह तेरी जीवन-) नईया का (इस संसार-समुंद्र में) डूब जाने का कोई खतरा नहीं रह जाएगा। 4। हे नानक ! दुनिया (की लुकाई) अजब नीचली तरफ जा रही है। सही जीवन-रास्ता बताने वाले मित्र कहीं कोई मिलते नहीं। भाईयों-सम्बन्धियों के मोह में फस के (मनुष्य परमात्मा का) प्यार (अपने अंदर से खत्म किए बैठा है) दुनिया (की माया) की खातिर आत्मिक जीवन का सरमाया गवाए जा रहा है। 5। हे भाई ! (किसी प्यारे सम्बन्धि के मरने पर औरतें) ‘हाय-हाय’ कह-कह के ‘ओय ओय’ करती हैं (मुँह से कहती हैं। अपनी) गालों को पीटती हैं (अपने) सिर (के बाल) खींचती हैं (यह बहुत ही बुरा काम है)। हे भाई ! जो प्राणी (ऐसे सदमे के समय भी परमात्मा का) नाम जपते हैं। और (परमात्मा की) रज़ा को मानते हैं। नानक उनके सदके जाता है। 6। हे मन ! (विकारों-भरे) टेढ़े (जीवन-) राह पर नहीं भटकते फिरना चाहिए। हे मन ! सीधे (जीवन-) राह पर दौड़। (टेढ़े रास्ते पर चलने से) इस लोक में भयानक आत्मिक मौत (आत्मिक जीवन को खाए जाती है। और) आगे परलोक में जठराग्नि के बवंडर में (डुबो लेती है भाव। जनम-मरण का चक्र ग्रस लेता है)। (टेढ़े रास्ते पर चलने से हर वक्त यह) जिंद सहम में पड़ी रहती है। हे मन ! (इस टेढ़े रास्ते से बचने के लिए गुरू की शरण के बिना) मुझे कोई और तरीका नहीं सूझता। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (ही इस टेढ़े रास्ते से) बचा जा सकता है। और प्रीतम प्रभू का साथ बन सकता है। 7। हे भाई ! जिस (मनुष्य) को गुरू की शिक्षा (प्राप्त) होती है। (उसका) मन वश में आ जाता है। (उसके अंदर से आत्मिक जीवन को खा जाने वाला) बाघ मर जाता है। (वह मनुष्य) अपने आत्मिक जीवन को परखता रहता है। वह परमात्मा को मिल जाता है। दोबारा उस को जनम-मरन का चक्कर नहीं पड़ता।

संदर्भ: यह अंग 1410 है, राग Salok Vaaraan Thay Vadheek का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

IGI Airport की 3 बजे की flight का इंतज़ार, सब लोग phones पर, मन कहीं और।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 32 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1410” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Salok Vaaraan Thay Vadheek राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1411 →, पीछे का: ← अंग 1409

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।