अंग
1408
राग Svaiyay Mehl 5
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਭੈ ਨਿਰਭਉ ਮਾਣਿਅਉ ਲਾਖ ਮਹਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਯਉ ॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰ ਗਤਿ ਗਭੀਰੁ ਸਤਿਗੁਰਿ ਪਰਚਾਯਉ ॥
ਗੁਰ ਪਰਚੈ ਪਰਵਾਣੁ ਰਾਜ ਮਹਿ ਜੋਗੁ ਕਮਾਯਉ ॥
ਧੰਨਿ ਧੰਨਿ ਗੁਰੁ ਧੰਨਿ ਅਭਰ ਸਰ ਸੁਭਰ ਭਰਾਯਉ ॥
ਗੁਰ ਗਮ ਪ੍ਰਮਾਣਿ ਅਜਰੁ ਜਰਿਓ ਸਰਿ ਸੰਤੋਖ ਸਮਾਇਯਉ ॥
ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਸਹਜਿ ਜੋਗੁ ਨਿਜੁ ਪਾਇਯਉ ॥੮॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰ ਗਤਿ ਗਭੀਰੁ ਸਤਿਗੁਰਿ ਪਰਚਾਯਉ ॥
ਗੁਰ ਪਰਚੈ ਪਰਵਾਣੁ ਰਾਜ ਮਹਿ ਜੋਗੁ ਕਮਾਯਉ ॥
ਧੰਨਿ ਧੰਨਿ ਗੁਰੁ ਧੰਨਿ ਅਭਰ ਸਰ ਸੁਭਰ ਭਰਾਯਉ ॥
ਗੁਰ ਗਮ ਪ੍ਰਮਾਣਿ ਅਜਰੁ ਜਰਿਓ ਸਰਿ ਸੰਤੋਖ ਸਮਾਇਯਉ ॥
ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਸਹਜਿ ਜੋਗੁ ਨਿਜੁ ਪਾਇਯਉ ॥੮॥
भै निरभउ माणिअउ लाख महि अलखु लखायउ ॥
अगमु अगोचर गति गभीरु सतिगुरि परचायउ ॥
गुर परचै परवाणु राज महि जोगु कमायउ ॥
धंनि धंनि गुरु धंनि अभर सर सुभर भरायउ ॥
गुर गम प्रमाणि अजरु जरिओ सरि संतोख समाइयउ ॥
गुर अरजुन कलॵुचरै तै सहजि जोगु निजु पाइयउ ॥८॥
अगमु अगोचर गति गभीरु सतिगुरि परचायउ ॥
गुर परचै परवाणु राज महि जोगु कमायउ ॥
धंनि धंनि गुरु धंनि अभर सर सुभर भरायउ ॥
गुर गम प्रमाणि अजरु जरिओ सरि संतोख समाइयउ ॥
गुर अरजुन कलॵुचरै तै सहजि जोगु निजु पाइयउ ॥८॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजन देव जी ने) उस हरी को माणा है। जिसको कोई डर छू नहीं सकता। और जो लाखों में रमा हुआ है। गुरू (रामदास जी) ने आपको उस हरी का उपदेश दिया है जो अगम है। गंभीर है और जिसकी हस्ती इन्द्रियों की पहुँच से परे है। गुरू के उपदेश के कारण आप (प्रभू की हजूरी में) कबूल हो गए हो। आप ने राज में जोग कमाया है। गुरू अरजन देव धन्य हैं। खाली हृदयों को आप ने (नाम-अमृत से) नाको-नाक भर दिया है। गुरू वाली पदवी प्राप्त कर लेने के कारण आप ने अजर अवस्था को जरा है। और आप संतोख के सरोवर में लीन हो गए हैं। कवि ‘कल्’ कहता है- ‘हे गुरू अरजुन (देव जी) ! तूने आत्मिक अडोलता में टिक के (अकाल-पुरख से) असली कृपा प्राप्त कर ली है’। 8।
ਅਮਿਉ ਰਸਨਾ ਬਦਨਿ ਬਰ ਦਾਤਿ ਅਲਖ ਅਪਾਰ ਗੁਰ ਸੂਰ ਸਬਦਿ ਹਉਮੈ ਨਿਵਾਰੵਉ ॥
ਪੰਚਾਹਰੁ ਨਿਦਲਿਅਉ ਸੁੰਨ ਸਹਜਿ ਨਿਜ ਘਰਿ ਸਹਾਰੵਉ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਲਾਗਿ ਜਗ ਉਧਰੵਉ ਸਤਿਗੁਰੁ ਰਿਦੈ ਬਸਾਇਅਉ ॥
ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਜਨਕਹ ਕਲਸੁ ਦੀਪਾਇਅਉ ॥੯॥
ਪੰਚਾਹਰੁ ਨਿਦਲਿਅਉ ਸੁੰਨ ਸਹਜਿ ਨਿਜ ਘਰਿ ਸਹਾਰੵਉ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਲਾਗਿ ਜਗ ਉਧਰੵਉ ਸਤਿਗੁਰੁ ਰਿਦੈ ਬਸਾਇਅਉ ॥
ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕਲੵੁਚਰੈ ਤੈ ਜਨਕਹ ਕਲਸੁ ਦੀਪਾਇਅਉ ॥੯॥
अमिउ रसना बदनि बर दाति अलख अपार गुर सूर सबदि हउमै निवारॵउ ॥
पंचाहरु निदलिअउ सुंन सहजि निज घरि सहारॵउ ॥
हरि नामि लागि जग उधरॵउ सतिगुरु रिदै बसाइअउ ॥
गुर अरजुन कलॵुचरै तै जनकह कलसु दीपाइअउ ॥९॥
पंचाहरु निदलिअउ सुंन सहजि निज घरि सहारॵउ ॥
हरि नामि लागि जग उधरॵउ सतिगुरु रिदै बसाइअउ ॥
गुर अरजुन कलॵुचरै तै जनकह कलसु दीपाइअउ ॥९॥
हिन्दी अर्थ: हे अलख ! हे अपार ! हे सूरमे गुरू ! आप जीभ से अमृत (बरसाते हो) और मुँह से वर की बख्शिश करते हो। शबद द्वारा आपने अहंकार दूर किया है। अज्ञान को आपने नाश कर दिया है और आत्मिक अडोलता से अफुर निरंकार को अपने हृदय में टिकाया है। हे गुरू अरजुन ! हरी-नाम में जुड़ के (आपने) जगत को बचा लिया है; (आप ने) सतिगुरू को हृदय में बसाया है। कल् कवि कहता है- आपने ज्ञान-रूप कलश को चमकाया है। 9।
ਸੋਰਠੇ ॥
ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਮਾਣੁ ਪਾਰਥਉ ਚਾਲੈ ਨਹੀ ॥
ਨੇਜਾ ਨਾਮ ਨੀਸਾਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰਿਅਉ ॥੧॥
ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਪੁਰਖੁ ਪ੍ਰਮਾਣੁ ਪਾਰਥਉ ਚਾਲੈ ਨਹੀ ॥
ਨੇਜਾ ਨਾਮ ਨੀਸਾਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਵਾਰਿਅਉ ॥੧॥
सोरठे ॥
गुरु अरजुनु पुरखु प्रमाणु पारथउ चालै नही ॥
नेजा नाम नीसाणु सतिगुर सबदि सवारिअउ ॥१॥
गुरु अरजुनु पुरखु प्रमाणु पारथउ चालै नही ॥
नेजा नाम नीसाणु सतिगुर सबदि सवारिअउ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: सोरठे ॥ गुरू अरजुन (देव जी) अकाल-पुरख-रूप है। अर्जुन की तरह कभी घबराने वाले नहीं हैं (भाव। जैसे अर्जुन कुरुक्षेत्र के युद्ध में वैरियों के दलों से नहीं घबराते थे। वैसे ही गुरू अरजुन देव जी कामादिक वैरियों से नहीं घबराते; नाम का प्रकाश आपका नेजा है (हथियार है)। गुरू के शबद ने आपको सुंदर बनाया हुआ है। 1।
ਭਵਜਲੁ ਸਾਇਰੁ ਸੇਤੁ ਨਾਮੁ ਹਰੀ ਕਾ ਬੋਹਿਥਾ ॥
ਤੁਅ ਸਤਿਗੁਰ ਸੰ ਹੇਤੁ ਨਾਮਿ ਲਾਗਿ ਜਗੁ ਉਧਰੵਉ ॥੨॥
ਤੁਅ ਸਤਿਗੁਰ ਸੰ ਹੇਤੁ ਨਾਮਿ ਲਾਗਿ ਜਗੁ ਉਧਰੵਉ ॥੨॥
भवजलु साइरु सेतु नामु हरी का बोहिथा ॥
तुअ सतिगुर सं हेतु नामि लागि जगु उधरॵउ ॥२॥
तुअ सतिगुर सं हेतु नामि लागि जगु उधरॵउ ॥२॥
हिन्दी अर्थ: संसार समुंद्र है। अकाल-पुरख का नाम पुल है और जहाज है। आपका गुरू से प्यार है। (अकाल-पुरख के) नाम में जुड़ के आप ने जगत को (संसार-समुंद्र से) बचा लिया है। 2।
ਜਗਤ ਉਧਾਰਣੁ ਨਾਮੁ ਸਤਿਗੁਰ ਤੁਠੈ ਪਾਇਅਉ ॥
ਅਬ ਨਾਹਿ ਅਵਰ ਸਰਿ ਕਾਮੁ ਬਾਰੰਤਰਿ ਪੂਰੀ ਪੜੀ ॥੩॥੧੨॥
ਅਬ ਨਾਹਿ ਅਵਰ ਸਰਿ ਕਾਮੁ ਬਾਰੰਤਰਿ ਪੂਰੀ ਪੜੀ ॥੩॥੧੨॥
जगत उधारणु नामु सतिगुर तुठै पाइअउ ॥
अब नाहि अवर सरि कामु बारंतरि पूरी पड़ी ॥३॥१२॥
अब नाहि अवर सरि कामु बारंतरि पूरी पड़ी ॥३॥१२॥
हिन्दी अर्थ: जगत को तैराने वाला नाम आपने गुरू के प्रसन्न होने पर प्राप्त किया है। हमें अब किसी से कोई सरोकार नहीं। (गुरू अरजुन देव जी के) दर पर ही हमारे सारे कारज रास हो गए हैं। 3। 12।
ਜੋਤਿ ਰੂਪਿ ਹਰਿ ਆਪਿ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕੁ ਕਹਾਯਉ ॥
ਤਾ ਤੇ ਅੰਗਦੁ ਭਯਉ ਤਤ ਸਿਉ ਤਤੁ ਮਿਲਾਯਉ ॥
ਅੰਗਦਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਅਮਰੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਥਿਰੁ ਕੀਅਉ ॥
ਅਮਰਦਾਸਿ ਅਮਰਤੁ ਛਤ੍ਰੁ ਗੁਰ ਰਾਮਹਿ ਦੀਅਉ ॥
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਦਰਸਨੁ ਪਰਸਿ ਕਹਿ ਮਥੁਰਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਯਣ ॥
ਮੂਰਤਿ ਪੰਚ ਪ੍ਰਮਾਣ ਪੁਰਖੁ ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਪਿਖਹੁ ਨਯਣ ॥੧॥
ਤਾ ਤੇ ਅੰਗਦੁ ਭਯਉ ਤਤ ਸਿਉ ਤਤੁ ਮਿਲਾਯਉ ॥
ਅੰਗਦਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਅਮਰੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਥਿਰੁ ਕੀਅਉ ॥
ਅਮਰਦਾਸਿ ਅਮਰਤੁ ਛਤ੍ਰੁ ਗੁਰ ਰਾਮਹਿ ਦੀਅਉ ॥
ਗੁਰ ਰਾਮਦਾਸ ਦਰਸਨੁ ਪਰਸਿ ਕਹਿ ਮਥੁਰਾ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਯਣ ॥
ਮੂਰਤਿ ਪੰਚ ਪ੍ਰਮਾਣ ਪੁਰਖੁ ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਪਿਖਹੁ ਨਯਣ ॥੧॥
जोति रूपि हरि आपि गुरू नानकु कहायउ ॥
ता ते अंगदु भयउ तत सिउ ततु मिलायउ ॥
अंगदि किरपा धारि अमरु सतिगुरु थिरु कीअउ ॥
अमरदासि अमरतु छत्रु गुर रामहि दीअउ ॥
गुर रामदास दरसनु परसि कहि मथुरा अंम्रित बयण ॥
मूरति पंच प्रमाण पुरखु गुरु अरजुनु पिखहु नयण ॥१॥
ता ते अंगदु भयउ तत सिउ ततु मिलायउ ॥
अंगदि किरपा धारि अमरु सतिगुरु थिरु कीअउ ॥
अमरदासि अमरतु छत्रु गुर रामहि दीअउ ॥
गुर रामदास दरसनु परसि कहि मथुरा अंम्रित बयण ॥
मूरति पंच प्रमाण पुरखु गुरु अरजुनु पिखहु नयण ॥१॥
हिन्दी अर्थ: प्रकाश-रूप हरी ने अपने आप को गुरू नानक कहलवाया। उस (गुरू नानक देव जी) से (गुरू अंगद प्रकट हुआ)। (गुरू नानक देव जी की) जोति (गुरू अंगद जी की) जोति के साथ मिल गई। (गुरू) अंगद (देव जी) ने कृपा करके अमरदास जी को गुरू स्थापित किया; (गुरू) अमरदास (जी) ने अपने वाला छत्र गुरू रामदास (जी) को दे दिया। मथुरा कहता है- ‘गुरू रामदास (जी) का दर्शन कर के (गुरू अरजन देव जी के) वचन आत्मिक जीवन देने वाले हो गए हैं। पाँचवें स्वरूप अकाल-पुरख रूप गुरू अरजुन देव जी को आँखों से देखो। 1।
ਸਤਿ ਰੂਪੁ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਧਰਿਓ ਉਰਿ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖਿ ਪਰਤਖਿ ਲਿਖੵਉ ਅਛਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧੁਰਿ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਜੋਤਿ ਜਗਮਗੈ ਤੇਜੁ ਭੂਅ ਮੰਡਲਿ ਛਾਯਉ ॥
ਪਾਰਸੁ ਪਰਸਿ ਪਰਸੁ ਪਰਸਿ ਗੁਰਿ ਗੁਰੂ ਕਹਾਯਉ ॥
ਭਨਿ ਮਥੁਰਾ ਮੂਰਤਿ ਸਦਾ ਥਿਰੁ ਲਾਇ ਚਿਤੁ ਸਨਮੁਖ ਰਹਹੁ ॥
ਕਲਜੁਗਿ ਜਹਾਜੁ ਅਰਜੁਨੁ ਗੁਰੂ ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸ੍ਟਿ ਲਗਿ ਬਿਤਰਹੁ ॥੨॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖਿ ਪਰਤਖਿ ਲਿਖੵਉ ਅਛਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧੁਰਿ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਜੋਤਿ ਜਗਮਗੈ ਤੇਜੁ ਭੂਅ ਮੰਡਲਿ ਛਾਯਉ ॥
ਪਾਰਸੁ ਪਰਸਿ ਪਰਸੁ ਪਰਸਿ ਗੁਰਿ ਗੁਰੂ ਕਹਾਯਉ ॥
ਭਨਿ ਮਥੁਰਾ ਮੂਰਤਿ ਸਦਾ ਥਿਰੁ ਲਾਇ ਚਿਤੁ ਸਨਮੁਖ ਰਹਹੁ ॥
ਕਲਜੁਗਿ ਜਹਾਜੁ ਅਰਜੁਨੁ ਗੁਰੂ ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸ੍ਟਿ ਲਗਿ ਬਿਤਰਹੁ ॥੨॥
सति रूपु सति नामु सतु संतोखु धरिओ उरि ॥
आदि पुरखि परतखि लिखॵउ अछरु मसतकि धुरि ॥
प्रगट जोति जगमगै तेजु भूअ मंडलि छायउ ॥
पारसु परसि परसु परसि गुरि गुरू कहायउ ॥
भनि मथुरा मूरति सदा थिरु लाइ चितु सनमुख रहहु ॥
कलजुगि जहाजु अरजुनु गुरू सगल स्रिस्टि लगि बितरहु ॥२॥
आदि पुरखि परतखि लिखॵउ अछरु मसतकि धुरि ॥
प्रगट जोति जगमगै तेजु भूअ मंडलि छायउ ॥
पारसु परसि परसु परसि गुरि गुरू कहायउ ॥
भनि मथुरा मूरति सदा थिरु लाइ चितु सनमुख रहहु ॥
कलजुगि जहाजु अरजुनु गुरू सगल स्रिस्टि लगि बितरहु ॥२॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजुन देव जी ने) संत-संतोख हृदय में धारण किया है। और उस हरी को अपने अंदर बसाया है जिसका रूप सति है और नाम सदा-स्थिर है। प्रत्यक्ष तौर पर अकाल पुरख ने धुर से ही आप के माथे पर लेख लिखा है। (आप के अंदर) प्रतयक्ष तौर पर (हरी की) जोति जगमग-जगमग कर रही है। (आपका) तेज धरती पर छाया हुआ है। पारस (गुरू) को और परसने-योग्य (गुरू) को छू के (आप) गुरू से गुरू कहलवाए। हे मथुरा ! कह- (गुरू अरजुन देव जी के) स्वरूप में मन भली प्रकार जोड़ के सन्मुख रहो। गुरू अरजन कलियुग में जहाज है। हे दुनिया के लोगो ! उसके चरणों में लग के (संसार-सागर) से सही-सलामत पार हो जाओ। 2।
ਤਿਹ ਜਨ ਜਾਚਹੁ ਜਗਤ੍ਰ ਪਰ ਜਾਨੀਅਤੁ ਬਾਸੁਰ ਰਯਨਿ ਬਾਸੁ ਜਾ ਕੋ ਹਿਤੁ ਨਾਮ ਸਿਉ ॥
ਪਰਮ ਅਤੀਤੁ ਪਰਮੇਸੁਰ ਕੈ ਰੰਗਿ ਰੰਗੵੌ ਬਾਸਨਾ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਪੈ ਦੇਖੀਅਤੁ ਧਾਮ ਸਿਉ ॥
ਅਪਰ ਪਰੰਪਰ ਪੁਰਖ ਸਿਉ ਪ੍ਰੇਮੁ ਲਾਗੵੌ ਬਿਨੁ ਭਗਵੰਤ ਰਸੁ ਨਾਹੀ ਅਉਰੈ ਕਾਮ ਸਿਉ ॥
ਮਥੁਰਾ ਕੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸ੍ਰਬ ਮਯ ਅਰਜੁਨ ਗੁਰੁ ਭਗਤਿ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਾਇ ਰਹਿਓ ਮਿਲਿ ਰਾਮ ਸਿਉ ॥੩॥
ਪਰਮ ਅਤੀਤੁ ਪਰਮੇਸੁਰ ਕੈ ਰੰਗਿ ਰੰਗੵੌ ਬਾਸਨਾ ਤੇ ਬਾਹਰਿ ਪੈ ਦੇਖੀਅਤੁ ਧਾਮ ਸਿਉ ॥
ਅਪਰ ਪਰੰਪਰ ਪੁਰਖ ਸਿਉ ਪ੍ਰੇਮੁ ਲਾਗੵੌ ਬਿਨੁ ਭਗਵੰਤ ਰਸੁ ਨਾਹੀ ਅਉਰੈ ਕਾਮ ਸਿਉ ॥
ਮਥੁਰਾ ਕੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸ੍ਰਬ ਮਯ ਅਰਜੁਨ ਗੁਰੁ ਭਗਤਿ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਾਇ ਰਹਿਓ ਮਿਲਿ ਰਾਮ ਸਿਉ ॥੩॥
तिह जन जाचहु जगत्र पर जानीअतु बासुर रयनि बासु जा को हितु नाम सिउ ॥
परम अतीतु परमेसुर कै रंगि रंगॵौ बासना ते बाहरि पै देखीअतु धाम सिउ ॥
अपर परंपर पुरख सिउ प्रेमु लागॵौ बिनु भगवंत रसु नाही अउरै काम सिउ ॥
मथुरा को प्रभु स्रब मय अरजुन गुरु भगति कै हेति पाइ रहिओ मिलि राम सिउ ॥३॥
परम अतीतु परमेसुर कै रंगि रंगॵौ बासना ते बाहरि पै देखीअतु धाम सिउ ॥
अपर परंपर पुरख सिउ प्रेमु लागॵौ बिनु भगवंत रसु नाही अउरै काम सिउ ॥
मथुरा को प्रभु स्रब मय अरजुन गुरु भगति कै हेति पाइ रहिओ मिलि राम सिउ ॥३॥
हिन्दी अर्थ: हे लोगो ! उस गुरू के दर से माँगो। जो सारे संसार में प्रकट है और दिन-रात जिसका प्यार और वासा नाम के साथ है। जो पूरन वैरागवान है। हरी के प्यार में भीगा हुआ है। वाशना से परे है; पर वैसे गृहस्थ में देखा जाता है। (जिस गुरू अरजुन का) प्यार बेअंत हरी के साथ लगा हुआ है। और जिसको हरी के बिना किसी और काम के साथ कोई सरोकार नहीं। वह वह गुरू अरजुन ही मथुरा के सर्व-व्यापक प्रभू हैं। वह भगती की खातिर हरी के चरणों में जुड़ा हुआ है। 3।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 1408 है, राग Svaiyay Mehl 5 का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Bhatt Mathuraa।
भट्ट सवैये, formal-praise, मगर substance पूरा devotional।
Gurgaon-Delhi border पर शाम 8 बजे की रुकी हुई traffic।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 33 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1408” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Svaiyay Mehl 5 राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 1409 →, पीछे का: ← अंग 1407।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।