सुरघु: किरात राजा

कथा · 20

सुरघु: किरात राजा से ऋषि तक

हिमालय के किरात राजा सुरघु को मांडव्य ऋषि ने सिखाया। बहुत बरस बाद फ़ारस के एक राजा परिघ ने अकेले तपस्या से वही सीख पाई। दो दूर के देशों के राजा, दो रास्ते, एक मंज़िल।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या एक जंगल का राजा भी ज्ञान पा सकता है?”

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वसिष्ठ बोले – “राम, ज्ञान देखने वाले की जाति नहीं देखता। एक किरात राजा थे, सुरघु, और एक फ़ारस के राजा थे, परिघ। दोनों अलग-अलग रास्ते से एक ही जगह पहुँचे, और जब बहुत बूढ़े होकर मिले, तो उन्होंने अपने अनुभव आपस में बाँटे।”

हिमालय

सुरघु हिमालय की तलहटी में एक किरात जनजाति के राजा थे।


किरात लोग पहाड़ी थे। उनका देह छोटा और मज़बूत था, उनकी खाल साँवली और धूप-छाँव से कठोर, और उनके बाल काले तथा सीधे थे।


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सुरघु का राज-प्रासाद कोई पत्थर का महल नहीं था। यह देवदार की लकड़ी की एक बड़ी कुटिया थी, जिसकी छत पर सूखी पत्तियों की मोटी पर्त बिछी रहती और नीचे ज़मीन की कच्ची मिट्टी थी।


भीतर बीच में एक अग्नि-कुंड था, जिसमें हर समय आग जलती रहती। सुरघु की प्रजा का नियम था कि इस आग को कभी बुझने न दिया जाए।


प्रासाद के भीतर की हवा में हमेशा एक मिली-जुली गन्ध रहती – देवदार की राल, जली हुई पाइन-शाख, और दीयों में जलती हिरण-वसा की गन्ध। शाम को उस गन्ध में जौ-की-रोटी की भुनी हुई महक भी मिल जाती।

सुरघु के सिंहासन के पीछे एक भालू की खाल टँगी थी, जिसे उनके पिता ने एक बार ख़ुद मारा था। खाल अभी भी मोटी थी, पर बहुत बरस की धूप ने उसका रंग हलका कर दिया था।


मन्त्री सूखी घास से बुनी एक चटाई पर बैठते। उनके सामने एक तांबे की थाली रखी होती, जिसमें ओक के पत्ते बिछे रहते और उन्हीं पर फल या कन्द रखे जाते।


किरातों का जीवन साधारण था। वो शिकार करते, जंगल से कन्द लाते, और थोड़ी-बहुत खेती भी कर लेते।

जब कोई बड़ा निर्णय लेना होता, तो सुरघु एक हड्डी का बना शिकार-शृंग बजाते। उसकी आवाज़ बहुत ख़ास और बहुत पुरानी थी, और तीन घाटियों दूर तक पहुँचती।


उनके घर पेड़ों के बीच बने थे, मिट्टी के, और उनके ऊपर सूखी पत्तियाँ छाई रहतीं।


एक किरात राजा के पास जो कुछ हो सकता था, वो सब सुरघु के पास था – एक छोटा सा राज्य, एक छोटा सा प्रासाद, उनकी पत्नी, उनके बच्चे, और उनके मन्त्री। पर भीतर एक प्यास भी थी।


सुरघु ने यह प्यास बहुत बरस से भीतर ही रखी थी और किसी से कुछ कहा नहीं था। एक बार उनके मन्त्री ने पूछा था – “महाराज, आप कभी-कभी बहुत दूर लगते हैं।”

सुरघु ने बात टाल दी – “मन्त्री, यह तुम्हारी कल्पना है।”


पर असल में मन्त्री सही थे।


माण्डव्य

एक दिन एक ऋषि आए, जिनका नाम माण्डव्य था। वो बहुत पुराने थे, उनकी दाढ़ी पूरी सफ़ेद और उनकी आँखें तेज़ थीं।

वो हिमालय की यात्रा पर थे और सुरघु के राज्य से गुज़र रहे थे। सुरघु ने यह सुना तो उन्होंने ऋषि को बुलवा भेजा।

ऋषि राज-प्रासाद में आए तो सुरघु ने हाथ जोड़े – “महाराज, यह आसन नहीं, आप ऊपर बैठिए।” और ऋषि बैठ गए।


सुरघु ने पूछा – “महाराज, आप यहाँ कैसे?”

ऋषि बोले – “सुरघु, मैं यात्रा पर हूँ। मैंने तुम्हारा राज्य देखा, तुम्हारी प्रजा देखी, और मुझे लगा कि यहाँ एक ऐसा राजा है जो दिखने में जितना है, उससे कहीं अधिक है।”


सुरघु ने पूछा – “महाराज, इसका क्या अर्थ?”

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ऋषि बोले – “सुरघु, तुम्हारी आँखों में एक प्यास है।”


सुरघु पल भर मौन रहे, फिर बोले – “हाँ। मुझे इसके बारे में बताइए।”


सुरघु ने अपनी सारी बात कह सुनाई – अपनी प्यास, अपने प्रश्न, अपनी बेचैनी, बहुत बरस की उमड़ी हुई बातें।


ऋषि ने बीच में कुछ कहे बिना सब सुना। जब सुरघु अपनी बात पूरी कर चुके, तब ऋषि बोले।

“सुरघु, यह प्यास हर एक के भीतर होती है, पर हर एक उसे पहचानता नहीं। आपने उसे पहचान लिया है, और यह बहुत बड़ी बात है।”

सुरघु ने पूछा – “तो अब मैं क्या करूँ?”


ऋषि बोले – “सुरघु, आत्म-विचार करिए।”

“कैसे?”

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“अपने मन के साथ बैठिए और उसे देखिए। हर विचार को आते देखिए, जाते देखिए, पर ख़ुद को विचार मत समझिए। आप विचार के पीछे हैं।”


सुरघु बोले – “महाराज, यह करना कठिन होगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि मेरा मन हमेशा व्यस्त रहता है – राज्य की बातें, प्रजा की बातें।”

ऋषि बोले – “सुरघु, यही तो असली काम है, राज्य के बीच में रहकर आत्म-विचार करना। अगर तुम राज्य छोड़कर पहाड़ पर चले जाओगे, तो तुम्हारा मन वहाँ भी वैसा ही रहेगा। बस वहाँ राज्य की बातें नहीं होंगी, पर मन की प्रकृति तो वही रहेगी।

“असली कला यह है कि राज्य के बीच में रहकर अपने भीतर बैठो। यह राज्य का त्याग नहीं, बल्कि राज्य को साधन बना लेना है।”

सुरघु ने एक और बात पूछी – “महाराज, क्या मुझे आप जैसे गुरु की हमेशा ज़रूरत रहेगी?”

ऋषि बोले – “सुरघु, अभी जो मैंने कहा, वह शुरुआत के लिए काफ़ी है। आगे का रास्ता तुम ख़ुद चलोगे।

“पर अगर कभी रास्ता खोया हुआ लगे, तो मुझे बुला सकते हो। बस एक शर्त है – पहले तुम्हें ख़ुद कोशिश करनी होगी।”

सुरघु ने सिर झुकाकर यह स्वीकार किया।


इसके बाद ऋषि चले गए।


अभ्यास

सुरघु ने अभ्यास शुरू किया। हर रात वो अपने कक्ष में बैठते, आँखें बन्द करते, और अपने मन को देखते।


मन हर रोज़ कुछ नया लेकर आता। पहली रात राज्य की एक छोटी समस्या लौट आई – एक गाँव में दो किसान आपस में लड़ रहे थे, और सुरघु ने उन्हें न्याय दिया था, पर मन बार-बार उसी बात पर लौटता रहा कि क्या वह निर्णय सही था।

सुरघु ने मन को देखा, उसे रोका नहीं, बस देखते रहे।


दूसरी रात बचपन की एक पुरानी याद उभरी, जब उनके पिता ने उन्हें एक बार बहुत डाँटा था, और मन उसी पुरानी डाँट पर लौट आया। सुरघु ने उसे भी बस देखा।


तीसरी रात भविष्य का एक डर उठा – अगर उनका राज्य कमज़ोर पड़ गया तो? अगर पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर दिया तो? सुरघु ने उस डर को भी देखा।


इसी तरह बहुत रातें बीतीं।


मन के हर खेल को सुरघु ने देखा। उसे न रोका, न अपनाया, बस देखते रहे।

धीरे-धीरे मन शान्त होने लगा। पूरी तरह तो नहीं, पर भीतर एक हलकी सी जगह बन गई, और उस जगह में सुरघु ने एक स्थिर सी चेतना देखी।


खुलासा

King Suraghu seated cross-legged in night meditation in his lamplit wooden chamber, hand to chest, serene face lit by a single oil lamp, eyes opening in inner realization; the restless thoughts as faint coiling smoke settling behind him; deep blue night, warm lamp glow, classical-Indian color illustration, dignified, no text

एक रात सुरघु ने इसे पहचाना – मन है, पर मैं मन नहीं हूँ। मैं तो वह हूँ जो इस मन को देख रहा है।


यह सोच सुनने में साधारण लग सकती है, पर भीतर बैठकर अनुभव करने पर यह बहुत गहरी थी।


सुरघु ने आँख खोली। बाहर रात थी और एक दीप जल रहा था, और उनके भीतर एक हलकी सी शान्ति उतर आई थी।


अगले दिन उन्होंने राज्य वैसे ही चलाया, जैसे रोज़ चलाते थे, पर अब उनके निर्णयों में एक अन्तर आ गया था। पहले वो हर निर्णय अपने मन से लेते थे, अब वो हर निर्णय अपने भीतर के साक्षी से लेने लगे। मन की हलचल अब भी थी, पर वह अब उनके पीछे रह गई थी।


मन्त्री ने यह बदलाव लक्ष्य किया और बोले – “महाराज, आप कुछ बदले हुए लगते हैं।”

“अब आपके निर्णय बहुत स्थिर लगते हैं।”

सुरघु बोले – “मन्त्री, मैं बदला नहीं हूँ। बस अब मैं अपनी चेतना से बात करता हूँ, मन से नहीं।”

मन्त्री पूरी बात तो नहीं समझे, पर उन्होंने सम्मान से सिर झुका दिया।


इसी तरह बहुत बरस बीत गए।

सुरघु अपनी प्रजा को न्याय देते रहे, और उनके निर्णय अब बहुत स्थिर हो चले थे।

प्रजा ने भी यह लक्ष्य किया और कहने लगी – “हमारे राजा अब पहले से अलग हैं।”


परिघ

बहुत दूर फ़ारस में एक राजा थे, जिनका नाम परिघ था।

परिघ एक बड़े राज्य के राजा थे, उनकी सेना बड़ी थी और महल भी बड़ा था।


परिघ का महल पत्थर का था, जिसमें उज़्बेक संगमरमर के पतले स्तम्भ लगे थे। फ़र्श पर लापिस-लाज़ुली का नीला रंग बिछा था, और बीच-बीच में सोने के तार से बने तारे जड़े थे।


महल के बीच एक बड़ा आँगन था, और आँगन के बीच एक छोटा फ़व्वारा। उसका पानी ज़मीन के नीचे से क़नात के माध्यम से आता – साफ़, ठण्डा, और साल भर बहता हुआ।


फ़व्वारे के चारों ओर सर्व के पेड़ खड़े थे, जिनकी छाया लम्बी और पतली थी।


महल की हवा में हमेशा अत्तर की महक रहती – गुलाब की, चमेली की, केवड़े की। सेवक रोज़ सुबह दीवारों पर यह अत्तर छिड़कते।


परिघ के दरबार में एक चीज़ ख़ास थी। कोने में एक तानपूरे जैसा वाद्य रखा रहता, जिसे फ़ारसी “सेतार” कहते थे, और एक संगीतकार पूरे दिन वहाँ बैठकर बहुत हलके स्वर में उसे बजाता रहता। दरबार की बातों के पीछे एक हलकी सी संगीत-रेखा हमेशा बहती रहती।


मन्त्री रेशम के कुशन पर बैठते। उनके सामने चाँदी की थाली रखी होती, जिस पर ख़ुरमे और भुने हुए पिस्ते सजे रहते, और पीने को गुलाब-शर्बत होता।


परिघ की कथा साधारण थी। बहुत बरस उन्होंने राज्य चलाया, उनकी एक रानी थी और बच्चे थे। पर एक बरस उनके राज्य में सूखा पड़ गया।

सूखा बहुत बुरा था। पहले बारिश नहीं आई, फिर नदियाँ सूखीं, और फिर कुएँ भी। खेतों में अनाज नहीं उगा, और लोगों के पास खाने को कुछ नहीं बचा।


The Persian king Parigha in heavy robes opening his grain stores and handing grain to gaunt drought-stricken villagers in a dust-choked land of cracked earth and broken huts; lapis-blue palace columns behind, a barren ridge beyond; sombre warm tones, classical-Indian painterly color illustration, dignified, no text

परिघ ने अपनी ओर से सब कुछ किया। उन्होंने अनाज के गोदाम खोल दिए, अपने महल के हीरे बेचकर अनाज ख़रीदा, पर सूखा इतना बड़ा था कि कुछ काम न आया, और हज़ारों लोग मारे गए।


परिघ ने यह सब अपनी आँखों से देखा।

उनकी आँखों के सामने उनकी प्रजा मर रही थी, और उनके हाथ में कुछ नहीं था।


एक रात उन्होंने सोचा – मैं राजा हूँ, मेरा काम प्रजा को बचाना है, पर मैं उसे बचा नहीं पा रहा। मेरी राजा-शक्ति झूठी है।


और परिघ ने एक निर्णय किया।


अगली सुबह उन्होंने अपने मन्त्रियों को बुलाकर कहा – “मैं राज्य छोड़ रहा हूँ।”

मन्त्री चौंक गए – “महाराज, पर क्यों?”

परिघ बोले – “क्योंकि मैं राजा होकर भी कुछ नहीं कर पा रहा। तो फिर राजा होने का क्या लाभ?”


मन्त्री पल भर मौन रहे, फिर पूछा – “महाराज, राज्य कौन सम्हालेगा?”

“मेरा बेटा।”

“पर वो तो अभी छोटा है।”

“वो बड़ा हो जाएगा।”


परिघ ने अपने बेटे को बुलाकर उसे सब कुछ बता दिया।

The crowned Persian king Parigha kneeling to embrace his weeping young son against his chest as he prepares to renounce the throne; grieving queen and courtiers behind, lapis-blue marble columns, a faint smoking city in the distance; tender sorrowful light, classical-Indian color illustration, dignified, no text

बेटा रोने लगा – “पिता, मत जाइए।”

“बेटे, मुझे जाना है।”

“पर मैं अकेला रह जाऊँगा।”

“बेटे, मेरा मन अब यहाँ नहीं लगेगा, और बिना मन के मैं तुम्हारे साथ रहकर भी तुम्हारे साथ नहीं हो पाऊँगा।”

बेटे के भीतर एक हलकी सी कठिनाई उतर आई, पर उसके साथ एक समझ भी थी, और उसने कहा – “पिता, आप जाइए।”


जंगल

परिघ ने राज्य छोड़ा और उत्तर की ओर, हिमालय की ओर चल पड़े।


उनकी यात्रा कई दिन लम्बी रही। रास्ते में लोग उन्हें देखते – एक बूढ़ा आदमी, साधारण कपड़ों में, पैदल चलता हुआ। किसी ने नहीं पहचाना कि यह कभी फ़ारस के राजा रहे थे।


आख़िर वो हिमालय पहुँच गए।


The former king Parnada, now a plain-clad bearded ascetic, seated cross-legged in deep meditation at the mouth of a small cave on a rocky Himalayan slope, water-pot and staff beside him; bare tree, dim grey-blue mountains behind; quiet austere color illustration, classical-Indian painterly style, dignified, no text

पहाड़ की ढलान पर एक छोटी सी गुफा मिली, और उन्होंने वहीं बैठना शुरू कर दिया।


खाने के लिए वो जंगल से कन्द और पत्तियाँ ले आते, और कभी-कभी कोई छोटा फल भी मिल जाता। इसी से उनका नाम भी बदल गया – पर्णाद, यानी पत्ते खाने वाला।


बहुत बरस वो जंगल में रहे, और इस बीच उन्होंने तप किया और आत्म-विचार किया।


पर्णाद के लिए यह सहज नहीं था। पहले उन्होंने एक बड़ा राज्य चलाया था, अब वो जंगल में अकेले थे। पहले उनके पास सब कुछ था, अब कुछ भी नहीं था। पहले वो दिन भर बातें करते थे, अब दिन भर चुप रहते थे।

शुरू में यह बहुत कठिन रहा। मन उन्हें बार-बार राज्य की ओर खींचता – बेटे की याद, रानी की याद, पुराने दिनों की याद। पर्णाद ने मन को बस देखा, उसे रोका नहीं।


धीरे-धीरे मन शान्त होने लगा।


बहुत बरस बाद पर्णाद के भीतर वही स्थिर सी चेतना खुल गई – मन है, पर मैं मन नहीं हूँ।


पर्णाद ने यह तो जान लिया, पर एक बात उन्हें भीतर ही भीतर खटकती रही।


मैंने राज्य छोड़कर यह पाया, पर क्या यह आवश्यक था? क्या तप के लिए राज्य छोड़ना सचमुच ज़रूरी था?


पर्णाद इस प्रश्न के साथ बहुत बरस रहे, पर उन्हें इसका कोई उत्तर नहीं मिला।


बीच में

उधर सुरघु के मन्त्री ने एक बार उनसे कहा – “महाराज, मुझे एक बात पूछनी है।”

“पूछिए।”


“महाराज, आप कई बार रात को अकेले, बिना किसी को बताए, निकल जाते हैं।”

सुरघु बोले – “हाँ।”

“पर क्यों?”

“मन्त्री, राजा होना भारी काम है। कभी-कभी मुझे राजा से छुट्टी चाहिए होती है।”

मन्त्री ने आगे पूछा – “महाराज, एक और बात। लोग कहते हैं कि आप पहले से अलग हो गए हैं। कैसे अलग?”


सुरघु पल भर सोचकर बोले – “मन्त्री, पहले मैं राजा था, अब मैं वह हूँ जो राजा हुआ है।”

“इसका मतलब?”

“मतलब यह कि पहले मेरी पहचान राजा होना थी, अब मेरी पहचान कहीं और से आती है। राजा होना अब मेरा एक काम भर है, मेरी पहचान नहीं।”


मन्त्री बोले – “महाराज, समझ गया।”

“सच में समझ गए?”

“पूरी तरह तो नहीं, पर एक हलकी सी समझ ज़रूर बन गई है।”

सुरघु बोले – “यही काफ़ी है। बाक़ी समझ बाद में आ जाएगी।”


और मन्त्री चले गए।


मिलन

फिर एक दिन, बहुत बरस बाद, वो दोनों आपस में मिले।

सुरघु अब एक ऋषि की तरह अपने राज्य से निकल पड़े थे। वो बहुत बूढ़े हो चुके थे, उनके बाल सफ़ेद और देह पतला हो गया था, पर उनकी आँखें वैसी ही तेज़ थीं।

वो हिमालय में बिना किसी ख़ास उद्देश्य के, बस यूँ ही घूम रहे थे।


एक छोटे से जंगल में उन्हें एक और तपस्वी मिले।


सुरघु ने उन्हें देखा – वो भी बहुत बूढ़े थे, उनके बाल और दाढ़ी सफ़ेद, देह पतला, पर आँखें तेज़ थीं।

दोनों ने एक-दूसरे का अभिवादन किया – “भाई।” “भाई।”

सुरघु ने पूछा – “आप कौन हैं?”

Two very old white-bearded ascetics, the former Kirata king Suraghu and the former Persian king Parnada, greeting each other as brothers beneath a great banyan-like tree in a small forest clearing; both thin, eyes bright, hands raised in mutual recognition; a forest stream and snowy ridge behind; warm reconciling light, classical-Indian color illustration, dignified, no text

तपस्वी बोले – “मेरा पुराना नाम परिघ था, फ़ारस का राजा। अब पर्णाद हूँ।”


सुरघु बोले – “मेरा पुराना नाम सुरघु था, किरात राजा। अब किसी नाम का नहीं रहा।”

दोनों हँस पड़े, और सुरघु ने कहा – “बैठिए।”

दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए।


बात

फिर उन्होंने बातें कीं। पर्णाद ने पूछा – “भाई, आपने यह बोध कैसे पाया?”

सुरघु बोले – “मैंने अपने राज्य का दुख देखा, फिर सब छोड़ दिया।”

“मैंने भी यह पाया, पर मैंने राज्य नहीं छोड़ा। मैं अब भी राजा हूँ।”

“तो दोनों एक ही जगह पहुँचे?”

“हाँ, बस रास्ते अलग थे।”

और दोनों फिर हँस पड़े।


पर्णाद ने पूछा – “भाई, मुझे एक बात बताइए। राज्य के बीच रहते हुए आप साधना कैसे करते हैं?”


सुरघु बोले – “पर्णाद भाई, मेरा राज्य मेरे देह की तरह है। देह है, पर मैं देह नहीं। राज्य है, पर मैं राज्य नहीं। मैं इन दोनों के पीछे हूँ। यह बात जब भीतर बैठ जाती है, तो राज्य चलाना भी एक तपस्या बन जाती है।”

“और आपके निर्णयों में?”

“मेरे निर्णय अब मुझसे नहीं आते। वो उस चेतना से आते हैं जो मेरे पीछे है। मैं तो बस उन्हें कहता हूँ, बाहर ले आता हूँ।”


पर्णाद ने कुछ सोचकर कहा – “भाई, मुझे अब लगता है कि राज्य छोड़ना ज़रूरी नहीं था।”


सुरघु बोले – “पर्णाद भाई, हर एक के लिए ज़रूरी अलग-अलग होता है। आपने वह रास्ता चुना जो आपके लिए सही था, मैंने वह रास्ता चुना जो मेरे लिए सही था। दोनों ही सही थे।

“आपने सूखा देखा था, आपके मन में राजा होने का दर्द बहुत बड़ा था। अगर आप वहीं रह जाते, तो शायद आपके भीतर कुछ टूट जाता। आपने जो किया, वह अपने भीतर का बचाव था।

“मैंने सूखा नहीं देखा, मेरा राज्य छोटा है, और मेरा मन अलग था। मेरे लिए राज्य के बीच रहना सम्भव था।

“इसलिए दोनों रास्ते सही हैं।”


पर्णाद ने फिर पूछा – “भाई, और मेरा बेटा? क्या वो ठीक रहा होगा?”


सुरघु पल भर मौन रहे, फिर बोले – “पर्णाद भाई, यह तो मैं नहीं जानता। पर एक बात कह सकता हूँ – बच्चे अपने माता-पिता के बिना भी बढ़ते हैं। आपके बेटे ने भी अपना रास्ता बनाया होगा, अच्छा हो या बुरा, पर अपना।”

इसके बाद दोनों बहुत देर तक चुप बैठे रहे। ऊपर पेड़ की डालियाँ हलके-हलके हिल रही थीं।


आगे

फिर पर्णाद ने पूछा – “भाई, अब आप कहाँ जाएँगे?”

सुरघु बोले – “पर्णाद भाई, मैं तो बस बिना उद्देश्य घूम रहा हूँ। मेरे राज्य में अब मेरा बेटा है, वही राज्य चलाता है। वहाँ अब मेरी ज़रूरत नहीं।”

“तो?”

“तो मैं बस चलता रहता हूँ। जहाँ कोई जगह अच्छी लगती है, वहाँ रुक जाता हूँ, फिर आगे बढ़ जाता हूँ।”


पर्णाद ने कहा – “भाई, क्या आप कुछ दिन मेरे पास रह सकते हैं?”

सुरघु बोले – “कुछ दिन क्यों नहीं।”


दोनों ने पर्णाद की पुरानी गुफा के पास एक छोटी सी कुटिया बना ली।


बहुत दिन वो साथ रहे।

वो साथ बैठकर बातें करते, पाठ करते, ध्यान करते, और बीच-बीच में देर तक चुप भी रहते।


एक रात पर्णाद ने सुरघु से कहा – “भाई, मुझे लग रहा है कि मेरा समय आ रहा है।”

सुरघु पल भर मौन रहे, फिर पूछा – “भाई, आप क्या चाहते हैं?”

“मैं चाहता हूँ कि मैं यहीं, आपके पास, यह देह छोड़ूँ।”


सुरघु ने इसे मौन स्वीकृति दे दी।


कुछ दिन बाद पर्णाद का देह शान्ति से छूट गया।

सुरघु ने उन्हें उसी जंगल में दफ़न किया।


सुरघु कुछ बरस और उसी जगह रहे, फिर वो भी चले गए।


बहुत बाद, कुछ तपस्वी उस जंगल में आए और उन्होंने वहाँ दो कब्रें देखीं। वो नहीं पहचान पाए कि ये कौन थे, पर उन्होंने उन कब्रों के पास एक छोटा सा मन्दिर बनवा दिया। लोग कहते थे – “यहाँ दो साधक एक साथ चले गए। एक राजा था, एक तपस्वी, पर वो दोनों अलग नहीं थे।”

राम ने पूछा – “गुरुदेव, दो अलग रास्ते, पर एक ही मंज़िल। तो मेरा रास्ता क्या है?”

वसिष्ठ बोले – “राम, तुम्हारा रास्ता तुम्हारा जीवन है। तुम राजा बनोगे, राज्य चलाओगे, पर भीतर वह स्थिर सी चेतना बनाए रखोगे जो हर निर्णय के पीछे रहेगी। तुम सुरघु की तरह रहोगे, पर्णाद की तरह नहीं।”


राम ने आगे पूछा – “गुरुदेव, और पर्णाद का बेटा? वो ठीक रहा होगा?”


वसिष्ठ पल भर मौन रहे, फिर बोले – “राम, मुझे लगता है कि हाँ। बेटे ने अपना रास्ता बनाया। शायद उसने कभी अपने पिता को याद किया हो, पर वो आगे बढ़ता गया।

“पिता का प्यार बच्चे को कभी अकेला नहीं छोड़ता, चाहे पिता कितना ही दूर क्यों न हो।”


राम ने फिर पूछा – “गुरुदेव, सुरघु और परिघ बहुत दूर के देशों से थे, फिर भी वो एक-दूसरे को समझ पाए। यह कैसे सम्भव हुआ?”


वसिष्ठ बोले – “राम, क्योंकि देश और भाषा से ऊपर एक चेतना है। जो लोग अपनी उस चेतना तक पहुँच जाते हैं, वो हर देश और हर भाषा को पार कर लेते हैं।”

राम ने कहा – “गुरुदेव, मेरे राज्य के बाहर भी ऐसे लोग होंगे।”

“हाँ, बहुत होंगे।”

“तो क्या मुझे उनसे मिलना चाहिए?”


वसिष्ठ बोले – “राम, जब तुम राज्य चलाने में व्यस्त हो जाओगे, तो शायद तुम्हें दूर के लोगों से मिलने का समय न मिले। पर एक बात है – तुम्हारे पास दूत होंगे, जो दूर-दूर जाएँगे। उन्हें सिखाओ कि वो हर देश में अपनी चेतना खुली रखें।

“अगर कोई दूर का राजा कुछ बुद्धिमत्ता वाला हो, तो दूत तुम्हें उसके बारे में बताएँ।”


राम ने एक और बात कही – “गुरुदेव, सुरघु ने अपनी जिज्ञासा नहीं छिपाई। उन्होंने अपने मन्त्री से कह दिया था कि वो कभी-कभी दूर लगते हैं। अगर वो इसे छिपा लेते, तो शायद माण्डव्य उन्हें कभी न मिलते।”


वसिष्ठ बोले – “बहुत अच्छी बात कही, राम। कई राजा अपनी जिज्ञासा छिपाते हैं, उन्हें लगता है कि राजा को तो सब कुछ पता होना चाहिए। पर असली ज्ञानी राजा अपनी अज्ञानता को स्वीकार करता है, और इसी से उसे ज्ञान मिलता है।”


राम ने सामने बहते पानी की ओर देखकर कहा – “गुरुदेव, मैं अपनी जिज्ञासा कभी नहीं छिपाऊँगा।”


वसिष्ठ बोले – “राम, यह तो तुम पहले से कर रहे हो। मुझसे इतने सारे प्रश्न जो पूछ रहे हो।”

राम मुस्कुराकर बोले – “गुरुदेव, हाँ।”


फिर दोनों बहुत देर तक चुप रहे। बाहर हवा हलके-हलके बह रही थी, और कहीं दूर से एक पंछी ने पुकारा।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.58-63 पर आधारित है। सुरघु और परिघ की मित्रता, और उनके दो अलग रास्तों का एक ही गंतव्य पर पहुँचना, यह शास्त्र की बहुलवादी दृष्टि का सुन्दर उदाहरण है। एक किरात राजा और एक फ़ारसी राजा का बूढ़े होकर मिलना, और एक-दूसरे को सम्मान देना, यह सांस्कृतिक एकता का एक प्राचीन उदाहरण है।

दर्शन-दृष्टि

सुरघु हिमालय के एक किरात राजा हैं। माण्डव्य ऋषि उन्हें आत्म-विचार सिखाते हैं, और वो शान्त हो जाते हैं। उनके मित्र परिघ, पारस के राजा, अकाल से टूटे हुए, तप करके पर्णाद बन जाते हैं। दोनों बूढ़े होकर मिलते हैं, और दो भिन्न संस्कृतियों के दो साधक एक ही चुप्पी में बैठते हैं। कथा यह कहती है कि बोध न जाति की वस्तु है, न देश की, वो उस प्रश्न की है जो हर मनुष्य के भीतर बराबर उठता है।

जिद्दू कृष्णमूर्ति (1895-1986) ने अपनी The First and Last Freedom (1954) में बार-बार कहा कि सत्य का कोई मार्ग नहीं, कोई परम्परा नहीं, कोई संस्कृति नहीं, वो हर व्यक्ति के अपने अवलोकन में खुलता है। सुरघु और परिघ का मिलन इसी का एक चित्र है। एक जंगल का राजा, दूसरा साम्राज्य का, पर जब दोनों भीतर देखते हैं तो उनके पास कहने को एक ही बात बचती है, और सुनने के लिए भी एक ही चुप्पी।