कच और संजीवनी

कथा · २१

कच और संजीवनी

देवताओं का दूत असुरों के गुरु से मरे को जिलाने का मंत्र सीखने गया। तीन बार मारा गया। तीसरी बार वो शुक्राचार्य के पेट में था। और वहीं, पेट के भीतर से, गुरु ने शिष्य को पढ़ाया।

देवता और असुर हमेशा लड़ते रहते थे। मगर एक तरफ़ बहुत आगे थी – असुरों के गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी मंत्र था। मरे हुए को जिला देता था। हर युद्ध में जो असुर मरते, शुक्राचार्य उन्हें वापस ज़िंदा कर देते। देवता परेशान।

देवताओं के गुरु बृहस्पति ने अपने बेटे कच को बुलाया। बेटा था नौजवान, स्वस्थ। हाथ-पाँव चुस्त।

“बेटा, तुम्हें शुक्राचार्य के पास जाना होगा। शिष्य बनकर। संजीवनी सीखकर लौटना। यह हमारे लिए ज़रूरी है।”

कच मान गए। नौजवान थे। उन्होंने अपने पिता के पाँव छुए।

“पिताजी, यह आसान नहीं होगा। शुक्राचार्य पहचान लेंगे।”

“पहचान लेंगे, मगर वो अनुशासित ब्राह्मण हैं। शिष्य को मना नहीं कर पाएँगे। मगर असुर शिष्य तुम्हें ख़तरा देंगे। संभलकर रहना।”

कच ने एक झोला बाँधा। थोड़े कपड़े, एक तुम्बी, एक छोटी कुंडी। असुर लोक की ओर निकले।

शिष्यता

शुक्राचार्य के आश्रम पहुँचे। बाहर से सुंदर। पेड़, बागीचा, यज्ञ-कुंड। मगर पास के असुर शिष्य कुछ भिन्न दिखते थे – बड़े-बड़े, भीमकाय, चेहरे पर हिंसा।

कच आगे बढ़े। पाँव छुए।

“गुरुजी, मुझे शिष्य बना लीजिए।”

शुक्राचार्य ने उन्हें देखा। पहचान गए कि यह बृहस्पति का बेटा है। आँखें वही, चाल वही। मगर शिक्षा देना उनका कर्तव्य था। ब्राह्मण किसी शिष्य को ठुकरा नहीं सकता।

“ठीक है। मगर आचार-व्यवहार ठीक रखना।”

कच रहने लगे आश्रम में। शास्त्र पढ़ते, यज्ञ में मदद करते, गोचारण भी करते – शुक्राचार्य की गायें। यह उनका रोज़ का काम था।

देवयानी

शुक्राचार्य की एक बेटी थी – देवयानी। बहुत सुंदर। पिता की लाडली। उसने कच को देखा। शिष्यों में से एक नौजवान, संस्कारी, मगर साफ़ चेहरे वाला। उससे बातें करने का बहाना ढूँढती।

“कच, मेरे लिए एक फूल लाओगे जंगल से?”

“लाऊँगा।”

“कच, तुम्हें वेद के यह श्लोक की समझ है? मुझे समझाओ।”

“समझाता हूँ।”

धीरे-धीरे देवयानी को कच से प्रेम हो गया। कच भी उसका मित्र थे, मगर मन से दूर। उन्हें मालूम था अपना काम।

पहली मृत्यु

असुर शिष्यों ने कच को पहचाना। एक दिन उन्होंने आपस में मीटिंग की।

“यह बृहस्पति का बेटा है। यह संजीवनी सीखने आया है। हमें इसे रोकना होगा।”

“कैसे? गुरुजी हैं तो जिला देंगे।”

“मार दें। एक बार। फिर देखें।”

एक दिन कच गायों को चराने वन में गए। असुर शिष्यों ने पीछा किया। एक नदी के पास उनसे लड़ाई की। कच निहत्थे थे। चार-पाँच असुर – उन्होंने कच को मारकर उनकी हड्डियाँ नदी के किनारे एक झाड़ी में फेंक दीं।

शाम हुई। कच नहीं लौटे। देवयानी चिंता में।

“पिताजी, कच नहीं आए।”

शुक्राचार्य ने योग-दृष्टि से देखा। कच की हड्डियाँ नदी के किनारे थीं।

“देवयानी, चिंता मत कर।”

उन्होंने संजीवनी का प्रयोग किया। हड्डियाँ इकट्ठा हुईं, माँस आया, देह बनी, प्राण लौटी। कच आँखें खोलकर उठ गए।

देवयानी रोई – खुशी से। कच आश्रम लौटे।

दूसरी मृत्यु

असुर शिष्य चिढ़ गए। उन्होंने सोचा – “हड्डियाँ रखीं, इसलिए जिला दिया। इस बार ऐसा करते हैं कि हड्डियाँ ही न मिलें।”

एक दिन कच फिर गोचारण को निकले। असुरों ने मार डाला। इस बार उन्होंने कच के शरीर को पीसा। पाउडर बनाया। समुद्र में बहा दिया।

कच फिर नहीं लौटे। देवयानी फिर रोई।

“पिताजी, कच फिर नहीं आए।”

शुक्राचार्य ने योग-दृष्टि से देखा। समुद्र में पाउडर। मगर शुक्राचार्य का संजीवनी मंत्र शक्तिशाली था। पाउडर के अनगिनत कणों को इकट्ठा किया, हड्डी बनाई, माँस बनाया, देह बनाई। कच फिर ज़िंदा हो गए।

देवयानी फिर रोई – खुशी से।

तीसरी मृत्यु: चालाकी

असुर शिष्य अब और गुस्सा थे। उन्होंने सोचा – “इस बार ऐसा कुछ करना है कि शुक्राचार्य ख़ुद कच को न जिला सकें।”

उन्होंने एक योजना बनाई।

एक रात उन्होंने कच को मार दिया। फिर शरीर को पीसा। पाउडर बनाया। फिर – पाउडर को शराब में मिलाया। एक बड़ा प्याला भरकर शुक्राचार्य के पास ले गए।

“गुरुजी, यह विशेष शराब है। प्रसाद। पीजिए।”

शुक्राचार्य ने पूछा भी नहीं। ब्राह्मण थे, मगर असुरों के बीच रहते थे। शराब पीना पाप नहीं था उस ज़माने में। उन्होंने पी ली।

पीते वक़्त उन्हें कुछ अजीब लगा – एक हलकी सी संवेदना। मगर ध्यान नहीं दिया।

शाम को देवयानी ने पूछा, “पिताजी, कच नहीं आए।”

शुक्राचार्य ने योग-दृष्टि से देखा। चौंके। कच कहीं भी नहीं थे – न पृथ्वी पर, न जल में, न आकाश में। फिर उन्होंने और गहरा देखा।

कच उनके अपने पेट में थे।

गुरु का संकट

शुक्राचार्य के होश उड़ गए।

“बेटी, बात बिगड़ गई।”

“क्यों?”

“कच मेरे पेट में हैं। पाउडर के रूप में। शराब में थे।”

देवयानी रोई। ज़ोर से।

“पिताजी, उन्हें बचाइए।”

शुक्राचार्य ने सोचा। संकट यह था – अगर वो संजीवनी से कच को जिलाएँ, तो कच उनके पेट से बाहर आएँगे। पेट फटेगा। शुक्राचार्य मर जाएँगे।

अगर वो कच को नहीं जिलाएँ, तो कच पेट में ही रहेंगे, धीरे-धीरे पच जाएँगे।

देवयानी ने पिता का हाथ पकड़ा।

“पिताजी, कच को बचाइए। मेरा प्यार है।”

शुक्राचार्य ने अपनी बेटी को देखा। उसकी आँखों में आँसू।

“बेटी, अगर मैं कच को जिलाऊँ, तो मैं मरूँगा।”

“फिर मेरा क्या होगा?”

“मैं तुझे एक रास्ता बताता हूँ।”

पेट के भीतर शिक्षा

शुक्राचार्य ने कुछ देर ध्यान किया। फिर एक तरकीब निकाली।

उन्होंने कच को – जो अभी पेट में राख-पाउडर के रूप में थे, मगर थोड़ी सी चेतना के साथ – अपने भीतर पुकारा।

“कच, सुनो।”

कच की चेतना ने सुना। यह आश्चर्य था – मरे हुए होकर भी सुन सकते थे, क्योंकि वो गुरु के भीतर थे।

“मैं तुम्हें संजीवनी मंत्र सिखा रहा हूँ। ध्यान से सुनो।”

उन्होंने मंत्र बोला। पूरी विधि बताई। कच ने अपने पेट-भीतर के अस्तित्व से सुना। याद रखा।

“अब बाहर आओ।”

शुक्राचार्य ने संजीवनी का प्रयोग किया।

कच का शरीर पेट के भीतर बनना शुरू हुआ। पहले हड्डियाँ। फिर माँस। फिर देह। पूरा कच।

शुक्राचार्य का पेट बढ़ता गया। आख़िर एक तेज़ चीख के साथ – कच पेट से बाहर निकल आए। शुक्राचार्य गिर पड़े। मरे।

शिष्य का दायित्व

कच, अब मंत्र जानने वाले, ने तुरंत संजीवनी का प्रयोग किया।

शुक्राचार्य के शरीर पर मंत्र फूँका। एक हलकी सी कंपन। फिर देह में जान आई। शुक्राचार्य ने आँखें खोलीं।

दोनों जीवित।

देवयानी रोते-रोते हँसी।

शुक्राचार्य ने कच को देखा।

“बेटा, तुमने मंत्र पाया।”

“हाँ, गुरुदेव।”

“और तुमने मुझे जिलाया।”

“मेरा यह कर्तव्य था।”

शुक्राचार्य मुस्कुराए। उनके चेहरे पर एक थकान थी, मगर शांति भी।

“कच, तुमने एक बात सिखाई।”

“क्या?”

“असली शिक्षा वो है जब गुरु शिष्य के लिए मरने को तैयार हो। और शिष्य गुरु को वापस लाने में समर्थ हो। मैंने आज पहली बार समझा कि शिक्षा एक तरफ़ से नहीं चलती।”

देवयानी का प्रेम

देवयानी कच के पास आई।

“कच, अब तो शिक्षा पूरी हो गई। अब हमारी शादी?”

कच ने धीरे से कहा, “देवयानी, मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता।”

“क्यों?”

“तुम मेरी गुरु-बहन हो। शुक्राचार्य गुरु, तुम बेटी, मैं शिष्य। आचार के अनुसार हम भाई-बहन हैं।”

देवयानी का चेहरा बदला। प्यार से क्रोध में।

“कच, तुमने मेरा प्यार ठुकराया।”

“मेरी मजबूरी समझो।”

“मैं श्राप दूँगी। तुम्हारा सीखा मंत्र तुम्हारे काम नहीं आएगा। तुम मरे को जिला नहीं सकोगे।”

कच ने सिर झुकाया। फिर हँसकर कहा, “ठीक है, देवयानी। मगर एक बात – मैंने जो सीखा है, वो सिखा सकता हूँ। मेरे लिए नहीं, मगर देवों के लिए। मेरे शिष्यों के लिए।”

देवयानी ने उत्तर नहीं दिया।

कच ने पाँव छुए शुक्राचार्य के। फिर देवलोक लौट गए। मंत्र देवों को दिया।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, गुरु को मरना पड़ा शिष्य के लिए। यह असली शिक्षा है। जब तक गुरु अपने आप को नहीं मिटाता, शिष्य पूरा नहीं होता। और शिष्य ज़िंदा रहता है तभी, जब गुरु को फिर से ज़िंदा करता है।

“और एक और बात – प्रेम और कर्तव्य कभी-कभी टकराते हैं। कच ने प्रेम को कर्तव्य से नीचे रखा। यह कठिन था। मगर कच के लिए धर्म पहले था। देवयानी का श्राप मिला, मगर कच ने अपना दायित्व निभाया।”

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