कथा · 03
पुण्य और पावन: दो भाई, दो दृष्टियाँ
पिता-माँ की मृत्यु पर एक भाई फूट-फूट कर रोया, दूसरा शान्त बैठा रहा। फिर एक ने दूसरे को समझाया कि शोक का असली घर कहाँ है।

सरयू पर शाम उतर रही थी। पीछे एक स्त्री अपने बच्चे को घर बुला रही थी, और बच्चा देर तक नदी के किनारे पत्थर पानी में फेंकता रहा, फिर माँ की आवाज़ पर लौट गया। उसके पाँव के नीचे रेत गीली थी।
राम ने यह सब देखा, फिर वसिष्ठ की ओर मुड़े।
“गुरुदेव, जब मेरे पिता एक दिन नहीं रहेंगे, तो मैं क्या करूँगा?”
वसिष्ठ ने राम को देखा। राम की आँखें भीगी हुई नहीं थीं, पर उनके चेहरे पर वो भार था जो तब दिखता है, जब कोई पहली बार किसी असम्भव को अपने जीवन में शामिल कर रहा हो।
“राम, यह प्रश्न तुम्हारे भीतर आज क्यों आया?”
“पिता कुछ दिन बीमार थे, अब ठीक हैं। पर जब वो बीमार थे, तो मैंने पहली बार उनके बिना अपना जीवन सोचा, और मैं हिल गया।”
वसिष्ठ कुछ देर शान्त रहे, फिर बोले।
“राम, दो भाइयों की कथा है। दोनों ने एक ही दिन अपने माता-पिता खोए। एक बहुत रोया, दूसरा नहीं रोया, और दोनों सही थे। पर एक का रोना ज्ञान से पहले था, और दूसरे का न रोना ज्ञान के बाद। यह कथा सुनो।”
घर
पुण्य और पावन दो भाई थे।
बड़े का नाम पुण्य था, छोटे का पावन। उनकी उम्र में दस बरस का अन्तर था। दोनों एक ही ऋषि और ऋषि-पत्नी के पुत्र थे। माता-पिता दोनों धार्मिक थे, दोनों शान्त, और दोनों अपने काम में लगे रहते थे।
घर नदी के किनारे एक कुटिया थी। आगे एक खेत था, पीछे एक बगीचा। बगीचे में हलदी थी, अदरक थी, और कुछ फूल भी, जो माता ने अपने हाथ से लगाए थे।

कुटिया के बाहर एक पुराना नीम का पेड़ था, जिसकी छाया दोपहर में बहुत ठंडी रहती थी। गर्मियों में सब उसी के नीचे बैठते। पिता पाठ करते, माँ कुछ कूटतीं, पुण्य पाठ सुनते और पावन पास ही खेलता रहता।
बचपन में दोनों भाई एक साथ खेलते थे।

बड़ा छोटे को नदी में नहाना सिखाता था। पावन पहले-पहल डरता था, पर पुण्य उसका हाथ पकड़कर पानी में ले जाता।
बड़ा छोटे को पेड़ पर चढ़ना सिखाता था। पावन कई बार गिरा, पर पुण्य ने उसे फिर-फिर ऊपर चढ़ाया।
बड़ा छोटे को पाठ करना सिखाता था, क्योंकि छोटा बहुत जल्दी सब भूल जाता था। पुण्य धीरज से बार-बार दोहराता, और पावन एक दिन समझ ही जाता।
पावन के लिए पुण्य पिता के बराबर था। यह कभी कहना नहीं पड़ा, यह बस था।
बरस
बरस बीतते गए। पुण्य बड़े हुए, उन्होंने एक गुरु से शिक्षा ली और आत्म-विचार सीखा।
एक दिन उनके भीतर वो खुलासा हुआ जिसकी कोई व्याख्या नहीं है। उन्होंने अपने को पहचान लिया। पर यह बात उन्होंने किसी को नहीं बताई, न माता को, न पिता को, न छोटे भाई को।
वो बाहर से वही पुराने पुण्य थे। भीतर एक स्थिर शान्ति आ बसी थी, पर उसे वो अपनी आँखों के पीछे ही रखे रहते थे।
पावन छोटे थे, अभी अपनी ज़िन्दगी सीख रहे थे। उन्होंने भी पाठ पढ़ा था, पर उनके भीतर वो खुलासा नहीं हुआ था।
वो अपने माता-पिता से बहुत प्रेम करते थे। माँ की गोद उन्हें अब भी अच्छी लगती थी, हालाँकि वो बीस बरस के हो चुके थे। पिता उन्हें रोज़ शाम सिखाते थे, और पावन हर शाम का इन्तज़ार करते थे।
पुण्य ने पावन को कई बार समझाने की कोशिश की थी।
पुण्य बोले – “पावन, तुम जो माँ-पिता से प्रेम करते हो, वो बहुत अच्छी बात है। पर एक बात सीखो। प्रेम के साथ-साथ एक स्थिरता भी रखो, ऐसी स्थिरता जो वो एक दिन न रहें, तो भी रहे।”
“भैया, ऐसा मत कहो।”
“पावन, मैं कह रहा हूँ क्योंकि एक दिन वो जाएँगे। सब जाते हैं, यह नियम है।”
“पर अभी तो…”
“अभी तो ठीक है। पर तैयारी अभी से।”
पावन ने मुँह घुमा लिया था। उसे यह सोचना भी नहीं था।
सर्दी
एक सर्दी में पिता बीमार पड़े। पहले हलकी खाँसी, फिर तेज़, और फिर साँस लेने में तकलीफ़।
वो अब उठते नहीं थे, उनकी साँस धीमी पड़ गई थी, और माँ दिन-रात उनके पास बैठी रहती थीं।
दोनों भाई बारी-बारी से सेवा करते। पुण्य रात की पाली लेते, पावन दिन की।
पुण्य रात भर पिता के पास बैठते, पानी की कटोरी पास रखते, और बीच-बीच में उनके माथे पर हाथ रखकर देखते कि बुख़ार है या नहीं।
पावन दिन भर माँ की मदद करते, उन्हें थोड़ा आराम देते, पिता के लिए गरम पानी लाते और उनके पैर दबाते।

एक रात पिता ने बहुत हलकी आवाज़ में पुण्य को बुलाया।
पिता बोले – “पुण्य, मेरा समय आ गया।”
पुण्य की आँखों में आँसू नहीं आए, पर उनके भीतर एक कोमलता उतर आई।
“पिता, मैं हूँ। बोलिए।”
“अपनी माँ को सम्हालना। पावन को सम्हालना।”
“हाँ।”
“और एक बात। पावन को मेरी मृत्यु से जो मिलेगा, वो उसे मत बचाओ। उसे रोने दो, उसे टूटने दो, फिर उसे ख़ुद उठने दो। यही उसकी शिक्षा होगी।”
“हाँ, पिता।”
पिता ने कुछ देर पुण्य को देखा, फिर उनकी आँखें बन्द हो गईं। रात के एक पहर में उनकी साँस रुक गई।
माँ
माँ ने पिता का चेहरा देखा।
उन्होंने उनके माथे पर हाथ रखा, और देर तक हाथ वहीं रखे रहीं। फिर माँ ने हाथ हटा लिया।
माँ बोलीं – “पुण्य, मेरा भी अब यहाँ कुछ नहीं है।”
पुण्य ने माँ को देखा।
“माँ, बैठिए।”
“नहीं, पुण्य। मेरा समय भी इन्हीं के साथ था। इनका देह यहाँ है, मैं भी यहीं इनके पास रहूँगी।”
माँ ने अपने पति का हाथ अपने हाथ में लिया और आँखें बन्द कर लीं। पुण्य कुछ नहीं बोले।
सुबह माँ की साँस भी रुक गई।
पावन
पावन सुबह आए। उन्होंने माँ और पिता दोनों को एक साथ चटाई पर देखा, दोनों के चेहरे शान्त, दोनों की आँखें बन्द। पहले तो वो कुछ समझ न पाए, फिर समझे, और ज़मीन पर गिर पड़े।
पुण्य ने उन्हें उठाया। पावन रो रहे थे, ऊँची आवाज़ में नहीं, एक गहरी धीमी रुलाई में, और उनका देह काँप रहा था।
पुण्य ने उन्हें अपनी छाती से लगा लिया और कुछ नहीं कहा। पावन देर तक रोते रहे।
पुण्य ने उन्हें कहीं ले जाने की कोशिश नहीं की, उन्हें वहीं माँ और पिता के पास रहने दिया। बहुत देर बाद पावन रुके।
पावन बोले – “भैया, माँ-पिता दोनों? एक साथ?”
“हाँ। पिता पहले गए, रात में। माँ ने उनके बाद अपना देह छोड़ा।”
अंतिम संस्कार
अंतिम संस्कार हुआ। पुण्य ने सब सम्हाला, और पावन के हाथ काँपते रहे, फिर भी वो कुछ काम कर पाए। नदी के किनारे दो चिताएँ बनीं।

पुण्य ने पिता की चिता को आग दी, पावन ने माँ की। दोनों चिताएँ जलीं, और दोनों राख हो गईं।
राख को नदी में बहाया गया।
पावन ने राख को पानी में फैलते देखा, एक धारा-सी बनते, फिर ग़ायब होते। पावन फिर रो पड़े।
पावन बोले – “भैया, वो कहाँ गए?”
“पावन, अभी मत पूछो। पहले रोओ, फिर हम बात करेंगे।”
लौटते समय पावन ने अपनी माँ का बगीचा देखा, हलदी और अदरक की लताएँ। पावन ठिठक गए।
पावन बोले – “भैया, माँ ने कल इन को पानी दिया था। और आज वो नहीं हैं।”
“हाँ।”
पावन की आँखें फिर भीग गईं।
“और कल? कल कौन पानी देगा?”
पुण्य ने उनके कन्धे पर हाथ रखा।
“पावन, कल हम देंगे, मैं और तुम।”
घर सूना
घर सूना था।
बगीचे में हलदी और अदरक उगे थे। माँ ने जो आख़िरी बार पानी दिया था, उसके निशान अब भी ज़मीन पर थे। पिता की चटाई पर एक पुस्तक रखी थी, जिसे वो बीमार पड़ने तक पढ़ रहे थे।
पावन ने पुस्तक उठाई, और उनके हाथ में पुस्तक काँप उठी। पुण्य ने पुस्तक उनके हाथ से ले ली और एक तरफ़ रख दी।
“बैठो।”
पावन बैठ गए।
पुण्य ने पावन को पानी दिया, पावन ने पीया।
“और कुछ? भोजन?”
“नहीं भैया, भूख नहीं।”
“पर तुम्हें खाना है।”
“नहीं, अभी नहीं।”
पुण्य ने ज़ोर नहीं दिया।
रात आई। पावन सोए नहीं, और पुण्य उनके पास बैठे रहे। बीच-बीच में पावन उठते, माँ-पिता को पुकारते, फिर याद आता और फिर रो पड़ते। पुण्य उनका हाथ पकड़े रहते।
दिन
कई दिन बीते।
पावन रोते रहे, कभी ज़ोर से, कभी धीरे से, पर रोते रहे। उन्होंने भोजन भी ठीक से नहीं किया, उनकी आँखें सूज गई थीं और बाल बिखर गए थे। पुण्य उन्हें देखते रहते, पर पहले कई दिन कुछ नहीं कहा।
बगीचे का काम पुण्य अकेले करते, हलदी और अदरक को पानी देते, नीम के पत्ते बटोरते। खाना भी पुण्य ही पकाते, बहुत साधारण, पर पकाते। पावन कभी-कभी थोड़ा खाते, फिर रोने लगते।
एक रात पावन ने पुण्य से पूछा।
पावन बोले – “भैया, आप क्यों नहीं रोते?”
“पावन, मेरा रोना तुम्हारे रोने से अलग है।”
“क्या मतलब?”
“तुम जिसके लिए रो रहे हो, उसके लिए मैं भी रोता हूँ। पर मेरा रोना भीतर है, बाहर नहीं।”
पावन बोले – “भैया, मुझे एक बात बताइए।”
“बताऊँगा।”
“क्या वो लोग कहीं हैं? मेरे माता-पिता? अब? कहीं?”
पुण्य ने उन्हें बहुत देर तक देखा, फिर बोले।
“पावन, बैठो। मैं तुम्हें एक बात बताऊँगा।”
भैया की बात

“पावन, हम जिसे जीवन कहते हैं, वो एक चेतना का प्रवाह है। यह चेतना देह में आती है, कुछ बरस रहती है, फिर देह छोड़ती है, और फिर दूसरे देह में चली जाती है। यह चेतना मरती नहीं, देह मरता है। चेतना बस अपनी कथा बदलती है।
“हमारे माता-पिता की चेतना अब भी है, पर अब उनकी अपनी कथा है। वो शायद किसी और घर में हैं, किसी और देह में। हो सकता है वो हमें भूल चुके हों, क्योंकि नए जन्म में पुरानी कथा भूल जाती है। पर वो हैं।
“अब सुनो, यह कथा यहाँ नहीं रुकती।
“तुम कितने जन्मों से चेतना के साथ हो, यह तुम्हें पता नहीं। तुम सोचते हो कि तुम बस इस एक जीवन के हो। पर तुम्हारी चेतना ने पहले भी कई देह पहने हैं। हर देह में तुम्हारे माता-पिता थे, हर देह में तुमने उन्हें खोया, और एक नए देह में नए माता-पिता पाए। तुम जिनके लिए आज रो रहे हो, उनके जैसे और भी थे, पहले, और उनके जैसे और भी होंगे, बाद में। यह क्रम चलता आ रहा है।
“तो क्या वो ख़ास नहीं थे?
“थे, पावन, बिल्कुल थे। हर देह में जो माता-पिता आते हैं, वो उस देह के लिए सबसे ख़ास हैं। पर देह के बाहर एक चेतना है जो हर देह को साक्षी की तरह देखती है। उस चेतना के लिए हर देह का रोना ज़रूरी है, पर हर रोने में डूब जाना ज़रूरी नहीं।
“तुम्हारा रोना ठीक है, पावन, बहुत ठीक है। पर अब तुम्हें अपनी चेतना भी देखनी होगी, जो रो रही है, पर रोने से अलग है, जो यह सब देख रही है।
“बैठो, आँखें बन्द करो।”
पावन ने आँखें बन्द कर लीं।
“अब अपने भीतर देखो। जो रो रहा है, वो कौन है?”
“मैं हूँ।”
“और जो देख रहा है कि तुम रो रहे हो, वो कौन है?”
“वो भी मैं हूँ।”
“दोनों एक कैसे हो सकते हैं? एक रो रहा है, एक देख रहा है। अगर देखने वाला रोने वाला है, तो वो ख़ुद को कैसे देख रहा है?”
पावन बोले – “भैया, देखने वाला और रोने वाला अलग हैं?”
“हाँ।”
“तो कौन सा मैं हूँ?”
पुण्य बोले – “पावन, तुम वो हो जो देखता है। रोने वाला तुम्हारा देह है, तुम्हारी भावनाएँ हैं। पर देखने वाला, जो हर पल साथ है, हर सुख-दुख का साक्षी है, वो तुम हो।”
पावन कुछ देर शान्त रहे।
पावन बोले – “भैया, और माता-पिता?”
“वो भी अपना देह नहीं थे, वो भी चेतना थे। उनका देह राख हो गया, पर उनकी चेतना तुम्हारी चेतना से अलग नहीं थी। तुम जो हो, वो वही हैं, एक ही चेतना।”
पावन ने आँखें खोलीं और पुण्य को देखा।
पावन बोले – “भैया, मेरे भीतर कुछ बदल रहा है।”
“रहने दो, उसे रोको मत।”
धीमा बदलाव
पावन कुछ देर शान्त बैठे रहे, फिर उन्होंने पुण्य को देखा।
पावन बोले – “भैया, मैं अब भी रोऊँगा?”
“रोओगे, पावन। कई दिन, हो सकता है कई महीने। पर हर बार जब रोओ, उस वक़्त देखने वाले को भी याद रखना। वो साथ रहेगा। तुम्हारे रोने के पीछे एक स्थिरता रहेगी, जो रो नहीं रही होगी। उसी को थामे रखो, बाक़ी सब आता-जाता है।”
बहुत दिन बीते। पावन ने रोना कम किया, पर एकदम बन्द नहीं किया, और पुण्य ने उन्हें रोका भी नहीं। कभी-कभी रात को नींद में पावन माँ को पुकारते। पुण्य पास ही सोते थे, वो उनकी पीठ पर हाथ रख देते और पावन शान्त हो जाते।
पावन ने धीरे-धीरे खाना शुरू किया, पहले थोड़ा, फिर थोड़ा और।
एक दिन उन्होंने ख़ुद खाना पकाया, बगीचे की हलदी और अदरक से, ठीक माँ की तरह।
पुण्य बोले – “पावन, माँ का खाना याद आ रहा है।”
“हाँ।”

एक दिन पावन बगीचे में काम कर रहे थे, और उनका ध्यान गया कि अदरक की एक नई कोंपल आई है।
पावन ने उसे देखा और सोचा। माँ ने यह बीज बोया था, अब वो नहीं हैं, पर बीज से कोंपल आ रही है। जो माँ ने रचा, वो अब भी है, बस माँ का देह नहीं है।
पावन ने पुण्य को बुलाया।
पावन बोले – “भैया, माँ ने यह बीज बोया था, और अब यह कोंपल आ रही है।”
पुण्य बोले – “पावन, तुम समझ रहे हो।”
“क्या?”
“माँ-पिता गए, पर जो उन्होंने रचा, वो रह गया, हमारे रूप में, बगीचे के रूप में, उनकी सीखों के रूप में। वो जाकर भी नहीं गए, वो हमारे भीतर हैं।”
ऋषि बनना
बहुत बरस बीते। पावन ने रोना धीरे-धीरे कम किया, पर एकदम बन्द नहीं किया।
एक रात पावन ने पुण्य से कहा।
पावन बोले – “भैया, मैं अब नहीं रोऊँगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे लगता है मैं अब समझ गया।”
पुण्य बोले – “पावन, जो समझ गया, वो रोएगा भी। पर अब उसका रोना अलग होगा। तुम चाहो तो रोते रहो, अब वो रोना तुम्हें खाएगा नहीं।”
दोनों भाई वहीं रहे।
उन्होंने बगीचा सम्हाला, हलदी और अदरक उगाए, और पाठ पढ़े।
फिर एक दिन पावन भी ऋषि बन गए, और उनके पास लोग आने लगे। जो आते, उनमें से बहुत वो थे जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया था। पावन उन्हें सिखाते।
पावन कहते – “पहले रोइए। जो दुख है, उसे भीतर मत रखिए, बाहर निकालिए।”
“पर मुझे रोना नहीं आता।”
“फिर भी कोशिश कीजिए। आँखें बन्द करिए, उनकी याद कीजिए, फिर रोइए।”
“और रोने के बाद?”
“फिर अपने भीतर देखिए। जो रो रहा था, उसे देखिए, और देखने वाले को पहचानिए। देखने वाला रोता नहीं।”
ऐसे ही और लोग आते रहे, और पावन ने हर एक से वही बात कही – पहले रोना, फिर देखना, फिर समझना।
और पावन ने एक बात अपने भीतर रखी। मेरे भैया ने मुझे यह सिखाया, और मेरे भैया को मेरे पिता ने सिखाया था, बहुत बरस पहले, अपनी मृत्यु से पहले। पिता ने भैया से कहा था, “पावन को मेरी मृत्यु से जो मिलेगा, वो उसे मत बचाओ।” भैया ने मुझे नहीं बचाया, मुझे रोने दिया, फिर देखने को कहा। इसी रास्ते मुझे ज्ञान मिला।
पावन ने अपने आप से कहा – “मैं भी अपने शिष्यों को नहीं बचाऊँगा।”
बहुत बरस वो ऋषि रहे और बहुत लोगों को सिखाया। फिर एक दिन उनका भी समय आया। जाने से पहले उन्होंने अपनी कुटिया अपने सबसे प्रिय शिष्य को दी।
पावन बोले – “बेटे, इस कुटिया में बगीचा है, हलदी और अदरक। यह मेरी माँ ने लगाए थे, बहुत बरस पहले। तुम इन्हें सम्हालना।”
शिष्य ने सिर झुकाया।
“गुरुदेव, धन्यवाद।”
“नहीं। यह तुम्हारा अधिकार है।”
पावन ने आँखें बन्द कीं। उन्होंने आख़िरी बार अपनी माँ का चेहरा भीतर देखा, फिर पिता का चेहरा, फिर भैया का चेहरा। फिर वो भी चले गए।
राम बहुत देर तक शान्त रहे, फिर बोले।
“गुरुदेव, क्या मैं पावन की तरह हूँ?”
“राम, हर मनुष्य पहले पावन होता है, फिर धीरे-धीरे पुण्य की ओर बढ़ता है। यह यात्रा कोई एक रात की नहीं है। पर शुरू तब होती है जब पावन एक बार ठीक से रो ले। पहले रोना, फिर देखना, फिर समझना। बीच में जल्दी मत करना।”
राम बोले – “गुरुदेव, और मेरे पिता का जब समय आएगा?”

“तब तुम पावन की तरह रोओगे, और रोते-रोते तुम्हें वो भीतर का देखने वाला भी मिलेगा। दोनों एक साथ होंगे। यही प्रेम का असली अर्थ है।”
राम ने नदी की ओर देखा। उस पर अब सूरज नहीं था, बस एक नीली रोशनी थी। पीछे बच्चे की माँ अब उसे रोटी खिला रही थी, और बच्चे की हँसी सुनाई दे रही थी।
राम ने उस बच्चे की हँसी देर तक सुनी।
राम बोले – “गुरुदेव, वो बच्चा भी एक दिन पावन बनेगा। और एक दिन पुण्य।”
“हाँ।”
राम बोले – “और मैं?”
“राम, तुम भी।”
“पर मुझे अपने पिता को खोने का डर लगता है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह डर रहेगा, बहुत बरस। फिर एक दिन वो ख़ुद पावन बनकर तुम्हारे सामने खड़ा होगा। और उस दिन तुम भी रोओगे। पर रोते-रोते तुम्हें वो भीतर का देखने वाला भी मिलेगा। दोनों एक साथ।”
पानी पर अब और भी नीली रोशनी फैल चुकी थी। बच्चे की हँसी अब कम थी, शायद वो सो गया था।
राम ने सरयू की ओर देखा। वहाँ पानी में एक झलक-सी उठी, जैसे कोई स्त्री बहुत बरस पहले उसमें उतरी हो।
पर वो झलक एक पल की थी, फिर ग़ायब हो गई।
राम बोले – “गुरुदेव, मैं अब चलूँ।”
“राम, चलो।”
दोनों उठे और घर की ओर चल पड़े।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.19-21 पर आधारित है। शोक और ज्ञान के बीच का सम्बन्ध, और पुनर्जन्म के दार्शनिक प्रस्ताव का प्रयोग शोक के सान्त्वना के रूप में, यह कथा का मुख्य योगदान है। पुण्य की शिक्षा शास्त्र की सबसे कोमल शिक्षाओं में से है। पावन का अन्ततः अपनी कुटिया अपने शिष्य को देना, और हलदी-अदरक की निरन्तरता, यह कथा को एक चक्र में बाँधती है।
दर्शन-दृष्टि
माता-पिता मरते हैं। बड़ा भाई पुण्य शान्त है। छोटा पावन टूटा हुआ है। पुण्य उसे समझाता है कि जो रूप गया वो रूप था, जो रहता है वो अलग है, और शोक वस्तुतः एक रूप को अपरिवर्ती मान बैठने की भूल है। कथा यह कहती है कि शोक एक ग़लत आरोप है, हम जिसे खोते हैं उसे हमने पहले ही उसके रूप के साथ अद्वैत मान लिया था, और रूप के जाने पर लगता है कि वो भी गया।
स्विस मनोविश्लेषक एलिज़ाबेथ क्यूब्लर-रॉस (Elisabeth Kübler-Ross, 1926-2004) ने अपनी On Death and Dying (1969) में शोक के पाँच चरण रखे, और अन्तिम चरण को स्वीकार कहा। पर पुण्य की दृष्टि स्वीकार से एक पग आगे है। वो कहती है कि शोक का अन्त स्वीकार में नहीं, सम्बन्ध की नई समझ में है, कि जिससे हम जुड़े थे वो रूप नहीं था, उसके भीतर की चेतना थी, और वो चेतना अपनी जगह है।