कथा · 05
गाधि का चांडाल-स्वप्न
एक मुनि ने भगवान विष्णु से कहा कि उन्हें माया दिखाई जाए, और अगली डुबकी में उन्होंने एक पूरा जीवन जी लिया, दूसरे नाम से, दूसरी जात में, दूसरे रिश्तों के साथ। जब लौटे, तो विष्णु बोले – “अभी और देखो।”
सरयू अब रात में डूबी थी, और पास के एक छोटे मन्दिर का अकेला दिया जल रहा था, जिसकी रोशनी पानी पर लम्बी खिंच आई थी।

राम बोले – “गुरुदेव, लवण की कथा सुनकर मेरे मन में एक प्रश्न रह गया है।”
वसिष्ठ बोले – “बताओ, राम।”
“लवण ने एक रात में सौ बरस जिए, पर उनकी पहचान एक ही रही। बस उनका देह बदला, उनका जीवन बदला। पर अगर पहचान भी बदल जाए तो? अगर मैं कल उठूँ और मुझे लगे कि मैं कोई और हूँ, और मैं उस दूसरे आदमी का पूरा जीवन याद रखूँ, तो मैं कौन हूँ?”
वसिष्ठ ने राम की ओर देखा और बोले – “राम, यह प्रश्न अच्छा है। एक ब्राह्मण थे, नाम गाधि। उन्होंने यही प्रश्न जीवन में तीन बार पूछा, और हर बार उन्हें जवाब विष्णु से मिला। पर हर बार जवाब वही था, और हर बार ब्राह्मण को वह जवाब फिर नया लगा। यह कथा सुनो।”
स्नान
गाधि एक ब्राह्मण थे।
उनकी मिट्टी की कुटिया एक नदी के किनारे थी। नदी का कोई बड़ा नाम नहीं था, बस एक पहाड़ी धारा थी जो दूर पहाड़ से उतरकर मैदान की ओर बहती थी। उसका स्रोत बर्फ़ था, इसलिए पानी पूरे साल ठंडा रहता था।
कुटिया के साथ एक बगीचा था, जिसमें हलदी और अदरक उगते थे, एक गाय थी, और एक पुरानी पुस्तक जो उन्हें अपने पिता से मिली थी। इसके सिवा कोई नहीं था। उनकी पत्नी कई बरस पहले बीमारी से चल बसी थीं, और उनके कोई बच्चे नहीं थे।
हर सुबह वे नदी में स्नान करते, सूर्य को अर्घ्य देते, मन्त्र पढ़ते, फिर अपनी कुटिया लौट आते। यह उनकी बीस बरस पुरानी आदत थी।
एक दिन वे नदी में स्नान कर रहे थे।

पानी हमेशा की तरह ठंडा था। उनके पैर घुटनों तक पानी में थे, हाथों में अंजली सूर्य की ओर उठी थी, और होंठों से मन्त्र धीमी आवाज़ में बाहर आ रहे थे।
फिर उन्होंने एक डुबकी ली।
पानी के भीतर वे थोड़ी देर आँखें बन्द किए रहे। पानी ठंडा और शान्त था।
जब वे उठे, तो वे गाधि नहीं थे।
चांडाल का जीवन
अब वे एक स्त्री की कोख में पल रहे एक नन्हे बच्चे थे।

वह स्त्री चांडाल थी, और उसकी झोंपड़ी जंगल के किनारे थी। उसका देह पतला और साँवला था, और हाथों पर मिट्टी के निशान पड़े रहते थे।
गाधि उसकी कोख में थे, यह उन्हें अब पता था।
समय बीता और वे पैदा हुए।
जन्म लेते ही पहले रोना आया, फिर माँ की गरमी, और फिर माँ का दूध।
उनका देह बहुत छोटा और साँवला था।
जैसे-जैसे वे बड़े हुए, वे अपने पिता के साथ शिकार पर जाने लगे, अपनी बहन से लड़ते, और जंगल में घूमते रहते।
इस तरह पाँच बरस का जीवन बीता, फिर दस, फिर पन्द्रह, और फिर बीस।
बीस की उम्र में एक दूसरे चांडाल युवक से उनकी मित्रता हुई, और दोनों साथ-साथ शिकार पर जाते थे।

एक दिन उस मित्र को साँप ने काटा और वह मर गया।
गाधि ने अपने मित्र की चिता बनाई, आग दी, और बहुत रोए।
तीस की उम्र में उन्होंने एक चांडाल स्त्री से शादी की। उसका कोई और नाम था, जो अब याद नहीं।
पत्नी ने एक बेटा और एक बेटी दी। घर चलता रहा, शिकार चलता रहा, और इसी तरह कई बरस बीत गए।
जब वे चालीस के थे, तब उनके बूढ़े माता-पिता चल बसे।
जब वे पचास के थे, तब उनकी पत्नी बीमारी से चल बसी।
जब वे साठ के थे, तब उनके बच्चे बड़े हुए, ब्याहे गए, और उनके अपने घर बस गए।
और जब वे सत्तर के थे, तब वे अकेले रह गए।
अब वे भटकने लगे। उन्होंने जंगल छोड़ा, नदी पार की, और दूसरे प्रदेश में चले गए।
कई दिन भटकने के बाद एक दिन वे एक नगर के पास जा पहुँचे।
कीर नगरी
उस नगर का नाम कीर था।

नगर के द्वार पर एक हाथी खड़ा था, जिस पर सोने की झूल पड़ी थी और जिसके ऊपर एक माला रखी थी। पीछे राजपुरुष खड़े थे और सब नगरवासी इकट्ठा थे।
गाधि रुक गए और पास खड़े एक आदमी से पूछा – “क्या हो रहा है?”
उस आदमी ने उन्हें देखा। उनका देह चांडाल जैसा था, कपड़े फटे थे, और बाल उलझे थे।
वह बोला – “राजा नहीं रहे, और अब नया राजा चुना जा रहा है। हाथी जिसे माला पहनाएगा, वही राजा बनेगा।”
गाधि भीड़ के पीछे जाकर खड़े हो गए।
हाथी कुछ देर वहाँ खड़ा रहा, फिर उसने अपनी सूँड हिलाई और एक के बाद एक क़दम भीड़ की ओर बढ़ाने लगा।
लोग पीछे हटने लगे, क्योंकि हाथी के नीचे आ जाना ख़तरे से ख़ाली नहीं था।
हाथी ने माला अपनी सूँड में उठाई और सीधे गाधि की ओर बढ़ा।
गाधि चकित रह गए। वे हटने ही वाले थे कि हाथी उनसे पहले उन तक पहुँच गया।

हाथी ने माला उठाकर गाधि के गले में डाल दी।
भीड़ में एक चुप्पी छा गई, फिर एक हलचल उठी, और मन्त्री आगे आकर बोले – “महाराज की जय!”
गाधि ने नीचे झुककर अपने देह और अपने साधारण चांडाल कपड़ों को देखा। उनके देह पर शिकार के पुराने निशान थे, और कलाई पर लाल कपड़े का वह टुकड़ा बँधा था जो उनकी पत्नी ने बहुत बरस पहले बाँधा था।
मन्त्री आगे आए और सिर झुकाकर बोले – “महाराज, आपका नाम?”
गाधि को अब अपना चांडाल नाम याद आ रहा था। उन्होंने वही नाम बताया, पर उनके भीतर कोई आवाज़ कह रही थी, गाधि, तुम गाधि हो। पर वह आवाज़ बहुत धीमी थी और जल्दी ही डूब गई।
मन्त्री ने सिर झुकाकर कहा – “महाराज, आइए। आपके लिए राजसी कपड़े, राजमुद्रिका और राज-कक्ष तैयार हैं।”
बहुत-से लोग गाधि के साथ चले। उन्होंने गाधि को नहलाया, राजसी कपड़े पहनाए, और उनके देह पर सुगन्ध डाली।
जब वे दर्पण के सामने खड़े हुए, तो उन्होंने अपने आप को एक राजा के रूप में देखा। पर भीतर वे वही पुराने थे, एक चांडाल जिसने पन्द्रह बरस जंगल में बिताए थे।
आठ बरस
गाधि आठ बरस तक राजा रहे।
उन्होंने न्याय किया, सीमाएँ सम्हालीं, और प्रजा के लिए कई अच्छे काम किए। एक राजवंश की कन्या उनकी पत्नी बनी, और उन्हें राजवंशी बच्चे हुए। राज्य आगे बढ़ता रहा।
आसपास के मन्त्री उन्हें “महाराज” कहते थे। उनके देह पर अब राजसी कपड़े थे, और हाथ अब साफ़ रहते थे, क्योंकि सेवक हर सुबह उन्हें नहलाते थे।
उनके चांडाल जीवन की कोई याद मन में नहीं रहती थी, सिवाय रात के उन कभी-कभी आने वाले सपनों के, जब वे जंगल में अपने पिता के साथ होते। ऐसे में वे जागते, सिर ज़रा भारी लगता, और फिर वे सब भूल जाते।
एक बात उन्होंने ध्यान से देखी थी।
जब भी कोई चांडाल राज-दरबार में आता, तो उनके भीतर एक अजीब-सी हलचल होती और उसका चेहरा जाना-पहचाना लगता। पर यह भाव वे अपने भीतर ही रखते।
उन्होंने अपने सपनों के बारे में न कभी अपनी पत्नी को बताया, न किसी मन्त्री को। यह बात बस उनके भीतर रही।
बूढ़ा
आठवें बरस की एक दोपहर थी।
राज सभा में एक बूढ़ा ब्राह्मण आया। वह किसी और प्रान्त से, राज-दरबार की बात सुनकर आया था। उसने राजा को देखा, और उसका चेहरा बदल गया।
वह बोला – “महाराज।”
गाधि बोले – “बोलिए।”
“महाराज, मैं उत्तर के एक गाँव से आया हूँ। वहाँ बहुत बरस पहले एक चांडाल लड़का था, जिसकी एक बहन थी और जिसके माता-पिता जंगल में रहते थे। मैं उस लड़के को जानता था, क्योंकि मेरे पिता उस गाँव के पास रहते थे।”
बूढ़े ने गाधि की ओर देखा।

“महाराज, माफ़ी चाहता हूँ, पर आप उसी लड़के की तरह दिखते हैं।”
राज सभा में सब चुप रह गए।
मन्त्री ने तुरन्त कहा – “बूढ़े, तू ग़लत कह रहा है। महाराज ब्राह्मण कुल से हैं।”
बूढ़े ने सिर झुकाकर कहा – “क्षमा, मन्त्री। मेरी ग़लती हो सकती है, पर एक बात है।”
मन्त्री बोले – “क्या बात है?”
“उस लड़के की दाहिनी कनपटी पर बचपन की चोट का एक निशान था।”
मन्त्री बोले – “महाराज की कनपटी पर भी निशान है, पर इससे क्या साबित होता है? बहुत लोगों की कनपटी पर निशान होते हैं।”
बूढ़े ने सिर झुकाकर कहा – “माफ़ी, मन्त्री।”
गाधि ने बूढ़े को देखा, जिसकी आँखें कुछ और ही कह रही थीं।
गाधि बोले – “बूढ़े, क्या उस लड़के की और कोई पहचान थी?”
बूढ़े ने सोचकर कहा – “महाराज, उसकी बायीं कोहनी पर एक तीर का गोदना था। चांडाल लोग अपने बच्चों के हाथ पर ऐसा गोदना बनाते थे, जो उम्र बढ़ने के साथ हलका पड़ता जाता था।”
गाधि ने अपनी बायीं कोहनी देखी। उन्हें पता था कि वहाँ तीर का वही गोदना था, बहुत हलका पड़ चुका, पर मौजूद।
गाधि ने मन्त्री की ओर देखकर कहा – “मन्त्री, अब इस सभा को विसर्जित करिए। मुझे थोड़ी देर अकेला रहना है।”
मन्त्री ने सिर झुकाया, दरबार समाप्त हुआ, और बूढ़ा भी चला गया।
रात
रात को गाधि अपने कक्ष में बैठे थे।
उन्हें एक के बाद एक अपना चांडाल नाम, अपनी माँ का चेहरा, अपने पिता, अपनी बहनें, अपनी पहली पत्नी और अपने बच्चे याद आते रहे।
यह सब उनके भीतर अब भी था।
उन्हें पहली बार लगा कि वे दो आदमी हैं, एक राजा और एक चांडाल, और दोनों एक ही देह में बसे हैं।
उन्होंने अपनी कोहनी छुई, और गोदना वहीं था।
उन्होंने सोचा कि यह असली है या उनके दिमाग़ का रचा हुआ। पर वे तो उसे अपनी उँगली से छू सकते थे, तो भला यह रचा हुआ कैसे हो सकता था।
सुबह उन्होंने बूढ़े को बुलवाया।
गाधि बोले – “बूढ़े, क्या तू सच कह रहा था?”
बूढ़े ने सिर झुकाकर कहा – “महाराज, मेरी आँखें बूढ़ी हो चुकी हैं, पर जिस लड़के को मैंने जाना था, उसके चेहरे पर वही दाहिनी कनपटी का छोटा निशान था जो आपके पास है। और वही गोदना। और एक बात और।”
गाधि बोले – “क्या?”
“उस लड़के की एक ख़ास हँसी थी। वह चिल्लाकर हँसता था, इसलिए उसकी हँसी थोड़ी कर्कश लगती थी। महाराज, क्षमा, पर आपकी हँसी भी ऐसी ही है। मैंने कल देखा था, जब आप मन्त्री से कुछ कह रहे थे।”
विद्रोह
बात फैल गई।
मन्त्री-गण, ब्राह्मण और राज पुरोहित इकट्ठा हुए और उन्होंने एक जाँच की। उत्तर के कुछ लोगों ने भी कह दिया कि यह वही लड़का है जो बहुत बरस पहले चला गया था।
सबने एक स्वर में कहा कि अगर राजा चांडाल हैं, तो यह असम्भव-सी बात है, और इतने बरस से एक चांडाल का सिंहासन पर बैठा रहना राज्य के लिए शाप है।
कुछ ब्राह्मण इतने व्यथित हुए कि उन्होंने अग्नि-समाधि लेने का निर्णय कर लिया।
वे बोले – “हम ऐसे राज्य में नहीं रहेंगे जहाँ एक चांडाल राजा हो। हमने अपने जन्म से धर्म का पालन किया है। हम अपनी आख़िरी आज्ञा माँगते हैं, अग्नि।”
राज पुरोहित ख़ुद आगे आए और बोले – “मैं भी।”
नगर के बीच में एक बड़ी चिता बनी।

एक के बाद एक चालीस ब्राह्मण उस पर बैठ गए, और आग जला दी गई।
गाधि ने यह सब देखा, और उनके भीतर कुछ टूट गया। यह उनकी कोई एक पहचान नहीं थी जो टूटी, बल्कि वह पुरानी सोच थी कि जाति से आदमी की पहचान बनती है।
जब चालीस ब्राह्मण एक चांडाल राजा के कारण मरने को तैयार हुए, तब गाधि ने जाना कि जाति की धारणा कितनी गहरी है, और उससे ऊपर उठना कितना मुश्किल।
उन्होंने सोचा कि यह सब उन्हीं के कारण हो रहा है। उनकी पहचान, चाहे जो भी हो, इन लोगों के लिए इतनी असह्य है कि वे मरना पसन्द करेंगे। अब उनका यहाँ रहना ठीक नहीं था।
उनकी पत्नी ने उन्हें देखा और कहा – “महाराज…”
गाधि बोले – “मैं यह सहन नहीं कर सकता।”
“महाराज, यह सब झूठ है। आप ब्राह्मण कुल से हैं। उस बूढ़े को बाहर निकालिए।”
गाधि बोले – “नहीं। बूढ़ा सच कह रहा है।”
पत्नी ठहर गई और बोली – “आप?”
“हाँ।”
“पर…”
“पत्नी, मैंने कई बरस से यह बात अपने भीतर रखी थी, और आज वह खुली है। मैं चांडाल हूँ। मेरा यह राज्य एक चमत्कार था, पर अब उसका अन्त है।”
गाधि ख़ुद चिता की ओर बढ़े।
मन्त्री ने रोककर कहा – “महाराज, नहीं।”
गाधि बोले – “रोकिए मत।”
गाधि चिता पर बैठ गए, और आग ने उन्हें छू लिया।
जागना
और तभी वे डुबकी से ऊपर उठे।
वही नदी थी और वही ठंडा पानी।

गाधि ने आँखें खोलीं और देखा कि वे नदी के बीच खड़े हैं। उनका देह उनका अपना ब्राह्मण देह था, और सूर्य अब भी ठीक उसी जगह था जहाँ वह डुबकी से पहले था।
उनकी साँस अब भी ऊपर-नीचे हो रही थी।
उन्होंने अपनी हथेली देखी, वह ब्राह्मण की हथेली थी, जिस पर न शिकार के निशान थे, न आग के जलने के।
उन्होंने अपनी कनपटी छुई। बचपन वाला छोटा निशान वहाँ अब भी था।
फिर उन्होंने अपनी बायीं कोहनी देखी, जहाँ कोई गोदना नहीं था।
गाधि नदी से निकलकर अपनी कुटिया लौटे और बैठ गए।
बहुत देर तक वे कुछ नहीं समझ पाए। फिर वे उठे और बोले – “मुझे जाना है।”
पहली यात्रा
गाधि ने अपनी कुटिया छोड़ी और उत्तर की दिशा में चल पड़े।
कई दिन चलते रहे, पहाड़ पार किए, नदियाँ पार कीं, और आख़िर एक जंगल में जा पहुँचे।
वह जंगल जाना-पहचाना लगा।
वे आगे बढ़े तो एक झोंपड़ी मिली, जिसकी दीवारें मिट्टी की थीं और छत पर सूखी घास पड़ी थी। बाहर एक बूढ़ी स्त्री बैठी थी।
गाधि ने उसे देखा। बूढ़ी ने आँखें उठाईं और बोली – “बेटा?”
उसकी आँखों में पहचान थी, और चेहरे पर एक हलकी रोशनी आ गई।
वह बोली – “बेटा, तू कहाँ था?”
गाधि एक क़दम पीछे हट गए और बोले – “माफ़ी, माँ। मैं किसी और के लिए नहीं आया हूँ।”
बूढ़ी बोली – “क्षमा, बेटा। तू मेरे बेटे की तरह दिखता है, पर वह तो बहुत साल पहले चला गया था। एक भविष्यवक्ता ने कहा था कि उसे कीर नगरी का राजा बनना है। फिर हमें उसकी कोई ख़बर नहीं आई।”
गाधि के पैर एक पल को ज़मीन से जुड़ गए।
बूढ़ी बात जारी रखते हुए बोली – “मेरा बेटा। उसकी एक बहन थी, जो ब्याह दी गई। पिता मर गए और मैं अकेली रह गई। बेटा भी यहीं रह जाता, तो मेरे पास होता, पर वह कीर चला गया, और हमने कभी सुना ही नहीं कि वहाँ क्या हुआ।”
गाधि ने मुँह खोला, पर शब्द नहीं निकले। फिर बोले – “माँ।”
बूढ़ी बोली – “बोल, बेटा।”
“कीर कितनी दूर है?”
“दो दिन की दूरी पर।”
“मैं वहाँ जाऊँगा।”
“क्यों, बेटा?”
“बस देखने।”
बूढ़ी ने पूछा – “बेटा, तू मेरे बेटे का कोई सम्बन्धी है?”
गाधि बोले – “माँ, मैं नहीं जानता।”
बूढ़ी बोली – “तो जा। जो जानेगा, वह बता देना।”
गाधि कीर पहुँचे।
नगर वैसा ही था जैसा उन्होंने देखा था। वही द्वार, हाथी का वही स्थान, और बीच में वही चौक।
उन्होंने एक नागरिक से पूछा – “भाई, कुछ बरस पहले यहाँ एक राजा थे, जो…”
नागरिक बोला – “चांडाल वाले?”
गाधि बोले – “हाँ।”
“वे थे, हाँ। आठ बरस राज्य किया था। फिर पता चला कि वे चांडाल थे। बहुत-से ब्राह्मण अग्नि-समाधि में चले गए, और राजा भी ख़ुद चिता पर बैठ गए। उसके बाद हमारा नगर बहुत दिनों तक शोक में रहा। अब नए राजा हैं।”
गाधि ने पूछा – “और राजा के परिवार?”
“रानी और बच्चे राज-कुल के पास हैं। उनकी सेवा होती है, पर वे अब महल में नहीं रहते।”
गाधि वापस लौट पड़े।
लौटते समय उन्होंने सोचा कि उन्होंने डुबकी में जो देखा था, वह सिर्फ़ सपना नहीं था। माँ हैं, और वे उन्हें पहचानती हैं। कीर नगर है, और वहाँ का इतिहास वही है जो उन्होंने अपनी उस ज़िन्दगी में जिया था।
तो वे कौन हैं, गाधि ब्राह्मण, या वह चांडाल लड़का जो कीर का राजा बना? अगर वे गाधि हैं, तो वह ज़िन्दगी क्या थी, और अगर वे चांडाल हैं, तो यह ज़िन्दगी क्या है?
वे सोचते रहे, और तभी उन्हें एक नाम याद आया, विष्णु।
विष्णु के पास
गाधि ने तप शुरू किया, बहुत बरस तक चलने वाला बहुत कठिन तप।

एक दिन विष्णु प्रकट हुए, चार हाथ, पीला पीताम्बर, और हाथ में चक्र।
विष्णु बोले – “गाधि, बोलो।”
गाधि बोले – “भगवन्, मुझे एक बात बताइए। मैंने एक डुबकी में एक पूरा जीवन जिया। चांडाल बना, राजा बना, फिर चिता पर बैठा, फिर जागा। फिर मैं वहाँ गया जहाँ मैंने अपनी माँ देखी थी, और वे सचमुच थीं। मैंने नगर देखा, वह भी था। सब वैसा ही है जैसा मैंने सपने में देखा। तो वह सच था या यह सच है?”
विष्णु बोले – “गाधि, वह सब तुम्हारे मन का था।”
“पर माँ?”
“वह भी तुम्हारे मन का था।”
“पर मैं वहाँ गया था।”
“तुम्हारा मन तुम्हें वहाँ ले गया था।”
“तो जो मैंने देखा?”
“वह सब तुम्हारे मन ने रचा।”
गाधि समझे नहीं, और बोले – “भगवन्, अगर वह सब मेरे मन का था, तो वह नगर?”
विष्णु बोले – “नगर भी तुम्हारे मन का था।”
“पर वहाँ और लोग भी हैं।”
“वे भी।”
गाधि और भी चकित हुए और बोले – “भगवन्, यह कैसे हो सकता है?”
“गाधि, यह इसलिए हो सकता है क्योंकि चेतना का स्वभाव यही है। तुम्हें अभी समझ नहीं आएगा। जाओ, फिर देखो, और फिर मेरे पास आना।”
यह कहकर विष्णु अदृश्य हो गए।
गाधि लौट आए, पर वह प्रश्न उनके भीतर बना रहा।
विष्णु के उस दर्शन में एक बात गाधि को खटकती रही। विष्णु की हँसी उन्हें असली नहीं लगी थी।
उन्हें लगा कि विष्णु ने उन्हें कोई बड़ी बात नहीं बताई, बस इतना कहा कि “सब तुम्हारे मन का है।” यह बात तो वे पहले से जानते थे और बहुत बार सुन चुके थे।
गाधि रात भर बैठे सोचते रहे कि विष्णु ने उन्हें टाल दिया है और पूरा उत्तर नहीं दिया।
पर थोड़ी देर बाद उन्हें एक और विचार आया, कि शायद उत्तर पूरा ही था, बस उन्हीं को समझ नहीं आया।
गाधि अपनी कुटिया में बैठकर कई दिनों तक यही सोचते रहे।
एक रात उन्हें एक सपना आया।
सपने में वे फिर से विष्णु के पास थे।
विष्णु बोले – “गाधि, तुम वापस आ गए।”
गाधि बोले – “भगवन्, मैं तो सो रहा हूँ।”
“हाँ, पर फिर भी तुम वापस आ गए।”
गाधि ने हाथ जोड़कर कहा – “भगवन्, मुझे और बताइए।”
विष्णु बोले – “गाधि, सुनो। मैंने पहले कहा था कि सब तुम्हारे मन का है। यह सच है, पर अधूरा है। पूरा सच यह है, अब बताओ, तुम्हारा मन कहाँ से आता है?”
गाधि बोले – “भगवन्, मुझे नहीं पता।”
विष्णु बोले – “सोचो।”
गाधि ने सोचा।
गाधि बोले – “भगवन्, मेरा मन मेरी चेतना से आता है।”
विष्णु बोले – “और चेतना?”
“वह…”
विष्णु बोले – “वह किसी और से आती है?”
गाधि बोले – “नहीं।”
“फिर?”
“वह स्वयं है।”
विष्णु बोले – “गाधि, अब तुम पास आ रहे हो।”
विष्णु अदृश्य हो गए और गाधि जाग गए।
सपना समाप्त हो गया।
पर गाधि की समझ बदल चुकी थी।
अब उन्हें एक बात मालूम होने लगी थी, कि उनका मन उनकी चेतना से आता है, और उनकी चेतना स्वयं है। तो जो वे देख रहे हैं, वह भी एक स्तर पर उनकी चेतना से ही आता है।
दूसरी यात्रा
गाधि ने फिर यात्रा शुरू की, इस बार दक्षिण की ओर। बरस बीतते गए।
उन्होंने कई गाँव और नगर देखे, और कई लोगों से बातें कीं।
एक स्त्री मिली, जिसने कहा – “मैं एक बार सोई थी, तो मुझे लगा कि मैं एक पंछी हूँ। पूरी ज़िन्दगी पंछी रही, बीस बरस का जीवन, बच्चे हुए। फिर मैं उठी, तो मैं स्त्री ही थी।”
एक आदमी मिला, जिसने कहा – “मुझे एक दिन लगा कि मैं समुद्र के तल पर एक मछली हूँ। मैं हज़ार बरस मछली रहा, फिर एक मछुआरे के जाल ने मुझे पकड़ लिया और मैं तड़पा। फिर मैं जागा, तो अपनी चटाई पर था और सुबह हो चुकी थी।”
एक बूढ़ा मिला, जिसने कहा – “मैंने एक बार सपना देखा कि मैं किसी बहुत बड़े राज्य का राजा हूँ। मेरा युद्ध हुआ, मैं हार गया, और मेरी हत्या हुई। फिर मैं जागा, तो मेरी पत्नी मेरे पास थी। उसने पूछा कि मैं क्यों चिल्ला रहा था, मैंने कहा, कुछ नहीं। पर वह हार मेरे भीतर कई दिन बैठी रही।”
गाधि ने यह सब सुना, और उन्हें एक बात समझ आने लगी, पर पूरी तरह नहीं।
वे फिर विष्णु के पास गए।
विष्णु बोले – “बोलो, गाधि।”
गाधि बोले – “भगवन्, मैंने अब और लोगों के अनुभव भी सुने हैं। उन्हें भी ऐसे ही अनुभव हुए हैं।”
विष्णु बोले – “और?”
“और मुझे लग रहा है कि यह सच में हुआ था। मेरा चांडाल जीवन, उनका पंछी जीवन, उनका मछली जीवन, यह सब सच में हुआ, बाहर, इस दुनिया में।”
विष्णु हँसे और बोले – “गाधि, यह सब सच में हुआ। पर ‘बाहर’ और ‘भीतर’ का जो भेद तुम कर रहे हो, वह भेद ख़ुद तुम्हारे मन का है। तुम्हारा मन कहता है कि जो भीतर है वह सपना है और जो बाहर है वह सच है। पर असल में बाहर भी भीतर ही है। चेतना के लिए कोई बाहर है ही नहीं।”
गाधि बोले – “पर भगवन्…”
“गाधि, अभी और सुनो, फिर समझोगे। जाओ।”
गाधि लौट आए, पर उनके भीतर अभी समाधान नहीं था।
विष्णु के पास, दूसरी बार
गाधि ने अपनी दूसरी यात्रा में बहुत कुछ देखा और बहुत-से लोगों से मिले। बहुत बरस बाद वे फिर विष्णु के पास लौटे।
इस बार विष्णु अलग रूप में थे। पहली बार वे चार हाथों वाले थे, पीले पीताम्बर में, हाथ में चक्र लिए। इस बार वे एक छोटे ब्राह्मण के रूप में थे, साधारण कपड़ों में, हाथ में बस एक छड़ी लिए।
गाधि ने उन्हें देखा, पर पहचाना नहीं।
ब्राह्मण बोला – “गाधि।”
गाधि चौंककर बोले – “आप मुझे जानते हैं?”
“हाँ। मैं विष्णु हूँ।”
गाधि ने हाथ जोड़कर कहा – “भगवन्, यह रूप?”
विष्णु बोले – “गाधि, मैं हर रूप में आता हूँ, हर बार एक नया रूप। पहली बार तुमने मुझे चार हाथों वाला देखा, अब छोटा ब्राह्मण, और अगली बार कुछ और।”
गाधि बोले – “भगवन्, मुझे एक और प्रश्न पूछना है।”
विष्णु बोले – “पूछो।”
“भगवन्, अगर सब मेरे मन का है, तो क्या आप भी?”
विष्णु बोले – “गाधि, यह बहुत अच्छा प्रश्न है।”
गाधि बोले – “बताइए।”
“हाँ। एक स्तर पर मैं भी तुम्हारे मन का हूँ। तुम मुझे अपनी कल्पना से रच रहे हो।”
गाधि ठहरकर बोले – “भगवन्, यह कैसे?”
विष्णु बोले – “गाधि, मैं हूँ, पर मैं तुम्हें कैसे दिखता हूँ, यह तुम्हारे मन से तय होता है। अगर तुम मुझे चार हाथों वाला सोचते, तो मैं वैसा दिखता, और अगर ब्राह्मण सोचते, तो वैसा। मेरा असली रूप तुम्हारी कल्पना से बाहर है, पर तुम्हारी आँखों के लिए मैं तुम्हारे मन से ही गढ़ा जाता हूँ।”
गाधि बोले – “और एक बात, भगवन्।”
विष्णु बोले – “क्या?”
“भगवन्, मैंने पहली यात्रा में चांडाल जीवन देखा, फिर असल में वहाँ गया, और दोनों एक ही निकले। दूसरी यात्रा में मैंने और भी अनुभव देखे, सब लोगों के अपने-अपने। अब मैं समझ रहा हूँ कि अनुभव और बाहर अलग नहीं हैं।”
विष्णु बोले – “और?”
विष्णु बोले – “गाधि, अब तुम पहले की तुलना में आगे हो, पर एक बात अभी बाक़ी है।”
गाधि बोले – “क्या?”
“तुम सोच रहे थे कि अनुभव बाहर से आता है। अब तुम समझ रहे हो कि अनुभव भीतर भी है। पर एक स्तर ऐसा भी है जहाँ अनुभव कुछ नहीं रहता, बस चेतना रहती है।”
गाधि बोले – “भगवन्, यह कैसे जानूँ?”
विष्णु बोले – “गाधि, अनुभव के बीच जो खाली है, उसे देखो। हर अनुभव के बाद एक छोटा क्षण आता है, जिसमें कोई अनुभव नहीं होता। उस क्षण में बस तुम होते हो, केवल तुम।”
गाधि बोले – “भगवन्, एक और प्रश्न।”
विष्णु बोले – “पूछो।”
“क्या मेरा चांडाल जीवन और मेरा यह जीवन एक ही चेतना के हैं?”
विष्णु बोले – “हाँ।”
“और मेरे राजा जीवन के मन्त्री?”
“वे भी।”
“और मेरी पत्नी?”
“वह भी।”
“और मेरे बच्चे?”
“वे भी।”
गाधि बोले – “भगवन्, फिर हम कितने हैं?”
विष्णु बोले – “गाधि, एक।”
“पर हम तो अलग दिखते हैं।”
“दिखना अलग है, होना एक है।”
इतना कहकर विष्णु अदृश्य हो गए।
चांडाल माँ की एक और बात
अपनी असली कुटिया लौटकर गाधि ने एक काम किया।
बहुत बरस बाद वे फिर उत्तर के उस चांडाल गाँव गए।
बूढ़ी अब जीवित नहीं थीं, जैसा कि गाधि को पहले से पता था। पर वहाँ एक छोटी बच्ची मिली, बूढ़ी की पड़पोती।
गाधि बोले – “बच्ची, मैं तुम्हारी परदादी को जानता था।”
बच्ची बोली – “बहुत बरस पहले?”
गाधि बोले – “हाँ।”
बच्ची ने गाधि को देखकर कहा – “बाबा, परदादी ने अपनी मृत्यु से पहले एक बात कही थी।”
गाधि बोले – “क्या?”
“उन्होंने कहा था, मेरे बेटे को बताना, अगर वह कभी आए, कि माँ ने उसे माफ़ कर दिया।”
गाधि बहुत देर तक ठहरे रह गए।
फिर बोले – “बच्ची, वह बेटा मैं ही था।”
बच्ची बोली – “मुझे पता है।”
गाधि बोले – “कैसे?”
“बाबा, परदादी ने आपका चेहरा बताया था, दाहिनी कनपटी पर एक छोटा निशान। आपके चेहरे पर वह निशान है।”
गाधि ने अपनी कनपटी छुई।
वे बहुत देर तक चुप रहे।
फिर बोले – “बच्ची, मैं तुम्हारी परदादी को क्या जवाब दूँ?”
बच्ची ने सोचकर कहा – “बाबा, परदादी अब नहीं हैं। पर अगर वे कहीं हैं, तो उन्हें अपने मन में बता दीजिए।”
गाधि ने आँखें बन्द कर लीं।
गाधि बोले – “माँ।”
भीतर से उत्तर आया – “बेटा।” पर वह एक हलकी-सी आहट थी, और पता नहीं वह असली थी या कल्पना।
गाधि बोले – “माँ, क्षमा?”
“क्षमा की कभी ज़रूरत ही नहीं थी, बेटा।”
बहुत बरस के बाद पहली बार गाधि के आँसू बहे।
जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो बच्ची उन्हें देख रही थी।
बच्ची बोली – “बाबा, आपने सुना?”
गाधि बोले – “हाँ।”
बच्ची बोली – “बाबा, यह तो अच्छा हुआ।”
गाधि ने अपने पास से कुछ अनाज निकालकर बच्ची को दिया और बोले – “बच्ची, यह तुम्हारे लिए।”
बच्ची बोली – “बाबा, धन्यवाद।”
गाधि लौट पड़े।
लौटते रास्ते उन्हें बहुत बरस बाद भीतर एक शान्ति मिली।
तीसरी यात्रा
गाधि ने एक तीसरी यात्रा की।
इस बार उन्होंने हर जगह जाकर हर कथा को सुना। हर मनुष्य की चेतना की अपनी एक अलग कथा थी, हर एक के पास अपने अनुभव थे, और हर अनुभव अपने तरीक़े से सच था।
एक दिन वे एक नदी के किनारे बैठे थे और उन्होंने अपना प्रतिबिम्ब देखा, एक थका हुआ बूढ़ा ब्राह्मण, पर भीतर वही पुराना प्रश्न लिए।
उन्होंने अपने प्रतिबिम्ब से पूछा – “मैं कौन हूँ?”
प्रतिबिम्ब ने कोई जवाब नहीं दिया।
गाधि ने अपने भीतर देखा।
मैं गाधि हूँ? पर गाधि तो एक नाम है, और नाम मैं नहीं हो सकता।
मैं ब्राह्मण हूँ? पर ब्राह्मण तो एक जाति है, और जाति मैं नहीं हो सकता।
मैं देह हूँ? पर देह तो बदलता रहता है। कभी चांडाल देह था, अब ब्राह्मण देह है। तो जो बदलता है, वह मैं नहीं हो सकता।
मैं मन हूँ? पर मन भी बदलता रहता है, एक क्षण ख़ुश, एक क्षण दुखी। तो जो बदलता है, वह मैं नहीं हो सकता।
गाधि ने एक के बाद एक हर चीज़ छोड़ी, और आख़िर वे एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ कुछ नहीं बदलता था, एक स्थिर चेतना, हर बदलाव की साक्षी।
वे वहीं ठहर गए और जान गए कि मैं यही हूँ।
अब गाधि के भीतर एक नया प्रश्न उठा, कि अगर हर एक का अनुभव सच है और सबके अनुभव अलग हैं, तो सच एक है या अनेक?
वे फिर विष्णु के पास गए।
विष्णु ने उन्हें देखकर कहा – “फिर आ गए, गाधि।”
गाधि बोले – “भगवन्, अब मुझे यह बताइए, सच एक है या अनेक?”
विष्णु बोले – “गाधि, अब ध्यान से सुनो, और इस बार समझो।
“सच एक है, चेतना, बस एक। पर यह एक चेतना अनगिनत रूप ले सकती है, और हर रूप अपने आप में सच है। तुम चांडाल थे, सच। तुम राजा थे, सच। तुम गाधि हो, सच। ये सब अलग-अलग कथाएँ हैं, पर सबका मूल एक है।
“तुम जो खोज रहे हो, वह एक ऐसी स्थिर सच्चाई है जो तुम्हारे अनुभवों के बाहर हो। ऐसी कोई सच्चाई नहीं है। तुम्हारे अनुभव ही सच्चाई हैं। पर तुम्हारी चेतना उन सब अनुभवों के पीछे है, और वह एक है।
“लोग कहते हैं कि यह सच है और यह झूठ है। पर असल में हर अनुभव चेतना का एक चित्र है। चित्र असली नहीं होते, पर चित्र बनाने वाला असली होता है। तुम चित्र पर मत अटको, चित्रकार को देखो।
“वह चित्रकार तुम हो। हर चित्र में तुम हो, हर कथा में तुम हो, हर ज़िन्दगी में तुम हो। पर तुम किसी एक चित्र, किसी एक कथा या किसी एक ज़िन्दगी में बँधे नहीं हो।
“जब तक तुम इस सत्य को नहीं पहचानते, तब तक तुम कहीं न कहीं बँधे रहोगे। जिस दिन पहचानोगे, उस दिन सब कथाएँ तुम्हें खेल-सी लगेंगी।”
इस बार गाधि समझ गए।
गाधि बोले – “भगवन्, एक प्रश्न। क्या मेरी चांडाल माँ अब भी वहाँ जंगल में हैं?”
विष्णु बोले – “हाँ, वे वहाँ हैं। तुम्हारी चांडाल पत्नी की कब्र भी वहाँ है, और तुम्हारे बच्चे राज्य में हैं।”
गाधि बोले – “तो क्या मुझे उनके लिए कुछ करना चाहिए?”
“गाधि, उनसे मिलो और उन्हें सहारा दो, यह तुम्हारा कर्तव्य है। पर उनसे अपने को बाँधना मत। तुम जान चुके हो कि तुम कौन हो।”
गाधि ने सिर झुकाया, और विष्णु अदृश्य हो गए।
गाधि बहुत देर तक बैठे रहे। उनके भीतर हर साँस के साथ धीरे-धीरे एक खुलासा हो रहा था।

मैं चित्रकार हूँ। चांडाल मेरा एक चित्र था, राजा मेरा एक चित्र था, और गाधि भी मेरा एक चित्र है। तीनों मेरे हैं, पर तीनों में से कोई एक मैं नहीं हूँ। मैं उन सबके पीछे का प्रकाश हूँ।
विष्णु के पास, तीसरी बार
गाधि की विष्णु से तीसरी मुलाक़ात हुई।
इस बार विष्णु एक स्त्री के रूप में थे, बहुत सुन्दर, जिनकी उम्र का कुछ पता नहीं चलता था और जिनकी आँखों में एक स्थिर-सी गहराई थी।
गाधि चकित होकर बोले – “भगवन्?”
विष्णु बोलीं – “हाँ, गाधि। मैं ही हूँ।”
गाधि बोले – “पर…”
“गाधि, हर बार नया रूप, यह तो मैंने तुम्हें बताया ही था।”
गाधि ने हाथ जोड़कर कहा – “भगवन्, इस बार मेरा प्रश्न अलग है।”
विष्णु बोलीं – “बोलो।”
गाधि बोले – “भगवन्, मैं समझ गया कि सब चेतना है। पर एक छोटा प्रश्न है, मेरी मृत्यु?”
विष्णु बोलीं – “गाधि, यह बहुत अच्छा प्रश्न है।”
गाधि बोले – “बताइए।”
“गाधि, मृत्यु एक रूप का अन्त है, चेतना का नहीं। तुम चेतना हो, इसलिए तुम मरते नहीं।
“पर तुम्हारा देह मरता है, तुम्हारा यह रूप मरता है। तब तुम कुछ देर बिना देह के रहते हो, फिर एक नए देह में चले जाते हो।
“और तुम्हें यह सब याद नहीं रहता। नए देह में नई पहचान होती है।”
गाधि बोले – “भगवन्, क्या मेरे पुराने देह की कोई बात याद रह सकती है?”
विष्णु बोलीं – “कुछ बार हाँ, कुछ बार नहीं। यह तुम्हारी सीखी हुई शिक्षा पर निर्भर है।”
गाधि बोले – “भगवन्, मैं चाहता हूँ कि मेरे अगले देह में कुछ याद रहे।”
विष्णु बोलीं – “क्यों?”
“क्योंकि मैंने इस जीवन में बहुत कुछ सीखा है। मैं नहीं चाहता कि सब फिर से सीखना पड़े।”
विष्णु बोलीं – “गाधि, यह अच्छी इच्छा है। पर असल में जो याद रहता है, वह शब्द नहीं, बल्कि एक हलकी प्रवृत्ति होती है।
“तुम्हारे अगले देह में तुम्हें इस जीवन के शब्द याद नहीं रहेंगे, पर एक प्रवृत्ति रहेगी।
“वह प्रवृत्ति यही होगी कि सच्चाई बाहर नहीं, भीतर है। वही प्रवृत्ति तुम्हें आगे ले जाएगी।”
गाधि बोले – “भगवन्, यह काफ़ी है।”
विष्णु बोलीं – “गाधि, और एक बात।”
गाधि बोले – “बोलिए।”
“तुम अब अपने राज्य लौटो। पर अब वह राज्य तुम्हारा नहीं है। तुम बस एक तपस्वी हो जो एक राज्य में रहता है।”
गाधि बोले – “भगवन्, मेरा कोई राज्य नहीं है। मैं तो ब्राह्मण हूँ।”
विष्णु बोलीं – “गाधि, तुम्हारा अब भी एक राज्य है। तुम्हारी कुटिया, तुम्हारी पुस्तकें, तुम्हारी पुरानी आदतें, वह भी एक राज्य ही है।”
गाधि ने सिर झुकाया।
विष्णु अदृश्य हो गईं।
और एक मुलाक़ात
बहुत बरस बाद गाधि बहुत बूढ़े हो चुके थे।
एक दिन एक युवक उनकी कुटिया पर आया और बोला – “बाबा, मैंने आपके बारे में बहुत सुना है।”
गाधि बोले – “क्या सुना?”
युवक बोला – “बाबा, सुना है कि आपने तीन जीवन जिए, एक डुबकी में एक पूरा जीवन।”
गाधि बोले – “बेटा, यह बहुत पुरानी बात है।”
युवक बोला – “बाबा, मुझे एक बात बताइए।”
गाधि बोले – “क्या?”
युवक बोला – “बाबा, क्या जीवन सच में सपना है?”
गाधि बोले – “बेटा, यह प्रश्न मेरे जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न था।”
युवक बोला – “और जवाब?”
गाधि बोले – “बेटा, जवाब एक नहीं है।”
गाधि ने युवक को बैठने का इशारा किया।
युवक बैठ गया।
गाधि बोले – “बेटा, अगर मैं कहूँ कि जीवन सपना है, तो तुम क्या करोगे?”
युवक बोला – “शायद मैं उसे गम्भीरता से न लूँ।”
गाधि बोले – “और अगर मैं कहूँ कि जीवन असली है, तो?”
“शायद मैं उसे बहुत गम्भीरता से लूँ।”
गाधि बोले – “बेटा, दोनों ग़लत हैं।”
युवक बोला – “फिर?”
गाधि बोले – “बेटा, जीवन सपना भी है और असली भी, दोनों एक साथ।”
युवक बोला – “बाबा, यह तो कठिन है।”
गाधि बोले – “हाँ।”
युवक बोला – “बाबा, एक बात पूछूँ?”
गाधि बोले – “बोलो।”
“क्या मेरे लिए कोई रास्ता है?”
गाधि बोले – “बेटा, हाँ, एक रास्ता है।”
युवक बोला – “क्या?”

गाधि बोले – “बेटा, जब तुम कुछ कर रहे हो, तो उसमें पूरी तरह डूब जाओ, जैसे वह असली हो। पर जब तुम कुछ नहीं कर रहे, तो उसे ऐसे देखो जैसे वह सपना हो। दोनों एक साथ।”
युवक बोला – “बाबा, कोई उदाहरण दीजिए।”
गाधि बोले – “बेटा, अगर तुम युद्ध में हो, तो अपनी तलवार पूरी तरह चलाओ, जैसे वह असली हो और तुम्हारा शत्रु असली हो।
“पर युद्ध के बाद अपने देह को देखो, अपने घाव, अपना डर, अपनी थकान, इन्हें ऐसे देखो जैसे ये सपना हों। एक रात बीतते ही ये चले जाएँगे।”
युवक बोला – “और प्रेम में?”
गाधि बोले – “बेटा, प्रेम में अपने प्रिय को पूरी तरह प्रेम करो, जैसे वह असली हो और हमेशा रहने वाला हो।
“पर अकेले बैठते समय अपने प्रेम को देखो, उसकी सीमा, उसकी तीव्रता, इन्हें ऐसे देखो जैसे ये सपना हों। ये बदलते रहते हैं।”
युवक बोला – “बाबा, मुझे यह बात बैठ रही है।”
गाधि बोले – “बेटा, इस बात को बैठने में बहुत बरस लगते हैं। पर तुमने शुरुआत कर दी है।”
युवक ने प्रणाम करके कहा – “बाबा, धन्यवाद।”
गाधि बोले – “नहीं, बेटा। तुमने मुझसे पूछा, यह तुम्हारा साहस है।”
युवक चला गया, और गाधि कुछ देर चुप बैठे रहे।
बाहर सूरज ढल रहा था।
गाधि ने सोचा – “मेरा जीवन भी एक कथा है। और इस कथा का सुनने वाला कौन है?”
गाधि ने अपने भीतर देखा, जहाँ एक स्थिर-सी उपस्थिति थी।
“तुम।”
लौटना
गाधि उठे और उत्तर की ओर चले। इस बार उन्होंने कोई जल्दबाज़ी नहीं की।
बहुत दिन बाद वे उसी झोंपड़ी पहुँचे।
बूढ़ी अब और भी बूढ़ी हो चुकी थीं। उन्होंने गाधि को देखकर कहा – “बेटा।”
गाधि ने सिर झुकाकर कहा – “माँ।”
बूढ़ी बोली – “तू अब क्या बता रहा है?”
गाधि बोले – “माँ, मैं ही तुम्हारा बेटा था। पर अब मैं इससे कुछ और भी हूँ।”
बूढ़ी बोली – “बेटा, मैं समझती नहीं। पर तू मेरे पास है, यही काफ़ी है।”
गाधि कुछ दिन वहाँ रहे और बूढ़ी की सेवा की। उन्होंने उनके लिए खाना बनाया, पानी लाया, और बातचीत की।
फिर एक दिन बूढ़ी गाधि की गोद में शान्ति से चल बसीं।
गाधि ने उन्हें नदी के किनारे दफ़नाया।
फिर वे कीर गए और अपने बच्चों से मिले। उन्होंने अपने बच्चों को कोई बहुत बड़ी बात नहीं बताई, पर बच्चे जान गए कि उनके पिता अब वही नहीं हैं जो पहले थे।
बच्चे राजकुल में थे और उनकी देखभाल हो रही थी।
गाधि ने उन्हें सहारा दिया, पर उनके साथ रहने के लिए नहीं रुके।
फिर गाधि अपनी कुटिया लौट आए और बाक़ी जीवन तपस्या में बिताया।
पर अब उनकी तपस्या प्रश्न से नहीं, उत्तर से थी। उत्तर मिल चुका था, और तपस्या उस उत्तर को बार-बार पहचानने का अभ्यास भर थी।
राम बोले – “गुरुदेव, तो जब मेरे साथ कुछ ऐसा होगा, तो क्या मैं भी…”
वसिष्ठ बोले – “नहीं, राम। तुम्हारे साथ शायद कभी ऐसा न हो जैसा गाधि के साथ हुआ। तुम्हारी कथा अलग है। पर तुम भी एक दिन यह जानोगे कि तुम चित्रकार हो। हर एक के लिए वह दिन आता है, बस उसकी कथा अलग होती है।”
राम ने पानी की ओर देखा, जहाँ मन्दिर का दिया अब भी जल रहा था।
राम बोले – “गुरुदेव, क्या मैं किसी और के सपने में हूँ?”
वसिष्ठ हँसकर बोले – “राम, यह प्रश्न अपने पास रखो। उत्तर समय पर आएगा।”
राम बोले – “गुरुदेव, गाधि की चांडाल माँ की बात मुझे बहुत भीतर तक छू गई।”
वसिष्ठ बोले – “क्यों?”
राम बोले – “उसने अपने बेटे को बहुत बरस याद किया, और मरते समय एक छोटा-सा संदेश छोड़ गई, माफ़ी का। जबकि उस बेटे को उसका कोई असली अनुभव नहीं था। बेटे के लिए वह माँ बस एक डुबकी की कथा थी, पर माँ के लिए बेटा असली था।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बात समझो। हर रिश्ता एक स्तर पर असली है और एक स्तर पर सपना। बेटे के लिए चांडाल माँ डुबकी का अनुभव थी, और माँ के लिए चांडाल बेटा बहुत बरस का जीवन था। दोनों सही हैं, दोनों एक साथ।”
राम ने पानी की ओर बहुत देर तक देखा।
फिर बोले – “गुरुदेव, मेरे जीवन में बहुत लोग आएँगे, और हर एक के लिए मैं अलग रहूँगा। माँ के लिए बेटा, पत्नी के लिए पति, प्रजा के लिए राजा। पर भीतर मैं एक ही हूँ।”
वसिष्ठ बोले – “राम, तुम सही कह रहे हो।”
राम बोले – “और गाधि के समान, मैं हर भूमिका में पूरी तरह उतर सकता हूँ, पर भीतर वही रहूँगा।”
वसिष्ठ बोले – “बिल्कुल।”
मन्दिर का दिया अब भी जल रहा था, और राम ने उसे देखा।
राम बोले – “गुरुदेव, वह दिया भी कई रूपों में होगा। कोई इसे साधना मानता होगा, कोई बस रोशनी। पर दिया एक ही है।”
वसिष्ठ हँसकर बोले – “बिल्कुल, राम। यह प्रश्न अपने पास रखो। उत्तर समय पर आएगा।”
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.44-49 पर आधारित है। गाधि की कथा लवण की कथा की साथी है, पर वहाँ समय बदलता है और यहाँ पहचान बदलती है। विष्णु के तीन दर्शन और हर बार वही उत्तर, “सब तुम्हारे मन का है,” इस कथा की दार्शनिक संरचना है। यह कथा चेतना और अनुभव के सम्बन्ध पर शास्त्र की सबसे स्पष्ट कथाओं में से एक है। ब्राह्मणों की अग्नि-समाधि का दृश्य शास्त्र की सबसे तीखी सामाजिक टिप्पणियों में से एक है, क्योंकि वह दर्शाता है कि जाति की धारणा की पकड़ कितनी बड़ी है।
दर्शन-दृष्टि
गाधि नदी में स्नान करते हुए डूबते हैं और एक चांडाल स्त्री के गर्भ में जन्म लेते हैं। एक पूरा जीवन तृणवासी के रूप में जीते हैं, फिर आठ बरस के लिए कीर नगरी के राजा बनते हैं, फिर अपनी जाति का भेद खुलने पर अग्नि में कूद पड़ते हैं, और तब नदी के तट पर जागते हैं। बार-बार जाँचने जाते हैं, बार-बार सब कुछ सच मिलता है, और बार-बार विष्णु कहते हैं कि सब तुम्हारे मन में था। कथा यह कहती है कि पहचान कोई वस्तुगत वस्तु नहीं, बल्कि मन की एक रचना है, और मन उसे जब चाहे जैसी चाहे रच लेता है।
आधुनिक जर्मन दर्शन में एडमुण्ड हुसर्ल (Edmund Husserl, 1859-1938) ने अपनी Logical Investigations (1900-1901) में चेतना की intentionality की व्याख्या की, कि चेतना सदा किसी न किसी विषय की चेतना होती है, और वह विषय चेतना के बाहर स्वतन्त्र खड़ा नहीं रहता। गाधि का अनुभव यही है। उनकी ब्राह्मण-पहचान, चांडाल-पहचान और राजा-पहचान, सब चेतना के विषय हैं, और चेतना ही उन्हें ख़ुद से खड़ा करती है।