हेमचूड़ और हेमलेखा

कथा · 23

हेमचूड़ और हेमलेखा: प्रेम जो गुरु बना

राजा को एक सुंदर लड़की पसंद आई। शादी की शर्त बस एक थी, कि आपको मेरी सिखाई हर बात सुननी होगी। राजा ने मान लिया, और उसके बाद हर दिन एक नया प्रश्न आया, और हर रात एक नई समझ।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या एक पत्नी अपने पति को सिखा सकती है, बिना यह बताए कि सिखा रही है?”

वसिष्ठ बोले – “राम, चूड़ाला ने अपने पति को सिखाया था, पर वो एक स्त्री के रूप में स्वीकार नहीं हुई थीं, और उन्हें कुम्भ बनना पड़ा। एक और कथा है, जिसमें यह बात अलग ढंग से हुई। हेमलेखा अपने पति हेमचूड़ को उसी रूप में सिखाती हैं, बस प्रश्नों के द्वारा, और उनके पति ने उन्हें स्त्री के रूप में स्वीकार किया। पर इसमें भी एक रास्ता था। सुनो।”

हेमचूड़

हेमचूड़ राजकुमार थे। उनके पिता एक बड़े राज्य के बड़े राजा थे, और हेमचूड़ उनके अकेले पुत्र, बड़े लाड़-प्यार में पले।

Young prince Hemachuda, richly jeweled, rides a spirited horse and draws a bow on a palace training ground, attendants watching, sunlit Indian-miniature style

उनका देह सुन्दर था और उनकी हँसी मधुर, और उनकी आदतें राजकुलीन। वो घोड़ों पर बैठते, धनुष चलाते, और युद्ध की कलाएँ सीखते।

पर भीतर वो बहुत साधारण थे। उन्हें न कोई बहुत बड़ी प्यास थी, न कोई बहुत बड़ी कमी।

उनके जीवन में सब कुछ था।


जब वो बड़े हुए, तो पिता ने उनके विवाह की बात की।

बहुत राजवंशी राजकुमारियों के नाम आए, और हेमचूड़ ने एक के बाद एक उन सब के चित्र देखे, पर कोई एक ख़ास नहीं लगी। फिर एक चित्र आया।


हेमलेखा

चित्र में एक स्त्री थी।

वो राजकुमारी नहीं थी। उसके कपड़े साधारण थे, और उसके पीछे एक आश्रम था और कुछ पेड़। पर उसकी आँखों में कुछ था।

Prince Hemachuda stands gazing intently at a framed portrait of Hemalekha on an easel, turning to question his crowned father in an arched palace hall

हेमचूड़ ने उस चित्र को बहुत देर तक देखा, फिर पिता से पूछा – “पिता, यह कौन है?”

पिता बोले – “बेटा, यह हेमलेखा है, एक अप्सरा की बेटी। पर उसकी माँ ने उसे एक ऋषि के आश्रम में पाला, और वो वहीं बड़ी हुई। ऋषि ने उसे शास्त्र पढ़ाए, और उसकी एक बहुत अलग बुद्धि है। पर यह तेरे लिए शायद उपयुक्त नहीं। तू राजकुमार है, तेरी पत्नी राजकुमारी होनी चाहिए।”

हेमचूड़ बोले – “पिता, मुझे यह पसन्द है। इसकी आँखों में कुछ है, और मुझे लगता है मेरी प्यास इसके पास होगी।”

पिता एक पल चुप रहे, फिर बोले – “बेटा, सोच लो।”

“मैंने सोच लिया।”


विवाह हुआ।

The slender, simply-braided Hemalekha arrives at the royal palace in courtly silks she wears uneasily, attendants and marble columns around her, her eyes steady and questioning

हेमलेखा राजमहल में आईं। वो सुन्दर थीं, पर साधारण रूप से। उनका देह छरहरा था, उनके बाल पीछे एक साधारण जूड़े में बँधे, और उनके कपड़े अब राजकुलीन थे, पर वो उनमें असहज दिखती थीं।

उनकी आँखें अलग थीं। उनमें एक स्थिरता थी, एक तेज़ी, एक प्रश्न।


हेमलेखा अपने साथ बहुत कम चीज़ें लाई थीं, बस एक पोटली। उसमें कुछ साधारण कपड़े थे, एक ताम्बे का कमंडल, और एक रुद्राक्ष की माला जिसे उनके पालक-ऋषि ने उन्हें विवाह के पहले दिन दिया था।


माला उनके गले में रहती, पर रेशम के दुपट्टे के नीचे।


हेमलेखा की एक आदत थी। जब वो किसी कठिन प्रश्न पर सोचतीं, तो दाहिने हाथ की उँगलियाँ बिना देखे अपनी रुद्राक्ष की माला पर पहुँचतीं, और एक मनका छूकर रुक जातीं। यह उनके सोचने का स्वर था, ठीक वैसे जैसे उनके पालक-ऋषि का था।


इसमें एक विडम्बना थी। हेमलेखा हर एक से कहती थीं, “अपनी पकड़ छोड़ो।” पर उनकी अपनी एक पकड़ थी, यह माला, जिसे उन्होंने कभी उतारा नहीं था।


रात को सोते समय माला उनकी छाती पर रहती, और सुबह जब वो उठतीं, तो पहले उसे ही छूतीं। यह बात उन्होंने हेमचूड़ को कभी नहीं बताई।

पहली रात

विवाह की पहली रात।

हेमचूड़ अपने कक्ष में थे, और हेमलेखा सामने। दोनों कुछ देर चुप रहे, फिर हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, आप मुझ से क्या उम्मीद रखती हैं?”

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, मुझे आप से कोई बड़ी उम्मीद नहीं, बस एक छोटी बात। मैं आप से प्रश्न पूछूँगी, बहुत प्रश्न, और आप उन से चिढ़ें नहीं।”

हेमचूड़ बोले – “बस इतना?”

“बस इतना।”

“तो ठीक है।”


पहला प्रश्न

On the flower-strewn wedding-night bed in a moonlit chamber, Hemalekha gently raises a finger asking her first question while Hemachuda listens, an oil lamp glowing

रात के एक पहर बाद हेमलेखा ने कहा – “महाराज, आप किस लिए ख़ुश हैं?”

हेमचूड़ बोले – “आप के पास हूँ, और यह सब मेरे साथ है। राज्य, धन, सब।”

“पर क्या यह सब हमेशा रहेगा?”

हेमचूड़ रुके, फिर बोले – “नहीं।”

“तो जब यह सब नहीं रहेगा, तब क्या होगा?”

“पता नहीं।”

“तो आपकी ख़ुशी कितनी पक्की है?”

इस बार हेमचूड़ के पास कोई जवाब नहीं था।

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, यह प्रश्न रख लीजिए, अभी जवाब मत दीजिए।”


Hemachuda sits awake alone through the night on cushions, brow furrowed in thought, a single lamp burning, palace darkness and a moonlit window behind him

हेमचूड़ ने रात भर सोचा। मेरी ख़ुशी इन सब चीज़ों पर है, पर ये चीज़ें तो जाएँगी। तो क्या मेरी ख़ुशी भी जाएगी?


सुबह उन्होंने हेमलेखा से कहा – “हेमलेखा, आपका सवाल रात भर मेरे भीतर रहा।”

“क्या समझ आया?”

“कि मेरी ख़ुशी कमज़ोर है, क्योंकि वो बाहर की चीज़ों पर टिकी है, और बाहर की चीज़ें कभी नहीं रहतीं।”

हेमलेखा बोलीं – “तो?”

“तो मुझे एक ऐसी ख़ुशी ढूँढनी होगी जो बाहर पर न हो।”

“और वो कहाँ होगी?”

“पता नहीं।”

“फिर सोचिए।”


दूसरा प्रश्न

हेमचूड़ कई दिन सोचते रहे। एक रात उन्होंने हेमलेखा से कहा – “हेमलेखा, शायद वो ख़ुशी भीतर है।”

“भीतर कहाँ?”

“मेरे मन में।”

“मन भीतर है?”

“हाँ।”

“पर मन तो बदलता है, एक क्षण ख़ुश, एक क्षण दुखी। तो मन में जो ख़ुशी होगी, वो भी बदलेगी।”

हेमचूड़ रुके, फिर बोले – “तो…”

“महाराज, सोचिए। ख़ुशी का असली घर कहाँ है? वहाँ, जहाँ कुछ नहीं बदलता।”

“पर जहाँ कुछ नहीं बदलता, वहाँ क्या है?”

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, यह बहुत अच्छा प्रश्न है, और यह आपको ख़ुद ढूँढना होगा। मैं बस आप के साथ खड़ी हूँ।”


तीसरा प्रश्न

इसके बाद बहुत रातें बीतीं।

हेमलेखा हर रात एक नया प्रश्न पूछतीं, और हर प्रश्न हेमचूड़ को थोड़ी और गहराई में ले जाता।


एक रात हेमलेखा ने पूछा – “महाराज, आप कौन हैं?”

“मैं राजकुमार हेमचूड़।”

“यह तो नाम है। नाम के पीछे कौन है?”

“मैं हूँ।”

“यह ‘मैं’ क्या है?”

“देह।”

“देह आप हैं?”

Hemalekha and Hemachuda in close night dialogue, she pointing toward his own body as he touches his chest pondering 'am I this body?', lamplit intimate scene

हेमचूड़ ने एक पल सोचा, फिर बोले – “देह मेरा है।”

“मेरा? तो आप देह से अलग हैं?”

“शायद।”

“तो आप क्या हैं?”

“मन।”

“मन भी मेरा है। तो आप मन से भी अलग हैं?”

“पता नहीं।”

“सोचिए।”


चौथा

एक रात हेमलेखा ने पूछा – “महाराज, अगर आप ने पिछले दस मिनट याद नहीं किए होते, तो क्या आप वही हेमचूड़ होते?”

“हाँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि मेरा देह वही है।”

“पर देह तो बदलता है। आप के बचपन का देह आप अभी का देह नहीं है, फिर भी आप वही हेमचूड़ हैं?”

“हाँ।”

“तो आप वो हैं जो हर देह के पीछे है।”

“शायद।”

“और हर याद के पीछे।”

“हाँ।”

“और हर विचार के पीछे।”

“हाँ।”

“तो आप वो हैं जो बदलते नहीं।”

हेमचूड़ बोले – “मैं समझा।”

“पर अभी नहीं। आपने अभी सुना है। समझने में देर है।”


पाँचवाँ

एक रात हेमलेखा ने एक अलग प्रश्न पूछा – “महाराज, अगर आप जान लें कि आप वो हैं जो बदलते नहीं, तो आपकी ख़ुशी का क्या होगा?”

हेमचूड़ ने सोचकर कहा – “शायद वो भी नहीं बदलेगी।”

“और दुख?”

“वो भी?”

“हाँ। क्योंकि जो बदलता है, वो आप नहीं हैं। ख़ुशी और दुख, दोनों बदलते हैं, इसलिए दोनों आप नहीं हैं।”

हेमचूड़ बोले – “तो मैं इन दोनों से अलग हूँ।”

“हाँ।”

“और जो मैं हूँ, वो हमेशा वैसा ही रहता है?”

“हाँ।”

“फिर वो कैसे ख़ुश या दुखी होगा?”

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, बहुत अच्छा प्रश्न। उस जगह पर ख़ुशी और दुख नहीं हैं, बस होना है। और होना अपने आप में पूर्ण है।”


यह कहकर हेमलेखा एक पल को रुक गईं।


उन्होंने बिना देखे अपनी रुद्राक्ष की माला को छुआ और एक मनके पर रुकीं।


Hemalekha, mid-teaching, secretly fingers her hidden rudraksha mala beneath her silk dupatta, a flicker of inner doubt on her face, soft lamplight, quiet self-recognition

भीतर एक हलचल हुई। उन्होंने सोचा, “मैंने अभी कहा कि होना पूर्ण है। फिर मेरी यह माला क्यों? यह भी तो एक चिह्न है, मेरी पुरानी पहचान का, आश्रम का, पालक-ऋषि का।”


हेमलेखा ने हेमचूड़ को नहीं देखा। उनकी आँखें माला पर थीं, और मुँह बन्द।


पहली बार उन्हें लगा कि वो अपने पति को जो सिखा रही थीं, उसके एक स्तर पर वो ख़ुद अधूरी थीं।


हेमचूड़ ने इस पर ध्यान नहीं दिया, वो अपने प्रश्न में डूबे थे।


हेमलेखा ने हलके से अपना हाथ माला से हटाया, पर माला अब भी उनके गले में थी।


छठा प्रश्न

एक रात हेमलेखा ने पूछा – “महाराज, आपके भीतर अभी क्या चल रहा है?”


हेमचूड़ ने सोचकर कहा – “हेमलेखा, मेरे भीतर एक बेचैनी है। मैं रोज़ इन प्रश्नों के साथ बैठता हूँ, पर मुझे कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते।”

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, उत्तर तो कभी स्पष्ट नहीं होते।”

“फिर?”

“फिर बस प्रश्न के साथ रहना है। उत्तर अपने आप आते हैं, बिना पुकारे।”


सातवाँ

कुछ दिन बाद हेमलेखा ने पूछा – “महाराज, क्या आप ख़ुश हैं?”


हेमचूड़ ने सोचकर कहा – “मैं तब ख़ुश था। पर अब अजीब बात है, मैं बेचैन भी नहीं हूँ, और ख़ुश भी नहीं।”

“फिर क्या हैं?”

“बस हूँ।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, यही है।”

“क्या?”

“बस होना। यह सबसे बड़ी अवस्था है। ख़ुश होना भी एक स्थिति है, और दुखी होना भी। बस होना इन दोनों के पीछे है।”


आठवाँ

एक रात बाद हेमलेखा ने पूछा – “महाराज, आपका ‘बस होना’ किस से बना है?”


हेमचूड़ रुके, फिर बोले – “मतलब?”

“मतलब, आप कहते हैं, मैं बस हूँ। पर ‘बस हूँ’ भी एक अनुभव है। उस अनुभव का स्रोत क्या है?”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, मुझे नहीं पता।”

“फिर भीतर देखिए।”


हेमचूड़ ने आँखें बन्द कीं और अपने भीतर देखा।


Hemachuda in deep meditation under a great tree by a mountain stream, eyes closed, a luminous still awareness suggested behind his stilled form, jewels and a water pot set aside

बस होने की अनुभूति थी। पर उसके पीछे एक चेतना थी, जो बस होने को देख रही थी।


हेमचूड़ ने आँखें खोलकर कहा – “हेमलेखा, मेरे भीतर एक देखने वाला है। वो हर अनुभव को देख रहा है।”

“और वो कौन है?”


हेमचूड़ बोले – “वो मैं हूँ।”

“पक्का?”

“हाँ।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, यह बात आपने पकड़ी।”


नौवाँ

बहुत दिन बीते।


एक रात इस बार हेमचूड़ ने हेमलेखा से कहा – “हेमलेखा, मुझे एक प्रश्न है।”

“बोलिए।”

“आप ने यह सब कैसे जाना?”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, मैं अप्सरा की बेटी हूँ, पर मेरी माँ ने मुझे एक ऋषि के आश्रम में पाला, और वहाँ मुझे यह सब सिखाया गया।”

“पर आप मुझे यह बातें प्रश्न के द्वारा कह रही हैं। आप ने ऐसा क्यों चुना?”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, सीधी बात बहुत बार नहीं लगती।”

“क्यों?”

“क्योंकि सीधी बात सुनकर हम मानते नहीं। हम सोचते हैं, यह तो उसकी राय। पर प्रश्न के द्वारा हम ख़ुद उत्तर ढूँढते हैं, और तब उत्तर अपना लगता है।”

हेमचूड़ ने सिर हिलाया।


हेमलेखा ने आगे कहा – “और एक बात।”

“क्या?”

“मुझे यह कहना सीखना था। यह कि एक पत्नी अपने पति को प्रश्न पूछे, यह बहुत बार नहीं होता।”


हेमचूड़ ने पूछा – “हेमलेखा, अगर आप मेरे पुरुष होतीं, तो आप मुझे क्या प्रश्न पूछतीं?”

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, यह अच्छा प्रश्न है। पर एक पुरुष के पास वो धैर्य नहीं होता जो एक पत्नी के पास होता है। पुरुष कहते हैं, समझिए। पत्नी कहती है, ढूँढिए।”


दसवाँ

एक रात हेमलेखा ने पूछा – “महाराज, अगर मुझे कुछ हो जाए, तो आप क्या करेंगे?”


हेमचूड़ रुके, फिर बोले – “हेमलेखा, ऐसा क्यों पूछ रही हैं?”

“बस एक प्रश्न है।”


हेमचूड़ ने सोचकर कहा – “मैं दुखी होऊँगा।”

“और?”

“मैं आपको याद करूँगा।”

“और?”

“मेरा देह रोने के लिए काँपेगा।”

“और?”


हेमचूड़ कुछ देर चुप रहे।


फिर बोले – “और एक स्तर पर, मैं वहाँ रहूँगा जहाँ मैं हूँ।”

“मतलब?”

“मतलब, मेरे भीतर वो स्थिर सी चीज़ रहेगी। जो रोएगी नहीं, जो डरेगी नहीं, जो आप के साथ हमेशा रहेगी।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, अब आप तैयार हैं।”

“किस लिए?”

“मेरे जाने के लिए।”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, आप अभी नहीं जा रही हैं।”

“नहीं। पर एक दिन तो जाऊँगी। और तब, अगर मेरे लिए ज़रूरी हो, तो मुझे पता रहेगा कि आप तैयार हैं।”


हेमचूड़ ने हेमलेखा का हाथ अपने हाथ में लिया, और दोनों बहुत देर चुप रहे।


अनुभव

हेमचूड़ बहुत दिन तक सोचते रहे। एक रात उन्होंने आँखें बन्द कीं और ख़ुद से पूछा, मैं देह नहीं, मैं मन नहीं, तो मैं क्या हूँ?

उन्होंने अपने भीतर देखा। वहाँ एक स्थिर सी चीज़ थी, जो हर विचार से पहले थी, जो हर भाव से अलग थी, जो सब कुछ देख रही थी।


वही मैं हूँ।


हेमचूड़ ने आँख खोली। हेमलेखा पास बैठी थीं।

उन्होंने पूछा – “महाराज, क्या मिला?”

हेमचूड़ बोले – “वो जो हर चीज़ का साक्षी है, वो मैं हूँ।”

हेमलेखा बोलीं – “और अब आपकी ख़ुशी?”

“उस साक्षी की।”

“और वो हमेशा है?”

“हमेशा।”

“तो आपकी ख़ुशी?”

“हमेशा।”

हेमलेखा मुस्कुरा दीं।


माँ की बात

बहुत बरस बीते।

एक दिन, बहुत बरस के बाद, हेमलेखा की माँ आईं। वो अप्सरा थीं। उन्होंने हेमचूड़ और हेमलेखा को देखा।

हेमलेखा बोलीं – “माँ।”

माँ ने हेमचूड़ की ओर देखकर कहा – “दामाद।”

“माँ।”


माँ एक पल चुप रहीं, फिर बोलीं।

Hemalekha's radiant apsara mother, regal and celestial, sits speaking tenderly to bowed Hemachuda and Hemalekha in a palace pavilion, gardens and distant peaks behind

“बेटी, मैंने तुझे ऋषि के पास इसलिए छोड़ा था कि तू वो सीख सके जो स्वर्ग में नहीं मिलता। तू ने सीखा, और अब तू ने अपने पति को भी सिखाया। मुझे ख़ुशी है।”

हेमलेखा ने सिर झुकाया।

माँ ने पूछा – “बेटी, क्या तू मेरे साथ स्वर्ग चलेगी?”

हेमलेखा ने हेमचूड़ की ओर देखा।

हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, अगर आप चाहें, तो जाइए।”

हेमलेखा बोलीं – “नहीं, महाराज। मेरी जगह यहाँ है।”

माँ बोलीं – “बेटी, तू समझदार है। फिर भी, अगर तेरा मन कभी हो, तो आ जाना।”

हेमलेखा ने सिर हिलाया, और माँ चली गईं।


हेमचूड़ ने हेमलेखा का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा – “हेमलेखा, आप ने मुझे बहुत बड़ी भेंट दी।”

“नहीं, महाराज। मैंने कुछ नहीं दिया, मैंने बस प्रश्न पूछे। जवाब आप के थे।”

“पर प्रश्न आप के थे।”

“हाँ।”

“तो आप मेरी गुरु हैं।”

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, गुरु और शिष्य का खेल पुरानी बात है। हम दोनों एक हैं, और इसे अलग कर के देखना भी एक भ्रम है।”

हेमचूड़ ने सिर हिलाया।


राजा

बहुत बरस बीते। पिता मर गए, और हेमचूड़ राजा बने।

उन्होंने राज्य चलाया, पर अब उनके राज्य चलाने में एक अलग रंग था। कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई बड़ी इच्छा नहीं, बस एक स्थिर सी समझ।

हेमलेखा रानी बनीं, पर वो दरबार में बहुत कम आतीं। वो ज़्यादातर अपने कक्ष में रहतीं, पाठ करतीं, या बगीचे में रहतीं।


राज्य में लोगों ने धीरे-धीरे जाना कि हेमचूड़ एक अलग राजा हैं। वो किसी बात पर जल्दी क्रोधित नहीं होते, कोई बात बहुत जल्दी तय नहीं करते, बल्कि हर बात सुनते और फिर शान्ति से जवाब देते।

मन्त्रियों ने उन्हें कई बार चुनौती दी, पर हर बार हेमचूड़ ने उन्हें शान्ति से सम्हाला। वो हारते नहीं थे, पर जीतने की कोई बहुत बड़ी इच्छा भी नहीं रखते थे।


एक बार एक मन्त्री ने हेमलेखा से पूछा – “महारानी, महाराज अलग हैं। वो किसी बात पर बहुत बेचैन नहीं होते।”

हेमलेखा बोलीं – “मन्त्री, क्योंकि उन्हें पता है कि बेचैनी से कुछ नहीं बदलता। बेचैनी सिर्फ़ अपनी शान्ति को कम करती है।”

मन्त्री ने पूछा – “और अगर मैं भी ऐसा बनना चाहूँ?”

हेमलेखा बोलीं – “मन्त्री, तब आप प्रश्न पूछिए। अपने आप से। मुझ से नहीं, हेमचूड़ से नहीं, बस ख़ुद से, हर रोज़।”

“कौन से प्रश्न?”

“मैं कौन हूँ। मेरी ख़ुशी कहाँ है। मेरी पीड़ा क्या है। ये प्रश्न रखिए, उत्तर समय पर आएँगे।”

मन्त्री ने सिर झुकाया।


और प्रश्न

बहुत बरस बीते।


एक रात हेमचूड़ और हेमलेखा अपने पुराने कक्ष में बैठे थे।

बहुत बरस वो साथ रहे थे, और उनके बीच की चुप अब और बड़ी थी।


हेमलेखा ने एक साँस ली, फिर बोलीं – “महाराज, अभी भी एक प्रश्न है।”

“अब क्या?”

“महाराज, हमने इतने बरस यह यात्रा की। आपने पाया, और मैं तो जानती ही थी। अब क्या?”


हेमचूड़ ने सोचकर कहा – “हेमलेखा, अब हम जानते हैं। पर जानना भी एक अवस्था है। उससे बढ़कर एक अवस्था है, होना। अब हम होंगे।”

“होना मतलब?”

“मतलब, अब हम अपने ज्ञान को नहीं पकड़ेंगे। ज्ञान हो जाएगा, उसमें कोई गर्व नहीं, कोई पहचान नहीं, बस एक स्थिर सी चीज़।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, यह अच्छा कहा।”

“पर एक बात।”

“क्या?”

“अब हम क्या करेंगे?”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, यह आप का प्रश्न कभी नहीं था। पर अब आप पूछ रहे हैं, और यही बदलाव है।”

“बदलाव?”

“पहले आप प्रश्न पूछते थे, ज्ञान पाने के लिए। अब आप प्रश्न पूछ रहे हैं, ज्ञान को जीने के लिए। दोनों अलग हैं।”


हेमचूड़ ने पूछा – “और जवाब?”

हेमलेखा बोलीं – “जवाब है, राजकाज चलाइए। पर अब उसमें कोई अहम् नहीं, कोई जीतने की इच्छा नहीं, कोई हारने का डर नहीं। बस राजकाज, और प्रजा से प्यार, बिना भेद के, बिना बँधन के।”


बहुत बरस वो यह बात लागू करते रहे।


ग्यारहवाँ

बहुत बरस बाद, एक रात हेमलेखा ने कहा – “महाराज, मैंने आज एक बच्चे से एक प्रश्न सुना।”

“क्या?”

“उसने मुझ से पूछा, महारानी, क्या आप ख़ुश हैं?”


हेमचूड़ ने पूछा – “और आप ने क्या कहा?”

“मैंने कहा, बेटे, मैं ख़ुश से बड़ी कुछ हूँ।”

“बड़ी?”

“हाँ। ख़ुशी एक अवस्था है, और मैं उसके पीछे हूँ।”

“और बच्चा?”

“बच्चे ने फिर पूछा, उसके पीछे क्या है? मैंने कहा, यह तू अपने आप जानेगा, एक दिन।”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, आप अब बच्चों को भी सिखा रही हैं।”

“नहीं, महाराज। मैं सिखा नहीं रही, मैं उन्हें प्रश्न दे रही हूँ। वो अपने आप उत्तर ढूँढेंगे।”


बारहवाँ

बहुत बरस बीते।


एक दिन एक युवती हेमलेखा के पास आई। वो सुन्दर थी, पर उसकी आँखों में एक प्यास थी।


युवती बोली – “महारानी, मुझे एक बात पूछनी है। मैं अपने पति से प्रेम करती हूँ, पर वो मेरी बात नहीं सुनते। मैं उन्हें कैसे सिखाऊँ?”


हेमलेखा कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं।


“बहन, पहले एक बात समझो। तुम्हारा पति तुम्हारी बात इसलिए नहीं सुनता क्योंकि तुम पत्नी हो। यह बहुत पुरुषों का स्वभाव है। और दूसरी बात, तुम्हें उन्हें सिखाने की ज़रूरत नहीं, तुम्हें बस अपना रास्ता चलाना है।”


युवती चकित होकर बोली – “पर महारानी, क्या यह मेरी ज़िम्मेदारी नहीं?”

हेमलेखा बोलीं – “बहन, पति को सिखाना तुम्हारी ज़िम्मेदारी नहीं। तुम्हारा अपना ज्ञान, तुम्हारा अपना धर्म, तुम्हारा अपना सीखना, यही तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। पति को अगर सीखना है, तो वो तुम्हें देखकर, तुम्हारे स्वाभाविक होने से सीखेंगे। पर अगर तुम उन्हें ज़बरदस्ती सिखाने जाओगी, तो वो प्रतिरोध करेंगे।”


युवती बोली – “महारानी, यह बहुत कठिन है।”

हेमलेखा बोलीं – “हाँ, बहन, यह कठिन है, पर यह सच है। तुम अपने रास्ते चलो, प्रश्न पूछो अपने आप से, और जवाब ढूँढो अपने आप। एक दिन तुम्हारे पति देखेंगे कि तुम बदली हो, और तब शायद वो भी सीखना चाहेंगे।”


युवती बोली – “धन्यवाद, महारानी।” और वो चली गई।


हेमलेखा ने हेमचूड़ को देखकर पूछा – “महाराज, क्या मैंने सही कहा?”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, आप ने वही कहा जो मेरे पिता को मुझे बहुत बरस पहले कहना चाहिए था। आप ने अच्छा कहा।”


तेरहवाँ

हेमचूड़ अब बहुत बूढ़े हो रहे थे। उनका देह दुबला हो चला, उनके बाल सफ़ेद हुए, पर उनकी आँखें वैसी ही स्थिर रहीं।


एक रात उन्होंने हेमलेखा से कहा – “हेमलेखा, मैं एक काम करना चाहता हूँ। मैं अब राजकाज छोड़कर एक छोटी सी पाठशाला शुरू करना चाहता हूँ।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, अब?”

“हाँ, अब।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने सीखा है, अब मैं सिखाऊँ।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, बहुत अच्छा। पर क्या आप राजकाज छोड़ेंगे?”

“मेरा बेटा सम्हाल लेगा।”

“और हम?”

“हम दोनों पाठशाला चलाएँगे।”


हेमलेखा मुस्कुरा दीं।

पाठशाला

हेमचूड़ ने अपने बेटे को सिंहासन पर बिठाया। राज्य के बाहर एक छोटी सी जगह चुनी, एक बगीचे के पास, जहाँ एक छोटी नदी बहती थी, और वहाँ एक पाठशाला बनाई।


पाठशाला साधारण थी। एक छोटा कक्ष, मिट्टी की दीवारें, और साफ़ फ़र्श। हेमचूड़ ने अपने पुराने राजसी कपड़े छोड़ दिए और साधारण कपड़े पहन लिए।


लोग आने लगे, पहले कुछ, फिर ज़्यादा। युवक, प्रौढ़, बूढ़े, स्त्रियाँ, पुरुष, बच्चे, सब आए।


हेमचूड़ हर एक के साथ अलग तरीक़ा अपनाते, पर मूल बात एक ही थी, प्रश्न पूछना। जवाब देना नहीं, बस प्रश्न पूछना।


एक युवक आया और बोला – “महाराज, मुझे जीवन में क्या करना चाहिए?”


Elderly teacher Hemachuda in simple cloth at his humble thatched pathshala by a river, gently directing a seeking young man to look within, other students seated around

हेमचूड़ बोले – “बेटा, यह प्रश्न मुझ से नहीं, अपने आप से पूछ। बैठ, और ख़ुद से पूछ। उत्तर तेरे भीतर से आएगा।”

“पर महाराज, मेरे पास उत्तर नहीं।”

“तो प्रश्न के साथ रहो। एक दिन उत्तर आएगा।”


युवक चकित होकर बोला – “महाराज, कब तक?”

हेमचूड़ बोले – “बेटा, यह नहीं कह सकता। कभी जल्दी, कभी देर। पर आएगा।”


युवक वहीं बैठ गया।


बहुत दिन वो बैठा रहा। हेमचूड़ ने उसे कुछ नहीं सिखाया, बस उसके पास बैठते, साथ में चुप।


एक दिन युवक मुस्कुराया और बोला – “महाराज, मुझे मिला।”

“क्या?”

“मेरा उत्तर।”

“क्या है?”


युवक बोला – “महाराज, मैं नहीं बता सकता।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर मैं बताऊँगा, तो वो मेरा उत्तर रह जाएगा। पर अगर मैं उसे जीऊँ, तो वो मेरा जीवन बन जाएगा।”


हेमचूड़ बोले – “बेटा, तुम सीख गए।”


स्त्रियाँ

बहुत स्त्रियाँ भी आईं, और हेमलेखा उनके साथ बैठतीं।


एक दिन एक स्त्री आई, बहुत दुखी, और बोली – “महारानी, मेरा पति बहुत क्रोधी है, और मेरे साथ बुरा व्यवहार करता है।”


हेमलेखा बोलीं – “बहन, यह कठिन है।”

“क्या करूँ?”

“बहन, दो रास्ते हैं।”

“बोलिए।”


हेमलेखा बोलीं – “पहला रास्ता यह कि तुम उन्हें छोड़कर अपने माता-पिता के पास जा सकती हो। अगर माता-पिता तुम्हें सहारा दें, तो यह रास्ता ठीक है। और दूसरा रास्ता यह कि अगर तुम रुक सको, तो रुको। पर रुकने में तुम्हें अपने भीतर एक स्थिरता बनानी होगी, ऐसी कि उनका क्रोध तुम्हें न छुए। उनका बुरा व्यवहार तुम्हारे देह को छुए, पर तुम्हारी चेतना को नहीं।”


स्त्री बोली – “महारानी, दूसरा रास्ता बहुत कठिन है।”

“हाँ, बहुत।”

“और पहला?”

“पहला आसान है, पर सामाजिक रूप से कठिन।”


स्त्री ने सोचकर कहा – “महारानी, मैं सोचूँगी।”

“सोचो, बहन। फिर आना।”

स्त्री चली गई, और बहुत महीने बाद लौटी। इस बार उसके चेहरे पर एक अलग रंग था।


स्त्री बोली – “महारानी, मैंने रुकने का निर्णय किया।”

“और?”

“और मैंने अपने भीतर एक छोटी सी स्थिरता बनानी शुरू की। अभी पूरी तरह नहीं, पर शुरुआत है।”

“अच्छी बात है।”

“और एक बदलाव भी हुआ।”

“क्या?”


“मेरे पति का क्रोध थोड़ा कम हुआ है।”

“क्यों?”

“शायद क्योंकि मैं प्रतिक्रिया नहीं करती। पहले मैं रोती थी, चिल्लाती थी, और अब बस सुनती हूँ, फिर अपने काम में लग जाती हूँ।”


हेमलेखा बोलीं – “बहन, यह बहुत अच्छी बात है।”

“महारानी, धन्यवाद।”

“मेरा क्या? यह तुम्हारा अनुभव है।”


स्त्री ने सिर झुकाया और चली गई।


बच्चे

बहुत बच्चे भी आए, और हेमचूड़ और हेमलेखा बच्चों से अलग तरह से बात करते।

बच्चों के साथ वो खेलते भी।


एक दिन एक बच्चे ने हेमलेखा से पूछा – “माँ, क्या आप कभी रोती हैं?”


हेमलेखा बोलीं – “हाँ, बेटा।”

“क्यों?”

“क्योंकि कभी-कभी मेरे देह को रोना होता है। मैं भी मनुष्य हूँ।”

“पर आप तो रानी हैं।”

“रानी होने का यह मतलब नहीं कि कोई न रोए। रानी होना बस एक पहचान है।”


बच्चा बोला – “माँ, मेरी माँ भी कभी-कभी रोती है।”

“और तुम क्या करते हो?”

“मैं उन्हें गले लगाता हूँ।”


हेमलेखा बोलीं – “बेटा, यही सबसे अच्छी बात है।”


बच्चा हँसकर चला गया।


इसी तरह बहुत बरस बीते।


चौदहवाँ

बहुत बरस बाद हेमचूड़ और हेमलेखा एक रात अपनी पाठशाला में बैठे थे।


हेमलेखा ने हेमचूड़ से एक नया प्रश्न पूछा – “महाराज, क्या आप मरने से डरते हैं?”


हेमचूड़ ने सोचकर कहा – “हेमलेखा, मैं देह की मृत्यु से नहीं डरता। पर एक हलकी सी बात है।”

“क्या?”

“मैं अकेले मरने से डरता हूँ।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, हम साथ हैं।”

“पर एक दिन हम में से एक पहले जाएगा।”

“हाँ। और जो रहेगा, वो कुछ समय के लिए अकेला होगा।”

हेमचूड़ ने पूछा – “आप पहले जाएँगी या मैं?”

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, यह कौन जान सकता है?”


“पर अगर आप पहले गईं, तो?”

“तो आप अकेले होंगे।”

“और अगर मैं पहले गया?”

“तो मैं अकेली।”


हेमचूड़ कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “हेमलेखा, यह सोच कठिन है।”

“महाराज, यह सोच सब के लिए कठिन है।”


पन्द्रहवाँ

कुछ दिन बाद हेमचूड़ ने कहा – “हेमलेखा, मैंने एक बात सोची। मुझे मरने से डर नहीं है, मुझे आप के बिना जीने से डर है।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, यह स्वाभाविक है। पर एक बात।”

“क्या?”

“अगर आप मेरे बिना जीते हैं, तो आप मुझे अपने भीतर पाएँगे। मैं कहीं नहीं जाऊँगी।”


“पर देह नहीं होगा।”

“देह तो एक रूप है। मेरा असली रूप चेतना है, और चेतना हमेशा है।”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, यह बात आप ने बहुत बार कही।”

“हाँ।”

“पर मुझे अभी पूरी तरह नहीं बैठती।”

“महाराज, यह बैठने वाली बात नहीं, यह अनुभव से आती है।”


सोलहवाँ

एक रात हेमलेखा बीमार पड़ीं, बहुत बीमार। बुख़ार चढ़ा, और साँस लेने में कठिनाई होने लगी।


हेमचूड़ रात भर उनके पास रहे। राज-वैद्य आए और दवा दी।

पर बीमारी ठीक नहीं हुई।


तीन दिन बीते, और हेमलेखा कमज़ोर होती गईं।


चौथे दिन उन्होंने हेमचूड़ से कहा – “महाराज, मेरा समय आ रहा है।”


हेमचूड़ की आँखें भीगीं, पर आँसू नहीं गिरे। उन्होंने कहा – “हेमलेखा, मैंने हमारे बहुत बरस के साथ की प्रतीक्षा की।”

“महाराज, मैंने भी।”


दोनों कुछ देर चुप रहे।


फिर हेमलेखा ने पूछा – “महाराज, मुझे एक प्रश्न है। क्या आप अब मरने से डरते हैं?”

हेमचूड़ कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “हेमलेखा, अब नहीं।”

“क्यों नहीं?”

“क्योंकि आप ने मुझे सिखाया। मरना देह का है, और मैं देह नहीं।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, आप ने सीख लिया।”


फिर उन्होंने पूछा – “और एक और प्रश्न। आप के बिना जीने से?”


हेमचूड़ कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “हेमलेखा, इस से अभी भी थोड़ा डरता हूँ।”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, ठीक है, यह डर रहेगा। पर एक बात।”

“क्या?”

“मैं नहीं जा रही।”


हेमलेखा की आँखें बन्द हुईं।


पर एक पल बाद वो फिर खुलीं, और हेमलेखा बोलीं – “महाराज, मैं अभी नहीं जा रही।”

हेमचूड़ रुके, फिर बोले – “मतलब?”


हेमलेखा बोलीं – “मतलब, मेरी बीमारी ठीक हो रही है। मुझे लगा था मैं जा रही हूँ, पर अब लगता है, थोड़ा और।”


हेमचूड़ हलके से हँस दिए और बोले – “हेमलेखा, आप मुझे डराने में अच्छी हैं।”

हेमलेखा भी हँसीं।


हेमलेखा ठीक हुईं, और बहुत बरस और रहीं।


सत्रहवाँ

बहुत बरस बाद हेमचूड़ और हेमलेखा अपनी पाठशाला में थे।


एक दिन एक प्रौढ़ पुरुष आया। उसके चेहरे पर एक भारी सी छाया थी।


उसने कहा – “महाराज, मुझे एक बात पूछनी है। मैंने अपने पुत्र को खोया।”

हेमचूड़ ने पूछा – “कब?”

“कुछ महीने पहले।”

“कैसे?”

“बीमारी से।”


हेमचूड़ बोले – “भाई, मुझे क्षमा करना।”

“महाराज, मुझे एक बात समझ नहीं आती।”

“क्या?”


“महाराज, मेरा पुत्र क्यों गया?”

हेमचूड़ बोले – “भाई, इस प्रश्न का कोई सीधा जवाब नहीं।”

“मुझे जवाब चाहिए।”


हेमचूड़ ने हेमलेखा को देखा, और हेमलेखा आगे आईं।


हेमलेखा ने पूछा – “भाई, आप यह प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं?”


प्रौढ़ रुका, फिर बोला – “महारानी, क्या मतलब?”

“भाई, आप यह प्रश्न जवाब के लिए पूछ रहे हैं, या किसी और कारण के लिए?”


प्रौढ़ ने सोचकर कहा – “महारानी, मुझे नहीं पता।”

“भाई, सोचिए।”


प्रौढ़ बहुत देर चुप रहा, फिर उसकी रुलाई फूट पड़ी। वो बोला – “महारानी, मुझे यह प्रश्न इसलिए पूछना है क्योंकि मुझे लग रहा है यह मेरी ग़लती थी।”


हेमलेखा बोलीं – “भाई, अब हम बात कर सकते हैं।”

“महारानी?”

“भाई, आपका असली प्रश्न यह नहीं कि पुत्र क्यों गया। आपका असली प्रश्न यह है कि क्या आप ज़िम्मेदार हैं।”


प्रौढ़ बहुत देर रोया।


हेमलेखा ने उसे रोने दिया।


जब वो रुका, तब हेमलेखा ने पूछा – “भाई, आप ने अपने पुत्र के लिए क्या किया?”


प्रौढ़ ने बताया कि उसने बहुत किया। वैद्य बुलाए, दवा खरीदी, और रात भर पास बैठा रहा।


हेमलेखा बोलीं – “भाई, यह काफ़ी है।”

“महारानी?”

“आप ने अपना सब किया।”

“फिर भी?”

“फिर भी पुत्र गया, क्योंकि कुछ बातें हमारे हाथ में नहीं।”


प्रौढ़ ने पूछा – “महारानी, फिर मेरी ज़िम्मेदारी?”

हेमलेखा बोलीं – “भाई, आपकी ज़िम्मेदारी थी अपना सब करना, और आप ने किया। बाक़ी पुत्र की अपनी कथा थी, उसके देह की सीमा।”


प्रौढ़ बोला – “महारानी, यह बात बैठने में बहुत समय लगेगा।”

“हाँ, भाई।”

“पर मुझे अब हलका लग रहा है।”

“यह काफ़ी है।”


प्रौढ़ ने प्रणाम किया और चला गया।


हेमलेखा ने हेमचूड़ से पूछा – “महाराज, आप क्यों चुप रहे?”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, यह बात आप के लिए थी।”

“क्यों?”

“क्योंकि आप एक माँ हैं। बेटा खोने का दर्द आप समझ सकती हैं, मैं नहीं।”

हेमलेखा कुछ देर चुप रहीं।


फिर उन्होंने कहा – “महाराज, हमारा बच्चा, बहुत साल पहले।”


हेमचूड़ रुके, फिर धीरे से बोले – “हेमलेखा।”

“वो भी हमारे साथ नहीं रहा।”

“हाँ।”

“मैं उस दर्द को जानती हूँ।”


हेमचूड़ ने हेमलेखा का हाथ अपने हाथ में लिया, और बहुत देर तक थामे रहे।


अठारहवाँ

बहुत बरस बाद, हेमचूड़ अब बहुत बूढ़े हो चुके थे, और हेमलेखा भी।


एक रात उन्होंने एक-दूसरे से कहा।

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, अब समय आ गया।”

“हाँ।”


दोनों ने सिर हिलाए।


“साथ?”

“साथ।”


दोनों एक-दूसरे के पास बैठे, हाथ एक-दूसरे के हाथ में।


हेमलेखा ने एक आख़िरी प्रश्न पूछा – “महाराज, क्या आप अब डर नहीं रहे?”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, अब नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि आप मेरे साथ हैं, और मैं आप के साथ। दोनों एक साथ जा रहे हैं।”

“अगर एक पहले जाता?”

“तब डर होता। पर अब नहीं।”


दोनों ने आँखें बन्द कीं।


उन्नीसवाँ

बहुत बरस बीते।


राज्य में लोग बदले। पुरानी पीढ़ी जा रही थी, और नई आ रही थी। हेमचूड़ और हेमलेखा अब बहुत बूढ़े थे, पर उनकी पाठशाला अब भी चलती थी।


एक दिन एक छोटी बच्ची आई, जिसे कुछ पूछना था।


बच्ची बोली – “दादी, मुझे एक बात पूछनी है।”

“पूछो।”

“दादी, मेरी सहेली ने मुझे कहा कि मैं कमज़ोर हूँ। क्या मैं हूँ?”


हेमलेखा बोलीं – “बेटी, तू ख़ुद को कैसा देखती है?”

“मैं कमज़ोर नहीं।”

“तो?”

“तो मुझे क्यों लग रहा है कि मैं हूँ?”


हेमलेखा बोलीं – “बेटी, जब कोई हमें कुछ कहता है, तो वो हमारे भीतर एक छोटी सी हलचल बना देता है। वो हलचल हमें सोचने पर मजबूर करती है, कि मैं वैसा हूँ, या नहीं? पर असल बात यह है कि तू ख़ुद को कैसा देखती है, वही असली है।”


बच्ची बोली – “दादी, मैं ख़ुद को मज़बूत देखती हूँ।”

“तो तू है।”


बच्ची हँसी और बोली – “दादी, धन्यवाद।”

हेमलेखा बोलीं – “बेटी, और एक बात।”

“क्या?”

“अपनी सहेली को क्षमा कर देना। उसने यह बात शायद अपनी कमज़ोरी से कही।”


बच्ची ने पूछा – “दादी, यह कैसे?”

हेमलेखा बोलीं – “बेटी, जो लोग दूसरों को कमज़ोर कहते हैं, वो बहुत बार ख़ुद कमज़ोर होते हैं। पर वो अपनी कमज़ोरी देख नहीं पाते, इसलिए दूसरों में देखते हैं।”


बच्ची बोली – “दादी, मैं समझ रही हूँ।” और वो चली गई।


हेमचूड़ ने हेमलेखा से कहा – “हेमलेखा, आप अब बच्चों को भी सिखा रही हैं।”

“नहीं, महाराज। मैं उन्हें ख़ुद से सोचने का तरीक़ा दे रही हूँ।”


बीसवाँ

एक दिन एक युवक आया। उसके चेहरे पर बहुत प्यास थी।


युवक बोला – “महाराज, मैंने सुना है आप ने अपनी पत्नी से सीखा।”

“हाँ।”

“पर महाराज, यह सम्भव कैसे? पुरुष स्त्री से नहीं सीखते।”


हेमचूड़ बोले – “बेटा, यह वाक्य ही समस्या है। तू ने कहा, पुरुष स्त्री से नहीं सीखते, पर यह वाक्य एक मान्यता है। पुरुष स्त्री से सीख सकते हैं, बस अधिकतर नहीं सीखते। और क्यों नहीं सीखते? क्योंकि उन्हें यह मान्यता है कि वो नहीं सीख सकते। यही चक्र है।”


युवक ने पूछा – “महाराज, फिर मैं?”

हेमचूड़ बोले – “बेटा, अगर तू सीखना चाहे, तो सीख सकता है। पर पहले अपनी मान्यता तोड़।”


युवक रुका, फिर बोला – “महाराज, यह कठिन है।”

“हाँ।”

“महाराज, मैं कोशिश करूँगा।”


हेमचूड़ ने आगे कहा – “बेटा, और एक बात। अपनी स्त्री को सुनना नहीं, यह तो छोटी बात है। बड़ी बात यह है कि अपनी स्त्री में एक गुरु देख। वो शायद तेरे लिए कुछ ख़ास जानती है, बस तू ने अब तक उसे एक गुरु नहीं देखा।”


युवक बोला – “महाराज, मैं देखूँगा।” और वो चला गया।


हेमलेखा ने कहा – “महाराज, आप ने उसे एक बहुत बड़ी बात कही।”

हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, बस वही जो आप ने मुझे सिखाया।”


इक्कीसवाँ

एक रात हेमचूड़ और हेमलेखा अपने कक्ष में बैठे थे। बाहर एक हलकी हवा बह रही थी।


हेमलेखा कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं – “महाराज, मुझे एक बात कहनी है। मैंने आप को बहुत बरस तक सिखाया, पर अब मुझे लगता है कि मुझे ख़ुद सीखने वाला कुछ बाक़ी है।”


हेमचूड़ रुके, फिर बोले – “आप?”

“हाँ।”

“क्या?”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, मैंने आप को सिखाने में अपना सब लगाया, पर एक बात पर ध्यान नहीं दिया।”

“क्या?”

“अपने भीतर पर। अपनी पुरानी पीड़ाओं पर।”


हेमचूड़ ने पूछा – “हेमलेखा, कौन सी पीड़ाएँ?”

हेमलेखा बोलीं – “महाराज, मेरी माँ। उन्होंने मुझे एक ऋषि के पास छोड़ दिया था, जब मैं बहुत छोटी थी। मैंने यह बात अपने भीतर एक तरफ़ रख दी।”


हेमचूड़ ने हेमलेखा का हाथ अपने हाथ में लिया।

उन्होंने कहा – “हेमलेखा, यह बात आप ने पहले कभी नहीं बताई। क्यों?”


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, क्योंकि मैं आपको सिखा रही थी, और मैं अपनी कमज़ोरी नहीं दिखाना चाहती थी।”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, अब मैं सिखाऊँगा।”

“आप?”

“हाँ। आप ने मुझे जो सिखाया, वही मैं आप को सिखाऊँगा।”


हेमलेखा बोलीं – “बोलिए।”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, अपनी माँ की पीड़ा को देखिए। उसे रोकिए मत, बस देखिए।”

“देख रही हूँ।”


“उसके पीछे क्या है?”

हेमलेखा कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं – “महाराज, एक प्यास।”

“किस की?”

“माँ की।”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, और गहरा देखिए।”

हेमलेखा ने आँखें बन्द कीं और बहुत देर तक वैसे ही बैठी रहीं।


Aged Hemalekha opens tear-filled eyes after deep contemplation, having forgiven her mother, while elderly Hemachuda holds her hand by a stream, a lamp and ritual items nearby

जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो वो भीगी थीं। उन्होंने कहा – “महाराज, मैंने अपनी माँ को क्षमा कर दिया।”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, यह बहुत बड़ी बात है।”

“महाराज, और एक बात।”

“क्या?”


हेमलेखा बोलीं – “मैंने ख़ुद को भी क्षमा कर दिया।”

“ख़ुद को क्यों?”

“क्योंकि मैंने अपनी इस पीड़ा को बहुत बरस अपने भीतर रखा, बाहर नहीं लाया। वो भी एक ग़लती थी।”


हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, क्षमा बहुत बड़ी बात है।”

“हाँ।”


दोनों कुछ देर चुप रहे।


हेमलेखा बोलीं – “महाराज, धन्यवाद।”

हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, इस बार आप ने मुझ से सीखा।”

“हाँ।”


दोनों धीरे से मुस्कुराए।


जाना

बहुत बरस बीते, और हेमचूड़ और हेमलेखा बूढ़े हुए।

एक रात वो अपने उसी पुराने कक्ष में थे, जहाँ बहुत बरस पहले हेमलेखा ने पहला प्रश्न पूछा था।

हेमचूड़ बोले – “हेमलेखा, मेरा समय आ रहा है।”

हेमलेखा कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं – “मेरा भी।”


“साथ?”

“साथ।”


दोनों एक-दूसरे के पास बैठे, हाथ एक-दूसरे के हाथ में, और आँखें बन्द कीं।


At dawn a servant discovers aged Hemachuda and Hemalekha seated together, hands clasped, faces serene and at peace, breath gone, soft morning light filling their old chamber

सुबह सेवक ने उन्हें वैसे ही पाया। दोनों बैठे थे, हाथ एक-दूसरे के हाथ में, चेहरे शान्त, पर साँस नहीं थी।


जब लोगों ने यह सुना, तो किसी ने कहा, “यह कैसे हो सकता है?” पर पुराने मन्त्री, जो अब बहुत बूढ़े थे, बोले – “जब दो चेतनाएँ इतनी पास हो जाएँ कि एक हो जाएँ, तो उनका देह भी एक साथ छूट जाता है। यह सरल बात है।”

लोगों ने सिर हिलाया।


बहुत बरस बाद भी उनकी पाठशाला चलती रही। उनके शिष्य वहाँ बैठते, और उन शिष्यों के शिष्य भी।


हर पीढ़ी में वही प्रश्न पूछे जाते। “मैं कौन हूँ?” “मेरी ख़ुशी कहाँ?” “मेरी पीड़ा क्या?”


और हर पीढ़ी में कुछ लोगों को उत्तर मिलते, और बाक़ी इन प्रश्नों को आगे बढ़ाते।


एक पीढ़ी में एक स्त्री ने पाठशाला सम्हाली। वो हेमलेखा की वंश-परम्परा से नहीं थी, बस एक साधारण स्त्री जो वहाँ पढ़ने आई थी।


उस स्त्री ने नए शिष्यों को सिखाया, और उसने भी वही प्रश्न पूछे।

एक दिन एक युवक उसके पास आया और बोला – “महारानी।”

स्त्री हँसकर बोली – “बेटा, मैं रानी नहीं, साधारण स्त्री हूँ।”

“पर आप तो हेमलेखा की पाठशाला में हैं।”

“हाँ। पर हेमलेखा भी एक साधारण स्त्री थी। अप्सरा की बेटी भले रही हो, पर अप्सरा भी अन्ततः एक स्त्री है।”


युवक ने पूछा – “मुझे एक प्रश्न है। क्या एक स्त्री सच में पुरुष की गुरु हो सकती है?”


स्त्री बोली – “बेटा, यह प्रश्न सैकड़ों बरस पुराना है। हेमचूड़ ने भी पहले-पहले यही पूछा होगा। और हेमलेखा ने उन्हें जो जवाब दिया, वही मैं तुझे दूँगी।”

“क्या?”

“बेटा, गुरु-शिष्य कोई जाति नहीं, यह एक सम्बन्ध है। एक स्त्री किसी पुरुष की गुरु हो सकती है, अगर वो उससे सीखने को तैयार हो। और बहुत बार पुरुष तैयार नहीं होते, यही असली समस्या है।”


युवक बोला – “मैं तैयार हूँ।”

स्त्री बोली – “बेटा, तो शुरू करते हैं।”


बहुत बरस वो वहीं रहे। युवक ने सीखा, और बाद में वो भी एक पाठशाला चलाने लगा।


कथा यूँ ही चलती रही।


राम ने कहा – “गुरुदेव, हेमलेखा का तरीक़ा चूड़ाला से अलग था। वो अपने रूप में रहीं, कुम्भ नहीं बनीं, क्योंकि उनके पति ने उन्हें स्त्री के रूप में स्वीकार किया। तो कौन सी सीख मैं लूँ?”

वसिष्ठ बोले – “राम, दोनों सीख लो।”

“चूड़ाला से सीखो कि अगर पति न सुने, तो भी हार मत मानो, रूप बदलकर भी सिखाओ। और हेमचूड़ से सीखो कि अगर तुम पति हो, तो अपनी पत्नी की बात सुनो, उसे स्त्री होने के कारण मत रोको। दोनों कथाएँ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक स्त्री की ओर से, एक पुरुष की ओर से।”

राम ने सिर हिलाया।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा लघु योग वासिष्ठ पर आधारित है। हेमलेखा का अपने पति को प्रश्नों के द्वारा जागृत करना, यह स्त्री-गुरु की एक और सुन्दर कथा है। चूड़ाला की कथा से इसका बड़ा अन्तर यह है कि हेमलेखा को छिपकर सिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। यह कथा दिखाती है कि अगर पुरुष अपनी सीमा को थोड़ा खोले, तो स्त्री का ज्ञान सीधा उस तक पहुँच सकता है।

दर्शन-दृष्टि

हेमचूड़ राजकुमार हैं। उनकी पत्नी हेमलेखा, एक अप्सरा की बेटी, आश्रम में पली-बढ़ी। वो हर सुख-सामग्री पर एक प्रश्न रखती हैं, और हर बार पति को थोड़ा और भीतर खींचती हैं। उनके प्रश्नों से कोई थोपी हुई शिक्षा नहीं उतरती, बस एक रिक्ति खुलती है जिसमें हेमचूड़ अपने आप गिरते हैं। कथा यह कहती है कि असली गुरु उत्तर नहीं देता, ठीक प्रश्न को ठीक जगह पर रखता है, और साधक उस प्रश्न के साथ बैठते-बैठते अपने आप जागता है।

जिद्दू कृष्णमूर्ति (1895-1986) ने अपनी Freedom from the Known (1969) में बार-बार कहा कि हर तैयार उत्तर मन को बन्द कर देता है, और सच्चा अवलोकन तभी होता है जब हम किसी ज्ञात उत्तर से नहीं, खुले प्रश्न से शुरू करें। हेमलेखा का तरीक़ा बिल्कुल यही है। वो अपने पति को कोई वेदान्त नहीं पढ़ातीं, वो हर बार ऐसा प्रश्न रखती हैं जिसका पहले से कोई उत्तर उनके पास भी नहीं, और वो साथ बैठकर देखने को कहती हैं।