कथा · 24
दम, व्याल, कट: तीन भाई, तीन ग़लतियाँ
दानव-राजा शम्बर ने तीन दानव रचे, बिना किसी अहम् के, और इसी कारण वो बिना डर के, अजेय थे। फिर देवताओं ने उन्हें स्तुति से अहम् दिया, और तभी वो हारे। हज़ारों जन्मों के बाद, एक चिड़ी, एक मच्छर और एक तोते के रूप में, उन्होंने अपनी ही कथा सुनी।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, अहम् क्या है? यह अच्छा है या बुरा?”
वसिष्ठ बोले – “राम, अहम् न अच्छा है, न बुरा; यह बस एक रचना है। तीन दानवों की कथा सुनो। वो अहम् के बिना अजेय थे, फिर देवों ने उन्हें अहम् दिया, और तब वो हार गए। उसके बाद वो हज़ारों जन्म भटके, और अन्त में एक चिड़ी, मच्छर और तोते के रूप में अपनी ही कथा सुनकर मुक्त हुए।”
शम्बर
यह बहुत बरस पहले की बात है। एक दानव-राजा था, जिसका नाम शम्बर था।

शम्बर दानवों का एक प्रसिद्ध और बड़ा राजा था, जिसने अपने जीवन में कई युद्ध जीते थे। पर हाल ही में वो हार रहा था।
देव और दानव के बीच की यह लड़ाई कोई नई नहीं थी; बहुत बरस से चलती आ रही थी। पर इस बार देव बहुत प्रबल थे, क्योंकि उनके पास बेहतर हथियार, बेहतर सेना और बेहतर रणनीति थी। शम्बर हार रहा था।

एक रात शम्बर बहुत गुस्से में अपने कक्ष में बैठा सोच रहा था। मेरे सैनिक इसलिए हार रहे हैं क्योंकि उनके भीतर मरने का डर है, और यही डर उन्हें कमज़ोर करता है। अगर मैं ऐसे सैनिक बना सकूँ जिनमें डर न हो, तो वो कभी नहीं हारेंगे।
तीन
शम्बर के पास एक बहुत पुरानी विद्या थी, जो उसके पिता ने उसे सिखाई थी। उस विद्या से कोई भी अपनी माया से नए जीव रच सकता था।

पर इस विद्या में एक सीमा थी। जो जीव इस विद्या से रचे जाते, उनमें पिछले जन्म नहीं होते, उनके पास कोई स्मृति नहीं होती, कोई पुरानी कथा नहीं होती। इसका मतलब था कि उनके पास कोई अहम् नहीं होता, क्योंकि अहम् तो कथा से बनता है, पुरानी यादों से, पुराने अनुभवों से।
शम्बर ने सोचा कि मैं तीन ऐसे ही जीव बनाऊँगा।
उसने एक रात अपनी विद्या से तीन दानव रचे।

पहला था दम, जिसका नाम “नियन्त्रण” का अर्थ रखता था, और शम्बर ने उसे बहुत बल दिया। दूसरा था व्याल, जिसका नाम “साँप” का अर्थ रखता था, और शम्बर ने उसे बहुत तेज़ी दी। तीसरा था कट, जिसका नाम “चटाई” का अर्थ रखता था, और शम्बर ने उसे बहुत धैर्य दिया।
तीनों ज़मीन से उठकर शम्बर के सामने आ खड़े हुए।
ये तीनों ख़ास थे, क्योंकि ये किसी पिछले जन्म से नहीं आए थे, बिल्कुल नए थे। उनके भीतर कुछ नहीं था, न कोई याद, न कोई इच्छा, न कोई अहम्।
शम्बर ने उन्हें आदेश दिया – “देवों से लड़ो।” और तीनों लड़ने चल पड़े।
अजेय
देव हैरान रह गए।
इन तीनों को कोई हरा नहीं सकता था।

देवों ने उन पर तीर चलाए, पर तीर उन्हें कोई नुक़सान नहीं कर पाते थे। ऐसा इसलिए होता था क्योंकि उनके भीतर डर नहीं था, और जब डर नहीं था तो तीर का घाव भी नहीं होता था। तीर लगता ज़रूर, पर भीतर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती; तीनों में से कोई एक रुकता, तीर निकालता और फिर लड़ने लगता। देव चकित रह जाते।
देवों ने उन पर तलवारें चलाईं, पर तलवारें फिसल जातीं, क्योंकि उनके भीतर बचने की इच्छा ही नहीं थी, और इच्छा न होने से वो तलवार पर ध्यान ही नहीं देते थे। वार होता ज़रूर, पर तीनों में से कोई हटता नहीं; वार लगता, पर उनका देह ही उसे रोक देता, क्योंकि उनका देह डर से तना हुआ नहीं था। देव हतोत्साहित होने लगे।
देवों ने अपने सबसे बड़े अस्त्र भी चलाए। इन्द्र का वज्र, जो उसका सबसे बड़ा अस्त्र था, वो भी इन तीनों पर नहीं चला।
तीनों आगे बढ़ते रहे और हर युद्ध जीतते रहे।
देव मारे जाते, उनके स्थान खाली होते जाते, और देव-राज्य धीरे-धीरे कम होता गया।
ब्रह्मा
देव परेशान होकर ब्रह्मा के पास गए।

उन्होंने हाथ जोड़कर कहा – “भगवन्, तीन दानव हैं जो किसी से हार नहीं रहे। हम क्या करें?”
ब्रह्मा बोले – “देवों, यह बात समझो। ये दानव इसलिए अजेय हैं क्योंकि इनमें अहम् नहीं है, डर नहीं है, इच्छा नहीं है, बचने की कोई चाह नहीं है। अगर ये अहम् पा लें, तो ये भी सामान्य हो जाएँगे। इसलिए तुम्हें इन्हें अहम् देना होगा।”
देवों ने पूछा – “पर कैसे?”
ब्रह्मा बोले – “देवों, इन्हें प्रशंसा दो, इनकी जय-जयकार करो, इन्हें बताओ कि ये कितने ख़ास हैं। फिर देखो।”
देव चकित होकर बोले – “भगवन्, पर यह तो…”
ब्रह्मा बोले – “देवों, यही उपाय है। अहम् प्रशंसा से बनता है; बिना प्रशंसा के अहम् नहीं बनता। तुम जब किसी की प्रशंसा करते हो, तो वो ख़ुद को बड़ा समझने लगता है, और यही अहम् की शुरुआत है।”
देवों ने सिर झुकाकर ब्रह्मा को प्रणाम किया, और फिर लौट पड़े।
स्तुति

अगले दिन देवों ने स्तुति शुरू कर दी – “दम, व्याल, कट, तीनों अजेय। दम, व्याल, कट, तीनों महान। दम, व्याल, कट, तीनों के सामने कोई नहीं।”
स्तुति इतनी ज़ोर से हुई कि तीनों दानवों ने उसे सुन लिया। पहली बार उन्होंने अपना नाम बाहर से सुना।
तीनों रुक गए।
दम ने सोचा कि मेरा नाम दम है, मैं अजेय हूँ, मुझे लोग पहचानते हैं।
व्याल ने सोचा कि मेरा नाम व्याल है, मैं महान हूँ।
कट ने सोचा कि मेरा नाम कट है, मेरे सामने कोई नहीं।
यह बात उनके भीतर गहरे बैठ गई।
अहम् का स्वाद
तीनों के भीतर अहम् बढ़ता गया।

दम सबसे पहले बदला। पहले वो बिना सोचे लड़ता था, पर अब वो हर वार से पहले सोचता था कि यह वार सही है या नहीं, अगर वो रुक गया तो क्या होगा, और लोग क्या कहेंगे।
दम के ये सोचे-समझे वार धीमे होते गए, और इसी धीमेपन से वो ख़ुद को कमज़ोर बना रहा था।
व्याल ने अहम् को एक और रूप दिया; उसने अपनी प्रसिद्धि चाहने लगा – “मैं सबसे महान दानव हूँ, यह सबको पता होना चाहिए।” इसलिए व्याल अपने युद्धों के बाद बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कथाएँ सुनाने लगा।
बाद में कुछ युद्धों में व्याल मुसीबत में फँसा, पर वो हार मानने को तैयार नहीं था – “मैं हार नहीं सकता, लोग क्या कहेंगे?” और इसी ज़िद में व्याल ने अपनी सुरक्षा को नज़रअन्दाज़ कर दिया।
कट ने अहम् को सबसे सूक्ष्म रूप दिया; उसने एक नया विचार पकड़ लिया – “मैं सबसे ज़्यादा बहादुर हूँ, मुझे सबसे ख़तरनाक काम करने चाहिए।” इसलिए कट जान-बूझकर बिना सोचे ख़तरे चुनने लगा।
तीनों अब एक-दूसरे से भी अलग होने लगे।
पहले वो एक टीम की तरह थे और हर युद्ध साथ लड़ते थे, पर अब हर एक अपने रास्ते चलने लगा। दम कहता – “मैं अकेले जा सकता हूँ।” व्याल कहता – “मेरा युद्ध मेरा है।” और कट कहता – “मैं किसी की बात नहीं सुनूँगा।”
देवों ने यह सब देखा और आपस में कहा – “ब्रह्मा सही कहते थे; अहम् ने इन्हें छोटा कर दिया।”
हार
अब अगले युद्ध में दम सोच रहा था कि मुझे बचना है, मैं हार गया तो लोग मुझे क्या कहेंगे।
उसके भीतर डर आ गया।
व्याल भी सोच रहा था कि मुझे जीतना है, अगर मैं हार गया तो मेरी प्रतिष्ठा का क्या होगा, लोग मुझे महान नहीं कहेंगे। उसके भीतर इच्छा आ गई।
कट सोच रहा था कि मुझे सबसे बहादुर दिखना है, मेरे सामने कोई नहीं। उसके भीतर दिखावा आ गया।
अगले युद्ध में तीनों धीमे पड़ गए।
दम, जो पहले तेज़ी से आगे बढ़ता था, अब सोचता था कि आगे जाऊँ या रुकूँ, जाऊँ तो ख़तरा है, रुकूँ तो हार है। व्याल, जो पहले बिना सोचे वार करता था, अब सोचता था कि यह वार सफल होगा या नहीं, और अगर नहीं हुआ तो लोग क्या कहेंगे। कट, जो पहले धैर्य से लड़ता था, अब जल्दबाज़ी में लड़ता था, क्योंकि उसे दिखाना था कि वो सबसे बहादुर है।
और तीनों हार गए।
देवों ने उन्हें मार डाला।
जन्म-जन्म
तीनों मर तो गए, पर उनकी आत्मा कहीं नहीं गई।
क्योंकि अब उनके पास अहम् था, और अहम् वाली आत्मा बँध जाती है।

वो एक-एक देह में जन्म लेने लगे, और बहुत जन्म लिए।
कभी मनुष्य बने, कभी पशु, कभी पंछी; कभी राजा, कभी गुलाम; कभी पुरुष, कभी स्त्री।
हर जन्म में उनका नाम अलग होता, देह अलग होता, पर भीतर वही अहम् रहता जो उन्होंने अपने मूल अवतार में पाया था; वही डर, वही इच्छा, वही दिखावा।
दम कई बार राजा बने, और हर बार उन्हें अपने बचने की चिन्ता रहती, हर बार वो अपने सिंहासन को बचाने में लगे रहते। व्याल कई बार योद्धा बने, और हर बार उन्हें जीतने की इच्छा और प्रतिष्ठा की चाह घेरे रहती। कट कई बार ऋषि बने, और हर बार उन्हें सबसे बहादुर तपस्वी दिखना होता, हर बार वो दूसरे ऋषियों से प्रतियोगिता में उलझे रहते।
इस तरह बहुत हज़ार जन्म बीते और बहुत सी पीढ़ियाँ गुज़र गईं।
पर एक बात होती रही, कि हर जन्म में वो अहम् धीरे-धीरे थोड़ा कम होता गया।
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हर जन्म में पीड़ा होती थी, और पीड़ा अहम् को घिसती है। जब एक राजा का राज्य छिनता है, तब उसका अहम् घिसता है; जब एक योद्धा हारता है, तब उसका अहम् घिसता है; और जब एक ऋषि की तपस्या असफल होती है, तब उसका अहम् घिसता है।
इस तरह बहुत जन्म बीतते-बीतते, तीनों के अहम् बहुत हलके हो गए।
अन्तिम जन्म
एक जन्म में दम एक चिड़ी बना। वह बहुत साधारण चिड़ी थी, जो एक नगर में, एक मन्दिर के पास रहती थी।
एक जन्म में व्याल उसी नगर में एक मच्छर बना।
एक जन्म में कट उसी नगर में, एक पास के पेड़ पर एक तोता बना।
तीनों एक ही राज्य में थे, पर एक-दूसरे को बिना जाने।
एक शाम उस राज्य के राजा के मन्त्री ने एक कथा सुनाई।
मन्त्री का नाम वसुदत्त था और उनकी उम्र पैंसठ बरस की थी। वो बहुत पुराने मन्त्री थे, जो तीन राजाओं की सेवा कर चुके थे, और उनके माथे पर एक पुरानी चोट का निशान था।
राजकुमार पाँच बरस का था, उसका नाम धान्य था, और वो बहुत बातूनी था।

शाम का आख़िरी पहर था और मन्त्री और राजकुमार छज्जे पर बैठे थे। राजकुमार के सामने एक कटोरी रखी थी, जिसमें गरम दूध था और ऊपर मलाई जमी थी; मन्त्री के पास एक थाली थी, जिस पर कुछ मेवे रखे थे।
छज्जे के नीचे राज-उद्यान था, जिसमें एक तालाब था, और तालाब के पास एक पुराना नीम का पेड़ खड़ा था। उस पेड़ की एक डाली छज्जे की ओर झुकी हुई थी।
राजकुमार ने एक मेवा उठाते हुए कहा – “मामा, आज कोई नई कथा सुनाओ।”
मन्त्री बोले – “बेटा, आज एक पुरानी कथा सुनाता हूँ, पर तुमने यह नहीं सुनी होगी। तीन दानवों की कथा, जिनके नाम दम, व्याल और कट थे।”
राजकुमार के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। वो पैर मोड़कर बैठ गया, हाथ में दूध की कटोरी थामे हुए।
मन्त्री ने कथा के लिए सही शब्द ढूँढे और फिर कहना शुरू किया।
“बहुत बरस पहले तीन दानव थे, जिनके नाम दम, व्याल और कट थे। वो शम्बर राजा की माया से रचे गए थे, और उनके पास कोई पिछला जन्म नहीं था, इसलिए कोई अहम् नहीं था। बिना अहम् के उनमें न डर था, न बचने की इच्छा, न प्रशंसा की चाह, और इसीलिए वो अजेय थे।”
राजकुमार ने दूध पीते हुए पूछा – “मामा, अजेय? कोई उन्हें हरा नहीं सकता था?”
मन्त्री बोले – “नहीं, बेटा। देवों ने तीर चलाए, तलवारें चलाईं, वज्र भी चलाया, पर तीनों के भीतर बचने की इच्छा नहीं थी, इसलिए कोई वार उन्हें छू ही नहीं पाता था।”
छज्जे की चौड़ी मुँडेर पर एक साधारण भूरी चिड़ी बैठी थी, जो मन्दिर के पास से उड़कर आई थी, और उसकी आँखें मन्त्री की ओर टिकी थीं।
नीम की डाली पर एक हरा तोता बैठा था, जिसकी चोंच लाल थी, और वो भी मन्त्री की ओर देख रहा था।
हवा में, राजकुमार के सिर के पास, एक मच्छर भनभना रहा था, पर वो अपनी आदत के विपरीत रुका हुआ था।
मन्त्री ने आगे कहा – “फिर देव परेशान हुए और उन्होंने ब्रह्मा से पूछा। ब्रह्मा ने उन्हें एक उपाय बताया, कि इन्हें अहम् दो, क्योंकि बिना अहम् के ये अजेय हैं और अहम् के साथ ये सामान्य हो जाएँगे। देवों ने पूछा कि कैसे, तो ब्रह्मा ने कहा कि इनकी स्तुति करो, इनकी प्रशंसा करो, इन्हें बताओ कि ये कितने ख़ास हैं।”
राजकुमार ने हैरानी से पूछा – “मामा, स्तुति से अहम्?”
मन्त्री बोले – “हाँ, बेटा।”
चिड़ी अब और स्थिर हो गई और उसने अपने पंख तक नहीं हिलाए। तोते ने अपनी चोंच थोड़ी खोली, फिर बन्द कर ली। और मच्छर एक हलका-सा कम्पन रोक नहीं पाया।
मन्त्री ने आगे कहा – “देवों ने यही किया। उन्होंने तीनों दानवों की रोज़ स्तुति करनी शुरू कर दी – दम महान, व्याल महान, कट महान। पहले दिन तीनों दानवों ने यह सुना और कुछ नहीं हुआ; दूसरे दिन भी, तीसरे दिन भी कुछ नहीं हुआ। पर एक हफ़्ते बाद कुछ बदला। एक दिन दम ने सोचा – ‘लोग मुझे पहचानते हैं, मेरा नाम है।’ व्याल ने सोचा – ‘मैं महान हूँ।’ और कट ने सोचा – ‘मेरे सामने कोई नहीं।’ बस, यही अहम् की शुरुआत थी।”
चिड़ी ने एक पल को आँखें बन्द कर लीं। तोते ने नीम की डाली पर अपनी पकड़ कस ली। और मच्छर ने अपना कम्पन रोक लिया।
मन्त्री ने आगे कहा – “फिर तीनों धीरे-धीरे बदलने लगे। दम सोच-सोचकर लड़ने लगा, जबकि पहले वो बिना सोचे लड़ता था। व्याल अपनी प्रसिद्धि चाहने लगा, जबकि पहले उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी। कट जान-बूझकर ख़तरे चुनने लगा, जबकि पहले वो धैर्य से लड़ता था। और एक बात और हुई, कि तीनों एक-दूसरे से अलग होने लगे; पहले वो एक टीम थे, अब हर एक अपना अलग रास्ता चलने लगा।”
राजकुमार ने कहा – “मामा, यह सुनकर मुझे एक बात लगी।”
मन्त्री बोले – “क्या बेटा?”
राजकुमार बोला – “मैं भी कभी-कभी ऐसा महसूस करता हूँ। जब लोग मेरी प्रशंसा करते हैं तो मुझे अच्छा लगता है, पर अगली बार मैं कुछ ख़ास करने की कोशिश करता हूँ।”
मन्त्री बोले – “बेटा, यह बात तुझे समझ आ रही है?”
राजकुमार ने कहा – “हाँ।”
चिड़ी के भीतर एक हलचल हुई और उसने अपना सिर थोड़ा झुका लिया। तोते ने एक पंख हिलाया। और मच्छर ने अपनी जगह थोड़ी छोड़ दी।
मन्त्री ने आगे कहा – “फिर वो हार गए, बेटा। तीनों हार गए। पर मरने के बाद वो कहीं नहीं गए, क्योंकि अब उनके पास अहम् था, और अहम् वाली आत्मा कहीं नहीं जाती, वो फिर जन्म लेती है। तीनों ने हज़ारों जन्म लिए, कभी मनुष्य, कभी पशु, कभी पंछी बनकर। हर जन्म में देह अलग होता, पर भीतर वही अहम्, वही डर, वही इच्छा। हर जन्म में पीड़ा होती, और हर पीड़ा से अहम् थोड़ा घिसता। ऐसे बहुत हज़ार जन्म बीते।”
चिड़ी ने मुँडेर पर अपने पैर हिलाए। तोते की चोंच थोड़ी खुली। और मच्छर ने एक हलकी-सी आवाज़ की।
मन्त्री ने आगे कहा – “बेटा, अब आख़िरी बात। बहुत बाद, बहुत हज़ार जन्मों के बाद, तीनों एक नगर में आ पहुँचे। पर अब वो दानव नहीं थे, छोटे जीव थे। दम एक चिड़ी बना, व्याल एक मच्छर, और कट एक तोता। और तीनों उसी नगर में थे, एक-दूसरे को बिना जाने।”
छज्जे पर सब कुछ ठहर-सा गया।
मन्त्री ने आगे कहा – “और एक शाम, उस नगर के एक राज-प्रासाद के एक छज्जे पर, एक मन्त्री ने एक राजकुमार को यह कथा सुनाई। उस समय चिड़ी छज्जे पर बैठी थी, मच्छर हवा में था, और तोता पास के एक पेड़ की डाली पर बैठा था। तीनों ने यह कथा सुनी, और तीनों ने एक साथ पहचान लिया – मेरा नाम दम था, मेरा नाम व्याल था, मेरा नाम कट था।”
राजकुमार चुप रह गया।

मुँडेर पर चिड़ी के पंख थरथराए। नीम की डाली पर तोते ने अपना सिर तेज़ी से एक तरफ़ किया। और राजकुमार के पास का मच्छर ऐसे ठहर गया, मानो साँस रोक ली हो, अगर मच्छर साँस लेता तो।
राजकुमार ने मन्त्री को देखकर पूछा – “मामा, यह कथा क्या तब हो रही है?”
मन्त्री बोले – “बेटा, कथा हमेशा अभी हो रही होती है। हर कथा कथा सुनने वाले के समय में होती है। पर एक बात देख, बेटा। यहाँ, मुँडेर पर एक चिड़ी।”
राजकुमार ने देखकर कहा – “मामा, हाँ।”
मन्त्री बोले – “और वो नीम पर एक तोता।”
राजकुमार ने उधर देखकर कहा – “मामा, हाँ।”
मन्त्री बोले – “और तेरे सिर के पास एक मच्छर।”
राजकुमार ने हँसते हुए कहा – “मामा, हाँ। पर वो तो हमेशा रहता है।”
मन्त्री बोले – “बेटा, हमेशा नहीं। आज इसकी एक ख़ास बात है।”
राजकुमार ने मच्छर को देखा।
उसी क्षण तीनों जीवों ने अपने भीतर देखा।
और उन्हें सब कुछ याद आ गया।
हर देह, हर जन्म, हर डर, हर इच्छा, और इन सबके पीछे वो अहम् जो उन्हें मिला था।
मुक्ति
तीनों ने अपना अहम् देख लिया।
देखते ही वो छोटा हो गया।
देखते ही वो पारदर्शी हो गया।
और देखते ही वो ग़ायब हो गया।
क्योंकि अहम् वही है जो देखा न जाए; जब उसे देखा जाता है, तो वो रहता नहीं।
चिड़ी ने अपने पंख फैलाए, मच्छर रुक गया, और तोता हलकी-सी आवाज़ में बोला।
और तीनों मुक्त हो गए।
चिड़ी अब भी चिड़ी ही थी, पर भीतर कुछ हलका हो गया था। उसने पंख फैलाए, पर उड़ी नहीं, बस मुँडेर पर बैठी रही।
मच्छर हवा में रुक गया, उसके पंखों की भनभनाहट धीमी हुई और फिर बन्द हो गई। वह राजकुमार के पैर के पास ज़मीन पर उतर आया।
तोते की आवाज़ में एक बदलाव आ गया। पहले वो “राम राम” बोलता था, क्योंकि उसके पुराने मालिक ने यह सिखाया था; पर अब उसने एक अलग आवाज़ दी, बस “आह”, एक हलकी हाँफ।
राजकुमार ने तोते को देखकर कहा – “मामा, तोते ने आज नई आवाज़ दी।”
मन्त्री बोले – “बेटा, हाँ। यह तोता आज कुछ अलग है।”
राजकुमार ने मच्छर को देखा, जो उसके पैर के पास था, और पूछा – “मामा, मच्छर मर गया क्या?”
मन्त्री ने ध्यान से देखकर कहा – “नहीं बेटा, वो जीवित है। बस अब उड़ नहीं रहा।”
राजकुमार ने चिड़ी को देखकर कहा – “मामा, चिड़ी भी रुकी हुई है।”
मन्त्री ने सहमति में सिर हिलाया।
मन्त्री बोले – “बेटा, शायद इन तीनों को आज एक बात पता चली है।”
राजकुमार ने पूछा – “क्या?”
मन्त्री बोले – “बेटा, कि वो भी अपनी कथा का हिस्सा हैं।”
राजकुमार ने आँखें बड़ी करके पूछा – “मामा, क्या ये तीनों वही दानव हैं?”
मन्त्री बोले – “शायद, बेटा, शायद नहीं। पर एक बात तय है, कि हर एक के भीतर एक कथा होती है, और हर कथा सुनने वाली कोई न कोई चेतना होती है।”
राजकुमार ने सिर हिलाया, और बहुत देर तक चुप रहा।
फिर राजकुमार ने मुस्कुराकर कहा – “मामा, मैं भी अपनी कथा सुनूँगा कभी।”
मन्त्री ने सिर हिलाते हुए कहा – “शायद बेटा। शायद आज ही तूने सुन ली।”
राजकुमार फिर कुछ देर चुप रहा।
चिड़ी मुँडेर पर बैठी रही, मच्छर ज़मीन पर रहा, और तोते ने नीम पर अपनी जगह नहीं छोड़ी।
बहुत देर तक तीनों वहीं रहे।
फिर एक-एक करके, तीनों ने अपने देह से अपनी पकड़ छोड़ दी।
चिड़ी ने पंख फैलाए और एक हलकी-सी आवाज़ के साथ ऊपर उड़ गई। मच्छर ने अपने छोटे देह को छोड़ा और हवा में मिल गया। और तोते ने एक आख़िरी “आह” दी, फिर चुप हो गया।
राजकुमार ने मन्त्री को देखकर कहा – “मामा, मुझे लग रहा है, तीनों चले गए।”
मन्त्री ने सिर हिलाते हुए कहा – “बेटा, गए नहीं, मुक्त हुए।”
राजकुमार ने सिर हिलाया।
उसे कुछ समझ आया, कुछ नहीं भी आया, पर भीतर कुछ ठहर गया।
मन्त्री ने राजकुमार का हाथ पकड़ते हुए कहा – “चल बेटा, अब सोने का समय है।”
राजकुमार उठ खड़ा हुआ।
बाहर रात घनी हो चली थी।
आगे
इसके बहुत दिन बाद चिड़ी मरी, और उसकी आत्मा शान्ति से चली गई। मच्छर मरा, और उसकी आत्मा भी शान्ति से चली गई। तोता मरा, और उसकी आत्मा भी शान्ति से चली गई।
तीनों के अहम् अब नहीं थे, इसलिए वो कहीं नहीं बँधे।
बहुत बाद, ऋषियों ने यह कथा सुनी और मुस्कुराकर कहा – “तीन छोटे जीव अपनी कथा सुनकर मुक्त हुए। यह असली ज्ञान का स्वरूप है, कि आप अपनी ही कथा सुनते हैं और मुक्त हो जाते हैं। पर इसके लिए कथा सही ढंग से सुननी चाहिए, और बहुत बार सुननी चाहिए। तीनों दानवों ने अपनी कथा हज़ारों जन्मों तक अनजाने में सुनी थी, पर एक बार जब उन्होंने उसे जानकर सुना, तब वो मुक्त हुए।”
वसिष्ठ की एक बात
मैंने यह कथा बहुत बरस तक नहीं सुनाई। राम, यह कथा मुझे एक पुराने ऋषि ने बहुत बरस पहले सुनाई थी, और वो उसी मन्त्री के पोते थे जिसने यह कथा अपने राजकुमार को सुनाई थी। तब मैंने सोचा कि यह बहुत विचित्र कथा है। हम सब अपनी कथाएँ अपने भीतर रखते हैं, और अगर एक दिन कोई हमारी कथा हमें सुनाए, तो शायद हम भी मुक्त हो जाएँ।
पर एक बात है। हमें वो कथा सुनाने वाला कोई और होना चाहिए। हम अपनी ख़ुद की कथा अपने भीतर सुनते रहते हैं, पर वो सुनना अहम् से ही होता है, और वो हमें मुक्त नहीं करता। अगर बाहर से कोई हमारी कथा सुनाए, तो शायद बात बने।
राम, यह कथा मैं तुम्हें इसलिए सुना रहा हूँ, क्योंकि एक दिन तुम भी अपनी कथा सुनोगे; शायद कोई और सुनाए, शायद तुम ख़ुद। जब वो दिन आए, तब इन तीन दानवों को याद करना। उन्हें भी एक दिन सुनकर मुक्ति मिली थी, और तुम्हें भी मिल सकती है।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, तो अहम् ख़ुद ही बँधन है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, अहम् बँधन तब है जब आप उससे चिपकते हैं। जब आप उसे देखते हैं, तो वो छोटा हो जाता है। ये तीन दानव अपनी कथा सुनकर अपना अहम् देख पाए, और हम सब भी अपनी कथा को देखकर अपने अहम् को देख सकते हैं।”
राम ने पानी की ओर देखकर पूछा – “गुरुदेव, और मेरी कथा?”
वसिष्ठ बोले – “राम, तुम्हारी कथा बहुत लम्बी होगी, और वो कथा एक दिन कोई लिखेगा। उस कथा को बहुत लोग बहुत बरस तक पढ़ेंगे, और शायद कुछ लोग वो कथा पढ़कर मुक्त भी होंगे।”
राम ने पूछा – “कौन लिखेगा?”
वसिष्ठ बोले – “पता नहीं, कोई एक ऋषि। शायद उसका नाम वाल्मीकि होगा, शायद कोई और।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, दम-व्याल-कट की कथा ने मुझे बहुत सोचने पर मजबूर कर दिया।”
वसिष्ठ बोले – “क्यों?”
राम ने कहा – “मैंने सोचा था कि अहम् हम सबका होता है, पर इन तीनों के पास तो पहले अहम् था ही नहीं। तो क्या अहम् हम सबके लिए स्वाभाविक नहीं है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, अहम् कथा से बनता है, और जिनके पास कथा नहीं, उनके पास अहम् नहीं। हमारे पास कथा इसलिए है क्योंकि हम जन्म से बढ़े हैं, हमारे पास बहुत यादें और बहुत अनुभव हैं। पर इन तीनों दानवों का तो जन्म ही नहीं हुआ था; शम्बर ने इन्हें माया से रचा था, इसलिए इनके पास कोई कथा नहीं थी, और कथा नहीं थी तो अहम् भी नहीं था।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, यह बहुत गहरी बात है। और मेरा अहम्?”
वसिष्ठ बोले – “राम, तुम्हारा अहम् तुम्हारी कथा से बना है। राजकुमार होना, दशरथ का बेटा होना, एक बड़े वंश का होना, यह सब तुम्हारी कथा है, और इसी से तुम्हारा अहम् है।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मैं अपने अहम् को छोड़ सकता हूँ?”
वसिष्ठ बोले – “राम, छोड़ नहीं सकते, पर देख सकते हो।”
राम ने पूछा – “देखकर क्या होगा?”
वसिष्ठ बोले – “देखकर वो छोटा होगा।”
राम ने फिर पूछा – “और एक प्रश्न है, गुरुदेव। वो तीनों जब चिड़ी, मच्छर और तोता बने, तो अपनी कथा सुनकर मुक्त हुए। पर वो कथा उनके पास पहुँची कैसे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, यही असली रहस्य है। मन्त्री ने वो कथा अपने राजकुमार को संयोग से सुनाई थी, पर वो तीनों उसी नगर में, उसी समय मौजूद थे; चिड़ी छज्जे पर, मच्छर हवा में, और तोता पास के पेड़ पर। यह संयोग नहीं था, यह उनकी चेतना का रचा हुआ था।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, इसका क्या मतलब?”
वसिष्ठ बोले – “राम, जब चेतना मुक्ति की ओर तैयार होती है, तब वो ख़ुद वो परिस्थितियाँ रच लेती है जो उसे मुक्ति देंगी। वो तीनों मुक्ति के लिए तैयार थे, इसलिए उनकी चेतना ने उन्हें वहाँ बैठाया जहाँ वो अपनी कथा सुन सकें।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, यह बात मुझे बहुत बड़ी लगती है। क्या मेरी चेतना भी मेरे लिए परिस्थितियाँ रच रही है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हाँ। तुम मेरे पास क्यों आए? यह संयोग नहीं है, यह तुम्हारी चेतना ने ही रचा है।”
राम ने सिर हिलाया और बहुत देर तक चुप रहे।
फिर राम ने कहा – “गुरुदेव, दानवों की कथा में एक और बात है। शम्बर ने उन्हें रचा, फिर देवों ने उन्हें अहम् दिया; दोनों ने उनके साथ खेल खेला। पर वो तीनों कभी भी अपनी कथा के मालिक नहीं थे।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बहुत अच्छी बात तुमने कही। अधिकतर लोग अपनी कथा के मालिक नहीं होते। माता-पिता ने उन्हें रचा, समाज ने उन्हें ढाला, राज्य ने उन्हें मजबूर किया। वो अपनी कथा में बस पात्र होते हैं, मालिक नहीं।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, और मैं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, तुम भी अधिकतर समय ऐसे ही हो। पर तुम पूछ रहे हो, और प्रश्न पूछना ही मालिक बनने का पहला कदम है।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, मैं और प्रश्न पूछूँगा।”
वसिष्ठ बोले – “बहुत अच्छा।”
राम ने पानी की ओर देखकर पूछा – “गुरुदेव, दम, व्याल, कट; इन नामों का क्या मतलब है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, दम का मतलब नियन्त्रण, व्याल का मतलब साँप, और कट का मतलब चटाई।”
राम ने पूछा – “और इनके अर्थ?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर नाम के पीछे एक रूपक है। दम के नियन्त्रण से अर्थ है इच्छा का नियन्त्रण, व्याल के साँप से अर्थ है इच्छा की लम्बाई, और कट की चटाई से अर्थ है इच्छा का फैलना। तीनों मिलकर इच्छा के तीन रूप हैं।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, यह बात बहुत बड़ी है।”
वसिष्ठ बोले – “हाँ।”
राम कुछ देर चुप रहे। बाहर एक हलकी हवा बह रही थी।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, मेरे भीतर के दम, व्याल और कट; उन्हें मैं कैसे देखूँ?”

वसिष्ठ बोले – “राम, हर रात आँखें बन्द करके अपनी इच्छाओं को देखना। जो इच्छा तुम्हें नियन्त्रित करना चाहती है, वो दम है; जो इच्छा लम्बी है, बहुत बरस की, वो व्याल है; और जो इच्छा बहुत जगह फैली है, वो कट है। बस इन तीनों को देखो।”
राम ने कहा – “गुरुदेव, मैं करूँगा।”
वसिष्ठ बोले – “बहुत अच्छा।”
राम ने पानी की ओर देखा। बाहर रात घनी हो चली थी।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, मेरी सबसे बड़ी इच्छा क्या है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह तुम ख़ुद जानो।”
राम ने कहा – “मुझे पता नहीं।”
वसिष्ठ बोले – “तो रात को इस पर ध्यान देना।”
राम ने सिर हिलाया, और रात भर इस पर सोचते रहे।
सुबह वो जान गए कि उनकी सबसे बड़ी इच्छा सबको सुख देने की थी।
राम ने मुस्कुराकर कहा – “यह भी एक अहम् है।”
पर भीतर वो जानते थे कि यह अहम् भले ही हो, पर बुरा नहीं है; बस उसे देखते रहना है।
बहुत बरस तक राम ने यही काम किया। अपना राज्य चलाते समय भी वो बस अपनी इच्छाओं को देखते रहे।
और दम, व्याल, कट उनके भीतर अब छोटे होते गए, बहुत छोटे, पर पूरी तरह कभी नहीं गए।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 4.25-33 पर आधारित है। तीन अहम्-रहित दानवों की कथा, और उनका अहम् पाकर पराजित होना, यह अहंकार के सिद्धान्त की सबसे विडम्बनापूर्ण कथा है। अन्त में जब वो तीनों एक चिड़ी, मच्छर, और तोते के रूप में अपनी ही कथा सुनकर मुक्त होते हैं, यह शास्त्र की मेटा-कथात्मक चमक है। यह कथा कथा के स्वरूप पर भी एक टिप्पणी है। हम सब अपनी कथाएँ अपने भीतर रखते हैं, पर उन्हें बाहर से सुनने पर ही हम उन से मुक्त हो सकते हैं।
दर्शन-दृष्टि
शम्बर तीन दैत्य बनाता है, जिनके पास कोई पिछला जन्म नहीं, इसलिए कोई अहंकार नहीं। वो अजेय हैं। ब्रह्मा देवताओं को सलाह देते हैं, इनमें अहंकार पैदा कर दो। अहंकार आता है, और तीनों एक के बाद एक हार जाते हैं। फिर अनेक जन्मों के बाद, एक चिड़िया, एक मच्छर, और एक तोते के रूप में, वो एक मन्त्री के मुँह से अपनी ही कथा सुनते हैं, और मुक्त होते हैं। कथा यह कहती है कि अजेयता का स्रोत अहंकार का अभाव है, और मुक्ति का स्रोत अपनी कथा को बाहर से सुन पाना।
अमेरिकी दार्शनिक डेनियल डेनेट (Daniel Dennett, 1942-2024) ने अपनी Consciousness Explained (1991) में “narrative self” की व्याख्या की, कि मनुष्य का “मैं” वस्तुतः उसकी अपनी कहानी सुनाने का एक अनवरत अभ्यास है, और जब वो कहानी अपने को दूर से सुन सकता है, तो वो उसके बाहर भी निकल सकता है। दम, व्याल, और कट यही करते हैं। तीनों अपनी ही कथा को तीसरे व्यक्ति में सुनते हैं, और सुनते-सुनते उस “मैं” से ढीले पड़ जाते हैं जिसने उन्हें फँसा रखा था।