कथा · ०६
चूड़ाला: रानी जो गुरु बनी
पति को सीधे सिखा नहीं सकी, तो रानी ने एक नौजवान ब्राह्मण-बालक का रूप धरा। फिर वर्षों तक उसी रूप में पति को राह दिखाई। और बीच में एक बार उसे एक स्त्री के रूप में परीक्षा भी ली।
रानी चूड़ाला और राजा शिखिध्वज। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। राजा बहुत धार्मिक थे, साधना भी करते थे। मगर एक बात अलग थी – रानी जल्दी उतर गई।
चूड़ाला ने ध्यान शुरू किया। पहले तो साँस को साधा। फिर मन को। फिर बुद्धि को। हर रोज़, चार-छह घंटे। राजा को थोड़ी देर लगी पहचानने में कि रानी क्या कर रही है। फिर उन्होंने सोचा, “ठीक है। पत्नी है, उसे भी कुछ करने दो।”
कुछ ही वर्षों में चूड़ाला उस अवस्था में पहुँच गई जहाँ सब विचार थम जाते हैं। उसे आत्म-ज्ञान हो गया। उसके चेहरे पर एक चमक आ गई। आँखों में गहराई। और कुछ सूक्ष्म शक्तियाँ भी मिलीं – जैसे आकाश में उड़ना, छोटा-बड़ा हो जाना, अदृश्य होना।
पहली कोशिश
राजा ने एक दिन रानी से पूछा, “तुम बहुत बदल गई हो। क्या हुआ?”
रानी ने सोचा – यह सही समय है। बोली, “मैंने आत्मा को जान लिया है।”
राजा ने हँसा। ज़ोर से। “तुमने आत्मा को जान लिया? रानी, तुम पत्नी हो। तुम्हें घर देखना है। आत्मा-जैसी बातें ऋषि-मुनि करते हैं। पुरुष करते हैं। तुम भोजन बनाओ, बच्चों को संभालो। यह बातें तुम्हारे मतलब की नहीं।”
चूड़ाला कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “महाराज, ज़रा सुनिए। आत्मा की बात में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है। और मैं घर भी देखती हूँ, साधना भी करती हूँ।”
राजा ने सिर हिलाया। “ठीक है। तुम्हारा भ्रम है। मगर मेरा समय कीमती है।”
उठकर चले गए।
चूड़ाला अकेली रह गई। उसने देखा – राजा सीधे नहीं समझेंगे। अहंकार आड़े था। पुरुष होने का अहंकार। राजा होने का अहंकार। पति होने का अहंकार।
वन की ओर
कुछ साल और बीते। राजा की बेचैनी बढ़ती गई। उन्होंने भी ध्यान करने की कोशिश की, मगर मन रुकता नहीं। शास्त्र पढ़े, पर समझ नहीं आए। यज्ञ करवाए, पर शांति नहीं मिली।
एक दिन उन्होंने रानी से कहा, “मैं वन को जा रहा हूँ। राज्य तुम सँभालो। मुझे आत्म-ज्ञान चाहिए, और वो यहाँ नहीं मिलेगा।”
चूड़ाला ने रोका नहीं। बोली, “जाइए।”
राजा वन में चले गए। एकदम अकेले। थोड़ा सामान साथ लेकर। उन्होंने वर्षों तप किया। उपवास, मौन, आसन, जप – हर तरीक़ा। मगर हर बार थक जाते। हर बार लगता कुछ छूट रहा है।
उधर महल में चूड़ाला राज्य चलाती। मंत्रियों को निर्देश देती। न्याय करती। राज्य चला सकती थी क्योंकि उसके भीतर शांति थी।
मगर उसके भीतर पति की चिंता थी। उसने योग-दृष्टि से देखा – शिखिध्वज वन में थे, थक रहे थे। उम्र बढ़ रही थी। मगर उन्हें कुछ नहीं मिल रहा था।
कुम्भ का रूप
चूड़ाला ने तय किया – सीधे जाकर बात नहीं हो सकती। वो मुझे पत्नी मानेंगे, गुरु नहीं।
उसने अपनी सूक्ष्म-शक्ति का उपयोग किया। पहले अदृश्य हुई। फिर एक नौजवान ब्राह्मण-बालक का रूप धर लिया। साँवला, सुंदर, युवा। हाथ में एक डंडा, कमर में एक छोटा झोला। नाम रखा – कुम्भ।
कुम्भ बनकर वो वन में गई। राजा शिखिध्वज को ढूँढा। ढूँढने में दिन लगे। आख़िर एक नदी के पास उन्हें मिले।
राजा बहुत बूढ़े दिखते थे। बाल लंबे, सफ़ेद। आँखें थकी हुई। एक चटाई पर बैठे थे, मगर ध्यान नहीं लग रहा था।
कुम्भ ने राजा को प्रणाम किया।
“हे महाराज, मुझे लगता है आप कुछ ढूँढ रहे हैं।”
राजा ने सिर उठाया। एक नौजवान ब्राह्मण – साधारण कपड़ों में, मगर उनकी आँखों में एक चमक। राजा को कुछ पकड़ में नहीं आया, मगर वो प्रणाम करने लगे।
“बेटे, तुम कौन हो?”
“मैं एक यात्री हूँ। आत्म-ज्ञान का मार्ग जानता हूँ। माँ ने मुझे यहाँ भेजा।”
“माँ?”
“माँ सरस्वती।”
राजा का दिल भर आया। बोले, “मुझे सिखाओ। मैं वर्षों से ढूँढ रहा हूँ।”
शिक्षा
कुम्भ (यानी चूड़ाला) ने राजा को कई दिनों तक उपदेश दिया। पहले छोटी बातें – मन क्या है, इच्छा क्या है, अहंकार क्या है। फिर थोड़ी बड़ी – आत्मा, ब्रह्म, चेतना।
हर रात वो एक प्रश्न देते। राजा रात भर सोचते। सुबह जवाब देते। कुम्भ कभी ख़ुश होते, कभी और गहरा सोचने को कहते।
एक दिन कुम्भ ने पूछा, “महाराज, आप वन में क्यों आए?”
“शांति के लिए।”
“शांति यहाँ है?”
“नहीं। कहीं नहीं।”
“तो आप क्यों यहाँ हैं?”
“क्योंकि मैंने सोचा था यहाँ शांति होगी।”
“तो शांति आपके सोचने में थी, यहाँ नहीं?”
राजा रुक गए।
“फिर तो शांति मेरे साथ है। यहाँ नहीं, वहाँ भी नहीं।”
कुम्भ मुस्कुराए।
“महाराज, आगे बढ़ रहे हैं।”
दिन बीते। कुम्भ राजा को धीरे-धीरे ले जाते। एक दिन राजा को पहली बार ध्यान में शांति मिली। उन्होंने कुम्भ को बताया।
“बेटे, मन रुक गया था कुछ देर के लिए। कोई विचार नहीं था। मगर मैं था। यह क्या था?”
“वही जो आप ढूँढ रहे थे। मगर अभी और गहरा जाना है।”
मदनिका की परीक्षा
वर्षों बीते। राजा अब बहुत बदल चुके थे। मगर चूड़ाला को एक चीज़ देखनी थी – क्या उनका वैराग्य पक्का है? क्या वो स्त्री के सामने भी अडिग रह सकते हैं?
एक दिन कुम्भ ने कहा, “महाराज, मुझे एक छोटी सी बात समझानी है। मगर मैं इसे एक स्त्री के रूप में बेहतर बता सकूँगा।”
राजा हैरान। “क्या?”
“मेरी एक सूक्ष्म-शक्ति है। मैं स्त्री बन सकता हूँ कुछ देर के लिए। फिर वापस।”
राजा ने सोचा। फिर मान गए।
कुम्भ ने अपना रूप बदला। एक सुंदर युवती बन गए। नाम बताया – मदनिका। केश लंबे, चेहरा कोमल, आँखों में लहर।
राजा देखते रहे। कुछ देर तक उनकी पुरानी स्मृति जगी – रानी चूड़ाला की। मगर भीतर कोई आकर्षण नहीं उठा। वो अब उस जगह पहुँच चुके थे जहाँ रूप मायने नहीं रखते।
मदनिका ने बात की। एक प्रश्न पूछा – कोई दार्शनिक प्रश्न। राजा ने जवाब दिया। शांत आवाज़ में।
मदनिका मुस्कुराईं। बोलीं, “महाराज, आप पास हुए।”
“पास हुए?”
“हाँ। यह एक परीक्षा थी। आपने रूप के सामने दिल नहीं हिलाया। यह बड़ी बात है।”
राजा थोड़ा हैरान। “मगर तुम मुझे क्यों परख रही हो?”
मदनिका ने उत्तर नहीं दिया। बस मुस्कुराईं।
रहस्य खुलता है
कुछ दिन बाद मदनिका ने अपना रूप फिर बदला। पहले कुम्भ बनी। फिर कुम्भ धीरे-धीरे बदला। और अंत में – रानी चूड़ाला सामने थी।
राजा शिखिध्वज की आँखें भर आईं। बहुत देर तक कुछ न बोल पाए।
“रानी?” आख़िर कहा।
“हाँ।”
“कुम्भ तुम थी?”
“हाँ।”
“मदनिका भी?”
“हाँ।”
राजा बैठ गए। “तुमने यह सब मेरे लिए किया?”
चूड़ाला ने कहा, “तुमने ज़ोर से चाहा था। मैंने रास्ता बस दिखाया। तपस्या तुम्हारी थी। मगर मैं देख नहीं सकती थी कि तुम वर्षों यहाँ अकेले थक रहे हो। और मैं अपने रूप में आती तो तुम मुझे पत्नी समझते, गुरु नहीं।”
राजा रोए। फिर हँसे। फिर रोए।
“मेरी सबसे बड़ी ग़लती क्या थी, रानी?”
“तुम्हारा अहंकार। तुमने सोचा कि स्त्री गुरु नहीं हो सकती। उसी सोच ने तुम्हें वर्षों भटकाया।”
राजा ने सिर झुकाया।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। अब दोनों जागे हुए थे।
वापसी
वो वापस राज्य में आए। मंत्री हैरान – राजा बदल चुके थे। शांत, हलके, सहज। रानी भी बदली हुई थी, मगर रानी हमेशा से वैसी थी।
दोनों ने राज्य चलाया। मगर अब भीतर से दोनों मुक्त थे। फ़ैसले लिए, मगर बंधे नहीं। न्याय किया, मगर बोझ नहीं उठाया। एक दूसरे के साथ रहे, मगर पकड़े नहीं।
लोग कहते – “ये राजा-रानी कुछ और हो गए हैं।”
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, गुरु पुरुष नहीं होता, स्त्री नहीं होता। ज्ञान जिसके पास है, वो गुरु है। चूड़ाला अपने पति की गुरु थी, मगर पति को सिखाने के लिए उसे पुरुष का रूप धरना पड़ा। यह उसका त्याग था, और पति का अहंकार था।
“और घर में ही रहकर भी ज्ञान संभव है, वन की आवश्यकता नहीं। शिखिध्वज ने वर्षों वन में बिताए, मगर ज्ञान वहाँ नहीं मिला। ज्ञान तब मिला जब अहंकार गिरा। अहंकार महल में भी गिर सकता है।”
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