कथा · 28
मूर्ख हाथी: आज़ादी के बाद भी पिंजरा
हाथी अपनी पूरी ताक़त से गड्ढे से निकल आया। कुछ दिन बाद ख़ुद ही उसी गड्ढे में लौट गया। आदत बंधन से ज़्यादा गहरी थी।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या स्वतंत्रता एक बार पाकर खो भी सकती है?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हाथी की कथा सुनो।”
किसी जंगल में एक हाथी रहता था, बड़ा और मज़बूत, और उसकी सूँड बहुत लम्बी थी।
एक दिन शिकारियों ने उसे पकड़ लिया।

उन्होंने उसे एक मोटी रस्सी से एक मज़बूत खूँटे के साथ बाँध दिया।
हाथी ने पहले उस रस्सी को तोड़ने की कोशिश की, पर रस्सी नहीं टूटी। उसने बहुत बार ज़ोर लगाया, फिर भी वह नहीं टूटी।
बहुत दिन यों ही बीत गए, और हाथी ने एक बात सीख ली। जब रस्सी बाँधी जाती, तब वह रुक जाता; जब खुलती, तब आगे बढ़ता।
एक रात रस्सी ढीली हो गई और हाथी जाग पड़ा। उसने रस्सी पर हलका सा खींचा, और रस्सी खुल गई।
हाथी ने एक क़दम बढ़ाया, फिर रुक गया, क्योंकि उसे लगा कि वह तो अब भी बँधा हुआ है।

रस्सी अब ज़मीन पर पड़ी थी, पर हाथी के मन में वह रस्सी अब भी कसी हुई थी। इसलिए वह वहीं खड़ा रहा।
सुबह शिकारी आए और उन्होंने देखा कि रस्सी खुली पड़ी है, फिर भी हाथी वहीं खड़ा है।
उन्होंने रस्सी फिर से बाँध दी, और हाथी ने कुछ नहीं किया।
बहुत साल तक यही चलता रहा। हाथी जानता था कि रस्सी ढीली है, पर मन की रस्सी कड़ी बनी रही।
एक दिन एक ऋषि वहाँ से गुज़रे।
उन्होंने हाथी को देखा और पूछा – “हाथी, तुम बँधे क्यों हो?”
हाथी ने सूँड उठाकर रस्सी की ओर देखा।
ऋषि बोले – “हाथी, रस्सी को ध्यान से देखो।”
हाथी ने देखा कि रस्सी सचमुच ढीली पड़ी है।
ऋषि बोले – “अब तुम चलो।”
हाथी ने एक क़दम बढ़ाया, और रस्सी खुली रही। उसने दूसरा क़दम बढ़ाया, रस्सी तब भी खुली रही। फिर उसने तीसरा क़दम भी बढ़ा दिया।

हाथी ने सूँड हिलाई और जंगल की ओर चल पड़ा।
वह जंगल में चला गया।
ऋषि बोले – “बहुत बरस पुरानी रस्सी थी, पर वह रस्सी असली नहीं थी। वह तो केवल मन में थी।”
इतना कहकर ऋषि आगे चले गए।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मेरी भी ऐसी कई रस्सियाँ हैं?”
वसिष्ठ बोले – “हाँ राम, और हर पहचान एक ऐसी ही रस्सी है। राजकुमार होना, बेटा होना, भाई होना, ये सब रस्सियाँ हैं। ये असली नहीं हैं, फिर भी मन में बँधी रहती हैं।
“जब तुम भीतर अपनी असली पहचान को जान लोगे, तब ये रस्सियाँ अपने आप खुल जाएँगी। फिर बाहर से तुम इन्हीं रस्सियों में रहोगे, पर भीतर से पूरी तरह मुक्त।”
राम कुछ देर इस बात पर ठहरे रहे।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण, सर्ग 6अ.89 और 91 पर आधारित है। यह चूड़ाला की कथा के भीतर एक छोटा रूपक है। आदत का बँधन बन जाना, और मन का अपनी ही बनाई हुई रस्सी से बँधे रहना, एक सर्व-व्याप्त मानवीय अनुभव है।
दर्शन-दृष्टि
एक हाथी पकड़ा जाता है। वो छूट जाता है। फिर पकड़ा जाता है, और इस बार पहले से आसान। तीसरी बार उसे पकड़ने वाले को कुछ नहीं करना पड़ता, हाथी ख़ुद ही उसी रास्ते पर लौट आता है जहाँ बेड़ी इन्तज़ार कर रही है। पहली बेड़ी बाहर थी, तीसरी भीतर। कथा यह कहती है कि वासना और संस्कार बाहरी जाल नहीं, हमारी अपनी आदतें हैं, और एक बार जब ये गहराई पकड़ लेती हैं तो पकड़ने वाले को कुछ नहीं करना पड़ता।
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स (William James, 1842-1910) ने अपनी The Principles of Psychology (1890) में आदत पर एक पूरा अध्याय रखा, और लिखा कि मनुष्य अन्ततः अपनी आदतों का ही नाम है, और आदत एक बार पड़ जाने पर वो हमारी पसन्द के बाहर निकल जाती है, हम उसी रास्ते पर चलते हैं जिस पर हम पहले चले हैं। हाथी की दूसरी और तीसरी कैद इसी का चित्र है। पहली बार बाहरी जाल था, बाद की बार जाल जेम्स की भाषा वाला है, स्नायुओं में पड़ गया हुआ।