कथा · २९
मंकि का अवसाद: हार गया, इसलिए जीत गया
सब कुछ खो दिया। पत्नी ने भी छोड़ दिया। पैर चलने को नहीं थे। तब उसने एक वाक्य कहा, और उसी वाक्य ने सब बदल दिया।
मंकि एक छोटे से गाँव का ब्राह्मण था। ज़्यादा ज्ञान नहीं था। ज़्यादा धन नहीं था। बस दो बैल थे, एक खेत, और एक पत्नी।
उसने बहुत मेहनत की। दिन भर खेत जोतता। बैल थक जाते, मंकि भी थक जाता। फसल अच्छी होती थी।
एक साल बारिश नहीं हुई। फसल सूख गई। एक बैल पानी न मिलने से मर गया।
मंकि ने सब कुछ बेचकर दूसरा बैल खरीदा। उम्मीद थी कि अगले साल अच्छा होगा।
नया बैल भी मर गया। एक रात अचानक। पता नहीं क्यों।
मंकि ने अपनी पत्नी के गहने बेचे। तीसरा बैल खरीदा। वो भी कुछ महीनों में मर गया।
अब कुछ नहीं बचा। न खेत हल करने को, न खाने को।
पत्नी ने कहा, “मैं अपने पिता के यहाँ जा रही हूँ। तुमसे और रहा नहीं जाता।” चली गई।
मंकि अकेला बच गया। एक खाली घर। एक खाली पेट। एक खाली आँगन।
उसने पैर जुटाए। शहर की तरफ़ चला। कुछ काम मिल जाए शायद। मगर रास्ते में पैर थक गए। शरीर गिर गया।
एक पेड़ के नीचे लेटा। आसमान देखा।
उसने अपने आप से कहा – “मैंने सब किया। बैल खरीदे, मरे। फिर खरीदे, मरे। फिर खरीदे, मरे। पत्नी रखी, चली गई। मेहनत की, बेकार। उम्मीद की, टूटी।
“अब मेरे पास कुछ नहीं है। न पैसा। न रिश्ता। न उम्मीद। न योजना।
“मैं हार गया।
“और…”
उसने रुककर सोचा।
“…और मुझे कुछ नहीं चाहिए।
“मुझे कोई बैल नहीं चाहिए। कोई फसल नहीं चाहिए। पत्नी नहीं चाहिए। पैसा नहीं चाहिए। ज़िंदगी से अब कोई उम्मीद नहीं।”
उसने एक लंबी साँस ली।
उस पल कुछ अजीब हुआ।
उसके भीतर का सारा बोझ – उम्मीद का बोझ, चाह का बोझ, इंतज़ार का बोझ – सब उतर गया।
क्यों? क्योंकि सबको चाहना ही बोझ था। न चाहना – हलकापन।
मंकि वहीं लेटा रहा। मगर अब उसके चेहरे पर कुछ था। एक हलकी सी मुस्कान।
उसने भीतर देखा। पाया – जो “मैं हार गया” कह रहा है, वो हारा नहीं है। हारा तो वो है जिसकी उम्मीद थी। उम्मीद ख़त्म, हारने वाला भी ख़त्म।
“मैं अभी भी यहाँ हूँ। बिना उम्मीद, बिना चाह, बिना भविष्य। मगर हूँ। यह ‘होना’ किसी से नहीं माँगा। यह बस है।”
मंकि उठा। शहर नहीं गया। वहीं उस पेड़ के नीचे रुक गया।
दिन बीते। एक दूसरे ब्राह्मण ने उसे देखा। उसके चेहरे पर शांति थी। पूछा, “तुम कौन हो?”
“मैं मंकि हूँ। मैंने सब कुछ खोया, इसलिए मुक्त हूँ।”
“कैसे?”
“जब तक उम्मीद थी, बंधन था। उम्मीद गई, बंधन गया।”
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, अंतिम हार कभी-कभी पहली जीत होती है। मंकि उम्मीद ख़त्म होने पर रोया नहीं। उसने बस स्वीकार किया। और स्वीकार में मुक्ति है। चाह में बंधन है।”
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