कथा · 29
मंकि का अवसाद: हार गया, इसलिए जीत गया
ऋषि मंकि बहुत बरस उस अँधेरे में बैठे रहे, और हर बार उससे लड़ने की कोशिश ने उसे और घना कर दिया। फिर एक दिन उन्होंने लड़ना ही छोड़ दिया और बस उसके साथ बैठ गए, और वही अँधेरा अपने आप एक दरवाज़ा बन गया।
राम ने पूछा – “गुरुदेव, अगर एक ऋषि भी उदास हो जाए, तो वो क्या करे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, मंकि नाम के एक ऋषि हुए, जिन्होंने एक बार बहुत लम्बी उदासी जानी। उनकी कथा बड़ी अजीब है, क्योंकि उनका रास्ता उदासी से बाहर निकलने का नहीं था, बल्कि उसके भीतर इतने गहरे उतर जाने का था कि वो ख़ुद ही टूट जाए। सुनो।”
ऋषि
मंकि एक ऋषि थे, और उनकी कुटिया एक नदी के किनारे थी। नदी छोटी थी, पर पूरे साल बहती रहती थी।
वो बहुत बरस से तप कर रहे थे, बहुत मन्त्र पढ़ चुके थे और बहुत किताबें पढ़ी थीं। उन्होंने यज्ञ भी किए और ध्यान भी।

उनकी कुटिया के बाहर एक बगीचा था, जिसमें वो हलदी और अदरक उगाते थे। एक गाय थी, जो अब बहुत बूढ़ी हो चली थी, और एक कुत्ता था, जिसे उन्होंने सालों पहले एक टोकरी से निकाला था।
वो अपने आप में सन्तुष्ट थे, और यह जीवन उन्हें ठीक लगता था।
पर एक दिन बिना किसी कारण के कुछ बदल गया।
आना
उस सुबह वो उठे, जैसे रोज़ उठते थे, पर इस बार उठने में कुछ अजीब था, एक भारीपन। उनका देह सोने को तैयार था, पर उठने को नहीं।
उन्होंने सोचा कि यह आज भर की बात है, रात ठीक से सोया नहीं होऊँगा।
वो नदी पर गए, स्नान किया और मन्त्र पढ़े, पर मन्त्र में वो रस नहीं था जो हमेशा होता था।
वो लौटे, भोजन तैयार किया और खाया, पर भोजन में कोई स्वाद नहीं था।
दिन भर वो अपनी कुटिया में बैठे रहे। बीच-बीच में उन्होंने पुस्तक खोली, पर शब्द उन्हें छू नहीं रहे थे। बीच-बीच में ध्यान करने की कोशिश की, पर मन भागता रहा। बीच-बीच में बगीचे में काम करना चाहा, पर हाथ ही नहीं उठा।
शाम तक उन्हें लगा कि यह कुछ अलग है, यह केवल थकान नहीं है।
अगले दिन भी ऐसा ही रहा, और तीसरे दिन भी।
अँधेरा
तब मंकि ने ध्यान दिया।

उनके भीतर एक अँधेरा उतर रहा था, बिना किसी कारण के।
यह अँधेरा देह का नहीं था, क्योंकि उनका देह स्वस्थ था। यह अँधेरा मन का भी नहीं था, क्योंकि उनके पास कोई बड़ी समस्या नहीं थी। पर अँधेरा था।
सुबह वो उठते, और उठते ही सबसे पहली चीज़ जो उन्हें मिलती, वो यही अँधेरा होता, जैसे रात भर वो उनके देह में सोया रहा हो और जागते ही सक्रिय हो जाता हो।
भोजन में कोई स्वाद नहीं, मन्त्र में कोई रस नहीं, पुस्तक में कोई ज्ञान नहीं, बगीचे में कोई काम नहीं, और ध्यान में कोई शान्ति नहीं।
मंकि सोचते रहे कि मेरे साथ आख़िर हो क्या रहा है।
कोशिश
उन्होंने पहले तो इसे हटाने की कोशिश की।

उन्होंने अपना तप बढ़ाया। अब वो सुबह जल्दी उठते और कई घंटे मन्त्र पढ़ते, यज्ञ में और लकड़ी डालते। पर अँधेरा और बढ़ गया।
उन्होंने पुस्तकें बदलीं, पुरानी रखीं और नई पढ़ीं। पर अँधेरा और बढ़ गया।
उन्होंने नदी के किनारे एक लम्बी यात्रा की, बहुत दूर तक, पर लौटते समय अँधेरा वहीं था, उनके साथ-साथ चलता हुआ।
तब मंकि ने सोचा कि शायद यह उन्हीं की ग़लती है, कि उनकी तपस्या अधूरी है, कि वो इसके योग्य ही नहीं।
यह सोच कैसे आई, उन्हें ख़ुद पता नहीं चला, पर एक बार आ गई तो भीतर ही बस गई – मेरी ग़लती, मैं किसी काम का नहीं, मैं असफल हूँ।
यह सोच अँधेरे को और घना कर देती, और जितना वो ख़ुद को कोसते, उतना ही अँधेरा भारी होता जाता।
भीतर का चित्र
मंकि के भीतर हर रोज़ एक बहुत सूक्ष्म चित्र बनता था।
सुबह वो उठते, बाहर एक साधारण दिन होता, पर भीतर एक ऐसा अहसास होता, जैसे कोई बहुत भारी बादल उनकी छाती पर रखा हो। बादल अदृश्य था, पर उसका वज़न पूरा था।
पहले उन्होंने सोचा कि यह बादल किसी बीमारी से है, पर बीमारी नहीं थी। फिर सोचा कि भूख से है, पर भूख नहीं थी। फिर सोचा कि किसी कमी से है, पर कुछ कम नहीं था।
बादल बिना किसी कारण के था।
मंकि को यही बात बहुत खटकती थी – “बादल को कारण चाहिए, पर मेरे बादल का कोई कारण ही नहीं।” और यह सोच बादल को और बढ़ा देती।
एक रात मंकि ने कुछ ख़ास देखा।
वो लेटे थे, सोने की कोशिश में, और उनकी छाती में बादल भारी था। तभी उन्हें लगा कि बादल उनके भीतर नहीं है, बादल वो ख़ुद ही हैं।
यह विचार विचित्र था, पर इसमें एक राहत भी थी। मतलब यह कि बादल कोई बाहरी चीज़ नहीं जो उन पर आ बैठी हो, बादल उनकी अपनी ही अवस्था है।
मंकि ने मन में कहा – “शायद मुझे इससे लड़ना नहीं चाहिए।” पर इसके बावजूद वो बहुत बरस तक लड़ते रहे।
तह
बहुत दिन बीत गए, शायद महीने भी, क्योंकि मंकि ने गिनना ही छोड़ दिया था।
वो बस अपने झोपड़े में बैठे रहते, न बाहर जाते, न किसी से बात करते। उनकी दाढ़ी बढ़ गई, बाल उलझ गए और आँखें भीतर धँस गईं।
उनकी गाय भी कमज़ोर होती जा रही थी, क्योंकि वो उसे चारा देना भूल जाते थे, और कुत्ता भी पतला पड़ गया था।

एक दिन कुत्ता उनके पास आया और उनकी गोद में सिर रख दिया। मंकि ने उसकी ओर देखा और हाथ बढ़ाया, उसके सिर पर, पर हाथ बीच में ही रुक गया। उन्होंने सोचा कि मैंने इसे भी छोड़ दिया है, यह मेरे पास है, पर मैं इसके पास नहीं हूँ।
कुत्ता वैसे ही बैठा रहा। मंकि के भीतर एक हलचल हुई, पर वह हलचल भी अँधेरे की ही थी – मैं इस कुत्ते से प्यार करता था, पर अब नहीं कर पाता, यह भी मेरी ही असफलता है।
एक रात मंकि ने सोचा कि मैं मर ही जाऊँ।
पर यह सोच भी ज़ोर से नहीं आई, बस धीमे से आई। और तब उन्होंने सोचा कि मैं मर भी जाऊँगा, तो क्या? जो अँधेरा है, वो तो रहेगा, मेरे साथ ही; मेरी मृत्यु से अँधेरा थोड़े ही मरेगा।
यह बात उन्हें चकित कर गई, कि मेरा अँधेरा मेरे देह से बड़ा है, मेरा अँधेरा मेरी कथा से भी बड़ा है।
और मंकि बहुत देर तक यूँ ही बैठे रहे, बिना कुछ किए।
ठहराव
तब एक अजीब बात होती गई। जब उन्होंने कोशिश करना छोड़ा, जब उन्होंने ख़ुद को कोसना छोड़ा, जब उन्होंने कुछ करना ही नहीं चाहा, तब अँधेरा कम होने लगा।
मंकि ने इस पर ध्यान दिया – जब मैं अँधेरे से लड़ता हूँ, अँधेरा बढ़ता है; और जब मैं अँधेरे के साथ बैठता हूँ, अँधेरा कम होता है।

अब उन्होंने अँधेरे को देखा, बिना भागे, बिना लड़े, बिना ख़ुद को कोसे। और अँधेरा बस था।
उन्होंने उससे एक प्रश्न पूछा – “अँधेरे, तू क्या है?” अँधेरा चुप रहा। “तू कहाँ से आया?” अँधेरा चुप रहा। “तू मेरे साथ क्यों है?” अँधेरा फिर भी चुप ही रहा।
पर एक बात मंकि ने ज़रूर ध्यान से देखी।
जब वो अँधेरे से बात करते, तब अँधेरा थोड़ा हलका हो जाता। मतलब, अँधेरे को बात पसन्द थी; उसे बस पहचान चाहिए थी।
तब मंकि ने सोचा कि शायद अँधेरा वही है जिस पर ध्यान न दिया गया हो, शायद अँधेरा वही है जिसे हम भगाते रहते हैं। और जब हम अँधेरे को देखते हैं, उसे स्वीकार करते हैं, उसके साथ बैठते हैं, तब वो अपना भार तो रखे रहता है, पर हमें खाता नहीं।
दिन
बहुत दिन बीत गए, और मंकि अँधेरे के साथ बैठे रहे।

फिर एक दिन उस अँधेरे के भीतर एक प्रकाश दिखा, बहुत छोटा सा, पर था ज़रूर।
उस प्रकाश की कोई ख़ास जगह नहीं थी, न उनकी छाती में, न सिर में, न पेट में। वह बस एक समझ थी – यह समझ कि अँधेरा भी अपने आप में एक रास्ता है। जो उससे लड़ता है, उसे वो ख़त्म कर देता है; और जो उसके साथ बैठता है, उसे वो पार लगा देता है।
तब मंकि ने एक निर्णय किया कि अब मैं अँधेरे को न डराऊँगा, न उससे भागूँगा। मैं हर रोज़ उसके साथ रहूँगा, जब तक वो ख़ुद नहीं चला जाता।
उठना
अगले दिन उन्होंने वही सबसे पहला काम किया।
वो उठे, कुत्ते को नहलाया, उसे खाना दिया और गाय को चारा दिया। यह सब करते समय भीतर अँधेरा तो था, पर अब उन्होंने उससे लड़ना छोड़ दिया था।
वो नदी पर गए और स्नान किया, पर मन्त्र नहीं पढ़े, क्योंकि अभी मन्त्र में रस नहीं था। फिर लौटे, भोजन तैयार किया और खाया; स्वाद नहीं था, फिर भी खाया।
दिन भर वो वैसे ही रहे जैसे पहले रहते थे, पर एक अन्तर था – अब अँधेरा उनके साथ था, उनके ख़िलाफ़ नहीं।
इसी तरह बहुत दिन, बहुत हफ़्ते, बहुत महीने बीतते गए।
मंकि ने अपनी जीवन-दिनचर्या फिर से शुरू की, पूरी तरह नहीं, पर थोड़ी-थोड़ी करके।
एक दिन उन्हें मन्त्र में हलका सा रस मिला, एक दिन भोजन में हलका सा स्वाद आया, और एक दिन उन्होंने कुत्ते के सिर पर हाथ रखा तो उन्हें उससे प्यार महसूस हुआ।
ये बदलाव बहुत धीमे थे, पर थे ज़रूर।
ज्ञान
बहुत बरस बाद मंकि एक बहुत अलग ऋषि बन चुके थे। उनकी कुटिया तो वैसी ही थी, पर उनकी गाय बूढ़ी होकर मर चुकी थी और एक नई गाय आ गई थी। उनका कुत्ता भी मर चुका था, पर मरने से पहले उसने कई पिल्ले दिए थे, और उन्हीं में से एक अब उनके पास था।
मंकि ने पुस्तकें फिर से पढ़नी शुरू कीं, पर अब उनके पढ़ने का तरीक़ा पहले जैसा नहीं रहा था। पहले वो पुस्तक से ज्ञान चाहते थे, और अब वो पुस्तक के साथ बैठते थे।

धीरे-धीरे लोग उनके पास आने लगे, पहले कुछ ही, फिर ज़्यादा, और फिर तो बहुत लोग।
जो लोग आते, उनमें से बहुतों के पास भी अपना-अपना अँधेरा था। वो मंकि के पास इसलिए आते थे, क्योंकि वो जानते थे कि मंकि उन्हें समझेंगे।
एक स्त्री आई, जिसके पति मर चुके थे। उसने कहा – “ऋषि, मैं रोज़ रोती हूँ, पर मेरा रोना ख़त्म ही नहीं होता।”
मंकि बोले – “बहन, रोइए, पर एक बात याद रखिए। अपने रोने से लड़िए मत, उसके साथ बैठिए, उसे पहचानिए, उससे बात कीजिए।”
स्त्री ने पूछा – “उससे बात कैसे?”
मंकि बोले – “उससे पूछिए कि तू कौन है, तू कहाँ से आता है, तू मुझ से क्या चाहता है। ये प्रश्न पूछिए। उत्तर शायद न आएँ, पर रोना धीरे-धीरे शान्त हो जाएगा।”
एक आदमी आया, जिसके पास सब कुछ था, पर उसके भीतर एक भारीपन था। उसने कहा – “ऋषि, मेरे पास सब है, फिर भी मैं ख़ुश नहीं हूँ।”
मंकि बोले – “भाई, यह तुम्हारी ग़लती नहीं है।”
आदमी ने पूछा – “क्यों नहीं?”
मंकि बोले – “क्योंकि बाहर के ‘सब’ से भीतर का खालीपन नहीं भरता, यही नियम है। तुम्हें भीतर से कुछ करना होगा। पहले अपने भारीपन को स्वीकार करो, उसे हटाने की कोशिश मत करो, उसके साथ बैठो, फिर देखो कि वो क्या कहता है।”
ऐसे ही और भी लोग आते रहे, और मंकि ने हर एक से वही बात कही, थोड़ी-थोड़ी अलग, पर मूल बात एक – अपने अँधेरे से लड़ो मत, उसके साथ बैठो, वो ख़ुद ही रास्ता बनेगा।
बहुत बरस तक वो यह तप करते रहे।
उनके पास जो लोग आते, उनके भीतर भी अँधेरा होता, और मंकि हर एक से यही कहते – “मित्र, अँधेरे से डरो मत, उसके साथ बैठो, वो ख़ुद ही रास्ता बनेगा।”
एक दिन उनके पास एक छोटा बच्चा आया और रोते हुए बोला – “ऋषि, मेरी माँ बहुत उदास रहती है।”
मंकि बोले – “बेटा, अपनी माँ से कहना कि उदासी एक मित्र है, उसके साथ बैठने से वो ख़ुद ही चली जाती है।”
बच्चे ने पूछा – “मित्र?”
मंकि बोले – “हाँ। हर भारी भाव एक मित्र है, पर हम उसे शत्रु समझ बैठते हैं, और यही हमारी ग़लती है।” इतना सुनकर बच्चा लौट गया।
फिर बहुत बरस बीत गए। मंकि बूढ़े हुए, और एक दिन शान्ति से चल बसे। लोगों ने उनकी कुटिया सम्हाली, उनकी पुस्तकें सहेजीं और उनकी एक छोटी सी मूर्ति बनाई।
और कई पीढ़ियों तक, जब भी किसी के भीतर अँधेरा उतरता, तो लोग यही कहते – “मंकि की तरह करो। अँधेरे से लड़ो मत, उसके साथ बैठो, वो ख़ुद ही रास्ता बनेगा।”
राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मेरे भीतर भी कभी अँधेरा आएगा?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हर एक के भीतर अँधेरा आता है। बस जब आए, तो उससे लड़ना मत, उसके साथ बैठना, वो ख़ुद ही रास्ता बनेगा।”
राम कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, मुझे लग रहा है कि मैं एक दिन यह बात बहुत बड़ी समझूँगा।”
वसिष्ठ बोले – “राम, उस दिन इस कथा को याद करना, मंकि की कथा को।” राम ने सिर हिलाया।
फिर राम बोले – “गुरुदेव, मंकि की कथा में एक विशेष बात है।”
वसिष्ठ ने पूछा – “क्या?”
राम बोले – “उन्होंने अपने अँधेरे से बात की, उससे पूछा कि तू कौन है, तू कहाँ से आया।”
वसिष्ठ ने कहा – “हाँ।”
राम बोले – “यह मुझे विचित्र लगा, क्योंकि हम तो अपने भावों से बात ही नहीं करते।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यही तो असली सबक है। हम अपने भावों से लड़ते हैं या उन्हें अनदेखा कर देते हैं, पर उनसे बात नहीं करते। और अगर हम उनसे बात करें, तो वो शान्त हो जाते हैं, क्योंकि हर भाव एक छोटे बच्चे जैसा है, और जब बच्चे को पहचान मिलती है, तभी वो शान्त होता है।”
राम बोले – “गुरुदेव, मेरे भी कुछ पुराने भाव हैं, एक डर, बहुत बरस पुराना।”
वसिष्ठ ने पूछा – “किस का डर?”
राम कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “पता नहीं। पर कहीं भीतर एक डर सा है, कि मैं काफ़ी नहीं हूँ।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह डर बहुत राजकुमारों में होता है।”
राम ने पूछा – “क्यों?”
वसिष्ठ बोले – “क्योंकि पिता बहुत बड़ा होता है, और पुत्र को लगता है कि मैं भला उतना बड़ा कैसे बनूँगा।”
राम बोले – “गुरुदेव, यह बात मुझे भी लगती है।”
वसिष्ठ बोले – “राम, इस डर से बात करो।”
राम ने पूछा – “कैसे?”
वसिष्ठ बोले – “राम, आज रात अकेले बैठना, आँखें बन्द करना और अपने डर को बुलाना। फिर पूछना – डर, तू कौन है? पूछना – डर, तू कहाँ से आया? पूछना – डर, तू मुझ से क्या चाहता है?”
राम ने पूछा – “और क्या जवाब मिलेगा?”
वसिष्ठ बोले – “शायद मिले, शायद न मिले, पर तुम्हारा डर ज़रूर छोटा हो जाएगा।”
राम बोले – “गुरुदेव, मैं आज रात यही करूँगा।”
वसिष्ठ बोले – “बहुत अच्छा।”
राम कुछ देर पानी की ओर देखते रहे, फिर बोले – “गुरुदेव, मंकि की कथा तो हर एक के लिए है। बहुत लोगों के भीतर मंकि का अँधेरा होगा।”
वसिष्ठ ने कहा – “हाँ।”
राम ने पूछा – “और मैं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, तुम्हें भी कभी आएगा। जब आए, तब मंकि को याद करना।” राम ने सिर हिलाया।
फिर राम ने पूछा – “गुरुदेव, मंकि के बारे में लोगों ने क्या कहा?”
वसिष्ठ बोले – “राम, लोगों ने पहले उन्हें कमज़ोर कहा।”
राम ने पूछा – “क्यों?”
वसिष्ठ बोले – “क्योंकि वो बहुत बरस तक उदास रहे।”
राम ने पूछा – “फिर?”
वसिष्ठ बोले – “फिर वो बदल गए, तो लोगों ने उन्हें ऋषि कहा।”
राम ने पूछा – “और मंकि ने क्या कहा?”
वसिष्ठ बोले – “मंकि बोले कि मैं तो वही था, बस लोगों की पहचान बदल गई।”
राम बोले – “गुरुदेव, यह बहुत सच है। लोग पहले एक तरह से देखते हैं, फिर दूसरी तरह से।”
वसिष्ठ ने कहा – “बिल्कुल।”
फिर राम ने पूछा – “गुरुदेव, मुझे एक प्रश्न है। क्या मेरे जीवन में भी ऐसा होगा, कि लोग पहले मुझे एक तरह से देखेंगे, फिर दूसरी तरह से?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हाँ, बहुत बार। पहले तुम्हें एक राजकुमार के रूप में देखेंगे, फिर एक राजा के रूप में, फिर शायद कुछ और; पर तुम भीतर से वही रहोगे।” राम ने सिर हिलाया।
फिर राम कुछ देर चुप रहे।
बाहर रात उतर आई थी, और राम ने एक हलकी जम्हाई ली।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण के बिखरे संदर्भों पर आधारित है। मंकि की उदासी और उसका रास्ता बनना, यह आधुनिक मनोविज्ञान का बहुत पुराना संस्करण है। अवसाद को विरोध से नहीं, स्वीकृति से पार करने का सिद्धान्त, शास्त्र की एक गहरी सीख है। यह कथा किसी भी आधुनिक मनश्चिकित्सक को परिचित लगेगी।
दर्शन-दृष्टि
मंकि ऋषि हैं। बहुत बरस का तप, बहुत मन्त्र, बहुत समाधि। और एक दिन बिना किसी कारण के एक अँधेरा उतरता है। न देह का रोग है, न मन की समस्या, बस एक भारीपन। वो उससे लड़ते नहीं, उससे भागते नहीं। उसके भीतर बैठते हैं, उसे देखते हैं, और देखते-देखते वो अपनी जगह से उठ जाता है। कथा यह कहती है कि कुछ अवस्थाएँ इलाज नहीं माँगती, उन्हें माँगती है धैर्य से देखी जाने वाली दृष्टि, और तभी वो अपनी ही गति से खुलती हैं।
स्पेनिश रहस्यवादी सन्त जुआन डे ला क्रूज़ (Saint John of the Cross, 1542-1591) ने अपनी Dark Night of the Soul (Noche oscura del alma, सोलहवीं सदी का अन्त) में लिखा कि साधक के मार्ग में एक अँधेरा आता है जो उसके अपने तप या दोष से नहीं, उसकी आत्मा के अगले चरण से आता है, और उसका इलाज प्रतिरोध नहीं, आत्मसमर्पण है। मंकि की चुप्पी इसी प्रकार है। उन्होंने अपने अवसाद को बीमारी नहीं माना, उसे एक मार्ग का अँधेरा हिस्सा माना, और उसी से वो पार लगे।