कथा · 07
कौआ भुशुण्ड: युगों का साक्षी
मेरु पर्वत के एक वृक्ष पर एक कौआ रहता है, जो कई कल्पों (1 कल्प = 4.32 billion years = 432 करोड़ साल) से जी रहा है। एक बार वसिष्ठ जी ख़ुद उससे मिलने गए। दोनों की कई बातें हुईं, वसिष्ठ जी ने बहुत कुछ पूछा। कौए से जो जवाब मिले, वो असाधारण थे।

“राम, यह प्रश्न मैं ने भी एक बार पूछा था। बहुत बरस पहले, जब मैं युवा था। मुझे कौतूहल था कि सबसे पुराना जीव कौन है? उसी कौतूहल से एक यात्रा शुरू हुई। और उस यात्रा में मुझे एक कौआ मिला जिसका नाम भुशुण्ड था। वो हज़ारों सृष्टियाँ देख चुका है। मैं ख़ुद उससे मिल आया था। आज तुम्हें वो कथा सुनाऊँगा।”
कौतूहल
बहुत बरस पहले, जब मैं युवा था, मेरे भीतर एक प्रश्न उठा था।
यह प्रश्न साधारण नहीं था। यह उस तरह का प्रश्न था जो मन अपने आप बार-बार पूछता रहता है, जब तक उसका उत्तर न मिले।

मैंने सोचा – हर जीव की एक उम्र है। आम के पेड़ की दो सौ बरस। मनुष्य की सौ। कौवे की पन्द्रह-बीस। हाथी की सत्तर-अस्सी। तो सबसे लम्बी उम्र किसकी?
मैं ने अपने पिता ब्रह्मा से पूछा – “पिता, सब से पुराना जीव कौन है, इस सृष्टि में?”
ब्रह्मा बोले – “सुनो। मेरी सेना में एक कौआ था। उसका नाम था चण्ड। यह बहुत बरस पहले की बात है। उसका एक बेटा है। उसका नाम है भुशुण्ड। वो अभी भी जीवित है।”
“मेरुपर्वत से उत्तर की दिशा में, बहुत ऊँचाई पर, एक पेड़ है। वो पेड़ अपने आप में विचित्र है। उसकी हर डाली से कुछ अलग बहता है। एक से सोना। एक से पानी। एक से अमृत। उस पेड़ की एक डाली पर भुशुण्ड बैठता है।”
मैने पूछा “और वो कितना पुराना है?”
ब्रह्मा बोले – “यह तू उससे ही पूछना।

तो फिर मेरी यात्रा शुरू। यात्रा कुछ लम्बी ज़रूर थी, कई दिन लगे पर में चलता रहा।
मैने मेरुपर्वत पार किया, फिर उससे आगे का प्रदेश भी पार किया। आख़िर में मैं एक ऐसी जगह पहुँचा जहाँ हवा बहुत पतली थी। ज़मीन नीचे नहीं थी, क्योंकि मैं अब आकाश में चल रहा था।
ऊँचाई अब भी बढ़ती गई। एक जगह ऐसी आई जहाँ बादल पीछे रह गए।
एक जगह आई जहाँ पृथ्वी एक छोटी सी गोलाई दिखने लगी, नीचे।
और तभी मुझे वो पेड़ दिखा।
कल्प-वृक्ष
पेड़ बहुत बड़ा था। बहुत बड़ा।
पृथ्वी के किसी पेड़ से तुलना नहीं की जा सकती। उसका तना इतना मोटा था कि उसके चारों ओर चलने में कई दिन लगते। उसकी डालियाँ इतनी फैली थीं कि उनके नीचे कई गाँव बस सकते थे।
पर पेड़ ज़मीन पर नहीं था। पेड़ आकाश में था। बिना नींव के।
मैंने पेड़ के पास उड़ान भरी। (हाँ, मैं तब उड़ान भर सकता था। बहुत बरस के तप से एक छोटी सी सिद्धि मिली थी।) पेड़ की डालियाँ अलग-अलग रंग की थीं।

एक डाली से सोने की बूँदें टपक रही थीं। एक से पानी। एक से दूध। एक से अमृत। एक से रत्न जो हवा में चमकते थे।
इस पेड़ की एक डाली पर एक कौआ बैठा था।
कौआ काला था। बहुत काला। उसकी चोंच पीली। आँखें भूरी, चमकती। पंख इतने पुराने कि उनकी काली रंगत बहुत भी अचंभित करने वाली हो चुकी थी, जैसे कोई काला रंग जो हज़ारों बरस से मँजा हुआ हो। उसके पंखों के बीच में जगह-जगह सफ़ेद रेखाएँ थीं, बहुत बरस की।
उसका देह छोटा था, साधारण कौवे की तरह। पर उसकी आँखें अलग थीं। उन आँखों में कुछ ऐसा था जो साधारण कौवे की आँखों में नहीं होता।

मैं पेड़ की उस डाली पर उतरा। बहुत आहिस्ता से। अब कौए ने मुझे देखा।
मैं ने हाथ जोड़े।
“भुशुण्ड?”
कौआ ने सिर थोड़ा झुकाया।
“वसिष्ठ?”
मैं चौंका।
“आप मुझे कैसे जानते हैं?”
कौआ ने हँसी दी। उसकी हँसी कौवे की तरह नहीं थी। एक हलकी सी मानवीय हँसी।
“वसिष्ठ, मैं तुम्हारे कई जन्म देख चुका हूँ। तुम कई बार वसिष्ठ हुए हो। हर बार थोड़ा अलग। पर आज जैसे आए हो, ऐसे कभी नहीं आए। इस बार तुम युवा हो।”
मैं ने कुछ देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर पूछा।
“भुशुण्ड, मैं ने पहले कौन-कौन से रूप लिए थे?”
कौआ बोला – “वसिष्ठ, यह बात बहुत लम्बी है। पर कुछ बताऊँ। एक बार तुम कौसिक कुल के थे। वहाँ तुम्हारा नाम विष्णु था। एक बार तुम भृगु कुल के थे। वहाँ तुम्हारा नाम अंगिरस था। एक बार तुम बस वसिष्ठ थे, पर एक छोटे से गाँव में, बिना किसी ख्याति के।
“और एक बार तुम बिल्कुल कुछ नहीं थे। बस एक छोटे से ब्राह्मण थे, जिनकी पत्नी का नाम अरुन्धती था। दस-बारह हाथ की एक झोंपड़ी में रहते थे। बहुत बरसों तक उसी उसी झोंपड़ी में तुम दोनों साथ में रहते थे।”
मैं ने सिर हिलाया, और कहा – “भुशुण्ड, ऐसी कथा शायद मैंने सुनी है। पर वो वसिष्ठ अलग थे। वो मैं नहीं था।”
कौआ हँसा, और बोला – “वसिष्ठ, सब वसिष्ठ एक थे। और सब वसिष्ठ अलग थे। यह बात तुम्हें अभी समझ नहीं आएगी। आगे आएगी।”
मैं बैठ गया, उसी डाली पर। हमारी बातचीत शुरू हुई।
कहानियाँ
“वसिष्ठ, बैठो। मैं तुम्हें अपनी कथा सुनाता हूँ।”

मैं बैठा।
“बहुत पहले, मेरा एक पिता था। एक कौआ, उसका नाम चण्ड। वो ब्रह्मा का सेवक था। एक दिन ब्रह्मा के सात हंस उड़े जा रहे थे, आकाश में। चण्ड ने उन्हें देखा। और उन सातों से चण्ड का प्रेम हो गया।”
“सात से?”
“हाँ। सब से।”
भुशुण्ड हँसे।
“मेरे पिता का अपना तरीक़ा था। उन्हें यह बात अजीब नहीं लगती थी कि कोई एक कौवा सात हंसिनियों से प्रेम कर सके। उनके लिए प्रेम पात्र की संख्या से नहीं था।”
“फिर?”
“उन सात हंसिनियों ने मेरे पिता को स्वीकार किया। यह बहुत बड़ी बात थी। हंसिनियाँ ब्रह्मा की वाहन थीं। पर उन्होंने एक साधारण कौवे को स्वीकार किया। इस से एक बात मुझे शुरू से समझ आ गई थी। प्रेम जाति को नहीं देखता।
“उनसे मेरा जन्म हुआ। मैं सात के बेटा हूँ। इसलिए मेरे देह में भी सात स्त्रियों का बल है। मेरा अमरत्व इसी से जुड़ा है।”
मैं ने पूछा – “भुशुण्ड, आपका जन्म कैसा था?”
“वसिष्ठ, मेरा जन्म साधारण नहीं था। मेरे जन्म के समय आकाश साफ़ था। सब सात हंसिनियाँ एक साथ खड़ी थीं। मेरे पिता पास थे।
“और मैं एक अण्डे से निकला, बहुत साधारण रूप से। पर निकलते ही, मेरे भीतर एक बात थी जो साधारण नहीं थी। मैंने पहले ही पल से अपने जन्म को देखा। मेरी आँखें खुलते ही, मुझे पता था कि मैं कौन हूँ।”
“मतलब?”
“मतलब, मैं ने अपने भीतर वो चेतना देखी जो हर साँस से पहले है। बच्चे के रूप में देखी। यह बहुत कम लोगों को होता है।”

मैने पूछा – “भुशुण्ड, यह आपका वर्तमान जीवन है। पर पहले?”
“वसिष्ठ, पहले मैं ने सृष्टि के कई चक्र देखे हैं। हर सृष्टि एक चक्र की तरह है। पहले निर्माण, फिर स्थिति, फिर प्रलय। यह चक्र चलता रहता है। मैं ने इन चक्रों को कौवे के रूप में देखा है। पर हर चक्र में मेरा देह बदलता है, मेरी चेतना नहीं बदलती।”
“कैसे?”
“वसिष्ठ, सृष्टि का स्वभाव यह है कि वो आती है, जाती है। पर जो उसे देखता है, वो रहता है। मैं देखता हूँ। मेरा देह सृष्टि में पैदा होता है, सृष्टि में मरता है। पर मैं नहीं मरता।”
“पर देह तो आपका है।”
“हाँ। मेरा देह है। पर मैं देह नहीं हूँ। मैं वो हूँ जो हर देह के पीछे है।”

मैने पूछा – “मुझे एक बात बताइए। आप ने कितनी सृष्टियाँ देखी हैं?”
“वसिष्ठ, गिनती करना मुश्किल है। पर कुछ बताऊँ। मैं ने कई ब्रह्मा देखे हैं। हर सृष्टि का अपना ब्रह्मा होता है। मैं ने कई विष्णु देखे हैं। हर सृष्टि का अपना विष्णु। मैं ने कई शिव देखे हैं।
“और तुम जैसे एक वसिष्ठ हो, तुम्हारे जैसे भी कई वसिष्ठ देख चुका हूँ। मैं ने तुम्हें कौसिक कुल में देखा। मैं ने तुम्हें भृगु कुल में देखा। मैं ने तुम्हें छोटे ब्राह्मण के रूप में देखा। मैं ने तुम्हें अब, इस अवस्था में, देखा।”
मैने राम के बारे में पूछा – “और राम?”
“राम?”
मैने कहा – “जो भविष्य में आएगा। दशरथ का पुत्र।”
भुशुण्ड ने कहा – “वसिष्ठ, राम भी मैं ने कई बार देखा है। हर सृष्टि में एक राम होता है। हर बार थोड़ा अलग। एक बार वो धनुर्धर था। एक बार वो योद्धा था। एक बार वो ऋषि था। एक बार वो साधारण मनुष्य था जिसने वन में बस रहना सीखा। पर हर बार एक बात वैसी ही रहती है – हर बार वो धर्म के साथ रहा।”
मैं ने कुछ देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर पूछा – “भुशुण्ड, यह बात मुझे चकित करती है। हर सृष्टि में एक राम। हर सृष्टि में एक वसिष्ठ। हर सृष्टि में एक ब्रह्मा। तो यह सब अलग हैं या एक हैं?”
भुशुण्ड ने बताया – “वसिष्ठ, यह प्रश्न पुराना है। उत्तर एक है। यह सब अलग हैं और एक हैं, दोनों।
“देह से अलग हैं। चेतना से एक हैं।
“हर वसिष्ठ का देह अलग है। पर हर वसिष्ठ की चेतना एक ही चेतना है। हर राम का देह अलग है, पर चेतना वही।
“यह बात मनुष्य के लिए समझना मुश्किल है, क्योंकि वो देह को असली समझता है। पर देह बस एक रूप है। चेतना असली है।”
एक पुराना ब्रह्मा
मैने पूछा – “क्या आप मुझे एक पुराने ब्रह्मा के बारे में बताएँगे? जो आप ने देखे।”
भुशुण्ड ने जवाब में एक सवाल पूछा – “वसिष्ठ, कौन सा ब्रह्मा?”
“कोई एक।”
भुशुण्ड ने एक पल को सोचा।
“वसिष्ठ, एक ब्रह्मा थे जिन्हें मैं ने सबसे ज़्यादा देखा। उनका नाम सत्य-ब्रह्मा। वो बहुत समय पहले थे। शायद कई कल्पों पहले। उनकी एक विशेष बात थी।”
“क्या?”
“उन्होंने अपनी सृष्टि में दुख कम रखा।”
मैं रुक गया।
“कैसे?”
“वसिष्ठ, हर ब्रह्मा जब सृष्टि रचता है, तो उसमें सुख-दुख दोनों डालता है। यह नियम है, क्योंकि सुख-दुख के बीच का खेल ही चेतना को रास आता है। पर सत्य-ब्रह्मा ने एक अलग सोचा। उन्होंने सोचा, अगर मैं दुख कम कर दूँ, तो मेरे जीव अधिक सुखी रहेंगे। और उन्होंने दुख कम किया।”
“फिर?”
“फिर एक अजीब बात हुई।”
“क्या?”
“उनके जीव सुखी हुए। पर वो भी एक स्तर पर ऊब गए।”
“क्यों?”
“वसिष्ठ, क्योंकि बिना दुख के सुख की पहचान नहीं होती। अगर हमेशा सुख रहे, तो वो सामान्य हो जाता है। फिर वो सुख नहीं। सत्य-ब्रह्मा ने यह देखा। उनके जीव ऊबने लगे। फिर वो आपस में लड़ने लगे, अपनी ऊब से।”
मैने पूछा – “फिर सत्य-ब्रह्मा ने क्या किया?”
“उन्होंने अपनी सृष्टि को संशोधित किया। थोड़ा सा दुख जोड़ा।”
“और?”
“और जीव फिर ख़ुश हुए। यह विचित्र बात है, पर सृष्टि का यह नियम है। सुख-दुख दोनों चाहिए। अगर एक ही हो, तो वो भी सामान्य हो जाता है।”
मैं ने एक पल को कुछ नहीं कहा।
“भुशुण्ड, एक और प्रश्न।”
“बोलो।”
“क्या उस सृष्टि का भी प्रलय हुआ?”
भुशुण्ड ने कहा – “हाँ। हर सृष्टि का प्रलय होता है। सत्य-ब्रह्मा की भी। पर एक बात।”
“क्या?”
“उनका प्रलय शान्त था। साधारण प्रलय में बहुत हलचल होती है। पर सत्य-ब्रह्मा की सृष्टि शान्ति से डूबी।”
मैंने पूछा – “और एक और प्रश्न।”
“बोलो।”
“क्या एक प्रलय के बाद का प्रलय का स्थान भी अलग होता है? एक ब्रह्मा से दूसरे ब्रह्मा तक?”
भुशुण्ड बोले – “वसिष्ठ, यह बहुत गहरा प्रश्न।”
“बताइए।”
“हाँ। हर प्रलय का स्वाद अलग होता है। साधारण प्रलय में अनेकता डूबती है। शान्ति आती है। पर वो शान्ति भारी होती है।
“विशेष प्रलयों में कुछ और। कुछ हलकी सी। पर सब प्रलय एक स्थान पर मिलते हैं। उस अनन्त खाली (vacuum) में, जहाँ कुछ भी नहीं।”
एक पुराने राम
“भुशुण्ड।”
“बोलो।”
“क्या आप ने पहले के राम भी देखे?”
भुशुण्ड ने बताया “वसिष्ठ, हाँ। बहुत राम।”
“एक के बारे में बताइए।”
भुशुण्ड ने एक पल को सोचा।
“एक राम था जो बहुत साधारण था। तुम्हारे अभी के राम जैसा नहीं। साधारण।”
“साधारण कैसे?”
“उस राम का कोई वनवास नहीं हुआ। कोई सीता नहीं खोई। कोई रावण नहीं मारा।
“वो बस एक सीधा राजा। अपने राज्य में रहा। पिता के बाद सिंहासन। पत्नी। बच्चे। एक साधारण जीवन।”
मैने पूछा – “और उनकी कथा?”
“वसिष्ठ, उनकी कथा बहुत साधारण। कोई बड़ा युद्ध नहीं। कोई बड़ी पीड़ा नहीं। उन्होंने राज्य चलाया। न्याय किया। प्रजा सुखी। फिर बूढ़े हुए। फिर चले गए।”
“पर भुशुण्ड, अगर ऐसा था, तो उनकी कथा क्यों याद की जाएगी?”
“वसिष्ठ, उनकी कथा नहीं याद की गई। क्योंकि उसमें कुछ नहीं था। वो सृष्टि चली। फिर ख़त्म हुई। और कोई याद नहीं।”
मैने फिर पूछा – “तो अब का राम?”
“अब के राम की कथा याद की जाएगी। क्योंकि उसमें पीड़ा है। क्योंकि उसमें लड़ाई है। क्योंकि उसमें ख़ोना है मनुष्य को साधारण कथाएँ याद नहीं रहतीं। मनुष्य को बड़ी कथाएँ याद रहती हैं।”
मैं ने एक पल को कुछ नहीं कहा।
“भुशुण्ड, और एक प्रश्न।”
“बोलो।”
“क्या मेरे अभी के राम की कथा भी अन्ततः भूल जाएगी?”
भुशुण्ड हँसे।
“वसिष्ठ, यह कथा बहुत बरस याद रहेगी। शायद हज़ारों बरस। पर अन्ततः, हाँ। यह भी भूल जाएगी। हर कथा अन्त में भुलाई जाती है। पर एक बात।”
“क्या?”
“भले ही कथा भूल जाए, चेतना याद रखती है। चेतना के लिए हर कथा अपने भीतर है। चाहे वो याद की जाए या न।”
मेरा अगला सवाल था – “क्या मेरी कथा भी याद की जाएगी?”
भुशुण्ड हँसे। “वसिष्ठ, तुम्हारी कथा राम की कथा का हिस्सा। तो हाँ, याद की जाएगी।”
मैने पूछा – “क्या यह मेरे लिए अच्छा है? कि मेरी कथा याद की जाए?”
भुशुण्ड ने कहा – “वसिष्ठ, यह बात तुम्हें तय करनी।”
“कैसे तय करूँ?”
“वसिष्ठ, अगर तुम अपनी कथा से बँधते हो, तो याद होना बँधन। अगर नहीं बँधते, तो याद होना बस एक तथ्य बँधाव या न-बँधाव, यह तुम्हारी पसन्द।”
प्रलय
“भुशुण्ड, मुझे एक बात बताइए। प्रलय कैसा होता है?”
भुशुण्ड ने कहा – “वसिष्ठ, यह बात तुम्हारी समझ से बाहर हो सकती है। पर सुनो।”

“प्रलय एक रात की तरह होता है। पर वो रात बहुत लम्बी होती है। उसमें सब कुछ डूब जाता है। पहले हवा कम होती है। फिर रोशनी कम होती है। फिर पानी कम होता है। फिर ज़मीन कम होती है। फिर एक ऐसा क्षण आता है जब कुछ नहीं रहता। बस एक अनन्त खाली। और उस खाली में मैं रहता हूँ।”
“अकेले?”
“हाँ।”
“डर नहीं लगता?”
भुशुण्ड हँसे।
“वसिष्ठ, डर तब लगता है जब तुम अपने देह को असली समझते हो। पर देह तो प्रलय में नहीं रहता। तो डरने वाला कौन? बस चेतना रहती है। और चेतना ख़ुद कभी अकेली नहीं होती। क्योंकि चेतना ख़ुद होती है। उसका दूसरा कोई नहीं।”
“और प्रलय कितनी देर रहता है?”
“पता नहीं। समय वहाँ नहीं होता। शायद एक पल। शायद हज़ारों बरस। यह दोनों एक ही हैं।”
मैं ने सिर हिलाया।
“और फिर?”
“फिर सृष्टि शुरू होती है। पहले एक छोटी सी हलचल। फिर एक हवा। फिर एक रोशनी। फिर एक ब्रह्मा प्रकट होते हैं। फिर ब्रह्मा से बहुत कुछ निकलता है। फिर एक नई सृष्टि।”
“और आप?”
“मैं देखता रहता हूँ।”
“मैं भी?”
“तुम तब अपनी सृष्टि की कथा में हो। तुम्हें देखना नहीं होता, क्योंकि तुम कथा का हिस्सा हो। मैं कथा से अलग हूँ। इसलिए देखता हूँ।”
मैने कहा जो मैं सोच रहा था – “क्या मैं भी कभी कथा से अलग हो सकता हूँ?”
भुशुण्ड ने कहा – “वसिष्ठ, यही तो तुम सीखने आए हो।”
प्राण
“भुशुण्ड, मुझे यह अमरत्व कैसे मिले?”
“वसिष्ठ, यह प्राण के अभ्यास से मिला है।”
“समझाइए।”

भुशुण्ड ने अपनी आँख बन्द कीं और कहा – “वसिष्ठ, हर जीव की एक प्राण होती है। साँस। यह प्राण ऊर्जा है, चेतना का बाहरी रूप। जब हम साँस लेते हैं, तो प्राण भीतर आती है। जब हम साँस छोड़ते हैं, तो प्राण बाहर जाती है। यह सबको पता है। पर एक बात बहुत कम लोग जानते हैं। साँस लेने और साँस छोड़ने के बीच एक छोटा सा क्षण है, जब हम न साँस ले रहे हैं, न छोड़ रहे हैं। एक क्षण। बहुत छोटा। पर वो क्षण असली है। उस क्षण में चेतना अपनी मूल अवस्था में होती है।”
“भुशुण्ड, मैं ने यह सुना है।”
“पर सुनना और जानना अलग हैं। मैं ने अपने जीवन में बस यही किया है। मैं ने हर साँस के बीच के उस क्षण को बार-बार देखा है। हर बार। हज़ारों बरस से। और एक बात और। न केवल साँस लेने और छोड़ने के बीच का क्षण। बल्कि साँस छोड़ने और साँस लेने के बीच का भी। दोनों क्षणों में चेतना अपनी होती है। बीच में नहीं। प्राण के दौरान चेतना देह में बहती है। पर ठहराव में, चेतना अपनी होती है।”
“और?”
“और अब मेरा देह उस क्षण से जुड़ा है। मेरा देह तब तक रहेगा जब तक चेतना है। और चेतना तो हमेशा है। तो मेरा देह भी हमेशा रहेगा।”
मैं ने भुशुण्ड को बहुत देर तक देखा।
“भुशुण्ड।”
“बोलो।”
“मुझे यह सीखना है।”
भुशुण्ड हँसे।
“वसिष्ठ, तुम सीख सकते हो। पर एक बात याद रखना। यह विद्या किसी को बस सीखने से नहीं मिलती। इसके लिए अभ्यास चाहिए। बहुत लम्बा अभ्यास। मैं ने हज़ारों बरस किया है। तुम जब तक करोगे, तब तक यह बात तुम्हारे भीतर अपने आप बैठ जाएगी।”
“बताइए।”
भुशुण्ड ने मुझे प्राणायाम सिखाया।
“वसिष्ठ, बैठो। पीठ सीधी रखो। आँखें बन्द करो।
“साँस को देखो। बस देखो। बदलने की कोशिश मत करो। साँस अपने आप जैसी आती है, वैसी आने दो।
“धीरे-धीरे, साँस लेने और साँस छोड़ने के बीच के क्षण को देखो। वो छोटा क्षण।
“उस क्षण में रुको, जितनी देर रुक सको।
“फिर साँस छोड़ो। फिर साँस लो।
“फिर साँस लेने और छोड़ने के बीच के क्षण को देखो। फिर रुको।
“यह अभ्यास करो। हर रोज़। बरसों।
“फिर तुम भी जानोगे जो मैं जानता हूँ।”
मैं ने आँखें बन्द कीं। मैं ने अपनी साँस देखी। साँस अन्दर। साँस बाहर। बीच में एक छोटा सा क्षण।
मैं उस क्षण में रुका। बहुत छोटा क्षण। फिर साँस फिर। फिर बाहर। फिर बीच।
मैं ने उस क्षण में फिर रुकने की कोशिश की। थोड़ा देर तक।
भुशुण्ड ने मेरे पास से कहा – “वसिष्ठ, यह क्षण अभी छोटा लगता है। पर अभ्यास से वो क्षण लम्बा होगा। एक दिन तुम पाओगे कि वो क्षण देह के ऊपर है।”
मैं ने आँखें खोलीं। मैं ध्यान में बैठा था। मैं ने साँस के बीच के क्षण में पहुँचने का अभ्यास किया था। पर इस बार कुछ अलग हुआ।
वो क्षण लम्बा हुआ। बहुत लम्बा।
और उस लम्बे क्षण में मैं ने एक बात देखी। मेरा देह मेरे साथ नहीं था। मतलब, देह वहाँ था, पर मैं देह में नहीं था। मैं देह से ऊपर था। मैं देह को देख रहा था।
यह पहली बार था। बहुत बरस की प्रतीक्षा का फल। मैंने फिर भुशुण्ड को सोचा। वो सही कह रहे थे। मैंने अभ्यास जारी रखा। मेरे देह की उम्र चलती रही, पर वो उस तरह नहीं बूढ़ा हुआ जैसे और साधारण लोगों का होता है।
मेरा मन और स्थिर हुआ। मेरी चेतना और स्थिर। बहुत बरस बीते।
और प्रश्न
मैं बहुत दिन भुशुण्ड के पास रहा।
एक रात मैं ने उनसे पूछा।
“भुशुण्ड।”
“बोलो।”
“क्या आप कभी थकते हैं? इतने बरस के अनुभव से?”
भुशुण्ड ने एक पल को कुछ नहीं कहा।
“वसिष्ठ, थकना और थकना अलग।”
“समझाइए।”
“देह थकता है। चेतना नहीं।
“मेरा देह कई बार थका है। पर देह को विश्राम देने पर वो ठीक हो जाता है। पर चेतना थकती ही नहीं।”
मैने पूछा – “क्या आप ने कभी पिता या माता को मिस किया?”
“वसिष्ठ, बहुत बरस। बहुत बरस पहले।”
“फिर?”
“फिर समय के साथ वो मिस करना धुँधला हो गया। अब बस उनकी एक छाया मेरे भीतर। मीठी छाया।”
“और कोई स्त्री? जिससे आप ने प्रेम किया हो?”
वह बोले – “वसिष्ठ, यह बहुत व्यक्तिगत प्रश्न। हाँ, मैं ने एक स्त्री से प्रेम किया था। बहुत बरस पहले। एक हंसिनी वो भी मेरी माँओं में से एक थी, एक तरह से। पर उसके साथ मेरा रिश्ता और था।”
“वो अब बहुत बरस पहले गई। पर उसकी चेतना मेरे भीतर है। हर रोज़।”
फिर मैने पूछा “क्या आप अकेले लगते हैं?”
“वसिष्ठ, इतने बरस। अकेले नहीं हो सकता।”
“क्यों?”
“क्योंकि बहुत बरस मेरे साथ। बहुत यादें। बहुत चेतनाएँ जो मेरे भीतर हैं। पर अगर मैं देह के स्तर पर सोचूँ, तो हाँ। मेरा देह अकेला। कोई पास नहीं। पर देह बस एक रूप है।”
“भुशुण्ड, यह बात मेरे लिए बहुत है।”
“वसिष्ठ, तुम जब लौटोगे, तो अपनी पत्नी के पास होगे। तुम्हें मेरी तरह अकेले नहीं रहना। तुम्हारा रास्ता अलग है।”
और एक प्रलय
“भुशुण्ड, आप ने जो प्रलय मुझे बताए, उनमें से एक विस्तार से बताइए।”
भुशुण्ड ने एक पल को सोचा, फिर बोले – “वसिष्ठ, एक बार एक ख़ास प्रलय हुआ था। बहुत पहले। मैं तब बहुत युवा था। पर तब तक मैं ने कई प्रलय देख चुका था।”

“वसिष्ठ, उस प्रलय में पहले हवा शान्त हुई। साधारण प्रलयों में पहले तूफ़ान आते हैं। पर इस बार नहीं। हवा बस धीमे-धीमे रुकती गई। पहले पंछी उड़ना रोक गए। फिर वो उड़ नहीं सकते थे, क्योंकि हवा नहीं थी। पंछी ज़मीन पर बैठ गए। फिर पानी। नदियाँ बहना रोकीं। पहले धीरे। फिर बिल्कुल। मछलियाँ रुक गईं। समुद्र शान्त हुआ।”
“पृथ्वी अपने चलने को रोकना शुरू की। धीरे-धीरे। दिन और रात का चक्र बदला। फिर रुका। सूरज एक जगह स्थिर हो गया।”
“लोग पहले हैरान। फिर डरे। फिर शान्त। एक स्तर पर सब को मालूम था कि अब कुछ ख़त्म हो रहा है। लोग अपने घरों में बैठ गए। बच्चों को गले लगाया। पुरानी बातें कीं।”
“फिर पृथ्वी हलकी होने लगी। पहले पहाड़ छोटे हुए। फिर समुद्र सूखे। फिर ज़मीन ही धुँधली। लोग और जीव-जन्तु धुँधले। फिर अदृश्य।”
“और आप?”
“मैं अपनी डाली पर। मेरी डाली भी धुँधली। पर मैं नहीं। फिर बस खाली। बहुत खाली। बहुत बरस।”
“फिर एक हलकी सी हलचल। बहुत बहुत हलकी। एक नया ब्रह्मा प्रकट हुए। और एक नई सृष्टि शुरू हुई।”
मैं ने एक प्रश्न किया – “उस सृष्टि में जो लोग गए, वो कहाँ गए?”
भुशुण्ड – “वसिष्ठ, यह बहुत अच्छा प्रश्न। उनकी चेतनाएँ नहीं मरीं। चेतनाएँ कभी नहीं मरतीं। वो vacuum में रहीं। कुछ समय के लिए। फिर नई सृष्टि शुरू हुई। और वो चेतनाएँ नई देहों में लौटीं। पर एक बात। बहुत के लिए वो पुरानी कथा भूली हुई। कुछ के लिए, थोड़ी सी याद रही।”
मैं ने पूछा – “भुशुण्ड, क्या मेरी कोई पुरानी कथा है?”
“वसिष्ठ, बहुत हैं। पर तुम्हें अभी ज़्यादा याद नहीं।”
“क्यों नहीं?”
“क्योंकि अभी का तुम्हारा काम अलग है। पुरानी याद तुम्हें बाधित करेगी।”
मैने पूछा – “क्या एक दिन मुझे सब याद आएगा?”
भुशुण्ड बोले – “शायद। पर जब आएगा, तब तुम तैयार होगे।”
लौटना
मेरुपर्वत के उत्तर से मैं लौटा। हिमालय की उस ऊँचाई से मैं नीचे आया। आकाश से होते हुए मैं पृथ्वी पर पहुँचा।
पहले मैं ने सोचा था कि मैं वहाँ कई दिन रहूँगा। पर भुशुण्ड ने एक रात के बाद मुझे कहा।
“वसिष्ठ, अब जाओ।”
“पर मैं अभी और सीखना चाहता हूँ।”
“वसिष्ठ, जो सीखना है, वो तुम्हें मिल चुका है। बाक़ी का काम अभ्यास का है। यहाँ बैठने से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। नीचे जाओ। अभ्यास करो। फिर एक दिन तुम वापस आओगे, और तुम्हें पता होगा।”
मैं ने भुशुण्ड को प्रणाम किया, और लौटने से पहले एक सवाल और पूछा – “आप कब तक रहेंगे? इस अमरत्व में?”
भुशुण्ड ने बताया – “वसिष्ठ, जब तक चेतना है, तब तक मैं हूँ। और चेतना तो हमेशा है। तो जब तुम लौटोगे, मैं यहीं रहूँगा। उसी डाली पर। तुम मेरे पास बार-बार आ सकते हो।”
बहुत बरस बीते। मैं ने भुशुण्ड से जो सीखा, वो मेरे जीवन में बार-बार उपयोग में आया। मैं हर रोज़ साँस के बीच के क्षण को देखता रहा। हर रोज़। पहले वो क्षण बहुत छोटा था। बस एक झपकी। फिर वो बढ़ा। एक साँस की लम्बाई। फिर दो। फिर पाँच।
एक दिन कुछ हुआ। मैं ध्यान में बैठा था। मैं ने साँस के बीच के क्षण में पहुँचने का अभ्यास किया था। पर इस बार कुछ अलग हुआ। वो क्षण लम्बा हुआ। बहुत लम्बा। और उस लम्बे क्षण में मैं ने एक बात देखी। मेरा देह मेरे साथ नहीं था। मतलब, देह वहाँ था, पर मैं देह में नहीं था। मैं देह से ऊपर था। मैं देह को देख रहा था।
यह पहली बार था।
मैं ने फिर भुशुण्ड को सोचा। वो सही कह रहे थे। जब साँस के बीच का क्षण काफ़ी लम्बा होता है, तो चेतना देह से अलग होती है। और जब चेतना देह से अलग होती है, तो वो देह के नियमों के बाहर होती है। मृत्यु के नियमों के बाहर।
मैं ने अभ्यास जारी रखा। बहुत बरसों तक। मेरा देह बूढ़ा होने लगता। पर मैं उस क्षण में और भीतर जाता। मेरा देह स्थिर हो जाता। मैं फिर रह जाता।
बहुत बरस बाद मैं फिर भुशुण्ड के पास दोबारा गया।
“भुशुण्ड।”
“वसिष्ठ। तुम लौटे।”
“मुझे एक और बात पूछनी है। वो क्षण जो आपने सिखाया था। साँस के बीच का क्षण। वो अब बहुत लम्बा हो गया है। मेरे लिए। अब मेरी साँस अपने आप बहुत धीमी हो गई है। मैं कई बार रुक जाता हूँ, बीच में।”
भुशुण्ड हँसे।
“वसिष्ठ, अब तुम मेरी पंक्ति में आ रहे हो। यह बस शुरुआत है। और अब तुम जानोगे कि देह बदलता है, चेतना नहीं। तुम कई जन्म लोगे। पर तुम मरोगे नहीं।”
मैं ने पूछा – “अगर मैं अमर हूँ, तो क्या यह जीवन कभी ख़त्म होगा?”
भुशुण्ड कुछ देर तक चुप रहे।
“वसिष्ठ, जीवन ख़त्म नहीं होता। पर एक स्तर पर यह जो बाहर है, वो ख़त्म होता है। चेतना अपनी कथा बदलती है। पुरानी कथा को छोड़ती है। नई कथा शुरू करती है। तुम पुराने वसिष्ठ नहीं रहोगे। पर तुम वसिष्ठ रहोगे। यह बात समझ में देर लगती है।”
“समझ रहा हूँ।”
“धीरे-धीरे और समझोगे। अभी जाओ।”
पहली रात लौटकर
मैं नीचे आया। बहुत बरस बीते। मेरी कुटिया वही। अरुन्धती वहीं। मुझे देखकर वो रुक गईं। उन्होंने मुझे पानी दिया। पीने को। मैं ने पीया। बहुत बरस का स्वर्ग का पानी और भुशुण्ड के कल्प-वृक्ष का पानी। पर इस सादे पानी का स्वाद अलग।
अरुन्धति बोलीं – “आपने क्या देखा, बताइए?”
मैं ने उन्हें बताया। कल्प-वृक्ष। भुशुण्ड। उनकी कथाएँ। प्राण के बीच का क्षण।
अरुन्धती ने सुना। बीच में कुछ नहीं कहा। जब मेरा बताना ख़त्म हुआ, उन्होंने एक छोटा सा प्रश्न पूछा।
“यह बताईये, क्या भुशुण्ड अकेले हैं?”
मैं रुक गया। “हाँ।”
“तो उनका अमरत्व कैसा?”
मैं ने एक पल को कुछ नहीं कहा। “अरुन्धती, उनका अमरत्व बहुत बड़ा। पर एक स्तर पर अकेला।”
अरुन्धती ने कहा “फिर मेरी यह कथा अच्छी।”
“क्यों?”
“मैं अमर नहीं। पर मैं आप के साथ। आप मेरे साथ। भुशुण्ड के पास कोई नहीं।”

मैं ने अरुन्धती का हाथ अपने हाथ में लिया। बहुत देर तक।
“अरुन्धती, मैं ने एक बात सीखी। अमरत्व देह से नहीं। साथ से।”
अरुन्धती ने हलकी हँसी दी और बोलीं – “यह बात आप ने अभी सीखी? मैं तो बहुत बरस से जानती थी।”
और एक रात
बहुत बरस बाद, एक बार अरुन्धती बीमार पड़ीं। मेरे हाथ काँपे।
मैं ने सोचा। “मैं अमरत्व जानता हूँ। पर अरुन्धती को नहीं दे सकता।”
मैं ने अरुन्धती से पूछा – “अरुन्धती, क्या मैं आपको प्राण-अभ्यास सिखा सकता हूँ?”
अरुन्धती ने मुस्कुराते हुए पूछा “अभी, इस हालात में?”
“हाँ। अभी।”
“पर मैं तो जा रही हूँ। सुनो, मेरा समय अब रुकने का नहीं।”
“पर…”
“मैं ने अपना जीवन जिया। बहुत बरस। आप के साथ। यह काफ़ी है।”
“और मैं?”
“आप अमर। आप रहेंगे।”
“पर मैं अकेला होऊँगा।”
अरुन्धती बोलीं “मैं अब समझ रही हूँ। यह वही भुशुण्ड का अकेलापन है।”
मैं ने अरुन्धती का हाथ अपने हाथ में लिया।
“अरुन्धती, मैं अब अमरत्व नहीं चाहता। मेरा अभ्यास अब पूरा हुआ। पर मैं अब अपने देह को नहीं रोकूँगा। मेरा समय जब आएगा, मैं चला जाऊँगा।”
और एक मुलाक़ात
बहुत बरस बीते। मैंने राम को पाया। मैं उसका गुरु बना। राम के साथ मेरा बहुत कुछ बदला। उसे सिखाते समय मुझे ख़ुद बहुत कुछ नया दिखाई दिया। एक दिन, राम के साथ बात करते समय, मुझे एक बात याद आई। मैं ने राम से कहा था कि वसिष्ठ कई हुए हैं। उन्होंने हलकी हैरानी से देखा था। मैं ने वो बात आगे नहीं बढ़ाई थी।
पर अब मुझे लगा। मुझे एक बार और भुशुण्ड के पास जाना चाहिए। यह बात उससे पूछनी चाहिए।
मैं फिर गया।
बहुत बरस बाद। पर भुशुण्ड वहीं था। उसी डाली पर। वैसा ही।
मैने पूछा – “राम मुझ से कथाएँ सुन रहा है। मैं ने उसे बहुत कथाएँ सुनाई हैं। उनमें से एक आज की कथा थी। आपके बारे में।”
“पर मुझे एक प्रश्न है। भुशुण्ड, मैं ने अपनी कथा में आप को रखा। मैं ने राम को आप के बारे में सब बताया। पर क्या यह सच है, यह सब? या यह भी एक कथा है? क्या आप असली हैं, या मेरी कल्पना?”
भुशुण्ड बोले – “वसिष्ठ, यह प्रश्न देर से पूछा।”
“क्या मतलब?”
“मतलब, तुम कुछ बरस पहले यह प्रश्न पूछ सकते थे। पर तुम ने नहीं पूछा। क्यूंकि तुम तब विश्वास से अधिक भरे थे। अब तुम्हारे भीतर एक संशय आया है। यह अच्छी बात है।”
“वसिष्ठ, मैं असली हूँ या तुम्हारी कल्पना, यह प्रश्न दूसरे प्रश्नों जैसा नहीं है। क्योंकि अगर मैं तुम्हारी कल्पना हूँ, तो जो ज्ञान मैं ने तुम्हें दिया, वो भी तुम्हारी कल्पना है। पर वो ज्ञान काम कर रहा है। तुम वसिष्ठ हो, राम के गुरु। तुम्हारे भीतर वो साँस के बीच का क्षण लम्बा हो चुका है। यह सब असली है। तो मैं असली हूँ, चाहे तुम मुझे कैसा भी मानो। अगर मैं तुम्हारी कल्पना भी हूँ, तो भी मैं असली हूँ। क्योंकि कल्पना और सच एक ही चेतना के दो रूप हैं।”
राम ने यह कथा सुन कर एक हलकी सी काँपती साँस ली, और बोले – “गुरुदेव, आप अमर हैं?”
“राम, हम सब अमर हैं। बस हमें यह पता नहीं। मैं इसे जान चुका हूँ, इसलिए कुछ बार-बार वसिष्ठ हुआ हूँ। पर जो जानता है, वो अमर है। जो नहीं जानता, वो भी अमर है। बस उसे पता नहीं।”
“और भुशुण्ड?”
“वो अब भी हैं। उसी कल्प-वृक्ष पर। अगर तुम कभी मेरुपर्वत के उत्तर जाओ, तो ऊपर देखना। हो सकता है तुम्हें एक काला कौआ दिखे।”
राम ने आसमान की ओर देखा।
ऊपर तीन कौवे उड़ रहे थे। पर वो साधारण कौवे थे।
राम बोले – “गुरुदेव। मैं अभ्यास करूँगा।”
“कौन सा अभ्यास?”
“साँस के बीच के क्षण का।”
“राम, तुम्हें यह अभ्यास हज़ारों बरस तक नहीं करना। पर रोज़ करो। एक दिन तुम्हें वो क्षण मिलेगा। तब तुम जानोगे कि देह बदलता है, चेतना नहीं।”
राम बोले – “भुशुण्ड की कथा में एक बात मुझे विशेष लगी। उन्होंने अपनी हंस-स्त्री को याद किया। बहुत बरस पहले की एक प्रिय। पर अब भी उनके भीतर। मतलब अमरता भी अकेलापन देती है ।”
वसिष्ठ ने एक पल को कुछ नहीं कहा। फिर बोले – “राम, यह बहुत गहरी बात। भुशुण्ड अमर है। पर वो जिनसे प्रेम करते, वो अमर नहीं। तो एक स्तर पर, अमरता अकेलापन।”
राम पूछते हैं – “गुरुदेव, क्या मैं भी ऐसा अमरत्व चाहूँगा?”
“राम, यह तुम तय करना। अगर तुम भुशुण्ड का अभ्यास पूरा करते हो, तो तुम बहुत बरस जी सकते हो। पर तुम्हारे प्रिय? वो साथ नहीं रहेंगे।”
राम ने एक पल को कुछ नहीं कहा, फिर बोले – “गुरुदेव। मुझे यह अमरत्व नहीं चाहिए। क्योंकि मेरे प्रिय मेरे साथ। अगर मैं अमर रहूँ और वो जाएँ, तो वो अमरत्व मेरे लिए दण्ड।”
वसिष्ठ बोले – “राम, यह बहुत समझदार जवाब।”
“पर मैं अभ्यास करूँगा। क्योंकि अभ्यास से जो चेतना मिलती, वो अमरत्व से अलग। वो भीतर की स्थिरता। मैं वो चाहता हूँ। पर देह की अमरता नहीं।”
राम ने आसमान की ओर देखा। ऊपर तीन कौवे अब नहीं दिख रहे थे। पर एक छोटा सा तारा। बहुत दूर।
राम ने सोचा।
“शायद वो भुशुण्ड।”
पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“राम, तुम्हें यह अभ्यास हज़ारों बरस तक नहीं करना। पर रोज़ करो। एक दिन तुम्हें वो क्षण मिलेगा। तब तुम जानोगे कि देह बदलता है, चेतना नहीं।”
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण, सर्ग 6a 14-27 और 6b 5-22 पर आधारित है। भुशुण्ड कौवे की कथा शास्त्र की सबसे विचित्र कथाओं में से है। एक कौआ, जो ब्रह्मा के सात हंसों से जन्मा, जिसने अनगिनत सृष्टि-चक्र देखे, जो प्राण के अभ्यास से अमर है। यह कथा प्राणायाम और साक्षी-चेतना के सिद्धान्त को एक विचित्र पर मार्मिक रूप में प्रस्तुत करती है। शास्त्र में यह वसिष्ठ की अपनी आत्म-कथा का एक भाग भी है।
दर्शन-दृष्टि
भुशुण्ड एक कौआ है जिसने अनेक ब्रह्माण्डों की रचना और प्रलय देखी है। वसिष्ठ उससे मिलने जाते हैं कल्प-वृक्ष पर, और कौआ बताता है कि कितने राम, कितने वसिष्ठ, कितने ब्रह्मा, कितने शिव वो देख चुका। उसकी दीर्घायु का रहस्य प्राण की एक विशेष साधना है। कथा यह कहती है कि साक्षी-चेतना कालातीत है, ब्रह्माण्ड बनते-मिटते रहते हैं, पर देखने वाला अपनी जगह है, और जो प्राण को थाम लेता है वो काल को थाम लेता है।
भारतीय परम्परा में स्वामी अभिनवगुप्त (950-1016) ने अपनी तन्त्रालोक में दिखाया कि श्वास, प्राण, और चेतना एक ही तत्त्व के तीन पहलू हैं, और प्राण के स्पन्द को धारण करने वाला कालचक्र से बाहर निकल आता है। भुशुण्ड की कथा इसी सिद्धान्त की पौराणिक देह है। वो जो हर कल्प में बचा रह जाता है, वो कोई चमत्कारी देह नहीं, वो प्राण की वो धारा है जिसे उसने पकड़ रखा है, और उस धारा के साथ साक्षी की निरन्तरता।