कथा · ११
राजा जनक का जागरण
यज्ञ की वेदी पर पाँव रखने ही वाले थे। किसी अदृश्य आवाज़ ने एक वाक्य कहा। वहीं रुक गए। फिर पूरी ज़िंदगी अलग हो गई। बाद में जब शुकदेव उनसे मिलने आए, तो जनक एक और कथा बने।
मिथिला के राजा जनक की बात है। ऐसे राजा थे कि उनकी कीर्ति दूर-दूर तक थी। जब भी कोई बड़ा यज्ञ होता, ऋषि-मुनि उनके यहाँ इकट्ठा होते। मिथिला विद्या और न्याय की राजधानी मानी जाती।
उनके दरबार में रोज़ कोई न कोई पंडित आता। शास्त्र-चर्चा, धर्म-चर्चा। जनक हर एक की सुनते। मगर भीतर से वो हमेशा एक बात सोचते – “ये पंडित बहुत बातें करते हैं। मगर असली अनुभव कितने को है?”
उन्हें ख़ुद भी नहीं था। यह बात उन्हें सबसे ज़्यादा खाती।
यज्ञ का दिन
एक सुबह जनक एक बड़े यज्ञ की तैयारी कर रहे थे। पुजारी सब कुछ व्यवस्थित कर रहे थे। अग्नि जल रही थी। मंत्र पढ़े जा रहे थे। राजा का पाँव वेदी की ओर बढ़ने वाला था।
राजसी पोशाक। माथे पर तिलक। हाथ में एक छोटा सा कलश।
राजा हाथ धोकर वेदी की ओर बढ़े। बस एक कदम और।
तभी कहीं से एक आवाज़ आई।
न पास से, न दूर से। न आसमान से, न ज़मीन से। जैसे भीतर ही उठी हो।
“सुख की खोज में जगत भागता है, पर सुख तो गहरी नींद में मिलता है।”
जनक ठहर गए। सुना तो था, मगर मानो किसी ने बहुत धीरे से कहा हो।
दूसरी आवाज़ आई।
“नींद में मन नहीं होता। कोई ‘मैं’ नहीं होता। फिर सुख कैसा?”
जनक का पैर रुक गया। उन्होंने इधर-उधर देखा। कोई दिख नहीं रहा था जो बोल रहा हो।
तीसरी आवाज़।
“वो सुख जो तब है जब ‘मैं’ नहीं है, वो असली सुख है। बाक़ी सब दौड़।”
रुक जाना
जनक खड़े रह गए। पाँव वहीं रुक गया। पंडित बोलते रहे। उन्हें पता ही नहीं चला कि राजा रुक गए हैं।
जनक के मन में बहुत तेज़ हलचल हुई।
उन्होंने ख़ुद से पूछा – “अगर सुख तब है जब ‘मैं’ नहीं है, तो ‘मैं’ ही दुख का कारण है।
“रोज़ कौन परेशान होता है? मैं। कौन ख़ुश होता है? मैं। कौन नाराज़ होता है? मैं। कौन निराश होता है? मैं।
“और गहरी नींद में यह ‘मैं’ कहाँ जाता है? बस ग़ायब। और तब चैन।
“मतलब ‘मैं’ होने में ही उलझन है। ‘मैं’ न होना ही शांति है।”
उन्होंने अपने पाँव की ओर देखा। एक कदम वेदी की तरफ़ बढ़ा हुआ था। एक हवा में रुका हुआ। उन्होंने पैर वापस लिया।
वो वहीं बैठ गए। यज्ञ-शाला के बीच में, सोने के सिंहासन के पास, मिट्टी पर। पूरी राजसी पोशाक में। आँखें मूँद लीं।
अंदर की यात्रा
उन्होंने भीतर देखा। हर “मैं” विचार को छाँटा।
“मैं राजा हूँ” – यह कहाँ से आता है? यह एक विचार है। उठता है, जाता है।
“मैं पिता हूँ” – कहाँ है यह? बस एक विचार।
“मैं जनक हूँ” – कौन है? एक नाम। कौन याद करता है यह नाम? वो जो याद करता है, वो जनक नहीं।
“मैं बूढ़ा होता हूँ” – कौन बूढ़ा होता है? देह। मगर देखने वाला बूढ़ा नहीं होता। देखने वाला हर उम्र में वही है।
सब विचार उठते-गिरते थे। जो विचार देख रहा था, उसकी कोई परिभाषा नहीं थी।
वो परिभाषा-रहित कुछ – वो “मैं” से पहले की चीज़ – जनक को मिल गई।
एक बहुत स्थिर सत्ता। बिना किसी पकड़ के। बिना किसी रंग के। बस होना।
जनक ने उस होने में अपने को रखा।
वापसी
आँखें खुलीं। कुछ ही पल बीते थे।
मंत्र अभी पढ़े जा रहे थे। राजा ने वेदी पर पाँव रखा। मंत्र पूरे हुए। पंडितों को कुछ अंदाज़ा नहीं था कि बीच में क्या हुआ है।
मगर जनक के लिए, बीच में सब कुछ हुआ था।
उस दिन से जनक बदल गए। बाहर से वही – वही पहनावा, वही दरबार, वही न्याय। मगर भीतर कोई था ही नहीं। बस घटनाएँ हो रही थीं।
मिथिला जले, मेरा क्या?
वर्षों बाद, जनक ने एक प्रसिद्ध बात कही।
दरबार में किसी ने पूछा, “महाराज, अगर मिथिला नगरी जल जाए, तो क्या आपको दुख होगा?”
जनक ने हँसकर कहा, “मिथिला जले, मेरा कुछ नहीं जलता।”
लोग चौंके। एक पंडित ने पूछा, “आप तो राजा हैं। राज्य आपका है।”
“राज्य था कब? मैं था कब? जो जलेगा वो मैं नहीं हूँ। जो मैं हूँ वो जलने योग्य नहीं।”
“मगर आपकी प्रजा?”
“प्रजा का दुख होगा – प्रजा को। उसमें मैं हाथ बटाऊँगा, मगर मेरे भीतर वो दुख नहीं उठेगा। यही ज्ञान का फ़ल है।”
लोग चुप हो गए।
शुकदेव की परीक्षा
एक दिन शुकदेव – व्यास के बेटे, जन्म से जागे हुए – जनक के पास आए। बहुत प्रश्न लेकर।
व्यास जी ने उन्हें भेजा था। बेटा जागा हुआ था, मगर व्यास को एक संदेह था। उन्होंने कहा था – “शुक, मिथिला जा। राजा जनक के पास। वो पुष्टि करेंगे।”
शुक मिथिला पहुँचे। महल के द्वार पर रुके।
पहरेदार ने पूछा, “कौन?”
“शुक। व्यास का बेटा।”
पहरेदार ने अंदर ख़बर भेजी। मगर जनक ने कहा, “उसे रुकने दो। मैं अभी नहीं मिल सकता।”
शुक द्वार पर रुक गए। बैठ गए। एक दिन। दो दिन। सात दिन। बिना खाए, बिना सोए। बस बैठे रहे।
आठवें दिन जनक ने कहा, “उसे आँगन में बुला लो।”
शुक आँगन में आए। बैठ गए। फिर इंतज़ार। एक दिन। दो दिन। सात दिन।
आठवें दिन जनक ने कहा, “अब उसे सुगंधित कक्ष में ले जाओ।”
शुक एक भव्य कक्ष में पहुँचे। हर तरफ़ अगरबत्ती की महक। सोने का पलंग। नर्तकियाँ नाच रही थीं। मीठा भोजन रखा था। संगीत बज रहा था।
शुक एक कोने में बैठ गए। आँखें मूँद लीं। नर्तकियाँ नाचती रहीं। शुक देखते नहीं थे। संगीत बजता रहा। शुक सुनते नहीं थे। मीठा रखा रहा। शुक छूते नहीं थे।
एक दिन। दो दिन। सात दिन।
मिलना
आख़िर आठवें दिन जनक स्वयं कक्ष में आए।
शुक ने आँखें खोलीं। देखा – एक राजसी पुरुष। मगर भीतर से बहुत हलके।
“महाराज,” शुक ने हाथ जोड़े।
जनक ने उन्हें देखा। पाँचवीं रात कोई आम साधक टूट जाता। मीठे के लिए, संगीत के लिए, स्त्रियों के लिए। शुक नहीं टूटे।
“बेटे, तुम क्या चाहते हो?”
“पिताजी ने भेजा है। आपने जो कहना है, वो कहिए।”
“मगर तुम्हारा अपना क्या है? तुम क्या ढूँढ रहे हो?”
शुक मुस्कुराए। “महाराज, मैंने जब से आँखें खोली हैं, मुझे यह संसार स्वप्न जैसा लगता है। मैं कुछ नहीं ढूँढ रहा। मैं जागा हुआ हूँ।”
जनक ने शुक को देखा। उनकी आँखों में कुछ तय किया।
“शुक, तुम जागे हुए हो। तुम्हें मेरी ज़रूरत नहीं। तुम्हारे पिता को बस यह विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने तीन परीक्षाएँ लीं – इंतज़ार, उपेक्षा, प्रलोभन। तुम तीनों में अडिग रहे।
“जाओ। पिता से कहो कि बेटा पूरा है।”
शुक ने प्रणाम किया। फिर एक प्रश्न पूछा।
“महाराज, मगर एक बात बताइए। आप राजा हैं। राज्य चलाते हैं। लोगों के साथ बैठते हैं, उनसे बात करते हैं। फिर भी जागे हुए कैसे रहते हैं?”
जनक ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, बाहर से देखो तो लगेगा मैं राज चलाता हूँ। मगर अंदर से देखो तो कोई नहीं चलाता। राज ख़ुद चलता है। फ़ैसले अपने आप होते हैं। मैं बस देखता हूँ।
“वन में जाने की ज़रूरत नहीं। जहाँ हो, वहीं जागो। दहलीज़ पर भी जागृति हो सकती है। यज्ञ की वेदी के पास भी।”
शुक ने सिर झुकाया। समझ गए। लौटे।
व्यास जी ने पहली बार बेटे को गले लगाया। फिर रोए। बोले, “मैंने तुझे जन्म दिया, मगर तू मुझसे आगे है। यह पिता का सबसे बड़ा सौभाग्य है।”
शुक मुस्कुराए। फिर वन को चले गए। वहीं समाधि लग गई।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, मुक्ति के लिए वन की ज़रूरत नहीं। दहलीज पर भी हो सकती है। एक वाक्य काफ़ी है, अगर सुनने वाला तैयार हो।
“जनक यज्ञ की वेदी पर जागे। शुक जन्म से जागे थे। मगर दोनों जगहों से हम तक एक ही बात पहुँचती है – जागृति परिस्थिति की मोहताज नहीं है। वो भीतर का काम है। और वो किसी भी क्षण हो सकता है।”
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