प्रथम भैरवी बिलावली ॥
पुंनिआकी गावहि बंगली ॥
पुनि असलेखी की भई बारी ॥
ए भैरउ की पाचउ नारी ॥
पंचम हरख दिसाख सुनावहि ॥
बंगालम मधु माधव गावहि ॥१॥
ललत बिलावल गावही अपुनी अपुनी भांति ॥
असट पुत्र भैरव के गावहि गाइन पात्र ॥१॥
दुतीआ मालकउसक आलापहि ॥
संगि रागनी पाचउ थापहि ॥
गोंडकरी अरु देवगंधारी ॥
गंधारी सीहुती उचारी ॥
धनासरी ए पाचउ गाई ॥
माल राग कउसक संगि लाई ॥
मारू मसतअंग मेवारा ॥
प्रबलचंड कउसक उभारा ॥
खउखट अउ भउरानद गाए ॥
असट मालकउसक संगि लाए ॥१॥
पुनि आइअउ हिंडोलु पंच नारि संगि असट सुत ॥
उठहि तान कलोल गाइन तार मिलावही ॥१॥
तेलंगी देवकरी आई ॥
बसंती संदूर सुहाई ॥
सरस अहीरी लै भारजा ॥
संगि लाई पांचउ आरजा ॥
सुरमानंद भासकर आए ॥
चंद्रबिंब मंगलन सुहाए ॥
सरसबान अउ आहि बिनोदा ॥
गावहि सरस बसंत कमोदा ॥
असट पुत्र मै कहे सवारी ॥
पुनि आई दीपक की बारी ॥१॥
कछेली पटमंजरी टोडी कही अलापि ॥
कामोदी अउ गूजरी संगि दीपक के थापि ॥१॥
कालंका कुंतल अउ रामा ॥
कमलकुसम चंपक के नामा ॥
गउरा अउ कानरा कल्याना ॥
असट पुत्र दीपक के जाना ॥१॥
सभ मिलि सिरीराग वै गावहि ॥
पांचउ संगि बरंगन लावहि ॥
बैरारी करनाटी धरी ॥
गवरी गावहि आसावरी ॥
तिह पाछै सिंधवी अलापी ॥
सिरीराग सिउ पांचउ थापी ॥१॥
सालू सारग सागरा अउर गोंड गंभीर ॥
असट पुत्र स्रीराग के गुंड कुंभ हमीर ॥१॥
खसटम मेघ राग वै गावहि ॥
पांचउ संगि बरंगन लावहि ॥
सोरठि गोंड मलारी धुनी ॥
पुनि गावहि आसा गुन गुनी ॥
ऊचै सुरि सूहउ पुनि कीनी ॥
मेघ राग सिउ पांचउ चीनी ॥१॥
बैराधर गजधर केदारा ॥
जबलीधर नट अउ जलधारा ॥
पुनि गावहि संकर अउ सिआमा ॥
मेघ राग पुत्रन के नामा ॥१॥
खसट राग उनि गाए संगि रागनी तीस ॥
सभै पुत्र रागंन के अठारह दस बीस ॥१॥१॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “जिसके संग पाँच रागिनियाँ भी गाती हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।