अंग 1430

अंग
1430
राग Maalaa
राग: Maalaa · रचयिता: गुरु-वाणी
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पंच रागनी संगि उचरही ॥
प्रथम भैरवी बिलावली ॥
पुंनिआकी गावहि बंगली ॥
पुनि असलेखी की भई बारी ॥
ए भैरउ की पाचउ नारी ॥
पंचम हरख दिसाख सुनावहि ॥
बंगालम मधु माधव गावहि ॥१॥
ललत बिलावल गावही अपुनी अपुनी भांति ॥
असट पुत्र भैरव के गावहि गाइन पात्र ॥१॥
दुतीआ मालकउसक आलापहि ॥
संगि रागनी पाचउ थापहि ॥
गोंडकरी अरु देवगंधारी ॥
गंधारी सीहुती उचारी ॥
धनासरी ए पाचउ गाई ॥
माल राग कउसक संगि लाई ॥
मारू मसतअंग मेवारा ॥
प्रबलचंड कउसक उभारा ॥
खउखट अउ भउरानद गाए ॥
असट मालकउसक संगि लाए ॥१॥
पुनि आइअउ हिंडोलु पंच नारि संगि असट सुत ॥
उठहि तान कलोल गाइन तार मिलावही ॥१॥
तेलंगी देवकरी आई ॥
बसंती संदूर सुहाई ॥
सरस अहीरी लै भारजा ॥
संगि लाई पांचउ आरजा ॥
सुरमानंद भासकर आए ॥
चंद्रबिंब मंगलन सुहाए ॥
सरसबान अउ आहि बिनोदा ॥
गावहि सरस बसंत कमोदा ॥
असट पुत्र मै कहे सवारी ॥
पुनि आई दीपक की बारी ॥१॥
कछेली पटमंजरी टोडी कही अलापि ॥
कामोदी अउ गूजरी संगि दीपक के थापि ॥१॥
कालंका कुंतल अउ रामा ॥
कमलकुसम चंपक के नामा ॥
गउरा अउ कानरा कल्याना ॥
असट पुत्र दीपक के जाना ॥१॥
सभ मिलि सिरीराग वै गावहि ॥
पांचउ संगि बरंगन लावहि ॥
बैरारी करनाटी धरी ॥
गवरी गावहि आसावरी ॥
तिह पाछै सिंधवी अलापी ॥
सिरीराग सिउ पांचउ थापी ॥१॥
सालू सारग सागरा अउर गोंड गंभीर ॥
असट पुत्र स्रीराग के गुंड कुंभ हमीर ॥१॥
खसटम मेघ राग वै गावहि ॥
पांचउ संगि बरंगन लावहि ॥
सोरठि गोंड मलारी धुनी ॥
पुनि गावहि आसा गुन गुनी ॥
ऊचै सुरि सूहउ पुनि कीनी ॥
मेघ राग सिउ पांचउ चीनी ॥१॥
बैराधर गजधर केदारा ॥
जबलीधर नट अउ जलधारा ॥
पुनि गावहि संकर अउ सिआमा ॥
मेघ राग पुत्रन के नामा ॥१॥
खसट राग उनि गाए संगि रागनी तीस ॥
सभै पुत्र रागंन के अठारह दस बीस ॥१॥१॥
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली।

हिन्दी अर्थ: जिसके संग पाँच रागिनियाँ भी गाती हैं। राग भैरब की पहली नारी भैरवी, तदन्तर बिलावली, पुण्या और बंगली गाती है, फिर असलेखी की गाने की बारी आती है। यह राग भैरब की पाँच स्त्रियाँ हैं। भैरव राग के आठ पुत्र। पंचम। हरख। दिसाख। बंगालम। मधु। माधव। ललत। बिलावल। मधु, माधव भी अपना गान सुनाते हैं।॥१॥ साथ ही साथ ललित एवं बिलावल भी अपने तरीके से गाते हैं। इस राग भैरब के आठ पुत्रों का गायक गान करते हैं।॥१॥ राग मालकौंस की पाँच रागनियाँ। गौंडकरी। देवगंधारी। गंधारी। सीहुती। धनासरी। जिसके संग पाँच रागिनियाँ भी शामिल हैं। गोंडकी, देवगंधारी, गान्धारी, सीहुति और धनासरी- इन पाँचों को गाया जाता है। ये राग मालकौंस के साथ ही हैं। मारू, मस्तअंग, मेवारा, प्रबलचंड, कौसक, उभारा, खौखट और भौरानद गाए जाते हैं। ये आठों ही राग मालकौसक के साथ सुर के साथ सुर मिलाकर लगे हुए हैं।॥१॥ फिर राग हिंडोल पाँच रागिनियों एवं आठ पुत्रों के साथ आता है। यह तान उठाकर किल्लोल करता स्वर मिलाकर गान करता है॥१॥ हिंडोल की रागनियाँ। तेलंगी। देवकरी। बसंती। संदूर। सहस अहीरी। बसंती, सुन्दर संदूर और सरस अहीरी भी आती है। ये पाँचों अपने पति के संग ही रहती हैं। हिंडोल के पुत्र। सुरमानंद। भास्कर। चंद्र बिम्ब। मंगलन। सरस बान। बिनोदा। बसंत। कमोदा। चंद्रबिंब, मंगलन शोभा सहित आते हैं। सरसवान, विनोद, बसंत, कमोद भी साथ ही गाते हैं। इस तरह आठ पुत्रों के साथ हिंडोल सवारी करता है और दीपक राग की रागनियाँ। कछेली। पटमंजरी। टोडी। कामोदी। गूजरी। कछेली, पटमंजरी, टोडी गाती है और कामोदी एवं गूजरी साथ ही दीपक के संग रागिनियाँ मौजूद हैं॥१॥ राग दीपक के आठ पुत्र। कालंका। कुंतल। रामा। कमल कुसम। चंपक। गउरा। कानड़ा। कलाना। कमल-कुसुम, चंपक, गौरा, कानड़ा एवं कल्याण नामक दीपक राग के आठ पुत्र माने जाते हैं।॥१॥ सिरी राग की पाँच रागनियाँ। बैरारी। करनाटी। गवरी। आसावरी। सिंधवी। साथ ही पाँच रागिनियों को भी शामिल करते हैं। बैराड़ी, करनाटी, गवरी, आसावरी को वे गाते हैं और साथ सिंधर्वी का गान होता है। ये पाँचों रागिनियाँ सिरी राग के साथ विद्यमान हैं।॥ १॥ श्री राग के आठ पुत्र। सालू। सारग। सागरा। गौंड। गंभीर। गुंड। कुंभ। हमीर। गुंड, कुंभ तथा हमीर- ये श्री राग के आठ पुत्र हैं।॥ १॥ मेघ राग की रागनियाँ। सोरठ। गोंड। मलारी। आसा। सूहउ। इसके साथ ही पाँच रागिनियों को भी शामिल करते हैं। इसकी रागिनी सोरठ, गोंड, मलारी की ध्वनि होती है, फिर आसा को मधुर स्वर में गाया जाता है। उच्च स्वर में सूही का गान होता है। इस तरह मेघ राग के साथ पाँच रागिनियाँ हैं॥१॥ मेघ राग के आठ पुत्रों के नाम। बैराधर। गजधर। केदारा। जबलीधर। नट। जलधारा। संकर। सिआमा। जवलीधर, नट, जलधारा, शंकर और श्यामा भी गाए जाते हैं। ये मेघ राग के पुत्रों के नाम हैं॥१॥ कुल रागनियाँ – 30 हरेक राग के आठ पुत्र। छे रागों के कुल पुत्र- 48सारा जोड़- 6+30+48। 84

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “जिसके संग पाँच रागिनियाँ भी गाती हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।