अंग
1410
सवैये · वारों से अतिरिक्त सलोक
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· सवैया
उतंगी पैओहरी गहिरी गंभीरी ॥
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
सलोक वारां ते वधीक ॥
महला 1 ॥
उतंगी पैओहरी गहिरी गंभीरी ॥
ससुड़ि सुहीआ किव करी निवणु न जाइ थणी ॥
गचु जि लगा गिड़वड़ी सखीए धउलहरी ॥
से भी ढहदे डिठु मै मुंध न गरबु थणी ॥1॥
सुणि मुंधे हरणाखीए गूड़ा वैणु अपारु ॥
पहिला वसतु सिञाणि कै तां कीचै वापारु ॥
दोही दिचै दुरजना मित्रां कूं जैकारु ॥
जितु दोही सजण मिलनि लहु मुंधे वीचारु ॥
तनु मनु दीजै सजणा ऐसा हसणु सारु ॥
तिस सउ नेहु न कीचई जि दिसै चलणहारु ॥
नानक जिन॑ी इव करि बुझिआ तिन॑ा विटहु कुरबाणु ॥2॥
जे तूं तारू पाणि ताहू पुछु तिड़ंन॑ कल ॥
ताहू खरे सुजाण वंञा एन॑ी कपरी ॥3॥
झड़ झखड़ ओहाड़ लहरी वहनि लखेसरी ॥
सतिगुर सिउ आलाइ बेड़े डुबणि नाहि भउ ॥4॥
नानक दुनीआ कैसी होई ॥
सालकु मितु न रहिओ कोई ॥
भाई बंधी हेतु चुकाइआ ॥
दुनीआ कारणि दीनु गवाइआ ॥5॥
है है करि कै ओहि करेनि ॥
गल॑ा पिटनि सिरु खोहेनि ॥
नाउ लैनि अरु करनि समाइ ॥
नानक तिन बलिहारै जाइ ॥6॥
रे मन डीगि न डोलीऐ सीधै मारगि धाउ ॥
पाछै बाघु डरावणो आगै अगनि तलाउ ॥
सहसै जीअरा परि रहिओ मा कउ अवरु न ढंगु ॥
नानक गुरमुखि छुटीऐ हरि प्रीतम सिउ संगु ॥7॥
बाघु मरै मनु मारीऐ जिसु सतिगुर दीखिआ होइ ॥
आपु पछाणै हरि मिलै बहुड़ि न मरणा होइ ॥
सलोक वारां ते वधीक ॥
महला 1 ॥
उतंगी पैओहरी गहिरी गंभीरी ॥
ससुड़ि सुहीआ किव करी निवणु न जाइ थणी ॥
गचु जि लगा गिड़वड़ी सखीए धउलहरी ॥
से भी ढहदे डिठु मै मुंध न गरबु थणी ॥1॥
सुणि मुंधे हरणाखीए गूड़ा वैणु अपारु ॥
पहिला वसतु सिञाणि कै तां कीचै वापारु ॥
दोही दिचै दुरजना मित्रां कूं जैकारु ॥
जितु दोही सजण मिलनि लहु मुंधे वीचारु ॥
तनु मनु दीजै सजणा ऐसा हसणु सारु ॥
तिस सउ नेहु न कीचई जि दिसै चलणहारु ॥
नानक जिन॑ी इव करि बुझिआ तिन॑ा विटहु कुरबाणु ॥2॥
जे तूं तारू पाणि ताहू पुछु तिड़ंन॑ कल ॥
ताहू खरे सुजाण वंञा एन॑ी कपरी ॥3॥
झड़ झखड़ ओहाड़ लहरी वहनि लखेसरी ॥
सतिगुर सिउ आलाइ बेड़े डुबणि नाहि भउ ॥4॥
नानक दुनीआ कैसी होई ॥
सालकु मितु न रहिओ कोई ॥
भाई बंधी हेतु चुकाइआ ॥
दुनीआ कारणि दीनु गवाइआ ॥5॥
है है करि कै ओहि करेनि ॥
गल॑ा पिटनि सिरु खोहेनि ॥
नाउ लैनि अरु करनि समाइ ॥
नानक तिन बलिहारै जाइ ॥6॥
रे मन डीगि न डोलीऐ सीधै मारगि धाउ ॥
पाछै बाघु डरावणो आगै अगनि तलाउ ॥
सहसै जीअरा परि रहिओ मा कउ अवरु न ढंगु ॥
नानक गुरमुखि छुटीऐ हरि प्रीतम सिउ संगु ॥7॥
बाघु मरै मनु मारीऐ जिसु सतिगुर दीखिआ होइ ॥
आपु पछाणै हरि मिलै बहुड़ि न मरणा होइ ॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा एक हैं। उनका नाम ‘सत्’ है, यानी सदा अस्तित्व में रहने वाला। वे सृष्टि के रचयिता हैं और सबमें व्याप्त हैं। वे भय और वैर से रहित हैं। उनका स्वरूप काल से परे है। वे जन्म नहीं लेते और स्वयं प्रकाशमान हैं। उन्हें सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (वे श्लोक जो ‘आदिग्रंथ' की बाईस वारों में से बढ़ गए, जिनका उन वारों में संकलन नहीं हो सका। इसलिए गुरु अर्जुन देव जी ने उन श्लोकों का ‘सलोक वारां ते वर्धीक' नामक शीर्षक पर संकलन किया) महला 1 ॥ ऊँचे लंबे कद वाली। भरी जवानी में पहुँची हुई। माण में मॅती हुई मस्त चाल वाली (अपनी सहेली को कहती है: हे सहेलिए!) भरी हुई छाती के कारण मुझसे झुका नहीं जाता। (बताइए।) मैं (अपनी) सास को नमस्कार कैसे करूँ। (कैसे माथा टेकूँ।)। (आगे से सहेली उत्तर देती है: देखिए।) जो पहाड़ों जैसे पक्के महलों को चूने का पलस्तर लगा होता था। वह (पक्के महल) भी गिरते मैंने देख लिए हैं (आपकी जवानी की तो कोई बिसात ही नहीं है) हे सहेलिए! (इस) भरी हुई जवानी के कारण अहंकार ना करें (इस जवानी को जाते देर नहीं लगनी।)। 1। हे सुंदर नेत्रों वाली भोली जवान कन्या! (हे जगत-रचना में से सोहणी जीव-सि्त्रऐ!) मेरी एक बहुत गहरी भेद की बात सुनें। (जब कोई चीज़ खरीदने लगें, तो) पहले (उस) चीज़ को परख के तब उसका व्च्यापार करना चाहिए (तभी वह खरीदनी चाहिए)। हे भोली जवान कन्या! (कामादिक विकार आत्मिक जीवन के वैरी हैं। इन) दुष्टों को (अंदर से निकाल भगाने के लिए प्रभू की सिफत-सालाह की) दुहाई देते रहना चाहिए (भले गुण आत्मिक जीवन के असल मित्र हैं। इन) मित्रों के साथ की खातिर (परमात्मा की) सिफत-सालाह करते रहना चाहिए। हे भोलीऐ! जिस दोहाई की बरकति से ये सज्जन मिले रहें। (उस दोहाई की) विचार को (अपने अंदर) संभाल के रखें। (इन) सज्जनों (के मिलाप) की खातिर अपना तन अपना मन भेट कर देना चाहिए (अपने मन और अपनी इन्द्रियों की नीच प्रेरणा से बचे रहना चाहिए) (इस तरह एक) ऐसा (आत्मिक) आनंद पैदा होता है (जो अन्य सारी खुशियों से श्रेष्ठ होता है)। हे भोलिऐ! (ये जगत-पसारा) नाशवंत दिख रहा है; इससे मोह नहीं करना चाहिए। हे नानक! (कहें:) जिन (भाग्यशालियों ने) (आत्मिक जीवन के भेद को) इस तरह समझा है मैं उन पर से सदके (जाता हूँ)। 2। हे भाई! अगर आप (संसार-समुंद्र के) पानियों का तैराक (बनना चाहते हैं), (तो तैरने की जाच) उनसे पूछें (जिनको इस संसार-समुंद्र में से) पार लांघ जाने का सलीका है। हे भाई! वह मनुष्य असल समझदार (तैराक हैं। जो संसार-समुंद्र की इन विकारों की लहरों में से पार लांघते हैं)। मैं (भी उनकी संगति में ही) इन लहरों से पार लांघ सकता हूँ। 3। हे भाई! (इस संसार-समुंद्र में विकारों की) झड़ियां (लगीं हुई हैं। विकारों के) झक्खड़ (झूल रहे हैं। विकारों की) बाढ़ (आ रही है। विकारों की) लाखों लहरें उठ रही हैं। (अगर आप अपनी जिंदगी की बेड़ी को बचाना चाहते हैं, तो) गुरू के पास पुकार करें (इस तरह आपकी जीवन-) नईया का (इस संसार-समुंद्र में) डूब जाने का कोई खतरा नहीं रह जाएगा। 4। हे नानक! दुनिया (की लुकाई) अजब नीचली तरफ जा रही है। सही जीवन-रास्ता बताने वाले मित्र कहीं कोई मिलते नहीं। भाईयों-सम्बन्धियों के मोह में फस के (मनुष्य परमात्मा का) प्यार (अपने अंदर से खत्म किए बैठा है) दुनिया (की माया) की खातिर आत्मिक जीवन का सरमाया गवाए जा रहा है। 5। हे भाई! (किसी प्यारे सम्बन्धि के मरने पर औरतें) 'हाय-हाय' कह-कह के 'ओय ओय' करती हैं (मुँह से कहती हैं। अपनी) गालों को पीटती हैं (अपने) सिर (के बाल) खींचती हैं (यह बहुत ही बुरा काम है)। हे भाई! जो प्राणी (ऐसे सदमे के समय भी परमात्मा का) नाम जपते हैं। और (परमात्मा की) रज़ा को मानते हैं। नानक उनके सदके जाता है। 6। हे मन! (विकारों-भरे) टेढ़े (जीवन-) राह पर नहीं भटकते फिरना चाहिए। हे मन! सीधे (जीवन-) राह पर दौड़ें। (टेढ़े रास्ते पर चलने से) इस लोक में भयानक आत्मिक मौत (आत्मिक जीवन को खाए जाती है। और) आगे परलोक में जठराग्नि के बवंडर में (डुबो लेती है भाव। जनम-मरण का चक्र ग्रस लेता है)। (टेढ़े रास्ते पर चलने से हर वक्त यह) जिंद सहम में पड़ी रहती है। हे मन! (इस टेढ़े रास्ते से बचने के लिए गुरू की शरण के बिना) मुझे कोई और तरीका नहीं सूझता। हे नानक! गुरू की शरण पड़ कर (ही इस टेढ़े रास्ते से) बचा जा सकता है। और प्रीतम प्रभू का साथ बन सकता है। 7। हे भाई! जिस (मनुष्य) को गुरू की शिक्षा (प्राप्त) होती है। (उसका) मन वश में आ जाता है। (उसके अंदर से आत्मिक जीवन को खा जाने वाला) बाघ मर जाता है। (वह मनुष्य) अपने आत्मिक जीवन को परखता रहता है। वह परमात्मा को मिल जाता है। दोबारा उस को जनम-मरन का चक्कर नहीं पड़ता।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1410 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।