अंग 1409

अंग
1409
राग Svaiyay Mehl 5
राग: Svaiyay Mehl 5 · रचयिता: Bhatt Mathuraa
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਵਤ ਦੇਵ ਸਬੈ ਮੁਨਿ ਇੰਦ੍ਰ ਮਹਾ ਸਿਵ ਜੋਗ ਕਰੀ ॥
ਫੁਨਿ ਬੇਦ ਬਿਰੰਚਿ ਬਿਚਾਰਿ ਰਹਿਓ ਹਰਿ ਜਾਪੁ ਨ ਛਾਡੵਿਉ ਏਕ ਘਰੀ ॥
ਮਥੁਰਾ ਜਨ ਕੋ ਪ੍ਰਭੁ ਦੀਨ ਦਯਾਲੁ ਹੈ ਸੰਗਤਿ ਸ੍ਰਿਸ੍ਟਿ ਨਿਹਾਲੁ ਕਰੀ ॥
ਰਾਮਦਾਸਿ ਗੁਰੂ ਜਗ ਤਾਰਨ ਕਉ ਗੁਰ ਜੋਤਿ ਅਰਜੁਨ ਮਾਹਿ ਧਰੀ ॥੪॥
अंतु न पावत देव सबै मुनि इंद्र महा सिव जोग करी ॥
फुनि बेद बिरंचि बिचारि रहिओ हरि जापु न छाडॵिउ एक घरी ॥
मथुरा जन को प्रभु दीन दयालु है संगति स्रिस्टि निहालु करी ॥
रामदासि गुरू जग तारन कउ गुर जोति अरजुन माहि धरी ॥४॥

हिन्दी अर्थ: इन्द्र और शिव जी ने जोग-साधना की। पर इन सभी देवताओं और मुनियों ने (गुरू अरजुन का) अंत नहीं पाया। ब्रहमा बेद विचार के थक गया। उसने हरी का जाप एक घड़ी ना छोड़ा। दास मथुरा का प्रभू (गुरू अरजुन) दीनों पर दया करने वाला है। आपने संगत को और सृष्टि को निहाल किया है। गुरू रामदास जी ने जगत के उद्धार के लिए गुरू वाली जोति गुरू अरजुन में रख दी। 4।
ਜਗ ਅਉਰੁ ਨ ਯਾਹਿ ਮਹਾ ਤਮ ਮੈ ਅਵਤਾਰੁ ਉਜਾਗਰੁ ਆਨਿ ਕੀਅਉ ॥
ਤਿਨ ਕੇ ਦੁਖ ਕੋਟਿਕ ਦੂਰਿ ਗਏ ਮਥੁਰਾ ਜਿਨੑ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਪੀਅਉ ॥
ਇਹ ਪਧਤਿ ਤੇ ਮਤ ਚੂਕਹਿ ਰੇ ਮਨ ਭੇਦੁ ਬਿਭੇਦੁ ਨ ਜਾਨ ਬੀਅਉ ॥
ਪਰਤਛਿ ਰਿਦੈ ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕੈ ਹਰਿ ਪੂਰਨ ਬ੍ਰਹਮਿ ਨਿਵਾਸੁ ਲੀਅਉ ॥੫॥
जग अउरु न याहि महा तम मै अवतारु उजागरु आनि कीअउ ॥
तिन के दुख कोटिक दूरि गए मथुरा जिन॑ अंम्रित नामु पीअउ ॥
इह पधति ते मत चूकहि रे मन भेदु बिभेदु न जान बीअउ ॥
परतछि रिदै गुर अरजुन कै हरि पूरन ब्रहमि निवासु लीअउ ॥५॥

हिन्दी अर्थ: जगत के इस घोर अंधेरे में (गुरू अरजुन के बिना) कोई और (रखवाला) नहीं। उसी को (हरी ने) ला के उजागर अवतार बनाया है। हे मथुरा ! जिन्होंने (उससे) नाम-अमृत पिया है उनके करोड़ों दुख दूर हो गए हैं। हे मेरे मन ! कहीं इस राह से भटक ना जाना। कहीं ये दूरी ना समझना। कि गुरू अरजुन (हरी से अलग) दूसरा है। पूरन ब्रहम हरी ने गुरू अरजन के हृदय में प्रत्यक्ष तौर पर निवास किया है। 5।
ਜਬ ਲਉ ਨਹੀ ਭਾਗ ਲਿਲਾਰ ਉਦੈ ਤਬ ਲਉ ਭ੍ਰਮਤੇ ਫਿਰਤੇ ਬਹੁ ਧਾਯਉ ॥
ਕਲਿ ਘੋਰ ਸਮੁਦ੍ਰ ਮੈ ਬੂਡਤ ਥੇ ਕਬਹੂ ਮਿਟਿ ਹੈ ਨਹੀ ਰੇ ਪਛੁਤਾਯਉ ॥
ਤਤੁ ਬਿਚਾਰੁ ਯਹੈ ਮਥੁਰਾ ਜਗ ਤਾਰਨ ਕਉ ਅਵਤਾਰੁ ਬਨਾਯਉ ॥
ਜਪੵਉ ਜਿਨੑ ਅਰਜੁਨ ਦੇਵ ਗੁਰੂ ਫਿਰਿ ਸੰਕਟ ਜੋਨਿ ਗਰਭ ਨ ਆਯਉ ॥੬॥
जब लउ नही भाग लिलार उदै तब लउ भ्रमते फिरते बहु धायउ ॥
कलि घोर समुद्र मै बूडत थे कबहू मिटि है नही रे पछुतायउ ॥
ततु बिचारु यहै मथुरा जग तारन कउ अवतारु बनायउ ॥
जपॵउ जिन॑ अरजुन देव गुरू फिरि संकट जोनि गरभ न आयउ ॥६॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जब तक माथे के भाग्य नहीं थे जागे। तब तक बहुत भटकते फिरते और भागते फिरते थे। पछतावा किसी भी वक्त नहीं मिटता था। पर। हे मथुरा ! अब सच्ची विचार ये है कि जगत के उद्धार के लिए (हरी ने गुरू अरजुन) अवतार बनाया है। जिन्होंने गुरू अरजुन देव (जी) को जपा है। वे पलट के गर्भ जोनि और दुखों में नहीं आए। 6।
ਕਲਿ ਸਮੁਦ੍ਰ ਭਏ ਰੂਪ ਪ੍ਰਗਟਿ ਹਰਿ ਨਾਮ ਉਧਾਰਨੁ ॥
ਬਸਹਿ ਸੰਤ ਜਿਸੁ ਰਿਦੈ ਦੁਖ ਦਾਰਿਦ੍ਰ ਨਿਵਾਰਨੁ ॥
ਨਿਰਮਲ ਭੇਖ ਅਪਾਰ ਤਾਸੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਮਨ ਬਚ ਜਿਨਿ ਜਾਣਿਅਉ ਭਯਉ ਤਿਹ ਸਮਸਰਿ ਸੋਈ ॥
ਧਰਨਿ ਗਗਨ ਨਵ ਖੰਡ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਸ੍ਵਰੂਪੀ ਰਹਿਓ ਭਰਿ ॥
ਭਨਿ ਮਥੁਰਾ ਕਛੁ ਭੇਦੁ ਨਹੀ ਗੁਰੁ ਅਰਜੁਨੁ ਪਰਤਖੵ ਹਰਿ ॥੭॥੧੯॥
कलि समुद्र भए रूप प्रगटि हरि नाम उधारनु ॥
बसहि संत जिसु रिदै दुख दारिद्र निवारनु ॥
निरमल भेख अपार तासु बिनु अवरु न कोई ॥
मन बच जिनि जाणिअउ भयउ तिह समसरि सोई ॥
धरनि गगन नव खंड महि जोति स्वरूपी रहिओ भरि ॥
भनि मथुरा कछु भेदु नही गुरु अरजुनु परतखॵ हरि ॥७॥१९॥

हिन्दी अर्थ: कलजुग के समुंद्र से तैराने के लिए गुरू अरजुन देव जी हरी का नाम-रूप प्रकट हुए हैं। आप के हृदय में संत (शांति के श्रोत प्रभू जी) बसते हैं। आप दुखों-दरिद्रों के दूर करने वाले हैं। उस (गुरू अरजुन) के बिना और कोई नहीं। आप अपार हरी का निर्मल रूप हैं। जिस (मनुष्य) ने मन और वचनों से हरी को पहचाना है। वह हरी जैसा ही हो गया है। (गुरू अरजुन ही) जोति-रूप हो के धरती आकाश और नौ-खण्डों में व्याप रहा है। हे मथुरा ! कह- गुरू अरजुन साक्षात अकाल पुरख है। कोई फर्क नहीं। 7। 19।
ਅਜੈ ਗੰਗ ਜਲੁ ਅਟਲੁ ਸਿਖ ਸੰਗਤਿ ਸਭ ਨਾਵੈ ॥
ਨਿਤ ਪੁਰਾਣ ਬਾਚੀਅਹਿ ਬੇਦ ਬ੍ਰਹਮਾ ਮੁਖਿ ਗਾਵੈ ॥
ਅਜੈ ਚਵਰੁ ਸਿਰਿ ਢੁਲੈ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਮੁਖਿ ਲੀਅਉ ॥
ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਸਿਰਿ ਛਤ੍ਰੁ ਆਪਿ ਪਰਮੇਸਰਿ ਦੀਅਉ ॥
ਮਿਲਿ ਨਾਨਕ ਅੰਗਦ ਅਮਰ ਗੁਰ ਗੁਰੁ ਰਾਮਦਾਸੁ ਹਰਿ ਪਹਿ ਗਯਉ ॥
ਹਰਿਬੰਸ ਜਗਤਿ ਜਸੁ ਸੰਚਰੵਉ ਸੁ ਕਵਣੁ ਕਹੈ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੁ ਮੁਯਉ ॥੧॥
अजै गंग जलु अटलु सिख संगति सभ नावै ॥
नित पुराण बाचीअहि बेद ब्रहमा मुखि गावै ॥
अजै चवरु सिरि ढुलै नामु अंम्रितु मुखि लीअउ ॥
गुर अरजुन सिरि छत्रु आपि परमेसरि दीअउ ॥
मिलि नानक अंगद अमर गुर गुरु रामदासु हरि पहि गयउ ॥
हरिबंस जगति जसु संचरॵउ सु कवणु कहै स्री गुरु मुयउ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू अरजुन देव जी की दरगाह में) कभी ना खत्म होने वाला (नाम-रूप) गंगा जल (बह रहा है। जिसमें) सारी संगति स्नान करती है। (आपकी हजूरी में इतने महा ऋषि ब्यास की लिखी हुई धर्म पुस्तकें) पुराण सदा पढ़े जाते हैं और ब्रहमा (भी आपकी हजूरी में) मुँह से वेदों को गा रहा है (भाव। ब्यास और ब्रहमा जैसे बड़े-बड़े देवते और विद्वान ऋषि भी गुरू अरजुन के दर पर हाजिर रहने में अपने अच्छे भाग्य समझते हैं। मेरे लिए तो गुरू की बाणी ही पुराण और वेद है)। (आप के) सिर पर ईश्वरीय चवर झूल रहा है। आप ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम मुँह से (सदा) उचारा है। गुरू अरजन देव जी के सिर पर यह छत्र परमेश्वर ने स्वयं बख्शा है। गुरू नानक। गुरू अंगद और गुरू अमरदास जी को मिल के। गुरू रामदास जी हरी में लीन हो गए हैं। हे हरिबंस ! जगत में सतिगुरू जी की शोभा पसर रही है। कौन कहता है। कि गुरू रामदास जी मर गए हैं।
ਦੇਵ ਪੁਰੀ ਮਹਿ ਗਯਉ ਆਪਿ ਪਰਮੇਸ੍ਵਰ ਭਾਯਉ ॥
ਹਰਿ ਸਿੰਘਾਸਣੁ ਦੀਅਉ ਸਿਰੀ ਗੁਰੁ ਤਹ ਬੈਠਾਯਉ ॥
ਰਹਸੁ ਕੀਅਉ ਸੁਰ ਦੇਵ ਤੋਹਿ ਜਸੁ ਜਯ ਜਯ ਜੰਪਹਿ ॥
ਅਸੁਰ ਗਏ ਤੇ ਭਾਗਿ ਪਾਪ ਤਿਨੑ ਭੀਤਰਿ ਕੰਪਹਿ ॥
ਕਾਟੇ ਸੁ ਪਾਪ ਤਿਨੑ ਨਰਹੁ ਕੇ ਗੁਰੁ ਰਾਮਦਾਸੁ ਜਿਨੑ ਪਾਇਯਉ ॥
ਛਤ੍ਰੁ ਸਿੰਘਾਸਨੁ ਪਿਰਥਮੀ ਗੁਰ ਅਰਜੁਨ ਕਉ ਦੇ ਆਇਅਉ ॥੨॥੨੧॥੯॥੧੧॥੧੦॥੧੦॥੨੨॥੬੦॥੧੪੩॥
देव पुरी महि गयउ आपि परमेस्वर भायउ ॥
हरि सिंघासणु दीअउ सिरी गुरु तह बैठायउ ॥
रहसु कीअउ सुर देव तोहि जसु जय जय जंपहि ॥
असुर गए ते भागि पाप तिन॑ भीतरि कंपहि ॥
काटे सु पाप तिन॑ नरहु के गुरु रामदासु जिन॑ पाइयउ ॥
छत्रु सिंघासनु पिरथमी गुर अरजुन कउ दे आइअउ ॥२॥२१॥९॥११॥१०॥१०॥२२॥६०॥१४३॥

हिन्दी अर्थ: (गुरू रामदास) सचखण्ड में गए हैं हरी को यही रज़ा ठीक लगी है। हरी ने (आप को) तख्त दिया है और उस पर श्री गुरू (रामदास जी) को बैठाया है। देवताओं ने मंगलचार किया है। तेरा यश और जय-जयकार कर रहे हैं। वह (सारे) दैत्य (वहाँ से) भाग गए हैं। (उनके अपने) पाप उनके अंदर काँप रहे हैं। उन मनुष्यों के पाप कट गए हैं। जिन को गुरू रामदास मिल गया है। गुरू रामदास धरती का छत्र और सिंहासन गुरू अरजुन साहिब जी को दे आया है। 2। 21।

संदर्भ: यह अंग 1409 है, राग Svaiyay Mehl 5 का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Bhatt Mathuraa।

भट्ट सवैये, formal-praise, मगर substance पूरा devotional।

Mehrauli के पुराने पत्थरों के पास, 800 साल का इतिहास और एक 600 साल पुरानी पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 30 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 1409” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Svaiyay Mehl 5 राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 1410 →, पीछे का: ← अंग 1408

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।