सलोक 75 ॥ फरीदा पंखी फूले रुख जोड़ि नकेरा खाइ ॥ जे जाणा पंखी जाणी तितु थां न जायी ॥75॥
सलोक 76 ॥ फरीदा कूचे फरीदा मंजल दूरि ॥ जितु कीतेहि सो लेइ खुदाइ हजूरि ॥76॥
फ़रीद ख़ुद को address करते हैं। “कूचे फरीदा।” फ़रीद के कूचे (गली)। “मंजल दूरि।” मंजिल दूर है।
यानी फ़रीद की गली अभी “कूचा” (small lane) है। और मंज़िल (destination) बहुत दूर।
“जितु कीतेहि सो लेइ खुदाइ हजूरि।” जो कुछ किया है, वो ख़ुदा के “हुज़ूरि” (सामने) में ले जाओगे।
फ़रीद यह बहुत honest moment है। पूरी ज़िंदगी पर reflect कर रहे हैं। “मैं ने कितना सफ़र किया, मगर मंज़िल अभी दूर है।” और “जो किया है, वो साथ ले जाऊँगा।”
यह सबसे honest old-age realization है। बहुत कुछ achieve किया, मगर असली journey अभी पूरी नहीं। और जो record है, वो उसके सामने जाएगा।
सलोक 77 ॥ फरीदा पाटु ओहो खालसा जे पैंडा बहु दूरि ॥ रबु नालि ज लडे लड़े बाझ सहारा नदि न पूरि ॥77॥
फ़रीद “खालसा” शब्द use करते हैं। “पाटु ओहो खालसा।” वो “पाटु” (निर्वाह, path) “खालसा” (pure, ख़ालिस)। “जे पैंडा बहु दूरि।” अगर रास्ता बहुत दूर है।
“रबु नालि ज लडे।” अगर रब “नालि” (साथ) “लड़े” (हो)। “लड़े बाझ।” “लड़े” (एक तरफ़, अकेला)। “सहारा नदि न पूरि।” “नदि” (नदी) “पूरि” (पार) नहीं होती बिना सहारा।
यानी रास्ता लम्बा है, मगर खालसा (शुद्ध) वो जो रब को “साथ” रखता है। बिना सहारा, नदी पार नहीं हो सकती।
फ़रीद ख़ुद को कह रहे हैं: रास्ता लम्बा है। मगर अगर रब साथ है, चलोगे। और बिना सहारा? कुछ नहीं।
यह सिख कांसेप्ट “खालसा” का pre-version है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने यह formal कर दिया, मगर concept कबीर-फ़रीद के time से था।
सलोक 78 ॥ फरीदा गलि चलि के मरि मरि सहु जरीआ ॥ पिर पाछै फिरि न आइसी आउ करीआ ॥78॥
फ़रीद का urgent message। “गलि चलि के।” गलियों में चल कर। “मरि मरि सहु जरीआ।” मर-मर के “जरीआ” (सहना), “सह” (साईं) के नाम पर।
यानी ज़िंदगी की गलियों में चल, मर-मर के सहो, साईं के नाम पर।
“पिर पाछै फिरि न आइसी।” “पिर” (पति, साईं) पाछे “फिरि न आइसी” (फिर नहीं आएगा)। “आउ करीआ।” आओ, “करीआ” (कर्म)।
फ़रीद कह रहे हैं: यह life का chance फिर नहीं आएगा। यह specific window है। अभी कर्म करो।
यह urgent मगर hopeful है। urgency यह है कि time limited है। hope यह है कि “करना” अभी possible है।
सलोक 79 ॥ फरीदा जिनि कामि न आवै सोई कीचै कामु ॥ नहीं न लंघी जे न लंघई परवै सुलतानी मामु ॥79॥
फ़रीद का sharp instruction। “जिनि कामि न आवै सोई कीचै कामु।” जो काम काम नहीं आते, वही काम करो।
यह paradoxical है। बेकार काम क्यों? क्योंकि वो “बेकार” काम (spiritual practice, सेवा, charity) ही असली काम हैं, हरि के सामने।
“नहीं न लंघी जे न लंघई।” “लंघी” (पार, या short) नहीं, “नहीं” करोगे तो “लंघई” (long, troubled) नहीं। “परवै सुलतानी मामु।” “परवै” (परवाह) “सुलतान” (बड़ा master, राजा) “मामु” (मामला)।
फ़रीद कह रहे हैं: अगर तू “बेकार” काम (spirituality) नहीं करता, तो “सुल्तान” (साईं) के सामने तू troubled होगा।
modern context: हम सब “useful” काम करते हैं। career, money, network। मगर असली “मेकार” (बेकार से ज़्यादा important) काम spirituality है। फ़रीद कह रहे हैं, यह कमी सुल्तान के सामने बहुत बड़ी होगी।
सलोक 80 ॥ फरीदा मां कीतीआ कउसे चुकि चुकि उठहि ओह ॥ जेहड़े वैरी सेव करि उनहां पैरीं हटहि ओह ॥80॥
फ़रीद एक interesting wisdom। “मां कीतीआ कउसे।” “मां” (माँ) ने जो “कउसे” (favours) किए। “चुकि चुकि उठहि ओह।” वो “चुकि” (एक-एक करके) “उठहि” (निकलते जाते हैं)।
यानी माँ की गोद के favours धीरे-धीरे ख़त्म होते जाते हैं। माँ चली जाती है, या उसकी protection हट जाती है।
“जेहड़े वैरी सेव करि।” जो “वैरी” (दुश्मन) सेवा कर लो। “उनहां पैरीं हटहि ओह।” उनके पैरों में “हटहि ओह” (हट कर बैठो)।
फ़रीद का radical instruction: अपने “वैरी” की सेवा करो। उनके “पैरों” में बैठो।
यह सूफ़ी का सबसे inverted teaching है। हम सब अपने दुश्मनों से बचते हैं, या लड़ते हैं। फ़रीद कह रहे हैं, उनकी सेवा करो, उनके पैर छुओ।
यह आसान नहीं। मगर इसका psychological effect amazing है। जब आप अपने enemy को genuinely serve करते हो, उसकी enmity dissolve हो जाती है। यह सबसे effective conflict-resolution है।
सलोक 81 ॥ फरीदा सरवरि बैसा रहै बंधि रिणी असगाहु ॥ नोचुड़ि हलइ कै तरई न खंडी अंस अनाहु ॥81॥
फ़रीद एक interesting metaphor। “सरवरि बैसा।” तालाब में बैठो। “रहै बंधि रिणी असगाहु।” “बंधि” (बंधे), “रिणी” (ऋणी, debtor), “असगाहु” (असगाहो, सहो) रहे।
यानी तालाब में बैठो, बंधे हुए (साईं से), ऋणी (शुक्रगुज़ार), सहन करो।
“नोचुड़ि हलइ कै तरई न।” “नोचुड़ि” (कमर हिला कर) “तरई” (तैरे) नहीं। “खंडी अंस अनाहु।” “खंडी” (कण-कण), “अंस अनाहु” (अमृत, अंशामृत)।
फ़रीद कह रहे हैं: तालाब में हाथ-पैर मार-मार कर मत तैरो। शांत रहो, सब्र से। तब हर “कण” अमृत बन जाएगा।
यह wisdom Zen-like है। struggling मत करो। सब्र। और हर moment ख़ुद-ब-ख़ुद अमृत हो जाएगा।
सलोक 82 ॥ फरीदा बंदगी रबसुदाइ की भलि भली रति होइ ॥ लामी लोचणि लाड़ डडे चाटी दूर खलोइ ॥82॥
फ़रीद की closing intimacy। “बंदगी रबसुदाइ की।” रब-सिवाय की “बंदगी” (समर्पण)। “भलि भली रति होइ।” “रति” (रात, या प्रेम) “भली भली” (बहुत अच्छी) हो।
यानी रब के सामने बन्दगी, इसमें रात (या love) सबसे अच्छी है।
“लामी लोचणि लाड़।” “लोचणि” (आँख) “लामी” (लम्बी, खुली)। “डडे चाटी दूर खलोइ।” “डडे” (दूर) “चाटी” (बेखुदी) “खलोइ” (खड़े)।
फ़रीद एक scene paint कर रहे हैं: रब के सामने नींद की खुली आँखों से, थोड़ी दूर “बेखुदी” (intoxication) में खड़े।
यह intimate worship है। मगर एक distance भी। बहुत close मत जाओ। एक “अदब” (etiquette) रखो। मगर बेखुदी में रहो।
सलोक 83 ॥ फरीदा खाक न निंदिए खाकू जेडु न कोइ ॥ जीवदिआ पैरां तले मुइआ उपरि होइ ॥83॥
अंतिम बार ख़ाक की महिमा। अंग 1378 सलोक 15 / 1379 सलोक 16 का echo।
फ़रीद बार-बार यह बात रखते हैं। यह उनकी core philosophy है। मिट्टी से बने हो, मिट्टी में जाओगे। बीच में अहंकार मत रखो।
और एक beautiful aspect: मिट्टी कभी क्रोधित नहीं होती। हर पैर सहती है, हर पौधा देती है। यह पूरी silent generosity है।
फ़रीद का instruction: ऐसी बनो। तब तू असली sufi है।
सलोक 84 ॥ फरीदा गलाण कीडे जिवारिले लउ नहीं जिवालिआ ॥ जीआं भोगणि अनद बिनासि गए सुहासि लाहइआ ॥84॥
फ़रीद के सलोकों का closing। “गलाण कीडे।” “गलाण” (वर्तालाप, बातें), “कीडे” (कीट, छोटे जीव)। “जिवारिले लउ नहीं जिवालिआ।” “जीव” (जान, life) नहीं “जिवालिआ” (जिलाई)।
यानी आदमी बातें बहुत करता है (कीड़ों की तरह), मगर असली ज़िंदगी नहीं जिया।
“जीआं भोगणि अनद बिनासि गए।” “जीव” “भोगणि” (भोग, indulge) में “अनद” (आनन्द) “बिनासि” (बिना नष्ट) “गए” (गया)। “सुहासि लाहइआ।” “सुहासि” (साथी) “लाहइआ” (छूट गया)।
फ़रीद का final observation: आदमी आनन्द में, indulgence में बेहद busy रहता है। फिर एक दिन साथी छूट जाते हैं। ज़िंदगी समाप्त।
यह सब फ़रीद के सलोकों का summary है। ज़िंदगी fleeting है। comfort मत ढूँढ़ो, ज़मीन (असली बात) ढूँढ़ो। साईं को याद रखो, क्योंकि साथी छूट जाते हैं, साईं ही बचता है।
फ़रीद बाबा की 130+ सलोक यहाँ ख़त्म होते हैं। अगले अंगों पर (1384 आगे) उनकी सलोकों के जवाब में सिख गुरुओं (नानक, अंगद, अर्जन) के सलोक भी आते हैं। यह interfaith dialogue का अनूठा example है, ग्रंथ साहिब में।
फ़रीद का nature-observation। “पंखी फूले रुख जोड़ि नकेरा खाइ।” पंछी “फूले रुख” (खिलते हुए पेड़) पर बैठ कर “नकेरा खाइ” (फल खाते हैं)।
पंजाब का scene: फलों से लदा पेड़, पंछी बैठ कर खा रहे हैं।
“जे जाणा पंखी जाणी।” अगर मैं जानता कि पंछी कैसे जानते हैं। “तितु थां न जायी।” तो उस जगह नहीं जाता।
फ़रीद का statement: पंछी जो जानते हैं (कि कौनसा फल पका है, कौनसा available है), वो मनुष्य नहीं जानते।
और implicit: पंछी अपना काम जानते हैं, अपने moment में present हैं। हम मनुष्य distracted हैं, और बहुत कुछ “miss” करते हैं।
दिल्ली की birds को देखो। वो हर सुबह खुश हैं, हर शाम वापस अपने nest। कोई आदमी अगर इतनी contentment से जिए, चमत्कार हो जाए।